इस लड़की के सवाल ने आईपीएस द्वारा नारी सुरक्षा पर दिए भाषण की निकाल दी हवा, देखें वीडियो

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा आजकल नारी सुरक्षा सप्ताह का आयोजन किया  जा रहा है. इसी क्रम में आगरा पुलिस भी शहर भर के कॉलेज व स्कूल में जागरूकता कार्यक्रम करा रही है. आगरा के बीडी जैन गर्ल इंटर कॉलेज में नारी जागरूकता कार्यक्रम में एसएसपी अमित पाठक ने छात्राओं को सुरक्षा और अपराध के बारे में कई सारी जानकारियां दी. पर बाद में एक लड़की ने नारी सुरक्षा को लेकर कुछ ऐसे सवाल मीडिया के सामने दागे जिससे पूरे आयोजन और भाषण की सार्थकता पर सवाल उठ गया.

लड़की ने कौन से सवाल उठाए और एसएसपी अमित पाठक ने अपने भाषण में क्या कहा, जानने के लिए देखें ये वीडियो….

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दुर्व्यवहार से नाराज रायपुर की तीन महिला पत्रकारों ने रिपोर्ट दर्ज कराई

रायपुर प्रेस क्लब कार्यकारिणी बैठक में अदालत परिसर में महिला पत्रकारों के साथ पुलिस कर्मियों ने जो दुर्व्यवहार किया उसकी निंदा की गई। सभी पत्रकार साथियों ने जो एकजुटता का परिचय दिया, उसका आभार व्यक्त किया गया। देर रात एसपी संजीव शुक्ला के साथ वरिष्ठ पत्रकार रूचिर गर्ग और सुनील कुमार के नेतृत्व में जो चर्चा हुई, उससे प्रेस क्लब ने सहमति जताई। एसपी संजीव शुक्ला ने पत्रकारों की मांग पर एक टीई गौरव तिवारी के निलंबन के साथ ही दंडाधिकारी जांच की मांग को स्वीकार किया, इस पर सभी पदाधिकारियों ने संतोष व्यक्त किया।

साथ ही कार्यकारिणी ने यह मांग की कि घटना की दंडाधिकारी जांच के साथ-साथ विभागीय जांच कर दोषी पुलिस अधिकारियों पर जिनके खिलाफ तीन महिला पत्रकार श्रेया पांडे, अंकिता शर्मा, रजनी ठाकुर ने अलग-अलग रिपोर्ट दर्ज कराई हैं। समुचित कार्रवाई के जरिए पत्रकार जगत में विश्वास का महौल पुनः स्थापित किया जाए। जिससे निडर होकर महिला पत्रकार अपनी जिम्मेदारीपूर्ण पत्रकारिता का निर्वहन कर सकेंगे।बैठक में प्रेस क्लब अध्यक्ष के.के. शर्मा, महासचिव सुकांत राजपूत, उपाध्यक्ष सुखनंदन बंजारे, संयुक्त सचिव प्रफुल्ल ठाकुर, ममता लांजेवार, कोषाध्यक्ष मोहन तिवारी सहित कार्यकारिणी सदस्य सुशील अग्रवाल, प्रदीप दुबे, ओ.पी. चन्द्राकर, अनवर कुरैशी, मृगेन्द्र पाण्डेय उपस्थित थे।

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दिनांक 30.10.2017 को रायपुर प्रेस क्लब कार्यकारिणी मंडल के आपात बैठक के निर्णायानुसार प्रतिदिन प्रेस क्लब का कार्यालिन समय प्रात:10.30 बजे से शाम 7 बजे तक निर्धारित किया गया है। इसमें प्रेस क्लब के मुख्य द्वार को भी बंद किया जाएगा। प्रेस क्लब प्रागण में 7 बजे के बाद वाहन की जवाबदारी स्वंय वाहन मालिक की होगी।

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महिला पत्रकार के शोषण मामले में आरोपी बनाए गए पत्रकार कृष्ण कांत ने तोड़ी अपनी चुप्पी

Krishna Kant : मुझ पर बहुत संगीन आरोप लगाए गए हैं. सोचा था कि हमारा अपना प्रेम संबंध था, इस पर कुछ नहीं कहना. लेकिन मामला अब हाथ से निकल गया है. अब फेसबुक ही सर्वोच्च अदालत है, और हर व्यक्ति मुख्य न्यायाधीश. शर्मिंदगी के साथ इस कीचड़ में उतरने को मजबूर हूं. कहा जा रहा है कि अलग होना बड़ी बात नहीं है, लेकिन धोखा दिया गया. इस ‘धोखे’ में उसका जिक्र कहां है कि हमारे आसपास के लोग पिछले डेढ़ साल से मध्यस्थता कर रहे थे. वे लोग कहां हैं इस पूरी बहस में जो बार बार समझा रहे थे कि तुम दोनों साथ नहीं रह सकते? यह जिक्र कहां हैं कि हमें जब कहा गया कि हम साथ नहीं सकते तो तीन बार आत्महत्या करने कोशिश/धमकी दी गई? यह जिक्र कहां है कि आत्महत्या की धमकी पर दो बार ऐसा हुआ कि दोस्तों को दौड़कर आना पड़ा? यह जिक्र कहां है कि आप आत्महत्या की धमकी देकर दरवाजा बंद करके सीपी घूम रही थीं और हम दोस्तों के साथ तुमको ढूंढ रहे थे?

इस बात का जिक्र कहां है कि किसी 45 या 50 साल की महिला से भी बात करने या हालचाल लेने पर आपको परेशानी होती रही है? इस बात का जिक्र कहां है कि मुझे लोगों के बीच में ही काम करना है और आपको लोगों से उबकाई आती है? इस बात का जिक्र कहां है कि जिन लोगों के पास आपको फोर्स करके भेजा गया कि तुम अकेलेपन से निकलो, उन्हीं के पास जाकर आपने हमको गालियां दीं? वे दोस्त, वे वरिष्ठ महिलाएं कहां हैं जो आपको समझाती रहीं कि कोई अलग होना चाहता है तो उसे जाने देना चाहिए? वे पुरुष दोस्त कहां हैं जिनके मेरे घर आने भर से आप हफ्ते भर लड़ाई करती थीं? आपको न्याय दिलाने के लिए वही लोग क्यों और किस मकसद से जुटाए गए जो हमसे कभी नहीं मिले या जो हमको नहीं जानते?

इस बात का जिक्र कहां है कि आपको हमारे दफ्तर जाने, रिपोर्टिंग पर जाने, दोस्तों के साथ बैठने पर भी आपको दिक्कत थी जिसपर लगातार समझाइश की कोशिश होती रही और आपने हर बार समझने से इनकार किया? बार बार यह कहने के बाद कि हम साथ नहीं रह सकते, धोखा कैसे होता है? मैं अलग होना चाहता हूं, यह लगातार कहते रहना किस कानून के तहत धोखा या अपराध है? जिस जगह पर मैं हूं वहां पर कोई स्त्री होगी तो क्या करेगी? हमारी पूरी सर्किल के लोग, दोस्त सब हमारे संबंध को जानते हैं तो किसी के साथ भी धोखा कैसे हो गया? इतनी किचकिच के बाद अगर मैं अलग होना चाहता रहा तो कौन सा कानून या लोग मुझे फांसी देंगे, मैं तैयार हूं.

क्या मेरे मुताबिक, आप मेरे साथ नहीं रहना चाहें तो मुझे आपके चरित्रहनन का अभियान चला देना चाहिए? मुंह पर तेजाब डाल देना चाहिए? कहा गया है कि हमने कई लड़कियों को बरगलाया, मौत के मुंह में पहुंचाया और छोड़ दिया. तमाम लड़कियां आत्महत्या कर रही हैं. एक जिस रिश्ते में हम रहे, उसके अलावा वे कौन लड़कियां हैं? सब लड़कियां आत्महत्याएं कर रही हैं और अस्पताल से घर लौट जा रही हैं, लेकिन न कोई केस दर्ज हो रहा है, न अस्पताल रिपोर्ट कर रहा है. इतनी लड़कियों को बचा लेने वाले लोग भी कोई रिपोर्ट नहीं कर रहे हैं. ताजा आत्महत्या प्रकरण हुआ. किसी ने न देखा, न बात की, न अस्पताल ने पुलिस बुलाई, न मेरे पास पुलिस आई, न कोई केस हुआ, यह किस दुनिया में, कैसे संभव हुआ?

कहा गया है कि मैं तमाम लड़कियों को बरगला कर मौत के मुंह में डालता गया. यह सब देखते हुए आपको मुझसे शादी करनी थी? सारे आरोप अलग होने के बाद ही सामने आए? उसके पहले आपको उन लड़कियों की और हमारे ‘आपराधिक चरित्र’ पर चिंता नहीं हुई? एक महीने पहले तक हम आपसे शादी कर ​लेते तो यह सारे खून माफ थे? आरोप है कि हमने हैरेस किया, पैसा खाया. मैं सात साल से नौकरी कर रहा हूं. आप कितना पैसा कमाती थीं जो हम आपसे पैसे खाते थे और आप खिलाती थीं? बिना किसी पढ़ाई लिखाई के, बिना किसी अनुभव के आपको दोनों नौकरियां कैसे मिलीं? आपका परिवार आपको सपोर्ट नहीं कर रहा था, आप दिल्ली आ गईं, आपको यहां रहने के लिए आर्थिक मदद किसकी थी? अभियान चलाने के ठीक पहले आपका अकाउंट फ्रीज हुआ, आपने पैसा किससे लिया? आपके यहां आने से लेकर एक महीने पहले तक आपका रोना था कि मेरे कोई दोस्त नहीं हैं, कभी भी किसी भी परिस्थिति में आपकी किसी भी तरह की मदद, संबंध खराब होने के बावजूद, मेरे अलावा किसने की? (यह सब आरोप लगाया जाना और यह जवाब देना बेहद घिनौना है.)

जिस दिन मेरे घर बाबा की तेरहवीं थी, उस दिन भी मुझसे बहस करने की कोशिश की जा रही थी. 99 साल के मरे हुए व्यक्ति की भी फोटो लगाकर गालियां दी गईं? पिछले छह महीने में पिता और बाबा की मौत हुई, उसका यहां फेसबुक पर पोस्ट लिखकर मजाक उड़ाया गया. यह कौन सा न्याय मांगा जा रहा है? जितने आरोप लगाए जा रहे हैं वे सब पहले फर्जी अकाउंट से क्यों सामने आ रहे हैं? यदि मैं अपराधी हूं, तो उसका फैसला कौन करेगा? मुझे सजा कौन देगा? कहा गया कि फ्रिज में गोमांस है तो भीड़ जुट गई और पिटाई शुरू हो गई? इस संभ्रांत और ​वर्चुअल मॉब लिंचिंग के लिए आप सब बधाई के पात्र हैं.

तमाम लोगों का कहना है कि हमें हमारे संस्थान से निकाला जाए. हमारे किसी के साथ संबंध में मेरे संस्थान का क्या रोल है? किसी विचारधारा, जाति, वर्ग, समुदाय आदि का क्या रोल है? मेरे उन मित्रों, जिनका कहीं कोई रोल नहीं है, उनको भी इसमें घसीटा जा रहा है. प्रियंका से मेरी एक महीने से बात नहीं हुई है, उन्होंने जो किया, वह ठीक ही है. वे क्या क्या कहेंगी, क्या करेंगी, यह छोड़िए, बाकी जितने न्यायाधीश हैं, जिन्होंने भी नाम लेकर बिना मुझसे कुछ पूछे, बिना पक्ष लिए पोस्ट डाली है, वे सारे प्रोफेसर, पत्रकार और समाज बचाने के ठेकेदार अब अपने पक्ष और सबूत लेकर कोर्ट आएंगे, एफआईआर करवाकर सबको नोटिस भेज रहा हूं. मैं अपराधी हूं तो मेरी अपील है कि मुझे सजा मिले. एक महीने से फेसबुक ट्रायल किस मकसद से है? बार बार कहने के बाद भी कोई कोर्ट या पुलिस नहीं गया, तो मैं जाता हूं. जिस जिस का अपराधी हूं, सब लोग आएं.

आप लोग, जो भी मुझे जानते हैं, मुझ पर भरोसा करते रहे हैं, वे मेरे काम के कारण करते रहे हैं. संबंध में रहकर आप कहती रहीं कि ‘तुमको अपने काम के अलावा बाकी दुनिया नहीं दिखती.’ अब सारा हमला उसी काम पर है कि कैसे नौकरी छुड़वाई जाए. हां, मैं अपने काम को लेकर पागल हूं. तमाम लेखकों और पत्रकारों की हत्या के बावजूद मैं क्रूर भीड़ से नहीं डरता तो टुच्चे आरोपों से नहीं डरता. आप में से जिसे लगता हो कि मैं अपराधी हूं, वे छोड़कर जा सकते हैं. जो मुझे जानते हैं, वे जानते हैं कि मैं क्या कर सकता हूं. जो नहीं जानते उन्हें कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है. जिसके साथ था, उसके बारे में भी दुनिया जानती थी. अब जिसके साथ हूं उसके बारे में भी दुनिया जानती है. अब जिन जिन के साथ धोखा हुआ हो, वे सब आएं और इस मॉब लिंचिंग में शामिल हों.

बाकी जिस पर इलाहाबाद से लेकर जेएनयू तक 50 लड़कियों के यौन शोषण का आरोप है, जो इलाहाबाद से भागा इसीलिए कि कुटाई होनी थी, उस महान स्त्रीवादी न्यायविद के आरोपों पर कुछ नहीं कहना. जबसे यह प्रकरण शुरू हुआ, सिर्फ तीन चार लोगों से बात की, इस उम्मीद से कि शायद यह सब शांत होगा. लेकिन जो जो लोग ​इस घृणा अभियान में बिना मेरा कोई पक्ष जाने शामिल हुए, उन सबको सलाम पेश करता हूं. बिना अपराधी का पक्ष लिए न्याय कर देने की आपकी यह नायाब क्षमता देश के काम आएगी.

पत्रकार कृष्ण कांत की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को समझने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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आधी रात में आधी आबादी सड़क पर निकल कर बोली- मेरी रातें, मेरी सड़कें

महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर जताया गुस्सा, पित्रसत्तात्मकता को बढाने वाले भेदभावपूर्ण समाज व्यवस्था के विरूद्ध नायाब प्रदर्शन, विभिन्न समुदायों की महिलाओं ने किया आधी रात को पैदल मार्च, पीड़िता को दोषी ठहराने की कुत्सित मानसिकता का शहर की महिलाओं ने किया विरोध…

दिनांक 12 अगस्त 2017 को ”मेरी राते मेरी सड़के” अभियान के तहत वाराणसी शहर के विभिन्न समुदायों की महिलाओं और लड़कियों ने लंका से अस्सी तक मार्च निकाला. रात 11  बजे से शुरू हुआ यह मार्च मार्च रात एक बजे लंका पहुंचा. इस मार्च के दौरान शामिल विभ्भिन समुदायों की महिलावो और लड़कियों ने  आजादी और बराबरी के गीत गाये, और  इस अभियान को आगे बढाने के लिए आगे की रणनीति बनाई. रात पर अधिकार को  लेकर शुरू की गयी इस चर्चा में में मूल रूप से महिलाओं के विरुद्ध बढ़ाते अपराधो और बदले में अपराधियों के बजाये पीडित महिलाओं को ही कटघरे में खड़े किये जाने की प्रवृत्ति पर केन्द्रित रही.

उपस्थित महिलाओं ने रात एक बजे लंका पहुच कर चाय पीने के क्रम में दरअसल इस पित्रसत्तात्मक सोच को चुनौती दी जो महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर घरों में कैद करने पर अमादा हैं. उपस्थित महिलाओं ने एक स्वर से यह तय किया की आज की यह आदी रात की यात्रा केवल आगाज है और इन्ही तरीकों से आगे समाज में बराबरी और सुरक्षा की लड़ाई लड़ी जायेगी. वहा सभी महिलावो ने मिलकर ये तय किया की हम आगे इन सरे मुद्दों पर सरकार  से जवाब मांगेंगे और अपनी लड़ाई जारी रखेंगे, इस कार्यक्रम में शामिल महिलाये और लड़किया हर जाति धर्म और संगठन से परे सिर्फ अपने हक़ के लिए आज इकठ्ठा  हुई, और एक दूसरे से ये वादा किया कि हम सभी मिलकर समाज की इन रूढ़ियों को तोड़ेंगे.

महिलाओं के विरूद्ध होने वाली प्रत्येक घटनाओं के बाद मंत्रियों, नेताओं, और समाज में पित्रसत्ता के अन्य प्रतिनिधियों द्वारा लड़कियों को ही जिम्मेदार बताने वालों को आड़े हाथों लिया गया. मार्च को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज से तीन दिन बाद पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा होगा। कही परेड, कही झांकियां, कही आजादी की वीर गाथाएं, कहीं भाषण और इन सबके बीच कही एक निर्भया, वर्णिका, रागिनी जैसी तमाम लड़कियां घर से बाहर आजादी तलाशती हुए खतरों का सामना करते हुए भयानक ज़िन्दगी जीने को मजबूर है।

कभी महसूस किया है आपने कैसा लगता होगा जब आप कुछ बनने का सपना ले कर घर से बाहर कदम रखें और बाहर निकलते ही किसी की हैवानियत भरी नजर आपकी छाती पर तो कभी शरीर के दुसरे अंगों पर होती है. आप उनसे बचते बचाते फिर आगे बढ़ते है और फिर वही नज़र अब आपका पीछा करती रहती है. आपके विरोध के बावजूद भी तब आप  को छूने की कोशिश की जाती है और फिर, फिर तो कहानी अख़बारों में एक स्थान भी बना पाती है. यकीन मानिये देश में आधी आबादी इसी डर के साये में जी रही है, इसी डर के साथ वो स्कूल/कॉलेज, कार्यस्थल और यहाँ तक की कई बार घर में भी रहती है।

वक्ताओं नें आंकड़ों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि हर 6 सेकंड में देश में एक रेप की घटना होती है. महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा और भी कई रूपों में हो रही है। आंकड़ो में अगर इन सभी घटनाओं को शामिल किया जाए तो आप देश से पलायन की योजना कर लेंगें। इस तरह की घटनाये सिर्फ हमारे देश में नहीं हो रही यह मानते हुए सरकार, प्रशासन और समाज की जोजवाबदेही होनी चाहियें वो उसे तत्परता से निभाया जाए. यह दुःखद है कि केंद्रीय स्तर पर एक अभियान बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जोर शोर से चल रहा है और एक तरफ महिलाओं के प्रति होती घटनाओं पर उन्हें ही रात में निकलने का दोषी मानते हुए एक लम्बी सलाह की लिस्ट और धमकी दे दी जाती है. जरा हम इन् घटनाओ की लिस्टिंग करें तो जान पाएंगे की ज्यादातर घटनाएं दिन के उजाले  में हो रही है.  मार्च में महिलाओं के समर्थन में उनके पुरुष साथी भी मौजूदा थे. मुक्य रूप से मुनिज खान, जागृति राही, नीता चौबे, शीला तिवारी, श्रुती नागवंशी, नीलम पटेल, पूजा, शानिया, अनिता सिंह, सुजाता भट्टाचार्य, नम्रता, राजेश्वरी, और तमाम गृहणियों ने भी भारी संख्या में भागीदारी की।

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इस देश में स्तनपान कराने के लिए महिलाओं को दो घंटे अलग से छुट्टी दी जाती है

Praveen Jha : नॉर्वे में ‘बेबी-बॉटल’ ढूँढना दुर्लभ कह सकते हैं। डिजाइनदार तो छोड़ ही दें। वहाँ बोतल से दूध पीते बच्चे बस-ट्रेन कहीं नहीं मिलते। हर सार्वजनिक स्थलों, और ऑफीसों में स्तनपान के कमरे हैं। मेरी एक कर्मचारी जब लगभग एक साल की छुट्टी के बाद लौटीं, ‘रोस्टर’ बना, मैनें देखा कि एक घंटे के दो ‘पॉज़’ हैं। मुझे समझ नहीं आया, फिर देखा ‘अम्मो’ लिखा है, मतलब स्तनपान का विराम। दो घंटे प्रतिदिन का विराम है जिसमें वो पास के ‘क्रेच’ में जाकर स्तनपान करा आएंगीं।

सत्तर के दशक में ऐसा नहीं था। पूरा नॉर्वे ‘फॉर्मूला मिल्क’ और बोतल का फैन हो चला था। नया-नया अमरीकी फैशन चला था। नॉर्वे तब अमीर न था, अमरीका की नकल उतारता था। स्तनपान लगभग न के बराबर हो रहे थे।

तभी एक महिला मिसेज हेलसिंग ने एक ‘कैम्पेन’ चलाया और स्वास्थ्य मंत्रालय में एक अधिकारी से मिलीं। भाग्य से वह अधिकारी भी हार्वर्ड से इसी संबंध में शोध कर आई थीं, और उनके पेट में चौथा बच्चा था। उन्होंने अपने बच्चे का स्तनपान ही कराया, बोतल नहीं लगाया।

वही अधिकारी आगे चल कर नॉर्वे की प्रधानमंत्री बनीं, और इस मुहिम में ‘डोर-टू-डोर’ कैम्पेन में जुट गईं। उस प्रधानमंत्री का नाम था ग्रो ब्रंटलां। प्रधानमंत्री ने आखिर खुद अपने बच्चे को दूध पिलाकर शुरुआत की थी। बात जम गई। नॉर्वे से बोतल हमेशा के लिए खत्म हो गया।

नार्वे में कार्यरत प्रवीण झा की एफबी वॉल से.

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थू है ऐसे राष्ट्रीय चैनलों पर, जिन्हें दिल्ली के बाहर की बेटियों का दर्द नहीं दिखता

इन दिनों देवभूमि हिमाचल प्रदेश की जनता एक बेटी से हुए गैंगरेप के बाद उसकी नृशंस हत्या के मामले को लेकर सड़कों पर है। दसवीं की इस छात्रा गुडिय़ा के साथ कातिलों ने जो किया, वह दिल्ली में हुए निर्भयाकांड से भी कहीं ज्यादा अमानवीय और दहलाने वाला अपराध था। इस मामले में हिमाचल की पुलिस की कार्यप्रणाली शक के घेरे में है और प्रदेश की वीरभद्र सरकार के प्रति भी जनता में भारी रोष है। राजनीतिक दल इस मुद्दे पर खुलकर राजनीति कर रहे हैं। सरकार ने मामले की जांच पुलिस से छीन कर सीबीआई को सौंप दी है। हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए सीबीआई को तुरंत जांच करने के साथ कुछ सख्त दिशानिर्देश दिए हैं। इस बीच पुलिस द्वारा पकड़े गए छह आरोपियों में से एक की पुलिस कस्टिडी में उसके ही साथी आरोपी ने हत्या कर दी है।

जनता का आरोप है कि इस मामले में शामिल रईसजादों को बचाया जा रहा है। इसके चलते जनता में रोष है। आरोपी की हत्या के बाद गुस्साई जनता एक थाने को जला दिया है और पुलिस की गाडिय़ों को आग के हवाले करने के साथ ही पुलिस कर्मियों पर पत्थरबाजी करके अस्पताल पहुंचा दिया। सरकासर ने कई पुलिस अधिकारी व थाने का पुरा स्टाफ बदल दिया है। कुल मिलाकर मामला इतना संगीन है कि हर रोज प्रदेश के अखबार इस प्रकरण की खबरों से भरे पड़े हैं, मगर बेशर्म राष्ट्रीय चैनल हैं कि उन्हें यह खबर नहीं दिख रही है। या कहें कि इस खबर में इन्हें ब्लैकमेलिंग या किसी सरकार को तंग करने का मसाला नहीं नजर आ रहा। ऐसे समाचार चैनलों पर थू है, जो दिल्ली की बेटियों पर हुए अत्याचार को पूरे देश की बेटियों से हुए अत्याचार से जोड़कर 24 घंटे भोंकने लगते हैं और जब इससे भी कहीं ज्यादा अमानवीय कृत्य किसी छोटे से राज्य की बेटी से होता है, तो ये आंखें मूंद लेते हैं।

अब इस वारदात की बात करें तो हिमाचल प्रदेश के जिला शिमला के कोटखाई थाना के तहत दसवीं कक्षा में पढऩे वाली एक स्कूली छात्रा को स्कूल से घर लौटते समय चार जुलाई को अगवाह कर लिया गया। इसके दो दिन बाद छह जुलाई को गुडिय़ा का क्षतविक्षत शव जंगल में एक खड्डे में मिला। जब शव का पोस्टमार्टम हुआ तो पता चला कि इस नाबालिग छात्रा के साथ  गैंगरेप हुआ है और आरोपियों ने बाद में इसकी बेरहमी से तड़पा-तड़पा कर हत्या कर दी है। इस खबर ने देवभूमि को झकझोर कर रख दिया। शांतिप्रिय हिमाचल प्रदेश का हर बाशिंदा इस घटना के बाद अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर ङ्क्षचतित और आक्रोशित है। प्रदेश की शांत वादियों में विचरते बहशी भेडिय़ों की यह हरकत दिल्ली में हुए निर्भया कांड से भी कहीं अधिक झकझोरने वाली है। एक बच्ची जो पढ़ाई करके कुछ बनने की चाह लिए घर से रोजाना दस किलोमीटर का पैदल सफर करके स्कूल तक आती-जाती थी। रास्ते में घने जंगल में मौजूद जंगली जानवरों के खतरों की परवाह किए बिना यह बेटी रोजाना पैदल या फिर किसी से लिफ्ट लेकर स्कूल आती-जाती थी। उसे क्या पता था कि उसकी इस कठिन राह में जंगली जानवरों से कहीं खतरनाक इंसान के वेष में घुम रहे भेडिय़ों भी खतरा बन सकते हैं।

देवभूमि हिमाचल की शांत वादियों में इंसानी भेडिय़ों के छिपे होने के खतरों से अनजान एक दिन चार जुलाई को जैसे ही उसने अपने साथियों से अलग अकेले घर की ओर बढऩे का फैसला लिया। वह इन भेडिय़ों के चंगुल में फंस गई। फिर जो हुआ उसका मंजर इतना भयानक रहा होगा, इसकी तस्दीक इस दसवीं कक्षा की छात्रा का मृत शरीर और इस पर मौजूदा दरिंदगी के निशान साफ करते नजर आ रहे थे। जिस किसी ने भी हसती खेलती इस गुडिय़ा का क्षतविक्षत शरीर देखा, वह उस पर हुए जुल्म की कल्पना से ही दहल उठा।

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महिला पत्रकार की पीड़ा- ”मेरा पति मुझे दूसरे मर्दों के साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर करता है!”

मैं ऋपसी उप्पल एक पत्रकार हूं और जम्मू की रहने वाली हूं…मेरी शादी पुरोला के रहने वाले राजेन्द्र उप्पल से 2009 में हुई थी….शादी के पहले साल इन्होंने देहज के लिए मुझे परेशान किया तो मेरे मम्मी पापा ने इन्हें 5 लाख कैश दिए और फिर इनकी बहन ने मेरे पापा से मेरे गहने औऱ जो घरेलू वस्तुए होती हैं वो ली….

दरअसल ये मेरी दूसरी शादी है जिस वजह से मैं चुप रही लेकिन शादी के दूसरे साल मेरे पति ने रात के 12 बजे मुझ पर हाथ उठाया और इनकी मम्मी दरवाजे पर खड़े होकर देखती रही….लेकिन तब इन्होंने अपने दोस्त को बुलाकर रजामंदी कराई …..इसी के साथ-साथ ये शादी के बाद से मेरे फिगर को लेकर काफी गंदे कमेंट करते…इसके बाद मैं पढ़ने पंजाब चली गई….औऱ फिर जॉब करने दिल्ली गई लेकिन इस दौरान मैं जब भी घर दो चार दिन के लिए आती तो तब ये मुझे कभी मारपीट तो कभी मुझे मानसिक तौर से प्रताड़ित करते….

मैं कई बार दुखी होकर घर छोड़कर जा भी चुकी हूं लेकिन फिर कहां जाउं, इस डर से वापस आ जाती….ये मेरे यहां दिल्ली 6-7 महीने के बाद सिर्फ एक या दो दिन के लिए आते…लेकिन मैं जब साथ रहने की बात करती तो ये मारते पीटते औऱ बोलते तुझसे मैंने शादी सिर्फ दो वजह से की थी… एक अपने शारीरिक सुख के लिए और दूसरा कि तू पैसे कमाए और मेरी मां व मेरे बुढ़ापे का सहारा बने…

अभी जनवरी में मेरा ऑप्रेशन हुआ था तब मैंने इनके आगे हाथ पैर जोड़ कर कहा कि मैं आपके साथ रहूंगी, आप प्लीज अपनी सारी हरकतें बंद कर दें.. हम नए सिरे से जिंदगी शुरू करते हैं… लेकिन ऑप्रशेन के कुछ दिनों बाद मेरी सास ने मुझ पर चाकू से जानलेवा हमला किया… जब मैंने पुलिस कंप्लेन करने की बात की तो मेरे पति ने कहा कि मैं आने वाले महीने में सब कुछ बदल दूंगा.. मैं तुम्हें बहुत खुश रखूंगा… पर मेरा नाम मत लेना नहीं तो मेरा राजनीतिक करियर बर्बाद हो जाएगा….

मैंने वूमेन सेल में और पुलिस स्टेशन जाकर कम्पलेन करवाई… बाद में हमारा समझौता करवा दिया गया और काउंसलिंग की डेट दी गई…. मैं एक काउंसलिंग पर गई लेकिन अगली डेट पर मेरे पति ने अपनी मां को मेरी ननद के यहां भेज दिया… मेरी सास के चले जाने के बाद वो मेरे साथ ना सिर्फ मारपीट करता बल्कि मुझे मानसिक तौर पर और भी प्रताड़ित करता….

आगे है.. मेरा पति बोलता है- मेरे साथ रहना है तो 22 साल की लड़कियां ले आओ और उनसे मेरे संबंध बनवाओ…

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पीएम मोदी के घर पर एसपीजी की महिलाएं रात में ड्यूटी क्यों नहीं करना चाहतीं?

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री के घर और निजता से संबंधित ये कैसी खबर? इस बार के “शुक्रवार” (24 फरवरी – 02 मार्च 2017) मैग्जीन में एक गंभीर खबर है। पहले पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित इस खबर का शीर्षक है, “फिर विवादों में घिरी एसपीजी” लेकिन यह प्रधानमंत्री निवास से संबंधित विवाद खड़ा कर रही है। खबर के मुताबिक एसपीजी की महिला सुरक्षा कर्मियों ने अपने आला अफसरों से गुहार लगाई है कि उन्हें रात की ड्यूटी पर न रखा जाए।

यहां यह गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के घर में परिवार की कोई महिला सदस्य नहीं रहती है। आम जानकारी यही है कि प्रधानमंत्री अपने घर पर अकेले रहते हैं। ऐसे में भारतीय संस्कारों के लिहाज से महिला सुरक्षा कर्मियों की रात की ड्यूटी लगनी ही नहीं चाहिए। उन्हें अधिकारियों से गुहार लगाने की आवश्यकता ही क्यों पड़े? यही नहीं, खबर में आगे कहा गया है, “माना जा रहा है कि वे किसी विवाद का साक्षी बनना नहीं चाहती हैं।” यह और गंभीर है।

खबर में (टाइपिंग की कुछ गड़बड़ी है) कहा गया है कि एसपीजी के तत्कालीन निदेशक दुर्गा प्रसाद को हटा दिया गया था। हटाने की कोई वजह नहीं बताई गई थी। हालांकि जिस तरह से यह कार्रवाई की गई थी उसमें तमाम अटकलों को बल मिला था। इनमें एक अटकल यह भी थी कि दुर्गा प्रसाद चाहते थे कि प्रधानमंत्री से जो भी मिलने आए उसे कैमरों के सामने से गुजरना पड़े और उसका पूरा रिकार्ड रखा जाए। इसमें कोई बुराई नहीं है और यह जरूरी भी लगता है। पर उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी (और पद से हटा दिया गया)। खबर में यह नहीं लिखा है कि दुर्गाप्रसाद के बाद कौन निदेशक हैं और अब क्या होता है। ना ही अभी के निदेशक से कोई बातचीत की गई है।

खबर में आगे लिखा है, अब यह अफवाह जोर पकड़ रही है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं कि उनके निवास में लगे कैमरे कमरों के अंदर नजर रखें। इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं तो शयन कक्षों में कैमरे नहीं होने चाहिए और दरवाजे तक को कैमरे की नजर में लाकर अंदर छोड़ा जा सकता है और इस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। पर विवाद हैं औऱ महिलाएं रात में ड्यूटी करना नहीं चाहती हैं – सबको जोड़ कर देखिए तो एक बड़ी खबर बनती है। अगर अधिकृत खबर नहीं छपी तो तरह-तरह की अफवाहें उड़ती रह सकती हैं और प्रधानमंत्री के घर के बारे में ऐसी खबरें, जैसे अंदर जाने वालों के लिए कैमरा नहीं है – सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

Pratima Rakesh दाल में काला है या पूरी दाल काली है ?स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप कहीं साहब के पास आने वाले लोगों की सूचना लीक ना कर दे इसलिये ये मनाही हो रही है!

Surendra Grover इस खबर को पढ़ कर लग रहा है कि दाल में कुछ काला ज़रूर है जिसकी साक्षी वे महिला सुरक्षा कर्मी नहीं बनना चाहती..

Sanjaya Kumar Singh है कोई जो कर सके इस खबर का फॉलो अप? कांग्रेसी इस स्तर तक नहीं गिरते।

Pankaj Pathak लगता है ‘साहेब’ खुद घर में रेनकोट पहने घूमते हैं, नहाने का तो पता नहीं।

Sunil Kumar Singh गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी के आवास पर एक महिला आती थी जिससे वो अकेले में मिलते थे । ऐसा एक आईपीएस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है इस मुद्दे पर दिल्ली विधानसभा में चर्चा भी हो चुकी है जो ऑन दी रिकॉर्ड है ।

आलोक पाण्डेय कांग्रेसी अफवाह उड़ाने में माहिर है

Sanjaya Kumar Singh हां भाई। कैमरा ही नहीं रहेगा तो सबूत कहां से आए। वो तो एनडी तिवारी जैसे लोग लगवाते हैं और खुद वीडियो बांटते हैं।


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कई मर्दों से संबंध रखने वाली ये महिला भी करवा चौथ व्रत कर रही है!

Balendu Swami : मैं करवा चौथ रखने वाली अपने आस-पास की कुछ महिलाओं को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ: 1) एक महिला, जो 15 साल से विवाहित है और रोज आदमी से लड़ाई होती है, सभी जानते हैं कि इनका वैवाहिक जीवन नरक है। 2) एक और महिला, जिसकी महीने में 20 दिन पति से बोलचाल बंद रहती है और वह उसे छिपाती भी नहीं है तथा अकसर अपनी जिन्दगी का रोना रोती रहती है।

3) इस तीसरी महिला को हफ्ते में दो-तीन बार उसका पति दारु पीकर पीटता है और उस महिला के अनुसार वेश्याओं के पास भी जाता है। 4) इस महिला के अपने मोहल्ले के ही 3 अलग अलग पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बन्ध हैं और इस बात को लेकर पति के साथ उसकी लड़ाई सड़क पर आ चुकी है तथा सबको पता है. 5) पांचवीं महिला की बात और भी विचित्र है: उसका अपने पति से तलाक और दहेज़ का केस कोर्ट में चल रहा है। केवल कोर्ट में तारीखों पर ही आमना-सामना होता है!

परन्तु ये सभी करवा चौथ का व्रत रखतीं हैं! क्यों रखती हैं तथा इनकी मानसिक स्थिति क्या होगी? ये कल्पना करने के लिए आप लोग स्वतंत्र हैं! इनके अतिरिक्त उन्हें आप क्या कहेंगे जो खुद को प्रगतिशील, नारीवादी और आधुनिका भी कहतीं हैं और करवा चौथ का व्रत भी रखतीं हैं! आप करवा चौथ करो, घूँघट करो या बुरका पहनो कम से कम इन रुढियों को संस्कार तो मत कहो! फिर आप स्त्री मुक्ति का झंडा भी उठातीं है। बहुत अजीब लगता है यह सब। आप स्वयं जिम्मेदार व्यक्ति हैं!

Chandan Srivastava : करवा चौथ के बेसिक कंसेप्ट से मेरा असहमत होना तो खैर लाजमी है। लेकिन मैने गौर किया कि पिछले कुछ सालों से बहुत से पति लोग भी पत्नी के साथ निर्जल व्रत रखने लगे हैं। यह एक बेहतरीन बदलाव आ रहा। सीधा सा संदेश है कि तुम मेरी सलामती के लिए उपवास रख रही हो तो मैं तुम्हारी ही पद्धति को फॉलो करके तुम्हारे इस समर्पण के प्रति शीश नवाता हूं। पति-पत्नी के बीच प्रेम और एकदूसरे के प्रति आपसी समझ बढ़ाने का इससे बढ़िया और क्या तरीका हो सकता है। 

काश कि इतनी ही समझ उन पतियों में भी होती और कहते कि तीन तलाक का अधिकार मेरी बीवी को भी दो, जब उसे एक से अधिक पति की इजाजत नहीं तो मुझे क्यों? मैं यह अधिकार स्वतः त्यागता हूं। इसके लिए बनाए कानून का मैं समर्थन करूंगा। निकाह-ए-हलाला जैसा घटियापन आज और अभी खत्म किया जाए। ऐसी घिनौनी प्रथा का समर्थक मुझे बलात्कारी नजर आता है। काश कि वे अपनी पत्नियों से इतना प्यार करते। काश कि वे अपने हिंदू दोस्तों से कुछ अच्छी बातें सीखते। काश की वे परिवर्तन के अहमियत को समझ पाते।

वृंदावन के नास्तिक स्वामी बालेंदु और लखनऊ के पत्रकार व वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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हे पुरुष, तुम अपनी सहूलियत के लिए ये ड्रामा बंद कर दो कि हम बेचारी हैं : डा. रूपा जैन

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। इस अवसर पर महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर एटा जिले की जानी मानी गाइनेकोलॉजिस्ट, भ्रूण हत्या के विरोध में और महिलाओं-बच्चियों की शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए लंबे समय से काम कर रहीं चर्चित डॉक्टर रूपा जैन ने साक्षात्कार में जो कुछ कहा है, उसे उनके शब्दों में यहां रख रहा हूं…

ये सृष्टि, ये दुनिया हमारी है, हमसे है, कमजोर हम नहीं हैं, ये पुरुष हैं : डा. रूपा जैन

पहले तो मैं आज तक यह बात समझ नहीं पाई हूँ कि लड़का लड़कियों में इतना भेदभाव क्यों हैं? बेटी बचाओ, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ… क्या नॉनसेंस है। बेटी बेटा दोनों बराबर हैं। जो जीव गर्भ में आ गया उसे जन्म देना ही होगा। देयर शुड बी ए ला अगेंस्ट डिटरमिनेशन ऑफ़ प्रिगनैन्सी। वन्स यू हेव कन्सीवड यू हेव टू गिव बर्थ, में इट बी अ बॉय और गर्ल। बेटिया पिता को कितनी प्यारी होती हैं, ये बात एक पिता से ज्यादा कौन जानता है। यदि बेटियां बचानी हैं तो मेंटीलिटी पुरुषों की नहीं, औरतों की मैंटीलिटी को रिफाइंड करना पड़ेगा। 

जब तक एक औरत औरत को मजबूत नहीं करेगी, यह समस्या हल नहीं हो सकती। मैं अपने इतने साल के डॉक्टरी करियर में दावे के साथ कह सकती हूँ कि एक भी बाप ने चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो, मुझसे आकर यह नहीं कहा कि लड़की हुई तो मुझे नहीं चाहिए। मैं पूरे समाज से गुहार नहीं करती क्योंकि समाज बहुत ही अनस्टेबल विषय है। पर मैं सिर्फ हरेक गर्भवती माँ से ये विनती करती हूँ कि अपने पेट में पलने वाले बच्चे को इश्वर का अंश समझकर उसकी रक्षक बनें, भक्षक नहीं। 

एक औरत की ताकत इश्वर को भी झुका सकती हैं तो इस समाज के नियम क्या चीज हैं। एक नारी में पुरुष से ज्यादा अधिक आत्मिक, मानसिक और शारीरिक शक्ति होती है। बच्चे को पैदा करने में जो दर्द माँ को होता हैं वह एक हार्ट अटैक के दर्द से भी ज्यादा होता है। ये समाज मेल डोमिनेटेड नहीं, फीमेल डोमिनेटेड है साहब। यदि फीमेल डॉमिनेशन नहीं होता तो एक औरत ये फैसला नहीं लेती कि बच्ची को गिरवाना है। इग्नोरेंस इज द रुट ऑफ़ आल ईविल। बच्चों को पढ़ाओ, चाहे वह बेटी हो या बेटा हो। बेटे को पढ़ाओगे तो ये जन्म सुधर जाएगा और बेटी को पढ़ाओगे तो आने वाली पुश्तें सुधर जायेगी।

मैं एक बात जानती हूं। एक झूठ यदि १०० बार बोला जाए तो बात सच लगने लगती है। पुरुष इस सच्चाई को जानते थे कि स्त्री हमसे १००० गुना ज्यादा ताकतवर है। वो बहुत चालाक थे। इसलिए उन्होंने जोर जोर से बार बार बोलना शुरू कर दिया औरत करजोर है, उसे ताकतवर बनाओ, औरत लाचार है इसकी रक्षा हमें करनी है। ये पुरुष बुद्धिजीवियों ने इस सोसाइटी को मेल डोमिनेटेड का नाम दे दिया।

आज मैं इस बात को जोर जोर से और १०० बार बोलती हूं और हर औरत से कहती हूँ कि वह भी यही बोले कि ये सृष्टि, ये दुनिया हमारी है, हमसे है। कमजोर हम नहीं हैं, ये पुरुष हैं। तुम हमारी रक्षा क्या करोगे? हम अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं। तुम्हे भी संभाल लेते हैं और तुम अपनी सहूलियत के लिए ये ड्रामा बंद कर दो कि हम बेचारी हैं। आ जाओ और अपनी सच्चाई सबके सामने लाओ। अब समय आ गया है कि बेटी बेटा, औरत पुरुष का अलाप बंद होना चाहिए। दोनों ईश्वर की रचना हैं। दोनों कुदरत का हिस्सा हैं। दोनों को अपना कार्य करने दो और यदि तुम मर्दों को औरत से ज्यादा समझते हो तो फिर ये रिजर्वेशन का मुद्दा कहाँ से आ जाता है आदमियों के लिए?

मैं तो यह चाहती हूँ कि सब रिजर्ववेशन ख़त्म हो जाने चाहिए। सिर्फ एक रिजर्वेशन हो- फीमेल रिजर्वेशन। औरतों के लिए करके दिखाओ तो हम जानें कि तुम्हें औरतो की कितनी चिंता है। फिर देखिये कौन सा ऐसा परिवार है जो बेटी को नहीं पढ़ायेगा। ५० प्रतिशत मेल के लिए और ५० प्रतिशत फीमेल के लिए। हो जाने दो आमने सामने की टक्कर। बदल जाने दो समाज को। 

राकेश भदौरिया
पत्रकार
एटा / कासगंज
मो. ९४५६०३७३४६

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वीमन हेल्पलाइन के बड़े दरोगा नवनीत सिकेरा को पत्रकार कुमार सौवीर ने दिखाया आइना

Kumar Sauvir : 1090 यानी वीमन हेल्प लाइन के बड़े दरोगा हैं नवनीत सिकेरा। अपराध और शोहदागिरी की राजधानी बनते जा रहे लखनऊ में परसो अपना जीवन फांसी के फंदे पर लटका चुकी बलरामपुर की बीडीएस छात्रा की मौत पर सिकेरा ने एक प्रेस-विज्ञप्ति अपनी वाल पर चस्पा किया है। सिकेरा ने निरमा से धुले अपने शब्द उड़ेलते हुए उस हादसे से अपना पल्लू झाड़ने की पूरी कवायद की है। लेकिन ऐसा करते हुए सिकेरा ने भले ही खुद को पाक-साफ़ करार दे दिया हो, लेकिन इस पूरे दर्दनाक हादसे की कालिख को प्रदेश सरकार और पूरे पुलिस विभाग के चेहरे पर पोत दिया है।

सिकेरा प्रेस विज्ञप्ति में कहते हैं:- “गुडम्बा थाना क्षेत्र में एक लड़की रानू (नाम बदला हुआ) ने शोहदों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकरण में रानू के पिता ने आरोप लगाया कि 1090 ने कोई मदद नहीं की। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि रानू की कोई कॉल 1090 को प्राप्त नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में जब कोई शिकायत प्राप्त ही न हो तो मदद कर पाना असंभव है। रानू की कोई भी शिकायत 1090 में दर्ज नहीं है।”

सिकेरा जी, जब आप फोन ही नहीं उठाएंगे तो हर फोन अनआन्सर्ड ही रहेगी ही। मेरे पास ऐसी पचासों शिकायत हैं, लेकिन आपके पास एक भी नहीं। और, फिर जो दर्ज रिपोर्ट होती भी है तो आप करते क्या हैं उसका सिकेरा जी। कम से कम एक मामले में तो मैं जानता हूँ कि उसमें 15 हजार वसूल लिया था आपके विवेचक ने। वह मेरी 84 वर्षीय माँ का मामला था जो अकेले ही रहती थीं और उसे एक अपराधी ने भद्दी गालियां देते हुए मकान खाली न करने पर जान से मार देने की धमकी दी थी। उस खबर पर पुलिस के प्रवक्ता और सूचना विभाग के कुख्यात चोंचलेबाज़ डिप्टी डायरेक्टर डा.  अशोक कुमार शर्मा ने इस डाल से उस डाल तक खूब कुलांचें भरी थीं, केवल प्रदर्शन के लिए। ऐसे में आपकी ऐसी सफाई बहुत शर्मनाक लगती है। काम करना बहुत साहस का काम होता है। कुर्सी तो कोई भी तोड़ सकता है। है कि नहीं बड़े दारोगा जी?

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

मूल पोस्ट>

यूपी में ‘समाजवादी’ जंगलराज : लखनऊ में छेड़खानी से परेशान एक मेडिकल छात्रा ने फांसी लगाकर जान दी

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शाहरुख खान को देखकर पागल हो जाने वाली ये महिला पत्रकार क्या पत्रकारिता करने लायक हैं!

मीडिया में यंगस्टर आजकल बड़े लोगों संग सेल्फी लेने और सितारों के साथ अपना प्रेम जाहिर करने आते हैं… कल नोएडा में किडजेनिया के लांच समारोह में शाहरुख खान आए.. जाहिर है लाखों लड़कियों के दिलों की धड़कन शाहरुख आए तो पागल होना लाजमी था… जीआईपी मॉल के बाहर भीड़ लग चुकी थी… शाहरुख ने प्रेस कांफ्रेंस शुरू की… कुछ नई लड़कियों का ग्रुप जो जागरण, फैशन डॉट कॉम और कुछ अन्य संस्थाओं से आईं थी, उन्हें देख कर लग रहा था कि वो केवल खान को देखने आई हैं… उन्हें इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से कोई लेना देना नहीं है … और हुआ भी वही…

एक नामी चैनल की पत्रकार ने जब शहरुख से असहिष्णुता पर सवाल पूछा तब पी.आर. और शाहरुख खान, दोनों ने जवाब देने से मना कर दिया… पर फैशनेबल महिला पत्रकारों के ग्रुप को इससे कुछ लेना देना न था… इसी ग्रुप की एक लड़की ने जल्द ही माइक पकड़ कर बोला- शाहरुख आईलव यू… आप मेरी जान हैं…. शाहरुख ने भी उतर दिया… i will marry u…

ये सुन वो नई नवेली पत्रकार पागल हो गई और शाहरुख के सामने ही बचकानी हरकत करने लगी… अभी ये खत्म ही नहीं हुआ था कि उसी ग्रुप की दूसरी लड़की खड़ी हुई और बोली… शाहरुख मैं पत्रकारिता को अलग रखती हूं और ये कहूंगी कि मैं आपकी सबसे बड़ी फैन हूं, मैं यंहा सिर्फ आपके साथ फोटो लेने आई हूं।

सवाल ये है कि क्या एडिटर लोग अपने पत्रकारों को समझा कर नहीं भेजते… आप वहां काम करने जा रही हैं न ही उसकी फैन बनने… अगर आप उसे सर पर चढाएंगे तो वो आपको कुछ नहीं समझेगा… आज समझ आया कि सलमान खान क्यों प्रेस कॉन्फ्रेंस में यंग लड़कियों से बात नहीं करते, क्यों सलमान किसी युवा को इंटरव्यू नहीं देते। अगली बार संस्थान ऐसी जगहों पर उसको भेजे जो पत्रकार ही हो, न कि फैन बनकर पहुंचे।

युवा पत्रकार विपुल कश्यप की रिपोर्ट. संपर्क : kashyap.vipul28@gmail.com

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ये सायकिल न चला पाने वाली ‘बीमार’ लड़की कैसे पहले स्कूटी, फिर कार वाली बन गई?

Geetali Saikia : बचपन में सायकिल सीखने को लेकर अक्सर भाई से मेरी लड़ाई हो जाती थी. एक तो वो लाल रंग की हरकुलिस उसे बहुत पसंद थी. दूसरी मैं इतनी कमजोर थी कि मुझे चोट लगने के डर से वो मुझे छूने भी नहीं देता था. अकसर बीमार रहती थी मैं. दुबली पतली होने के कारण उससे जीत नहीं पाती थी तो मन मसोसकर या तो घर में आ जाती या फिर बाउंड्रीवाल के किनारे लगे नारियल के पेड़ों में पत्थर मारती थी.

फिर भी मन नहीं मानता था. वो सायकिल चलाता रहता और मैं उसके पीछे दौड़ती रहती. रोज माँ से शिकायत करती थी की “मुझे भी सीखना है सायकिल” तो माँ प्यार से मुझे कहती की “अभी तुम बहुत कमजोर हो, सायकिल का भर सम्हाल न सकोगी, जब तुम एकदम अच्छी हो जाओगी तो हम तुम्हे बिना डंडे वाली सायकिल दिला देंगे”.

भारतीय लड़कियों के वजूद को दिलासों से अलग नहीं किया जा सकता. दिलासे हमारी जीवन शैली में घर कर जाते हैं और हम एक अनजानी ख़ुशी की आहट को महसूस कर अकारण खुश हो लेते हैं. मैं भी खुश हो जाया करती थी और अपने जल्दी ही स्वस्थ हो जाने की कामना करती थी.

बहुत भोला होता है बचपन. इस उम्र में हमे राजनैतिक, सामाजिक मामलों से कतई सरोकार नहीं होता है. मैं उडती हुई चिड़ियों को देखकर उड़ने की कोशिश करती तो अक्सर गिर जाती. भाई को क्रिकेट पसंद था. वो दीवार के सामने बैट लेकर खड़ा हो जाता मैं उसे बोलिंग करती. बैटिंग मुझे भी पसंद थी पर बोलिंग और फील्डिंग से ही मैं थक जाती थी और बीच खेल में ही उसे वाक ओवर दे कर जाके सो जाती थी.

बच्चे दिनभर जूझते रहते हैं क्योंकि बच्चों को हारना अच्छा नहीं लगता. मैं भी जूझती पर हार जाती थी. कहीं न कहीं से मेरे जोश और जूनून के बीच में हर बार मेरी कमजोरी आ ही जाती. यही कारण है बचपन में बीमार बच्चे inferiority complex के शिकार हो जाते है और कहीं न कहीं से मैं भी इसकी गिरफ्त में आ चुकी थी.

समय बीतता गया.

हम स्कूल में पढने लगे थे. मेरी समस्या ज्यो की त्यों थी. मुझे इतिहास भूगोल जैसे सब्जेक्ट याद नहीं हो पाते थे. हाँ मुझे दीदी हिंदी पढ़ा देती और मैथ व साइंस में मुझे समस्या नहीं थी. इस बीच बीमारी से निजात मिल चुकी थी, यही एक अच्छी बात थी.

7th में साइंस की क्लास में पढने को मिला कि किसी भी कार्य को करने के लिए एक मिनिमम उर्जा की आवश्यकता होती है. किसी काम को नहीं कर पाने का मतलब है की आपने उसके लिए उसके लिए आवश्यक उर्जा की मात्रा को नहीं प्रदान किया.

बात समझ में आ चुकी थी.

बचपन ख़त्म हो रहा था और एक कोशिश तो करनी ही थी. बस जानना ये था कि कौन से काम मैं कर सकती हूँ?

घर पहुँचते देखा मेरा डोगी मुझे देखकर उछल रहा था. पता नहीं क्या मन में आया. बस कुत्ते को चेन से अलग किया, और दौड़ पड़ी उसके साथ. खूब दौड़ी थी मैं उस दिन. और तब तक दौड़ी जब तक थकी नहीं. बेशक उस दिन फिर हारी थी.. पर इतना तो मालूम चल गया था की वो “मिनिमम एनर्जी लेवल” मेरे अन्दर बहुत पहले से थी. ईश्वर ने कोई नाइंसाफी नहीं की थी मेरे साथ. गलती मेरी थी! अनजाने में मैंने अपनी कमजोरी को बहाना मानते हुए कोशिश करने से ही तौबा कर लिया था.

जीवन में सबसे बड़ी ख़ुशी अपने आपको पहचानने पर होती है, ये सच है कि आप हर काम नहीं कर सकते पर ये तो सब पर लागू होता है. वैसे भी कोशिश करके आप बड़ी से बड़ी मिथक तोड़ सकते हैं. हर समस्या का एक समाधान है .खोजिये. हार मत मानिए.

अब बारी थी अपने शौक पूरे करने की. महीने भर से भी कम समय में बिना किसी की मदद के मैं सायकिल चलाना सीख गयी थी. दीदी ने अच्छे खासे हिंदी पोएम और कहानिया रटा दिए थे और मैं गर्व से लोगो को अकसर अपनी हिंदी बोल पाने की शेखी मारती थी.

माँ को मुझ पर भरोसा हो चला था. कुछ दिन बाद ही एक नयी सायकिल मेरे लिए घर में आ चुकी थी. और, समय के साथ वो सायकिल स्कूटी में और स्कूटी कार में बदल चुकी है.

असम के तिनसुकिया की निवासी गीताली सैकिया ने गुवाहाटी विश्वविद्यालय से एमएससी की पढ़ाई की है और खुद का अपना उद्यम संचालित करती हैं उनसे संपर्क उनके फेसबुक एकाउंट facebook.com/geetali.saikia.7 के जरिए किया जा सकता है.

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प्रतिमा भार्गव केस में प्रेस काउंसिल ने दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट को दोषी ठहराते हुए लताड़ा, …लेकिन बेशर्मों को शर्म कहां!

आगरा की रहने वाली प्रतिमा भार्गव ने मीडिया के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली है. लेकिन दुख इस बात का है कि बेशर्म मीडिया वाले इस खबर को कतई नहीं छापेंगे. अगर इनमें थोड़ी भी नैतिकता होती तो प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के इस फैसले को न सिर्फ प्रकाशित करते बल्कि खुद के पतने पर चिंता जताते, विमर्श करते. प्रतिमा भार्गव के खिलाफ एक फर्जी खबर दैनिक जागरण आगरा और आई-नेक्स्ट आगरा ने प्रमुखता से प्रकाशित किया. अनाप-शनाप आरोप लगाए.

प्रतिमा से कोई पक्ष नहीं लिया गया. खबर छपने के बाद जब प्रतिमा ने अपना पक्ष छपवाना चाहा तो दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों ने इनकार कर दिया. प्रतिमा ने लीगल नोटिस भेजा अखबार को तो इसकी भी परवाह नहीं की. अंत में थक हारकर प्रतिमा ने प्रेस काउंसिल आफ इंडिया में केस किया और वकीलों के साथ प्रजेंट हुई. अपनी पूरी बात बताई. प्रेस काउंसिल ने कई बार दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों को बुलाया लेकिन ये लोग नहीं आए.

अब जाकर प्रेस काउंसिल ने आदेश किया है कि दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट ने प्रतिमा भार्गव के मामले में पत्रकारिता के मानकों का उल्लंघन किया है. इस बाबत उचित कार्रवाई के लिए RNI एवं DAVP को आर्डर की पूरी कापी प्रेषित की है. साथ ही आदेश की कापी दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों-मालिकों को भी रवाना कर दिया है. क्या दैनिक जागरण का संपादक संजय गुप्ता और आई-नेक्स्ट का संपादक आलोक सांवल इस फैसले को अपने अखबार में छाप सकेंगे? क्या इनमें तनिक भी पत्रकारीय नैतिकता और सरोकार शेष है? क्या ये एक पीड़ित महिला ने सिस्टम के नियम-कानून को मानते हुए जो न्याय की लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसका सम्मान करते हुए माफीनामा प्रकाशित करेंगे व उसकी खराब हुई छवि को दुरुस्त करने के लिए प्रयास करेंगे?

शायद नहीं. इसलिए क्योंकि इसी को कहते हैं कारपोरेट जर्नलिज्म, जहां सरोकार से ज्यादा बड़ा होता है पैसा. जहां पत्रकारिता के मूल्यों से ज्यादा बड़ा होता है धन का अहंकार. जहां आम जन की पीड़ा से ज्यादा बड़ी चीज होती है अपनी खोखली इज्जत. प्रतिमा ने जो लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसके लिए वह न सिर्फ सराहना की पात्र हैं बल्कि हम सबका उन्हें एक सैल्यूट भी देना बनता है. अब आप सब सजेस्ट करें कि आगे प्रतिमा को क्या करना चाहिए.

क्या उन्हें दिल्ली आकर पूरे मामले पर प्रेस कांफ्रेंस करना चाहिए? क्या उन्हें सुप्रीम कोर्ट में इस बात के लिए केस करना चाहिए कि अगर ये दोषी अखबार माफीनामा नहीं छापते हैं तो कोई पीड़ित क्या करे? आप सभी अपनी राय दें, सुझाव दें क्योंकि ये कोई एक प्रतिमा का मामला नहीं है. ऐसे केस हजारों की संख्या में हैं लेकिन लोग लड़ते नहीं, देर तक अड़े नहीं रह पाते, लड़ाई को हर स्टेज तक नहीं ले जा पाते. प्रतिमा ने ऐसा किया और इसमें उनका काफी समय व धन लगा, लेकिन उन्होंने अपने पक्ष में न्याय हासिल किया. अब उन्हें आगे भी लड़ाई इस मसले पर लड़नी चाहिए तो कैसे लड़ें, कहां लड़ें या अब घर बैठ जाएं?

कहने वाले ये भी कहते हैं कि संजय गुप्ता और आलोक सांवल दरअसल संपादक हैं ही नहीं, इसलिए इनकी चमड़ी पर कोई असर नहीं पड़ता. संजय गुप्ता चूंकि नरेंद्र मोहन के बेटे हैं इसलिए जन्मना मालिक होने के कारण उन्हें संपादक पद दे दिया गया, पारिवारिक गिफ्ट के रूप में. आलोक सांवल मार्केटिंग और ब्रांडिंग का आदमी रहा है, साथ ही गुप्ताज का प्रियपात्र भी, इसलिए उसे थमा दिया गया आई-नेक्स्ट का संपादक पद.

यही कारण है कि इनमें संपादकों वाली संवेदनशीलता और सरोकार कतई नहीं हैं. ये सिर्फ अपनी कंपनी का बिजनेस इंट्रेस्ट देखते हैं और अखबार का प्रसार अधिकतम बना रहे, इसकी चिंता करते हैं. इनके पहाड़ जैसे अवैध साम्राज्य के नीचे हजार दो हजार आम जन दम तोड़ दें तो इनको क्या फरक पड़ने वाला है. खैर, न्याय सबका होता है, सिस्टम नहीं करेगा तो प्रकृित करेगी. वक्त जरूर लग सकता है लेकिन प्राकृतिक न्याय का सामना तो करना ही पड़ेगा. जिस कदर ये महिला प्रतिमा भार्गव पेरशान हुई है, उससे कम परेशानियां ये दोनों शख्स न झेलेंगे, ये तय है, मसला चाहे जो रहे. जै जै. 

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


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‘आउटलुक’ मैग्जीन ने महिला आईएएस अफसर को ‘आई कैंडी’ बता घटिया कार्टून छापा, अफसर ने लीगल नोटिस भेजा

हैदराबाद : एक महिला आईएएस अफसर जिसे जनता के अफसर के तौर पर जाना जाता है और जो सरकारी योजनाओं को लागू करने की दिशा में लेटेस्ट तकनीक के इस्तेमाल के लिए जानी जाती हैं, उसे ‘आउटलुक’ पत्रिका ने ‘आईकैंडी’ यानि ‘आंखों को लुभाने वाली’ बताते हुए एक घटिया किस्म का कार्टून प्रकाशित कर दिया है. साथ में एक आर्टिकल है जिसका शीर्षक है- ‘नो बोरिंग बाबू’. इसमें लिखा है कि हर मीटिंग में मौजूद महिला आईएएस अपनी खूबसूरत साड़ियों की वजह से फैशन स्टेटमेंट साबित होती हैं और मीटिंग में मौजूद लोगों के लिए आई कैंडी भी. आउटलुक मैगजीन में छपे कार्टून में महिला आईएएस अफसर को एक फैशन शो में रैम्प पर चलते दिखाया गया है.

कार्टून में यह भी दिखाया गया है कि तेलंगाना के सीएम के. चंद्रशेखर राव उनकी फोटो खींच रहे हैं. कार्टून में अन्य नेता उन्हें तिरछी नजरों से देखते नजर आते हैं. यह कार्टून महिला आईएएस अफसर के हैदराबाद में हुए एक फैशन शो में मौजूदगी से जुड़ा हुआ है. इसमें आईएएस अफसर अपने पति के साथ गई थीं. इससे भड़की महिला आईएएस अधिकारी ने मैग्जीन को लीगल नोटिस भेजा है और मांफी मांगने को कहा है.

आईएएस अफसर का नाम स्मिता सबरवाल है. वे तेलंगाना में पोस्टेड हैं. उनके पति अकुन सबरवाल एक आईपीएस अफसर हैं. आउटलुक मैग्जीन द्वारा खुद को आई कैंडी बताए जाने और एक विवादास्पद कार्टून छापे जाने से यह महिला आईएएस अफसर काफी नाराज हैं. उन्होंने आउटलुक को कानूनी नोटिस भेजा है. माफी न मांगने की सूरत में आपराधिक केस दर्ज कराने की चेतावनी दी है. उन्होंने इसे महिलाओं का अपमान बताते हुए आउटलुक प्रबंधन से कहा है कि वह पूरे देश की महिलाओं से माफी मांगे. उधर चीफ सेक्रेटरी राजीव शर्मा ने आदेश जारी कर मैगजीन के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं.

इस पूरे प्रकरण के बारे में आईएएस अधिकारी स्मिता सबरवाल का कहना है कि उन्होंने 14 साल सर्विस की है लेकिन मीडिया का ऐसा रोल उन्होंने आजतक नहीं देखा. इस लेख और कार्टून से बहुत दुख पहुंचा है. अगर आउटलुक मैग्जीन वाले ऐसा एक ब्यूरोक्रेट के साथ कर सकते हैं, जो गंभीर काम कर रही हैं तो सभी तरह की महिलाएं इस तरह की पीत पत्रकारिता का शिकार हो सकती हैं. हमें आगे आकर इसे खत्म करना होगा.

उधर, आउटलुक मैग्जीन से जुड़े लोगों ने बजाय माफी मांगने के, उसने यह कहकर मामले को हलका करने की कोशिश की है कि उन लोगों ने संबंधित आर्टकिल में महिला आईएएस अफसर का नाम नहीं छापा है.

कई राजनीतिक पार्टियों ने भी मैग्जीन पर निशाना साधा है. कांग्रेस जिलाध्यक्ष ए राजेंद्र रेड्डी ने कहा कि कार्टून के जरिए अधिकारी के लुक्स और पहनावे पर कमेंट करने को गलत करार दिया.

उल्लेखनीय है कि 2001 बैच की आईएएस अफसर स्मिता सबरवाल सीएम ऑफिस में तैनात पहली महिला आईएएस अफसर हैं. 1977 में जन्मीं दार्जिलिंग की रहने वालीं स्मिता के पिता कर्नल पीके दास सेना में थे. 22 साल की उम्र में उन्होंने यूपीएससी परीक्षा पास किया जिसमें उनकी चौथी रैंक थी. उन्होंने चित्तूर जिले में पहला प्रभार बतौर सब कलेक्टर संभाला. आंध्र प्रदेश के विभिन्न जिलों में एक दशक तक काम करने के बाद उन्होंने अप्रैल 2011 में करीमनगर जिले में डीएम का कार्यभार संभाला. बच्चों के विकास से जुड़े उनके एक कार्यक्रम को पीएम अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया जा चुका है.

महिला आईएएस अधिकारी स्मिता सबरवाल की कुछ तस्वीरें…

अपने आईपीएस पति के साथ महिला आईएएस अधिकारी…

अपने बच्चों के साथ महिला आईएएस अधिकारी….

अपने कार्यस्थल पर महिला आईएएस अधिकारी….

आउटलुक में प्रकाशित आर्टकिल यूं है…

The Insnider
Deep Throat
A regular column on the essential buzz

Telangana : No Boring Babu

The portfolio of a junior bureaucrat, who is posted in the Telan­gana CM’s office, is a mystery. She used to be posted in a district earlier. But things changed all of a sudden after the elect­ions. The lady is present at every meeting and seen in almost every official photograph sent out by the CMO. But what she does exa­ctly is a puzzle. She makes a fas­h­ion sta­tement with her lovely saris and serves as “eye candy” at meetings, admit leading party politicians. In fact, it’s this burea­ucrat who calls up other officials in the CMO and asks them to come for meetings. She knows exactly what time the CM will arrive and leave the office. The lovely lady, known for her ethnic style, recen­tly stunned all by appearing in a trendy trouser and frilly top at a fashion show. And for once, she wasn’t sitting in an official meeting. But this appearance too made for a great photo op.

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अनशन पर बैठी महिला पत्रकार का घर ढहाया, पति समेत गिरफ्तार कर जेल में डाला

छत्तीसगढ़ : उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश में पत्रकारों को जलाकर मार दिये जाने की घटनाओं के बीच छत्तीसगढ के रायगढ़ जिले के खरसिया की महिला पत्रकार आरती वैष्णव के संघर्ष को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। भ्रष्ट सीएमओ के खिलाफ आवाज उठाने वाली आरती वैष्णव को पहले तो अपना अजन्मा बच्चा खोना पड़ा, उसके बाद लगातार धमकियों का सामना करना पडा।जब कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई तो आरती और उनके ​पति ने महिला सीएमओ के खिलाफ आमरण अनशन शुरू कर दिया। इसे भी तुड़वाने की प्रशासन की तरफ से भरपूर कोशिश की गई लेकिन कल तो​हसीलदार द्वारा किया गया वायदा तोड़ दिया गया। वो भी कुछ इस रूप में कि पहले तो अनशनरत आरती को उनके पति के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। उनका घर जेसीबी से ढहा दिया गया।

प्राप्त जानकारी को अनुसार आरती वैष्णव को एससी एक्ट यानी धारा 355 में गिरफ्तार किा गया है। प्रशासन का कहर यहीं नहीं रुका। नगर निगम ने आरती और उनके पति की गैर मौजूदगी में घर में सो रहे बच्चों को बाहर निकाला और जेसीबी मशीन से उनका मकान मय सामान के जमींदोज कर दिया। इस तोड़फोड़ की जनकारी प्रभारी प्रभारी कलेक्टर क्षीर सागर को दी गई। उन्होंने इसे रोकने के आदेश जारी किया लेकिन तब तक आरती का आशियाना उजड चुका था।

फिलहाल आरती और उनके पति भूपेंद्र वैष्णव को पुलिस ने रायगढ जेल में रख हुआ है और उनके बच्चे परिचितों के पास हैं। इस पूरे मामले को देखते हुये ऐसा लगता है कि प्रशासन द्वारा पूरी कार्रवाई किसी पूर्वाग्रह के चलते ​की जा रही है। आरती वैष्णव का घर तोडे जाने के कारण कभी न कभी नगर निगम और स्थानीय प्रशासन भी कटघरे में होंगे क्योंकि आरती वैषणव का घर नजूल की भूमि पर बना हुआ है और उसका केस अभी न्यायालय में विचाराधीन है।

बहरहाल इस पूरे मामले में शासन प्रशासन की भूमिका तो संदेह के घेरे में है ही, सवाल स्थानीय पत्रकार संगठनों पर उठना भी लाजिमी है कि एक महिला पत्रकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष को लगातार अनदेखा किया जा रहा है, जो कि उनके अस्तित्व पर ही सवालिया निशान है।

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मिस्टर पुरुष, बदल लो सिंगल रहने वाली लड़की के प्रति सोच

Mamta Yadav : लडकी सिंगल रहती है, जरूर परेशान होगी, मजबूर होगी, पैसों की तंगी होगी। मदद कर देते हैं, कुछ न कुछ तो मिलेगा। इस ‘कुछ न कुछ’ की हद एक लडकी के मामले में कहां तक जा सकती है, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। दिमागों के जाले वक्त से पहले साफ कर लिये जायें तो सरेबाजार बेपर्दा होने का डर कभी नहीं सतायेगा। या तो जो मुखौटा है उसे कायम रखा जाये या असली थोबडे के साथ घूमिये तथाकथित भैया, अंकल, दोस्त। उन लडकियों को थोडी नहीं, बहुत आसानी होगी जो आपकी नजर में कमजोर बेचारी हैं।

मौका समझने के मुगालते अब न पालें आप लोग। जब अकेली लड़की अपने पर आयेगी तो मुंह छुपाने की जगह नहीं मिलेगी। आमतौर पर कहा जाता है लडकियां एक—दूसरे की बहुत बुराईयां करती हैं लेकिन सच्चाई यह है कि हर आदमी या लडका दूसरे आदमी की बुराई लडकियों के सामने ज्यादा करता है। खुद को स्मार्ट दिखाने के लिये। बेशक इस पोस्ट के बाद ये कमेंट भी आयेंगे कि लड़कियां भीदोषी हैं तो लड़कियों पर उंगलियां उठाने वाले ये भी देख लें कि चार उनकी तरफ हैं। अपने दम पर आगे बढती लड़की की तरक्की बहुत कम लोगों को हजम होती है। बहुत ज्यादा नहीं, थोड़ी उम्मीद हम भी कर सकते हैं कि आप भी अपनी सोच बदलें अगर वाकई इस मॉडर्न सोच के साथ आप जी रहे हैं कि इतना मजाक तो दोस्त, बेटी, बहन के साथ भी चलता है। हम तो हैं ही पिछड़ी सोच के। सारा बहनापा, बेटियापा और दोस्ताना किसी खास मौके पर ही जागता है। माफ करो यार, मौका मत समझो, हमें मौका दो खुद को साबित करने का।

मध्य प्रदेश की पत्रकार ममता यादव के फेसबुक वॉल से.

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फ्रांसीसी नेताओं की घिनौनी टिप्पणियों पर मुखर हुईं 40 महिला पत्रकार

पेरिस (फ्रांस) : यहां के चुनिंदा नेताओं द्वारा लैंगिक एवं घिनौना कटाक्ष करने पर देश की 40 महिला पत्रकारों ने खुला खत लिखते हुए चेतावनी दी है कि उनका अगला कदम उन राजनेताओं के नाम का खुलासा करना हो सकता है। 

एक हस्ताक्षर अभियान में ‘मीडियापार्ट’ की खोजी पत्रकार लीनैग ब्रिडॉक्स ने समाचार एजेंसी ‘एफे’ को बताया है कि यदि स्थिति इसी तरह बनी रहे तो उनका अगला कदम उन राजनेताओं के नाम का खुलासा करना होगा। ब्रिडॉक्स ने कहा कि इस मुद्दे पर काफी लंबे अर्से से चुप रहने के बाद यह कदम उठाया गया है। 

अखबार ‘लिबरेशन’ की पत्रकार लॉरे ब्रेटन के नेतृत्व में इस अभियान के तहत फ्रांसीसी मीडिया से हस्ताक्षरों को इकट्ठा करने में सफल रहे। इसमें फ्रांस की साप्ताहिक पत्रिका ‘पेरिस मैच’, फ्रांस का रेडिया स्टेशन ‘फ्रांस इंटर’ और रेडियो स्टेशन, समाचार पत्र ‘ली मंडे’ और ‘ली पेरिसियन’ शामिल हैं। इस संदेश में कहा गया है कि हम, राजनीतिक पत्रकार कुछ चुनिंदा सासंदों, सीनेट सदस्यों और फ्रांस के राजनीतिक वर्ग के लोगों द्वारा किए जा रहे असहनीय लैंगिकवादी व्यवहार की निंदा करते हैं।

(आईएएनएस से साभार)

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शामली में गैंगरेप से डरे मां-पिता ने बेटी के पैर में जंजीर डाल दिया!

एक स्टोरी लिख रहा था ‘बेटी के पैर में जंजीर’..आप भी सोच रहें होंगे कि आखिर एक बेटी के पैर में भला किसने और क्यों जंजीर डाल दी। सुनकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ जाएगा। घटना यूपी के शामली की है लेकिन पूरे देश को प्रतिबिंबित करती है। खुद माता पिता ने ही बेटी की अस्मत बचाने के लिए उसके एक पैर में जजीर बांध दी। वाकई माता पिता ने वो किया जिसे कानून इजाजत नहीं देता है लेकिन सोचिए लाचार माता पिता और क्या करते। महज 16 साल की उनकी बेटी मानसिक तौर से कमजोर है और कुछ दिन पहले उसे अज्ञात अपराधी घर के पास से बहकाकर ले गए और उसके साथ गैंगरेप की वारदात को अंजाम दे दिया।

बेटी को बदहवासी की हालत में पाकर माता पिता पर जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा। इलाके के पुलिस थाने से लेकर जिले के एसएसपी तक से मुलाकात की लेकिन आरोपी पकड़ना तो दूर की बात है उनका सुराग तक नहीं मिल सका। अपराधी बेखौफ और आजाद घूम रहे हैं। ऊपर से बेटी की मानसिक हालत ठीक नहीं है। उम्र भले बढ़ गई हो लेकिन दिमाग किसी छोटे बच्चे की तरह। कब कहां चली जाए, कहा नहीं जा सकता।

अब बताइए कि लाचार मां बाप और क्या करते। बेटी को बचाने के लिए उसके पैर में जंजीर ही पहना दी। दुख होता है ये सब देखकर। क्या ऐसे ही बेटियों की रक्षा होगी। हमारे आस पास इंसान से ज्यादा दरिंदे मौजूद हैं। ऊपर से कहीं चले जाओ, पुलिस का रवैया बिलकुल लापरवाही भरा। आपकी पकड़ है तो पुलिस चाय ठंडा सब पिलाएगी और मदद भी करेगी और यदि आप कमजोर हैं तो लगाते रहो थाने के चक्कर..और अपराधियों से बचाने के लिए बेटियों को भी जंजीर लगा के रखो।

ऐसी ही एक घटना मुंबई के करीब वसई में भी हुई थी, जहां बेटियों को बचाने के चक्कर में एक पिता ने कई सालों तक उन्हें घर में कैद कर रखा था। यहां तक कि पड़ोसियों को भी भनक नहीं लगी और जब लगी भी तो बहुत देर हो चुकी थी। बेटियां महज हड्डियों का ढांचा भर रह गई थीं। बेहद ही शर्मनाक घटनाएं हैं और जब तक ये होता रहेगा, हम लाख दुनिया जीत लेने का दंभ भरें, हमारा सिर शर्म से झुका रहेगा।

अश्विनी शर्मा की रिपोर्ट.

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इंडियन वुमेन प्रेस कार्प (IWPC) के चुनाव में सभी पदाधिकारी निर्विरोध निर्वाचित

 

इंडियन वुमेन प्रेस कार्प यानि IWPC का वर्ष 2015-16 के लिए चुनाव संपन्न हो गया. टीके राजलक्ष्मी, शोभना जैन और रविंदर बावा सहित सभी पदधिकारी व कार्यकारिणी निर्विरोध निर्वाचित घोषित की गई है. महिला पत्रकारों के इस संगठन की स्थापना का 21वां वर्ष चल रहा है. इस संगठन में करीब 700 से अधिक महिला पत्रकार सदस्य हैं. इस वर्ष के लिये घोषित टीम इस प्रकार है…

अध्यक्ष- टीके राजलक्ष्मी (फ्रंटलाइन)
उपाध्यक्ष- शोभना जैन (वीएनआई), मंजरी चतुर्वेदी (नभाटा)
महासचिव- रविंदर बावा (बीबीसी)
कोषाध्यक्ष- अन्नपूर्णा झा (फ्रीलांसर)

कार्यकारिणी- अदिती कपूर (फ्रीलांसर), अंबिका पंडित (टीओआई), अमिती सेन (हिन्दू बिज़नेसलाइन), अरुणा सिंह (साउथ एशियन इन्साईडर), इश्पिता बैनर्जी (फ्रीलांसर), कमलजीत कौर संधु (हेडलाइन्स टुडे,) माधवीश्री (फ्रीलांसर), नारायणी गणेश (टीओआई), प्रीति प्रकाश (फेस एन फैक्ट्स.कॉम), प्रीतपाल कौर (फ्रीलांसर), रंजना सक्सेना (फ्रीलांसर), संतोष मेहता (फ्रीलांसर), सर्जना शर्मा (कबीर कम्युनिकेशन्स), सीमा कौल (न्यूज़ एक्स), श्वेता रश्मि (ललकार), सुमन कंसरा (फ्रीलांसर), सुनीता वकील (समाचार पोस्ट), सुषमा वर्मा (फ्रीलांसर), विभा जोशी (ग्रोथ स्टोरी), विमल इस्सर (फ्रीलांसर).

प्रबंध समिति का चुनाव 18 अप्रैल 2015 को कोर के नई दिल्ली स्थित कार्यालय 5, विंडसर पैलेस में संपन्न हुआ.

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स्त्री-अस्मिता और कुछ सवाल

नैतिकता, जाति, धर्म, स्त्री और स्त्री-पुरुष संबंधों आदि से जुड़े तमाम सवालों को लेकर हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में, खासकर खाए-अघाए तबके में, पाखंड इस कदर हावी है कि वह अपनी तमाम कुंठाओं को तरह-तरह से छिपाता और सच या कड़वे सवालों का सामना करने से कतरता और घबराता है। इसलिए पिछले दिनों बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा छब्बीस फीसद से बढ़ा कर उनचास फीसद करने के लिए पेश किए गए विधेयक पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान चमड़ी के रंग और सुंदरता को लेकर दिए गए मेरे भाषण के एक अंश पर जिस तरह देशव्यापी चर्चा हुई और जिसका सिलसिला अब भी जारी है, उससे एक बार फिर यही साबित हो रहा है कि भारतीय समाज के अंतर्विरोधों, खासकर चमड़ी के रंग पर रची मानसिकता और स्त्री की अस्मिता को लेकर हमारे देश के पढ़े-लिखे तबके में भी ज्यादातर लोगों की सामान्य समझ औसत से कम है। जितनी है, वह बेहद विकृत है।

राज्यसभा में बीमा विधेयक पर बहस के दौरान मैंने सुंदरता और चमड़ी के रंग को लेकर समाज में व्याप्त एक खास पूर्वग्रह की जो आलोचना की थी, उसे भले कोई अप्रासंगिक माने या संदर्भ से काट कर और मूल विषय से हट कर देखे, लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस पूर्वग्रह की चर्चा के पीछे मेरा मकसद गोरे रंग को श्रेष्ठ समझने की उस हीन ग्रंथि की ओर इशारा करना था, जो हमारे भारतीय मन में गहरे पैठी हुई है, यहां तक कि हमारा सत्ता-तंत्र भी उससे मुक्त नहीं है। वह भी उन नीतियों की ओर बहुत जल्दी आकर्षित हो जाता है, जो गोरे मुल्कों में अपनाई जाती हैं।

आखिर इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है कि बीमा विधेयक में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने का सवाल हो या आर्थिक उदारीकरण की अन्य नीतियों का, इन सब पर स्पष्ट रूप से पश्चिमी गोरे मुल्कों का प्रभाव नजर आता है। यह गोरे रंग के प्रति हमारी आसक्ति का ही परिणाम है कि एक ब्रिटिश महिला हमारे देश में आती है और यहां उसे बलात्कार की एक दर्दनाक घटना पर वृत्तचित्र बनाने के लिए वे तमाम सुविधाएं और अनुमतियां आसानी से मिल जाती हैं, जो किसी भारतीय फिल्मकार को इतनी आसानी से नहीं मिल सकतीं। मैंने राज्यसभा में अपने भाषण के दौरान इन्हीं संदर्भों में गोरे रंग और सुंदरता के पैमाने को लेकर चर्चा की थी। स्त्री को महज घरेलू कामकाजी, बच्चे पैदा करने की मशीन या शरीर-सुख का साधन मानने वाली विकृत मानसिकता के लोगों को यह चर्चा जरूर अटपटी लगी होगी, मगर यह देह-चर्चा कतई नहीं थी।

क्या यह सच नहीं है कि हमारे समाज में गोरे रंग को सुंदरता का पर्याय माना और सांवले रंग को हीन दृष्टि से देखा जाता है। अखबारों के तमाम वैवाहिक विज्ञापन भी इस हकीकत की गवाही देते हैं। दरअसल, भारतीय समाज में सुंदर देहयष्टि और त्वचा के गोरेपन को लेकर तमाम तरह के पूर्वग्रह सदियों से अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। इसी के चलते अपने को गौरवर्ण और छरहरा बनाने-दिखाने की ललक कोई नई बात नहीं है। शरीर के सांवलेपन को दूर कर उसे गोरा बनाने के लिए तरह-तरह के लेप और उबटनों का उपयोग भी हमारे यहां प्राचीनकाल से होता आया है। लेकिन कोई दो दशक पहले शुरू हुई बाजारवादी अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण की विनाशकारी आंधी ने इस सहज प्रवृत्ति को एक तरह से पागलपन में तब्दील कर दिया है।

माना जाता है कि बाजार में होने वाली प्रतियोगिता उपभोक्ता और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए फायदेमंद होती है। लेकिन इस प्रतियोगिता में कई तरह की विकृतियां दिखाई देती हैं। अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने और मुनाफा कमाने के फेर में बहुत से विज्ञापनों, खासकर सौंदर्य प्रसाधनों और शरीर को आकर्षक बनाने वाले उत्पादों के विज्ञापनों में भ्रामक दावे किए जाते हैं। इन विज्ञापनों में स्त्री-देह का जिस तरीके से प्रदर्शन किया जाता है वह भी कम शर्मनाक नहीं होता।

कथित तौर पर गोरा बनाने वाली क्रीम और मोटापा घटाने की दवाइयों के टीवी चैनलों पर आने वाले विज्ञापनों ने किशोर और युवा मन की संवेदनाओं का शोषण करते हुए उनके मानस पटल पर देह की बनावट और चमड़ी के रंग पर रचा सौंदर्य का यह पैमाना गहराई से अंकित कर दिया है कि गोरे रंग और छरहरी काया के बगैर न मनचाहा जीवन-साथी मिल सकता है, न रोजगार। सामाजिक तौर पर ऐसे आपराधिक विज्ञापनों के खिलाफ समाज के किसी भी कोने से कभी कोई आवाज क्यों नहीं उठती? स्त्री को भोग की वस्तु के तौर पर पेश कर उसे सरेआम बेइज्जत करने वाले इन विज्ञापनों पर उन लोगों की संवेदना को भी क्यों लकवा मार जाता है, जो असली सवाल उठाने वालों को स्त्री-अस्मिता का शत्रु करार देने में दकियानूसी दलीलों और कुतर्कों के साथ बढ़-चढ़ कर मुखर हो उठते हैं?

आज देश में गोरा बनाने वाली क्रीम और अन्य सौंदर्य प्रसाधन उत्पादों का बाजार करीब चालीस हजार करोड़ रुपए का है। इसी के साथ मोटापा घटाने वाली दवाओं का बाजार भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि ऐसी क्रीमों और दवाओं से चमड़ी का रंग बदलना और मोटापा कम होना तो दूर, उलटे इन चीजों के इस्तेमाल से दूसरी बीमारियां जन्म ले लेती हैं। लेकिन मुनाफा कमाने की होड़ में शामिल इन कंपनियों और इनके विज्ञापन प्रसारित करने वाले प्रचार माध्यमों पर इन बातों का कोई असर नहीं होता है। इन उत्पादों को लोकप्रिय बनाने के लिए फिल्म, टीवी और खेल जगत के सितारों से इनके विज्ञापन कराए जाते हैं।

विडंबना यह है कि सांवले और मोटे लोगों में हीनताबोध पैदा कर उनकी नैसर्गिक योग्यता पर नकारात्मक असर डालने वाले इन विज्ञापनों में किए गए दावों की असलियत जांचने के लिए हमारे यहां न तो कोई कसौटी है और न ऐसे भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए कोई असरदार तंत्र। बाजारवाद की उपासक हमारी सरकारों की भी ऐसा तंत्र विकसित करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। आखिर चमड़ी के रंग और शरीर के आकार-प्रकार पर आधारित खूबसूरती और कामयाबी का यह विकृत पैमाना स्वस्थ समाज के निर्माण में कैसे सहायक हो सकता है? ऐसे पैमाने रचने वाली आपराधिक मानसिकता के खिलाफ आवाज उठाना अगर किसी को अपराध लगता है, तो लगता रहे। मुझे ऐसा अपराध करने से कोई नहीं रोक सकता। आखिर यह मेरा राजनीतिक और सामाजिक दायित्व है।

चमड़ी के गोरे रंग पर आधारित पश्चिम की इस रंगभेदी सौंदर्य-दृष्टि से उपजा हीनताबोध और कुंठा कितनी खतरनाक होती है, इसकी सबसे बड़ी मिसाल रहा है मशहूर पॉप गायक माइकल जैक्सन। जिस समय पश्चिमी समाज में रंगभेद के खिलाफ जारी संघर्ष अपने निर्णायक दौर में था, गौरांग महाप्रभुओं के यूरोपीय देशों सहित पूरी दुनिया में इस श्यामवर्णीय लोकप्रिय कलाकार की पॉप गायकी का जादू छाया हुआ था। बेपनाह दौलत और शोहरत हासिल करने के बाद अपनी त्वचा को काले रंग से छुटकारा दिलाने की कुंठाजनित ललक में जैक्सन ने अपने शरीर की प्लास्टिक सर्जरी कराई थी। इस सर्जरी से उसकी त्वचा का रंग गोरा तो हो गया था, लेकिन सर्जरी और दवाओं के दुष्प्रभावों के चलते उसे कई तरह की बीमारियों ने घेर लिया था, जो आखिरकार उसकी मौत का कारण बन गर्इं।

हालांकि जैक्सन की बहन जेनिथ जैक्सन आज भी अपने काले रंग के बावजूद पॉप गायकी के क्षेत्र में धूम मचाए हुए है। इसी सिलसिले में चर्चित मॉडल नाओमी कैंपबेल का जिक्र भी किया जा सकता है, जो अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के दम पर आज ग्लैमर की दुनिया में सुपर मॉडल के तौर पर जानी जाती है। उसकी इस उपलब्धि में उसकी त्वचा का काला रंग कहीं आड़े नहीं आया।

व्यक्ति की कामयाबी में चमड़ी के गोरे रंग की कोई भूमिका नहीं होती, इस तथ्य को जोरदार तरीके से साबित करने वालों में बराक ओबामा का नाम भी शुमार किया जा सकता है, जो आज दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रप्रमुख हैं। दरअसल, वाइट हाउस में किसी ब्लैक का बैठना अमेरिकी इतिहास में किसी युगांतरकारी घटना से कम नहीं है।

गोरे रंग को श्रेष्ठ मानने की धारणा सारी दुनिया में किसी न किसी हद तक प्रचलित है, लेकिन हमारे देश में यह ज्यादा गहराई से जड़ें जमाए हुए है। क्या इस अमानवीय और अन्यायी मानसिकता पर चोट करना और उससे उबरने का आग्रह करना कोई अपराध है? दरअसल, गौरवर्ण की तानाशाही दुनिया का सबसे बड़ा उत्पीड़न है। वैसे तो दुनिया की सभी स्त्रियां किसी न किसी रूप में उत्पीड़ित हैं, लेकिन सांवले या काले रंग की स्त्रियां कुछ ज्यादा उत्पीड़न का शिकार होती हैं। वे चिंता और हीनता की खुराक पर ही पलती हैं। इस तथ्य को महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास’ और समाजवादी विचारक डॉ राममनोहर लोहिया ने अपने चर्चित निबंध ‘राजनीति में फुरसत के क्षण’ में शिद्दत से रेखांकित किया है।

कुल मिलाकर मेरा कहने का आशय यही है कि हमारे समाज में औरत की दोयम स्थिति और चमड़ी के रंग पर रची मानसिकता एक कड़वी हकीकत है। जो लोग नैतिकता का ढोल पीटते हुए इस हकीकत को नकारते या अनदेखा करते हैं वे अपने शुतुरमुर्गीय रवैए का ही परिचय देते हैं। जातीय और लैंगिक कठघरे में जकड़े ऐसे लोग ही दूसरों को जातीय समरसता और स्त्री के सम्मान का पाठ पढ़ा कर अपने अपराधबोध या अज्ञान को छिपाने का भोंडा प्रयास अक्सर करते रहते हैं। ऐसे लोगों की स्त्री के प्रति संवेदना कितनी कुंद है, इसका अंदाजा देश में बीसवीं सदी की शुरुआत से व्यापक पैमाने पर जारी कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति से भी लगाया जा सकता है, जिसके चलते लिंग अनुपात गंभीर रूप से गड़बड़ा रहा है।

स्त्रियों के प्रति होने वाले नाना प्रकार के अत्याचार हमारे समाचार माध्यमों में खूब जगह पाते हैं, लेकिन यह जानकारी कम ही लोगों को है कि जितनी स्त्रियां बलात्कार, दहेज और अन्य मानसिक तथा शारीरिक अत्याचारों की शिकार होती हैं, उससे कई सौ गुना ज्यादा तो जन्म लेने से पहले ही गर्भ में मार दी जाती हैं। वाणी और विचार में स्त्री को देवी का दर्जा देने वाले, पर व्यवहार में स्त्री के प्रति हर स्तर पर घोर भेदभाव बरतने और उस पर अमानुषिक अत्याचार करने वाले हमारे समाज की आधुनिक तकनीक के सहारे की जाने वाली यह चरम बर्बरता है। इस बर्बरता के खिलाफ स्त्री अस्मिता के तमाम झंडाबरदार क्यों मौन रहते हैं? दरअसल, जरूरत है स्त्री को मनुष्य समझे जाने की और समाज की शक्ल सुधारने की। आईने को दोष देने से काम नहीं चलेगा। शक्ल ही भद्दी हो तो आखिर आईना क्या करेगा?

जनसत्ता से साभार

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एक न्यूज चैनल जहां महिला पत्रकारों को प्रमोशन के लिए मालिक के साथ अकेले में ‘गोल्डन काफी’ पीनी पड़ती है!

चौथा स्तंभ आज खुद को अपने बल पर खड़ा रख पाने में नाक़ाम साबित हो रहा है…. आज ये स्तंभ अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिसक रहा है… खासकर छोटे न्यूज चैनलों ने जो दलाली, उगाही, धंधे को ही असली पत्रकारिता मानते हैं, गंध मचा रखा है. ये चैनल राजनेताओं का सहारा लेने पर, ख़बरों को ब्रांड घोषित कर उसके जरिये पत्रकारिता की खुले बाज़ार में नीलामी करने को रोजाना का काम मानते हैं… इन चैनलों में हर चीज का दाम तय है… किस खबर को कितना समय देना है… किस अंदाज और किस एंगल से ख़बर उठानी है… सब कुछ तय है… मैंने अपने एक साल के पत्रकारिता के अनुभव में जो देखा, जो सुना और जो सीखा वो किताबी बातों से कही ज्यादा अलग था…. दिक्कत होती थी अंतर आंकने में…. जो पढ़ा वो सही था या जो इन आँखों से देखा वो सही है…

कहते हैं किताबी जानकारी से बेहतर प्रायोगिक जानकारी होती है तो उसी सिद्धांत को सही मानते हुए मैंने भी उसी को सही माना जो मैंने अपनी आखों से देखा…  बहुत सुंदर लगती थी ये मीडिया नगरी बाहर से…. पर यहां केवल खबर नहीं बिकती… कुछ और भी बिकता है… यहाँ सिर्फ अंदाज़ नीलाम नहीं होते, यहां बिकता है स्वाभिमान… यहां क्रोमा के साथ और भी बहुत कुछ कट जाता है… यहां कटते हैं महिला पत्रकार के अरमान… यहां बलि चढ़ती है उसकी अस्मिता…. कामयाबी दूर होती है, लेकिन उसे पास लाने के यहां शॉर्टकट भी बहुत हैं… और उसे नाम दिया जाता है समझौता…

जब पहली बार एक नेशनल न्यूज़ चैनल के दफ्तर में कदम रखा तो सोचा था की अपनी काबलियत और हुनर के बलबूते बहुत आगे जाउंगी… आडिशन दिया… पीसीआर में खड़े लोगों ने अपनी आखों से ऐसे एक्सरे किया जैसे मेट्रो स्टेशन पर लगी एक्सरे मशीन आपके सामान का एक्सरे करती है… सिलेक्शन हुआ और शुरू हुआ मेरा भी करियर….. कुछ दिनों तक तो सब ठीक-ठाक चला, लेकिन अपनी काबिलियत के बलबूते शायद मैं कुछ लोगों की आँखों की किरकिरी बनने लगी…

जब एक नन्हा परिंदा खुले आसमान में उड़ने की कोशिश करता है तब उसी आसमान में उड़ती हुई चील उस पर झपट्टा मारकर उसे अपना शिकार बनाने की कोशिश करती है… कुछ वैसा ही मेरे साथ भी होने लगा… मैं परेशान होकर सबसे पूछती फिरती कि आखिर बात क्या है… लेकिन किसी से जवाब नहीं मिलता… हार कर सीधे चैनल के मालिक से मिलने पहुंच गई… सोचा था कि यहाँ से तो हल जरूर मिलेगा.. लेकिन दिलो-दिमाग़ को तब 440 वोल्ट का झटका लगा जब ये पता चला कि मालिक से मिलने के बाद उनके साथ अंतरंग में एक कप काफ़ी पीनी पड़ेगी जो मेरे काम भी करा देगी, साथ ही साथ प्रमोशन और सैलरी में अच्छी खासी बढ़ोतरी करा देगी… ऑफिस की कई लड़कियां वो काफ़ी पी चुकी हैं… तब समझ आया कि जिनको JOURNALISM का J नहीं आता वो कैसे इतनी ऊंची पोस्ट पर पहुंच गये… जाहिर है सारा कमाल उस गोल्डन काफ़ी का था…

अब दो आप्शन थे मेरे सामने… या तो नौकरी छोड़ दूं या उस काफ़ी का एक सिप ले लूं… लेकिन मैं बेचारी, अपने काबिलियत को एक कप काफ़ी की कीमत से नहीं तौल पाई… और नौकरी छोड़ दी मैंने…. अब दूसरे संस्थान में हूं… ये कैसा सच है, जिसे सब जानते हैं लेकिन सब झूठ मानकर अपनी नौकरी बचाने के लिए चुपचाप बस देखते हैं… आंखें बंद कर लेते हैं… बात होती भी है तो बड़ी गोपनीयता से अपने विश्वसनीय सहयोगी के साथ.. प्राइम टाइम में गला फाड़-फाड़ कर दुनिया भर को बात-बात पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले ये बातें करते समय शायद अपने चरित्र के बारे में भूल जाते हैं….  मैंने कहा था ना….. यहाँ सब बिकता है….. नैतिकता भी…..चरित्र भी….

एक युवा महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. महिला पत्रकार ने अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. उन्होंने जिस न्यूज चैनल के बारे में उपरोक्त बातें लिख कर भेजा है, वह चैनल कई वजहों से कुख्यात और विवादित रहा है. चैनल के बारे में कहा जाता है कि नाम बड़ा और दर्शन छोटे. चैनल हिंदुत्व के नाम पर चलाया जाता है और जमकर मीडियाकर्मियों का शोषण किया जाता है.

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धार्मिक चैनल के सीओओ ने एंकर के साथ ऋषिकेश के होटल में की छेड़छाड़, मामला दबा दिया गया

मानव जीवन को दिशा देने हेतु अध्यात्म, आस्था, धर्म, साधना आदि का ज्ञान पहचान कराने वाले धार्मिक न्यूज चैनलों के अंदर खुद कितनी अनैतिकता-अधार्मिकता है, इसे कोई मीडिया के बाहर का सीधा सच्चा आदमी जान जाए तो उसे पूरे धर्म से ही घृणा-वितृष्णा हो जाए. बाबाओं से पैसे लेकर उनके भाषण प्रवचन प्रसारित करने वाले धार्मिक चैनलों में से एक चैनल के सीओओ पर आरोप लगा है कि उन्होंने अपने सहकर्मी के साथ यौन दुर्व्यवहार किया है. हालांकि पीड़िता खुलकर सामने नहीं आ पा रही है लेकिन उसके साथ काम करने वाली महिलाओं का कहना है कि पीड़िता एंकर के पद पर है और उसने चैनल के अंदर कंप्लेन की हुई है.

पर चैनल के लोगों का कहना है कि सीओओ इतना पावरफुल है और प्रबंधन का खास है कि उसके खिलाफ बोर्ड मीटिंग में कोई एक्शन नहीं होता. वह हमेशा साफ पाक बरी होकर बाहर निकल जाता है क्योंकि उस पर मालिक मेहरबान हैं. चैनल के सीओओ से पीड़ित एंकर ने दिल्ली महिला सेल में शिकायत की धमकी दी है. चर्चा है कि पीड़ित एंकर का मनुहार कर मुंह बंद रखने को मजबूर कर दिया गया है. पीड़ित एंकर और चैनल के सीओओ के साथ-साथ की तस्वीरें इनके फेसबुक एकाउंट पर भी हैं जिनसे पता चलता है कि दोनों काफी करीबी हैं. पर एंकर को यह अंदाजा नहीं था कि इस करीबी का मतलब सीओओ कुछ और निकालता है.

सूत्रों के मुताबिक पीड़िता एंकर अपने सीओओ के साथ एक शूट पर ऋषिकेश गई हुई थी. वहां होटल के रूप में एंकर के साथ सीओओ ने बदतमीजी की. ये सीओओ महिलाओं से दुर्व्यवहार के मामले में कुख्यात है. कभी ये लड़कियों को उल्टे सीधे एसएमएस भेज भेज कर परेशान करता है तो कभी उनके साथ अश्लील हरकत करके. इन्हीं हरकतों के कारण पिछले दिनों चैनल से एक लड़की ने इस्तीफा दे दिया. ताजे घटनाक्रम की पीड़िता इतनी डरी हुई है कि वह बाहर कंप्लेन करने की हिम्मत नहीं कर पा रही है.

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8 मार्च को महिला पत्रकारों के सम्मान में प्रेस क्लब आफ इंडिया में कई किस्म का आयोजन

साल 2014 से प्रेस क्लब में महिला पत्रकारों के सम्मान में महिला दिवस मनाने का रिवाज शुरू हुआ. इस साल भी यह कार्यक्रम होगा. साल 2014 की तरह इस बार भी प्रेस क्लब के प्रांगण में महिला पत्रकार पत्रकारिता के साथ-साथ अन्य खूबियों के साथ मौजूद रहेंगी. इस 8 मार्च, दिन रविवार को पिछले साल से भी बड़े स्तर पर महिला दिवस का आयोजन किया जा रहा है. प्रेस क्लब की मैनेजिंग कमेटी की ज्वांईट सेक्रेटरी विनीता यादव, जो प्रेस क्लब में समय-समय पर अलग अलग कार्यक्रम करवाती आई हैं, का मानना है कि क्लब में महिला दिवस बड़े स्तर पर मनाने से ये पता चलता है कि क्लब महिला पत्रकारों के सम्मान, क्लब में उनकी बराबर उपस्थिति और उनकी प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है.

प्रेस क्लब के मैनेजिंग कमेटी के जनरल सेक्रेटरी नदीम काज़मी का मानना है कि क्लब में महिला दिवस इस स्तर पर बनाना क्लब के गौरव को और बढाता है. क्लब की मैनेंजिंग कमेटी मेंबर कोमल शर्मा, जो क्लब में सांस्कृतिक कार्यक्रम करवाती आई हैं, इस साल महिला दिवस में भी सहयोग कर रही हैं.

8 मार्च 2014 को सुबह 11.30 बजे क्लब में महिला पत्रकार ज्वैलरी, कपड़ों, हैंडिक्राफ्ट, टैरोकार्ड, साज-सज्जा, स्वादिष्ट और हेल्दी खाने के स्टॉल्स लगाएंगी. पूरे दिन मैजिक शो, अफ्रीकन ड्रम पर्फोमेंस, थियेटर और बच्चों का डांस प्रोग्राम समेत कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे जो महिला मुद्दों पर आधारित रहेंगे. साथ ही अलग-अलग क्षेत्रों में एक खास मुकाम हासिल कर चुकी प्रतिभावान महिलाओं को सम्मानित किया जाएगा.

इस खास दिन पत्रकारों से रूबरू होने के लिए मुख्य अतिथि के तौर पर जस्टिस उषा मेहरा समेत कई मंत्री और मुख्यमंत्री आमंत्रित हैं.  प्यारे पत्रकार बंधुओं, आप सभी को महिला दिवस के इस खास मौके पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया तहे दिल से आमंत्रित करता है.

धन्यवाद

प्रेस क्लब आफ इंडिया
रायसीना रोड
नई दिल्ली

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Concern over harassment to lady scribe

GUWAHATI : The Electronic Media Forum Assam (EMFA) has expressed serious concern over the telephonic harassment and even threats to a Guwahati-based television reporter-cum-anchor by miscreants. It has been understood that some persons used to call the lady journalist with abusive languages which prompted her to lodge an FIR in Paltan Bazar police station. The police has reportedly tracked and arrested a few individuals from Guwahati and Kolkata suspecting their roles in the case.

The journalist has also communicated the Assam Police chief Khagen Sarma, wherein the DGP assured her all necessary support. The EMFA, while condemning the mentality of the criminals involved in harassing a lady journalist, has urged the authority to take appropriate and timely actions in this regard. The television media forum has also appealed to the State Chief Minister Tarun Gogoi, also in charge of Home portfolio, to take personal interest to resolve the matter at the earliest.

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उबर के सीईओ ने कहा था- हम एक बूबर कंपनी हैं जिसके साथ महिलाएं सोना चाहती हैं!

: अमेरिकी महिला पत्रकार ने किया बड़ा खुलासा : बात इसी साल अक्टूबर की है जब सारा लेसी फ्रांस के शहर लियोन में थीं और कहीं जाने के लिए टैक्सी का इंतजार कर रही थीं। तभी उनकी निगाह एक ऐसे प्रचार पर पड़ी जिसमें लिखा था कि हॉट फीमेल ड्राइवर्स की सुविधा के लिए इस नंबर पर डायल करें। इस एड को देखते ही लेसी ने तय किया कि वह उस एप को ही डिलीट कर देंगी जो कैब की सुविधा देती है। लेसी को लगा कि वह खुद एक महिला हैं और अगर महिलाओं का इस्तेमाल इस तरह से किया जाएगा तो उनके साथ रेप जैसी घटनाओं को होने से कैसे रोका जा सकता है।

असल में सारा लेसी अमेरिका की एक टेक्नॉलेजी जर्नलिस्ट हैं जिन्होंने इसी साल अक्टूबर में अपने स्मार्टफोन से उबर एप को डिलीट किया और अपने जानने वालों से ही ऐसा करने की अपील की। उनके इस अभियान को शुरू हुए अभी दो महीने भी नहीं हुए थे कि उन्हें दिल्ली में उबर के कैब ड्राइवर द्वारा महिला के बलात्कार की घटना का पता चला। इस बारे में सुनते ही उन्होंने ट्विट कर कहा कि यह जानकर उन्हें बेहद दुख हो रहा है।

इस अमेरिकी महिला जर्नलिस्ट ने जिस सच्चाई की ओर संकेत किया वह इतनी शर्मनाक है जिसे जानकर किसी का भी सिर शर्म से झुक जाए। असल में लेसी भी कई बार उबर की सुविधाएं ले चुकी हैं लेकिन उनका कहना है कि असल मुद्दा ये नहीं है कि कौन सी कैब कंपनी कम खतरनाक है और कौन ज्यादा। असल समस्या ये है कि हमारी संस्कृति ही महिलाओं के अपमान को बढ़ावा देनी वाली है।

लेसी एक न्यूज वेबसाइट चलाती हैं। अभी हाल ही में उन्होंने एक इंवेस्टिगेटिव स्टोरी की ‌थी जिसमें उन्होंने उबर के उस दावे के खोखलेपन को साबित किया था जिसमें कंपनी कहती है कि उसके किसी भी ड्राइवर का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। लेसी ने अपनी रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि जैसे ही काोई उबर ड्राइवर्स की शिकायत कंपनी से करतीं कंपनी के लोग उलट कर पैसेंजर पर ही दोष मढ़ देते। यहां तक कहा जाता कि पैसेंजर ने इतने भड़काउ ड्रेस पहन रखे थे कि इस तरह की घटना को रोका नहीं जा सकता।

लेसी ने बताया कि उबर ऐसी कंपनी है जिसके सीईओ ट्रैविस क्लेनिक ने कंपनी की सफलता से खुश होकर कहा ‌कहा था कि हम एक बूबर (Boober) कंपनी है जिसके साथ महिलाएं सोना चाहती हैं। कंपनी तो यह तक कहती है कि महिलाएं टैक्सी ड्राइवर के हमले को सबसे ज्यादा शिकार बनतीं हैं। ऐसे में सिर्फ उबर को ही इसके लिए दोषी ठहराना गलत है। लेसी से तो यह तक कहा गया कि अगर उनके खुलासे के बाद भी महिलाओं के साथ इस तरह की घटना होती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी लेसी जैसी महिलाओं को लेनी चाहिए।

लेसी का कहना है कि जैसे ही इस तरह की घटनाओं के बारे में जिम्मेदारी लेने की बात आती है कोई भी आगे नहीं आना चाहता। लेसी की रिपोर्ट का सार है कि हमारे समाज में महिलाओं को जब तक उपभोग की वस्तु के रूप में प्रयोग किया जाता रहेगा उसे सम्मान दिलाना मुश्किल है। ऐसे में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सांस्कृतिक मूल्यों में बदलाव की गंभीर आवश्यकता है।

साभार: indianexpress.com

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बटंग में महिलाओं का मोर्चा, गांव में शराबियों की खैर नहीं

बटंग से लौट कर अमरेन्द्र कुमार आर्य की रिपोर्ट

भिलाई। जागो युवा, जागो नारी, खत्म करो शराब की बीमारी… नारी शक्ति जाग गई… गांव की रक्षा कौन करेगा, हम करेंगे, हम करेंगे। बटंग गांव मेंरोज रात १० बजे यही सीन देखा जा सकता है। इस गांव में जब पुरुष सोने की तैयारी कर रही होती हैं, तब गांव की महिलाएं हाथों में लाठी लेकर शराबियों और शराब की अवैध बिक्री करने वालों के खिलाफ मोर्चेबंदी की तैयारी करती हैं। हर रात महिलाएं बेखौफ होकर गांव में घूम घूम कर शराब माफिया को चुनौती दे रही हैं।

बटंग गांव में जनजागरुकता के नारों के साथ महिलाओं की आवाज पूरे गांव में गूंजती है। गांव में पहुंचते ही दो लोग करीब आए। परिचय पूछते हुए कई सवाल किए। इसके बाद मंच के पास चलने का इशारा किया। कबीर कुटी के बगल में बने मानस मंच पर सैकड़ों महिलाएं हाथों में लाठी-डंडा लेकर मार्च करने की तैयारी कर रही थी। साथ में कोटवार सुरेन्द्र सिंह चौहान नारे लगा रहा था। गांव के ज्यादातर अपने घर पर सोने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन महिलाएं महिलाएं मुस्तैदी के साथ शराब के खिलाफ मोर्चें पर डटी थी।

यूपी के बुंदेलखंड की गुलाबी गैंग की चर्चा आपने सुनी होगी। इसी तर्ज पर पाटन ब्लॉक के बटंग गांव में महिलाएं शराब बेचने और शराब पीकर गांव में हंगामा करने वालों का विरोध कर रही हैं। हालत यह है कि महिला जन चेतना मंच से जुड़ी इन महिलाओं का खौफ अब शराबियों और शराब माफिया पर छाने लगा है।

महिला चेतना मंच में गांव की लगभग ९० महिलाएं जुड़ी हैं। चूल्हा-चौका के काम निबटाने के बाद हर दिन महिलाएं शाम के समय गांव में लाठियां लेकर गश्त करती हैं। गश्त के दौरान शराबी मिल जाए तो पहले उसे समझाईश दी जाती है। इसके बाद भी न सुधरने पर उसे मानस मंच पर लाकर डंडे से पिटाई की जाती है। आर्थिक दंड भी दिया जाता है। इसके बाद भी शराब पीने वालों को पुलिस के हवाले कर दिया जाता है।

बटंग गांव रायपुर से लगभग ११ किलोमीटर दूर है। दुर्ग जिले के पाटन ब्लॉक का यह गांव अब शराबबंदी आंदोलन को लेकर चर्चित हो गया है।  शराब से उजड़ते परिवारों को बचाने के लिए दशहरा के बाद ५ अक्टूबर को महिलाओं ने महिला जन चेतना मंच बनाया। गांव की सरपंच चमेली ठाकुर ने समिति के गठन में महिलाओं को सहयोग दिया। महिलाओं ने संकल्प लिया कि वे शराब के खिलाफ अभियान शुरू करेंगी।

गश्ती दल में शामिल राम प्यारी नायक ने बताया कि गांव में शराब से कई परिवार तबाह हो रहे हैं। शराब के लिए अपने बीवी बच्चों का जीवन तक दांव पर लगा रहे हैं।  ऐसे माहौल में परिवार और गांव को बचाने के लिए महिला मंच का गठन किया गया। पिछले दो महीनों में गांव के शराबियों पर नकेल कसने के हर संभव प्रयास किए गए। हालत यह है कि अब इस सामाजिक बुराई पर काबू पाने में ८० प्रतिशत तक कामयाबी मिल चुकी है।  शीतला वैरागी ने बताया कि महिलाएं रोज रात के समय गांव में गश्त करती हैं। महिलाओं के सबसे बड़े दुश्मन हैं शराब और शराबी। पिछले कुछ महीनों में ही इस मंच ने कई लोगों को शराब की लत से मुक्त करा दिया है। सरस्वती वर्मा के अनुसार मंच के इस प्रयास में गांव के कई पुरूष भी उनकी ढाल बनकर इस लड़ाई में शामिल हो गए हैं।

महिलाओं की इस मोर्चेबंदी में सहयोग देने वाले दिलीप दास वैरागी बताते है कि शराब पीकर हंगामा करने वालों के  खिलाफ गांव की महिलाओं व बच्चों ने मोर्चा खोला है। देर रात गंाव में रतजगा कर रही महिलाओं में से एक सरस्वती नायक ने बताया  कि शराबी नशे में रोज घर आकर पत्नी व बच्चों से मारपीट करते थे। लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है। गांव की गलियों में गश्त कर रही महिलाओं और बच्चों का कहना है कि पहले लोग शराब पीकर हुड़दंग करते थे। हर दिन गाली-गलौच करते थे। इसका बुरा असर बच्चों व लड़कियों पर पड़ रहा था। तीज त्योहार के दौरान हंगामा होना आम बात थी। अब मंच की महिला सदस्यों कीेसक्रियता के कारण गांव में सभी लोगों ने मिलजुलकर शांतिपूर्वक दिवाली त्यौहार मनाया। महिला जन चेतना मंच की अध्यक्ष रमा नायक ने बताया कि शराबियों के कारण गांव का वातावरण खराब हो रहा था। गांव में शाम होते ही शराबियों का जमवाड़ा लगने से महिलाओं व लड़कियों का निकलना दूभर हो चुका था। कई बार शराबियों ने महिलाओं के साथ छेड़छाड़ भी की। अब इस बुराई से निजात मिलने लगी है।

मंच की पहल से छत्तीसगढ़ के कई गांवों में शराबबंदी आंदोलन को नई दिशा मिल सकती है। आदिवासी बहुल गांवो में शराब की लत से बीमार और बर्बाद होने वालों की बड़ी तादाद है। ऐसे गांवों में महिला चेतना मंच शराबखोरी जैसी सामाजिक बुराई को मिटाने की दिशा में बड़ा उदाहरण बन सकता है। शराब के खिलाफ इस मुहिम से महिलाओं के आत्मविश्वास और समाज में उनके रुतबे में भी इजाफा हो रहा है।

लेखक अमरेन्द्र कुमार आर्य कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में मीडिया स्टडीज संकाय के शोद्यार्थी हैं. इन्होंने यह खबर बटंग से लौट कर बनाई है. बटंग छतीसगढ़ का एक छोटा सा गांव है.

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मुंबई में महिला पत्रकार को घसीटकर डंडों से पीटा, एक आरोपी गिरफ्तार

महाराष्ट्र राज्य से खबर है कि मुंबई के पनवेल मे आज एक लोकल चैनल की रिपोर्टर चेतना वावेकर पर जानलेवा हमला किया गया. चेतना अपने घर से ड्यूटी पर जा रही थीं.  उसी वक्त एक युवक ने उनकी गाड़ी रोक दी. उनके बाल पकड़कर उन्हें बाहर खींच लिया और उन्हें बेरहमी से पीटा गया. बाद में आरोपी का एक दोस्त वहां पर पहुचा. दोनों ने मिलकर चेतना को डंडों से पीटा.

महिला पत्रकार की हाथ में फ्रैक्चर हो गया है. चेतना का लोकल हॉस्पिटल में उपचार किया गया. चेतना ने पनवेल पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है. पुलिस ने धारा आरोपी राजेश ठाकुर को गिरफ्तार कर लिया. दूसरा आरोपी चंद्रकांत पाटील अभी तक फरार है. पत्र​कार हमला विरोधी कृती समिती के अध्यक्ष एस.एम.देशमुख ने इस घटना पर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने राज्य सरकार से जल्द से जल्द पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग की है.

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महिला मेकअप आर्टिस्ट पर प्रतिबंध गैरकानूनी : कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने देश की फिल्म इंडस्ट्री में महिला मेकअप आर्टिस्ट पर 59 साल से जारी प्रतिबंध को गैरकानूनी बताया है। जस्टिस दीपक मिश्र और यू.यू. ललित ने भारतीय फिल्म उद्योग में लैंगिक असमानता को असंवैधानिक करार दिया। अदालत ने कहा, ‘हम 2014 में हैं, न कि 1935 में। इस भेदभाव को एक दिन के लिए भी नहीं चलने दिया जा सकता।’

भारतीय फिल्म उद्योग दुनिया के सबसे बड़े फिल्म और टीवी उद्योगों में से एक है। जनवरी 2013 में नौ महिलाओं ने सर्वोच्च अदालत में इस संबंध याचिका दायर की थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, ‘इस तरह का भेदभाव कैसे किया जा सकता है। हम इसकी इजाजत नहीं दे सकते हैं। हमें ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता जिसके आधार पर प्रशिक्षित महिला मेकअप आर्टिस्ट को प्रतिबंधित किया जाए।’

अदालत ने सिने कॉस्टय़ूम मेकअप आर्टिस्ट एंड हेयर ड्रेसर एसोसिएशन से कहा कि या तो वे महिला मेकअप आर्टिस्ट पर से इस प्रतिबंध को हटाए अन्यथा अदालत इस संबंध में आदेश जारी करेगी। अदालत ने यूनियन को इस मामले में प्रतिक्रिया देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया। मामले की अंतिम सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

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भास्कर चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल पर शादी का झांसा देकर देश-विदेश में रेप करने का आरोप (देखें पीड़िता की याचिका)

डीबी कार्प यानि भास्कर समूह के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ एक महिला ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया है. इस बाबत उसने पहले पुलिस केस करने के लिए आवेदन दिया पर जब पुलिस वालों ने इतने बड़े व्यावसायिक शख्स रमेश चंद्र अग्रवाल के खिलाफ मुकदमा लिखने से मना कर दिया तो पीड़िता को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. कोर्ट में पीड़िता ने रमेश चंद्र अग्रवाल पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. पीड़िता का कहना है कि रमेश चंद्र अग्रवाल ने उसे पहले शादी का झांसा दिया. कई जगहों पर शादी रचाने का स्वांग किया. इसके बाद वह लगातार संभोग, सहवास, बलात्कार करता रहा.

बाद में रमेश चंद्र अग्रवाल ने पीड़िता का उसके पति से तलाक करवाया. आखिरकार जब रमेश चंद्र अग्रवाल का पीड़िता से मन उब गया तो उसने उसे किनारे कर दिया और कोई भी संपर्क रखने से बचने लगा. इससे मजबूर होकर पीड़िता को कोर्ट का रास्ता अपनाना पड़ा. पीड़िता ने कोर्ट में लिखित शिकायत  में जो कुछ कहा है, वह न सिर्फ चौंकाने वाला है बल्कि एक बड़े मीडिया हाउस के मालिक की महिलाओं के प्रति नजरिए को भी उजागर करता है. बेटियों, महिलाओं को बचाने, सम्मान देने, बराबरी देने के ढेर सारे नारे देने वाला भास्कर समूह का चेयरमैन खुद महिला उत्पीड़न के एक बड़े मामले में आरोपी बन गया है.

देश के बाकी सारे मीडिया हाउस, अखबार, न्यूज चैनल इस खबर पर कतई एक लाइन न तो लिखेंगे, न दिखाएंगे क्योंकि उनके बिरादरी, फ्रैटनर्टी का मामला है. अगर यही मसला किसी और का होता तो मीडिया हाउस न जाने कबका इतना शोर मचा चुके होते कि पुलिस आरोपी को गिरफ्तार कर जेल में डाल चुका होता. ये खबर उन पत्रकारों, संपादकों के लिए है जो दिन भर पत्रकारिता के पतन पर आंसू बहाते रहते हैं लेकिन मीडिया के मालिकों की घिनौनी करतूत पर चुप्पी साधे रहते हैं.

अब पूरा दारोमदार सोशल मीडिया, न्यू मीडिया, वेब, ब्लाग, ह्वाट्सएप आदि पर है जहां इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर कर पूरे मामले को जनता के बीच ले जाया जा सकता है और बड़े लोगों की काली करतूत को उजागर किया जा सकता है. ये पूरा प्रकरण भड़ास के पास ह्वाट्सएप के जरिए पहुंचा है. सोचिए, अगर ये न्यू मीडिया माध्यम न होते तो बड़े लोगों से जुड़ी काली खबरें हमारे आप तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ जातीं क्योंकि बिकाऊ और बाजारू कार्पोरेट मीडिया का काम बड़े लोगों से जुड़ी भ्रष्टाचार और अत्याचार की खबरों को छापना नहीं बल्कि छुपाने का हो गया है. 

-यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया 


 

(पीड़िता के मान-सम्मान को ठेस न पहुंचे, इसलिए उसका नाम पहचान पता को उपरोक्त दस्तावेजों में ब्लैक कर अपठनीय बना दिया गया है.)


इस पूरे मामले / प्रकरण को समझने के लिए इन खबरों को भी पढ़ें…

रमेश अग्रवाल की संपत्ति पर ‘मां’ के हक ने उड़ाई समूह संचालकों की नींद

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भास्कर चेयरमैन रमेश अग्रवाल की पत्नी की याचिका पर बहू-बेटों को नोटिस

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