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गऊमांस, तम्बाकू, प्राइम टाइम सिनेमा और राज्य आतंकवाद

जन-जागरण के काम को  हमारे नेतागण कानून और पुलिस के सहारे करना चाहते हैं। इससे सामाजिक जारुकता पैदा नहीं होगी । सामाजिक जागरुकता के लिए घरों से निकलो ,लोगों से मिलो और समझाओ और यह काम निरंतर करो। लेकिन इतना परिश्रम करने का समय किसी भी दल के पास नहीं है। खासकर जो चीजें आम लोगों के खान-पान और आदतों में हैं उनको छुड़ाने के लिए जमीनी स्तर से लेकर टीवी तक प्रचार अभियान तेज करो। यह सब करने की बजाय राजनेताओं ने सीधे कानून बनाकर आम जनता के जीवन पर हमला करना आरंभ कर दिया है। यह राज्य आतंकवाद है।

जन-जागरण के काम को  हमारे नेतागण कानून और पुलिस के सहारे करना चाहते हैं। इससे सामाजिक जारुकता पैदा नहीं होगी । सामाजिक जागरुकता के लिए घरों से निकलो ,लोगों से मिलो और समझाओ और यह काम निरंतर करो। लेकिन इतना परिश्रम करने का समय किसी भी दल के पास नहीं है। खासकर जो चीजें आम लोगों के खान-पान और आदतों में हैं उनको छुड़ाने के लिए जमीनी स्तर से लेकर टीवी तक प्रचार अभियान तेज करो। यह सब करने की बजाय राजनेताओं ने सीधे कानून बनाकर आम जनता के जीवन पर हमला करना आरंभ कर दिया है। यह राज्य आतंकवाद है।

मसलन्, संघ परिवार को गऊ मांस नापसंद है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप सीधे गऊमांस बंद कर देंगे। भारत में यह संभव नहीं है। यदि ऐसा करेंगे तो लाखों चमड़ा मजदूर भूखे मर जाएंगे। अकेले महाराष्ट्र में गऊहत्या पर पाबंदी से कोल्हापुरी चप्पल का उद्योग बंद हो गया है। लाखों परिवारों के घरों में राशन-पानी बंद हो गया है। यही हाल बाकी देश का है। यदि संघ परिवार सच में गऊहत्या रोकना चाहता है तो जन-जागरण करे और आम लोगों को समझाए कि वे गऊ मांस न खाएं। लेकिन कानूनी आतंकवाद का सहारा न ले। यही बात हम दिल्ली में तम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर लगी पाबंदी पर भी कहना चाहते हैं। तम्बाकू का लोग इस्तेमाल न करें, यह आम आदमी पार्टी का चेतना अभियान तो हो सकता है, कानूनी अभियान नहीं। इस तरह की कानूनी बंदिशों से तम्बाकू उत्पाद बिकने बंद नहीं होंगे, बल्कि खुलेआम ब्लैक में बिकेंगे। दूसरी ओर हजारों लोगों के रोजगार पर भी बुरा असर होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि राजनेता यदि अपने विचारों के अनुरुप समाज बनाना चाहते हैं जो सामाजिक जन-जागरण करें,कानूनी आतंकवाद का सहारा न लें।

आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों में कानूनी आतंकवाद का सहारा लेने की प्रवृत्ति सबसे प्रबल है, वे कानून के नाम पर आम जनता,व्यापार और दैनंदिन जीवन में अराजकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।मसलन् ,महाराष्ट्र सरकार ने प्राइम टाइम समय में मराठी फिल्म दिखाने का आदेश जारी करके व्यापार के हक पर हमला बोला है।  किस समय कौन सी फिल्म दिखायी जाएगी यह हॉल का मालिक तय करेगा ,सरकार नहीं।यदि आम लोगों के जीवन में सरकारें इस तरह हमले करेंगी तो वे दिन दूर नहीं जब गली-मुहल्लो में संघ के बंदों को आम जनता घेरेगी ।

संघ परिवार ने कानून आतंकवाद का जिस तरह इस्तेमाल आरंभ किया है वह हमारे संविधान की बुनियादी भावनाओं के खिलाफ है। सरकार में आने के बाद से संघ परिवार और उसके विभिन्न संगठन विभिन्न स्तरों पर आम जनता के जीवन में कानूनी हमले कर रहे हैं , यह संविघान और लोकतंत्र विरोधी काम है। उनके इस काम की जो लोग आँखें बंदकरके प्रशंसा कर रहे हैं या समर्थन कर रहे हैं,वे असल में संघ के भोंपू का ही काम कर रहे हैं। हम तो यही कहना चाहते हैं कि संघ को यदि आम जनता के जीवन का वैविध्यपूर्ण जीवन पसंद नहीं है तो वह अपना देश और अपनी जनता भारत के बाहर चुन ले।भारत में रहना है तो संविधान का पालन करना होगा। आम जनता के वैविध्यपूर्ण जीवन,खान-पान,जीवनशैली,धर्म आदि को नतमस्तक होकर मानना होगा । 

जगदीश्वर चतुर्वेदी के ब्लॉग ‘नया जमाना’ से साभार

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