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सुख-दुख

ये सायकिल न चला पाने वाली ‘बीमार’ लड़की कैसे पहले स्कूटी, फिर कार वाली बन गई?

Geetali Saikia : बचपन में सायकिल सीखने को लेकर अक्सर भाई से मेरी लड़ाई हो जाती थी. एक तो वो लाल रंग की हरकुलिस उसे बहुत पसंद थी. दूसरी मैं इतनी कमजोर थी कि मुझे चोट लगने के डर से वो मुझे छूने भी नहीं देता था. अकसर बीमार रहती थी मैं. दुबली पतली होने के कारण उससे जीत नहीं पाती थी तो मन मसोसकर या तो घर में आ जाती या फिर बाउंड्रीवाल के किनारे लगे नारियल के पेड़ों में पत्थर मारती थी.

Geetali Saikia : बचपन में सायकिल सीखने को लेकर अक्सर भाई से मेरी लड़ाई हो जाती थी. एक तो वो लाल रंग की हरकुलिस उसे बहुत पसंद थी. दूसरी मैं इतनी कमजोर थी कि मुझे चोट लगने के डर से वो मुझे छूने भी नहीं देता था. अकसर बीमार रहती थी मैं. दुबली पतली होने के कारण उससे जीत नहीं पाती थी तो मन मसोसकर या तो घर में आ जाती या फिर बाउंड्रीवाल के किनारे लगे नारियल के पेड़ों में पत्थर मारती थी.

फिर भी मन नहीं मानता था. वो सायकिल चलाता रहता और मैं उसके पीछे दौड़ती रहती. रोज माँ से शिकायत करती थी की “मुझे भी सीखना है सायकिल” तो माँ प्यार से मुझे कहती की “अभी तुम बहुत कमजोर हो, सायकिल का भर सम्हाल न सकोगी, जब तुम एकदम अच्छी हो जाओगी तो हम तुम्हे बिना डंडे वाली सायकिल दिला देंगे”.

भारतीय लड़कियों के वजूद को दिलासों से अलग नहीं किया जा सकता. दिलासे हमारी जीवन शैली में घर कर जाते हैं और हम एक अनजानी ख़ुशी की आहट को महसूस कर अकारण खुश हो लेते हैं. मैं भी खुश हो जाया करती थी और अपने जल्दी ही स्वस्थ हो जाने की कामना करती थी.

बहुत भोला होता है बचपन. इस उम्र में हमे राजनैतिक, सामाजिक मामलों से कतई सरोकार नहीं होता है. मैं उडती हुई चिड़ियों को देखकर उड़ने की कोशिश करती तो अक्सर गिर जाती. भाई को क्रिकेट पसंद था. वो दीवार के सामने बैट लेकर खड़ा हो जाता मैं उसे बोलिंग करती. बैटिंग मुझे भी पसंद थी पर बोलिंग और फील्डिंग से ही मैं थक जाती थी और बीच खेल में ही उसे वाक ओवर दे कर जाके सो जाती थी.

बच्चे दिनभर जूझते रहते हैं क्योंकि बच्चों को हारना अच्छा नहीं लगता. मैं भी जूझती पर हार जाती थी. कहीं न कहीं से मेरे जोश और जूनून के बीच में हर बार मेरी कमजोरी आ ही जाती. यही कारण है बचपन में बीमार बच्चे inferiority complex के शिकार हो जाते है और कहीं न कहीं से मैं भी इसकी गिरफ्त में आ चुकी थी.

समय बीतता गया.

हम स्कूल में पढने लगे थे. मेरी समस्या ज्यो की त्यों थी. मुझे इतिहास भूगोल जैसे सब्जेक्ट याद नहीं हो पाते थे. हाँ मुझे दीदी हिंदी पढ़ा देती और मैथ व साइंस में मुझे समस्या नहीं थी. इस बीच बीमारी से निजात मिल चुकी थी, यही एक अच्छी बात थी.

7th में साइंस की क्लास में पढने को मिला कि किसी भी कार्य को करने के लिए एक मिनिमम उर्जा की आवश्यकता होती है. किसी काम को नहीं कर पाने का मतलब है की आपने उसके लिए उसके लिए आवश्यक उर्जा की मात्रा को नहीं प्रदान किया.

बात समझ में आ चुकी थी.

बचपन ख़त्म हो रहा था और एक कोशिश तो करनी ही थी. बस जानना ये था कि कौन से काम मैं कर सकती हूँ?

घर पहुँचते देखा मेरा डोगी मुझे देखकर उछल रहा था. पता नहीं क्या मन में आया. बस कुत्ते को चेन से अलग किया, और दौड़ पड़ी उसके साथ. खूब दौड़ी थी मैं उस दिन. और तब तक दौड़ी जब तक थकी नहीं. बेशक उस दिन फिर हारी थी.. पर इतना तो मालूम चल गया था की वो “मिनिमम एनर्जी लेवल” मेरे अन्दर बहुत पहले से थी. ईश्वर ने कोई नाइंसाफी नहीं की थी मेरे साथ. गलती मेरी थी! अनजाने में मैंने अपनी कमजोरी को बहाना मानते हुए कोशिश करने से ही तौबा कर लिया था.

जीवन में सबसे बड़ी ख़ुशी अपने आपको पहचानने पर होती है, ये सच है कि आप हर काम नहीं कर सकते पर ये तो सब पर लागू होता है. वैसे भी कोशिश करके आप बड़ी से बड़ी मिथक तोड़ सकते हैं. हर समस्या का एक समाधान है .खोजिये. हार मत मानिए.

अब बारी थी अपने शौक पूरे करने की. महीने भर से भी कम समय में बिना किसी की मदद के मैं सायकिल चलाना सीख गयी थी. दीदी ने अच्छे खासे हिंदी पोएम और कहानिया रटा दिए थे और मैं गर्व से लोगो को अकसर अपनी हिंदी बोल पाने की शेखी मारती थी.

माँ को मुझ पर भरोसा हो चला था. कुछ दिन बाद ही एक नयी सायकिल मेरे लिए घर में आ चुकी थी. और, समय के साथ वो सायकिल स्कूटी में और स्कूटी कार में बदल चुकी है.

असम के तिनसुकिया की निवासी गीताली सैकिया ने गुवाहाटी विश्वविद्यालय से एमएससी की पढ़ाई की है और खुद का अपना उद्यम संचालित करती हैं उनसे संपर्क उनके फेसबुक एकाउंट facebook.com/geetali.saikia.7 के जरिए किया जा सकता है.

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