नाकारा सरकारें और आत्महन्ता किसान

अनेहस शाश्वत

लाख दावों प्रति दावों के बावजूद आज भी भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती ही है। आधुनिक अर्थव्यस्था में इस स्थिति को पिछड़ेपन का द्योतक मानते हैं। बावजूद इसके अपने देश के किसानों ने देश के अनाज कोठार इस हदतक भर दिये हैं कि अगर तीन साल लगातार देश की खेती बरबाद हो जाये तो भी अनाज की कमी नहीं होगी। गौर करें यह तब जब भारत की आबादी लिखत-पढ़त में 125 करोड़ है यानी वास्तविक आबादी इससे ज्यादा ही होगी।

साथ ही गौरतलब यह भी है कि ऐसा करने वाला भारत का किसान लगभग रोजाना स्वतंत्र भारत में आत्महत्या करने के लिए मजबूर है। यही दोनों आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सदियों पुराने खेतिहर संस्कारों की वजह से किसान आज भी तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भरपूर मात्रा में अनाज पैदा कर रहा है। लेकिन नाकारा सरकारें किसान को मानवोचित गरिमा के अनुरूप जीवन देने में लगातार असमर्थ हो रही हैं जो कि सरकारों का संवैधानिक दायित्व है।

इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं लेकिन अफसोस की बात यह है कि देश के स्वतंत्र होने के बावजूद देश की खेती-किसानी पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए था। वह तो भला हो 1965-66-67 में पड़े अकाल, का जिसने सरकारों को खेती-किसानी पर थोड़ा बहुत ध्यान देने पर मजबूर किया। उस थोड़ी बहुत सरकारी कृपा और अपने सदियों पुराने संस्कारों की मदद से किसानों ने न केवल विशाल आबादी का पेट भरा बल्कि आपातकाल के लिए भी कोठारों में अनाज भर दिया। यह अवधि भी हालांकि थोड़े दिन ही रही, कुल करीब ड़ेढ दशक तक यानी 1965 से 1980 तक।

1980 का साल भारत में निर्याणक परिवर्तन का साल रहा। इंदिरा गांधी काफी धूम-धड़ाम के साथ फिर से प्रधानमंत्री बनीं। साथ ही उनके नहीं चाहने के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था पर पूंजीपतियों व वर्ल्ड बैंक का शिकंजा मजबूत होने लगा। इनकी प्रमुख मांग उद्योगों और उद्योगपतियों को अधिक से अधिक सुविधा देने की थी। दूसरी तरफ आकार ले रहा देश का विशाल मध्यम वर्ग था जिसकी जरूरतों को पूरा करने की सरकार की मजबूरी थी। क्योंकि उस समय सबसे बड़ा और संगठित वोट बैंक वहीं था। जाहिर सी बात है गाज खेती और किसानों पर गिरनी थी और गिरी। बाजार ने किसान को कभी भी उसकी उपज का लाभप्रद मूल्य नहीं दिया। उसकी भरपाई के लिए कृषि उपज को सरकारों ने खरीदना शुरू किया लेकिन इतना ध्यान रखा कि सरकारी खरीद की वजह से मूल्य इतना नहीं हो जाय कि मध्यम वर्ग की रसोई का खर्च उसको खटकने लगे।

आज भी आप चाहे तो खुद ही गणना करके देख लें, एक सामान्य मध्यम वर्ग परिवार की रसोई का खर्च माहवारी 8-10 हजार रुपये से ज्यादा नहीं होता जबकि आमदनी 60 हजार से एक लाख रुपये प्रति माह होती है। बहरहाल किसान इस समस्या से जूझ ही रहा था कि देश में उदारीकरण का दौर शुरू हो गया। इसने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी। आमदनी बढ़ाने के चक्कर में देश का किसान परम्परागत खेती के साथ ही तमाम नई तकनीकों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा शुरू की गई नई योजनायें अपनाने लगा। जैसा कि अपने देश का रिवाज है, किसानों को नये सिरे से प्रशिक्षित करने के लिए न तो सरकारी एजेंसियां थीं और न ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों  ने प्रशिक्षण में कोई दिलचस्पी ली। वे केवल अपना माल और तकनीक बेचने में व्यस्त रहीं। फलस्वरूप बाजार की विवशताओं और बैंकों के कर्जों की वजह से कई बार किसान को फसल का लागत मूल्य मिलना भी दूभर हो गया। नतीजे में अब आत्महत्या के सिवाय किसान के पास कोई चारा भी नहीं रहा।

यह सब तो हुआ ही, यह भी हुआ कि भारतीय उद्योगपतियों और सरकारी अमले की  अयोग्यता और धूर्तता के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था उद्योगों और सेवा क्षेत्रों में इतने रोजगार पैदा नहीं कर पाई जिसमें बढ़ी हुई कृषि आबादी को समायोजित किया जा सके। इस वजह ने भी खेती पर अतिरिक्त बोझ डाला जो किसानों की आत्महत्या का कारण बना। ऐसा नहीं है कि सरकारे इस वजह को जानती नही है लेकिन जान बूझकर आंखे मूंद रखी हैं क्योंकि उदारीकरण के इस दौर में प्रभुवर्ग के स्वार्थ और अधिकारो में किसी तरह की कटौती नही कर सकतीं। मध्यम वर्ग से सबसे ज्यादा वसूली के बाद अगर इस वर्ग की रसोई का खर्च भी बढ़ गया तो जीत के 30-35 फीसदी वोटों के सहारे सरकार बना पाना किसी भी राजनैतिक दल के लिए मुश्किल होगा।

अब रह गयी विशाल निर्धन आबादी तो वह तो पहले से ही मनरेगा के हवाले है और वैसे भी यह आबादी फिलहाल राजनैतिक जागरूकता के लिहाज इस हद तक बिखरी हुई है कि कोई भी राजनैतिक दल जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सरकार बनानी है इस आबादी पर जोखिम मोल नहीं लेगा। इस आबादी का एक पहलू और भी है, इसके तहत वे अकुशल मजदूर और खेतिहर मजदूर आते है जिनकी समाज में कोई हैसियत नहीं है। यह तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूरी है कि उनका न्यूनतम ध्यान रखा जाये, वही हो रहा है। ऐसे में यह कड़वा सच है कि भारतीय किसान की त्रासदी अभी रुकने वाली नहीं, बल्कि बढ़ने की आशंका ज्यादा है। साथ ही भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था अब ऐसी जगह जाकर फंस गयी है, जहां उद्योग-धन्धे हैं नहीं, खेती नष्ट हो रही है और सेवा क्षेत्र भी बेहतर नहीं कहा जा सकता। नतीजे में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अकुशल मजदूरों और डिग्रीधारी अप्रशिक्षित बेरोजगारों की भरमार है। ऐसे में सरकारें मर रहे किसानों पर ध्यान देगी, ऐसा लगता तो नहीं, खासतौर से तब जब इस विकराल समस्या से निपटने की कोई इच्छाशक्ति और योजनाएं भी सरकारों के पास नहीं हैं।

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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कमाल ख़ान की इस एक रिपोर्ट से हिल गया हूं : रवीश कुमार

Ravish Kumar : कमाल ख़ान की एक रिपोर्ट से हिल गया हूं। यूपी के सीतापुर में कर्ज़ रिकवरी वाले एक किसान के घर गए। रिकवरी एजेंट ने किसान को ट्रैक्टर से ही कुचल कर मार दिया और ट्रैक्टर लेकर फ़रार हो गए। मात्र 65,000 रुपये कर्ज़ था।

ज्ञानचंद ने पांच लाख लोन लेकर ट्रैक्टर ख़रीदा था। अधिकांश चुका दिया था। 65000 ही बाकी था। इसी कर्ज़ को चुकाने के लिए ज्ञान चंद दूसरे की खेत जोत रहे थे। रिकवरी वाले खेत पर गए और ट्रैक्टर छीन लिया। ज्ञानचंद रोकने लगे तो उनके ऊपर ट्रैक्टर चढ़ा दिया। किसान की हड्डियां चूर चूर हो गईं। आइये इस देश के किसानों के लिए कुछ देर मौन रहते हैं। कितना बोलेंगे। किसी को तो फर्क पड़ता नहीं है। किसान सिर्फ जय जवान जय किसान के नारे के लिए याद आता है। इस नारे ने देश के किसानों को मरवा दिया।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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वित्तीय पूंजी ने किसानों के सभी तबकों को तबाह किया है

किसान आंदोलन की नयी शुरुआत :  बैंक पति, स्टाक एक्सचेंज अधिपति जैसे वित्तीय अभिजात वर्ग के शासन में किसानों की अर्थव्यवस्था और जीवन का संकट उनकी आत्महत्याओं के रूप में चैतरफा दिख रहा है। यह वो दौर है जिसमें कारपोरेट पूंजी ने राजनीतिक सम्प्रभुता और आम नागरिकों के जीवन की बेहतरी के सभी पक्षों पर खुला हमला बोल दिया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार पर भी वित्तीय पूंजी का गहरा हमला है लेकिन सबसे अधिक इसकी चोट अनौपचारिक आर्थिक क्षेत्र खासकर खेती-किसानी पर दिख रही है। पचास फीसदी से अधिक देश की आबादी खेती पर निर्भर है और आर्थिक संकट का भयावह चेहरा यहाँ खुलकर दिख रहा है।

आजादी के पहले उन्नीसवी शताब्दी में ढेर सारे किसान संघर्ष हुये लेकिन 1917 का गांधी जी के नेतृत्व में हुए चम्पारन सत्याग्रह ने राष्ट्रीय रंगभूमि में किसान आन्दोलन के बतौर राजनीतिक तौर पर अपनी दस्तक दी। नील खेती के विरूद्ध आन्दोलन देर तक नहीं चला लेकिन निलहे साहबों को नील की खेती को बन्द करना पड़ा। उसी तरह गुजरात का खेड़ा आन्दोलन भी राजनीतिक प्रभाव बनाने में सफल रहा। 1921 के असहयोग आन्दोलन में भी गांधी ने किसानों से सरकार को कर न देने की अपील की थी। दूसरा महत्वपूर्ण आन्दोलन किसानों का सहजानन्द सरस्वती की अगुवाई में बिहार में किसान सभा के माध्यम से दिखा जो अपने चरित्र में पूरी तौर पर रेडिकल था। 1927 में गठित इस किसान सभा ने सहजानन्द की अगुवाई में 1934 में गांधी जी से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया।

इस आन्दोलन ने समाजवादियों, कम्युनिस्टों और सुभाष चन्द्र बोस को अपना पूरा सहयोग दिया और कांग्रेस के तमाम विरोध के बावजूद इसकी संख्या 1935 में लगभग 80,000 थी, जो 1938 में बढ़कर 250000 हो गयी। चर्चित किसान आन्दोलनों में जिसका राजनीतिक महत्व था उसमें गुजरात का बारदोली मालाबार का मोपला, बंगाल का तेभागा किसान आन्दोलन चर्चित रहा हैं। तेलंगाना की बात ही कुछ और थी वह भारत की राजनीति दिशा बदल देने का विशेष किस्म का किसान संघर्ष था। विकास का किसान बनाम कारपोरेट रास्ता इस आन्दोलन की अन्र्तवस्तु में था। तेलंगाना किसान आन्दोलन के बाद अस्सी के दशक का किसान आन्दोलन आमतौर पर राजनीति विरोधी दिखता है और गैर पार्टी स्वतंत्र किसान आन्दोलन की वकालत करता है।

इस किसान आन्दोलन में एक घड़ा शरद जोशी का रहा है जो मूलतः किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने और विश्व व्यापार से किसानों के उत्पादन को जोड़ने की वकालत करता है। ग्रामीण विकास पर विशेष जोर देते हुए शरद जोशी भारत बनाम इण्डिया के प्रवक्ता बने। कर्नाटक के नन्जन्डूस्वामी का किसान आन्दोलन अन्य फार्मर आन्दोलन से राजनीतिक तौर पर विकसित दिखता है। महेन्द्र सिंह टिकैत किसानों के उत्पादन के लिए सस्ते दर पर संसाधनों की उपलब्धता की वकालत करते थे। सब मिलाकर फार्मर आन्दोलन अपना प्रभाव छोड़ते हुए भी अपनी राजनीतिक दिशा नहीं तय कर पाया। अस्सी के दशक में ही फार्मर आन्दोलन के विपरीत बिहार का किसान संघर्ष खेतिहर मजदूर उनके साथ गरीब निम्न मध्यम किसानों में राजनीतिक प्रभाव बनाने में एक हद तक सफल रहा है। बिहार का किसान आन्दोलन सर्वागीण भूमि-सुधार पर ज्यादा जोर देता था, लेकिन हरित क्रांति से उत्पन्न संकट के सवाल पर भी हस्तक्षेप का पक्षधर रहा है।

आज दौर में भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ दादरी, कलिंग नगर, पोस्को, रायगढ़, पलाचीमाड़ा आदि में किसानों का सशक्त आन्दोलन खड़ा हुआ और यूपीए सरकार को मजबूर होकर अंग्रेजों के 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून की जगह 2013 में नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाना पड़ा। मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही कारपोरेट घरानों के पक्ष में भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में संशोधन की कोशिश की थी जिसके खिलाफ पूरे देश में किसानों के आंदोलन हुए और किसानों के दबाव में उसे संशोधनों से पीछे हटना पड़ा।
आज हजारों किसानों की आत्महत्याओं के बावजूद देश के वित्तमंत्री, रिजर्व बैंक के गर्वनर व अन्य सत्ता प्रतिष्ठान किसानों के कर्जा माफी इंकार कर रहे है और तर्क दे रहे है कि इससे वित्तीय घाटा बढेगा।

वित्तीय घाटा का तर्क कारपोरेट का है। यदि सरकार वित्तीय घाटा को बढ़ने से रोकने के प्रति ईमानदार है तो उसे बताना चाहिए कि परितोषिक के नाम पर कारपोरेट घरानों का लाखों करोड़ रूपया टैक्स का क्यों हर साल माफ किया जा रहा है, सरकार ने कारपोरेट घरानों की आय पर टैक्स का स्लैब क्यों घटा दिया, लाखों करोड़ों के कारपोरेट घरानों के एनपीए के नाम पर पड़े बैकों के कर्ज की वसूली क्यों नहीं हो रही और कारपोरेट घरानों की सम्पत्ति पर कर क्यों नहीं लगाती। दरअसल कारपोरेट घरानों के मुनाफे की अर्थव्यवस्था ने वित्तीय घाटा को बढाने का काम किया है। इसलिए इसे किसानों और जनता के मत्थे मढ़ने के सरकार की कोशिशों का हर स्तर पर प्रतिवाद करना होगा।

मध्य प्रदेश के मंदसौर में 6 किसानों की हत्या का राष्ट्रीय प्रतिवाद हुआ है और देश भर के अधिकांश किसान आन्दोलन और किसान आंदोलन की पक्षधर ताकतों ने मिलकर कर्जमाफी और लागत मूल्य के डेढ़ गुना दाम के लिए अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति बनाकर आन्दोलन शुरू किया है। 6 जुलाई से इस समन्वय समिति ने मंदसौर से किसान मुक्ति यात्रा शुरू की है जो छः राज्यों से होकर 18 जुलाई को दिल्ली पहुंचेगी जहां किसान जंतर-मंतर पर धरना शुरू करेंगे। भाजपा की मध्य प्रदेश की राज्य सरकार ने पूरे प्रदेश में रासुका लगाकर और यात्रा में शामिल किसान नेताओं को गिरफ्तार कर यात्रा को रोकने की कोशिश की थी पर भारी दबाब में सरकार को पीछे हटना पड़ा और यात्रा जारी है। बहरहाल यह किसान आन्दोलन का नया दौर है इस समन्वय समिति में समाजवादी, कम्युनिस्ट किसान संगठनों की भी अच्छी भागीदारी है। हालांकि कुछ किसान संगठन जो किन्हीं कारणों से अभी भी समन्वय समिति में शामिल नहीं हो सके है उन्हें जोड़ने की जरूरत है।

वित्तीय पूंजी ने किसानों के सभी तबकों को तबाह किया है। इसलिए वित्तीय पूंजी के खिलाफ व्यापक किसानों को उनके ज्वलंत मुद्दों को क्रमशः समाहित करते हुए गोलबंद करना वक्त की जरूरत है। आज के दौर के किसान आन्दोलन की दिशा और नीति को वित्तीय पूंजी की तानाशाही, जिसको केन्द्रीय स्तर पर एनडीए की सरकार स्थापित करने में लगी है, के खिलाफ संगठित और विकसित करने की जरूरत है। जब देश में मौजूद विपक्ष कोई कारगर भूमिका नहीं निभा रहा है किसान आंदोलन को अपने इर्द गिर्द वित्तीय पूंजी के हमलों से पीड़ित सभी तबकों को गोलबंद करना होगा। मोदी सरकार की अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ प्रतिकार में उतरे सामाजिक नागरिक आंदोलनों के साथ कायम एकता किसान आंदोलन को राजनीतिक तौर पर मजबूती प्रदान करेगा।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य
स्वराज अभियान

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किसानों को छींक भी आ जाए तो सरकारें कांपने लगती हैं

सरकार को केवल किसानों की चिंता है…  लगता है कोई और तबका इस देश में रहता ही नहीं…

श्रीगंगानगर। पटाखा फैक्ट्री मेँ आग से दो दर्जन से अधिक व्यक्ति मारे गए। एमपी मेँ सरकारी गोली से आंदोलनकारी 6 किसानों की मौत हो गई। दो दर्जन से अधिक संख्या मेँ मारे व्यक्तियों का जिक्र कहीं कहीं है और किसानों के मरने का चप्पे चप्पे पर। राजनीतिक गलियारों मेँ। टीवी की डिबेट मेँ। अखबारों के आलेखों मेँ। संपादकीय में। बड़े बड़े कृषि विशेषज्ञ लेख लिख रहे है। उनकी इन्कम का लेख जोखा निकाला जा रहा है। उनके कर्ज माफ करने की चर्चा है। उस पर चिंतन और चिंता है। कुल मिलाकर देश का फोकस किसानों पर है।
लगता है कोई और तबका इस देश मेँ रहता ही नहीं।

किसानों को छींक भी आ जाए तो सरकारें कांपने लगती हैं। राजनीतिक दलों मेँ हल चल मच जाती है। नेताओं के दौरे शुरू होते हैं। किसानों के अतिरिक्त किसी की चिंता नहीं। कमाल है! हद है! बड़े शर्म की बात है इस लोकतन्त्र मेँ, जो केवल एक वर्ग की बात करता है। मात्र एक तबके पर अपना पूरा ध्यान लगाता है। सबसिडी किसानों को। कर्ज माफ किसानों का। फसल खराब तो मुआवजा किसान के खाते मेँ। टैक्स की फुल  छूट किसानों को। सस्ती बिजली किसानों को।

कोई पूछने वाला हो इनसे कि ऐसा क्यों! करो माफ किसानों के कर्ज, क्योंकि आधे से अधिक विधायक, सांसद के प्रोफाइल में किसान लिखा मिलेगा। अपने क्षेत्र मेँ देख लो, पूर्व मंत्री गुरजंट सिंह बराड़ किसान। पूर्व मंत्री गुरमीत सिंह कुन्नर किसान। पूर्व मंत्री राधेश्याम गंगानगर, संतोष सहारण, विधायक राजेन्द्र भादू किसान। पूर्व विधायक गंगाजल मील किसान। मंत्री सुरेन्द्रपाल सिंह टीटी, डॉ राम प्रताप किसान….अनगिनत हैं इस लिस्ट मेँ। देश मेँ कितने होंगे! कोई भी कल्पना करके देख ले। कर दो इन सबके कर्जे माफ। क्योंकि ये सब के सब बेचारे हैं। हालत के मारे हैं। इससे बड़ा मज़ाक कोई और हो भी सकता है क्या!

एक दुकानदार को घाटा हो गया। कर्ज नहीं चुका सका। बैंक वाले आ गए ढ़ोल लेकर। उसके घर के सामने खूब बजाए। उस बंदे की इज्जत का तो हो गया सत्यानाश। कोई मुसीबत का मारा नहीं चुका सका कर्ज, कर दिया उसका मकान नीलाम। आ गया बंदा सड़क पर। क्योंकि ये किसान नहीं थे। ये बड़े लोग नहीं थे। देश मेँ हर प्रकार की छूट किसान को। हर प्रकार का टैक्स कारोबारी पर । व्यापारियों से टैक्स लेना, चंदा लेना और फिर इसी तबके को बात बात पर चोर कहना। इससे अधिक अपमान किसी तबके का इस देश मेँ क्या होगा! जो सरकार, अफसरों और नेताओं का पेट भर रहा है वह तो चोर और जिनको सरकार हर प्रकार की सुविधा दे रही है, वे बेचारे। कभी इन का रहन सहन भी देख ले सरकार।

बड़े बड़े नेता बेचारे हो जाते हैं, क्योंकि ये किसान कहलाते हैं और गली मोहल्ले मेँ छोटे छोटे दुकानदार, जो जीएसटी की परिभाषा पूछते घूम रहे हैं वकीलों के पास, वे धनवान है। जो किसान ईमानदारी से लिया कर्ज वापिस कर देते हैं, उन पर क्या गुजरती है, कर्ज माफी से।  वे मूर्ख कहलाते हैं। इस कर्ज माफी से सरकारों पर कितना बोझ पड़ता है, इसका आंकलन करने की योग्यता इन शब्दों मेँ तो है नहीं। सरकार कोई खेती थोड़ी ना करती है जो बोझ को वहन कर लेगी। वह जनता पर टैक्स लगाएगी। कोई नई तरकीब निकालेगी।

कमजोर का कल्याण सरकार की प्राथमिकता हो, परंतु उसे केवल इसलिए पोषित किया जाए कि वह किसान है, ये गलत है। जो मदद का हकदार है, मदद उसकी होनी चाहिए। ताकि किसी दूसरे का मन ना दुखे। उसे ऐसा ना लगे कि उसके अपने ही देश मेँ उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है। इस देश मेँ तो यही हो रहा है। दो लाइन पढ़ो-

परिंदे ने तूफान से पूछा है
मेरा आशियाना क्यों टूटा है।

लेखक गोविंद गोयल Govind Goyal राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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किसानों के पेशाब पीने के बाद भी नहीं पिघलेगी मोदी सरकार

Nitin Thakur : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस दिन कंगारुओं के प्रधानमंत्री के साथ अक्षरधाम में पिकनिक मना रहे थे, क्या उन्हें इल्म है कि ठीक उसी दिन नॉर्थ एवेन्यू पर इस देश के चार किसान नंग धड़ंग होकर प्रदर्शन कर रहे थे? वो पागल नहींं थे.. और ना ही वो किसी पब्लिसिटी के लिए आए थे.. वो तो बेचारे तमिलनाडु के अपने गांवों से हज़ारों किलोमीटर दूर पत्थर के इस शहर में अपनी गुहार लगाने पहुंचे थे।

28 दिनों तक वो बेचारे प्रदर्शन के लिए सरकारों द्वारा तय की गई जगह जंतर मंतर पर पड़े रहे। उन्हें लगा कि चेन्नई ना सही मगर दिल्ली उनकी आवाज़ ज़रूर सुनेगी। 28 दिनों तक तथाकथित प्रधानसेवक के दफ्तर से कोई उनसे बात करने जंतर मंतर नहीं आया। सब्र टूटा तो किसान खुद ही प्रधानमंत्री के दफ्तर जा पहुंचे लेकिन मैले-कुचैले और गंदे-से दिखनेवाले इन जीवों की वहां भला क्या बिसात.. आखिर वो लकदक और चमकदार नेताओं और साहब लोगों का गढ़ है। खैर, पुलिसवाले जीप में ठूंसकर इन किसानों को जंतर मंतर पर ही पटकने के लिए चल दिए। बस तभी मौका पाकर चारों जीप से कूदे और कपड़े उतारकर नारेबाज़ी करने लगे। उस दिन तो उन्हें किसी तरह घेरकर जंतर मंतर ले आया गया लेकिन आज वही लोग चारों तरफ से थक हार कर अपना पेशाब पीकर प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।

इससे पहले वो नरमुंड लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर चुके हैं। दिखावे के इस लोकतंत्र में किसानों का ये झुंड पूरे अहिंसक तरीके से प्रदर्शन कर रहा है लेकिन ना बेशर्म मंत्री के पास इनकी बात सुनने का वक्त है और ना ही उनके नेता के लिए ये ज़रूरी हैं। हां तमिलनाडु में चुनाव होता तो ये ही प्रधानसेवक इन किसानों के ही नाम पर रोने का ढोंग करके ‘मेरे किसान भाइयों को मत मारो’ कहकर हमदर्दी और वोट लूट लेता। आजकल वो सूरत में हीरे के कारखानों का उद्घाटन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बाकायदा वक्त निकालकर गुजरात के बड़े पूंजीपतियों के पुराने अहसान चुका रहे हैं। उनके 5 स्टार हॉस्पिटल के फीते काट रहे हैं जिन्होंने पुराने वक्त में फंड देकर करियर बनाने में मदद की।

मोदी जुलाई में इज़रायल जाने के लिए सामान पैक करने में जुटे हैं लेकिन चंद किलोमीटर पर खुदकुशी से चार कदम दूर किसानों से मिलने का उनके पास ना वक्त है और ना मन। मुझे नहीं लगता कि किसानों के पेशाब पीने से भी कोई सरकार पिघलेगी। वैसे बता दूं कि कंगारुओं के पीएम ने हमारे पीएम के साथ पिकनिक मनाई और सेल्फी तो ली… लेकिन फिर अपने देश में पहुंचते ही वो वीज़ा खत्म कर डाले जिनके सहारे हिंदुस्तान से लाखों बेरोज़गार ऑस्ट्रेलिया में नौकरी करते थे। समझ से परे है कि खुद को प्रधानसेवक (ये शब्द भी नेहरू से चुराया है) कहने वाला ये शख्स आखिर सेवक है किसका? क्या सिर्फ उनका जिनको ऑस्ट्रेलिया में ठेके दिलाने के लिए वो टर्नबुल को मेट्रो में घुमाकर पटा रहा था?

Arun Khare : तमिलनाडु के किसान कर्ज माफी की मांग को लेकर पिछले सैतीस दिन से दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दे रहे हैं आज 22 तारीख को इन किसानों ने सरकार की अनदेखी के विरोध में मूत्रपान कर देश के जनमानस को हिला दिया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिल्ली की सरकार आंख कान बंद कर अन्नदाता को विरोध के ऐसे तरीकों के लिए मजबूर कर रही है । सरकार की इस चुप्पी और किसानों से आज तक बात न करने की घोर निंदा की जानी चाहिए।

इसी के साथ उत्तर भारत के उन किसान संगठनों की भी कडी और घोर निंदा की जानी चाहिए जो अपने दक्षिण भारतीय किसानों के इस संघर्ष में चुप बैठे हुए हैं। कहां है दिल्ली को किसानों से भर देने वाले किसान संगठन? क्या उनके आंदोलन किसी राजनीतिक दलों के हित साधक होते थे ? यदि नही तो ये तथाकथित बडे किसान संगठन क्यों नहीं तमिलनाडु के किसानों के साथ खडे नजर नहीं आ रहे । देश भर के किसानों को आपने स्तर पर अपने अपने तहसील और जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर दक्षिण भारतीय किसानों की मांग का समर्थन करना चाहिए।

Priyamvada Samarpan : ”आत्महत्या की चिता पर देखकर किसान को, नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को?” हरिओम पवार जी के वीर रस की ये पंक्तियां उन्हें कैसे सोने देती होंगी? कविवर जंतर-मंतर पर से ऐसी ही हुंकार का वक्त है… अगर आप किसानों के साथ स्वर देंगे तो देश आपके साथ सुर मिलाएगा. सनद रहे अगर खामोश रह गए तो किसी भी मंच पर कोई बेबाक आईना दिखा देगा. कसम से तब नंगे नजर आएंगे. चुप्पी तोड़िए हुजूर.

Pankaj Chaturvedi : तमिलनाडु के किसान जंतर मंतर पर अपनी मांगों के लिए, जिसमे प्रमुख सम्पूर्ण कर्जा माफी की है, के लिए गत 40 दिन से जतन कर रहे है। कभी आत्महत्या कर चुके किसानों के नर मुंड के साथ तो कभी नग्न हो कर। दिल्ली शहर नगर निगम पर कब्जे की जंग का कुरुक्षेत्र बना है और किसान का दर्द उसके लिए कोई मायने नही रखता। आज किसानों ने अपना ही मूत्र पिया और कल विष्ठा खाएंगे। मीडिया के लिए उसका महज फोटो जरूरी है। मेरी अपील है छात्रों, स्वयमसेवी संगठनों, युवाओं, लेखकों, पत्रकारों से कि वे इस प्रदर्शन को तमाशे के रूप में ना लें। उनके साथ खड़े हों। उनकी मांगों को समाज और जिम्मेदार लोगों तक पहुंचाएं और उन्हें मल खाने जैसा विरोध करने से रोकें। आज मूत्र पान की खबर के बाद मन व्यथित है। यकीन मानिए, लंच नही किया। सोचें कि आपका अन्न दाता पेशाब पी रहा है। घर से निकले। एक रविवार जंतर मंतर पर बिताए। उस नॉटंकी अन्ना और केजरी के पीछे तो बहुत भृमित हुए थे। इन किसानों में खुद को देखें।

पत्रकार नितिन ठाकुर, अरुण खरे, प्रियंवदा और पंकज चतुर्वेदी की एफबी वॉल से.

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किसानों की वायरल हुई ये दो तस्वीरें ‘मोदी गान’ में रत टीवी और अखबार वालों को न दिखेंगी न छपेंगी

Mahendra Mishra : ये तमिलनाडु के किसान हैं। दक्षिण भारत से दिल्ली पीएम मोदी के सामने अपनी फरियाद लेकर आये हैं। इनमें ज्यादातर के हाथों में ख़ुदकुशी कर चुके किसानों की खोपड़ियां हैं। बाकी ने हाथ में भीख का कटोरा ले रखा है। पुरुष नंगे बदन हैं और महिलाओं ने केवल पेटीकोट पहना हुआ है। इसके जरिये ये अपनी माली हालत बयान करना चाहते हैं। इन किसानों के इलाकों में 140 वर्षों बाद सबसे बड़ा सूखा पड़ा है।

ये किसान चाहते हैं कि उन्हें सूखे में खराब हुई फसलों का मुआवजा मिले। साथ ही उनके कर्जे माफ़ कर दिए जाएं। और बुजुर्गों के लिए सरकार पेंशन की व्यवस्था करे। पीएम आवास की तरफ मार्च कर रहे इन किसानों को पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया। और फिर इन्हें जंतर-मंतर पर लाकर पटक दिया। इनका कहना है कि अब ये लौटकर जाने से रहे। क्योंकि इनके पास वहां खाने के लिए कुछ नहीं बचा है। भले उन्हें यहां भीख ही क्यों न मांगनी पड़े ये यहीं रहेंगे।

देश के लोगों का पेट भरने वाले किसान के हाथ में अगर भीख का कटोरा आ गया है। तो यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि हालात किस कदर बदतर हो गए हैं। ऊपर से अपनी बदहाली दिखाने के लिए अगर उसे अपने परिजनों की कब्रें खोदकर उनकी खोपड़ियां हाथ में लेनी पड़े तो समझिए सरकारी संवेदना पाताल के किस हिस्से में पहुंच गई है। कहां तो हम दुनिया की महाशक्ति बनने जा रहे हैं। लेकिन सामाने की हकीकत है कि उसे देखना ही नहीं चाहते। या फिर देखकर भी अनदेखा कर देना चाहते हैं।

महेंद्र मिश्रा सहारा समय, न्यूज एक्सप्रेस समेत कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं.


Satyendra PS : ये​ हरियाणा के किसान हैं,खेतों के लिए पानी मांग रहे थे। नहर का काम पूरा कराए जाने का वादा था वही पूरा कराना चाहते थे ! इस चेहरे में अपना चेहरा देखें, पिता, चाचा, भाई का चेहरा देखें। उन सबका चेहरा देखें जो सरकार से कुछ उम्मीद करते हैं, जो सरकार से कुछ छोटी मोटी सुविधाओं की उम्मीद करते हैं। लोकतंत्र लहूलुहान है। अपने रक्त में नहाया यह देश का किसान है!

सत्येंद्र प्रताप सिंह बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी अखबार के दिल्ली एडिशन में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.


उपरोक्त तस्वीरों पर कुछ टिप्पणियां…

Anil Mishra पानी मांग रहे थे तो सिर्फ लाठी खाये। अगर सरकार इनकी जमीन मांगती तो गोली खाते। इसमें कांग्रेस बीजेपी सपा बसपा का कोई लेना देना नहीं। यही परम्परा है। लोकतंत्र धोखा है। असल लड़ाई पूँजीवाद वर्सेस सर्वहारा है। गरीब को मार ही खाना है। सरकार किसी की भी हो।

Mahendra K. Singh लोग इस समय “राष्ट्रवाद” की अफीम खाकर मस्त हैं, वे इस तस्वीर में अपने पिता, चाचा, भाई का चेहरा तब तक नहीं देख पाएंगे जब तक उन के चाचा, पिता, भाई खुद इस जुल्म का शिकार न हो जाएँ। वैसे राष्ट्रभक्तों का यह मानना है कि खेती बारी आम लोगों के बस की बात नहीं है, इन लोगों को अपने खेत “राष्ट्रभक्त कॉर्पोरेट” जैसे अम्बानी और अडानियों को सौंप देने चाहिए, वे सेठ लोग फिर इन्ही गरीब लोगों को अपना मज़दूर बना कर उन्ही के खेतों में खेती करवाएंगे, फिर नफे-नुक्सान की कोई चिंता नहीं रह जायेगी, इन सब लोगों को एक निश्चित तनख्वाहें मिलेंगी और फिर सब खुश। अमेरिका में बड़ी-बड़ी कंपनियों ने यही किया, छोटे-छोटे किसानों के खेत खरीद लिए अब उन पर बड़े पैमाने पर खेती करवाते हैं – जैसे चिप्स बनाने वाली कंपनियां लाखों एकड़ बड़े खेतों में आलू के खेती, ब्रेड बनाने वाली कंपनियां ऐसे ही मीलों तक फैले खेतों में गेहूं की खेती। वही मॉडल भारत में लाकर मोदी जी देश का विकास करना चाहते हैं और इस किसान जैसे कुछ “राष्ट्रद्रोही” मोदी की योजना पर पानी फेरना चाहते हैं – कपार तो फूटना ही चाहिए ऐसे “राष्ट्रद्रोहियों” का।

Shaukat Ali Chechi मैं तहे दिल से लानत भेजता हूं ऐसी सरकारों पर अगर इस देश में ईमानदार है खून पसीने की खाता है गरीब है 70 परसेंट देश को चला रहा है देश की सरहदों की रक्षा करने में सबसे ज्यादा योगदान दे रहा है जिनको सरकार के मंत्री कायर कहते हैं वह है किसान हमारे पूर्वजों ने नारा दिया था जय जवान जय किसान आज उनकी यह हालत उनकी दुर्गति उनका अपमान जो देश का भी पेट भरता है पशु पक्षियों का भी पेट भरता है उसके पैदा करे हुए माल से देश की पहचान व तरक्की है आखिर इनका कौन सा गुनाह है कोई देशवासी तो बताएं

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सूखे और कर्ज की मार झेल रहे यूपी के एक किसान ने नातिन की शादी से हफ्ते भर पहले कर लिया सुसाइड

सूखे से तप रहे यूपी के बेहाल बुंदेलखंड में किसान के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं है शायद! इस मृतक किसान को नातिन की शादी करनी थी। धन का प्रबन्ध नही कर पाया तो ‘मेरा चोला हो लाल बसंती, सूख रही बुन्देली धरती’ कहते फांसी पर झूल गया! इसने बैंक से क्रेडिट कार्ड का 50 हजार का कर्ज लिया था जो चुकता नहीं हुआ!

झाँसी के समथर क्षेत्र के इस किसान की मौत पर भारतीय किसान यूनियन (भानु) के शिवनारायण सिंह परिहार (बुंदेलखंड अध्यक्ष) कहते है कि 16 अप्रैल को इसके नातिन की शादी है, दुर्भाग्य है इस किसान का शव ऐसे ही 5 घण्टे लटका रहा मगर स्थानीय प्रसाशन नहीं आया… देखिये यह फंदा आजाद देश के महान कृषि प्रधान अन्नदाता ने गले में डाला है, वो आप सबका मेक इन इंडिया करने की मांग कर रहा है.

बुंदेलखंड के सोशल एक्टिविस्ट आशीष सागर के फेसबुक वॉल से.

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कर्जखोर माल्या पर सिस्टम की दरियादिली से दुखी वेस्ट यूपी के एक प्रगतिशील किसान ने सुनाई आपबीती

Mukesh Yadav : किसान Vs माल्याज : नीचे एक किसान की आपबीती है… यह पोस्ट इस व्यवस्था का आईना है, जरूर पढ़िए. अंधभक्त भी देखें कि ‘सीमा पर जवान, खेत में किसान’ शहादत दे रहे हैं और माल्या अम्बानी अडानी जैसे लुटेरे टैक्सपेयर्स का पैसा लूटकर प्रधामनंत्री टाइप के लोगों को किस तरह जेब में रखते हैं. संविधान इनकी डस्टबिन में पड़ा है और जज पुलिस इनकी ‘शुभ दीपावली’ की मिठाई खाकर जमीर इनके यहां गिरवी रख चुके हैं. अब आप बताइये कौन देशभक्त और कौन देशद्रोही?

वेब जर्नलिस्ट मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

डॉ. अजित : विजय माल्या बेशर्मी से देश का कई हजार करोड़ डकार कर आराम से देश में विलासिता भोग रहा है। खबर ये भी है कि जल्द ही वो लंदन शिफ्ट होने वाला है। सिस्टम उसका कुछ नही बिगाड़ पाएगा। वो आराम से यहां से निकल जाएगा। जबकि इसके उलट किसान क्रेडिट कार्ड के ऋण के बदलें बैंक किसानों के नाक में दम कर देते हैं। मार्च के महीने में क्या मजाल वो अपना गन्ना भुगतान भी निकाल सके। मैनेजर उनका पैसा सीधा लोन अकाउंट में ट्रांसफर कर देते हैं।

आरसी कटने पर जिल्लत मत पूछिए। कुछ किसान तो कई कई दिन राजस्व बंदी गृह में भी रहकर आते हैं। एक ये माल्या है जिस पर बैंक का इतना बड़ा कर्जा है और उसका कोई कुछ नहीं उखाड़ पा रहा है और एक श्रमजीवी किसान है जिस पर कुछ लाख रुपए होने पर ही उसकी नाक में दम कर दिया जाता है जबकि वो कर्जा चुकाने की ईमानदार मंशा रखता है। ये देश के सिस्टम का कैसा दोहरा रवैया है। जो अन्नदाता है गरीब है उस पर कर्जे का ऐसा तकादा कि वो आत्महत्या तक कर लेता है और जो अमीर धनपशु है उससे कर्जा न वसूल पाने की अजीब सी बेबसी।

अब सैद्धांतिक बात से परे खुद का उदाहरण देता हूँ। हम भले ही बड़ी जोत के किसान रहे हैं मगर कई साल पहले हम खुद किसान क्रेडिट कार्ड के लोन के ऐसे चक्रव्यूह में फंसे थे कि बैंक मैंनेजर ने आरसी काटने की धमकी दी और लोन वसूली का ऐसा मानसिक दबाव बनाया कि पूछिए मत। लोन की राशि लाखों में थी। सामाजिक प्रतिष्ठा के दबाव और बैंक के दबाव के चलते अंतोतगत्वा हमने अपना एक दशहरी आम का बाग बेच कर वो कर्जा चुकाया था।

गाँव में जमीन बेचने का जो सामाजिक कलंक होता है वो गाँव देहात से जुड़े लोग बखूबी समझते हैं। आज जब विजय माल्या की बेशर्मी और सरकार की मजबूरी देखता हूँ तो अपने उस बाग़ बेचने वाले निर्णय पर अफ़सोस होता है। हमने तो कुछेक लाख के लिए अपने जी पर पत्थर रखकर सामाजिक प्रवंचना झेलते हुए वो कर्जा उतारा और एक ये माल्या है जो 7000 करोड़ का कर्जा होने के बावजूद भी ऐश कर रहा है और वो दिन दूर नहीं जब ये लन्दन शिफ्ट हो जाएगा।

सिस्टम का यही भेदभाव आदमी को विद्रोही बनने पर मजबूर करता है। मैं नहीं मानता कि नियम-कायदे मजबूत और कमजोर पर एक समान लागू होते हैं।

जिला मुजफ्फरनगर के पढ़े लिखे किसान डा. अजित के फेसबुक वॉल से.

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बर्बाद फसल दिखाने आई गरीब महिला को हड़का रहे इस कलेक्टर ने चार जूते मारने लायक काम किया है या नहीं? (देखें वीडियो)

एबीपी न्यूज में स्पेशल करेस्पांडेंट ब्रजेश राजपूत ने एक वीडियो फेसबुक पर शेयर किया है. साथ ही यह भी बताया है कि इस वीडियो के एबीपी न्यूज पर चलने के फौरन बाद वीडियो में दिख रहे खलनायक अफसर के ट्रांसफर का आदेश आ गया. वीडियो में खलनायक अफसर एक गरीब किसान महिला को हड़का रहा है. यह किसान महिला जनसुनवाई में अपनी सूखी फसल दिखाने लाई थी और फसल दिखाते ही अफसर इस महिला पर बिगड़ पड़ा.

पहले पढ़िए ब्रजेश राजपूत ने फेसबुक पर क्या लिखा है और फिर देखिए वो वीडियो जिसे उन्होंने एफबी पर अपनी पोस्ट के साथ शेयर किया है. वीडियो देखकर पक्का आपका खून खौल उठेगा. ऐसे संवेदनहीन अफसरों को क्या चौराहे पर खड़े करके चार जूते नहीं मारने चाहिए ताकि बाकी अफसरों में खौफ पैदा हो सक? इन अफसरों को पद और पैसा आखिर मिलता किस बात के लिए है? कि ये आम जन से बदतमीजी करें? जब भी कोई अफसर इस किस्म की बेहूदा हरकत करे, फौरन उसे मोबाइल में शूट कर ऐसे ही पब्लिक डोमेन में लाने की जरूरत है ताकि इनके भीतर तनिक तो डर कायम रहे. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


Brajesh Rajput : कैमरा लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी है। भले ही वो मोबाइल कैमरा क्यों ना हो। ये हैं भिंड के पूर्व कलेक्टर मधुकर आग्नेय जो जनसुनवाई में सूखी फ़सल दिखाने आयी महिला पर इस बुरी तरह से बिगड़े कि एमपी में संवेदनशील सरकार के दावों की क़लई खुल गयी। हैरान करने वाला ये छोटा सा वीडियो एबीपी न्यूज़ ने 10 बजे हेडलाइन बनाकर दिखाना शुरू किया तो चार बजे कलेक्टर साहब की जिले से रवानगी के आदेश आ गये। ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की ऐसी हरकत दिल दुखा देती है। चैनल और कैमरा सलामत रहे सदियों तक।

वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें:Badtameez Afsar

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बिल्डर की मनमानी पर गुस्सा फूटा, पुलिस और किसान आमने-सामने

मिर्जापुर (यूपी) : रामपुर बांगर गांव के खसरा नम्बरान 62 और 70 पर उच्च न्यायालय द्वारा यथास्थिति बनाये रखने के आदेश पारित किये गये थे, उस जमीन पर गौड सिटी बिल्डर द्वारा कार्य शुरू कर दिये जाने से किसानों का आक्रोश सड़कों पर आ गया। किसान नेता धीरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में 50 गांवों के किसानों की एक महापंचायत गौड सिटी बिल्डर की साइट पर हुई। पुलिस द्वारा धारा 144 का हवाला देकर किसानों को धमकाकर रोकने का प्रयास किया गया, जिससे स्थिति और बिगड़ गयी। पुलिस के रवैये से नाराज किसानों ने गौड सिटी बिल्डर की साईट पर ही बैठकर अनिश्चितकालीन धरना देने का ऐलान कर दिया तथा कब्जा लेने के लिए ट्रैक्टर मंगवा लिए। 

मिर्जापुर में बिल्डर की मनमानी से गुस्सा किसान निर्माण स्थल की ओर कूंच करते हुए

पुलिस की मौजूदगी में विरोध पर आमादा किसान

स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए मौके पर उपजिलाधिकारी सदर बच्चू सिंह के नेतृत्व में यमुना प्राधिकरण के अधिकारी किसानों के बीच पहुंचे। उन्होंने आश्वस्त किया कि समझौता होने तक बिल्डर विवादित भूमि पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं करेगा। 

गौरतलब है कि ज्ञात रहे कि उच्च न्यायालय के आदेश का पालन कराने के लिए तीन माह पूर्व 06 अप्रैल 2015 को प्राधिकरण ने मौके पर गौड सिटी बिल्डर द्वारा विवादित जमीन पर किये जा रहे निर्माण कार्य को बंद करा दिया था। चोरी छिपे गौड सिटी बिल्डर के कर्मचारी निर्माण कार्य बदस्तूर जारी रखे हुये थे। किसानों के मना करने पर फौजदारी पर आमादा हो जाते थे और स्थानीय थाने में किसानों के विरुद्ध झूठी शिकायतें दर्ज करा देते थे, ताकि किसान डर कर अपने हक की आवाज न उठायें। 

किसान नेता धीरेन्द्र सिंह ने किसानों के मध्य में कहा कि शक्तिशाली पूंजीपतियों ने कानून के मुहाफिजों को अपनी मुट्ठी में कैद कर रखा है, जिसकी वजह से किसानों का हक मिलने से पहले उसे मार लिया जाता है। किसानों को धमकियां देकर तथा आपसी फूट डालकर पुलिस और प्रशासन के लोग बिल्डरों को नफा पहुंचाते हैं। किसान विकास के खिलाफ नहीं है लेकिन यदि उनके साथ जोर जबरदस्ती की गयी तो इसके परिणाम गम्भीर होंगे। 

पंचायत की अध्यक्षता अर्जुन प्रधान सलारपुर ने की। संचालन चन्द्रपाल सिंह सोलंकी ने किया। किसान मजदूर संगठन के जिलाध्यक्ष चौधरी अमरपाल सिंह, भृगराज सिंह रावल, सुरेश सिंह, हरिबाबा, राजेन्द्र भगत, किरनपाल मुनिम, अनूप चौधरी, उधम सिंह आदि ने भी पंचायत के समक्ष अपने विचार रखे। पंचायत में शामिल प्रमुख लोगों में इन्दर प्रधान, मेघराज सिंह, सुरेशचंद शर्मा, ठाकुर किरनपाल सिंह, रामेश्वर दयाल प्रधान, राकेश भाटी, हंसराज शर्मा, श्रीओम शर्मा, जसवंत प्रधान जी भाईपुर, जाकिर प्रधान, बिजेन्द्र प्रधान, हाजी हाशम अली खांन, देवेन्द्र सिंह, सत्यप्रकाश, पूरन सिंह, नवजीत चैधरी भूले मेम्बर, ललित भाटी, चंचल सिंह, सलीम भाटी दौला, राजीव भाटी, धर्मेन्द्र सिंह, गिर्राज शर्मा वाईस चेयरमैन रबूपुरा, अमन ठाकुर, धर्मवीर सिंह, ओमकुमार, रामवीर सिंह, नेपाल सिंह, हरकेश प्रधान, रविन्द्र भाटी, नेपाल सिंह, रामवीर सिंह, योगेन्द्र सिंह, रियासत अली, राकेश भाटी, मानक सिंह, महेश नेता जी, सतीश मिल्क, भूले मेम्बर, खलील खांन, धर्मराज, सुरेशचंद शर्मा, मुकेश, नसरू ठेकेदार, अमित कौशिक आदि हजारों लोग उपस्थित रहे। 

Video link : https://youtu.be/XmEVmPfig3U

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आर्थिक सुधारों के ढाई दशक में कृषि क्षेत्र ही सर्वाधिक उपेक्षित हुआ है : अखिलेन्द्र

: भूमि अधिग्रहण अध्यादेश नहीं समग्र भूमि उपयोग नीति की देश को जरूरत : आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने वाराणसी में आयोजित स्वराज्य संवाद को बतौर अतिथि सम्बोधित करते हुए एनडीए की मोदी सरकार द्वारा तीसरी बार भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश लाने के फैसले की सख्त आलोचना की और इसे मोदी सरकार का लोकतंत्र विरोधी कदम कहा। उन्होंने समग्र भूमि उपयोग नीति के लिए राष्ट्रीय आयोग के गठन को देश के लिए जरुरी बताते हुए कहा कि जमीन अधिग्रहण का संपूर्ण प्रश्न जमीन के बड़े प्रश्न का महज एक हिस्सा है। 2013 का कानून पूरे मुद्दे को सरकारी और निजी एजेसियों द्वारा उद्योग और अधिसंरचना के विकास बनाम जमीन मालिकों और जमीन आश्रितों के हितों के संकीर्ण व लाक्षणिक संदर्भ में पेश करता है। 2013 का कानून बाजार की तार्किकता के बृहत दायरे के भीतर ही इसकी खोजबीन करता है।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि जमीन-लूट के विरुद्ध किसान-आदिवासी प्रतिरोध सहमति व मुआवजे से आगे बड़े बुनियादी मुद्दों को उठाता है। इस विमर्श में सामाजिक विवेक के आधार पर जमीन एवं खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग शामिल है। बाजार-प्रक्रिया में अंतर्निहित विकृत्तियां सट्टेबाज वित्तीय पूंजी से बढावा पाती है। अंधाधुध निजी मुनाफाखोरी के आगे जनहित के लक्ष्य की प्राप्ति वस्तुतः असंभव है। इस प्रक्रिया में खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण व इकोलाजिकल संतुलन की सामाजिक तौर पर अनदेखी की जाती है। इससे पैदा हो रहे सामाजिक असंतुलन में संपत्ति, संसाधनों व शक्ति के चुनिंदा कार्पोरेट घरानों के हाथों तेजी से संकेन्द्रण के कारण भारी पैमाने पर किसानों-ग्रामीणों की बेदखली व दरिद्रीकरण होता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बड़े प्रश्नों का हल तब तक असंभव है जब तक कि बाजार की तार्किकता (Market Rationality) को पूर्णतः सामाजिक विवेक (Social Rationality) के सिद्धांत के मातहत नहीं लाया जाता।

अखिलेन्द्र ने कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मानक वर्ष में बदलाव कर सात प्रतिशत से ज्यादा की जीडीपी दर दिखाकर भले ही मोदी सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है। सच यह है कि पिछले दशक के इस वित्तीय वर्ष में लोगों की क्रय शक्ति में सबसे ज्यादा गिरावट आयी है और रोजगार के अवसर घटे हैं। दरअसल देश की आधी से ज्यादा आबादी खेती किसानी पर निर्भर है। देश की 47.2 करोड़ की श्रमशक्ति में कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्र 23 करोड़ लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। आर्थिक सुधारों के ढाई दशकों में कृषि क्षेत्र ही सर्वाधिक उपेक्षित हुआ है। मोदी सरकार के एक वर्ष में तो देश की कृषि विकास दर शून्य पर आकर टिक गई है व ऋणात्मक विकास को प्रदर्शित कर रही है।

कृषि की उपेक्षा को सम्पूर्ण बजट में उसकी हिस्सेदारी से समझा जा सकता है। वर्ष 2014- 15 के इस सरकार द्वारा 16.81 लाख करोड़ के बजट में कृषि और सहकारिता के क्षेत्र को जहां केन्द्र व राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में कुल 22651.75 करोड़ रुपए आंवटित हुए थे वहीं इस वर्ष 17.77 लाख करोड़ के बजट में इस क्षेत्र में 17003.85 करोड़ रुपए आवंटित कर सरकार ने 5647.69 करोड़ की कटौती कर दी है। (व्यय बजट, अवस 1, 2015-16) कृषि संकट के कारण हर महीने करीब दस लाख लोग गैर-कृषि क्षेत्र में दाखिल होते हैं मगर निर्माण क्षेत्र को छोड़ दें तो नए रोजगार पैदा नहीं हो रहे है। आईटी, आटोमोटिव एवं दवा जैेसेे क्षेत्र भी भारी श्रमशक्ति को कतई समाहित नहीं कर सकते। कृषि और कृषि आधारित उद्योग ही रोजगार के संकट को हल कर सकते है। कारपोरेट पूंजी के विकास पर निर्भर होकर कृषि और रोजगार के संकट को कतई हल नहीं किया जा सकता। स्पेशल इकनोमिक जोन पर संसद में 2014 में पेश सीएजी की रिर्पोट कहती है कि सेज का मकसद आर्थिक विकास, माल एवं सेवाओं के निर्यात को प्रोत्साहन, घरेलू एवं विदेशी निवेश को बढ़ावा, रोजगार सृजन और अधिसंरचनात्मक सुविधाओं का विकास करना था। जबकि राष्ट्रीय डाटाबेस में यह साफ तौर पर दिखता है कि सेज के क्रियाकलापों से इन क्षेत्रों में कोई विकास नहीं हुआ।

152 सेजों के अध्ययन से सीएजी ने कहा कि रोजगार के अवसर बढ़े नहीं है। दूसरी बात यह भी गौर करने लायक है कि विकास के लिए जमीनें किसानों से ली गयी लेकिन बिल्डरों ने सरकार से मिलकर जमीनों का अच्छा खासा हिस्सा हथिया लिया। सीएजी रिर्पोट कहती है कि सेज के लिए देश में 45635.63 हेक्टयर जमीन अधिग्रहित की गयी जिसमें 28488.49 हेक्टयर जमीन में ही काम शुरू हुआ। सेज के लिए ली गयी जमीनें ‘‘सार्वजनिक उपयोग‘‘ के लिए ली गयी जिनका व्यावसायिक उपयोग किया गया। मोदी सरकार किस कदर झूठ बोलती है इसको इस सरकार के सिंचाई के सम्बंध में किए जा रहे दावे से समझा जा सकता है। सरकार ने पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष सिंचाई के बजट में तीन सौ करोड़ रुपए की कटौती कर दी है और जिस प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की बड़ी बातें हो रही है उसे महज 1000 करोड़ रुपए ही बजट में आवंटित किए गए है।

आइपीएफ राष्ट्रीय संयोजक ने आंदोलन के मुद्दे को सूत्रबद्ध करते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश तत्काल वापस लिया जाए और जनपक्षधर, वैज्ञानिक, आजीविकाहितैषी, खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने वाली और पर्यावरणहितैषी राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति के निर्माण के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन हो जो निश्चित समय सीमा में अपनी संस्तुति दे और तद्नुरुप कानून बनाया जाए, गैर कृषि उपयोग एवं कारपोरेट हितों के लिए कृषियोग्य जमीन के हस्तांतरण पर कड़ाई से रोक लगायी जाए, किसान आंदोलन के रूप में सहकारी आंदोलन, जो क्रेडिट, विपणन, लागत सामग्री की आपूर्ति एवं उत्पाद का प्रसंस्करण, अन्य सेवाएं, और सर्वोपरि खेती को समेटे हुए हो।

राज्य समर्थित कार्यक्रम के मकसद की तर्कसंगत समयसीमा में गारंटी की जानी चाहिए, जो कृषि कार्यशक्ति का शहरी व अर्द्धशहरी इलाकों में पलायन को कम करेगा और कम से कम औसतन राष्ट्रीय आय के बराबर प्रति व्यक्ति की दर से इस कार्यशक्ति को कार्यस्थल या उसी जल संभारक इलाके में ही अतिरिक्त श्रम के जरिए रोजगार की गारंटी की जानी चाहिए। यह हमारी औद्योगिक नीति के दायरे में बदलाव की मांग करेगा। यह ‘‘वैश्विक प्रतिस्पद्र्धी औद्योगीकरण’’ की मौजूदा मोहग्रस्तता से हटने का समावेशन करेगा और ‘‘रोजगार-केन्द्रित, जन उपभोग अनुकूल एवं गांव आधारित औद्योगीकरण’’ के पक्ष में बदलाव का वाहक बनेगा। अखिलेन्द्र ने कहा कि मोदी सरकार के विरूद्ध किसानों में अविश्वास का वातावरण है ऐसी स्थिति में देश की सभी आंदोलन की ताकतों को एक साथ आकर किसान सवालों पर इस सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ आंदोलन तेज करना होगा।

द्वारा जारी
दिनकर कपूर
संगठन प्रभारी
आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ)
उत्तर प्रदेश

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‘अर्द्ध सत्य’ के इस शानदार एपिसोड के लिए राणा यशवंत बधाई के पात्र हैं

भड़ास4मीडिया के कामकाज की व्यस्तता और यहां-वहां की यात्राओं-भागदौड़ के कारण न्यूज चैनल देखने का कम ही मौका मिल पाता है. लेकिन जब भी देखता हूं तो ज्यादातर निराश होता हूं और तुरंत डिस्कवरी, डिस्कवरी साइंस, एनजीसी, हिस्ट्री आदि चैनलों पर जाकर टिक जाता हूं. बकवास की चीख पुकार की जगह धरती ब्रह्मांड समुद्र जीव जंतु आदि के बारे में जानना सुनना समझना श्रेयस्कर है. दो रोज पहले ऐसे ही हिंदी न्यूज चैनलों पर भटक रहा था तो इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत का शो ‘अर्द्ध सत्य’ देखने लगा. शो अभी शुरू ही हुआ था. कंटेंट प्रभावित करता गया. रुक कर देखने को बाध्य हुआ.

बहुत अरसे बाद लगा कि किसी हिंदी न्यूज चैनल पर किसी सोशल एक्टिविस्ट ने कोई प्रोग्राम तैयार किया हो. बेहद साफ सरल शब्दों में बाजार और ताकतवरों के खेल का खुलासा कर दिया. बेहद शांति और साफगोई के साथ किसानों मध्यवर्गीयों गरीबों बच्चों के साथ किए जा रहे छल साजिश का भंडाफोड़ कर दिया. आलू बनाम चिप्स का महाखेल, कोल्ड ड्रिंक्स यानि लूट का अंतरराष्ट्रीय कारोबार, बेबी प्रोडक्ट्स यानि बचपन के साथ विश्वासघात, बोतलबंद पानी बनाम गरीबों की मजबूर प्यास… ऐसे मसलों के जरिए राणा यशवंत ने बहुत सरलता सहजता से समझा दिया कि ये जो सत्ता बाजार है, मिलजुल कर लूट का एक ऐसा संगठित गिरोह चला रहे हैं जिसका हमको आपको एहसास तक नहीं होता और हम रोज हंसते मुस्कराते रोते लुटते नष्ट होते रहते हैं.

इसे देखने के फौरन बाद मैंने तय किया कि इस शो को अन्य लोगों को भी दिखाया जाए ताकि वे भंगियाए हुए इनकी उनकी जय जय गान करने की जगह सच्चे तथ्यों आंकड़ों तर्कों पक्षों को अपने भीतर इजाद कर सकें और इनके जरिए पैदा हो रहे सवालों को लेकर इस क्रूरतम समय के महारथियों से मुठभेड़ का माद्दा पैदा कर सकें. इस शानदार शो के लिए राणा यशवंत बधाई के पात्र हैं. बिना बौद्धिक बाजीगरी के और बिना लफ्फाजी के से आतंकित किए, राणा यशवंत सरलता से वह सारी बातें कह बता जाते हैं जिसको सुनने के बाद व्यवस्था सत्ता बाजार के खिलाफ मन में गुस्सा नफरत भर जाता है.

इस शो के बीच में सत्ता सिस्टम से सवाल पूछने के दौरान नरेंद्र मोदी के कुछ फुटेज दिखाए जाने से यकीनन ये संदेश दर्शकों में गया कि मोदी सरकार भी लुटेरों को समर्थन देने के मामले में बकिया पूर्ववर्ती सरकारों से अलग नहीं है. राणा यशवंत कवि हृदय संपादक हैं और कविताएं लिखते रहते हैं. इसकी छाप उनके इस शो में भी दिखती है. गद्य और गुस्सा को बजाय भोंड़े व तीखे तरीके से पेश करने के, वे पद्यात्मक और स्तब्ध कर देने वाले अंदाज में संप्रेषित करते हैं जो सीधे दिल में उतर जाता है. शो आप भी देखें और अपने दूसरे साथियों को भी दिखलाएं.

शो का यूट्यूब लिंक ये है: https://www.youtube.com/watch?v=gc7a2c-4ISU

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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हरदोई के डीएम ने बर्बाद किसान को फेसबुक पर ब्लाक कर दिया!

Kumar Sauvir : मुझे तो अब अक्‍सर ऐसा साफ लगने लगता है कि जो पढ़-लिख कर डीएम बन जाता है, वह वाकई बेवकूफी या अभद्रता का दामन सम्‍भाल लेता है। उनसे ज्‍यादा समझदार और संवेदनशील तो साबित होता है किसान, जो अफसरशाही कार्यशैली से लेकर प्रकृति तक की निर्ममता का सामना करना होता है। नजीर हैं हरदोई के जिलाधिकारी रमेश मिश्र। हरदोई के डीएम ने डीएम हरदोई के नाम पर एक नया फेसबुक पेज बनाया है, जिसमें वे दिन भर अपनी ढपोरशंखी ढफली बजाया करते हैं कि:- आज मैंने इतने लोगों को लाभान्वित किया, उतने लोगों को उतना फायदा उठाया। इतने लोगों के साथ हेन किया, और उतने लोगों को हेन किया। ऐसा किया, वैसा किया, यू किया, ऊ किया, अइसन किया, वइसन किया।

लेकिन क्‍या, कितना, केतरा किया, उसका जवाब आपको उनके पेज पर टंगी अखबारी कटिंग के शीर्षक में मिल सकता है। पिछले एक पखवारे से डीएम रमेश मिश्र जी लगातार इसी तरह की लारंतनियां फेंक रहे थे, कि अचानक एक बेबस किसान, जिसकी सारी फसल ताजा प्राकृतिक हादसे में तबाह हो चुकी थी, लेकिन ने सरकारी अफसरों पर कई दिनों तक गुहार लगायी, चिरौरी की और मिन्‍नतें मनायीं कि:-सरकार। हम लोग बर्बाद हो चुके हैं, अब आप तो नजरे इनायत कर दीजिए।

लेकिन किसी भी अफसर के कानों तक जूं नहीं रेंगी। हारकर उस किसान ने एक नयी तरकीब अपनायी। उसने डीएम हरदोई फेसबुक के दावों वाले पोस्‍ट पर लगातार अपनी अर्जियां कमेंट के तौर पर लगाना शुरू कर दिया। इस किसान के मुताबिक उसके ऐसे कमेंट-अर्जियां लगाने को डीएम साहब ने इग्‍नोर किया, लेकिन जब किसान ने अपना हौसला नहीं छोड़ा तो डीएम साहब ने खुद ही अपना सब्र तोड़ दिया और उस किसान के कमेंट को लगातार डिलीट करना शुरू किया।

जाहिर है कि इस प्रक्रिया से भी किसान का हौसला नहीं टूटा, बल्कि उसकी तेजी बढ़ती ही गयी। एक दिन तो उस किसान ने यहां तक लिख दिया कि सरकार, अब क्‍या मरै के बादै कोई राहत मिली? नतीजा, डीएम साहब ने फैसला किया कि वह अपने संसार से इस किसान को विदा कर देंगे। और आखिरकार डीएम साहब ने अपने पेज पर इस किसान को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा करते हुए उसे ब्‍लाक कर दिया। बहुत सिकायत करत रहत रहै ना? ल्‍यौ, अब थामो बाबा जी का घण्‍टा!

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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वोटबैंक वाले इस लोकतंत्र में किसान मरे तो मरे… सत्ता और मीडिया ने अपनी औकात दिखा दी…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से…

उद्योगपित दिवालिया होने लगता है तो हंगामा मच जाता है. उसे फटाफट राहत देने की कवायद शुरू हो जाती है. उद्योगपति टैक्सचोरी में फंसा जाता है तो सरकार साहिब माफी देने में यह कहते हुए जुट जाती है कि ऐसा न करने से देश में निवेश और विकास का माहौल प्रभावित होगा. लेकिन जब खेती-किसानी संकट में पड़ जाए तो कोई नहीं बोलता. सत्ता का चरित्र बिलकुल साफ तौर पर सामने है इन दिनों. कारपोरेट मीडिया का बड़ा हिस्सा एक बड़े दलाल की भूमिका में है जो सत्ता को बचाने की खातिर मुख्य मुद्दों से ध्यान डायवर्ट करने में लगा रहता है. एक गजेंद्र के मरने पर आम आदमी पार्टी को घेरने के लिए इतना हायतौबा हुआ लेकिन देश भर में किसान जगह जगह धड़ाधड़ आत्महत्याएं कर रहा है तो कोई दिन भर इस पर लाइव मुहिम नहीं चला रहा.

खेती-किसानी को लेकर यह देश महासंकट से गुजर रहा है. आपातकाल की सी स्थिति से दो-चार है. हम सब जानकर अनजान बने हुए हैं, चुप्पी साधे हुए हैं. नेपाल में भूकंप पर हमारी सक्रियता प्रशंसनीय है. पर हम क्यों नहीं ऐसी ही तत्परता अपने देश में भी दिखा रहे. लगातार मर रहे किसानों को लेकर हम बिलकुल निष्ठुर बने हुए हैं. गेंद इस पाले से उस पाले लुढ़काई जा रही है. जो किसान जिंदा हैं और मुश्किल में हैं, उनकी सुध लेनी चाहिए. सरकारों को अपना खजाना इन किसानों को राहत प्रदान करने के लिए खोल देना चाहिए. नीचे तीन रिपोर्ट्स को शेयर कर रहा हूं. पढ़ लीजिए. आंखें खुल जाएंगी. कई लोग अपनी अपनी सरकारों (कोई नरेंद्र मोदी भक्त तो कोई अखिलेश यादव भक्त ) को प्रोटेक्ट करने के लिए किसानों को गालियां दे रहे हैं. किसान की आत्महत्याओं को सामान्य मौत बता रहे हैं. ऐसे दलाल और सामंती मानसिकता वाले लोगों से कहना चाहूंगा कि दिन रात फेसबुक पर कलम चलाने से खेत में फसल नहीं उग जाती. एनजीओ के धंधे से आए पैसे से आपका परिवार तो चल सकता है, लेकिन जो सिर्फ खेत व खेती पर निर्भर है, वह अगर जिंदा है तो जीते जी मरणासन्न है.

आत्महत्या करने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए. आत्महत्या आखिरी विकल्प के तौर पर व्यक्ति अपनाता है. किसान शौक से सुसाइड नहीं कर रहा है, वह अपनी इज्जत और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए जान दे रहा है. वह कर्ज और विपन्नता के कारण परिवार में मुंह न दिखा पाने की स्थिति को महसूस कर प्राण त्याग रहा है. किसानों के मसले को सोशल मीडिया पर शेयर करिए दोस्तों. साथियों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करिए. मैं किसानों की पीड़ा इसलिए शिद्दत से महसूस कर पाता हूं क्योंकि कक्षा आठ तक की पढ़ाई गांव से की है और अब भी गांव जाना लगा रहता है. फसलों के खराब या ठीक होने पर परिजनों के आंखों में दुख या खुशी का भाव गहराई से महसूस किया है. उन घरों की स्थिति ज्यादा खराब होती है जिनके यहां कोई युवा नौकरी में नहीं है और जिनका सब कुछ किसानी पर ही निर्भर है. ऐसे परिवारवाले फसल तबाह होने पर बिजली और खाद में खर्च की गई रकम तक नहीं निकाल पाते और कर्ज दर कर्ज लेते हुए एक अंतहीन दुष्चक्र में फंस जाते हैं.

हम सभी वे लोग जो गांव से आए हैं, उन्हें किसानों की पीड़ा, दुख को बहुत प्रमुखता से सोशल मीडिया पर उठाना चाहिए अन्यथा हमारी धरती, हमारी माटी, हमारे खेत, हमारे पुरखे हमें माफ नहीं करेंगे. आबादी, भोजन और परिजनों की निर्भरता के लिहाज से किसान इस देश का बहुमत है. जब बहुमत संकट में है तो समझिए पूरा मुल्क संकट में है. किसान कोई धर्म या जाति या क्षेत्र नहीं. किसान राष्ट्रीयता है. किसान भारत की ताकत है. भारत की पहचान है. पर हम सब बहुत बेशर्मी से किसानों की बदहाली के मुद्दे को इगनोर कर रहे हैं क्योंकि किसान किसी एक जाति, किसी एक धर्म, किसी एक क्षेत्र का नहीं है. वोटबैंक वाले इस लोकतंत्र में किसान का कोई धर्म, जाति, क्षेत्र न होना सचमुच बहुत पीड़ादायी है… अन्यथा अगर किसान कोई जाति या धर्म या क्षेत्र होता तो उसकी आत्महत्या पर पूरे देश में बवाल मच चुका होता.

तीन रिपोर्ट्स ये हैं…

किसान ने डीएम ऑफिस के बाहर लगाई फांसी
http://goo.gl/Oph5pE

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किसान आत्महत्या पर डीएम का गैर-जिम्मेदाराना बयान
http://goo.gl/LyxN4T

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हफ्ते भर में राजस्थान में चौथे किसान ने आत्महत्या की
http://goo.gl/uG82Wm

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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राजस्थान में हफ्ते भर में चौथे किसान ने आत्महत्या की

भूकंप के बाद तबाह हुए नेपाल में भारत ने जो सक्रियता दिखाई है, वह तारीफ के काबिल है. लेकिन अगर अपने देश में देखें तो किसान खुदकुशी का मामला किसी तबाही से कम नहीं है. हर रोज जाने कितने किसान मर रहे हैं. लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें पूरी बेशर्मी से इन मौतों को नकार रही हैं. ये सरकारें साफ-साफ किसान विरोधी दिख रही हैं. जिस देश की आबादी की बहुत बड़ी संख्या खेती पर निर्भर हो, उस देश में जब खेती तबाह हो जाए और किसान कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या कर रहा हो तो इससे बड़ा संकट क्या होगा.

यह राष्ट्रीय संकट है. यह आपातकाल की स्थिति है. किसानों तक तुरंत राहत पहुंचाई जानी चाहिए. कर्ज माफ किया जाना चाहिए. लेकिन सरकारी तंत्र यानि नेता अफसर मीडिया सब इस कदर चुप्पी साधे हैं जैसे कुछ हो ही न रहा हो. सारा का सारा एजेंडा अब शहर केंद्रित हो गया है. देश की बहुत बड़ी आबादी मरने के लिए छोड़ दी गई है. यूपी हो या राजस्थान, महाराष्ट्र हो या मध्य प्रदेश. हर जगह किसान तबाह है. आत्महत्याएं लगातार जारी हैं. जयपुर से खबर है कि राजस्थान में फसल खराबे के कारण सदमें में आए किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला थम नहीं रहा है. रविवार को अजमेर की ब्यावर तहसील के फतेहगढ में एक और किसान महेन्द्र सिंह ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. राजस्थान में बीते सात दिन में यह किसी किसान की आत्महत्या का चौथा मामला है.

इसी सप्ताह दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी की रैली में गजेन्द्र सिंह के अलावा और भरतपुर व अलवर में एक-एक किसान की आत्महत्या की बात सामने आ चुकी है. महेन्द्र सिंह के पास छह बीघा जमीन थी और उसकी काफी फसल खराब हो गई थी. उसे उम्मीद थी कि सरकार कम से कम 40-50 प्रतिशत तक मुआवजा देगी, लेकिन गिरदावरी रिपोर्ट में उसका खराबा सिर्फ 30 प्रतिशत बताया गया. ऐसे में उसे मुआवजा मिलने की उम्मीद ही खत्म हो गई, क्‍योंकि 33 प्रतिशत से कम खराबे वालों को मुआवजा देने का प्रावधान नहीं है.

उसने पटवारी से मिलकर इसका विरोध भी किया था, लेकिन कोई फायदा नहीं निकला. गांववालों के अनुसार महेन्द्र सिंह पर कर्जा भी था और खराबे के कारण वह पूरी तरह बर्बादी के हालात में पहु्च गया था. रविवार को गांव में कोई धार्मिक उत्सव था. पूरा परिवार इस उत्सव में गया था, लेकिन धर्मेन्द्र घर पर ही रह गया था. इसी दौरान उसने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

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किसान खुदकुशी मामले में आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने बाराबंकी के डीएम के बयान को गैर-जिम्मेदाराना करार दिया

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किसान खुदकुशी मामले में आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने बाराबंकी के डीएम के बयान को गैर-जिम्मेदाराना करार दिया

Surya Pratap Singh : बाराबंकी में सत्ता की चौखट पर आशाराम ने फ़ासी लगाई. बैंकों और सूदखोरों के तगादे से त्रस्त किसान आशाराम ने शनिवार देर रात बाराबंकी में डीएम आवास के सामने पेड़ से फांसी लगाकर जान दे दी. रविवार सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले लोगों व एडीएम पीपी पॉल ने पुलिस को सूचना दी. आशाराम ने डीएम के नाम संबोधित दो पेज के सूइसाइड नोट में सूदखोरों के दबाव की बात लिखने के साथ ही सीएम से अपने अंतिम संस्कार में शामिल होने का आग्रह भी किया है.

किसान के सुइसाइड नोट का कुछ अंश इस प्रकार है:  “कुछ पैसे मैंने विजय यादव से लिए थे, इस पर उन्होंने मेरी जमीन का इकरारनामा करवा लिया। यह पैसा सुरेश चन्द्र मिश्रा ने विजय को दे दिया है। सुरेश चन्द्र मिश्रा अब पैसा चाहते हैं। न दे पाने पर मुझे अपनी जमीन का बैनामा करना पड़ेगा। मैं अब जीना नहीं चाहता हूं।”

डीएम का गैर जिम्मेदाराना बयानः ”किसान आशाराम शराबी था।”

प्रश्न: यदि शराबी था तो कर्जदार मान कर आत्महत्या का आधार देकर शासन से मुआवजा क्यों माँगा?

प्रदेश की सच्चाई:

1. वर्तमान ओला ब्रष्टि से उ. प्र. में ३०० से ज्यादा किसानो की मौत हो चुकी है. अभी तक रु. 7 लाख प्रति किसान को दिए जाने के वादे के विरुद्ध एक भी किसान को मुआवजा नहीं.

2. वे कहते हैं कि किसी किसान ने ओला ब्रष्टि के नुकसान से आत्महत्या नहीं की. क्या उसे शौक था ऐसा करने का.

3. 89% किसान ऐसे हैं जो साहूकार, बैंक या अन्य संस्थायों के कर्ज से दबा है. राहत के कोई उपाय नहीं किये गए. बैंक और साहूकार का कर्जा माफ़ नहीं. केवल फसली ऋण ही defer किया गया.

4. रु. 4500 करोड़ के नुकसान के सापेक्ष, किसानों को मुआवजे के नाम पर ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ वह भी आधा अधूरा.

5. 75-80% आबादी रोजी रोटी के लिए खेती पर निर्भर है, ऐसी खेती का धंधा जो इतना जोखिम भरा है, छोटे किसानों को फसल बीमा सुरक्षा क्यों नहीं. जो भी बीमा सुरक्षा है वह केवल बड़े किसानों के लिए है, जिन्होंने KKC (किसान क्रेडिट कार्ड) बनवा रखा है.

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.


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राजस्थान में हफ्ते भर में चौथे किसान ने आत्महत्या की

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मीडिया रिपोर्ट्स पर यक़ीन करें तो किसानों के मुद्दे पर हार रही मोदी सरकार

विदर्भ हो या दौसा, तेलंगाना हो या बुंदेलखंड, अगर भारतीय मीडिया की रिपोर्ट्स पर यक़ीन किया जाए तो फांसी लगाकर आत्महत्या करने वाले किसान गजेंद्र सिंह को ‘आपदा पीड़ित’ किसान कहना मुश्किल है. राजस्थान स्थित उनके गाँव का दौरा करने वाले पत्रकारों के अनुसार उनके परिवार के पास 10 एकड़ ज़मीन है. उनका परिवार गेहूँ, आँवला और टीक की खेती करता है. भारत में 65 प्रतिशत किसानों के पास एक एकड़ या उससे कम ज़मीन है. वहीं, राजस्थान में 70 प्रतिशत खेती योग्य ज़मीन ऐसे किसानों के पास है जो मझोले या बड़े किसान हैं यानी जिनके पास 15 एकड़ या उससे ज़्यादा खेती की ज़मीन है.

गजेंद्र सिंह का परिवार छह कमरों वाले एक मंजिल के मकान में रहता है. एक रिपोर्ट के अनुसार, “टीक और आँवले के पेड़ों के घिरे मैदान के बीच स्थित उनके पक्के और बड़े घर से वो समृद्ध परिवार के प्रतीत होते हैं.”

गजेंद्र ने मरने से पहले एक कथित नोट छोड़ा था जिसमें कहा गया है कि ख़राब मौसम के कारण फ़सलें ख़राब होने के बाद उन्हें ‘घर से निकाल दिया गया’ था. हालाँकि उनके परिवार वाले इस नोट से सहमत नहीं हैं.

स्थानीय किसानों ने पत्रकारों के बताया कि उनके इलाक़े में फ़सलों को दूसरे इलाक़ों की तुलना में कम नुक़सान हुआ है.

गजेंद्र सिंह के तीन भाइयों में सबसे बड़े भाई पुलिस में नौकरी करते हैं. उनके दूसरे भाई जयपुर स्थित एक निजी कंपनी में काम करते हैं. ऐसा लगता है कि गजेंद्र सिंह खेती को लेकर बहुत इच्छुक नहीं थे.

दिल्ली स्थित सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के साल 2014 के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में खेती से जुड़े 76 प्रतिशत नौजवान कोई दूसरा काम करना चाहते हैं और 60 प्रतिशत से ज़्यादा शहर में नौकरी.

इन नौजवानों के अनुसार खेती में तनाव और जोखिम ज़्यादा है और फ़ायदा कम.

बेरोज़गार युवक गजेंद्र सिंह अपने पिता के खेतों में काम करते थे. वो प्रसिद्ध राजस्थानी पगड़ी बांधने का काम भी करते थे.

उन्होंने दो बार चुनाव लड़ने की कोशिश की थी लेकिन उन्हें पार्टी टिकट नहीं मिला था. उनके फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल में 66 दोस्त हैं और एक तस्वीर में वो टोयोटा सेडान के साथ दिखाई दे रहे हैं.

उनके गाँव का दौरा करने वाले एक पत्रकार ने लिखा है, “उनका दिल खेती में नहीं लगता था.”

गजेंद्र सिंह आम आदमी पार्टी की दिल्ली में आयोजित किसान रैली में संभवतः पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल से मिलने आए थे. उनके पड़ोसियों ने पत्रकारों से कहा, “संभव है कि वो किसानों की समस्या की तरफ़ ध्यान दिलाना चाह रहे हों और इसीलिए आत्महत्या की कोशिश की हो.”

गजेंद्र सिंह रैली के दौरान एक पेड़ पर चढ़ गए और अपने गले में एक गमछा बांध लिया. उसके बाद उन्होंने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली.

एक रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वो पेड़ से फिसल गए हों और दुर्घटनावश ये हादसा हुआ हो. बहरहाल, पुलिस मामले की जाँच कर रही है.

गजेंद्र का मक़सद जो भी रहा हो उनकी मौत ने भारतीय किसानों की समस्या को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

अजय जाखड़ नामक किसान ने बताया, “पिछले दस सालों में मैंने किसानों की ऐसी त्रासद स्थिति नहीं देखी. यह समस्या बहुत गंभीर है.”

कर्ज़ में डूबे सैकड़ों किसानों की आत्महत्या की ख़बरें मीडिया में आती रही हैं. गाँवों में मज़दूरी की दर पिछले 10 साल में सबसे निचले स्तर पर है.

ट्रैक्टरों की बिक्री से खेती की स्थिति का अच्छा जायज़ा मिलता है. भारत में ट्रैक्टरों की बिक्री में पिछले 10 साल में एक तिहाई की कमी आई है. पिछले तीन साल में खेती के लिए क़र्ज़ लेने की दर में तेज़ बढ़ोतरी हुई है.

विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय किसानों की वर्तमान दुर्दशा के लिए फ़सलों की कम क़ीमत और ख़राब मौसम की दोहरी मार ज़िम्मेदार है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमोडिटी की कीमतें पिछले 10 साल के सबसे निचले स्तर पर है. कपास, आलू और रबर पैदा करने वाले भारतीय किसान इसके सबसे बड़े शिकार बने हैं.

भारत सरकार गेहूँ को विशेष क़ीमत पर ख़रीदती है, लेकिन बेमौसम की बरसात ने फ़सल को बर्बाद कर दिया. ऐसे ख़तरों के निपटने के अपर्याप्त उपायों से किसानों की समस्या और बढ़ जाती है.

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार भारत में किसानों के लिए मौसम के पूर्वानुमान, ख़ास तौर पर मध्यम समय के अनुमानों को काफ़ी बेहतर बनाने की ज़रूरत है.

यह भी महत्वपूर्ण है कि सत्ताधारी भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के विवादित भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर हुए विवाद से किसानों की मौजूदा त्रासदी का ज़्यादा लेना-देना नहीं है. विपक्षी दल इस अध्यादेश का विरोझ कर रहे हैं.

एक किसान ने कहा, “हम भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के बारे में सोच भी नहीं रहे हैं. हमारे सामने एक दूसरी समस्या खड़ी है.”

बहुत से लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसानों में भरोसा पैदा करना चाहिए ताकि ये समस्या और न बढ़े. जाखड़ कहते हैं, “नरेंद्र मोदी की सरकार नज़रिए की लड़ाई में मात खा रही है. भाजपा को किसान विरोधी पार्टी के रूप में देखा जा रहा है.”

नरेंद्र मोदी अपने अगले मासिक रेडियो संबोधन में एक बार फिर किसानों से बात करें तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होगा.

बीबीसी हिंदी से साभार सौतिक बिस्वास की रिपोर्ट

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फसल बर्बाद हो जाने पर मीणा ने कर लिया आत्मदाह

आत्महत्या करने वाले दौसा के किसान गजेन्द्र की चिता की राख अभी ठण्डी भी नहीं हुई कि भीलवाड़ा जिले के जहाजपुर उपखण्ड में लाल का बाड़ा गांव के आदिवासी किसान रामस्वरूप मीणा ने पांच बीघे में बोयी अपनी फसल के खराब होने से परेशान होकर अपने शरीर पर किरोसिन छिड़ककर आग लगा ली। वह बुरी तरह से झुलस गया। उसे भीलवाड़ा के महात्मा गांधी चिकित्सालय में भर्ती करवाया गया, जहां उसका उपचार जारी है।

आत्मदाह करने की कोशिश करने वाले रामस्वरूप मीणा ने कहा कि मुझे पहले से ही डायबिटीज की बिमारी है और मेरे तीन बच्चे हैं। मैंने उधार लेकर फसल की बुवाई की थी लेकिन सारी फसल खराब हो गयी, जिसके कारण मुझे आये दिन कर्जदार परेशान कर रहे हैं। इसलिए मैंने आत्महत्या के लिए यह कदम उठाया था। मेरे यहां कोई भी फसल खराब होने की जानकारी न तो लेने आया, न ही मुआवजे की राशि मुझे मिली है। 

उसके परिजन राजकुमार मीणा ने कहा कि इसकी आमदनी का जरिया मात्र खेती ही थी और उसमें भी कुछ नहीं होने के कारण हालत बहुत खराब हो गयी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार गरीब किसानों की मदद के लिए कब तक पहुंचेगी और कब यह सिलसिला रुकेगा।

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विदर्भ में लाखो ‘गजेन्द्र’ कर चुके आत्महत्याएं, मीडिया ने नहीं लिया संज्ञान

आम आदमी पार्टी की रैली में किसान गजेन्द्र सिंह कल्याणवत ने ख़ुदकुशी कर ली तो समूचे दिल्ली के टीवी चैनल्स रात दिन डिबेट करने में लगे हैं। लाइव शो, टॉक शो के जरिये यह दिखा रहे हैं कि वो किसानों के कितने हिमायती हैं। यह किसान का दर्द केवल गजेन्द्र तक ही सीमित नहीं है। चौबीस घंटे कैमरे के सामने बने रहने वाले रिपोर्टर / एडिटर ने कभी भी विदर्भ के किसानों के दर्द, पीड़ा को समझा नहीं। 

वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ को छोड़ दिया जाए तो कोई भी चैनल या प्रिंट मीडिया के दिल्ली स्थित पत्रकार ने इस मसले को गंभीरता से उठाया नहीं। विदर्भ में किसान ख़ुदकुशी का आंकड़ा बहुत बड़ा है। एक संस्था ने पिछले वर्ष एक सर्वे किया गया था, जिसमें कहा गया है की विगत 15 वर्षो में विदर्भ में दो लाख किसानों ने आत्महत्या की है। यूपीए -एक सरकार के वक्त राहत पैकेज के नाम पर विदर्भ के हिस्से में 60 हजार करोड़ का पैकेज दिया गया था किन्तु यह पैकेज सहकारी बैंक डकार गए। सत्तर हजार करोड़ सिंचाई परियोजनाओं के लिए रखी गई राशि भी नेताओं ने गबन कर ली।  चुकी ज्यादातर विदर्भ में कॉऑपरेटिव बैंक मंत्री, राजनेताओ के हैं, जो किसी न किसी राजनीतिक दल से तालुक्कात रखते हैं। और इन्ही बैंकों में राहत पैकेज की धन राशि जमा की गई। 

केंद्र और राज्य सरकार ने इस मसले का हल ढूंढने के लिए कई सारी कमेटियां बनाईं। मसलन, डॉक्टर नरेंद्र जाधव कमेटी आदि। रोकथाम को लेकर कई कमेटियों ने सुझाव दिए लेकिन समस्या ढाक के तीन पात रही है आज तक। विदर्भ में रोजाना तीन-चार किसान ख़ुदकुशी करते हैं। अब बड़ा सवाल है कि जिस दिल्ली के मीडिया ने विदर्भ के किसानों को भी सूद लेना जरूरी नहीं समझा, जिन्होंने कर्ज के बोझ तले आत्महत्याएं कर लीं, उनकी भी सुननी चाहिए, उनकी भी जिंदगी पीपली के नत्था जैसी आज तक बनी हुई है।

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किसान सुसाइड के बहाने न्यूज चैनलों की पड़ताल और भारत में खेती-किसानी का भविष्य

Ramprakash Anant : NDTV के पत्रकार ने अभी अभी तीन बातें रखीं कि मरने वाले किसान की सत्रह बीघा फसल बर्बाद हो गई है। रैली में आने से पहले उसने जिन रिश्तेदारों से बात की उससे यही पता चलता है कि वह अपने क्षेत्र के किसानों की स्थिति की ओर इस रैली का ध्यान आकर्षित करना चाहता था। गजेन्द्र के भाई भी आजकल पर यही बात कह रहे हैं। बीजेपी के सिद्धार्थ नाथ कह रहे हैं कि वह पीड़ित किसान नहीं था. वह आप का कार्यकर्ता था।

अंजना ओम कश्यप गहन जांच पड़ताल में जुटी हैं और वे दोष सिद्ध कर तुरंत केजरीवाल को जेल भिजवाने के मूड में हैं। जो बात गजेन्द्र के भाई ने कही है वही बात राम गोपाल यादव ने आज राज्य सभा में उठाई थी कि सरकार हजारों करोड़ का प्रीमियम बीमा कंपनियों को दे रही है और वे किसानों को मुआवजा नहीं दे रहीं हैं। देश का प्रधान मंत्री हेड मास्टर की तरह बोलता है- ”देश की जीडीपी बढ़ी, बोलो ये गरीब और किसान के लिए हुआ या नहीं। मुआवजा पचास परसेंट फसल खराब की जगह से कम कर तैतीस परसेंट फसल खराब पर कर दिया, यह किसान के हक़ में हुआ या नहीं।” अब कोई इन्हें क्या बताए कि तैंतीस क्या तीन परसेंट पर कर दो, जब मुआवजा देना ही नहीं है तो क्या फ़ायदा।

ABP, IBN7, इंडिया टीवी जी न्यूज़ का पीपली लाइव चालू है। सुमित अवस्थी को देख के लगता है कि उन्हें यह भी नहीं पता है किसान क्या होता है। वे आशुतोष के बड़े भाई हैं। आम आदमी के सांसद से पूछ रहे थे कि आपकी सरकार ने तीन लाख का एलान किया है क्या इतना काफी है? मुआवजा के पंद्रह-पंद्रह रूपए के चैक किसानों तक पहुँच रहे हैं और बाउंस हो रहे हैं। किसान रोज़ आत्महत्याएं कर रहे हैं। सरकारें इस बात को स्वीकार नहीं कर रही हैं। पिछले महीने भर चैनलों पर निगाह डाल के देखिए NDTV ने लगातार रिपोर्टिंग की है वरना कोई चैनल रिपोर्टिंग तक नहीं कर रहा है।
परसों के टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने सम्पादकीय लिखा है ”टायर्ड पैंटोमिम” इस सम्पादकीय में राहुल गांधी के संसद में दिए भाषण की आलोचना करते हुए किसानों हालात की खिल्ली उड़ाते हुए केंद्र सरकार के मन की बात की है। अखबार ने लिखा है- ”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित मुआवजा व पारदर्शी भूमि अधिग्रहण के लिए सुदृढ़ परिवर्तन किए हैं। संक्षेप में अखबार ने लिखा है कि किसान को स्थाई रूप से गरीबी पीड़ित मान लिया है, इस गरीबी से लाखों लोगों ने अपने आप को नए मध्यवर्ग के रूप में निकाला है और अभी भी 60 % किसान अनुत्पादित कृषि जो जीडीपी में महज 13.9 % योगदान देती है में फंसे हुए है।”

यही बात NDTV पर रविश से कृषि विशेषज्ञ देवेन्द्र ने कही थी कि विश्व बैंक की गाइडलाइन्स हैं कि भारी संख्या में कृषि से निकाल कर लोगों को उद्योग में लगाया जाए। मनमोहन सरकार उतनी तेज़ी से काम नहीं कर रही थी। मोदी ने आते ही बहुत फुर्ती से काम शुरू किया है। आने के तुरंत बाद उन्होंने श्रम कानूनों में बदलाव कर पूंजीपतियों के लिए उपयोगी बनाया। अब उनके मंत्री खुलेआम कह रहे हैं विकास के लिए ज़मीन की ज़रूरत तो पड़ेगी ही और वह किसानों से ली जाएगी। उम्मीद की जानी चाहिए आने वाले समय में मोदी ऐसे हालात पैदा कर देंगे कि साठ प्रतिशत आबादी दो वक़्त की रोटी के लिए कारखाने में काम कर के विकास करने के लिए मज़बूर होंगे।

राम प्रकाश अनंत के फेसबुक वॉल से.

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शाबास टीवी चैनलों! पूरी बहस ‘आप’ बनाम पुलिस पर फोकस रखा, वसुंधरा और मोदीजी का नाम तक न आने दिया

Sandhya Navodita : मौत के मुक़दमे की घंटों लम्बी बहस में महारानी वसुंधरा, मोदीजी और कांग्रेस का नाम तक नहीं आ पाया. यह बड़ी उपलब्धि है. साँच को आँच नहीं आई. यह साबित हुआ कि केजरीवाल और उनकी पार्टी ही मौत के लिए ज़िम्मेदार है. थोड़ी देर में यह भी साबित किया जा सकता है कि देश में अब तक जो तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है उसके ज़िम्मेदार भी केजरीवाल हैं. यह बड़ी बात है टीवी चैनलों ने किसान की बदहाली के मुद्दे पर एक शब्द भी चर्चा न होने देने में सफलता हासिल की, और पूरी बहस में आप पार्टी और पुलिस के बीच ही मामला बनाये रखा. जिसे बाद में रेफरी भाजपा ने आकर हल किया. आप के मुजरिमों के बहुत रोने गाने के बाद भाजपा का दिल पसीजा. उन्होंने कहा कि वैसे तो ज़िम्मेदार केजरीवाल एंड पार्टी ही हैं पर अगर कोई पुलिस वाला भी दोषी पाया गया, जिसकी कोई संभावना नहीं है, तो उसे भी बख्शा नहीं जाएगा.

पुलिस जी, आप महान साबित हुए. क्योंकि यह मौत ऎसी रही जो आपके हाथ हिलाए बिना हो गयी. न आपने लाठी चलाई, न गोली चलाई. काश ऐसे ही लोग मारें तो आप की खाकी दागदार न हो. इतने बड़े मुद्दे का हल मीडिया और भाजपा ने संसद के बाहर ही निकाल लिया. अब बस केजरीवाल का इस्तीफ़ा हो जाए तो कम से कम आगे से किसान आत्महत्या नहीं करेंगे. मीडिया जी आप संत हैं जिसके सामने एक आदमी जान देता रहा और कैमरा पकडे हुए आपका हाथ ज़रा भी काँपा. आपकी पत्रकारिता की पढ़ाई कामयाब हुई. आपको तो नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए. और गजेन्द्र जी बैठे ठाले आपको छप्पर फाड़ टी आर पी दे गए.

और, हम सब भी महान साबित हुए. हमने भी गला फाड़ा कि वहाँ खड़े लोगों ने कुछ क्यों नहीं किया! जैसे हम और आप ही बस अलग मिटटी के हैं. हम तो वैसे तमाश बीन हैं ही नहीं जो एक्सीडेंट होते देख दो मिनट नज़ारा देख निकल लेते हैं. हम मौत का वो खेल न देखते , हम तालियाँ और सीटियाँ न बजाते. हम तो सीधे पेड़ पर चढ़ते और उसे उतार लाते. साबित यह भी हुआ कि किसान आत्महत्या में तभी दम है जब वो लाइव हुई हो, उसमे सत्ता और विपक्ष को भरपूर मसाला मिले. और हाँ, मीडिया को भी. जिसमे हमें और आपको भी लाइव एहसास हो.

हम सब तो वैसे भी मौत के वीडियो को बहुत पसंद करते हैं, वह शेर ने चिड़ियाघर में जब आदमी को मारा था, जब एक आदमी ने ट्रेन पर चढ़ कर बिजली का तार पकड़ लिया और भभक के जल गया, वह जो ट्रेन से कटा और धड़ अलग हो गया, वह सब तो हम फेसबुक पर भी खूब शेयर करते हैं. साबित यह भी हुआ कि बस अब और कोई आत्महत्या नहीं होगी, गो कि इसी के साथ आज एक और गजेन्द्र जाटव ने ट्रेन से कट कर आत्महत्या कर ली. पर वह लाइव नहीं थी, दूसरी बात उससे किसी सरकार को गिराया नहीं जा सकता , अरे भाई समझा कीजिये वह अपनी ही सरकार है.

संध्या नवोदिता के फेसबुक वॉल से.

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इसी तरह गुजरात में ‘सीएम नरेंद्र मोदी’ को खत लिखकर एक और किसान ने की थी आत्महत्या

दौसा के किसान गजेन्द्र की आत्महत्या पर सभी दल अब अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने लगे हैं लेकिन ऐसे कई गजेन्द्र गुजरात में भी हैं. गुजरात के जामनगर जिले के कल्य़ाणपुरा तालुका के छिजवड़ गांव के अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा  ने भी ठीक गजेन्द्र की ही तरह 4 अक्टूबर 2012 को नरेन्द्र मोदी के नाम पत्र लिखकर आत्महत्या कर ली थी. उस समय नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 

उसी अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा का परिवार आज दाने-दाने को मोहताज है. उस गरीब किसान ने अपने पत्र में गुजराती भाषा में लिखा था कि 2005 से 2012 तक उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला। उसके परिवार में छह सदस्य हैं। वह उनका भरण-पोषण कैसे करे? उसने मोदी को लिखा था कि आप गरीब कल्याण मेले पर बहुत खर्च करते हैं लेकिन किसानों पर नहीं? ताज्जुब की बात यह है कि उस समय विपक्षी दल कांग्रेस ने गुजरात में कुछ किसानों को एक एक लाख की राशि बांटी लेकिन अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा के परिवार को उसने भी कोई मुआवजा नहीं दिया. गुजरात के किसान भी आंदोलन के मूड में हैं। अपनी इस लड़ाई को लेकर अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाए हैं और अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा के पत्र को भी सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी दलील के रुप में रखा है. उनकी यह लड़ाई भरतसिंह झाला के नेतृत्व में बनी ‘क्रांति’ नाम की गैरस्वैच्छिक संस्था लड़ रही है.

झाला कहते हैं कि नर्मदा नदी को मोदी ने नर्मदे सर्वदे कहा था लेकिन अब जहां नर्मदा नदी का पानी जा रहा है, वहां की जमीन लेने का जुगाड़ किया जा रहा है. क्योंकि किसानों के लिए छोटी केनाल तो बनी नहीं, इसीलिए किसान को बड़ी केनाल से पानी लेने के लिए हर रोज एक हजार का खर्च आता है. वे कहते हैं कि मुंद्रा पोर्ट और जामनगर की कृषि आधारित जमीन तो किसानों को जबरन मार-मारकर अंबानी और अडानी बंधुओं को दे दी गई. धोलेरा जहां स्मार्ट सिटी का मोदी का सपना है, वहां के बावलयारी गांव के लोग अपनी जमीन के लिए अब भी संघर्ष कर रहे हैं. 

विधानसभा से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मोदी ने उद्योगपतियों को टैक्स में छूट देकर 4000 करोड़ का फायदा पहुंचाया. सूचना अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2005 में आई बाढ़ में गुजरात के19 जिलों में 35 लाख किसानों की जमीन बंजर हो गई. उस समय पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र मोदी ने 189 करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी, लेकिन 35 लाख के सामने मात्र 2 लाख किसानों को ही मुआवजा मिला, वो भी गुजरात हाईकोर्ट के आदेश पर दिया गया. लेकिन वह भी एक हेक्टर पर किसी को बीज की स्थिति पर 250 रु का मुआवजा और बंजर जमीन होने पर किसी किसान को 2000रु. का मुआवजा दिया गया. 

2012 में अकाल जैसी स्थिति आई, जिसमें जून 2012 से अक्टूबर में 52 किसानों ने आत्महत्या कर ली. लेकिन कोई मुआवजा नहीं दिया गया. सूचना अधिकार से प्राप्त जानकारी के आधार पर कुल मिलाकर अब तक गुजरात में 6055 किसान आत्महत्या कर चुके हैं लेकिन सरकार इन किसानों को दुर्घटना या बीमारी मानकर पल्ला झाड़ रही है लेकिन सरकार की यह पालिसी है कि दुर्घटना में किसान को एक लाख का मुआवजा दिया जाता है लेकिन सरकार ने अभी मात्र 2000 किसानों को ही मुआवजा दिया है, सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि तो क्या 4055 किसानों ने आत्महत्या की? गुजरात विधानसभा में बताया गया है कि 2013 से 2018 में गुजरात में 89 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. झाला का कहना है कि अभी जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया जा रहा. वे कहते हैं कि 2007 में सोनिया गांधी से मिले थे लेकिन उन्होंने भी मात्र आश्वासन ही दिए. 

लेखिका उषा चांदना से संपर्क 09327012338 या ushachandna55@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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देखिये एक मोदी समर्थक इस किसान की मौत को कैसे विश्लेषित करता है…

Ajit Singh : मैं हमेशा से ये लिखता कहता आया हूँ कि ये जो किसान के नाम पे फ़र्ज़ी आत्महत्या दिखाई जा रही है और ये जो फ़र्ज़ी किसान दिखाए जा रहे हैं ये फर्जीवाड़ा बंद होना चाहिए। आज तक जितनी भी किसान आत्म ह्त्या हुई हैं उनकी वृहद् जांच होनी चाहिए। उससे पता चलेगा कि कितनी ही natural deaths को किसान द्वारा आत्म ह्त्या बता दिया जाता है। न जाने कितने लोग depression के मरीज हो के और बाकी अन्य निजी कारणों से आत्मह्त्या करते हैं। उन्हें किसान द्वारा आत्महत्या नहीं माना जा सकता। मैं हमेशा कहता हूँ की प्रत्येक किसान आत्महत्या को कायदे से study कर एक श्वेत पत्र लाया जाए जिस से समस्या की जड़ तक पहुंचा जा सके।

आज AAP की रैली में गजेन्द्र नामक जिस सिरफिरे ने आपिया नौटंकी और publicity stunt करते करते जान दे दी वो AAP के लिए भारी मुसीबत बन गयी है। किसानों की समस्याओं को समझे बूझे बिना सिर्फ राजनातिक stunt करने के लिए जो रैली की जाती है उसकी परिणीति ऐसे होगी किसी ने कल्पना न की होगी। राजनैतिक रैलियों में इस प्रकार के पब्लिसिटी के भूखे लोग रैली स्थल पे नाटक करते रहते हैं। ऐसा ही कोई नौटंकीबाज सिरफिरा लटक गया।

कम से कम अब इसकी वृहद् जांच ज़रूर हो जायेगी की वो कौन था? कितनी किसानी करता था? कितनी फसल बर्बाद हुई उसकी जो उसने ऐसा Live show करते हुए ख़ुदकुशी कर ली? उसका अगला पिछ्ला रिकॉर्ड भी खंगाल लो कि किसान भाई क्या करते थे और आपिया नौटंकी मण्डली में कब से शामिल थे। इस घटना ने ये पोल भी खोल दी है कि भारतीय राजनीति राष्ट्रीय समस्याओं को ले के कितनी संवेदनशील है और उनका हल खोजने के लिए कितने गंभीर प्रयास कर रही है। एक बेवक़ूफ़ नौटंकी बाज मूर्ख ने आपिया नौटंकी के चक्कर में जान दे दी।

अजित सिंह यूपी के गाजीपुर जिले के निवासी हैं और घनघोर मोदी भक्त हैं. ‘उदयन’ नाम एनजीओ का संचालन करते हैं.

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गजेन्द्र चुनाव लड़ चुका था, सैकड़ों वीआईपियों को साफा बांध चुका था, आत्महत्या की कोई वजह नहीं थी…

दिनेशराय द्विवेदी : मेरे ही प्रान्त राजस्थान के एक किसान ने आज दिल्ली में अपनी जान दे दी, तब आआपा की रैली चल रही थी। उस के पास मिले पर्चे से जिसे हर कोई सुसाइड नोट कह रहा है वह सुसाइड नोट नहीं लगता। उस में वह अपनी व्यथा कहता है, लेकिन उस नें घर वापसी का रास्ता पूछ रहा है। जो घर वापस लौटना चाहता है वह सुसाइड क्यों करेगा? जिस तरह के चित्र मीडिया में आए हैं उस से तो लगता है कि वह सिर्फ ध्यानाकर्षण का प्रयत्न कर रहा था। उस ने हाथों से पैर से भी कोशिश की कि वह बच जाए। पर शायद दांव उल्टा पड़ गया था। वह अपनीा कोशिश में कामयाब नहीं हो सका। हो सकता है उसे उम्मीद रही हो कि इतनी भीड़ में उसे बचा लिया जाएगा। पर उस की यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी।

यह शख्स गजेन्द्र सिंह कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। वह एक विधानसभा चुनाव लड़ चुका था। सैंकड़ों वीआईपियों को साफा बांध चुका था। कोई वजह नहीं थी कि वह आत्महत्या करे। उसके पास समस्याएँ थीं। उस की फसल नष्ट हो चुकी थी। मुआवजे की बातें खूब हो रही हैं, घोषणाएँ भी हो रही हैं। कागजों पर मदद भी दिखने लगेगी। लेकिन लोगों को विश्वास नहीं कि उन्हें मदद मिलेगी, जो मिलेगी वह पर्याप्त होगी। जनता में यह अविश्वास एक दिन में पैदा नहीं होता।

उसे घर से निकाल दिया गया था। कोई पारिवारिक विवाद था। हो सकता है वह जमीन से संबंधित हो या हो सकता है वह परिवार से संबंधित हो. हमारी राजनीति इस मामले में बहुत सुविधाजनक है। चन्द अदालतें खोल कर इन सब समस्याओं का रुख उधर कर देती हैं। उसे इस से कोई मतलब नहीं कि पारिवारिक विवाद अदालत से बरसों नहीं सुलझ रहे हैं। जमीन के विवाद तो पीढ़ियों तक नहीं सुलझते। कृषि भूमि विवादों के मामले में तो अदालत के चपरासी से ले कर हाकिम तक मुहँ फाड़ता हुआ दिखाई देता है।

आखिर राजनीति कब समझेगी कि इन विवादों को न्यूनतम समय में सुलझाने की जिम्मेदारी उसी की है। पर्याप्त और सक्षम अदालतें स्थापित करने का काम भी उसी के जिम्मे है। यह दीगर बात है कि अभी अधिकांश लोग यह नहीं समझते। लेकिन कब तक? कब तक नहीं समझेंगे। राजनीति को समझ जाना चाहिए कि अब वह वक्त आ गया है जब चीजें तेजी से जनता की समझ आने लगी हैं। यदि वे नहीं समझेंगे तो जनता उन्हें समझा देगी।

दिनेश राय द्विवेदी के फेसबुक वॉल से.

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‘आप’ की प्री-प्लांड स्क्रिप्ट थी गजेंद्र का पेड़ पर चढ़ना और फंदे से लटकना!

Abhai Srivastava : गजेंद्र की चिट्ठी की आख़िरी लाइन, ‘कोई मुझे बताओ, मैं घर कैसे जाऊंगा?’ जाहिर है कि ये सुसाइड नोट नहीं। मीडिया क्लिप में साफ सुनाई पड़ रहा है कि जब कुमार विश्वास भाषण दे रहा था तब आवाज़ आई, ‘लटक गया’, फिर विश्वास हाथ के इशारे जैसे कह रहा है कि ‘लटक गया है, स्क्रिप्ट के अनुसार नाटक पूरा हुआ’.  भाइयों AAP ने एक व्यक्ति की हत्या की है। ये भी ध्यान देने की बात है कि गजेंद्र के घर में 2 भतीजियों की आज शादी है, इसका मतलब उसके घर में ऐसा आर्थिक संकट नहीं जैसा प्रोजेक्ट हुआ है। भाई, ये बहुत बड़ी साज़िश है।

Deepak Sharma : केजरीवाल के ग्रह ठीक नही लग रहे. जिस दिल्ली पुलिस को महामहिम कोस रहे थे उस दिल्ली पुलिस के पास ही अब किसान आत्महत्या की जांच है. पुलिस लाइव घटना के सारे विडियो और उस वक़्त मंच पर बैठे नेताओं के द्वारा कारवाई का पूरा ब्यौरा इकठा कर रही है. कुछ पुलिसवालों पर विभागीय कारवाई के बाद पुलिस अब आप के नेताओं से पूछताछ करेगी.

Dr Praveen Tiwari : अभी किसान आत्महत्या पर बहस में आप के राघव चढ्ढा भी थे। क्यूंकि मैं अपनी वॉल को बहुत साफ सुथरा रखता हूं इसीलिए बहुत माफी के साथ कहना चाहूंगा कि अच्छा वक्ता होने के बावजूद आज वो आशूतोष, कुमार विश्वास और संजय सिंह के ‘हगे’ को समेट नहीं पाए। छी छी… धिक्कार है .. सब पर जो भी वहां मौजूद था और जो भी इस पर सियासत कर रहा है। चाहे पुलिस हो, चाहे मीडिया.. पर आप तो सबकी बाप निकली इस नंगई में.. भाईसाब कोई राजनैतिक दल के समर्थक कृपया इस बहस में मुझसे यहां मत उलझिएगा आपके पापा लोगों की औकात देख ली है थोड़ी देर पहले….

Vivek Singh : मुझे पता था कि बेशर्मी का ये काम आम आदमी पार्टी संजय सिंह से ही करवाएगी। आखिर इतनी मोटी बुद्धि और किसी की हो भी नहीं सकती है। किसान के फांसी पर लटकने के बावजूद रैली चलने के सवाल पर संजय सिंह बयान दे रहे हैं क‌ि याद करिए पटना की रैली में बम ब्लास्ट हो रहा था और नरेंद्र मोदी भाषण दे रहे थे। मतलब क‌ि आप को दूसरी भाजपा और कांग्रेस बनने के ल‌िए ही राजनीति में आए हैं। कुछ तो शर्म करो, अब आप उन्हीं का उदाहरण दोगे।

पत्रकार अभय श्रीवास्तव, दीपक शर्मा, डा. प्रवीण तिवारी और विवेक सिंह के फेसबुक वॉल से.

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आशुतोष जैसा एक मीडियॉकर पत्रकार और बौनी संवेदना का आदमी ही इतनी विद्रूप बातें बोल सकता है!

Vishwa Deepak : गजेन्द्र नामक ‘किसान’ की आत्महत्या के बारे में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष कहते हैं- ”यह अरविंद केजरीवाल की गलती है. उन्हें मंच से उतर जाना चाहिए था.उन्होंने गलती की. अगली बार मैं केजरीवाल को कहूंगा कि वो मंच से उतर पेड़ पर चढ़ें और लोगों को बचाएं.”

एक मीडियॉकर पत्रकार और बौनी संवेदना का आदमी ही इतनी विद्रूप बातें बोल सकता है. पत्रकार के रूप में इनका क्लेम टू फेम रहा है कांशीराम का थप्पड़. और…? अगर टीवी नहीं होता या हमारे समाज की मीडिया अंडरस्टैंडिंग ज्यादा होती तब? जैसे 1920-30-40 के बीच पैदा होने वाले अपने आप स्वाधीनता संग्राम सेनानी बन गए, वैसे ही बहत से लोग हिंदी पत्रकारता के ‘सेनानी’ हैं. कई बार घिन आती है अपने पेशे से जिसे बहुत सारे लोगों ने बहुत कुछ छोड़ कर के चुना था.

Satish Tyagi : Can not write in Hindi due to net problem but its urgent.—many years ago ashutosh was slapped by kanshiram ji. today ashutosh crossed all the limits. had he uttered such words in my presence I would have certainly slapped him. How come such an insensitive guy survived in media for so long. Chullu bhar pani men doob maro ashutosh.

विश्व दीपक और सतीश त्यागी के फेसबुक वॉल से.

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Live खुदकुशी फिल्माते मीडियाकर्मी, स्टेज पर खड़ा अहंकारी मुख्यमंत्री, पुलिस से गुहार लगाते शातिर नेता, अविचल मुस्काते पुलिसवाले…

Nadim S. Akhter : फिल्म ‘पीपली लाइव’ Anusha Rizvi ने बनाई थी और आज देश की राजधानी दिल्ली में ‘पीपली लाइव’ साकार हो कर जी उठा. सब कुछ वैसा ही. वही खुदकुशी की सनसनी, गर्म तवे पर रोटी सेंकने को आतुर मीडिया-नेता-प्रशासन की हड़बड़ी और दर्शकों-तमाशाइयों का वैसा ही मेला, वही हुजूम. सब कुछ जैसे एक लिखी स्क्रिप्ट की तरह आंखों के सामने होता रहा. एक पल को तो समझ ही नहीं आया कि मनगढंत फिल्म पीपली लाइव देख रहा हूं या फिर हकीकत में ऐसा कुछ हमारे देश की राजधानी दिल्ली के दिल यानी जंतर-मंतर पर हो रहा है !!!

दिल्ली के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, गणमान्य नेताओं-सज्जनों, पुलिस, मीडिया, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और जनता के सामने एक निरीह जीवन से मायूस युवा किसान अपना गमछा बांध पेड़ से लटक जाता है, खुदकुशी कर लेता है और सब के सब तमाशबीन बने देखते रहते हैं. मीडियाकर्मी और उनके कैमरे उस वीभत्स नजारे को फिल्माने में व्यस्त रहते हैं, मुख्यमंत्री स्टेज पर खड़े होकर पुलिस से ‘बचा लो-बचा लो’ की गुहार लगाते रहते हैं, वहां मौजूद पुलिस के कुछ अफसर-जवान के चेहरों पर मुस्कान तैरती रहती है, पार्टी के कार्यकर्ता हो-हो करके चिल्लाते रहते हैं और बेचारा पेड़ पर चढ़ा किसान हताश और कातर निगाहों से उन सबको तकता रहता है. एक पल को उसने जरूर सोचा होगा कि कोई तो जल्दी से पेड़ पर चढ़ कर उसे रोकने आएगा, उसे मनाएगा, उसे डांटेगा. चलो कोई ऊपर नहीं आएगा तो नीचे से ही सही, कुछ लोग हाथ जोड़कर कहेंगे कि ऐसा मत करो, रुक जाओ….अभी सबकुछ खत्म नहीं हुआ है…

…लेकिन कोई नहीं आया. नीचे गर्द-गुबार के बीच इंसानों के जिस्म सरीखे रोबोट टहल रहे थे, जो सिर्फ अपने पूर्वनिर्धारित काम को अंजाम देना चाहते थे. ऐसी किसी अप्रत्याशित घटना के लिए वे रोबोट तैयार नहीं थे. पेड़ पर चढ़ा किसान जल्द ही ये बात समझ गया कि नीचे इंसानों की नहीं, रोटी-बोटी नोचकर खाने वाले होमोसेपियन्स की भीड़ लहलहा रही है, जिनके सामने उसके लहु का मोल उसका अनाज उपजाने वाली मिट्टी के बराबर भी नहीं. यही सब देखता और उधेड़बुन में पड़ा वो थका-हारा-मायूस किसान आखिरकार पेड़ से लटक गया. लेकिन इस दफा उसके गमछे और उसकी धरती मां के बीच काम कर रहा गुरुत्वाकर्षण बल ज्यादा मजबूत साबित हुआ. इधर उसने दम तोड़ा और उधर मीडिया से लेकर नेताओं का खुला खेल चालू हो गया.

पहले बात दूध से धुली मीडिया की. मुझे नहीं पता कि जिस पेड़ पर किसान जान देने के लिए चढ़ा था, उससे मीडियाकर्मी कितने दूर थे. लेकिन अगर वह जान देने की धमकी दे रहा था तो मेरा अंदाजा है कि मीडिया के कैमरे उसे कैप्चर करने की कोशिश में नजदीक जरूर गए होंगे. ऐसे में यह सोचकर दुख और पीड़ा होती है कि इतने सारे मीडियाकर्मियों में से कोई भी इंसानियत के नाते ही सही, उसे बचाने, उसे रोकने आगे नहीं आया.

टीवी पर जो तस्वीरें देख रहा था, उनमें राममनोहर लोहिया अस्पताल के बाहर एबीपी न्यूज का कोई पराशर नामक नया-नवेला संवाददाता लोगों से बात कर रहा था कि गजेंद्र नामक उस किसान की हालत अभी कैसी है. वहां मौजूद लोगों में से शायद एक किसान का जानने वाला था. उसने रुआंसा होकर कहना शुरु किया कि साहब, वो मर गया है. इसके लिए दिल्ली की मीडिया, दिल्ली के नेता और दिल्ली की पुलिस को हम जिम्मेदार मानते हैं. कोई उसे बचाने नहीं आया…..इससे आगे वह कुछ बोल पाता लेकिन तेजतर्रार और मोटी चमड़ी का वह रिपोर्टर तुरंत वहां से अपनी गनमाइक हटा लेता है, उसे दूर कर देता है, माइक अपने थोेबड़े के अपने नथुने के सामने ले आता है और फिर ज्ञान देते लगता है…देखिए, यहां किसान को भर्ती कराया गया है, उसकी हालत नाजुक है. वह बड़ी सफाई से ये छुपाने की कोशिश करता है कि वहां मौजूद लोग नेता और पुलिस के साथ-साथ मीडिया को भी गाली दे रहे हैं. उसको लानत भेज रहे हैं. कैमरे पर सब दिख जाता है लेकिन चालाक रिपोर्टर बड़ी धूर्तता से कहानी का एंगल चेंज करता हैं. वह और उसका चैनल सिर्फ यही सवाल पूछता रहता है कि खुदकुशी के बाद भी केजरीवाल ने रैली क्यों जारी रखी. इस बात का जवाब वे नहीं देना चाहते कि मीडिया वालों में से कोई उस गरीब किसान को बचाने आगे क्यों नहीं आया??!!!

अब बात जरा राजनेताओं की. किसान की खुदकुशी के बाद करीब डेढ़ घंटे तक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की रैली चलती रही. अरविंद, मनीष, विश्वास, सबने भाषण दिया. मोदी पर जुबानी हमले हुए. और जब -गुप्तचरों- ने ये बताया कि किसान मर चुका है (ऐसा मेरा अंदाजा है) तभी केजरीवाल एंड कम्पनी उसे देखने की रस्मअदायगी करने अस्पताल पहुंचे.
लेकिन यह क्या!! कांग्रेस नेता और राहुल गांधी के हनुमान, अजय माकन तो केजरीवाल से भी पहले किसान को देखने अस्पताल पहुंच चुके हैं. कह रहे हैं कि राजनीति नहीं करनी मुझे, बहुत दुखी हूं लेकिन कर वही सब रहे हैं, जो राजनीति को शोभा देता है. कुछ ही देर में आकाधिराज राहुल गांधी भी अप्रताशित रूप से किसान को देखने अस्पताल पहुंच जाते हैं. मीडिया से बात करते हैं, बोलने को उनके पास कुछ नहीं है, लड़खड़ाते हैं और फिर संभलकर बहुत ही बचकानी बात कह जाते हैं. किसान की लाश पर राजनीति करने की कोशिश करते राहुल गांधी कहते हैं कि कांग्रेस और इसका कार्यकर्ता हरसंभव मदद करेगा मृतक की. जरूरत पड़ी तो हम लाश को पहुंचाने का भी बंदोबस्त कर देंगे.

जरा सोचिए. देश का भावी सरताज इसी बात से गदगद हुआ जा रहा है कि लाश को उसके घरवालों तक पहुंचवा देंगे. कितना महान और धार्मिक कार्य किया आपने राहुल गांधी जी. मुझे इंतजार रहेगा कि आप देश के प्रधानमंत्री कब बनते हैं !! लगता है कि इस देश की अभी और दुर्दशा होनी बाकी है !!! उधर सचिन पायलट भी कैमरे के सामने किसान की मौत पर दुख जताने लगते हैं. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह मामले की जांच के आदेश दे देते हैं. अभी और नेताओं के बयान आने हैं, आ रहे होंगे. और सब के सब वही करेंगे. किसान की लाश पर राजनीति.

तीसरी और आखिरी बात दिल्ली पुलिस की. उसके बारे में क्या कहना. मुशी प्रेमचंद ने तो बरसों पहले लिख दिया था—नमक का दारोगा- . यानी ये जो खाकी वर्दी है, वह आपको इस संप्रभु गणराज्य में शरीर पर सितारे लगाकर बिना जवाबदेही के बहुत कुछ करने की आजादी देता है. कानून के रखवालों के सामने कानून का बलात्कार हुआ और वे मूकदर्शक बने देखते रहे. अब मंत्री जी जांच कराएंगे तो पता चलेगा कि कहां और किसने गलती की!! मतलब विभाग के कबाड़खाने की शोभा बढ़ाने एक और फाइल जाएगी. जांच चलती रहेगी, तब तक मामला ठंडा हो जाएगा. फिर कौन पूछता है कि कब-क्या हुआ??!! चलने दीजिए, ये देश ऐसे ही चलता है.

फिलहाल तो पीपली लाइव के इस असली खूनी खेल में मीडिया के दोनों हाथ में लड़डू हैं और सिर कड़ाही में. आज रात देखिएगा, कैसे-कैसे शो बनेंगे. मोदी भक्त टीवी चैनल किसान की खुदकुशी के बहाने अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर सवाल उठाएंगे कि बताइए, वहां किसान मर रहा था और ये हैं कि रैली चला रहे थे.!!! उन्हें किसी के जान की परवाह नहीं थी…वगैरह-वगैरह.

ऐसे कूढ़मगजों, हड़़ी चाटने वालों और अक्ल के दुश्मन मीडिया वालों से मेरा भी एक सवाल रहेगा. याद कीजिए लोकसभा चुनाव से पहले बिहार के गांधी मैदान में बीजेपी की एक विशाल रैली थी. तभी वहां बम धमाके होते हैं. रैली में भगदड़ मच जाती है. टीवी पर बम धमाके के दृश्य दिखाए जा रहे हैं. किसी को नहीं मालूम कि किस पल और कहां अगला धमाका हो सकता है. हजारों-लाखों लोगों की जान को खतरा है लेकिन अलग चाल-चरित्र और चेहरे का दावा करने वाली पार्टी बीजेपी और इसके नेता रैली में आए लोगों की जान की परवाह किए बिना रैली को जारी रखते हैं. अरविंद केजरीवाल की ही तरह वे भी रैली खत्म करके, भाषणबाजी पूरी करके ही दम लेते हैं. उस रैली को बीजेपी के नरेंद्र मोदी सम्बोधित करते हैं और संवेदनहीनता की हद तो ये हो जाती है कि बम धमाकों के बाद अपने भाषण में वे इन धमाकों के जिक्र भी नहीं करते !! बाद में पूछने पर बीजेपी के नेता ये कुतर्क देते हैं कि बम धमाके हों या कुछ भी हो जाए, हम आतंकवाद के सामने नहीं झुकेंगे. अरे भैया, आतंकवाद के सामने मत झुकिए लेकिन अपनी रैली को सफल बनाने के लिए हजारों मासूमों की जान को बम धमाकों के हवाले तो मत कीजिए.

मुझे याद है. तब किसी मीडिया चैनल ने बीजेपी और उसके नेताओं पर ये सवाल नहीं उठाया कि बम धमाकों के बीच उन्होंने अपनी रैली क्यो जारी रखी??!! आज जो सवाल उठा रहे हैं कि किसान की जान से बढ़कर रैली थी, वो उस वक्त क्यों चुप थे??!! इसका कोई जवाब है उनके पास???

मित्तरों-दोस्तों !!! मतलब साफ है. किसान की खुदकुशी और मौत तो बस बहाना है. मीडिया हो, राजनेता हो या फिर प्रशासन. सबके अपने-अपने एजेंडे हैं, अपने-अपने स्वार्थ हैं और अपना-अपना खेमा है. सो सब के सब उसी के मुताबिक बर्ताव कर रहे हैं. और करते रहेंगे. किसानों की फिक्र किसे हैं.?? ईमानदारी से कहूं तो किसी को नहीं.

लेकिन एक बात जान लीजिएगा शासकों !!! जिस भी दिन जनता के सब्र का बांध टूटा तो वह सबको सड़क पर लाकर अपना हिसाब बराबर कर लेगी. इतिहास उठाकर देखने की जरूरत नहीं है, नजर घुमाकर देख लीजिए कि दुनिया के किन-किन देशों में सताई जनता ने क्या-क्या किया.

खबर का ये लिंक प्रधानसेवक, बीजेपी के अंधभक्तों और मीडिया के उस धड़े के लिए जो selective होकर सवाल उठाते हैं. देखिए, पढ़िए और जानिए कि जब पटना के गांधी मैदान में तत्कालीन गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी की रैली थी, वहां धमाके हुए तब बीजेपी और नरेंद्र भाई मोदी ने क्या किया. किस तरह सबकुछ ताक पर रखके उन्होंने रैली जारी रखी. http://www.theguardian.com/world/2013/oct/27/india-bomb-blasts-bjp-rally-patna

लेखक नदीम एस. अख्तर युवा और तेज-तर्रार पत्रकार हैं. इन दिनों आईआईएमसी में अध्यापन कार्य से जुड़े हैं.


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‘आप’ की प्री-प्लांड स्क्रिप्ट थी गजेंद्र का पेड़ पर चढ़ना और फंदे से लटकना!

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किसान की खुदकुशी पर पाणिनी आनंद की कविता…

Panini Anand : यह नीरो की राजधानी है. एक नहीं, कई नीरो. सबके सब साक्षी हैं, देख रहे हैं, सबके घरों में पुलाव पक रहा है. सत्ता की महक में मौत कहाँ दिखती है. पर मरता हर कोई है. नीरो भी मरा था, ये भूलना नहीं चाहिए.

खून रोती आंखों वाली माँ,
बेवा, बच्चे और खेत,
सबके सब तड़पकर जान दे देंगे
फिर भी नहीं बदलेगी नीयत
इन भूखी आदमखोर नीतियों के दौर में
कैसे बचेगा कोई,
किसान
जब नियति का फैसला
बाज़ार के सेठ को गिरवी दे दिया गया हो
और चाय बेचनेवाले की सरकार
ज़हर और फंदे बेचने लगे

मौत किसे नहीं आती
कौन बचा है
पर कोई सोचता है,
कि मौत के सिवाय अब कोई रास्ता नहीं
और कोई सोचता है
वो मरेगा नहीं.
लोगों को लगातार मार रहे लोग
अपने को अमर क्यों समझते हैं
अपने मरने से पहले
दूसरों को मारना
बार-बार मारना
लगातार मारना
मरने पर मजबूर करना
किसी की उम्र नहीं बढ़ाता
न ही खेतों में सहवास से,
अच्छी होती है फसल
न गंगा नहाने से,
धुलते हैं पाप
न जीतने से,
सही साबित होता है युद्ध

हत्यारा सिर्फ हत्यारा होता है
भेष बदलने से
वो नीला सियार लग सकता है
साहूकार लग सकता है
कलाकार लग सकता है
बार-बार ऐसा सब लग सकता है
लेकिन हत्यारा, हत्यारा होता है
चाहे किसान का हो,
किसी मरीज़ का,
किसी ग़रीब का,
किसी हुनर का, पहचान का
कृति का, प्रकृति का
हत्या किसी को नहीं देती यौवन
न शांति, न अभ्युदय
मौत फिर भी आती है
मरना फिर भी होता है

खौलकर उठती मरोड़,
सूखती जीभ, बंधे गले,
और रह-रहकर चौंकते हाथों में
जो विचार
अंतिम अरदास हैं
वो चाहते हैं
कि
भाप हो जाएं
ऐसे नायक, सेवक
प्रतिनिधि
जिनके रहते आत्महत्या करे अन्नदाता
शीशे की तरह टूटकर बिखर जाएं
ऐसी आंखें
जो देखती रहीं मौत को लाइव
सूख जाएं दरख्त
कागज़ों की तरह फट जाएं राजधानी की वे सड़कें
जहाँ मरने के लिए मजबूर होकर आए एक किसान
किसान मरा करे,
देश तमाशा देखता रहे,
ऐसे लाक्षागृह की सत्ता
लहू के प्यासी नीतियां
और लड़खड़ाते गणतंत्र में
आग लगे.
मुर्दा हो चुकी कौमें
हत्यारी सरकारें
और देवालयों के ईष्ट
सबका क्षय हो.
प्रलय हो.

हा रे
हा

पाणिनि आनंद
22 अप्रैल, 2015. नई दिल्ली (एक किसान की राजधानी में आत्महत्या की साक्षी तारीख)

पाणिनी आनंद कवि, एक्टिविस्ट और पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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जंतर मंतर पर किसान आत्महत्या से अधिग्रहण अध्यादेश तक

आज दिल्ली में जंतर मंतर पर केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान दौसा (राजस्थान) का किसान गजेंद्र सिंह पेड़ पर फांसी से झूल गया। अपने पीछे छोड़े एक सुसाइड नोट में वह लिख गया कि ‘दोस्तों, मैं किसान का बेटा हूं। मेरे पिताजी ने मुझे घर से निकाल दिया क्योंकि मेरी फसल बर्बाद हो गई। मेरे पास तीन बच्चे हैं….जय जवान, जय किसान, जय राजस्थान।’ घटना के समय मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, आप के नेता संजय सिंह, कुमार विश्‍वास मौके पर मौजूद थे। राममनोहर लोहिया अस्पताल के मुताबिक उसको मृत अवस्था में अस्पताल ले जाया गया था। 

जंतर मंतर पर आत्महत्या से पूर्व गजेंद्र सिंह

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आप के कार्यकर्ता दिल्ली पुलिस से किसान को बचाने के लिए अपील करते रहे लेकिन दिल्ली पुलिस के जवानों ने इस दिशा में कुछ नहीं किया। उसे पेड़ पर चढ़ने दिया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि किसान और मजदूर घबराएं नहीं, हम उनके साथ खड़े हैं। देश की राजधानी में सरेआम एक रैली के दौरान गजेंद्र सिंह की मौत अपने पीछे कई बड़े सवाल छोड़ गई है। यह सवाल केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस, भाजपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस, इन सबको कठघरे में खड़ा करता है। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश से शुरू होकर यह सवाल हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था तक जाता है। यह सवाल उस पूरे सिस्टम से है, जो एक तरफ मौसम की मार से निढाल किसानों की लाशें गिन रहा है, दूसरी तरफ किसी भी कीमत पर वह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पारित कराने पर आमादा है, जो किसान से उसकी जमीन भी छीन सके। 

गजेंद्र सिंह सुसाइड नोट

जंतर मंतर की मौत उस गहरे षड्यंत्र के दुष्परिणाम के रूप में देखी जानी चाहिए, जो देश आजाद होने के बाद से लगातार इस देश के करोड़ो-करोड़ किसान-मजदूरों के साथ खेत-खलिहानों से कल-कारखानों तक हो रहा है। उस षड्यंत्र में सबसे बड़ी साझीदार कांग्रेस है, जिसने आज देश को इस मोकाम तक पहुंचा दिया है। उस षड्यंत्र में दूसरी सबसे बड़ी भागीदार मजदूर-किसान विरोधी भाजपा है, जिसकी इस समय केंद्र में सरकार है। इन दोनो की आर्थिक नीतियां एक हैं। देश का आम बजट हो या एफडीआई जैसे मुद्दे, दोनो एक सिक्के के दो पहलू हैं। इन दोनो की प्राथमिकताएं कारपोरेट पूंजी की हिफाजत है। 

उस षड्यंत्र के लिए उन्हें भी गैरजिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए जो पिछले साठ साल से इस देश में किसानों-मजदूरों की सियासत के नाम पर खूब मुस्टंड और हरे-भरे हो रहे हैं। इस षड्यंत्र से उस मीडिया को भी असंपृक्त नहीं माना जा सकता, जो स्वयं को भारतीय लोकतंत्र का चौथा सबसे बड़ा खैरख्वाह मानता है लेकिन खबरें छापते-छापते, अब पूरी बेशर्मी से सिर्फ खबरें बेचने लगा है। 

कथित हरितक्रांतिवादी देश में ये सब-के-सब इसलिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि इन सभी को बहुत अच्छी तरह से मालूम है कि भारत में विदर्भ, तेलंगाना से बुंदेलखंड तक क्यों हजारों किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। उस प्रदेश में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, जिसके शासन की बागडोर धरतीपुत्र के पुत्र के हाथ में है। ये कैसा मजाक है कि 2014 में किसानों की आत्महत्या का ब्यौरा नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो जून महीने तक देगा। 31 मार्च 2013 तक के आंकड़े बताते हैं कि 1995 से अब तक 2,96 438 किसानों ने आत्महत्या की है हालांकि जानकार इस सरकारी आकंड़े को काफी कम बताते हैं। क़रीब पांच साल पहले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने पंजाब में कुछ केस स्टडी के आधार पर किसान आत्महत्याओं की वजह जानने की कोशिश की थी। इसमें सबसे बड़ी वजह किसानों पर बढ़ता कर्ज़ और उनकी छोटी होती जोत बताई गई। इसके साथ ही मंडियों में बैठे साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज की ऊंची दरें बताई गई थीं लेकिन वह रिपोर्ट भी सरकारी दफ़्तरों में दबकर रह गई। असल में खेती की बढ़ती लागत और कृषि उत्पादों की गिरती क़ीमत किसानों की निराशा की सबसे बड़ी वजह है, जिससे सरकारें बेखबर रहना चाहती हैं।

यह सच है कि इस व्यवस्था की जनद्रोही क्रूरताओं के चलते इससे पहले हजारों किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं लेकिन अपने हालात से विक्षुब्ध एक युवा किसान का देश की राजधानी में इस तरह हुई मौत कोई यूं ही भुला दिया जाने वाला मामूली हादसा नहीं। घटना के समय वहां उस पार्टी के हजारों कार्यकर्ता मौजूद थे, जिसकी दिल्ली में सरकार है। उस मीडिया के दर्जनों रिपोर्टर मौजद थे, जो चौथा खंभा कहा जाता है। घटना उस स्थान पर हुई, जिससे कुछ कदम दूर देश की संसद है, जिसमें देश भर के जनप्रतिनिधियों का जमघट लगता है और जिसमें इस समय भाजपा सरकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पारित कराने पर पूरी तरह से आमादा है। कैसी बेशर्मी है कि वही पार्टी आज इस मौत पर बयान देती है कि जंतर मंतर पर मानवता की हत्या हुई। भाजपा प्रवक्ता संबित कहते हैं कि रैली क्या किसी आदमी की जान से ज्यादा जरूरी थी? तो क्या यही सवाल केंद्र की भाजपा सरकार से नहीं बनता कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश फिर तो किसान की जान से ज्यादा जरूरी है!

जयप्रकाश त्रिपाठी 

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यूपी में किसान की मौत और आदिवासी नेता पर पुलिसिया फायरिंग से मुलायम-अखिलेश का असली चेहरा उजागर

लखनऊ 14 अप्रैल 2015। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के लोकसभा क्षेत्र आजमगढ़ के गांव सरायसादी में हुई किसान की मौत को रिहाई मंच ने सपा सरकार की किसान विरोधी नीति का एक और उदाहरण बताते हुए कहा कि इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सूबे में किसान और उसके प्रति सरकार का रवैया क्या है। मंच ने सोनभद्र में कन्हार बांध के नाम पर गैरकानूनी ढ़ंग से किए जा रहे अधिग्रहण के खिलाफ अंबेडकर जयंती पर ‘संविधान बचाओ’ प्रदर्शन पर पुलिस फायरिंग की कड़ी भर्त्सना करते हुए दोषी पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

रिहाई मंच के राज्य कार्यकारिणी सदस्य अनिल यादव ने कहा कि मुलायम सिंह यादव द्वारा गोद लिए गांव तमौली की सीमा से लगे सरायसादी गांव के किसान रामजन्म राजभर की फसलों की बर्बादी के बाद हुई सदमें से मौत यह बताती है कि मुलायम सिंह यादव किसानों के प्रति कितने असंवेदनशील हैं। उन्होंने कहा कि मुलायम हों या मोदी इन सबने चुनावों के वक्त किसानों को विकास के बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाए, पर आज जब प्रति दिन दर्जनों किसान आत्महत्या कर रहें है तो मोदी को विदेश दौरे से फुर्सत नहीं है तो वहीं मुलायम को उनके प्रतिनिधियों की वसूली के हिसाब से।

रिहाई मंच नेता लक्ष्मण प्रसाद ने कहा कि एक तरफ सत्ताधारी राजनीतिक दल बाबा साहब भीमराव अंबेडकर से अपनी विरासत जोड़ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ अंबेडकर जयंती पर सोनभद्र में ‘संविधान बचाओ’ प्रदर्शनकारी जिनके हाथों में बाबा साहब की तस्वीरें थी, पर पुलिस ने फायरिंग की, जिसमें एक आदिवासी नेता को गोली लगी व कई प्रदर्शनकारी जख्मी हुए। यह घटना सरकार के वंचित समाज विरोधी चेहरे को उजागर करती है।

मूल खबर….

यूपी में जंगलराज : एक और अन्नदाता ने की आत्महत्या, एक और किसान के सीने में घुसी पुलिस की गोली

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