कमलनाथ ने सीएम पद की शपथ लेते ही किसानों का दो लाख रुपये तक का कर्ज माफ किया

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कमलनाथ ने बड़ा फैसला किया… उन्होंने किसानों की कर्जमाफी फाइल पर दस्तखत कर दिए… शपथ लेने के बाद कर्जमाफी फाइल पर दस्तखत के बाद कमलनाथ ने जो राजाज्ञा जारी किया उसमें कहा गया है कि 2 लाख रुपये तक का किसानों का कर्जा माफ किया …

किसान विरोधी पत्रकारों से अपील, वायरल हो चुके इस कार्टून व परचे को न देखें-पढ़ें!

दिल्ली आज किसानों की हो चुकी है. हर ओर किसान. रंग-बिरंगे झंडों से लैस किसान. कर्ज माफी और फसलों का वाजिब मूल्य इनकी मुख्य मांगें हैं. लेकिन मीडिया खामोश है. मीडिया इसलिए खामोश है क्योंकि ये गोदी है. मीडिया इसलिए खामोश है क्योंकि यह पेड है. मीडिया इसलिए खामोश है क्योंकि बाजारू हो चुका यह …

TOI को पता है कि कोई किसान टाइम्स आफ इंडिया नहीं पढ़ता, इसलिए वह किसान विरोधी छापता है! देखें

Vibhuti Pandey : आप चाहे कितनी भी बार कह लें, चाहे टाइम्स के संपादक तक आप की बात से सहमत हों, लेकिन The Times of India अपना उच्च मध्यम वर्गीय चरित्र नहीं छोड़ेगा. कल किसान कवरेज पर टाइम्स की हेडलाइन पढ़िए. परसों सोशल मीडिया पर हिट शेयर के लिए इन्होंने जो भी किया हो लेकिन …

नाकारा सरकारें और आत्महन्ता किसान

अनेहस शाश्वत

लाख दावों प्रति दावों के बावजूद आज भी भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती ही है। आधुनिक अर्थव्यस्था में इस स्थिति को पिछड़ेपन का द्योतक मानते हैं। बावजूद इसके अपने देश के किसानों ने देश के अनाज कोठार इस हदतक भर दिये हैं कि अगर तीन साल लगातार देश की खेती बरबाद हो जाये तो भी अनाज की कमी नहीं होगी। गौर करें यह तब जब भारत की आबादी लिखत-पढ़त में 125 करोड़ है यानी वास्तविक आबादी इससे ज्यादा ही होगी।

कमाल ख़ान की इस एक रिपोर्ट से हिल गया हूं : रवीश कुमार

Ravish Kumar : कमाल ख़ान की एक रिपोर्ट से हिल गया हूं। यूपी के सीतापुर में कर्ज़ रिकवरी वाले एक किसान के घर गए। रिकवरी एजेंट ने किसान को ट्रैक्टर से ही कुचल कर मार दिया और ट्रैक्टर लेकर फ़रार हो गए। मात्र 65,000 रुपये कर्ज़ था।

वित्तीय पूंजी ने किसानों के सभी तबकों को तबाह किया है

किसान आंदोलन की नयी शुरुआत :  बैंक पति, स्टाक एक्सचेंज अधिपति जैसे वित्तीय अभिजात वर्ग के शासन में किसानों की अर्थव्यवस्था और जीवन का संकट उनकी आत्महत्याओं के रूप में चैतरफा दिख रहा है। यह वो दौर है जिसमें कारपोरेट पूंजी ने राजनीतिक सम्प्रभुता और आम नागरिकों के जीवन की बेहतरी के सभी पक्षों पर खुला हमला बोल दिया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार पर भी वित्तीय पूंजी का गहरा हमला है लेकिन सबसे अधिक इसकी चोट अनौपचारिक आर्थिक क्षेत्र खासकर खेती-किसानी पर दिख रही है। पचास फीसदी से अधिक देश की आबादी खेती पर निर्भर है और आर्थिक संकट का भयावह चेहरा यहाँ खुलकर दिख रहा है।

किसानों को छींक भी आ जाए तो सरकारें कांपने लगती हैं

सरकार को केवल किसानों की चिंता है…  लगता है कोई और तबका इस देश में रहता ही नहीं…

श्रीगंगानगर। पटाखा फैक्ट्री मेँ आग से दो दर्जन से अधिक व्यक्ति मारे गए। एमपी मेँ सरकारी गोली से आंदोलनकारी 6 किसानों की मौत हो गई। दो दर्जन से अधिक संख्या मेँ मारे व्यक्तियों का जिक्र कहीं कहीं है और किसानों के मरने का चप्पे चप्पे पर। राजनीतिक गलियारों मेँ। टीवी की डिबेट मेँ। अखबारों के आलेखों मेँ। संपादकीय में। बड़े बड़े कृषि विशेषज्ञ लेख लिख रहे है। उनकी इन्कम का लेख जोखा निकाला जा रहा है। उनके कर्ज माफ करने की चर्चा है। उस पर चिंतन और चिंता है। कुल मिलाकर देश का फोकस किसानों पर है।
लगता है कोई और तबका इस देश मेँ रहता ही नहीं।

किसानों के पेशाब पीने के बाद भी नहीं पिघलेगी मोदी सरकार

Nitin Thakur : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस दिन कंगारुओं के प्रधानमंत्री के साथ अक्षरधाम में पिकनिक मना रहे थे, क्या उन्हें इल्म है कि ठीक उसी दिन नॉर्थ एवेन्यू पर इस देश के चार किसान नंग धड़ंग होकर प्रदर्शन कर रहे थे? वो पागल नहींं थे.. और ना ही वो किसी पब्लिसिटी के लिए आए थे.. वो तो बेचारे तमिलनाडु के अपने गांवों से हज़ारों किलोमीटर दूर पत्थर के इस शहर में अपनी गुहार लगाने पहुंचे थे।

किसानों की वायरल हुई ये दो तस्वीरें ‘मोदी गान’ में रत टीवी और अखबार वालों को न दिखेंगी न छपेंगी

Mahendra Mishra : ये तमिलनाडु के किसान हैं। दक्षिण भारत से दिल्ली पीएम मोदी के सामने अपनी फरियाद लेकर आये हैं। इनमें ज्यादातर के हाथों में ख़ुदकुशी कर चुके किसानों की खोपड़ियां हैं। बाकी ने हाथ में भीख का कटोरा ले रखा है। पुरुष नंगे बदन हैं और महिलाओं ने केवल पेटीकोट पहना हुआ है। इसके जरिये ये अपनी माली हालत बयान करना चाहते हैं। इन किसानों के इलाकों में 140 वर्षों बाद सबसे बड़ा सूखा पड़ा है।

सूखे और कर्ज की मार झेल रहे यूपी के एक किसान ने नातिन की शादी से हफ्ते भर पहले कर लिया सुसाइड

सूखे से तप रहे यूपी के बेहाल बुंदेलखंड में किसान के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं है शायद! इस मृतक किसान को नातिन की शादी करनी थी। धन का प्रबन्ध नही कर पाया तो ‘मेरा चोला हो लाल बसंती, सूख रही बुन्देली धरती’ कहते फांसी पर झूल गया! इसने बैंक से क्रेडिट कार्ड का 50 हजार का कर्ज लिया था जो चुकता नहीं हुआ!

कर्जखोर माल्या पर सिस्टम की दरियादिली से दुखी वेस्ट यूपी के एक प्रगतिशील किसान ने सुनाई आपबीती

Mukesh Yadav : किसान Vs माल्याज : नीचे एक किसान की आपबीती है… यह पोस्ट इस व्यवस्था का आईना है, जरूर पढ़िए. अंधभक्त भी देखें कि ‘सीमा पर जवान, खेत में किसान’ शहादत दे रहे हैं और माल्या अम्बानी अडानी जैसे लुटेरे टैक्सपेयर्स का पैसा लूटकर प्रधामनंत्री टाइप के लोगों को किस तरह जेब में रखते हैं. संविधान इनकी डस्टबिन में पड़ा है और जज पुलिस इनकी ‘शुभ दीपावली’ की मिठाई खाकर जमीर इनके यहां गिरवी रख चुके हैं. अब आप बताइये कौन देशभक्त और कौन देशद्रोही?

वेब जर्नलिस्ट मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

बर्बाद फसल दिखाने आई गरीब महिला को हड़का रहे इस कलेक्टर ने चार जूते मारने लायक काम किया है या नहीं? (देखें वीडियो)

एबीपी न्यूज में स्पेशल करेस्पांडेंट ब्रजेश राजपूत ने एक वीडियो फेसबुक पर शेयर किया है. साथ ही यह भी बताया है कि इस वीडियो के एबीपी न्यूज पर चलने के फौरन बाद वीडियो में दिख रहे खलनायक अफसर के ट्रांसफर का आदेश आ गया. वीडियो में खलनायक अफसर एक गरीब किसान महिला को हड़का रहा है. यह किसान महिला जनसुनवाई में अपनी सूखी फसल दिखाने लाई थी और फसल दिखाते ही अफसर इस महिला पर बिगड़ पड़ा.

बिल्डर की मनमानी पर गुस्सा फूटा, पुलिस और किसान आमने-सामने

मिर्जापुर (यूपी) : रामपुर बांगर गांव के खसरा नम्बरान 62 और 70 पर उच्च न्यायालय द्वारा यथास्थिति बनाये रखने के आदेश पारित किये गये थे, उस जमीन पर गौड सिटी बिल्डर द्वारा कार्य शुरू कर दिये जाने से किसानों का आक्रोश सड़कों पर आ गया। किसान नेता धीरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में 50 गांवों के किसानों की एक महापंचायत गौड सिटी बिल्डर की साइट पर हुई। पुलिस द्वारा धारा 144 का हवाला देकर किसानों को धमकाकर रोकने का प्रयास किया गया, जिससे स्थिति और बिगड़ गयी। पुलिस के रवैये से नाराज किसानों ने गौड सिटी बिल्डर की साईट पर ही बैठकर अनिश्चितकालीन धरना देने का ऐलान कर दिया तथा कब्जा लेने के लिए ट्रैक्टर मंगवा लिए। 

मिर्जापुर में बिल्डर की मनमानी से गुस्सा किसान निर्माण स्थल की ओर कूंच करते हुए

आर्थिक सुधारों के ढाई दशक में कृषि क्षेत्र ही सर्वाधिक उपेक्षित हुआ है : अखिलेन्द्र

: भूमि अधिग्रहण अध्यादेश नहीं समग्र भूमि उपयोग नीति की देश को जरूरत : आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने वाराणसी में आयोजित स्वराज्य संवाद को बतौर अतिथि सम्बोधित करते हुए एनडीए की मोदी सरकार द्वारा तीसरी बार भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश लाने के फैसले की सख्त आलोचना की और इसे मोदी सरकार का लोकतंत्र विरोधी कदम कहा। उन्होंने समग्र भूमि उपयोग नीति के लिए राष्ट्रीय आयोग के गठन को देश के लिए जरुरी बताते हुए कहा कि जमीन अधिग्रहण का संपूर्ण प्रश्न जमीन के बड़े प्रश्न का महज एक हिस्सा है। 2013 का कानून पूरे मुद्दे को सरकारी और निजी एजेसियों द्वारा उद्योग और अधिसंरचना के विकास बनाम जमीन मालिकों और जमीन आश्रितों के हितों के संकीर्ण व लाक्षणिक संदर्भ में पेश करता है। 2013 का कानून बाजार की तार्किकता के बृहत दायरे के भीतर ही इसकी खोजबीन करता है।

‘अर्द्ध सत्य’ के इस शानदार एपिसोड के लिए राणा यशवंत बधाई के पात्र हैं

भड़ास4मीडिया के कामकाज की व्यस्तता और यहां-वहां की यात्राओं-भागदौड़ के कारण न्यूज चैनल देखने का कम ही मौका मिल पाता है. लेकिन जब भी देखता हूं तो ज्यादातर निराश होता हूं और तुरंत डिस्कवरी, डिस्कवरी साइंस, एनजीसी, हिस्ट्री आदि चैनलों पर जाकर टिक जाता हूं. बकवास की चीख पुकार की जगह धरती ब्रह्मांड समुद्र जीव जंतु आदि के बारे में जानना सुनना समझना श्रेयस्कर है. दो रोज पहले ऐसे ही हिंदी न्यूज चैनलों पर भटक रहा था तो इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत का शो ‘अर्द्ध सत्य’ देखने लगा. शो अभी शुरू ही हुआ था. कंटेंट प्रभावित करता गया. रुक कर देखने को बाध्य हुआ.

हरदोई के डीएम ने बर्बाद किसान को फेसबुक पर ब्लाक कर दिया!

Kumar Sauvir : मुझे तो अब अक्‍सर ऐसा साफ लगने लगता है कि जो पढ़-लिख कर डीएम बन जाता है, वह वाकई बेवकूफी या अभद्रता का दामन सम्‍भाल लेता है। उनसे ज्‍यादा समझदार और संवेदनशील तो साबित होता है किसान, जो अफसरशाही कार्यशैली से लेकर प्रकृति तक की निर्ममता का सामना करना होता है। नजीर हैं हरदोई के जिलाधिकारी रमेश मिश्र। हरदोई के डीएम ने डीएम हरदोई के नाम पर एक नया फेसबुक पेज बनाया है, जिसमें वे दिन भर अपनी ढपोरशंखी ढफली बजाया करते हैं कि:- आज मैंने इतने लोगों को लाभान्वित किया, उतने लोगों को उतना फायदा उठाया। इतने लोगों के साथ हेन किया, और उतने लोगों को हेन किया। ऐसा किया, वैसा किया, यू किया, ऊ किया, अइसन किया, वइसन किया।

वोटबैंक वाले इस लोकतंत्र में किसान मरे तो मरे… सत्ता और मीडिया ने अपनी औकात दिखा दी…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से…

उद्योगपित दिवालिया होने लगता है तो हंगामा मच जाता है. उसे फटाफट राहत देने की कवायद शुरू हो जाती है. उद्योगपति टैक्सचोरी में फंसा जाता है तो सरकार साहिब माफी देने में यह कहते हुए जुट जाती है कि ऐसा न करने से देश में निवेश और विकास का माहौल प्रभावित होगा. लेकिन जब खेती-किसानी संकट में पड़ जाए तो कोई नहीं बोलता. सत्ता का चरित्र बिलकुल साफ तौर पर सामने है इन दिनों. कारपोरेट मीडिया का बड़ा हिस्सा एक बड़े दलाल की भूमिका में है जो सत्ता को बचाने की खातिर मुख्य मुद्दों से ध्यान डायवर्ट करने में लगा रहता है. एक गजेंद्र के मरने पर आम आदमी पार्टी को घेरने के लिए इतना हायतौबा हुआ लेकिन देश भर में किसान जगह जगह धड़ाधड़ आत्महत्याएं कर रहा है तो कोई दिन भर इस पर लाइव मुहिम नहीं चला रहा.

राजस्थान में हफ्ते भर में चौथे किसान ने आत्महत्या की

भूकंप के बाद तबाह हुए नेपाल में भारत ने जो सक्रियता दिखाई है, वह तारीफ के काबिल है. लेकिन अगर अपने देश में देखें तो किसान खुदकुशी का मामला किसी तबाही से कम नहीं है. हर रोज जाने कितने किसान मर रहे हैं. लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें पूरी बेशर्मी से इन मौतों को नकार रही हैं. ये सरकारें साफ-साफ किसान विरोधी दिख रही हैं. जिस देश की आबादी की बहुत बड़ी संख्या खेती पर निर्भर हो, उस देश में जब खेती तबाह हो जाए और किसान कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या कर रहा हो तो इससे बड़ा संकट क्या होगा.

किसान खुदकुशी मामले में आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने बाराबंकी के डीएम के बयान को गैर-जिम्मेदाराना करार दिया

Surya Pratap Singh : बाराबंकी में सत्ता की चौखट पर आशाराम ने फ़ासी लगाई. बैंकों और सूदखोरों के तगादे से त्रस्त किसान आशाराम ने शनिवार देर रात बाराबंकी में डीएम आवास के सामने पेड़ से फांसी लगाकर जान दे दी. रविवार सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले लोगों व एडीएम पीपी पॉल ने पुलिस को सूचना दी. आशाराम ने डीएम के नाम संबोधित दो पेज के सूइसाइड नोट में सूदखोरों के दबाव की बात लिखने के साथ ही सीएम से अपने अंतिम संस्कार में शामिल होने का आग्रह भी किया है.

मीडिया रिपोर्ट्स पर यक़ीन करें तो किसानों के मुद्दे पर हार रही मोदी सरकार

विदर्भ हो या दौसा, तेलंगाना हो या बुंदेलखंड, अगर भारतीय मीडिया की रिपोर्ट्स पर यक़ीन किया जाए तो फांसी लगाकर आत्महत्या करने वाले किसान गजेंद्र सिंह को ‘आपदा पीड़ित’ किसान कहना मुश्किल है. राजस्थान स्थित उनके गाँव का दौरा करने वाले पत्रकारों के अनुसार उनके परिवार के पास 10 एकड़ ज़मीन है. उनका परिवार गेहूँ, आँवला और टीक की खेती करता है. भारत में 65 प्रतिशत किसानों के पास एक एकड़ या उससे कम ज़मीन है. वहीं, राजस्थान में 70 प्रतिशत खेती योग्य ज़मीन ऐसे किसानों के पास है जो मझोले या बड़े किसान हैं यानी जिनके पास 15 एकड़ या उससे ज़्यादा खेती की ज़मीन है.

फसल बर्बाद हो जाने पर मीणा ने कर लिया आत्मदाह

आत्महत्या करने वाले दौसा के किसान गजेन्द्र की चिता की राख अभी ठण्डी भी नहीं हुई कि भीलवाड़ा जिले के जहाजपुर उपखण्ड में लाल का बाड़ा गांव के आदिवासी किसान रामस्वरूप मीणा ने पांच बीघे में बोयी अपनी फसल के खराब होने से परेशान होकर अपने शरीर पर किरोसिन छिड़ककर आग लगा ली। वह बुरी तरह से झुलस गया। उसे भीलवाड़ा के महात्मा गांधी चिकित्सालय में भर्ती करवाया गया, जहां उसका उपचार जारी है।

विदर्भ में लाखो ‘गजेन्द्र’ कर चुके आत्महत्याएं, मीडिया ने नहीं लिया संज्ञान

आम आदमी पार्टी की रैली में किसान गजेन्द्र सिंह कल्याणवत ने ख़ुदकुशी कर ली तो समूचे दिल्ली के टीवी चैनल्स रात दिन डिबेट करने में लगे हैं। लाइव शो, टॉक शो के जरिये यह दिखा रहे हैं कि वो किसानों के कितने हिमायती हैं। यह किसान का दर्द केवल गजेन्द्र तक ही सीमित नहीं है। चौबीस घंटे कैमरे के सामने बने रहने वाले रिपोर्टर / एडिटर ने कभी भी विदर्भ के किसानों के दर्द, पीड़ा को समझा नहीं। 

किसान सुसाइड के बहाने न्यूज चैनलों की पड़ताल और भारत में खेती-किसानी का भविष्य

Ramprakash Anant : NDTV के पत्रकार ने अभी अभी तीन बातें रखीं कि मरने वाले किसान की सत्रह बीघा फसल बर्बाद हो गई है। रैली में आने से पहले उसने जिन रिश्तेदारों से बात की उससे यही पता चलता है कि वह अपने क्षेत्र के किसानों की स्थिति की ओर इस रैली का ध्यान आकर्षित करना चाहता था। गजेन्द्र के भाई भी आजकल पर यही बात कह रहे हैं। बीजेपी के सिद्धार्थ नाथ कह रहे हैं कि वह पीड़ित किसान नहीं था. वह आप का कार्यकर्ता था।

शाबास टीवी चैनलों! पूरी बहस ‘आप’ बनाम पुलिस पर फोकस रखा, वसुंधरा और मोदीजी का नाम तक न आने दिया

Sandhya Navodita : मौत के मुक़दमे की घंटों लम्बी बहस में महारानी वसुंधरा, मोदीजी और कांग्रेस का नाम तक नहीं आ पाया. यह बड़ी उपलब्धि है. साँच को आँच नहीं आई. यह साबित हुआ कि केजरीवाल और उनकी पार्टी ही मौत के लिए ज़िम्मेदार है. थोड़ी देर में यह भी साबित किया जा सकता है कि देश में अब तक जो तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है उसके ज़िम्मेदार भी केजरीवाल हैं. यह बड़ी बात है टीवी चैनलों ने किसान की बदहाली के मुद्दे पर एक शब्द भी चर्चा न होने देने में सफलता हासिल की, और पूरी बहस में आप पार्टी और पुलिस के बीच ही मामला बनाये रखा. जिसे बाद में रेफरी भाजपा ने आकर हल किया. आप के मुजरिमों के बहुत रोने गाने के बाद भाजपा का दिल पसीजा. उन्होंने कहा कि वैसे तो ज़िम्मेदार केजरीवाल एंड पार्टी ही हैं पर अगर कोई पुलिस वाला भी दोषी पाया गया, जिसकी कोई संभावना नहीं है, तो उसे भी बख्शा नहीं जाएगा.

इसी तरह गुजरात में ‘सीएम नरेंद्र मोदी’ को खत लिखकर एक और किसान ने की थी आत्महत्या

दौसा के किसान गजेन्द्र की आत्महत्या पर सभी दल अब अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने लगे हैं लेकिन ऐसे कई गजेन्द्र गुजरात में भी हैं. गुजरात के जामनगर जिले के कल्य़ाणपुरा तालुका के छिजवड़ गांव के अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा  ने भी ठीक गजेन्द्र की ही तरह 4 अक्टूबर 2012 को नरेन्द्र मोदी के नाम पत्र लिखकर आत्महत्या कर ली थी. उस समय नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 

देखिये एक मोदी समर्थक इस किसान की मौत को कैसे विश्लेषित करता है…

Ajit Singh : मैं हमेशा से ये लिखता कहता आया हूँ कि ये जो किसान के नाम पे फ़र्ज़ी आत्महत्या दिखाई जा रही है और ये जो फ़र्ज़ी किसान दिखाए जा रहे हैं ये फर्जीवाड़ा बंद होना चाहिए। आज तक जितनी भी किसान आत्म ह्त्या हुई हैं उनकी वृहद् जांच होनी चाहिए। उससे पता चलेगा कि कितनी ही natural deaths को किसान द्वारा आत्म ह्त्या बता दिया जाता है। न जाने कितने लोग depression के मरीज हो के और बाकी अन्य निजी कारणों से आत्मह्त्या करते हैं। उन्हें किसान द्वारा आत्महत्या नहीं माना जा सकता। मैं हमेशा कहता हूँ की प्रत्येक किसान आत्महत्या को कायदे से study कर एक श्वेत पत्र लाया जाए जिस से समस्या की जड़ तक पहुंचा जा सके।

गजेन्द्र चुनाव लड़ चुका था, सैकड़ों वीआईपियों को साफा बांध चुका था, आत्महत्या की कोई वजह नहीं थी…

दिनेशराय द्विवेदी : मेरे ही प्रान्त राजस्थान के एक किसान ने आज दिल्ली में अपनी जान दे दी, तब आआपा की रैली चल रही थी। उस के पास मिले पर्चे से जिसे हर कोई सुसाइड नोट कह रहा है वह सुसाइड नोट नहीं लगता। उस में वह अपनी व्यथा कहता है, लेकिन उस नें घर वापसी का रास्ता पूछ रहा है। जो घर वापस लौटना चाहता है वह सुसाइड क्यों करेगा? जिस तरह के चित्र मीडिया में आए हैं उस से तो लगता है कि वह सिर्फ ध्यानाकर्षण का प्रयत्न कर रहा था। उस ने हाथों से पैर से भी कोशिश की कि वह बच जाए। पर शायद दांव उल्टा पड़ गया था। वह अपनीा कोशिश में कामयाब नहीं हो सका। हो सकता है उसे उम्मीद रही हो कि इतनी भीड़ में उसे बचा लिया जाएगा। पर उस की यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी।

‘आप’ की प्री-प्लांड स्क्रिप्ट थी गजेंद्र का पेड़ पर चढ़ना और फंदे से लटकना!

Abhai Srivastava : गजेंद्र की चिट्ठी की आख़िरी लाइन, ‘कोई मुझे बताओ, मैं घर कैसे जाऊंगा?’ जाहिर है कि ये सुसाइड नोट नहीं। मीडिया क्लिप में साफ सुनाई पड़ रहा है कि जब कुमार विश्वास भाषण दे रहा था तब आवाज़ आई, ‘लटक गया’, फिर विश्वास हाथ के इशारे जैसे कह रहा है कि ‘लटक गया है, स्क्रिप्ट के अनुसार नाटक पूरा हुआ’.  भाइयों AAP ने एक व्यक्ति की हत्या की है। ये भी ध्यान देने की बात है कि गजेंद्र के घर में 2 भतीजियों की आज शादी है, इसका मतलब उसके घर में ऐसा आर्थिक संकट नहीं जैसा प्रोजेक्ट हुआ है। भाई, ये बहुत बड़ी साज़िश है।

आशुतोष जैसा एक मीडियॉकर पत्रकार और बौनी संवेदना का आदमी ही इतनी विद्रूप बातें बोल सकता है!

Vishwa Deepak : गजेन्द्र नामक ‘किसान’ की आत्महत्या के बारे में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष कहते हैं- ”यह अरविंद केजरीवाल की गलती है. उन्हें मंच से उतर जाना चाहिए था.उन्होंने गलती की. अगली बार मैं केजरीवाल को कहूंगा कि वो मंच से उतर पेड़ पर चढ़ें और लोगों को बचाएं.”