संजय सिन्हा-
जब बाप चोर होगा, तो कलाई पर लिखा जाएगा, मेरा बाप चोर है!
कुंती का पुत्र होने के बावजूद कर्ण पांडवों के साथ नहीं, कौरवों के खेमे में खड़ा था।
रावण का भाई होने के बावजूद विभीषण राम के साथ खड़ा था।
आदमी की पहचान केवल उसके जन्म से नहीं होती, उसकी पहचान इस बात से भी होती है कि वह किसके साथ है।
इन दिनों बहस चल रही है कि जंतर मंतर पर रिपोर्टर के माइक को देखकर प्रदर्शनकारी ने उसे ‘गोदी मीडिया’ कहकर हूट कर रहे हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि पत्रकार को अपना काम करने देना चाहिए, मीडिया की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए और किसी रिपोर्टर के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए।
बिल्कुल। पत्रकार को अपना काम करने देना चाहिए। किसी रिपोर्टर को भीड़ के सामने अपमानित करना अच्छा दृश्य नहीं है। गोदी मीडिया कह कर भगाना भी अच्छी बात नहीं है।
यहां संजय सिन्हा का प्रश्न है कि किसी पत्रकार की छवि ऐसी बनी ही क्यों कि सार्वजनिक रूप से उसे भीड़ की लज्जा का सामना करना पड़े?
क्या जनता किसी रिपोर्टर को पहली बार देखकर अचानक कोई नाम दे देती है? किसी भी प्रश्न का उत्तर होता है। ज़रूरत होती है उत्तर तलाशने की।
पिछले बारह वर्षों में मीडिया का व्यवहार, खबरों का चुनाव, सवालों की दिशा और सत्ता के साथ संबंधों का सच अब किससे छिपा रह गया है?
गोदी मीडिया शब्द सुन कर चैनल अपने रिपोर्टर के साथ खड़ा हो, यह स्वाभाविक है। वह अपने कर्मचारी का बचाव करेगा। करना भी चाहिए। लेकिन बाकी लोगों को यह समझना होगा कि छवि एक दिन में, दो दिन में नहीं बनती। किसी एक घटना से नहीं बनती। छवि लगातार किए गए काम, बार बार चुने गए पक्ष और लंबे समय तक दिखाई देने वाले व्यवहार से बनती है।
यहां संजय सिन्हा का मानना है कि जब आप वर्षों तक एक खास दिशा में चलते हैं, तो एक दिन रास्ते में खड़ा आदमी आपको उसी दिशा का यात्री कह ही देगा। इसमें आश्चर्य कैसा?
‘गोदी मीडिया’ शब्द को लोकप्रिय बनाने वालों में ‘एनडीटीवी’ के पूर्व संपादक रवीश कुमार का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। विडंबना देखिए कि फिलहाल उसी चैनल की एक रिपोर्टर को इस संबोधन का सामना करना पड़ा। माइक आईडी देख कर उसे जंतर मंतर से भगाया गया।
एक पत्रकार को शर्मसार होना पड़ा। क्यों? पत्रकार की छवि के कारण?
नहीं।.. मालिक की छवि के कारण।
वो भीड़ जानती है कि चैनल का मालिकाना हक बदल गया है। और जब प्रबंधन बदला तो जाहिर है जनता की नजर में छवि भी बदली। पत्रकार शायद वही काम कर रहे हों, लेकिन जनता अब उन्हें किस नजर से देखती है, यह भी एक हकीकत है।
मैं साफ कहता हूं कि किसी आदमी की छवि केवल किसी के आरोप लगाने से नहीं बनती या बिगड़ती है। छवि बनती और बिगड़ती है लगातार किए जाने वाले व्यवहार से।
आरोप गलत हो सकते हैं, आलोचना अनुचित हो सकती है, भीड़ का व्यवहार गलत हो सकता है, लेकिन इन बातों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि किसी संस्थान की वर्षों में बनी छवि का कोई आधार ही नहीं है।
संजय सिन्हा जब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ समूह में 1988 से 1999 तक काम करते थे, तब उस अखबार की एक खास छवि थी। उसे सत्ता विरोधी, खासकर कांग्रेस सरकारों के प्रति आलोचनात्मक अखबार माना जाता था।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की छवि वैसी नहीं थी। वो बीच की छवि वाला अखबार था। और ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ को लेकर लोगों की साफ धारणाएं थीं। ये तो सरकारी है। कारण भी साफ था।
हर अखबार का अपना मिजाज था, अपनी संपादकीय परंपरा थी और अपनी पहचान थी। अखबार का मतलब वहां काम करने वाले हर कर्मचारी की छवि उसी से जुड़ी थी, जुड़ी होती है, जुड़ी रहेगी।
ऐसा मत सोचिएगा कि उन दिनों मुझे ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ या ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में नौकरी नहीं मिल सकती थी। बात यह थी कि मैंने अपने मिजाज के हिसाब से ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की नौकरी चुनी थी।
फिर मैं ‘जी न्यूज’ गया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में वह मेरा पहला अनुभव था। वहां मैं फील्ड रिपोर्टर था। उसके बाद ‘आजतक’ गया, जहां मैं संपादकीय टीम का हिस्सा बना।
जब तक मैं ‘आजतक’ में रहा, मुझे लगता रहा कि यह चैनल किसी राजनीतिक दल का घोषित समर्थक या सत्ता का चापलूस नहीं है। हो सकता है कि मेरे स्तर पर कभी ऐसी परिस्थिति आई ही न हो, जिसमें मुझे उस संस्थान का कोई दूसरा चेहरा देखना पड़ता। लेकिन कम से कम तब मेरा निजी अनुभव यही रहा।
‘आजतक’ में हम अपने काम को गंभीर, ईमानदार और निर्भीक पत्रकारिता मानते थे।
हम खबर के लिए दौड़ते थे। खबर की विश्वसनीयता हमारे लिए महत्वपूर्ण थी। हमें लगता था कि चैनल की पहचान खबर से बननी चाहिए, किसी राजनीतिक दल के साथ खड़े होने से नहीं।
2014 के बाद सही मायने में मीडिया का माहौल तेजी से बदलने लगा। बदलाव एक दिन में नहीं हुआ। धीरे-धीरे हुआ। बिल्कुल वैसे, जैसे ठंडे पानी में बैठे मेंढक को पता ही नहीं चलता कि पानी कब गर्म होकर उबलने लगा और कब उसकी जान पर बन आई।
एक समय ऐसा आया जब मीडिया संस्थानों के राजनीतिक खेमे खुलकर दिखाई देने लगे।
पहले भी पक्षधरता थी, विचारधाराएं थीं, मालिकों के अपने हित थे और संपादकों के अपने झुकाव थे। लेकिन 2014 के बाद यह विभाजन एकदम से मुखर हो गया।
चैनलों को सत्ता समर्थक और सत्ता विरोधी खांचों में बांटकर देखा जाने लगा।
‘एनडीटीवी’ को सरकार विरोधी चैनल माना जाने लगा। रवीश कुमार को भी उसी नजर से देखा गया। जबकि कांग्रेस के शासनकाल में रवीश कुमार ने सरकार से बहुत सवाल किए थे, रोजगार के वादों पर सवाल उठाए थे और सत्ता की आलोचना की थी। लेकिन सत्ता बदलने के बाद उनके सवालों का राजनीतिक अर्थ बदलकर देखा जाने लगा। सत्ता के समर्थकों की नजर में आलोचक विरोधी हो गया।
यही मीडिया की विडंबना है। पत्रकार का काम सत्ता से सवाल करना है, लेकिन जब सवाल सत्ता के विरुद्ध जाता है, तो कई बार सवाल पूछने वाले को ही विरोधी घोषित कर दिया जाता है।
दूसरी ओर, जब कोई पत्रकार सत्ता के साथ खड़ा दिखाई देता है, तो उसके लिए वही कसौटी क्यों नहीं अपनाई जाती, ये सोचने वाली बात है।
आइए, उस दौर के चैनलों को याद करते हैं।
‘जी न्यूज’, ‘आजतक’, ‘स्टार न्यूज’, ‘एबीपी’, ‘एनडीटीवी’, ‘सहारा’ और बाद में इंडिया टीवी। इनके अलावा भी कई चैनल थे, लेकिन बड़े संस्थानों के बीच काम करने वाले पत्रकारों के बीच इनकी अपनी पहचान थी।
‘इंडिया टीवी’ को लेकर हमारी पत्रकार बिरादरी में यह धारणा थी वो तो भाजपा का है।
‘आजतक’ के मालिक अरुण पुरी पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थे। शुरुआती दौर में मुझे उनका जोर खबरों की गुणवत्ता, पत्रकारिता के मानकों और टीआरपी पर दिखाई देता था। यह कहने में मुझे हिचक नहीं कि ‘आजतक’ ने अपने शुरुआती वर्षों में हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता के लिए कई मानक स्थापित किए। तब चैनल का जोर ‘सबसे तेज’ पर था। यानी खबर सबसे पहले।
‘जी न्यूज के सुभाष चंद्रा व्यापारी थे। उन्हें अपना कारोबार आगे बढ़ाना था और मीडिया भी उनके कारोबारी संसार का हिस्सा था। लेकिन यह भी सच है कि जी न्यूज ने भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण से जुड़ा चर्चित स्टिंग ऑपरेशन दिखाया था, जिसमें उन्हें कथित तौर पर नकदी लेते हुए रिकॉर्ड किया गया था।
किसी संस्थान की छवि को समझने के लिए उसके एक पक्ष को नहीं, उसके पूरे काम को देखना चाहिए।
‘स्टार’ न्यूज हमारे लिए किसी खास राजनीतिक दल का चैनल नहीं था। उसकी पहचान बेहतर वेतन देने वाले चैनल की भी थी, जहां अच्छे पत्रकार नौकरी करना चाहते थे। बाद में ‘एबीपी’ समूह ने अपना अलग स्वामित्व और संपादकीय पहचान विकसित की। शुरुआती दौर में हमारे बीच स्टार और ‘एबीपी’ को लेकर मनोरंजन, प्रयोग और नए टेलीविजन प्रारूपों की चर्चा भी होती थी।
हम ‘आजतक’ में अपने आप को श्रेष्ठ समझते थे। गंभीर, ईमानदार और निर्भीक। शायद हर पीढ़ी के पत्रकार अपने समय में ऐसा ही सोचते हैं। लेकिन उस समय हमारी प्रतिस्पर्धा मुख्य रूप से खबरों की गति, प्रस्तुति, विश्वसनीयता और दर्शकों के भरोसे को लेकर थी।
पत्रकारों के बीच एक मजाकिया कहावत भी चलती थी-
‘आजतक’ में काम, ‘एनडीटीवी’ में नाम, ‘एबीपी’ में दाम, ‘जी में परेशान, सहारा में आराम और इंडिया टीवी में बदनाम।
यह कोई आधिकारिक मूल्यांकन नहीं था। यह हम पत्रकारों के बीच संस्थानों को लेकर बनने वाली धारणाओं और आपसी चुटकुलों का हिस्सा था।
फिर टीवी पत्रकारिता में एक ऐसा दौर आया, जब खबर और तमाशे के बीच की दूरी लगातार घटने लगी। रिपब्लिक भारत ने इस बदलाव को और मुखर किया। वहां बहस का अंदाज, मेहमानों के साथ व्यवहार और राजनीतिक टकराव की प्रस्तुति ने एक अलग किस्म की पहचान बनाई। टीआरपी को लेकर विवाद और आरोप भी सामने आए। यह कहना उचित नहीं होगा कि हर आरोप साबित हो गया, लेकिन इतना जरूर है कि टीवी पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल लगातार तेज होते गए।
पहले चैनलों पर आने वाले लोगों को देखकर लगता था कि वे किसी विषय पर अपनी जानकारी या राय रखने आए हैं। फिर ऐसा समय आया, जब बहस में शामिल लोगों को एक दूसरे पर चिल्लाते, अपमानित करते और लगभग लड़ते हुए दिखाना भी कार्यक्रम की सफलता का हिस्सा बन गया।
पत्रकारिता का स्टूडियो धीरे-धीरे खबरों की जगह राजनीतिक पार्टी के अखाड़े जैसा दिखाई देने लगा। दर्शकों ने यह सब देखा। लंबे समय तक देखा। फिर उन्होंने अपनी राय बनाई।
न्यूज 18 जैसे बड़े नेटवर्क की पहुंच और ताकत भी चर्चा का विषय बनी। लेकिन केवल पैसे से पत्रकारिता की विश्वसनीयता नहीं खरीदी जा सकती। जैसे कोई फिल्म वितरक अपनी दौलत के दम पर हर सिनेमाघर बुक कर ले, तो फिल्म हर जगह दिखाई भले देने लगे, लेकिन इससे फिल्म अच्छी नहीं हो जाएगी। न्यूज 18 के साथ यही हुआ। वितरक अमीर, पटकथा लचर और छवि उसी से बनी बिना धार की तलवार।
कौन नहीं जानता है कि पैसे से पहुंच तो बढ़ सकती है, लेकिन प्रतिष्ठा तो काम से ही बनती है। सब जानते हैं कि जो अडानी का होगा, अंबानी का होगा, वो किसका होगा। भले पत्रकार गोदी में न भी हों, लेकिन मालिक तो हैं न। और सोशल मीडिया के ज़माने में किसी से कुछ छिप सकता है क्या?
ओह! लंबी बात हो गई। आइए अब आपको जंतर मंतर की उस घटना पर ले चलते हैं जहां एक महिला रिपोर्टर को गोदी मीडिया-गोदी मीडिया कहकर हूट किया गया।
कुछ लोग पूछ रहे हैं कि जनता को ऐसा करने का अधिकार कैसे मिल गया?
यहां संजय सिन्हा का सवाल है कि जनता को अपनी राय बनाने का अधिकार किसने छीना है?
हां, असहमति जताने और किसी पत्रकार को काम करने से रोकने में फर्क है। किसी को धमकाना या हिंसा करना गलत है। लेकिन जनता किसी चैनल की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, यह भी उसका अधिकार है।
और यह छवि अचानक नहीं बनी। ‘एनडीटीवी’ के स्वामित्व में बदलाव के बाद उसके बारे में जनता की धारणा में बड़ा परिवर्तन आया। प्रणय रॉय और गौतम अडानी का कारोबारी और सार्वजनिक व्यक्तित्व एक जैसा नहीं है।
जब किसी संस्थान का मालिक बदलता है, तो जनता स्वाभाविक रूप से यह पूछती है कि क्या उसकी संपादकीय स्वतंत्रता भी बदलेगी?
लोग केवल पत्रकार के चेहरे को नहीं देखते, वे उस संस्थान के मालिक को भी देखते हैं, जिसके नाम का माइक पत्रकार अपने हाथ में पकड़े होता है।
हो सकता है कि उस रिपोर्टर ने किसी खबर में कोई गलती न की हो। हो सकता है कि वह पूरी ईमानदारी से अपना काम कर रही हो। लेकिन संस्थान की छवि का बोझ कई बार उस कर्मचारी को भी उठाना पड़ता है, जिसने वह छवि बनाई ही नहीं होती। यही नौकरी की विडंबना है।
आप मछली बाजार में दिन भर घूमकर घर लौटेंगे, तो आपके कपड़ों में मछली की गंध आ सकती है।
आप इत्र की दुकान में दिन भर रहेंगे, तो आपके कपड़ों में खुशबू बस सकती है।
आप कह सकते हैं कि मैंने तो कोई मछली नहीं बेची, मैं तो केवल वहां काम करता था। आप यह भी कह सकते हैं कि इत्र मैंने नहीं बनाया, मैं तो केवल दुकान पर बैठा था।
लेकिन बहुत बड़ी सच्चाई है कि आपके आसपास का माहौल आपकी पहचान का हिस्सा बन ही जाता है।
पत्रकारिता में भी यही होता है। आपका नाम, आपका माइक, आपके चैनल का लोगो और आपकी रिपोर्टिंग की शैली, सब मिलकर आपकी सार्वजनिक पहचान बनाते हैं।
मुझे ‘टीवी 9’ का लांच याद आता है, जो अब ‘टीवी 9 भारतवर्ष’ है। उसके शुरुआती दौर का एक दृश्य याद कीजिए, जो यूट्यूब पर उपलब्ध हो सकता है। अजीत अंजुम, विनोद कापड़ी और एक अन्य पत्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत के लिए खड़े दिखाई देते हैं। चैनल के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री को बुलाया गया था। उस दृश्य में प्रधानमंत्री आते हैं और पत्रकारों की मौजूदगी को लेकर कुछ ऐसा कहते हैं, जिसका आशय था कि सारे विरोधियों को एक ही जगह इकट्ठा कर लिया गया है?
क्या ये छवि का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं था? वहां भीड़ ने गोदी कहा रिपोर्टर को। यहां पीएम ने विरोधी कहा था संपादकों को। उनकी वो छोटी-सी टिप्पणी रिकॉर्ड हो गई, सार्वजनिक भी हो गई। उन पत्रकारों के करियर में क्या हुआ, वह अलग चर्चा का विषय है।
इंदिरा गांधी अरुण शौरी जैसे संपादकों के बारे में अपनी छवि रखती थीं। इस हद तक एक मौके पर उन्होंने रामनाथ गोएनका से कह कर उन्हें नौकरी से निकलवाया।
तब सत्ता पत्रकारों को सेट करती थी। वो तो बाद में सरकार की समझ में आया कि ये एक दो पत्रकार क्या सेट करने? सीधे मालिक को सेट कर लो।
संजय सिन्हा ने ज़िंदगी का पाठ फिल्मों से बहुत सीखा है। अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘दीवार’ को याद कीजिए। फिल्म में उनके पिता मजदूर नेता होते हैं। परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि उन्हें मजदूरों के हितों के विरुद्ध समझौते पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। इसके बाद उनके बेटे की कलाई पर लिखा जाता है, मेरा बाप चोर है।
वह दृश्य केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। वह समाज की नजर में बनने वाली पहचान की कहानी है।
पिता ने अपने पक्ष में जो तर्क दिए, उनकी मजबूरियां थीं, उनके पास अपनी सफाई थी। लेकिन जनता के सामने उनका हस्ताक्षर था। लोगों ने उस हस्ताक्षर को देखा और अपनी राय बना ली।
अब आप कह सकते हैं कि फिल्म में अमिताभ बच्चन के पिता चोर नहीं थे। आप कह सकते हैं कि उन पर दबाव था। आप कह सकते हैं कि पूरी कहानी जाने बिना फैसला नहीं करना चाहिए। ये सभी बातें अपनी जगह सही हो सकती हैं। लेकिन फिल्म का वह दृश्य एक कठोर सवाल छोड़ जाता है।
जब आप किसी समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं, तो क्या आप केवल कागज पर अपना नाम लिखते हैं, या अपनी पहचान भी उसके साथ जोड़ देते हैं? और यहीं अमिताभ बच्चन को बड़ा बेटा होने के नाते अपने बाप के समझौते को माथे पर छपवाना पड़ा कि मेरा बाप चोर है।
आज निष्ठा और निष्पक्षता का मामला केवल पत्रकारों के लिए नहीं है। हर पेशे के आदमी के लिए है। वकील किसके लिए खड़ा है।
आपके मन में जो है, वह आपका सच हो सकता है। लेकिन दुनिया आपके मन के भीतर झांककर फैसला नहीं करती। दुनिया तो आपके काम, आपके फैसलों और आपके सार्वजनिक व्यवहार को देखकर राय बनाती है।
आपकी नीयत और आपकी छवि में फर्क हो सकता है। आप अपने आप को ईमानदार मान सकते हैं, लेकिन आप जिधर खड़े हैं उधर से आपकी छवि आपके पीछे आकर खड़ी हो जाएगी।
ऐसे में यह कहना आसान है कि जनता गलत है, प्रदर्शनकारी गलत हैं, पत्रकार को हूट नहीं करना चाहिए और किसी चैनल को गोदी मीडिया नहीं कहना चाहिए।
यह सब कहने से पहले एक बार यह भी पूछिए कि आखिर यह शब्द पैदा क्यों हुआ?
किसी पत्रकार को हूट करना सही नहीं है। लेकिन किसी चैनल की छवि पर सवाल उठाना भी गलत नहीं है। दोनों बातों को एक साथ समझना होगा। पत्रकार की गरिमा बचनी चाहिए और जनता के सवाल पूछने का अधिकार भी बचना चाहिए।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता का अर्थ केवल पत्रकार को बोलने की आजादी नहीं है, जनता को पत्रकार से सवाल पूछने की आजादी भी है।
और अब आखिरी बात। संजय सिन्हा आज बेरोजगार हैं। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपनी कलाई पर यह लिखवाकर घूमना पसंद नहीं किया कि उनका बाप चोर है।
मेरे लिए नौकरी जरूरी है। पैसा जरूरी है। सम्मान जरूरी है। लेकिन अपने नाम के साथ कौन सी पहचान जोड़ रहा हूं, यह समझना उससे भी जरूरी है।
यह मेरा चुनाव है। कोई दूसरा मेरे लिए यह चुनाव नहीं कर सकता। हर आदमी को अपनी परिस्थितियों के हिसाब से फैसला करना पड़ता है। किसी की मजबूरी का मजाक उड़ाना आसान है, उसकी जगह खड़े होकर फैसला करना मुश्किल। इसलिए मैं किसी रिपोर्टर को अकेले दोषी नहीं ठहराता। मैं उस व्यवस्था और उस संस्थान की भी चर्चा करता हूं, जिसकी छवि का बोझ वह रिपोर्टर उठा रहा है।
आप किस संस्थान में नौकरी करते हैं, किसके साथ खड़े होते हैं, किसके पक्ष में आवाज उठाते हैं और किसके सवालों को अनसुना करते हैं, ये सब बातें मिलकर आपकी पहचान बनाती हैं। फिर चाहे आप जो कहें, अपने बारे में जो सोचें और अपनी सफाई में जितने तर्क दें, जनता अपनी आंखों से जो देखती है, उसके आधार पर राय बनाती है।
कर्ण कुंती का पुत्र था, लेकिन कौरवों के साथ खड़ा हुआ। विभीषण रावण का भाई था, लेकिन राम के साथ खड़ा हुआ। दोनों की पहचान उनके जन्म से आगे जाकर उनके चुनाव से बनी।
इसीलिए जीवन में केवल यह मत देखिए कि आप किसके बेटे हैं, किस संस्थान में काम करते हैं और किस पद पर बैठे हैं।
पिता की छवि चोर की, तो बेटे की कलाई पर दुखी जनता चोर तो लिख ही देगी। मालिक हुकूमत की गोदी में दिखेगा तो कर्मचारी गोदी वाला माना ही जाएगा।
समझौता आपका है। चुनाव आपका है। नौकरी आपकी है। मजबूरी भी आपकी है। लेकिन आपकी छवि पर फैसला आपका नहीं होगा। वो बनती है, आपके चयन से, समझौते से, मजबूरी से।
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