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गजेन्द्र चुनाव लड़ चुका था, सैकड़ों वीआईपियों को साफा बांध चुका था, आत्महत्या की कोई वजह नहीं थी…

दिनेशराय द्विवेदी : मेरे ही प्रान्त राजस्थान के एक किसान ने आज दिल्ली में अपनी जान दे दी, तब आआपा की रैली चल रही थी। उस के पास मिले पर्चे से जिसे हर कोई सुसाइड नोट कह रहा है वह सुसाइड नोट नहीं लगता। उस में वह अपनी व्यथा कहता है, लेकिन उस नें घर वापसी का रास्ता पूछ रहा है। जो घर वापस लौटना चाहता है वह सुसाइड क्यों करेगा? जिस तरह के चित्र मीडिया में आए हैं उस से तो लगता है कि वह सिर्फ ध्यानाकर्षण का प्रयत्न कर रहा था। उस ने हाथों से पैर से भी कोशिश की कि वह बच जाए। पर शायद दांव उल्टा पड़ गया था। वह अपनीा कोशिश में कामयाब नहीं हो सका। हो सकता है उसे उम्मीद रही हो कि इतनी भीड़ में उसे बचा लिया जाएगा। पर उस की यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी।

दिनेशराय द्विवेदी : मेरे ही प्रान्त राजस्थान के एक किसान ने आज दिल्ली में अपनी जान दे दी, तब आआपा की रैली चल रही थी। उस के पास मिले पर्चे से जिसे हर कोई सुसाइड नोट कह रहा है वह सुसाइड नोट नहीं लगता। उस में वह अपनी व्यथा कहता है, लेकिन उस नें घर वापसी का रास्ता पूछ रहा है। जो घर वापस लौटना चाहता है वह सुसाइड क्यों करेगा? जिस तरह के चित्र मीडिया में आए हैं उस से तो लगता है कि वह सिर्फ ध्यानाकर्षण का प्रयत्न कर रहा था। उस ने हाथों से पैर से भी कोशिश की कि वह बच जाए। पर शायद दांव उल्टा पड़ गया था। वह अपनीा कोशिश में कामयाब नहीं हो सका। हो सकता है उसे उम्मीद रही हो कि इतनी भीड़ में उसे बचा लिया जाएगा। पर उस की यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी।

यह शख्स गजेन्द्र सिंह कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। वह एक विधानसभा चुनाव लड़ चुका था। सैंकड़ों वीआईपियों को साफा बांध चुका था। कोई वजह नहीं थी कि वह आत्महत्या करे। उसके पास समस्याएँ थीं। उस की फसल नष्ट हो चुकी थी। मुआवजे की बातें खूब हो रही हैं, घोषणाएँ भी हो रही हैं। कागजों पर मदद भी दिखने लगेगी। लेकिन लोगों को विश्वास नहीं कि उन्हें मदद मिलेगी, जो मिलेगी वह पर्याप्त होगी। जनता में यह अविश्वास एक दिन में पैदा नहीं होता।

उसे घर से निकाल दिया गया था। कोई पारिवारिक विवाद था। हो सकता है वह जमीन से संबंधित हो या हो सकता है वह परिवार से संबंधित हो. हमारी राजनीति इस मामले में बहुत सुविधाजनक है। चन्द अदालतें खोल कर इन सब समस्याओं का रुख उधर कर देती हैं। उसे इस से कोई मतलब नहीं कि पारिवारिक विवाद अदालत से बरसों नहीं सुलझ रहे हैं। जमीन के विवाद तो पीढ़ियों तक नहीं सुलझते। कृषि भूमि विवादों के मामले में तो अदालत के चपरासी से ले कर हाकिम तक मुहँ फाड़ता हुआ दिखाई देता है।

आखिर राजनीति कब समझेगी कि इन विवादों को न्यूनतम समय में सुलझाने की जिम्मेदारी उसी की है। पर्याप्त और सक्षम अदालतें स्थापित करने का काम भी उसी के जिम्मे है। यह दीगर बात है कि अभी अधिकांश लोग यह नहीं समझते। लेकिन कब तक? कब तक नहीं समझेंगे। राजनीति को समझ जाना चाहिए कि अब वह वक्त आ गया है जब चीजें तेजी से जनता की समझ आने लगी हैं। यदि वे नहीं समझेंगे तो जनता उन्हें समझा देगी।

दिनेश राय द्विवेदी के फेसबुक वॉल से.

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