यूपी से बुरी खबरें : PCS अफसर ने खुद को गोली मारी, महिला सिपाही ने की आत्महत्या, BJP विधायक का निधन

उत्तर प्रदेश से लगातार बुरी खबरों के आने का सिलसिला जारी है. ललितपुर में एक PCS अफ़सर ने ख़ुद को गोली से उड़ा लिया है. इनका नाम है हेमंत कुमार. ये फिहाल एसडीएम मड़वारा के पद पर तैनात थे. इन्होंने बन्द कमरे में खुद को गोली मारी. Continue reading

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आइपीएस सुसाइड प्रकरण : घरेलू हिंसा के चलते अब महिलाओं से ज्यादा पुरुष कर रहे हैं आत्महत्या!

Yashwant Singh : फेमिली प्रॉब्लम कितनी खतरनाक हो जाया करती हैं, यह एक आईपीएस के सुसाइड से जाहिर होता है। मेरे समेत वो सब भाग्यशाली हैं जिनके पास फेमिली तो है, लेकिन प्रॉब्लम नहीं। हमें छोटी-छोटी खुशियों-उपलब्धियों के लिए नेचर / प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। Continue reading

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छत्तीसगढ़ में 12 घंटे के अंदर दो युवा पत्रकारों ने फंदे से लटक कर दी जान, मीडियाकर्मी स्तब्ध

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता मुश्किल दौर से गुजर रही है। मीडियाकर्मी तनावों और दबावों के कारण परेशान हैं। इसकी परिणति सुसाइड के रूप में हो रही है। बारह घंटे के भीतर दो पत्रकारों के सुसाइड से राज्य समेत देश भर के मीडियाकर्मी स्तब्ध हैं। अंबिकापुर में हिंदी न्यूज चैनल के पत्रकार शैलेन्द्र विश्वकर्मा और बस्तर में राजस्थान पत्रिका समूह के अखबार पत्रिका में पदस्थ महिला पत्रकार रेणु अवस्थी ने खुदकुशी कर ली। Continue reading

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‘मेरा दिमाग ही मेरा दुश्मन है’ लिख कर महिला एंकर ने किया सुसाइड

भारत में एक महिला एंकर यह लिखकर सुसाइड कर लेती है कि- ”मेरा दिमाग ही मेरा दुश्मन है”.  आत्महत्या करने वाली यह महिला एंकर अपने पति से तलाक के बाद डिप्रेशन में चल रही थी. मामला आंध्र प्रदेश का है.   Continue reading

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चंदौली के पत्रकार डीके सिंह ने आत्महत्या की

पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले से एक दुखद खबर आ रही है. वरिष्ठ पत्रकार डीके सिंह ने आत्महत्या कर लिया है. बताया जाता है कि वे किसी पारिवारिक विवाद के चलते तनाव में थे. चंदौली जनपद के सैय्यदराजा थाना के अन्तर्गत बरठी कमरौर के रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार डीके सिंह अमर उजाला समेत कई अखबारों के संवाददाता रहे हैं.

बताया जा रहा है कि डीके सिंह ने पारिवारिक विवाद के चलते अपने नौबतपुर गेस्ट हाउस में खुद के मोफलर से फांसी लगाकर आत्महत्या कर लिया. सूचना मिलने पर सैय्यदराजा थाने की पुलिस मौके पर पहुंची.  पत्रकार द्वारा सुसाइड की इस घटना से जिले भर के पत्रकार और गणमान्य लोग स्तब्ध हैं.

चंदौली से प्रशान्त सिंह की रिपोर्ट.

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दैनिक भास्कर के मीडियाकर्मी ने सुसाइड किया, जीएम से लेकर संपादक तक पर शक की सुई

दैनिक भास्कर होशंगाबाद एडिशन से खबर आ रही है कि यहां एक मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव ने अपने वरिष्ठों की प्रताड़ना से तंग आकर सुसाइड कर लिया. मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव ने कीटनाशक पीकर जान दी. परिजनों ने आत्महत्या के लिए दैनिक भास्कर के वरिष्ठों को जिम्मेदार ठहराया है. पिता ने इस बाबत जीएम हरिशंकर व्यास, संपादक विनोद सिंह और एड एजेंसी के ओंकार कोहली का नाम लिया है जिनकी प्रताड़ना से आत्महत्या करने को बेटा मजबूर हुआ. 

चर्चा है कि इटारसी में एक बड़ा आयोजन कराया गया था जिससे मिले बिजनेस का एक हिस्सा हड़प लिया गया और मामला खुलने पर इसे मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव के मत्थे मढ़ दिया गया. इसी वजह से मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव ने डिप्रेशन में सुसाइड कर लिया. इस सुसाइड को लेकर स्थानीय अखबारों में जो कुछ खबरें छपी हैं, उसे नीचे दिया जा रहा है… इसको पढ़ने से काफी कुछ समझ में आ जाएगा….

आत्महत्या के लिए मजबूर करने वालों की गिरफ्तारी की मांग करते स्थानीय संगठनों के प्रतिनिधि.

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एक कामरेड पत्रकार के शोषण से तंग आकर महिला पत्रकार ने सुसाइड की कोशिश की!

‘दी वायर हिंदी’ में काम करते हैं आरोपी पत्रकार कृष्णकांत… एक साथ कई लड़कियों को प्रेम के जाल में फांसने और उन्हें धोखा देने का आरोप…

उपासना झा : प्रियंका ने आत्महत्या का प्रयास किया था.. बहुत अवसाद में चल रही थी.. उसके माता-पिता पहुँच चुके हैं… अब ख़तरे से बाहर तो है लेकिन उसे इस हाल में पहुंचाने वाले कृष्णकांत पर जिस तरह उसके खेमे वाले (वामपंथी) चुप हैं वह बहुत लज्जास्पद है.. नीचे वो पोस्ट दे रही हूं जिसे प्रियंका ने खुद लिखकर अपनी वॉल पर पोस्ट किया है…

”The Wire Hindi लगातार महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाता है लेकिन खुद अपने ही साथी कर्मी, एक झूठे क्रांतिकारी पत्रकार, धोखेबाज़ और धूर्त व्यक्ति का पक्षधर बना हुआ है. वायर में काम कर रहे कृष्णकांत ने एक महिला पत्रकार को इस मुकाम पर ला खड़ा कर दिया कि वह लगातार में अवसाद में रहते हुए भयानक मानसिक पीड़ा और लगातार आते अटैक्स से जूझ रही हैं. सिर्फ यही नहीं, अपनी सफाई में कृष्णकांत ने वही सब कहा जो एक अपराधी मानसिकता वाला व्यक्ति कह सकता है/कर सकता है. कृष्णकांत लगातार लोगों को मैसेज भेज कर और फोन द्वारा अपनी सफाई पेश कर रहा है कि लड़की विक्टम कार्ड खेल रही है, बदनाम कर रही है, मेरे अस्वीकार देने पर पगला गयी है. जबकि यही सारी बातें यह साबित करती हैं कि कृष्णकांत धूर्त व्यक्ति है. वह लगातार लड़की के दोस्तों को फ़ोन करके सभी पोस्टें हटा लेने को कहता है और रोने-धोने का नाटक करता है. हम हैरान हैं कि Siddharth Varadarajan जो महिला की लिस्ट में भी हैं और लगातार इस मसले से अवगत हैं वह कैसे मौन है!! कृष्णकांत की नीचता की हद यह है कि उसने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि वायर में महिला को जॉब नहीं दी तो बदला ले रही है…यह बेहद शर्मनाक बात है कि अपनी कालीकरतूतों को छिपाने के लिए यह झूठा आदमी महिला पर अनगर्ल बातें मढ़ रहा है. कुछ दिनों पहले नेशनल दस्तक ने अपने कर्मी ओमसुधा को उसके इसी तरह के कृत्यों को जान कर उसे संस्थान से अलग किया था. ज्ञात रहे कि नेशनल दस्तक अपने तरह का एक मात्र प्रतिष्टित संस्थान है जैसा कि वायर है. हम The Wire Hindi यानी सिद्धार्थ वर्धराजन से उम्मीद करते हैं कि वह इस मसले पर अधिक देर तक और मौन नहीं रहेंगे. महिला मुद्दों पर आवाज़ उठाना और दबी चुप्पी को तोड़ना ही आपकी पहचान है जिसे आप बनाये रखेंगे ऐसी हम आशा करते हैं.”

फेसबुक पर महिलाओं के मुद्दे को लेकर सक्रिय लेखिका उपासना झा की वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Naveen Raman शर्म आती है ये कहते हुए कि ये हमारे परिचित हैं। मुझे तो नफरत हो गयी है वामपंथियों से।

उपासना झा इस आदमी पर केस दर्ज होना चाहिए। एक साथ न जाने कितनी लड़कियों को बेवकूफ बना रहा था। उसे जेल जाना चाहिए।

Mamta Pandey हाँ…पर इस तरह मरने से बेहतर है उसे ही मार देती!

Suyash Deep Rai वो प्रियंकाके लिए प्रेस क्लब नही जाएँगे। फुटेज नहीं मिलेगा न। क्रांतिकारी पत्रकार थोड़े न हैं, अभिनेता हैं सारे के सारे। ख़ासतौर पर ये ब्रिगेड।

Sarjana Sharama nothing new. this is way communist and all left leaning people behave. They have double standards. Sidhrath vardrajan is leftist . These people believe in freedom of body freedom of kiss on the road. For them women are just to be used and abused. Though they –hathi ke daant khaney ke aur dikhaney ke aur

Apoorva Pratap Singh आप खेमेबंदी देखिये ! अभी कुछ और मामला होता, जनता इंसाफ दिलाने निकल पड़ती । इनके टुच्चेपन को देख के लगता है कि इनकी दुर्गति सही ही हो रही है

उपासना झा डेढ़ महीने से ये बड़े लोग चुप हैं। मौन व्रत कर रहे। पिछले साल योगिता को इसने इसी हाल में पहुंचाया था। अगर प्रियंका परसों रात में मर जाती तो!

Nishant Yadav इसकी पोस्ट देखी थीं कितना आदर्शवादी बनता था, यार जो आदमी रिश्तों में ईमानदार न हो वो काहे का आदर्शवादी, यहां फ़ेसबुक पे ऐसे ऐसे पोस्ट लिखते हैं कि ये दुनिया बदल देंगे, और खुद वहीं उसी कीचड़ में पड़े हैं

उपासना झा एक नहीं, कई लड़कियों को उल्लू बनाया

Nishant Yadav हाँ मेने प्रियंका के पोस्ट पढ़ें हैं पहले वो मित्र थीं अब पता नही कैसे अनफ्रेंड हो गई तो पढ़ नही पाया, आज पढ़े, कई लड़कियों को धोखा दिया, और मेने तो देखा है लड़कियाँ अक्सर शादी और प्यार के झांसे में आजाती हैं मैन कई ऐसे केस देखें हैं.. बाकी ये तो ऐसे ऐसे क्रांतिकारी पोस्ट करता था, और खुद के जीवन मे ये हाल है

Shams Hussain दुःखद! कृष्णकांत को अच्छा साथी समझता था मैं. बेहद वाहियात किश्म का टुच्चा आदमी निकला. आज प्रियंका के अवसाद में जाने का दोषी सिर्फ और सिर्फ कृष्णकांत हैं.

अनु प्रिया जल्द ठीक हो जाओ प्रियंका..!! कृष्णकांत को सजा मिलनी चाहिए !!

उपासना झा हाँ अनु जी, सज़ा मिलनी चाहिए

Neera Jalchhatri शुक्रिया उपासना ….प्रियंका की खबर देने के लिए….कई दिनों से कुछ पता नही चल रहा था…ये सूचना बहुत दुखद है. उसे हिम्मत से काम लेना होगा…..और अपने आपको कष्ट देने के बजाय कानूनी लड़ाई की तरफ़ जाना चाहिए…

सरस जैन ऐसे लोगों के सामाजिक बहिष्कार की जरूरत हैं, इनको लज्जित करना जरूरी।

Aparna Anekvarna He should be booked for this.. I met her once at the book fair. A well mannered, sweet girl who helped me choose books. I am unable to associate that bubbly girl with this trauma.. how this stress has affected her.. more power to her!

उपासना झा अपर्णा जी, उसने इस हाल में मदन योगिता को भी पहुँचाया था।

Manisha Choudhary हर चीज़ को अपने वाद से ही तौलने की कोशिश करेंगे लोग तो इंसानियत जियेगी कैसे

Amarendra Kishore जो भी हुआ दुखद है।प्रियंका हिम्मत से काम ले।किसी के बगैर भी ज़िन्दगी चलती है–इसलिए उसे अपना मन मजबूत रखना होगा।आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है।इस मामले को आपी या वामी से जोड़ने का घटिया प्रयास खेदपूर्ण है।यह समस्या है जिसका समाधान समाज के स्तर पर कानून के रास्ते से हो।
उपासना झा यह इसलिए कि अगर किसी संघी ने किया होता तो इनका उत्साह देखते आप।

Amarendra Kishore करनेवाला न संघी होता है और न आपी, न कांग्रेसी।करनेवाला सिर्फ करनेवाला होता है।किये जाने के बाद जनता ही कुछ करती है। गर्भवती शिवानी भटनागर को मां बनानेवाला पहले इंसान था तब वह किसी पार्टी से था।कर्ता अपने कर्म के बाद झंडे का इस्तेमाल अपने बचाव में करता है।डेरा सच्चा सौदा इसका उदाहरण है। उसे किसका संरक्षण था। उसके साथ किसने गठबंधन था? क्या गठबंधन करनेवाले राजनीतिक दल ने उसे अनाचार की छूट दी थी? शायद नहीं।

Rakesh Singh ए बात आज प्रियंका प्रकरण मे उसके पोस्ट पर कही जा रही है, जो एक तरह से आवरण सदृश दिखता है| अगर यही विचार सामने वाले प्रकरणो मे भी अपनाए जाय ,तो हम सब संयुक्त रूप से अपराधियो पर ज्यादा प्रहार कर सकते हैं | अमरेन्द्रजी विचार सही है आपका पर इसका प्रयोग पूर्वाग्रही रूप में ही हुआ है |उपासना जी आपके इस सहज प्रयास को बहुत बधाई व शुभकामनाएँ |

उपासना झा पिछले डेढ़ महीने से इस मुद्दे पर बड़े लोग चुप्पी साधे हुए हैं।

Amarendra Kishore आप इस मामले को वामी होने से क्यों जोड़ रहीं हैं। और इतनी बड़ी दो घटनाओं आसाराम और डेरा सच्चा सौदा के बाद? इस समस्या के मानवीय पहलू को समझिए। हां,कानून अपना काम करे, ये जरूरी है।

Nishant Yadav मैंने आज प्रियंका के सारे पोस्ट पढ़े, पहले वे मित्र सूची में थी , कृष्णकांत मेरे भी सूची में है कितना कमज़र्फ निकला, लोगों के कई चेहरे होते हैं उसकी पोस्ट कितनी क्रांर्तिकारी , होती थी, जातिवाद, ऑनर किलिंग, प्रेम सबके ऊपर, लेकिन खुद ही इसमें डूबा हुआ है ये सब पत्रकारों का यही हाल है क्या , यहां लिखते कुछ हैं और जीवन मे होते कुछ हैं

Sarjana Sharama Leftist will talk about women rights and most them leave their wife or husband for another male or female. Shabana azami and sitaram yetury are two major example. But I love the honey irani attitude . She said— let jawed akhtar marry shabana who will fight for this Buddha ( old man)

Amarendra Kishore पत्नी को छोड़ने की परंपरा किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है। एक महिला और मानवीय होकर लिखिए,बोलिये।पार्टी प्रवक्ता बनने की जरूरत शायद अब नहीं है।खास तौर से इस मामले में।

Sarjana Sharama It is not your wall do not teach me I stand by my statement leftists talk about child labour bring minors as domestic help from Bengal and Bihar. Suppose u.s.a but their children study in U.S on American scholarship . They wear lives jeans smoke 555 talk about women rights and practice multi relations. When I come on your wall you can object

Amarendra Kishore ऐसा लिखना शायद आपकी विवशता हो मगर यहां कौन कम है।गरीबों और जरूरतमंदों की चिंता करनेवाला कोई एक भी हो तो बताएं।किसी भी दल का। आपको 555 और जीन्स दिख गया।विदेश में पढ़ते बच्चे दिख गए लेकिन उन दलों का हाल भी बयाँ करें जहां जूतों में दाल बांटे जा रहे हैं।

Sarjana Sharama I have many leftist friends I have seen the reality this is my experience . They I read something and themselves practice something else. I can not give their names and detail . Do not undermine others.. One should follow what you preach . Leftist only preach

Ramashish Kumar ये वही कृष्णकांत है क्या जो गले में गमछा लपेट कर सात्र हुआ करता था/है? कितनी बड़ी बड़ी बातें करता था/है वो ! इसीलिये जरुरी है कि लेफ्ट के इस चिंतन से परहेज करना चाहिये कि मनुष्य सिर्फ देह है । खास कर स्त्रियों को ! लेकिन सुनता कौन है ! और ये भी जरुरी है कि उन्हें किसी भी के लिखे को बहुत धीरे धीरे पढ़ना चाहिये, शब्द में नहीं उलझन चाहिए । लिखे के पीछे के भाव को समझना चाहिए । धीरे धीरे व्यक्तित्व समझने में मदद मिलेगी।

Rustam Hayat Khan Koi us krishnkant ka ek pic to share karo…

Animesh Mukharjee मेरा एक विनम्र सवाल है, सम्भव हो तो समझाएं। दोनों लंबे समय से एक रिलेशन में थे, कई कारणों से जिनमें कृष्णकांत की गलतियां ज़्यादा होंगी, ये रिश्ता नहीं चल पाया। प्रियंका खुद भी इससे बाहर ही जा चुकी हैं। कृष्णकांत भी शायद ऐसा कुछ चाहते हैं। ऐसे में वायर क्यों दोषी है, कृष्णकांत अपराधी क्यों हैं? क्या kk किसी तरह से ब्लैकमेल कर रहा है। क्या बिना कंसेंट के कुछ करने का मामला है। अगर kk सीरियल मोलेस्टर है तो और लड़कियां सामने आएं, वरदराजन से मिलें। अपराध क्या है मुझे अभी तक समझ नहीं आया।

उपासना झा अनिमेष एक साथ कई लड़कियों को बेवकूफ़ बनाना अपराध ही है। शादी के नाम पर सम्बन्ध बनाना भी

Amarendra Kishore सवाल सहमति का नहीं है।सवाल उसकी निजता को असुरक्षित करने का है। किनाराकशी अन्याय है।लेकिन इस अन्याय का प्रतिकार हो।प्रियांका गलत कर रही है।उसे सहानुभूति चाहिए। लेकिन मामले को समझना होगा– जब जैविक रिश्ते में दरार आ सकता है तो ऐसे रिश्तों का वजूद तो कपूर के धेले के माफिक होता है। कृष्णकांत को जेल भेजना समाधान नहीं है।

उपासना झा हाँ, मैंने प्रियंका को यही कहा था कि सब लड़कियाँ एकसाथ केस करो

Amarendra Kishore चोर दरवाजे या सहमति या शादी के इरादों से बने विवाहपूर्व संबंध शायद ही सकारात्मक दिशा और निश्चित मुकाम हासिल कर पाते हैं। शादी से पहले सम्बन्ध बन जाना आज की तारीख में एक आम बात है शहरों में। ज़्यादातर लोग इसके बाद शादी न होने को सहजता से लेते हैं। शादी का वादा करके सम्बन्ध बनाने में में पीड़ित की गलती ज़्यादा मानता हूं। अगर लड़की को बाद में लगे कि लड़का सही नहीं तो? तब वो बाहर नहीं जाएगी रिश्ते से? विवाहपूर्व या विवाहेत्तर संबंध केवल शहरी ज़िन्दगी का मौकापरस्त मनोवृति नहीं है।सहमति दोनो की होती है,समाज की नहीं।लेकिन एक पक्ष को बाद संबंध रास नहीं आकर रिश्ते से खुद को अलग कर लेना और दूसरे का ठगा महसूस होना केवल लड़का या केवल लड़की के साथ नहीं होता।समाज से अलग हटकर या उसके प्रारूप को धता बताकर बने ऐसे सहमतिमूलक संबंध एक दूसरे से लाजमुक्त हो चुके होते हैं।गलती दोनों पक्षों की होती है।

Sudipti Satyanand यही मुझे भी लगता है। प्रियंका को पहले दिन से सपोर्ट करने, समझाने के बाद भी यही कि अगर रिश्ते में इतनी बार दरारें आईं, खामियां रहीं और बाहर आ गए तो ऐसे आदमी के।लिए जान क्यों देना? शादी अगर हो भी जाए तो नहीं चलती है तो लोग अलग होते हैं न? संबंध नहीं चला, अलग हो गए, उसकी धूर्तता भी सामने लायी गयी पर अब उस लड़की को बाहर आना चाहिए न? शादी नहीं चलती तो लोग तलाक लेते हैं जान नहीं देते।

Amarendra Kishore आप बिलकुल सही कह रहीं हैं–किसी ने कहा भी है कि आँसुओं में धुली खुशी की तरह,रिश्ते होते हैं शायरी की तरह।रिश्ते निभाने की अंदर से ज़िद्द होती है। डंडे के बूते न रिश्ता चलता है और न ही कानून का भय दिखाकर रिश्तों की मिठास लौटाती है।यदि कल तक प्रेम था तो आज प्रतिकार क्यों? जो भी वक़्त गुजार लिया उसके अच्छे पलों को याद कर आगे बढिये– वह तुम्हारा नहीं था, लिहाजा नहीं लौटा, तुम्हारा होता तो कहीं नहीं जाता। कल तक सहमति थी यानी दोनो की इच्छा थी।परस्पर संतुलन रख पाना दोनो के बूते की बात नहीं थी।इसलिए गलती भी दोनो की रही होगी।

Gunjan Jhajharia दी कल से सोच रही हूँ, प्रियंका को कुछ मैसेज करूँ, लेकिन समझ नही आ रहा क्या लिखूँ। वामपंथ विचारधारा आइडियल है, लेकिन इसके फॉलोवर्स आइडियल नहीं हैं। कृष्णकान्त को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन दी प्रियंका का इश्क़ पाक था, उसको सज़ा मिलने से भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बस इसे समय चाहिए। जरूर ये मुश्किल समय होगा, लेकिन हिम्मत रखनी होगी। खुद का साथ देना होगा प्रियंका तुम्हें, तुम अपने आपको नहीं छोड़ सकती। तुम ये समझ लो, ऐसा हर दूसरे आदमी के साथ होता है, जब उनके जज्बातों से खिलवाड़ किया जाता है, और फिर बदनाम करने की कोशिश की जाती है।
तुम उन सभी से कमज़ोर नहीं हो,
खुद को कमज़ोर साबित मत करो,
उसे छोड़ खुद पर ध्यान दो, उसके साथ क्या हो क्या नहीं, कुछ भी कहे वो, सच्चाई तुमसे बेहतर कौन जानता है। तुम खुद से इस कीमती जिंदगी के अच्छे पल नहीं छीन सकती। प्रियंका तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है दूसरों के लिए भी। सबको तुमसे उम्मीदें हैं। कम से कम मुझे तो हैं।

DrAjit Pandey वामपंथ का पाखण्ड यही है। जिन मुद्दों पर दूसरों को कटघरे में खड़ा करते हैं, उन्हीं मुद्दों पर वे अमल करते हैं। BHU के प्रोफेसर कृष्णमोहन सिंह ने 2014 में अपनी महिला मित्र के साथ मिलकर अपनी पत्नी की खुलेआम पिटाई की थी। उनकी पत्नी ने उनके इस अवैध सम्बन्ध का विरोध किया था लेकिन प्रोफेसर अपने घर में महिला मित्र को ले आये थे। वस्तुतः हर वाद के समर्थकों में ऐसे लोग मिल जाते हैं जिनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है।

Mrinal Ashutosh पहले प्रियंका जी को ठीक होने दीजिये। फिर इस मामले को सही से ठीक करिये। @#$कांत से भी पूछ लीजिये कि जनाब, क्या है यह? अपना विचार जल्दी बताओ। नहीं तो दूसरा विचार किया जाएगा।

Majdoor Jha मैं अपने निजी अनुभव में द वायर और नेशनल दस्तक के अलोकतांत्रिक रवैये को महसूस कर चुका हूं। विस्तार से इस पर जरूर लिखूंगा। लेकिन एक बात जरूर कहना चाहूंगा वह ये कि हमारे तमाम सामाजिक सरोकार के कार्यक्रमों के बावजूद हमें जनता से शिकायत रहती है कि वह इतना अलोकतांत्रिक शक्तियों को ही क्यों चुनती है। तो इसका जवाब है कि जब जब आपको अपने और सच में से एक को चुनना होता है आप सच का गला घोंट देते हैं और ये बात वह जनता भी जानती है जिसे आप बेवकूफ समझते हैं ।

Devesh Pandey घटना दुःखद है….. पर कहीं ना कहीं दुख के कारण को इन लोगों ने स्वयं चुना है। धोखा देने वाला दोषी है पर जो धोखा खाते जा रही हैं उनको भी विचार करना चाहिए

Ritu Tiwary घरवाले उसको लेकर गाँव चले गये। वो जल्दी आये सब प्रार्थना कीजिए।

सुलोचना लड़कियों को कुछ क्रांतिवीर बेवकूफ समझते हैं और एक साथ एक से अधिक अफेयर चलाते हैं जैसे कि उन्हें कुछ पता ही न चलेगा

Arvind Arora अपने विषैले ज़हनों की गंदगी लीप-पोत कर आरोपी को मौक़े पर ही ‘क्लीन चिट’ दे रहे और प्रियंका को क़ानूनी कार्यवाही से रोकने का हर जतन घिनौना प्रयास कर रहे दरिंदों के कमेंट पढ़ रहा हूँ और घिन से भर रहा हूँ उपासना झा. यही वह लोग हैं जो कुछ दिनों से BHU मामले पर स्त्रीवाद का झंडा फहराते घूम रहे थे!? थू है इस बेशर्मी पर. कैसे-कैसे हैवान घूम रहे हैं आसपास की दुनिया में इंसान की पहचान और सरोकारों का नक़ाब ओढ़े!

Arvind Arora  इस पोस्ट को और कुछ वक़्त ख़र्च कर के सारे कमेंट्स को भी पढ़िए और हो सके तो इस पर लिखिए भी Shobha Shami. अभी परसों ही आपने पोस्ट लिखी थी कि कैसे ख़ुद को Politically Correct रखने के लिए आपकी एक मित्र ने आपको ही उलाहनों भरी ‘शिक्षा’ दी थी, यहाँ तो बड़ी संख्या में प्रियंका को आगे कार्रवाई न करने की ताक़ीद के साथ ही आरोपी को अभी से ही ‘क्लीन चिट’ देने वाले लोग दिख जाएँगे आपको. और ध्यान रहे यह सब अभी तक BHU वाले मसले पर हायतौबा मचा कर स्त्रीवाद के सर्टिफिकेट जीतने वाले लोग हैं.

उपासना झा विभा रानी नाम की एक महिला में मेरे इनबॉक्स में पहुँच गयी। बोल रही कि आप केस करिये मैं बेल कराऊंगी।

Arvind Arora ऐसा!? बताओ, यह लोग गिरोहबंद अपराधियों से कैसे कम हैं!?

Arti Varma yakeen nahi hota priyanka jaisi strong ladki aisa kar sakti hai..kis hadd tak aahat thi tum dost:'( jaldi niklo isse aasaan nahi hai par namumkin bhi nahi

Pragya Pande यह क्या मामला है । अभी आपकी वाल से पता चला। ईश्वर प्रियंका को जल्दी स्वस्थ करे।

Shreekant Satyadarshi U have unravelled many masks Upasanaji,i hope culprit heads will roll,sincere accolades to u

Qamrul Hasan Siddiqui The Wire को इसपर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए वर्ना उनकी छवि को धूमिल होने में समय नहीं लगेगा।

Mamta Pathak Sharma वामपंथी अपनी सुविधानुसार बोलते हैं उपासना झा…प्रियंका स्वस्थ हों और घर आयें…ऐसी कामना है…

Chandrakala Tripathi मध्यवर्गीय सुविधापरस्ती के फ्रेम में ज्यादातर हैं। उन्हें इसका भाष्य चतुराई से करने भी आता है। स्त्री के लिए भी वही निरंकुशता उसके स्पेस का फायदा उठाना। कोई भी घटना उठा कर देखो इनके पैतरे दिख जाएंगे। यहां वाम दक्षिण सब एक से दिखेंगे। जरूरी है कि प्रियंका को साहस में लौटाया जाए। मुकाबला करना चाहिए इसका।

Ritu Tiwary किसी का चरित्र उसका व्यक्तिगत होता है..उसका किसी विचारधारा से सम्बंध नहीं..।कृष्णकांत का जो चरित्र वर्णन मैंने देखा ये ज़रूर उम्मीद करूँगी कि उनके मित्र जो उनके साथ उठते बैठते थे उन्हें मामले में पड़ना चाहिए..आख़िर समाज का भय कहाँ चला गया। इतनी उद्दंडता वो इसी वजह से करने का साहस कर रहा है क्योंकि उसे परिवार, दोस्त, रिश्तेदार और समाज का भय नहीं। ये भय लोगों में ख़त्म होगा तो अराजकता बढ़ेगी।

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मौत का दर्शन सुनाते इस आईएएस अफसर ने दे ही दी अपनी जान (देखें वीडियो)

शांति प्रिय और आध्यात्मिक स्वभाव वाले आईएएस अफसर मुकेश पांडेय बिहार में बक्सर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे. एक शाम वे सर्किट हाउस में अकेले रुकते हैं और खुद का एक वीडियो रिकार्ड करने लगते हैं. यह वीडियो अब उनके जीवन का अंतिम वीडियो बन चुका है. यह वीडियो उनकी निजी जिंदगी की दिक्कतों और जीवन के प्रति उनके नजरिए का गवाह बन जाता है. सुसाइड से ठीक पहले रिकार्ड किए गए इस वीडियो में उन्होंने पांच मिनट में ही काफी सारी बातें कही हैं. Continue reading

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दैनिक भास्कर रोहतक के संपादकीय प्रभारी ने ट्रेन से कटकर आत्महत्या की

एक बड़ी और बुरी खबर रोहतक से आ रही है. दैनिक भास्कर के संपादकीय प्रभारी जितेंद्र श्रीवास्तव ने ट्रेन से कटकर आत्महत्या कर ली है. बताया जा रहा है कि उनका प्रबंधन से लेटरबाजी भी हुई थी और पिछले दिनों पानीपत में हुई मीटिंग में उनकी कुछ मुद्दों पर अपने वरिष्ठों से हाट टॉक हुई थी. पर आत्महत्या की असल वजह क्या है, इसका पता नहीं चल पाया है.

जितेंद्र श्रीवास्तव (फाइल फोटो)

बताया जा रहा है कि आज सुबह वह बच्चों को स्कूल छोड़कर घर लौटे थे. उसके बाद सुबह सवा दस बजे घर से निकल गए. वह स्टेशन पहुंचे और जीआरपी थाने के पास ही ट्रेन के सामने कूद गए. आज उनका वीकली आफ भी बताया जा रहा है. लोग तरह तरह के कयास लगा रहे हैं. कुछ पारिवारिक तो कुछ आफिसियल कारण बता रहे हैं सुसाइड के पीछे. जितेंद्र के दो छोटे छोटे बच्चे हैं. एक आठ साल और दूसरा नौ साल का.

जितेंद्र वैसे तो संपादकीय प्रभारी थे लेकिन उनका पद न्यूज एडिटर का था. छोटी यूनिट होने के कारण रोहतक में न्यूज एडिटर को ही संपादकीय प्रभारी बना दिया जाता है. एक संपादकीय प्रभारी के सुसाइड कर लेने की घटना यह पहली है. बताया जा रहा है भास्कर प्रबंधन अपने संपादकों और संपादकीय प्रभारियों पर बेवजह भारी दबाव बनाए रखता है और तरह तरह के टास्क देकर उन्हें हर पल तनाव में जीने को मजबूर किए रहता है. जब अच्छी सेलरी और वेज बोर्ड देने की बात आती है तो खराब परफारमेंस का बहाना करके या तो नौकरी से निकाल दिया जाता है या काफी दूर तबादला कर दिया जाता है ताकि थक हार कर खुद ही इंप्लाई इस्तीफा दे दे. सूत्रों का कहना है कि इन दिनों भास्कर प्रबंधन छंटनी का अभियान चलाए हुए है और काफी लोगों को नौकरी से निकाल रहा है. भास्कर के न्यूज एडिटर के सुसाइड से रोहतक में हड़कंप मचा हुआ है.

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राहुल इतने संजीदा और साफ दिल थे कि अगर किसी ने कुछ बोल दिया तो आंखों में आंसू आ जाते

Abhimanyu Shitole राहुल ने आत्महत्या कर ली… ! यह दुखद खबर जब से सुनी है मन उदास है। राहुल और मैं करीब साढ़े तीन-चार साल tv9 में एक साथ रहे। tv9 लॉन्च होने से पहले से वह मेरे साथ टीम में था। बेहद सौम्य, शालीन और अतंरमुखी लड़का। आंखों में हजार सपने पाले हुआ था। बोलता कम था, बस जो काम दो, वह पूरे मन से करता था। वह मेरे साथ प्रोडक्शन में था। कभी डे शिफ्ट, कभी नाइट शिफ्ट, कभी डे-नाइट दोनों एक साथ… नाराज होता था, लेकिन अपनी नाराजगी भी मन में ही दबा कर रखता था।

संजीदा और साफ दिल इतना था कि अगर किसी ने कुछ बोल दिया था तो उसकी आंखों में आंसू आ जाते थे। काम के प्रति जिम्मेदार और कुछ अच्छा करने की ललक उसमें भरी थी। एक दिन राहुल मेरे पास आया बोला, सर मुझे भी स्क्रिप्ट लिखना सिखा दो। उस दिन उसे स्क्रिप्टिंग की कुछ बुनियादी बातें बताई थी। बाद में वह लिखने लगा। उसे स्क्रिप्टिंग में मजा आने लगा। कुछ दिन बाद आकर बोला आपको मेरी लिखी स्क्रिप्ट कैसी लगती है? मैंने कहा टेक्निकली तो ठीक है, लेकिन शब्दों से खेलना भी सीख लो तो मजा आ जाएगा।

स्वर्गीय राहुल शुक्ला

धीरे-धीरे वह शब्दों से खेलना भी सीख गया। अब वह प्रोडक्शन के साथ-साथ स्क्रिप्टिंग भी करने लगा। उसकी लगन ने उसे पर्दे के पीछे से निकाल कर ऑन स्क्रीन कर दिया। हमारा राहुल एंकर भी बन गया। उस दिन मैं बहुत खुश हुआ था। पहली बार जब राहुल ने एंकरिंग की थी मैंने राहुल को उस दिन दिल से बधाई दी थी और कहा था, अब तुम्हारे लिए रास्ता खुल गया है, पीछे मत पलटना… राहुल ने जबाव में इतना ही कहा था, ‘सर! मैं पूरी मेहनत करूंगा।’

सोमवार की सुबह लखनऊ से विनय शुक्ला का फोन आया। विनय भी हमारा tv9 का पुराना साथी है। वह मुझसे राहुल की खबर की पुष्टि करना चाहता था। उसे भी मेरी तरह राहुल की आत्महत्या वाली बात पर भरोसा नहीं हो रहा था। हालांकि वह मुझसे पहले गिरीश गायकवाड से इस खबर की पुष्टि कर चुका था। इस खबर के बाद से मन बिल्कुल खिन्न है। tv9 छोड़ने के कुछ महीनों बाद सबसे संपर्क टूट गया था।

कुछ साथी अब भी फोन करके याद करते हैं, लेकिन राहुल का कभी फोन नहीं आया और अब इसके लिए उसे डांटने या शिकायत करने का मौका भी नहीं है। रविवार को जब से यह मनहूस खबर सुनी है, बारबार राहुल का चेहरा आंखों के सामने आ रहा है। भगवान जाने क्या वजह रही होगी कि उसने खुद को खत्म करने का फैसला लिया। अब तो सिर्फ इतनी ही प्रार्थना है कि हे भगवान उसकी अशांत आत्मा को जरूर-जरूर-जरूर शांति देना। और हाँ एक प्रार्थना और है इस बार उसे इतना कलेजा जरूर देना कि वह अपनी परेशानी से लड़ सके, अपना मन अपने दोस्तों के सामने खोल सके।

लेखक अभिमन शितोले मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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जी न्यूज के वरिष्ठ संवाददाता राहुल शुक्ला ने आत्महत्या के पहले फेसबुक पर लिखी थे ये कविता

Ashwini Sharma : बावरा मन देखने चला एक सपना… आखिर ऐसा कौन सा सपना था जिसे देखने की ख्वाहिश लिए जी न्यूज के वरिष्ठ संवाददाता राहुल शुक्ला ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया..उसने मुंबई के चांदिवली में फांसी लगाकर जान दे दी..राहुल की खुदकुशी की जानकारी मेरी पूर्व सहयोगी हर्षा ने मुझे कल रात को दी और तब से ही मेरा मन बेचैन हो उठा..साल 2009 में पहली बार राहुल मुझसे टीवी9 महाराष्ट्र में काम करने के दौरान मिला था..

राहुल की पहली नौकरी थी..कभी भी मैंने राहुल के मुरझाए चेहरे को नहीं देखा था..हमेशा मुस्कराता हुआ किसी भी टास्क को करने के लिए तैयार रहता..यही वजह है कि वो अपने सहकर्मियों का चहेता था..और बड़ी लगन से काम करते हुए वो जी न्यूज में वरिष्ठ संवाददाता के पद पर पहुंचा था..लेकिन आज राहुल नहीं है और मैं ही नहीं उसके वो तमाम साथी सदमे में हैं जो कभी ना कभी राहुल के साथ काम कर चुके हैं..

सब यही कह रहे हैं कि आखिर सबके दुखों का साथी राहुल इतना अकेला क्यों था..उसने खुदकुशी से पहले फेसबुक पर कई ऐसी कविताएं पोस्ट की जो उसके गहरे विशाद में होने का भाव पेश करती हैं..राहुल ने चंद दिन पहले एक कविता लिखी जिसमे किसी परछाई का जिक्र है..वो परछाई आखिर क्या थी..आखिर वो क्यों राहुल का पीछा कर रही थी..राहुल ने लिखा था..

एक परछाई पीछे भागती है..
ना जाने कहां से आती है..
मैं रूकता हूं वो छिप जाती है..
मैं दौड़ता हूं वो दबे पांव फिर आती है..
हर दिन छलती है, हर दिन हंसती है..
शाम होते ही छिप जाती है..

पूरी कविता का स्क्रीनशाट ये है…

मलाल इस बात का भी है कि आभासी दुनिया और रीयल दुनिया में अनगिनत दोस्त होने के बाद भी किसी को राहुल का दर्द क्यों नहीं दिखा…राहुल ने किसी से अपना दर्द खुलकर क्यों नहीं शेयर किया और अगर ऐसा हो जाता तो आज राहुल हमारे बीच होता…ईश्वर से यही प्रार्थना है राहुल की आत्मा को शांति दें…

मुंबई समेत कई शहरों में कई न्यूज चैनलों के लिए काम कर चुके और इन दिनों लखनऊ में पदस्थ टीवी पत्रकार अश्विनी शर्मा की एफबी वॉल से.

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मुंबई में टीवी पत्रकार राहुल शुक्ला ने आत्महत्या कर ली

Hari Govind Vishwakarma : पत्रकार ने की ख़ुदकुशी… यक़ीन नहीं हो रहा है, लेकिन यह सच है कि टीवी9 में मेरे पूर्व सहकर्मी और बेहद प्रतिभासंपन्न पत्रकार राहुल शुक्ला ने आज अपने नेरुल के घर में ख़ुदकुशी कर ली।

टीवी 9 के हिंदी से मराठी होने पर वह टाइम्स नॉउ में चले गए थे और टीवी 9 की ऑफिस कमला मिल कंपाउंड में शिफ्ट होने के बाद उऩसे अकसर मुलाकात होती थी, जब अर्नब गोस्वामी के टाइम्स नाउ से इस्तीफे की ख़बर आ रही थी, तब मैंने राहुल से ही ख़बर कनफर्म की थी। आजकल वह ज़ी बिज़नेस में थे। श्रद्धांजलि।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार हरि गोविंद विश्वकर्मा की एफबी वॉल से.

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आत्महत्या के पहले अंगदान कर गए थे मुंबई के वरिष्ठ प्रेस फोटोग्राफर जगदीश औरंगाबादकर

इस पुरानी तस्वीर में फिल्म स्टार दिलीप कुमार के साथ प्रेस फोटोग्राफर जगदीश औरंगाबादकर दिख रहे हैं.

मुम्बई : सिनेमा जगत को कवर करने वाले जाने माने प्रेस फोटोग्राफर जगदीश औरंगाबादकर ने परसों मुम्बई के गोरेगांव स्थित अपने आवास पर आत्महत्या कर लिया था। इस घटना से सिनेमाजगत को कवर करने वाले पत्रकारों और फोटोग्राफरों में शोक का माहौल है। इस बारे में मिली जानकारी के मुताबिक जगदीश औरंगाबादकर गोरेगांव स्थित अपने आवास पर अकेले थे।

पुलिस के मुताबिक सुबह 9 बजे उन्होंने अपने शुभचिंतको के गुड मार्निंग के वाट्सअप पर आये सन्देश को पढ़ा भी। संभवतः उन्होंने परसों 10 से 12.30 बजे के आसपास आत्महत्या का यह कदम उठाया। सुबह टिफिन देने वाला लड़का आया तो आत्महत्या की इस घटना की जानकारी पड़ोसियों को लगी। इसके बाद तुरंत पुलिस को सूचना दी गयी।

पुलिस के मुताबिक जगदीश औरंगाबादकर का शव उनके घर में बालकनी में रस्सी से लटका मिला। पुलिस ने शव के पास से मृत्यु से पूर्व लिखा गया पत्र भी बरामद किया है जिसमे उन्होंने आत्महत्या के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया है। उन्होंने मृत्यु के बाद अपने शरीर के अंगों को दान करने लिए अंगदान का फ़ार्म भी भरा था। इसके बाद उनके शव को अस्पताल को अंगदान के लिए सौंप दिया गया। जगदीश औरंगाबादकर के निधन पर फिल्म पत्रकारों की संस्था चेंबर ऑफ फिल्म जर्नलिस्ट के अध्यक्ष इंद्रमोहन पन्नू और सभी पदाधिकारियों और सदस्यों ने शोक जताया है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

मूल खबर…

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मुंबई के वरिष्ठ फिल्म फोटोग्राफर जगदीश औरंगाबादकर ने आत्महत्या की

मुंबई से एक बड़ी और दुखद खबर आ रही है. वरिष्ठ प्रेस फोटोग्राफर जगदीश औरंगाबादकर ने आत्महत्या कर ली है. दादा के नाम से चर्चित जगदीश फ्रीलांस फिल्म फोटोग्राफर थे. सूचना मिलते ही पुलिस की टीम मौके पर पहुंची. पुलिस वालों ने जगदीश दादा की लाश को नीचे उतारा. इस स्तब्धकारी घटनाक्रम की जानकारी मिलने पर फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन ने बेहद दुख जताया और श्रद्धांजलि दी.

जगदीश औरंगाबादकर ने कई मशहूर फिल्मी हस्तियों की कई मौकों पर फोटोग्राफी की है. उनका फोटो जर्नलिज्म का लंबा इतिहास रहा है. नीचे एक तस्वीर में जगदीश औरंगाबादकर जाने माने फिल्म स्टार दिलीप कुमार के साथ दिख रहे हैं…

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सौमित खुदकुशी के बहाने मीडिया संस्थानों की हालत देख लीजिए

बेहद टैलेंटेड जर्नालिस्ट सौमित सिंह ने पायोनियर, डीएनए, मुंबई मिरर और हेडलाइंस टुडे जैसे तमाम बड़े कहे जानेवाले संस्थानों में बेहद सीनियर पदों पर काम करने के बावजूद भीषण बेरोजगारी का दंश झेला और 44 साल की उम्र में दो छोटी बच्चियों के भविष्य का ध्यान रखे बगैर अपनी जान दे दी। इसका मतलब है कि बड़े संस्थान और बड़े पद का अनुभव भी पत्रकारों को सुरक्षा भाव देने में असमर्थ है। आगे पता नहीं उसके परिवार का जीवनयापन कैसे होगा। पत्रकार संस्थाएं इसमें कोई भूमिका निभा भी सकती हैं या नहीं?

हम हिंदी वाले सोचते हैं कि हमारा तो जीवन शोषण के लिए ही हुआ है पर अंग्रेजी पत्रकारों के लिए दुनिया की मीडिया खुली है। इसके बावजूद सौमित जैसा जर्नलिस्ट लड़ते लड़ते हार जाता है तो यह पत्रकार बिरादरी के लिए सिहरा देनेवाली बात है। इस समस्या का हल खुदकुशी नहीं है यह सौमित भी जानते होंगे पर निश्चित तौर पर स्थितियां ऐसी रही होंगी कि उसने मान लिया होगा कि अब कुछ नहीं हो सकता।

इधर उधर नजर दौड़ाएं तो यह आखिरी केस भी नहीं होनेवाला। बड़े अखबार और चैनल एक दिन में इम्पलाई को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं और छोटे मोटे संस्थान महीनों बिना वेतन के काम कराते रहते हैं। अभी नेशनल दुनिया और सहारा के मीडिया कर्मियों का कहना है कि उन्हें पांच छह महीने से वेतन नहीं मिला है और जल्दी मिलने की संभावना भी नहीं है। उनके घर में गुजर बसर कैसे हो रही होगी आप अंदाजा लगा सकते हैं। मेरा यह कहना है कि अगर आप संस्थान नहीं चला सकते तो बिना वेतन काम कराने का मतलब क्या है, बकाया दीजिए और अपनी दुकान बंद कीजिए, किस वैद्य ने कहा है कि बिना पैसे के मीडिया संस्थान चलाते रहिए।  

बमबम
bambam.bihari@gmail.com


पूरे मामले को जानने समझने के लिए इसे भी पढ़िए….

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WHEN SAUMIT SINGH NEEDED HELP, NONE OF YOU WERE THERE….

सौमित सिंह की फाइल फोटो

I clearly remember that conversation with Saumit Singh. It was just after Independence Day in 2013. He was goading me to be more aggressive in my writing. “Tu Bohot Soft Hai. This is not journalism. You should say it the way it should be said,” he said.

There couldn’t be a better example of aggressiveness than Saumit Singh. Taking on Bollywood personalities is one thing but waging war against corporate giants is another. Saumit wrote numerous articles against corporate giants. I know for sure that some of them made the companies so uncomfortable that they hurled legal notices at him. In at least one of the cases, he was forced to apologise because he didn’t want to be dragged to a courtroom outside Delhi.

Saumit’s fearless blogs made news too. He made it to the front page of DNA when he made public, the conversations between Preity Zinta and Ness Wadia at the Wankhede Stadium, which led Preity to file a FIR of molestation against Wadia.

Saumit’s blog, about how he was told to drop a story about NSE, made headlines and “created a flutter in the media circles”.

Saumit wrote numerous such stories and in some of them he attacked senior editors of media houses quite blatantly. I would guess that further limited his scope of employment in some media houses. But he didn’t seem to care.

I am yet to see a public rebuttal to his stories. I don’t think in any of the stories, he had his facts wrong. I always believed that Saumit was doing very well given the nature of his journalism. His site had huge hits, in terms of page views. But this aggressive stance was also taking a toll on him. He was without a regular job for a while but there was nothing to believe that he was in any sort of crisis. He stopped writing regularly but we spoke off and on.

He admitted that he needed more funds for his website but he never said that he was suffering financially.  I briefly lost touch with him for about six months because I was going through a trying time myself and I was in between jobs, twice. I didn’t prepare myself for the shock that I was supposed to receive next.

On March 31st 2016, I received a message from his wife that Saumit has been admitted to Cosmos Institute of Mental Health and Behavioural Science at Vikas Marg, New Delhi. When I called Sushma, she told me that Saumit had been missing for two days and when he was finally found, a doctor advised that he be hospitalised immediately.

I send out WhatsApp messages to all common friends on my contact list, specially former colleagues of DNA with whom we have worked. I also asked Sushma to tell me if Saumit had any friends in the Mumbai page three circuit. I took down the names from her and sent out a message to them too.

Only three people responded positively and immediately — 1. Ayaz Memon 2. Parvez Damania and 3. Nandita Puri. All of them did whatever they could in that hour of crisis. Others just ignored my message.

Some of my journalist friends sent me a sad smiley in return and most of them didn’t even respond to the WhatsApp message even though I know that they had read it. The page three celebs about whom Saumit had written so many “positive” articles, couldn’t be less  bothered.

We tried to put out the message that he is sick and he needs help. Nobody, I repeat, nobody even responded to my call. In the end, thanks to Saumit’s family’s strong support, the crisis was over and Saumit came back home.

After Saumit came home, I made it a point to speak to him at least once every week. His wife told me that he is doing fine. Saumit told me that he is doing fine. But he was in depression. I spoke to him, convinced him to write for me again (so I can pay him some money through my company) but nothing seemed to be working. He was not willing to work.

I spoke to Sushma off and on and she said that she believes that Saumit will get over the phase soon. She expressed concern that nobody was calling him to find out how he was.  Yes this is true. Not a single person called him to find out how he is in the last few months when he needed these calls the most.

When I spoke to Saumit on June 30, he told me in a mocking tone that I too should stop calling him because “nobody cares”. I have never seen cases of severe depression before so I couldn’t recognise the obvious signs.

He killed himself a few days later. I know that all of you loved him (going by your social media posts) but none of you were there when he needed you the most. I appeal to every friend of his, who are posting tributes to social media to step forward and help his family.

Sushma is lucky that she has the help of her family members and Saumit’s family members. They are firmly lending their support to her. I am so happy that she has this protective ring around her. But we can do much more for him. If you want to make a difference, you can.

You may contact his wife Sushma and offer anything that might help them in this hour of need. I am again seeking help for Saumit. This time more openly and publicly. Only this time, I hope that at least some of you will respond. I am putting out this post with a few intimate details and asking for help with the permission of his wife.

His wife, Sushma, can be contacted at +91 98994 30161. Her email ID is sushama1976.singh@gmail.com

लेखक मयंक शेखर मशहूर फिल्म समीक्षक हैं.


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जिसकी तस्वीरें मुकेश अम्बानी और शाहरुख़ खान जैसों संग जगमगा रही हों, वह शख्स पैसे के अभाव में फांसी के फंदे से झूल गया!

एक था सोमू…. जिसकी तस्वीरें मुकेश अम्बानी, शाहरुख़ खान, आमिर खान जैसी नामी गिरामी हस्तियों और धनकुबेरों के साथ उसके फेसबुक प्रोफाइल पर जगमगा रही हों, वह शख्स पैसे के अभाव में गरीबी से घबरा के यूँ किसी असहाय और अनाथ शख्स की तरह फांसी के फंदे से झूल जाए तो भला कौन यक़ीन कर पायेगा। यही वजह है कि मुम्बई, दिल्ली और लखनऊ के बड़े बड़े अखबारों में बरसों तक वरिष्ठ पत्रकार और कॉलमिस्ट रह चुके बेहद हैंडसम, मिलनसार, जिंदादिल और सौम्य व्यवहार के सौमित सिंह की 40 बरस में उमर में ख़ुदकुशी से हुई मौत पर अभी भी उनके बहुत से मित्रों को यकीन नहीं हो पा रहा।

मगर त्रासदी यही है कि यही सच है। उसकी मौत के खबर आते ही सोशल मीडिया पर इस देश के छोटे बड़े अखबारों, टीवी चैनलों, वेब पोर्टल के पत्रकारों, संपादकों, फ़िल्मी और उद्योग जगत की कई हस्तियों ने दुःख जताना शुरू कर दिया। एक दो को छोड़कर हर किसी ने रस्मी तौर पर उसकी तारीफों के पुल बाँध दिए, उसकी मदद न कर पाने पर अफ़सोस जताया। एक बड़े अखबार से उसकी नौकरी छूटने के बाद से लेकर उसके मरने तक के पिछले महज दो ढाई साल के संघर्ष में उसके इतना अकेले पड़ जाने पर लोगों ने हैरानी भी जताई।

मगर मुझे कोई हैरानी नहीं है। क्योंकि मीडिया ने बहुतों की जान ऐसे ही ले ली है। मैं खुद मीडिया के इसी जानलेवा पेशे से अपनी जान छुड़ा कर 2011 में भाग चुका हूँ और इन दिनों अपने बिज़नस में जूझ रहा हूँ। सौमित, जिसे मैं अपनी क्लास 6th की उमर से सोमू के नाम से जानता हूँ, मेरा बचपन का बहुत करीबी दोस्त था। मगर हमारा साथ मेरे क्लास 12th पास करने के बाद बहुत कम रह गया था।

मैं पढाई और नौकरी के सिलसिले में जब इलाहाबाद से लेकर दिल्ली का सफ़र कर रहा था, तभी मुझे पता चला कि सोमू लखनऊ में पायनियर में पत्रकार हो गया था। मेरी गाहे बगाहे उससे बात मुलाक़ात हो जाती थी मगर नियमित संपर्क नहीं था। फिर मैं भी दुर्भाग्य से इसी पेशे में आ गया। दिल्ली में जैसे ही टाइम्स समूह से मैंने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की तो उसी समय प्रेस क्लब में हुई एक मुलाक़ात में मुझे पता चला कि सोमू भी अब दिल्ली में ही है। फिर कई बार मेरी उसकी मयकशी की देर रात की महफ़िलें जमीं, कभी दिल्ली के प्रैस क्लब में, कभी उसके नए ख़रीदे फ्लैट में तो कभी कभी लखनऊ में भी।

उसका वह चमकदार दौर था। वह बहुत खुश रहता था और जिंदादिली से जी रहा था। हालांकि 2007 आते आते तक खुद मेरा जी मीडिया से घबराने लगा था। ऐसा भी नहीं था कि मेरा कैरियर का ग्राफ गिर रहा था बल्कि उस दौर में तो वह बढ़ ही रहा था। टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह, हिंदुस्तान टाइम्स समूह से होते हुए बिज़नस स्टैण्डर्ड आते आते तक मेरी पोस्ट और सैलरी में काफी इजाफा हुआ भी था। फिर भी गुटबाजी, जातिवाद, क्षेत्रवाद, चमचागिरी, एक दूसरे के प्रति बर्बाद कर देने तक का द्वेष, भेदभाव और सबसे बड़ी बात नौकरी पर हमेशा लटकती तलवार के चलते मैं बहुत परेशान रहने लगा था। संपादकों और अपने बॉसेस के अहंकारी स्वाभाव और अपने सहकर्मियों में कौन दुश्मन है कौन दोस्त इसको लेकर बढ़ता दिन रात का तनाव चैन से जीने ही नहीं दे रहा था। फिर मैंने घबरा कर 2011 में मीडिया को अलविदा कह दिया। तब सोमू अपने जीवन के बेहतरीन दौर में था और बहुत संतुष्ट भी रहता था। मैं तो खैर वापस लखनऊ ही लौट आया, कुछ भी छोटा मोटा काम करके शान्ति से जिंदगी बिताने की चाह लिए।

उसी लखनऊ में जहां मेरी सोमू से तब मुलाक़ात हुई थी, जब मेरे पिताजी ने एक किराए का छोटा सा मकान लिया था और मेरा एडमिशन उन्होंने लखनऊ के उस समय में सबसे प्रतिष्ठित स्कूल महानगर बॉयज में क्लास 6th में कराया था। बहुत ही पॉश कॉलोनी में मेरे किराए के घर के सामने एक 10-15 हजार वर्गफीट में बनी आलीशान कोठी थी, जिसमे संयोग से अपना सोमू ही न सिर्फ रहता था बल्कि मेरे ही स्कूल में एक ही क्लास मगर अलग सेक्शन में पढता भी था। इसी वजह से हम दोनों बच्चों में गहरी दोस्ती भी हो गयी। मेरे पिता गाँव से पढ़कर निकले थे और लखनऊ में सरकारी विभाग में इंजीनियर थे। इसलिए मेरा परिवेश गांव और शहर का मिक्स था मगर सोमू एकदम अंग्रेजीदां और संपन्न घराने का बच्चा था।

वह कुछ ही समय पहले ढाका से आया था, जहां उसके नाना वर्ल्ड बैंक में थे। उसने अपना बचपन नाना नानी के यहाँ बिताया था फिर मेरे घर के सामने रहने वाले अपने मामा मामी के विशाल घर में आ गया था। उसके मामा बहुत पैसे वाले थे। विदेशी कार और सोमू के बर्थडे की भव्य पार्टियों समेत उनके रहन सहन से तो मुझे यही लगता था। सोमू के माता पिता कौन थे, क्या थे और वह क्यों शुरू से अपने नाना नानी और मामा मामी के यहाँ रहा, इसकी मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है। हाँ, शायद 9th या 10th क्लास के आसपास वह मुझे अपने मम्मी पापा से मिलाने ले गया था, जो कि कानपुर में एक छोटे से मकान में रहते थे। यहीं वह भी उसी दौर में रहने लगा था।

मैंने आधुनिकता के सारे तौर तरीके उसी से सीखे थे। टेबल टेनिस जैसा खेल हो या अंग्रेजी की कॉमिक्स किताबें पढ़ना, अंग्रेजी म्यूजिक-गाने, पहनावा सब सोमू को देख देख कर ही 9वीं-10वीं क्लास तक मैंने भी सीख लिया था। शायद यही वजह है कि धन के अभाव में ख़ुदकुशी कर लेने की खबर आने तक जीवन भर सोमू की मेरे दिलो दिमाग में ऐसी ही छवि थी कि वह न बहुत अभिजात्य वर्ग से है, जहां पैसा कोई समस्या ही नहीं है। तभी तो मैं कभी सपने में भी सोच नहीं पाया कि उसके इतने रसूखदार या धनाढ्य संपर्कों या नाते रिश्तेदारों के चलते या इतने बरसों तक उसके इतने अच्छे पदों पर नौकरी करते रहने के बावजूद वह इस कदर अकेला और अभावग्रस्त हो जाएगा।

मैं आज भी नहीं जानता कि उसके साथ ऐसा कैसे हुआ। मेरे मन औरों की तरह बहुत से सवाल है, मसलन क्यों वह इतने कम अरसे में ही इतना अकेला और अभावग्रस्त हो गया? कहाँ चले गए उसके सारे मददगार, दोस्त या रिश्तेदार? या क्यों वह अपने लिए इतने पैसे भी नहीं जोड़ पाया या कहीं चल अचल सम्पत्ति ले पाया, जिसे बेच कर दो ढाई साल तक वह बिना किसी के सामने हाथ पसारे जीवन यापन कर पाये? माना कि नौकरी छूटने के बाद शुरू की गयी उसकी वेबसाइट फेल हो गयी मगर क्यों उसे लगने लगा कि अब सब ख़त्म हो गया? क्यों उसने ये नहीं सोचा कि वह लखनऊ जैसे छोटे शहर में ही लौट जाए, जहाँ वह फिर से पत्रकारिता या फिर कुछ भी छोटा मोटा करके अपनी बाकी की जिंदगी चैन और शान्ति से गुजार सकता है? जैसे कि उसके बाकी के ढेरों दोस्त कर ही रहे हैं। यहां चकाचौंध और बड़ी बड़ी सफलताएं या नाम नहीं है, मगर चंद रिश्ते नाते और दोस्त तो हैं।

मुझे ये पता है कि अब ये सवाल हमेशा मेरे लिए सवाल ही रह जाएंगे क्योंकि इनका जवाब देने वाला मेरा बचपन का दोस्त मुझे रूठकर हमेशा के लिए इस दुनिया से ही चला गया है। उसका रूठना लाजिमी भी है। मैंने बहुत बड़ी गलती की, जो सिर्फ सोशल मीडिया और पुरानी जिंदगी के जरिये ही उसकी खुशहाल जिंदगी का भ्रम पाले रहा और कभी उससे पूछ ही नहीं पाया कि भाई कैसे हो। 2011 के बाद से अपनी नौकरी छोड़ने रियल एस्टेट कंपनी शुरू करने से लेकर अब तक चले अपने जीवन के झंझावातों में  मैं खुद भी इतना घिरा रहा कि कभी व्हाट्सएप्प या फोन पर भी मैंने उससे बचपन के दोस्त के नाते उसके सुख दुःख नहीं जाने।

2014 के बाद से अपनी वेबसाइट फेल होने के बाद से ही वह संकटों में घिरने लगा था मगर दुर्भाग्य से 2015 या 16 में मेरी न तो उससे एक बार भी मुलाक़ात हो पायी और न ही कभी फ़ोन पर बात हो पायी। हाँ, फेसबुक पर उसने 2015 में मेरे एक बार स्वाइन फ्लू होने की पोस्ट पर चिंता जताते हुए लिखा था कि भाई अपना ध्यान रखना।

मैंने तो अपना ध्यान रखा मेरे भाई मगर तुमने क्यों नहीं रखा? क्यों नहीं ध्यान रखा अपने छोटे छोटे बच्चों और बीबी का? क्यों जिंदगी से अचानक हार गए?

दो दिन पहले तुम्हारी मौत की हतप्रभ कर देने वाली खबर सुनी। एक दिन बहुत हल्ला और दुःख जताने वालों की चीखें सुनीं। मगर अब सब खामोश हो गए। अपनी अपनी जिंदगी में फिर से यूँ ही मगन हो गए, जैसे तब थे, जब तुम संघर्ष करके लगातार मौत की ओर बढ़ रहे थे।

मुझसे भारी गलती हुई जो मैंने अपने अनवरत चलने वाले संघर्षों में डूब कर तुमसे कभी तुम्हारा सुख दुःख नहीं पूछा। शायद तुम्हे मेरी याद नहीं थी या ये भरोसा नहीं था कि मैं तुम्हारे कुछ काम आ सकूँगा, इसीलिए तो तुमने मुझसे कभी कोई मदद नहीं मांगी न अपना दुःख बताया। सुचित्रा कृष्णमूर्ति जैसी मशहूर हस्ती की तरह मैं ये भी नहीं कह रहा कि एक फ़ोन ही कर दिया होता। तुम्हारे अलविदा कहने के बाद कल मुझे पुराने दोस्तों से ही पता चला कि तुमने उनसे पिछले महीने फ़ोन करके कुछ हजार रुपये मांगे थे अपने मेडिकल बिल चुकाने के लिए।

तुम्हारे जाने का दुःख तो है ही मगर इस बात का भी गहरा दुःख है मुझे कि तुम इस कदर टूटते गए, हारते गए और मैं जान तक नहीं पाया। पता नहीं पैसे रुपये से मैं तुम्हारे कितने काम आ पाता मगर मुझे इतना पता है कि अगर तुम्हारे ऐसे घनघोर दुःख का ज़रा भी अंदाजा होता तो मैं बचपन के दोस्त होने का पूरा फर्ज निभाता और तुम्हारा मनोबल न टूटने पाये, इसके लिए जी जान लगा देता। मन के हारे हार है और तुम मन से हार गए सोमू। वरना दुनिया में इतनी क़ुव्वत ही नहीं है, जो तुम जैसे जिंदादिल और बहादुर इंसान को हरा सके। मैं तुम्हे यही समझाता सोमू कि बहुत रास्ते हैं दुनिया में जीने के। जब तक शरीर काम करने लायक है, तब तक कुछ भी करो मगर जिन्दा रहो। झोपडी में भी रहकर अपने बच्चों को पालेगो तो भी कभी न कभी हालात फिर बदल ही जाएंगे मगर यूँ दुनिया ही छोड़ कर चले जाओगे तो उन बच्चों का क्या भविष्य होगा?

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। अब मेरे जैसे तुम्हारे कई दोस्त, हितैषी, नाते रिश्तेदार झूठे सच्चे आंसू बहा रहे है, दुःख जता रहे हैं, अपने अपने कारण-किस्से बता रहे हैं कि क्यों वह तुम्हे बचा नहीं पाये, क्यों उन्होंने तुम्हारा साथ नहीं दिया, क्यों तुम अकेले पड़ गए। लेकिन अब कड़वी हकीकत यही है कि तुम्हारे पीछे तुम्हारे बच्चे और बीबी अंधकारमय भविष्य की ओर चल पड़े हैं। और तुम…..माना कि बहुत बड़े खबरनवीस थे। बड़ी बड़ी ख़बरें तुमने ब्रेक कीं, जिनकी टीआरपी जबरदस्त थी…. मगर तुम्हारी जिंदगी में तो कोई टीआरपी नहीं है मेरे दोस्त….. तुम्हारी दर्दनाक ख़ुदकुशी में भी नहीं। इसलिए किसी के लिए खबर भी नहीं हो। हाँ, मेरे जैसे चंद लोग जरूर कुछ दिनों और यही किस्सा सुनाएंगे कि ……. एक था सोमू।

लेखक अश्विनी कुमार श्रीवास्तव आईआईएमसी से प्रशिक्षित, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान और बिज़नस स्टैण्डर्ड जैसे अखबारों में दिल्ली में 12 साल तक पत्रकारिता कर चुके हैं. फिलहाल अपने गृह नगर लखनऊ में अपना व्यवसाय कर रहे हैं. अश्विनी से संपर्क srivastava.ashwani@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. 

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…यूं ही सौमित सिंह की तरह आत्महत्या कर मरते रहेंगे पत्रकार!

पूर्वी दिल्ली के मधु विहार स्थित अपने आवास पर सोमवार की सुबह एक फ्रीलांस जर्नलिस्ट सौमित सिंह ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। खबर को जब मैंने फेसबुक पर इस स्टेटस के साथ शेयर किया…

”ध्वस्त हो चुकी पत्रकारिता की दुनिया में वाकई सर्वाइव करना बेहद मुश्किल है। कनेक्शन से कलेक्शन होता है यहां। दुनिया भर की औपचारिकताओं में बांधकर काबिलियत को जमींदोज करके कीमत तय की जाती है। और मां-बहन हो चुकी उस कीमत को जानकर दर्द होता है उसमें आप नवरत्न तेल खरीदिए..रोज सिर पर मलिए तो शायद ठंडक आपको कुछ राहत दे। फिर जब आप किसी दूसरे संस्थान की ओर पलायन करने की सोचते हैं तो आपकी विचारधारा काफी मायने रखती है। इसके इतर सैलरी स्लिप। अगर नहीं तो फिर से चंपादक अलग अलग तरह से आंकलन करते हैं। और शोषण आपको अवसाद का रास्ता दिखा देता है। पत्रकारिता की दुनिया के अलग ही दर्द हैं, जिसे न कोई सुनता है, न समझता है। हां ये जरूर देखता है कि आपमें कुत्ते बनने की काबिलियत है या नहीं। नहीं तो आपको कोई टायरों के नीचे कुचलने वाला है।”

मेरे इस स्टेटस पर कई कमेंट्स आए। इसमें से एक कमेंट ऐसा भी था जिसमें कहा गया था कि हर कोई रवीश कुमार नहीं बनता। चलिए ये मान लिया मैंने और मैं कोई रवीश कुमार सरीखे बनने को कह भी नहीं कह रहा क्योंकि वो अंधेरा दिखा देते हैं तो भी लोग वाह-वाह करते हैं, कुछ नया बताने लगते हैं लेकिन वहीं जब एक शुरूआती पत्रकार रवीश कुमार से भी बड़ा करता है तो भी उसको तवज्जो नहीं दी जाती। वजह है उसका कद। उसकी कीमत। समाज का एक बड़ा हिस्सा अपनी अपनी सुविधा के अनुसार बेहतर पत्रकार और घटिया पत्रकार, बिकाऊ पत्रकार और टिकाऊ पत्रकार, रंगबाज पत्रकार, लफ्फाज पत्रकार चुन चुका है। जो अब तैयार हो रहे हैं उनके के लिए कोई जगह नहीं। क्योंकि उन्हें इस बात के आधार पर नजरंदाज कर दिया जाता है कि इन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है।

लेकिन साहब आपको बता दूं कि रवीश कुमार भी गर्भ से सीखकर नहीं आए। न ही दीपक चौरसिया, दो साल की उम्र इतनी जोर जोर से चिल्लाते हुए आसाराम पर डीबेट करते थे। यहां तक कि पुण्य प्रसून वाजपेई जी भी सत्ता के गलियारे के परिचित जन्म लेने के तुरंत बाद से ही नहीं हो गए थे। पत्रकारिता घिस घिसकर परचून की दुकान बन चुकी है। सबको अपना हल्दी धनिया बेचना है। नहीं बिक रहा तो गरम मसाले के तौर पर मॉल फंक्शन का शिकार, क्लीवेज आदि बातों से खबर बनाकर परोस दी जाती हैं।

आज खुद को नंबर वन बताने वाला कोई भी समाचार पत्र उठाकर देख लीजिए…बाबा बंगाली, टॉवर लगवाएं एक लाख रूपये रेंट मिलेगा आदि आदि विज्ञापन तो होता है और पूरा फायदा जाता है मालिकान को। मैं ये नहीं कह रहा कि फायदा लेना गलत है लेकिन साहब जी तोड़ मेहनत करने वालों के लिए भी नमक की व्यवस्था तो करा ही दीजिए, पुराने पत्रकारों के पास अनुभव माना जाता है…चाहे हों बड़ी सी कटोरी जो कि खाली है। आज रिज्यूमे भेजिए तो कूड़े के भाव जाता है। होता जुगाड़ के आधार पर है। तो मृत्यु कम उम्र में ही दिमाग में उपज जाती है और झूल जाती हैं सारी उम्मीदें, आशाएं, अपेक्षाएं। सच कहूं तो पत्रकारिता में भी जमीनी बदलावों की जरूरत है। अगर नहीं होते हैं तो मरते रहिए, आज आप कल हम…..और आने वाली पीढ़ी भी।

हिमांशु तिवारी आत्मीय
पत्रकार
himanshujimmc19@gmail.com

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हे विक्रम राव, फ्रांस की बातें बाद में कर लेना, पहले आत्महत्या करने वाले बुजुर्ग पत्रकार त्रिपाठी जी की सुध तो ले लो

पता चला है कि मई दिवस पर IFWJ की रैली में जुटेंगे 1200 श्रमजीवी पत्रकार और के. विक्रम राव होंगे मुख्य वक्ता…. इनसे मेरा कहना है कि पहले मलिहाबाद तो जाओ, फिर कर लेना फ्रांस की बातें… लखनऊ में नाका थाना क्षेत्र में आर्थिक तंगी के चलते वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर त्रिपाठी (74) ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी. श्री त्रिपाठी नव जीवन अख़बार में काम करते थे उसके बंद होने के बाद से इनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. लेकिन इन पत्रकार नेताओं को कभी फुर्सत नहीं मिली कि वे ऐसे पीड़ित और गरीब पत्रकारों की सुध लेते.

दिवंगत बुजुर्ग / वरिष्ठ पत्रकार के घर या घाट पर पांच पत्रकार भी नजर नहीं आये. कहने को लखनऊ में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार संगठन और पत्रकार नेता खूब सक्रिय हैं. पत्रकारों के हितों की आवाज उठाने के लिये दुनियाभर में भव्य कार्यक्रम कराते हैं. अब एक मई को सुनिएगा बड़ी-बड़ी बातें. इन दिनों सत्ताधारियों को इकट्ठा करने का कार्य प्रगति पर है. कोई पत्रकार आर्थिक तंगी से मरे या भूखा मर जाये, हमारी बला से. हम तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं. खुदा ना खास्ता किसी बड़े न्यूज चैनल / अखबार के नामी गिरामी / संपन्न पत्रकार का देहांत होता तो लाइन लग जाती. क्योंकि वहाँ बड़े नेताओं / अधिकारियों के पहुँचने की उम्मीद होती, इनसे मिलन हो जाता, चेहरा दिखा देते, हाथ मिला लेते. लेकिन त्रिपाठी जी जैसे गरीब पत्रकार के आत्महत्या करने पर कोई पत्रकार घर या घाट पर नहीं जाएगा… लखनऊ के पत्रकार भाई लोग बहुत आगे की सोचते हो… यही है लखनऊ की दलाल पत्रकारिता का सच…

त्रिपाठी जी जैसे पत्रकारों को आत्महत्या इसलिए करना पड़ता है क्योंकि उनको दी जाने वाली सुविधाओं का हक पत्रकार नेता लोग हजम कर जाते हैं… जिस लखनऊ के पत्रकार संगठन / पत्रकार नेता दुनियाभर मे पत्रकारों के हितों के लिये भव्य आयोजन / सम्मेलन कर रहे हैं, बतौर पत्रकार नेता प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियो से मिलने की होड है, आपस में मारामारी हो रही है, उसी शहर के असली / वरिष्ठ / बुजुर्ग पत्रकार भूखों मर रहे हैं, आर्थिक तंगी और तमाम परेशानियों से परेशान होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं लेकिन कोई पत्रकार नेता / पत्रकार संगठन इसका संज्ञान नहीं ले रहा है… ऐसे दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं।

नवेद शिकोह 
वाट्सअप- 8090180256
मोबाइल- 9369670660 
Navedshikoh84@Gmail.Com

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मुस्लिम लड़के से प्यार में धोखा खाई तो मरने के पहले पूरे कौम को कमीना बता गई (पढ़ें पत्र)

Sanjay Tiwari : वह दलित होकर भी वेमुला नहीं थी। न ही अखलाक हो पायी थी। आनंदी होती तो टीवी रोता। सोशल मीडिया भी निंदा ही करता लेकिन उसका दुर्भाग्य यह था कि वह न रोहित थी, न टीवी की आनंदी, इसलिए बिहार के एक जिले में सिंगल कॉलम की खबर बनकर रह गयी। लेकिन पूनम भारती की मौत का एक संदेश है। उसी तरह का संदेश जैसे रोहित वेमुला की मौत में एक संदेश था। पूनम भारती एक ऐसे झूठे फरेब का शिकार हुई जिससे वह प्यार के आवेग में बच नहीं पायी।

बिहार में जहानाबाद की पूनम भारती जिस कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ने जाती थी वहां जाल बिछाये एक बहेलिये ने उसे फंसा लिया। “प्यार” के इस फंदे में फंसकर पूनम वहां तक चली गयी जहां कोई लड़की शादी से पहले जाने से बचती है। लेकिन जहांगीर ने तो उसे अपनी पत्नी बता ही दिया था लिहाजा जहांगीर ने उसे बिना शादी के “पेट” से कर दिया। यहां से आगे का रास्ता पूनम के लिए या तो जहांगीर के साथ जाता था, नहीं तो फिर कहीं नहीं जाता था। पूनम ने घर में कुछ भी नहीं बताया था कि वह एक ऐसे लड़के के प्यार में पड़ चुकी है जो उसकी जाति और धर्म का नहीं था। पेट का बच्चा गिराकर जहांगीर उसका साथ पहले ही छोड़ चुका था। इसके बाद वह कहां जाती? उसने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी और पटना गया रेलवे लाइन को अपनी जिन्दगी का आखिरी मुकाम बना लिया।

उसने जो चिट्ठी लिखी है उसमें एक पूरी कौम को कसूरवार ठहराया है। “मियां जात कमीना होता है। इसकी जुबान पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए।” रोहित वेमूला की तरह पूनम दलित होकर भी किसी ब्राह्मणवाद का शिकार नहीं हुई है। वह एक और वाद का शिकार हुई है जिसकी बुनियाद में ऐसे मौलवी और उनकी मानसिक संतान बैठे हुए हैं जो एक खास किस्म के “जिहाद” पर है। यह “जिहाद” एक मुशरिक को “पाक” बनाने की प्रक्रिया है। पूनम भारती शायद इसी मानसिकता का शिकार हो गयी। अगर ऐसा न होता तो इतनी बड़ी बात वह कभी न लिखती कि “मियां जात” पर कभी भरोसा मत करना।

लेकिन पूनम भारती की मौत पर सवाल के सारे दरवाजे हमारी बौद्धिक दुनिया ने “लव जिहाद का झूठा प्रलाप” बताकर पहले ही बंद कर दिया है। हमारे समय की त्रासदी यही है कि हमने धोखा, फरेब और मौत का भी मजहबीकरण कर दिया है। ऐसे हालात में पूनमों के हिस्से में भले ही मौत हो लेकिन जहांगीरों के हिस्से में पूरी आजादी है। वे जो चाहें कर सकते हैं उसको बौद्धिक संरक्षण देनेवाले लोग दो मिनट का मौन तो रखेंगे लेकिन श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं बल्कि चुप्पी साधने के लिए।

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Shahnawaz Malik : दिल्ली में हर दिन शादी का झांसा देकर रेप और ख़ुदकुशी की कहानी छपती है। आरोपी सारे तिवारी शर्मा होते हैं। ख़ैर नफ़रत कम फैलाएं वरना इतिहास में नफ़रत फ़ैलाने वालों में.

Gaurav Sharma : Shehnawaj ji Delhi main Ek bhi crime ki khabar dikhao Jis main koi musalman na ho.

Shahnawaz Malik : शर्माजी…या तो रिकॉर्ड खंगालिए या फिर योगा करिए

Saurabh Dwivedi : इतिहास में नफरत फ़िलहाल एक ही कौम फैलाती आई और फैलाती रहेगी. रोज़ हज़ारो लाखो मासूमो को अपना निशाना बना कर कभी सुसाइड बॉम्बर बन के तो कभी आतंकवादी हमले करके उससे भी जी नहीं भरा तो लव जिहाद पे उतारू है

Shahnawaz Malik : तिवारीजी की वाल पर ट्रैफिक का स्टैंडर्ड काफी लो है। रेटोरिक कब तक करेंगे।

राकेश कुमार मिश्रा : कोई आवाज़ नहीं उठेगी कहीं से। अगर कोई विरोध करेगा भी तो उसे सेक्यूलर लोग संघी कह कर दो समुदायों में दरार पैदा करने की साज़िश कह कर ख़ारिज कर देंगे। वैसे मुझे इस लड़की के साथ कोई सहानुभूति नहीं है। अवैध सम्बन्ध बनाते समय तो इसने कुछ नहीं सोचा अपने माँ बाप और परिवार की इज़्ज़त के बारे में और लेटर में लेक्चर झाड़ रही है।

Yusuf Ansari : संजय भाई, आपने पूनम की आवाज बुलंद करके अच्छाी काम किया है। मरने वाले का बयान सच्चा माना जाता है। मैं भी चाहता हूं कि पूनम को खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाले को सज़ा मिले। मैं भी आपकी पोस्ट शेयर कर रहा हूं।

Shahnawaz Malik : यूसुफ़ साब…दिल्ली समेत पूरे देश में हर दिन इसी तरह के रेप और मर्डर के मामले होते हैं, आप उसे क्यूं नहीं शेयर करते?

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, मैं न्याय के पक्ष में हूं और अन्याय के ख़िलाफ़। मेरा मानना है कि सबको इंसाफ़ मिलनमा चाहिए। बग़ौर घार्मिक और जातीय भेदभाव के। मैंने पहले भी ऐसी कई पोस्ट शेयर की हैं। आगे भी करूंगा। आपने याद दिलाया है तो और ज़्यादा ध्यान रखूंगा।

Shahnawaz Malik : न्याय के पक्ष में कौन नहीं है। तिवारी की इस पोस्ट में घृणा है और तर्क सारे खोखले। रोहित या अख़लाक़ अपनी पहचान की वजह से मारे गए, जबकि इस मामले में ऐसा नहीं है। रेप और मर्डर के सामान्य केस में जाति और धर्म जोड़ने से न्याय होगा या नहीं लेकिन अन्याय ज़रूर होगा।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, आपकी बात सही है। लेकिन क्या सिर्फ़ इसी वजह से हम इंसाफ के लिए आवाज़ छोड़ देें। पूनम को प्यार में धोखा मिला है। ये धोखा उसे जहंगीर की जगह कोई जसबीर भई दे सकता था। उसके साथ नाइंसाफ़ी तो ङुई है।

Shahnawaz Malik : ये एक नॉर्मल क्राइम है जो दिल्ली और देश के हर कोने में हर दिन होता है। आप आवाज़ उठाएंगे तो मैं पूछूँगा कि बाक़ियों के लिए क्यों नहीं उठाया। तिवारी का तो मकसद समझ आता है क्योंकि इसमें आरोपी मुस्लिम है। ये लोग दिनभर यही करते हैं।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, सबके लिए इंसा की आवाज उठनी ही चाहिए। हम हिंदू और मुसलमान छोड़कर इंसान की बात करें तो बेहतर है।

Shahnawaz Malik : काश आप जैसा तिवारी महाशय भी सोचते। मैं इस लड़की के लिए आवाज़ फिर भी उठा सकता हूँ लेकिन ये पोस्ट नहीं शेयर करूँगा।

Yusuf Ansari : हमें शुरुआत अपने से करनी चाहिए। हमने शुरुआत कर दी है। इंशाल्लाह नतीजे अच्छे ही होंगे। Shahnawaz Malik भाई, कोई बात नहीं आप आवाज़ उठाइए। पोस्ट शेयर मत कीजिए। आपकी आवाज़ यहीं से दूक तर जाएगी।

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सूखे और कर्ज की मार झेल रहे यूपी के एक किसान ने नातिन की शादी से हफ्ते भर पहले कर लिया सुसाइड

सूखे से तप रहे यूपी के बेहाल बुंदेलखंड में किसान के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं है शायद! इस मृतक किसान को नातिन की शादी करनी थी। धन का प्रबन्ध नही कर पाया तो ‘मेरा चोला हो लाल बसंती, सूख रही बुन्देली धरती’ कहते फांसी पर झूल गया! इसने बैंक से क्रेडिट कार्ड का 50 हजार का कर्ज लिया था जो चुकता नहीं हुआ!

झाँसी के समथर क्षेत्र के इस किसान की मौत पर भारतीय किसान यूनियन (भानु) के शिवनारायण सिंह परिहार (बुंदेलखंड अध्यक्ष) कहते है कि 16 अप्रैल को इसके नातिन की शादी है, दुर्भाग्य है इस किसान का शव ऐसे ही 5 घण्टे लटका रहा मगर स्थानीय प्रसाशन नहीं आया… देखिये यह फंदा आजाद देश के महान कृषि प्रधान अन्नदाता ने गले में डाला है, वो आप सबका मेक इन इंडिया करने की मांग कर रहा है.

बुंदेलखंड के सोशल एक्टिविस्ट आशीष सागर के फेसबुक वॉल से.

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इसलिए लड़के आत्महत्या नहीं करते, लड़कियां कर लेती हैं

प्रत्यूशा की मौत के बहाने : मरने वाली लड़की ही क्यों?

Sanjaya Kumar Singh : मैंने किसानों की आत्महत्या पर नहीं लिखा, डेल्टा मेघवाल की मौत पर भी नहीं लिखा लेकिन प्रत्यूशा बनर्जी की मौत पर लिख रहा हूं। कारण इसी में है फिर भी ना समझ में आए तो उसपर फिर कभी बात कर लेंगे। फिलहाल प्रत्यूशा और उसके जैसी अभिनेत्रियों की मौत के कारणों को समझने की कोशिश करते हैं। जो छोटे शहरों से निकलकर बड़ा काम करती है। शोहरत और पैसा कमाती हैं, सब ठीक-ठाक चल रहा होता है और अचानक पता चलता है कि उसकी मौत हो गई (आत्महत्या कर ली, हत्या हो गई या शीना बोरा की तरह) या गायब हो गई। कारण हर तरह के हैं, होते हैं लेकिन प्रेम संबंध, पति, प्रेमी, आशिक, ब्वायफ्रेंड की भूमिका भी सामने आती है और कुछ मामले खुलते हैं, कुछ नहीं खुलते हैं। मरने वाली बदनाम जरूरी होती है या कर दी जाती है। मीडिया ट्रायल की अलग समस्या है। जो तुरंत बंद होना चाहिए पर वह हमारे हाथ में नहीं है। Continue reading

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दैनिक जागरण प्रबंधन की प्रताड़ना से परेशान और मजीठिया वेज बोर्ड न मिलने से दुखी मीडियाकर्मी ने आत्महत्या की

लुधियाना से एक बुरी खबर आ रही है. पता चला है कि दो दशक से ज्यादा समय से दैनिक जागरण के साथ कार्यरत मीडियाकर्मी अतुल सक्सेना ने आत्महत्या कर लिया है. कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि उन्हें जहर देकर मारा गया है क्योंकि उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड का केस वापस लेने के प्रबंधन के दबाव में आने से इनकार कर दिया था. अतुल ने मजीठिया वेज बोर्ड का हक पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में केस कर रखा था और इस मामले में फैसला आने में हो रही देरी से दुखी थे. उन पर दैनिक जागरण प्रबंधन लगातार दबाव बनाए हुए था कि वह केस वापस लें अन्यथा उनका दूरदराज तबादला कर दिया जाएगा.

अतुल दैनिक जागरण लुधियाना में दो दशक से ज्यादा समय से पीटीएस डिपार्टमेंट में कार्यरत थे. अतुल की पूरी गृहस्थी लुधियाना में सेटल है. उनकी पत्नी म्यूजिक टीचर के रूप में शहर के एक स्कूल में कार्यरत हैं. जागरण प्रबंधन के लगातार दबाव बनाने और मजीठिया वेज बोर्ड के तहत लाभ न दिए जाने से दुखी अतुल सक्सेना करीब पंद्रह दिनों से घर बैठे हुए थे. वे प्रबंधन के दबाव व प्रताड़ना से बेहद परेशान और डरे हुए थे. बताया जाता है कि उन्होंने कल घरवालों से कहा था कि वह अगले दिन यानि आज दैनिक जागरण आफिस जाकर इस्तीफा दे देंगे. उनकी पत्नी रोजाना की तरह आज स्कूल पढ़ाने चली गई थीं. जब वह शाम को लौटीं थी अतुल सक्सेना बेहोश हालत में मिले.

उन्हें तुरंत दयानंद मेडिकल कालेज ले जाया गया जहां डाक्टर उन्हें बचा नहीं सके. उन्हें जहर देकर मारा गया या उन्होंने खुद जहर खाया, यह पता नहीं चल पाया है. उनकी बाडी को फिलहाल मेडिकल कालेज के पोस्टमार्टम हाउस में रखा गया है. दैनिक जागरण प्रबंधन के लोग इस मामले में लीपापोती के लिए सक्रिय हो चुके हैं. वहीं दैनिक जागरण कर्मियों की यूनियन के लोग भी अतुल सक्सेना के घर के लिए रवाना हो चुके हैं. मीडिया एक्टिविस्ट और पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव भी दिल्ली से लुधियाना के लिए चल चुके हैं. अभिषेक ने बताया कि अभी तक जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक ये सारा मामला पुलिस केस का है. इस आत्महत्या या हत्या जो भी है, के लिए पूरी तरह दैनिक जागरण प्रबंधन जिम्मेदार है.

ज्ञात हो कि दैनिक जागरण प्रबंधन ने हरियाणा, पंजाब और दिल्ली-नोएडा के सैकड़ों मीडियाकर्मियों को नौकरी से इसलिए बर्खास्त कर दिया है क्योंकि उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी व अन्य लाभ पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में मानहानि का केस कर रखा है. दर्जनों ऐसे लोग जो अब भी जागरण में नौकरी कर रहे हैं, उन्हें केस वापस लेने हेतु प्रबंधन के बनाए फार्मेट पर हस्ताक्षर करने या फिर तबादले जैसी प्रताड़ना झेलने को मजबूर होना पड़ रहा है. इसी किस्म की प्रताड़ना अतुल सक्सेना झेल रहे थे. वह अत्यधिक दबाव, प्रताड़ना, उपेक्षा और अलगाव झेल नहीं पाए.

दैनिक जागरण लुधियाना के मीडियाकर्मियों का कहना है कि इस खून के लिए पूरी तरह दैनिक जागरण प्रबंधन जिम्मेदार है. दैनिक जागरण कर्मचारी यूनियन के लोग जल्द इस पूरे प्रकरण पर अपनी जांच रिपोर्ट जारी करने वाले हैं और आगे की कार्रवाई का ऐलान करने वाले हैं.

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अतुल सक्सेना के खून के छींटे जागरण के मालिकों के माथे से लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्याय के तराजू और नरेंद्र मोदी के अच्छे दिनों के नारे तक पर पड़े हैं

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फिर बन रही वेमुला प्रकरण जैसी भूमिका, हतास आइसा अध्यक्ष बोले- सपने धरे रह गये

लखनऊ : इन दिनों लखनऊ विश्वविद्यालय में वेमुला जैसे प्रकरण की भूमिका पूर्ण तैयार नजर आ रही है। आइसा के प्रदेश अध्यक्ष सुधांशु बाजपेई के सोसल मीडिया पर वायरल हुए एक संदेश से मामला बेहद गंभीर नजर आ रहा है। मामले के बारे में हमने पड़ताल करने के लिए आइसा के प्रदेश अध्यक्ष से सीधे संपर्क किया तो उनका जवाब था “मेरा एक साल बर्बाद हो गया मै पी॰ एच॰ डी॰ करना चाहता था, लेकिन सारे सपने धरे रह गए अब समझ में आया वेमुला कैसे बनते हैं।”

जो मामला लखनऊ विश्वविद्यालय में उठा है वह वेमुला प्रकरण से बहुत हद तक मेल खाता है। इस मामले में भी पाँच छात्र निष्कासित हैं जिनमे दो दलित छात्र हैं एक ओबीसी और दो सवर्ण हैं। वेमुला के प्रकरण में मामला अगर केंद्रीय मंत्री को भेजा गया था तो यहा यह प्रकरण राज्यपाल तक पहुच चुका है। अगर निष्काषित छात्रों का पक्ष सुना जाये तो यहाँ पर भी छात्र संगठन एबीवीपी ही इसका मुख्य कारण है। समाज कई वर्गों में बटता नजर आ रहा है इनमे से  एक वर्ग के अनुसार विश्वविद्यालय तो विमर्श का केंद्र होने चाहिए लेकिन उनके अनुसार विश्वविद्यालयों का भगवाकरण हो चुका है। असल मामला कुछ भी हो लेकिन अगर छात्र आत्महत्या को विवश हो तो इसे किसी मायने में कोई वर्ग ठीक नहीं कह सकता।

आपको बताते चलें कि लखनऊ विश्वविद्यालय में लगभग एक साल पहले चार छात्रों को निलंबित और एक को निष्कासित किया गया था। निलंबित और निष्कासित छात्रों के अनुसार उन्होने निलंबन समाप्त करने हेतु अपनी अर्जी राज्यपाल को दी लेकिन उनका निलंबन वापस न करके उन्हे कई पन्नों का जवाब थमा दिया गया। यह मामला गंभीर तब हो उठा जब आँखों में सपने लिए संघर्ष करते छात्रों की हिम्मत टूटने लगी। आँख इस कदर पथराई कि विश्वविद्यालय को खुला पत्र भेज कर आत्महत्या हेतु विवश न करने की प्रार्थना तक कर डाली गयी। चार अन्य निलंबित छात्रों में रवीद्र कुमार, संदीप सेन, अश्विनी यादव और संटू का नाम सामने आया है।

छात्रों के निलंबन का उद्देश्य कुछ भी हो लेकिन क्या वाकई छात्र आत्महत्या तक विवश किया जा रहा है यह सवाल गंभीर मुद्दा बन कर खड़ा हो गया है। बात वेमुला की हो या शुधांशु फर्क महज नाम का है। अगर देखा जाये तो वेमुला की मौत पर तमाम तरह की हाय तौबा और तमाशा तो हो रहा है लेकिन उससे अब तक क्या सीखा क्या गया बात यहा फिर अटक जाती है। सवाल यह भी है इस हादसे के बाद भी स्थितियाँ अब तक जस की तस क्यों हैं। निलंबित और निष्कासित छात्र आज भी अपने बिखरते सपनों को पथराई आंखो से बटोरने की जुगत में हैं। फिलहाल जिन आंखो में ऊंची उड़ान के सपने थे वह आंसुओं के सैलाब को लिए घूमती नजर आ रही हैं। दांव पर लगे इन भारत भविष्यों का सफर आखिर और कितना लंबा होगा देखने वाली बात होगी। 

लखनऊ से रामजी मिश्र ‘मित्र’ की रिपोर्ट.

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यूपी में ‘समाजवादी’ जंगलराज : लखनऊ में छेड़खानी से परेशान एक मेडिकल छात्रा ने फांसी लगाकर जान दी

बधाई हो सरकार में बैठे समाजवादियों और तुम्हारे कारकूनों! तुम्हारे अटूट प्रयास आज फलीभूत हुए और नतीजा यह हुआ कि बीती रात एक मेडिकल छात्रा ने राजधानी के गुडम्बा कालोनी में अपने कमरे में पंखे से लटक  कर खुद को मौत हवाले कर दिया। बधाई हो। ताज़ा खबर है कि लखनऊ के एक डेंटल मेडिकल छात्रा ने छेड़खानी से त्रस्त होकर फांसी लगा ली। पिछले कई महीने से मोहल्ले से लेकर कॉलेज आसपास शोहदों ने उसका जीना हराम कर रखा था। मानसिक तनाव इतना बढ़ने लगा कि उसे खुद की जिंदगी ही अभिशाप लगाने लगी। उसे लगा कि उसका स्त्री-देह ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। बस फिर क्या था। इस बच्ची ने उस कलंक-अभिशाप को ही हमेशा-हमेशा के लिए धो डाला।

यह बच्ची अवध क्षेत्र के बलरामपुर जिले की थी। उसके पिता वहां दवा की दूकान चलाते हैं। यह बच्ची होनहार थी, सो आगे की पढाई के लिए लखनऊ अपने चाचा के परिवार के साथ रहने लगी। जल्दी ही उसकी मेहनत रंग लायी और उसे डेंटल कालेज में प्रवेश मिल गया। लेकिन मेरी समझ में नहीं आता है कि महिला-शक्ति को सशक्तिकृत करने के दावे तो यूपी सरकार ने तो खूब किये। शुरुआत हुई महिला अपराधों पर कडा अंकुश लगाने के संकल्प से। योजना की संकल्पना तैयार की थी 2 साल पहले सुल्तानपुर की एक महिला युवा आईपीएस अधिकारी अलंकृता ने, जो उस वक्त वहां पुलिस कप्तान थी।

लेकिन शासन और पुलिस के बड़े हाकिमों ने उस संकल्पना को उस महिला से छीन लिया और लखनऊ के एसएसपी पद से हटाये गए नवनीत सिकेरा को उसका मुखिया बना डाला। जबकि होना तो यह था कि जिस अफसर ने उस योजना की रूप-रेखा बुनी थी, उसे ही उसका जिम्‍मा दिया जाता। इसलिए खास तौर पर भी, कि महिला होने के चलते वह महिलाओं की इस हेल्‍पलाइन को बेहतर ढंग से समझ और क्रियान्वित कर सकती थी। लेकिन उस योजना को नयी रंगरोगन से लीपपोत कर उसे 1090 का नाम गया। सिकेरा को मुखिया इस लिए बनाया गया क्योंकि अखिलेश यादव परिवार से सिकेरा की बेहद करीबी है। कुछ भी हो, 1090 ने और कोई काम भले किया हो या नहीं, लेकिन इसको लेकर फर्जी डंके खूब बजवा दिया।

लेकिन अपने दो साल के प्रयोग के अंतराल यह 1090 का प्रयोग पूरी तरह असफल हो गया। महिलाओं में विश्वास उपजाने के बजाय अब किशोरियां-महिलाओं के सपनों में 1090 के दारुण-डरावने सपने दिखने लगे हैं। हाल ही 1090 के एक प्रभारी अधिकारी तो एक वादी युवती से ही वही करतूत करने लगे, जिसके खिलाफ ही 1090 डंका बजाने का दावा था। पीडि़त महिला जब महिला अधिकार प्रकोष्‍ठ की महानिदेशक सुतापा सान्‍याल के पास पहुंची तो उन्‍होंने तत्‍काल इस मामले की खुद जांच करने का ऐलान किया। लेकिन अचानक ही आला अफसरों ने सुतापा सान्‍याल से यह मामला खींच कर सीधे नवनीत सिकेरा को थमा दिया। बाकी आप-सब को यह बताने की जरूरत तो है नहीं कि करीब एक महीना होने के बावजूद यह मामला ठण्‍डे बस्‍ते में ही पड़ा हुआ है। इसके पहले एक 84 वर्षीय महिला को एक शख्‍स ने कई-कई बार फोन करके भद्दी गालियां दीं और जान से मार डालने की धमकियां दीं। इसकी शिकायत जब 1090 और नवनीत सिकेरा तक की गयी, लेकिन कई कोशिशों के बावजूद कुछ भी नहीं हुआ। बाद में पता चला कि इस शिकायत पर गाजीपुर के थानाध्‍यक्ष ने उक्‍त अभियुक्‍त से 15000 हजार रूपया वसूल कर मामला रफा-दफा कर दिया।

यह तब हुआ जब सूचना विभाग के एक बड़े बडबोले और महीन अफसर अशोक कुमार शर्मा पुलिस के प्रवक्‍ता बने घूम रहे थे और इस मामले पर उन्‍होंने खुद हस्‍तक्षेप करने का दावा किया था। तो बोलो:- नवनीत सिकेरा जिन्‍दाबाद।

ऐसे में 1090 के प्रति आम महिला का विश्‍वास कैसे पनपता ?

एक ओर मुलायम सिंह यादव जब यह ऐलान करते घूम रहे थे कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, ऐसे में यह मेडिकल छात्रा किससे अपनी फरियाद करती। उस बच्‍ची ने फैसला किया। तय किया कि अब न बांस रहेगा और न बजेगी बांसुरी। बीती रात उसने अपने दोपट्टे से पंखे से फांसी का फंदा बनाया और झूल गयी फांसी पर वह होनहार बच्‍ची। आओ, अब 1090 का डंका बजाया जाए कि 1090 निदान नहीं, बिलकुल ढपोरशंख है।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

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आगरा स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान में कार्यरत हिंदी के युवा कवि दलित प्रकाश साव ने खुदकशी की

केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा में पूरे दस साल तक ठेके की नौकरी करते हुए हिंदी के युवा कवि प्रकाश साव ने कर ली खुदकशी. अपने टीटीगढ़ स्थित घर में रात को उसने नींद की गोलियां खा ली और सुबह फिर नींद से उठा ही नहीं. अबकी दफा उससे हमारी बात भी नहीं हुई. हाल में पिछली दफा जब वह कोलकाता आया तो उसने फोन किया था. अब उससे फिर मुलाकात की कोई संभावना नहीं है.

पिछली दफा मैंने मिलने को कहा था. हमें तब भी हमें मालूम नहीं था कि किस पीड़ा और किस अवसाद से वह पल छिन पल छिन जूझ रहा है. वह नब्वे के दशक में करीब पांच छह साल जनसत्ता में संपादकीय सहयोगी रहा है और तब से उसकी कविताओं का सिलसिला जारी है. जनसत्ता छोड़कर वह गुवाहाटी में पूर्वांचल प्रहरी में गया और डां.शंभूनाथ के कार्यकाल में वह केंद्रीय हिंदी संस्थान का हो गया. वह वहां 2006 से लगातार काम कर रहा था.

इस बीच उसने न सिर्फ उच्च शिक्षा हासिल कर ली बल्कि हिंदी के मशहूर कवि अशोक वाजपेयी की कविता पर पीएचडी कर ली. लेकिन वह ठेका मजदूर ही बना रहा. गौरतलब है कि संस्थान की शोध पत्रिका के लेखन संपादन में उसकी भूमिका थी बेहद सक्रिय लेकिन उसे इसकी न मान्यता मिली और न उसकी नौकरी पक्की हुई. केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के उच्चतर विभाग द्वारा 1960 ई. में स्थापित स्वायत्त संगठन केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल द्वारा संचालित शिक्षण संस्था है. संस्थान मुख्यतः हिंदी के अखिल भारतीय शिक्षण-प्रशिक्षण, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार के लिए कार्य-योजनाओं का संचालन करता है.

संस्थान का मुख्यालय आगरा में स्थित है. इसके आठ केंद्र दिल्ली (स्था. 1970), हैदराबाद (स्था. 1976), गुवाहाटी (स्था. 1978), शिलांग (स्था. 1987), मैसूर (स्था. 1988), दीमापुर (स्था. 2003), भुवनेश्‍वर (स्था. 2003) तथा अहमदाबाद (स्था. 2006) में सक्रिय हैं.

प्रकाश का हमारे मित्र शैलेंद्र से लगातार संपर्क रहा है लेकिन वह अपनी कविताओं और समकालीन कविताओं के अलावा किसी और मुद्दों के बारे में बात ही न करता था कि हम लोग जान पाते कि सोलह मई के बाद सत्ता बदलने के बाद ऐसा क्या हो गया कि हिंदी के युवा कवि जिसे साहित्य अकादमी के युवा पुरस्कार के लिए पिछले दिनों नामित भी किया गया था, अचानक उसने खुदकशी कर ली. इसी बीच उसने विवाह भी कर लिया और अब उसकी दो तीन साल की एक बेटी है. उसके लगातार संघर्ष और संघर्ष के जरिये आगे का रास्ता बनाने, अधूरी पढ़ाई संघर्ष करते हुए पूरी करने और हिंदी संस्थान में लगातार अच्छा काम करने तक की इस यात्रा के हम लोग अंतरंग साक्षी रहे हैं.

जाहिर है कि घुटन किसी अकेले रोहित को नहीं होती. समूची जमात इस घुटन और जीवन यंत्रणा का शिकार है. प्रकाश दरअसल प्रकाश साव था और उसकी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा हिंदी का मूर्धन्य कवि बनने की थी. इसके लिए उसने पहसे साव नाम हटाकर प्रकाश पत्र नाम से धड़धड़ लिखा. अपने एकमात्र कविता संग्रह ‘न होने की सुगंध’ का शीर्षक इस जन्मजात दलित बेहतरीन कवि ने मरकर सत्य कर दिया और हिंदी आलोचना का ग्रंथ का शीर्षक है ‘कविता का अशोक पर्व’, जो अब शोक पर्व में तब्दील है. प्रकाश को 2000 में हिंदी कविता के लिए नागार्जुन पुरस्कार मिला तो 2012 में प्रकाश को भारतीय भाषा का युवा पुरस्कार मिला.  उत्तर प्रदेश सरकार का अक्षय पुरस्कार भी उसे मिला. प्रकाश के मां बाप कोलकाता के नजदीक टीटागढ़ में रहते हैं. उन्हें और उसकी लगभग नई नवेली पत्नी और अबोध बच्ची के लिए सांत्वना के शब्द खोजे नहीं मिल रहे हैं.

इसे अब क्या कहा जाये कि जिस हिंदी संस्थान में 2006 से 2016 तक नौकरी स्थाई न होने की वजह से पीएचडी किये हिंदी के एक होनहार कवि ने खुदकशी कर ली, उस हिंदी संस्थान का विजन 2021 भी है. आखिर ऐसे विजन के क्या मायने जो खुद के भीतर के अंधकार को देख तक नहीं पा रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार पलाश विश्वास की रिपोर्ट.

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दिव्य भास्कर के कर्मी ने आत्महत्या की

गुजरात से एक बड़ी खबर आ रही है. बीते 27 अगस्त को गुजरात के भावनगर सिटी में दिव्य भास्कर अखबार के एक कर्मचारी दिलीप भाई ने सुसाइड कर लिया. सूत्रों के मुताबिक दिलीप भाई एमआईएस डिपार्टमेंट में काम करते थे. आरोप है कि दिव्य भास्कर के सौराष्ट्र समाचार के यूनिट हेड की प्रताड़ना के चलते कर्मचारी आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुआ. इस संबंध में ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई है. यह घटना उन दिनों की है जब पटेल आंदोलन के कारण पूरे गुजरात में इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी गई थी.

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जगेंद्र की फोरेंसिक रिपोर्ट से घटनाक्रम में नया मोड़, हत्या नहीं, खुदकुशी !!

लखनऊ की फॉरेंसिक लैब रिपोर्ट ने जगेंद्र हत्‍याकांड को खुदकुशी करार दिया है। बताया गया है कि जगेन्द्र ने खुद आग लगाई थी. छाती के बाईं तरफ से आग से जलने के निशान पाए गए हैं. गौरतलब है कि जगेन्द्र ने घायल होने के बाद बयान दिया था और यूपी के मंत्री राममूर्ति वर्मा और यूपी पुलिस पर आग लगाने का आरोप लगाया था। 

एक टीवी रिपोर्ट के मुताबिक यूपी पुलिस के सूत्रों ने बताया कि फॉरेंसिक रिपोर्ट साफ तौर पर यह कह रही है कि जगेन्द्र ने खुद को आग लगाई, जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई. जांच करने वाले फॉरेंसिक एक्सपर्टस अपनी रिपोर्ट में जगेन्द्र द्वारा खुद आग लगाने की बात कह रहे हैं. इसके पीछे उनका तर्क है कि जगेंद्र का दाहिना हाथ सुरक्षित है और बायां जला है. 

अगर उसे किसी ने जलाया होता तो दोनों हिस्सों में आग लगी होती. जगेंद्र भी दाहिने हाथ से काम करता था, इसलिए एक्सपर्ट्सअपनी रिपोर्ट में यह दर्शा रहे है कि उसने खुद आग लगाई.

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शैलेंद्र शर्मा आत्महत्या कांड : ‘दबंग दुनिया’ के सीईओ समेत चार पर लटकी कार्रवाई की तलवार

खंडवा (म.प्र.) : दबंग दुनिया अखबार के मार्केटिंग विभाग से जुड़े रहे शैलेंद्र शर्मा ने काम के दबाव के चलते तीन माह पहले खंडवा के एक होटल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अब उस मामले में खंडवा पुलिस ने दबंग दुनिया के सीईओ सहित चार लोगों के खिलाफ धारा 304 के तहत प्रकरण दर्ज करने की तैयारी कर ली है। 

गौरतलब है कि दबंग दुनिया के सीईओ द्वारा शैलेंद्र शर्मा को कार्यरत रहने के दौरान मानसिक रूप से काफी प्रताड़ित किया गया था। वह खंडवा में दबंग दुनिया के मार्केटिंग एवं सर्क्यूलेशन इंचार्ज थे।

इधर, दबंग दुनिया मैनेजमेंट ने शैलेंद्र के परिवार को अभी तक कोई सहायता राशि नहीं दी है और शैलेंद्र पर लाखों रुपए के गबन का आरोप लगा रहे हैं, जबकि कर्मचारियों ने शैलेंद्र के परिवार के लिए मार्च माह में ही एक दिन का वेतन भी कटवा दिया था। 

इस पूरे प्रकरण को ठिकाने लगवाने के लिए दबंग दुनिया के चैयरमैन किशोर वाधवानी ने अपने खास गुर्गे राजू पाठक और डाक प्रभारी विजय पाठक को लगा रखा है। शैलेंद्र के परिजन भी इस मामले में सीएम शिवराज सिंह से गुहार लगाने वाले रहे हैं।

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वोटबैंक वाले इस लोकतंत्र में किसान मरे तो मरे… सत्ता और मीडिया ने अपनी औकात दिखा दी…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से…

उद्योगपित दिवालिया होने लगता है तो हंगामा मच जाता है. उसे फटाफट राहत देने की कवायद शुरू हो जाती है. उद्योगपति टैक्सचोरी में फंसा जाता है तो सरकार साहिब माफी देने में यह कहते हुए जुट जाती है कि ऐसा न करने से देश में निवेश और विकास का माहौल प्रभावित होगा. लेकिन जब खेती-किसानी संकट में पड़ जाए तो कोई नहीं बोलता. सत्ता का चरित्र बिलकुल साफ तौर पर सामने है इन दिनों. कारपोरेट मीडिया का बड़ा हिस्सा एक बड़े दलाल की भूमिका में है जो सत्ता को बचाने की खातिर मुख्य मुद्दों से ध्यान डायवर्ट करने में लगा रहता है. एक गजेंद्र के मरने पर आम आदमी पार्टी को घेरने के लिए इतना हायतौबा हुआ लेकिन देश भर में किसान जगह जगह धड़ाधड़ आत्महत्याएं कर रहा है तो कोई दिन भर इस पर लाइव मुहिम नहीं चला रहा.

खेती-किसानी को लेकर यह देश महासंकट से गुजर रहा है. आपातकाल की सी स्थिति से दो-चार है. हम सब जानकर अनजान बने हुए हैं, चुप्पी साधे हुए हैं. नेपाल में भूकंप पर हमारी सक्रियता प्रशंसनीय है. पर हम क्यों नहीं ऐसी ही तत्परता अपने देश में भी दिखा रहे. लगातार मर रहे किसानों को लेकर हम बिलकुल निष्ठुर बने हुए हैं. गेंद इस पाले से उस पाले लुढ़काई जा रही है. जो किसान जिंदा हैं और मुश्किल में हैं, उनकी सुध लेनी चाहिए. सरकारों को अपना खजाना इन किसानों को राहत प्रदान करने के लिए खोल देना चाहिए. नीचे तीन रिपोर्ट्स को शेयर कर रहा हूं. पढ़ लीजिए. आंखें खुल जाएंगी. कई लोग अपनी अपनी सरकारों (कोई नरेंद्र मोदी भक्त तो कोई अखिलेश यादव भक्त ) को प्रोटेक्ट करने के लिए किसानों को गालियां दे रहे हैं. किसान की आत्महत्याओं को सामान्य मौत बता रहे हैं. ऐसे दलाल और सामंती मानसिकता वाले लोगों से कहना चाहूंगा कि दिन रात फेसबुक पर कलम चलाने से खेत में फसल नहीं उग जाती. एनजीओ के धंधे से आए पैसे से आपका परिवार तो चल सकता है, लेकिन जो सिर्फ खेत व खेती पर निर्भर है, वह अगर जिंदा है तो जीते जी मरणासन्न है.

आत्महत्या करने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए. आत्महत्या आखिरी विकल्प के तौर पर व्यक्ति अपनाता है. किसान शौक से सुसाइड नहीं कर रहा है, वह अपनी इज्जत और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए जान दे रहा है. वह कर्ज और विपन्नता के कारण परिवार में मुंह न दिखा पाने की स्थिति को महसूस कर प्राण त्याग रहा है. किसानों के मसले को सोशल मीडिया पर शेयर करिए दोस्तों. साथियों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करिए. मैं किसानों की पीड़ा इसलिए शिद्दत से महसूस कर पाता हूं क्योंकि कक्षा आठ तक की पढ़ाई गांव से की है और अब भी गांव जाना लगा रहता है. फसलों के खराब या ठीक होने पर परिजनों के आंखों में दुख या खुशी का भाव गहराई से महसूस किया है. उन घरों की स्थिति ज्यादा खराब होती है जिनके यहां कोई युवा नौकरी में नहीं है और जिनका सब कुछ किसानी पर ही निर्भर है. ऐसे परिवारवाले फसल तबाह होने पर बिजली और खाद में खर्च की गई रकम तक नहीं निकाल पाते और कर्ज दर कर्ज लेते हुए एक अंतहीन दुष्चक्र में फंस जाते हैं.

हम सभी वे लोग जो गांव से आए हैं, उन्हें किसानों की पीड़ा, दुख को बहुत प्रमुखता से सोशल मीडिया पर उठाना चाहिए अन्यथा हमारी धरती, हमारी माटी, हमारे खेत, हमारे पुरखे हमें माफ नहीं करेंगे. आबादी, भोजन और परिजनों की निर्भरता के लिहाज से किसान इस देश का बहुमत है. जब बहुमत संकट में है तो समझिए पूरा मुल्क संकट में है. किसान कोई धर्म या जाति या क्षेत्र नहीं. किसान राष्ट्रीयता है. किसान भारत की ताकत है. भारत की पहचान है. पर हम सब बहुत बेशर्मी से किसानों की बदहाली के मुद्दे को इगनोर कर रहे हैं क्योंकि किसान किसी एक जाति, किसी एक धर्म, किसी एक क्षेत्र का नहीं है. वोटबैंक वाले इस लोकतंत्र में किसान का कोई धर्म, जाति, क्षेत्र न होना सचमुच बहुत पीड़ादायी है… अन्यथा अगर किसान कोई जाति या धर्म या क्षेत्र होता तो उसकी आत्महत्या पर पूरे देश में बवाल मच चुका होता.

तीन रिपोर्ट्स ये हैं…

किसान ने डीएम ऑफिस के बाहर लगाई फांसी
http://goo.gl/Oph5pE

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किसान आत्महत्या पर डीएम का गैर-जिम्मेदाराना बयान
http://goo.gl/LyxN4T

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हफ्ते भर में राजस्थान में चौथे किसान ने आत्महत्या की
http://goo.gl/uG82Wm

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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