इस लड़की के सवाल ने आईपीएस द्वारा नारी सुरक्षा पर दिए भाषण की निकाल दी हवा, देखें वीडियो

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा आजकल नारी सुरक्षा सप्ताह का आयोजन किया  जा रहा है. इसी क्रम में आगरा पुलिस भी शहर भर के कॉलेज व स्कूल में जागरूकता कार्यक्रम करा रही है. आगरा के बीडी जैन गर्ल इंटर कॉलेज में नारी जागरूकता कार्यक्रम में एसएसपी अमित पाठक ने छात्राओं को सुरक्षा और अपराध के बारे में कई सारी जानकारियां दी. पर बाद में एक लड़की ने नारी सुरक्षा को लेकर कुछ ऐसे सवाल मीडिया के सामने दागे जिससे पूरे आयोजन और भाषण की सार्थकता पर सवाल उठ गया.

लड़की ने कौन से सवाल उठाए और एसएसपी अमित पाठक ने अपने भाषण में क्या कहा, जानने के लिए देखें ये वीडियो….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दुर्व्यवहार से नाराज रायपुर की तीन महिला पत्रकारों ने रिपोर्ट दर्ज कराई

रायपुर प्रेस क्लब कार्यकारिणी बैठक में अदालत परिसर में महिला पत्रकारों के साथ पुलिस कर्मियों ने जो दुर्व्यवहार किया उसकी निंदा की गई। सभी पत्रकार साथियों ने जो एकजुटता का परिचय दिया, उसका आभार व्यक्त किया गया। देर रात एसपी संजीव शुक्ला के साथ वरिष्ठ पत्रकार रूचिर गर्ग और सुनील कुमार के नेतृत्व में जो चर्चा हुई, उससे प्रेस क्लब ने सहमति जताई। एसपी संजीव शुक्ला ने पत्रकारों की मांग पर एक टीई गौरव तिवारी के निलंबन के साथ ही दंडाधिकारी जांच की मांग को स्वीकार किया, इस पर सभी पदाधिकारियों ने संतोष व्यक्त किया।

साथ ही कार्यकारिणी ने यह मांग की कि घटना की दंडाधिकारी जांच के साथ-साथ विभागीय जांच कर दोषी पुलिस अधिकारियों पर जिनके खिलाफ तीन महिला पत्रकार श्रेया पांडे, अंकिता शर्मा, रजनी ठाकुर ने अलग-अलग रिपोर्ट दर्ज कराई हैं। समुचित कार्रवाई के जरिए पत्रकार जगत में विश्वास का महौल पुनः स्थापित किया जाए। जिससे निडर होकर महिला पत्रकार अपनी जिम्मेदारीपूर्ण पत्रकारिता का निर्वहन कर सकेंगे।बैठक में प्रेस क्लब अध्यक्ष के.के. शर्मा, महासचिव सुकांत राजपूत, उपाध्यक्ष सुखनंदन बंजारे, संयुक्त सचिव प्रफुल्ल ठाकुर, ममता लांजेवार, कोषाध्यक्ष मोहन तिवारी सहित कार्यकारिणी सदस्य सुशील अग्रवाल, प्रदीप दुबे, ओ.पी. चन्द्राकर, अनवर कुरैशी, मृगेन्द्र पाण्डेय उपस्थित थे।

xxx

दिनांक 30.10.2017 को रायपुर प्रेस क्लब कार्यकारिणी मंडल के आपात बैठक के निर्णायानुसार प्रतिदिन प्रेस क्लब का कार्यालिन समय प्रात:10.30 बजे से शाम 7 बजे तक निर्धारित किया गया है। इसमें प्रेस क्लब के मुख्य द्वार को भी बंद किया जाएगा। प्रेस क्लब प्रागण में 7 बजे के बाद वाहन की जवाबदारी स्वंय वाहन मालिक की होगी।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

महिला पत्रकार के शोषण मामले में आरोपी बनाए गए पत्रकार कृष्ण कांत ने तोड़ी अपनी चुप्पी

Krishna Kant : मुझ पर बहुत संगीन आरोप लगाए गए हैं. सोचा था कि हमारा अपना प्रेम संबंध था, इस पर कुछ नहीं कहना. लेकिन मामला अब हाथ से निकल गया है. अब फेसबुक ही सर्वोच्च अदालत है, और हर व्यक्ति मुख्य न्यायाधीश. शर्मिंदगी के साथ इस कीचड़ में उतरने को मजबूर हूं. कहा जा रहा है कि अलग होना बड़ी बात नहीं है, लेकिन धोखा दिया गया. इस ‘धोखे’ में उसका जिक्र कहां है कि हमारे आसपास के लोग पिछले डेढ़ साल से मध्यस्थता कर रहे थे. वे लोग कहां हैं इस पूरी बहस में जो बार बार समझा रहे थे कि तुम दोनों साथ नहीं रह सकते? यह जिक्र कहां हैं कि हमें जब कहा गया कि हम साथ नहीं सकते तो तीन बार आत्महत्या करने कोशिश/धमकी दी गई? यह जिक्र कहां है कि आत्महत्या की धमकी पर दो बार ऐसा हुआ कि दोस्तों को दौड़कर आना पड़ा? यह जिक्र कहां है कि आप आत्महत्या की धमकी देकर दरवाजा बंद करके सीपी घूम रही थीं और हम दोस्तों के साथ तुमको ढूंढ रहे थे?

इस बात का जिक्र कहां है कि किसी 45 या 50 साल की महिला से भी बात करने या हालचाल लेने पर आपको परेशानी होती रही है? इस बात का जिक्र कहां है कि मुझे लोगों के बीच में ही काम करना है और आपको लोगों से उबकाई आती है? इस बात का जिक्र कहां है कि जिन लोगों के पास आपको फोर्स करके भेजा गया कि तुम अकेलेपन से निकलो, उन्हीं के पास जाकर आपने हमको गालियां दीं? वे दोस्त, वे वरिष्ठ महिलाएं कहां हैं जो आपको समझाती रहीं कि कोई अलग होना चाहता है तो उसे जाने देना चाहिए? वे पुरुष दोस्त कहां हैं जिनके मेरे घर आने भर से आप हफ्ते भर लड़ाई करती थीं? आपको न्याय दिलाने के लिए वही लोग क्यों और किस मकसद से जुटाए गए जो हमसे कभी नहीं मिले या जो हमको नहीं जानते?

इस बात का जिक्र कहां है कि आपको हमारे दफ्तर जाने, रिपोर्टिंग पर जाने, दोस्तों के साथ बैठने पर भी आपको दिक्कत थी जिसपर लगातार समझाइश की कोशिश होती रही और आपने हर बार समझने से इनकार किया? बार बार यह कहने के बाद कि हम साथ नहीं रह सकते, धोखा कैसे होता है? मैं अलग होना चाहता हूं, यह लगातार कहते रहना किस कानून के तहत धोखा या अपराध है? जिस जगह पर मैं हूं वहां पर कोई स्त्री होगी तो क्या करेगी? हमारी पूरी सर्किल के लोग, दोस्त सब हमारे संबंध को जानते हैं तो किसी के साथ भी धोखा कैसे हो गया? इतनी किचकिच के बाद अगर मैं अलग होना चाहता रहा तो कौन सा कानून या लोग मुझे फांसी देंगे, मैं तैयार हूं.

क्या मेरे मुताबिक, आप मेरे साथ नहीं रहना चाहें तो मुझे आपके चरित्रहनन का अभियान चला देना चाहिए? मुंह पर तेजाब डाल देना चाहिए? कहा गया है कि हमने कई लड़कियों को बरगलाया, मौत के मुंह में पहुंचाया और छोड़ दिया. तमाम लड़कियां आत्महत्या कर रही हैं. एक जिस रिश्ते में हम रहे, उसके अलावा वे कौन लड़कियां हैं? सब लड़कियां आत्महत्याएं कर रही हैं और अस्पताल से घर लौट जा रही हैं, लेकिन न कोई केस दर्ज हो रहा है, न अस्पताल रिपोर्ट कर रहा है. इतनी लड़कियों को बचा लेने वाले लोग भी कोई रिपोर्ट नहीं कर रहे हैं. ताजा आत्महत्या प्रकरण हुआ. किसी ने न देखा, न बात की, न अस्पताल ने पुलिस बुलाई, न मेरे पास पुलिस आई, न कोई केस हुआ, यह किस दुनिया में, कैसे संभव हुआ?

कहा गया है कि मैं तमाम लड़कियों को बरगला कर मौत के मुंह में डालता गया. यह सब देखते हुए आपको मुझसे शादी करनी थी? सारे आरोप अलग होने के बाद ही सामने आए? उसके पहले आपको उन लड़कियों की और हमारे ‘आपराधिक चरित्र’ पर चिंता नहीं हुई? एक महीने पहले तक हम आपसे शादी कर ​लेते तो यह सारे खून माफ थे? आरोप है कि हमने हैरेस किया, पैसा खाया. मैं सात साल से नौकरी कर रहा हूं. आप कितना पैसा कमाती थीं जो हम आपसे पैसे खाते थे और आप खिलाती थीं? बिना किसी पढ़ाई लिखाई के, बिना किसी अनुभव के आपको दोनों नौकरियां कैसे मिलीं? आपका परिवार आपको सपोर्ट नहीं कर रहा था, आप दिल्ली आ गईं, आपको यहां रहने के लिए आर्थिक मदद किसकी थी? अभियान चलाने के ठीक पहले आपका अकाउंट फ्रीज हुआ, आपने पैसा किससे लिया? आपके यहां आने से लेकर एक महीने पहले तक आपका रोना था कि मेरे कोई दोस्त नहीं हैं, कभी भी किसी भी परिस्थिति में आपकी किसी भी तरह की मदद, संबंध खराब होने के बावजूद, मेरे अलावा किसने की? (यह सब आरोप लगाया जाना और यह जवाब देना बेहद घिनौना है.)

जिस दिन मेरे घर बाबा की तेरहवीं थी, उस दिन भी मुझसे बहस करने की कोशिश की जा रही थी. 99 साल के मरे हुए व्यक्ति की भी फोटो लगाकर गालियां दी गईं? पिछले छह महीने में पिता और बाबा की मौत हुई, उसका यहां फेसबुक पर पोस्ट लिखकर मजाक उड़ाया गया. यह कौन सा न्याय मांगा जा रहा है? जितने आरोप लगाए जा रहे हैं वे सब पहले फर्जी अकाउंट से क्यों सामने आ रहे हैं? यदि मैं अपराधी हूं, तो उसका फैसला कौन करेगा? मुझे सजा कौन देगा? कहा गया कि फ्रिज में गोमांस है तो भीड़ जुट गई और पिटाई शुरू हो गई? इस संभ्रांत और ​वर्चुअल मॉब लिंचिंग के लिए आप सब बधाई के पात्र हैं.

तमाम लोगों का कहना है कि हमें हमारे संस्थान से निकाला जाए. हमारे किसी के साथ संबंध में मेरे संस्थान का क्या रोल है? किसी विचारधारा, जाति, वर्ग, समुदाय आदि का क्या रोल है? मेरे उन मित्रों, जिनका कहीं कोई रोल नहीं है, उनको भी इसमें घसीटा जा रहा है. प्रियंका से मेरी एक महीने से बात नहीं हुई है, उन्होंने जो किया, वह ठीक ही है. वे क्या क्या कहेंगी, क्या करेंगी, यह छोड़िए, बाकी जितने न्यायाधीश हैं, जिन्होंने भी नाम लेकर बिना मुझसे कुछ पूछे, बिना पक्ष लिए पोस्ट डाली है, वे सारे प्रोफेसर, पत्रकार और समाज बचाने के ठेकेदार अब अपने पक्ष और सबूत लेकर कोर्ट आएंगे, एफआईआर करवाकर सबको नोटिस भेज रहा हूं. मैं अपराधी हूं तो मेरी अपील है कि मुझे सजा मिले. एक महीने से फेसबुक ट्रायल किस मकसद से है? बार बार कहने के बाद भी कोई कोर्ट या पुलिस नहीं गया, तो मैं जाता हूं. जिस जिस का अपराधी हूं, सब लोग आएं.

आप लोग, जो भी मुझे जानते हैं, मुझ पर भरोसा करते रहे हैं, वे मेरे काम के कारण करते रहे हैं. संबंध में रहकर आप कहती रहीं कि ‘तुमको अपने काम के अलावा बाकी दुनिया नहीं दिखती.’ अब सारा हमला उसी काम पर है कि कैसे नौकरी छुड़वाई जाए. हां, मैं अपने काम को लेकर पागल हूं. तमाम लेखकों और पत्रकारों की हत्या के बावजूद मैं क्रूर भीड़ से नहीं डरता तो टुच्चे आरोपों से नहीं डरता. आप में से जिसे लगता हो कि मैं अपराधी हूं, वे छोड़कर जा सकते हैं. जो मुझे जानते हैं, वे जानते हैं कि मैं क्या कर सकता हूं. जो नहीं जानते उन्हें कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है. जिसके साथ था, उसके बारे में भी दुनिया जानती थी. अब जिसके साथ हूं उसके बारे में भी दुनिया जानती है. अब जिन जिन के साथ धोखा हुआ हो, वे सब आएं और इस मॉब लिंचिंग में शामिल हों.

बाकी जिस पर इलाहाबाद से लेकर जेएनयू तक 50 लड़कियों के यौन शोषण का आरोप है, जो इलाहाबाद से भागा इसीलिए कि कुटाई होनी थी, उस महान स्त्रीवादी न्यायविद के आरोपों पर कुछ नहीं कहना. जबसे यह प्रकरण शुरू हुआ, सिर्फ तीन चार लोगों से बात की, इस उम्मीद से कि शायद यह सब शांत होगा. लेकिन जो जो लोग ​इस घृणा अभियान में बिना मेरा कोई पक्ष जाने शामिल हुए, उन सबको सलाम पेश करता हूं. बिना अपराधी का पक्ष लिए न्याय कर देने की आपकी यह नायाब क्षमता देश के काम आएगी.

पत्रकार कृष्ण कांत की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को समझने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आधी रात में आधी आबादी सड़क पर निकल कर बोली- मेरी रातें, मेरी सड़कें

महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर जताया गुस्सा, पित्रसत्तात्मकता को बढाने वाले भेदभावपूर्ण समाज व्यवस्था के विरूद्ध नायाब प्रदर्शन, विभिन्न समुदायों की महिलाओं ने किया आधी रात को पैदल मार्च, पीड़िता को दोषी ठहराने की कुत्सित मानसिकता का शहर की महिलाओं ने किया विरोध…

दिनांक 12 अगस्त 2017 को ”मेरी राते मेरी सड़के” अभियान के तहत वाराणसी शहर के विभिन्न समुदायों की महिलाओं और लड़कियों ने लंका से अस्सी तक मार्च निकाला. रात 11  बजे से शुरू हुआ यह मार्च मार्च रात एक बजे लंका पहुंचा. इस मार्च के दौरान शामिल विभ्भिन समुदायों की महिलावो और लड़कियों ने  आजादी और बराबरी के गीत गाये, और  इस अभियान को आगे बढाने के लिए आगे की रणनीति बनाई. रात पर अधिकार को  लेकर शुरू की गयी इस चर्चा में में मूल रूप से महिलाओं के विरुद्ध बढ़ाते अपराधो और बदले में अपराधियों के बजाये पीडित महिलाओं को ही कटघरे में खड़े किये जाने की प्रवृत्ति पर केन्द्रित रही.

उपस्थित महिलाओं ने रात एक बजे लंका पहुच कर चाय पीने के क्रम में दरअसल इस पित्रसत्तात्मक सोच को चुनौती दी जो महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर घरों में कैद करने पर अमादा हैं. उपस्थित महिलाओं ने एक स्वर से यह तय किया की आज की यह आदी रात की यात्रा केवल आगाज है और इन्ही तरीकों से आगे समाज में बराबरी और सुरक्षा की लड़ाई लड़ी जायेगी. वहा सभी महिलावो ने मिलकर ये तय किया की हम आगे इन सरे मुद्दों पर सरकार  से जवाब मांगेंगे और अपनी लड़ाई जारी रखेंगे, इस कार्यक्रम में शामिल महिलाये और लड़किया हर जाति धर्म और संगठन से परे सिर्फ अपने हक़ के लिए आज इकठ्ठा  हुई, और एक दूसरे से ये वादा किया कि हम सभी मिलकर समाज की इन रूढ़ियों को तोड़ेंगे.

महिलाओं के विरूद्ध होने वाली प्रत्येक घटनाओं के बाद मंत्रियों, नेताओं, और समाज में पित्रसत्ता के अन्य प्रतिनिधियों द्वारा लड़कियों को ही जिम्मेदार बताने वालों को आड़े हाथों लिया गया. मार्च को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज से तीन दिन बाद पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा होगा। कही परेड, कही झांकियां, कही आजादी की वीर गाथाएं, कहीं भाषण और इन सबके बीच कही एक निर्भया, वर्णिका, रागिनी जैसी तमाम लड़कियां घर से बाहर आजादी तलाशती हुए खतरों का सामना करते हुए भयानक ज़िन्दगी जीने को मजबूर है।

कभी महसूस किया है आपने कैसा लगता होगा जब आप कुछ बनने का सपना ले कर घर से बाहर कदम रखें और बाहर निकलते ही किसी की हैवानियत भरी नजर आपकी छाती पर तो कभी शरीर के दुसरे अंगों पर होती है. आप उनसे बचते बचाते फिर आगे बढ़ते है और फिर वही नज़र अब आपका पीछा करती रहती है. आपके विरोध के बावजूद भी तब आप  को छूने की कोशिश की जाती है और फिर, फिर तो कहानी अख़बारों में एक स्थान भी बना पाती है. यकीन मानिये देश में आधी आबादी इसी डर के साये में जी रही है, इसी डर के साथ वो स्कूल/कॉलेज, कार्यस्थल और यहाँ तक की कई बार घर में भी रहती है।

वक्ताओं नें आंकड़ों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि हर 6 सेकंड में देश में एक रेप की घटना होती है. महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा और भी कई रूपों में हो रही है। आंकड़ो में अगर इन सभी घटनाओं को शामिल किया जाए तो आप देश से पलायन की योजना कर लेंगें। इस तरह की घटनाये सिर्फ हमारे देश में नहीं हो रही यह मानते हुए सरकार, प्रशासन और समाज की जोजवाबदेही होनी चाहियें वो उसे तत्परता से निभाया जाए. यह दुःखद है कि केंद्रीय स्तर पर एक अभियान बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जोर शोर से चल रहा है और एक तरफ महिलाओं के प्रति होती घटनाओं पर उन्हें ही रात में निकलने का दोषी मानते हुए एक लम्बी सलाह की लिस्ट और धमकी दे दी जाती है. जरा हम इन् घटनाओ की लिस्टिंग करें तो जान पाएंगे की ज्यादातर घटनाएं दिन के उजाले  में हो रही है.  मार्च में महिलाओं के समर्थन में उनके पुरुष साथी भी मौजूदा थे. मुक्य रूप से मुनिज खान, जागृति राही, नीता चौबे, शीला तिवारी, श्रुती नागवंशी, नीलम पटेल, पूजा, शानिया, अनिता सिंह, सुजाता भट्टाचार्य, नम्रता, राजेश्वरी, और तमाम गृहणियों ने भी भारी संख्या में भागीदारी की।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इस देश में स्तनपान कराने के लिए महिलाओं को दो घंटे अलग से छुट्टी दी जाती है

Praveen Jha : नॉर्वे में ‘बेबी-बॉटल’ ढूँढना दुर्लभ कह सकते हैं। डिजाइनदार तो छोड़ ही दें। वहाँ बोतल से दूध पीते बच्चे बस-ट्रेन कहीं नहीं मिलते। हर सार्वजनिक स्थलों, और ऑफीसों में स्तनपान के कमरे हैं। मेरी एक कर्मचारी जब लगभग एक साल की छुट्टी के बाद लौटीं, ‘रोस्टर’ बना, मैनें देखा कि एक घंटे के दो ‘पॉज़’ हैं। मुझे समझ नहीं आया, फिर देखा ‘अम्मो’ लिखा है, मतलब स्तनपान का विराम। दो घंटे प्रतिदिन का विराम है जिसमें वो पास के ‘क्रेच’ में जाकर स्तनपान करा आएंगीं।

सत्तर के दशक में ऐसा नहीं था। पूरा नॉर्वे ‘फॉर्मूला मिल्क’ और बोतल का फैन हो चला था। नया-नया अमरीकी फैशन चला था। नॉर्वे तब अमीर न था, अमरीका की नकल उतारता था। स्तनपान लगभग न के बराबर हो रहे थे।

तभी एक महिला मिसेज हेलसिंग ने एक ‘कैम्पेन’ चलाया और स्वास्थ्य मंत्रालय में एक अधिकारी से मिलीं। भाग्य से वह अधिकारी भी हार्वर्ड से इसी संबंध में शोध कर आई थीं, और उनके पेट में चौथा बच्चा था। उन्होंने अपने बच्चे का स्तनपान ही कराया, बोतल नहीं लगाया।

वही अधिकारी आगे चल कर नॉर्वे की प्रधानमंत्री बनीं, और इस मुहिम में ‘डोर-टू-डोर’ कैम्पेन में जुट गईं। उस प्रधानमंत्री का नाम था ग्रो ब्रंटलां। प्रधानमंत्री ने आखिर खुद अपने बच्चे को दूध पिलाकर शुरुआत की थी। बात जम गई। नॉर्वे से बोतल हमेशा के लिए खत्म हो गया।

नार्वे में कार्यरत प्रवीण झा की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

महिला पत्रकार की पीड़ा- ”मेरा पति मुझे दूसरे मर्दों के साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर करता है!”

मैं ऋपसी उप्पल एक पत्रकार हूं और जम्मू की रहने वाली हूं…मेरी शादी पुरोला के रहने वाले राजेन्द्र उप्पल से 2009 में हुई थी….शादी के पहले साल इन्होंने देहज के लिए मुझे परेशान किया तो मेरे मम्मी पापा ने इन्हें 5 लाख कैश दिए और फिर इनकी बहन ने मेरे पापा से मेरे गहने औऱ जो घरेलू वस्तुए होती हैं वो ली….

दरअसल ये मेरी दूसरी शादी है जिस वजह से मैं चुप रही लेकिन शादी के दूसरे साल मेरे पति ने रात के 12 बजे मुझ पर हाथ उठाया और इनकी मम्मी दरवाजे पर खड़े होकर देखती रही….लेकिन तब इन्होंने अपने दोस्त को बुलाकर रजामंदी कराई …..इसी के साथ-साथ ये शादी के बाद से मेरे फिगर को लेकर काफी गंदे कमेंट करते…इसके बाद मैं पढ़ने पंजाब चली गई….औऱ फिर जॉब करने दिल्ली गई लेकिन इस दौरान मैं जब भी घर दो चार दिन के लिए आती तो तब ये मुझे कभी मारपीट तो कभी मुझे मानसिक तौर से प्रताड़ित करते….

मैं कई बार दुखी होकर घर छोड़कर जा भी चुकी हूं लेकिन फिर कहां जाउं, इस डर से वापस आ जाती….ये मेरे यहां दिल्ली 6-7 महीने के बाद सिर्फ एक या दो दिन के लिए आते…लेकिन मैं जब साथ रहने की बात करती तो ये मारते पीटते औऱ बोलते तुझसे मैंने शादी सिर्फ दो वजह से की थी… एक अपने शारीरिक सुख के लिए और दूसरा कि तू पैसे कमाए और मेरी मां व मेरे बुढ़ापे का सहारा बने…

अभी जनवरी में मेरा ऑप्रेशन हुआ था तब मैंने इनके आगे हाथ पैर जोड़ कर कहा कि मैं आपके साथ रहूंगी, आप प्लीज अपनी सारी हरकतें बंद कर दें.. हम नए सिरे से जिंदगी शुरू करते हैं… लेकिन ऑप्रशेन के कुछ दिनों बाद मेरी सास ने मुझ पर चाकू से जानलेवा हमला किया… जब मैंने पुलिस कंप्लेन करने की बात की तो मेरे पति ने कहा कि मैं आने वाले महीने में सब कुछ बदल दूंगा.. मैं तुम्हें बहुत खुश रखूंगा… पर मेरा नाम मत लेना नहीं तो मेरा राजनीतिक करियर बर्बाद हो जाएगा….

मैंने वूमेन सेल में और पुलिस स्टेशन जाकर कम्पलेन करवाई… बाद में हमारा समझौता करवा दिया गया और काउंसलिंग की डेट दी गई…. मैं एक काउंसलिंग पर गई लेकिन अगली डेट पर मेरे पति ने अपनी मां को मेरी ननद के यहां भेज दिया… मेरी सास के चले जाने के बाद वो मेरे साथ ना सिर्फ मारपीट करता बल्कि मुझे मानसिक तौर पर और भी प्रताड़ित करता….

आगे है.. मेरा पति बोलता है- मेरे साथ रहना है तो 22 साल की लड़कियां ले आओ और उनसे मेरे संबंध बनवाओ…

पढ़ने के लिए अगले पेज पर जाने हेतु नीचे क्लिक करें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पीएम मोदी के घर पर एसपीजी की महिलाएं रात में ड्यूटी क्यों नहीं करना चाहतीं?

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री के घर और निजता से संबंधित ये कैसी खबर? इस बार के “शुक्रवार” (24 फरवरी – 02 मार्च 2017) मैग्जीन में एक गंभीर खबर है। पहले पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित इस खबर का शीर्षक है, “फिर विवादों में घिरी एसपीजी” लेकिन यह प्रधानमंत्री निवास से संबंधित विवाद खड़ा कर रही है। खबर के मुताबिक एसपीजी की महिला सुरक्षा कर्मियों ने अपने आला अफसरों से गुहार लगाई है कि उन्हें रात की ड्यूटी पर न रखा जाए।

यहां यह गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के घर में परिवार की कोई महिला सदस्य नहीं रहती है। आम जानकारी यही है कि प्रधानमंत्री अपने घर पर अकेले रहते हैं। ऐसे में भारतीय संस्कारों के लिहाज से महिला सुरक्षा कर्मियों की रात की ड्यूटी लगनी ही नहीं चाहिए। उन्हें अधिकारियों से गुहार लगाने की आवश्यकता ही क्यों पड़े? यही नहीं, खबर में आगे कहा गया है, “माना जा रहा है कि वे किसी विवाद का साक्षी बनना नहीं चाहती हैं।” यह और गंभीर है।

खबर में (टाइपिंग की कुछ गड़बड़ी है) कहा गया है कि एसपीजी के तत्कालीन निदेशक दुर्गा प्रसाद को हटा दिया गया था। हटाने की कोई वजह नहीं बताई गई थी। हालांकि जिस तरह से यह कार्रवाई की गई थी उसमें तमाम अटकलों को बल मिला था। इनमें एक अटकल यह भी थी कि दुर्गा प्रसाद चाहते थे कि प्रधानमंत्री से जो भी मिलने आए उसे कैमरों के सामने से गुजरना पड़े और उसका पूरा रिकार्ड रखा जाए। इसमें कोई बुराई नहीं है और यह जरूरी भी लगता है। पर उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी (और पद से हटा दिया गया)। खबर में यह नहीं लिखा है कि दुर्गाप्रसाद के बाद कौन निदेशक हैं और अब क्या होता है। ना ही अभी के निदेशक से कोई बातचीत की गई है।

खबर में आगे लिखा है, अब यह अफवाह जोर पकड़ रही है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं कि उनके निवास में लगे कैमरे कमरों के अंदर नजर रखें। इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं तो शयन कक्षों में कैमरे नहीं होने चाहिए और दरवाजे तक को कैमरे की नजर में लाकर अंदर छोड़ा जा सकता है और इस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। पर विवाद हैं औऱ महिलाएं रात में ड्यूटी करना नहीं चाहती हैं – सबको जोड़ कर देखिए तो एक बड़ी खबर बनती है। अगर अधिकृत खबर नहीं छपी तो तरह-तरह की अफवाहें उड़ती रह सकती हैं और प्रधानमंत्री के घर के बारे में ऐसी खबरें, जैसे अंदर जाने वालों के लिए कैमरा नहीं है – सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

Pratima Rakesh दाल में काला है या पूरी दाल काली है ?स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप कहीं साहब के पास आने वाले लोगों की सूचना लीक ना कर दे इसलिये ये मनाही हो रही है!

Surendra Grover इस खबर को पढ़ कर लग रहा है कि दाल में कुछ काला ज़रूर है जिसकी साक्षी वे महिला सुरक्षा कर्मी नहीं बनना चाहती..

Sanjaya Kumar Singh है कोई जो कर सके इस खबर का फॉलो अप? कांग्रेसी इस स्तर तक नहीं गिरते।

Pankaj Pathak लगता है ‘साहेब’ खुद घर में रेनकोट पहने घूमते हैं, नहाने का तो पता नहीं।

Sunil Kumar Singh गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी के आवास पर एक महिला आती थी जिससे वो अकेले में मिलते थे । ऐसा एक आईपीएस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है इस मुद्दे पर दिल्ली विधानसभा में चर्चा भी हो चुकी है जो ऑन दी रिकॉर्ड है ।

आलोक पाण्डेय कांग्रेसी अफवाह उड़ाने में माहिर है

Sanjaya Kumar Singh हां भाई। कैमरा ही नहीं रहेगा तो सबूत कहां से आए। वो तो एनडी तिवारी जैसे लोग लगवाते हैं और खुद वीडियो बांटते हैं।


संजय कुमार सिंह का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कई मर्दों से संबंध रखने वाली ये महिला भी करवा चौथ व्रत कर रही है!

Balendu Swami : मैं करवा चौथ रखने वाली अपने आस-पास की कुछ महिलाओं को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ: 1) एक महिला, जो 15 साल से विवाहित है और रोज आदमी से लड़ाई होती है, सभी जानते हैं कि इनका वैवाहिक जीवन नरक है। 2) एक और महिला, जिसकी महीने में 20 दिन पति से बोलचाल बंद रहती है और वह उसे छिपाती भी नहीं है तथा अकसर अपनी जिन्दगी का रोना रोती रहती है।

3) इस तीसरी महिला को हफ्ते में दो-तीन बार उसका पति दारु पीकर पीटता है और उस महिला के अनुसार वेश्याओं के पास भी जाता है। 4) इस महिला के अपने मोहल्ले के ही 3 अलग अलग पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बन्ध हैं और इस बात को लेकर पति के साथ उसकी लड़ाई सड़क पर आ चुकी है तथा सबको पता है. 5) पांचवीं महिला की बात और भी विचित्र है: उसका अपने पति से तलाक और दहेज़ का केस कोर्ट में चल रहा है। केवल कोर्ट में तारीखों पर ही आमना-सामना होता है!

परन्तु ये सभी करवा चौथ का व्रत रखतीं हैं! क्यों रखती हैं तथा इनकी मानसिक स्थिति क्या होगी? ये कल्पना करने के लिए आप लोग स्वतंत्र हैं! इनके अतिरिक्त उन्हें आप क्या कहेंगे जो खुद को प्रगतिशील, नारीवादी और आधुनिका भी कहतीं हैं और करवा चौथ का व्रत भी रखतीं हैं! आप करवा चौथ करो, घूँघट करो या बुरका पहनो कम से कम इन रुढियों को संस्कार तो मत कहो! फिर आप स्त्री मुक्ति का झंडा भी उठातीं है। बहुत अजीब लगता है यह सब। आप स्वयं जिम्मेदार व्यक्ति हैं!

Chandan Srivastava : करवा चौथ के बेसिक कंसेप्ट से मेरा असहमत होना तो खैर लाजमी है। लेकिन मैने गौर किया कि पिछले कुछ सालों से बहुत से पति लोग भी पत्नी के साथ निर्जल व्रत रखने लगे हैं। यह एक बेहतरीन बदलाव आ रहा। सीधा सा संदेश है कि तुम मेरी सलामती के लिए उपवास रख रही हो तो मैं तुम्हारी ही पद्धति को फॉलो करके तुम्हारे इस समर्पण के प्रति शीश नवाता हूं। पति-पत्नी के बीच प्रेम और एकदूसरे के प्रति आपसी समझ बढ़ाने का इससे बढ़िया और क्या तरीका हो सकता है। 

काश कि इतनी ही समझ उन पतियों में भी होती और कहते कि तीन तलाक का अधिकार मेरी बीवी को भी दो, जब उसे एक से अधिक पति की इजाजत नहीं तो मुझे क्यों? मैं यह अधिकार स्वतः त्यागता हूं। इसके लिए बनाए कानून का मैं समर्थन करूंगा। निकाह-ए-हलाला जैसा घटियापन आज और अभी खत्म किया जाए। ऐसी घिनौनी प्रथा का समर्थक मुझे बलात्कारी नजर आता है। काश कि वे अपनी पत्नियों से इतना प्यार करते। काश कि वे अपने हिंदू दोस्तों से कुछ अच्छी बातें सीखते। काश की वे परिवर्तन के अहमियत को समझ पाते।

वृंदावन के नास्तिक स्वामी बालेंदु और लखनऊ के पत्रकार व वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हे पुरुष, तुम अपनी सहूलियत के लिए ये ड्रामा बंद कर दो कि हम बेचारी हैं : डा. रूपा जैन

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। इस अवसर पर महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर एटा जिले की जानी मानी गाइनेकोलॉजिस्ट, भ्रूण हत्या के विरोध में और महिलाओं-बच्चियों की शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए लंबे समय से काम कर रहीं चर्चित डॉक्टर रूपा जैन ने साक्षात्कार में जो कुछ कहा है, उसे उनके शब्दों में यहां रख रहा हूं…

ये सृष्टि, ये दुनिया हमारी है, हमसे है, कमजोर हम नहीं हैं, ये पुरुष हैं : डा. रूपा जैन

पहले तो मैं आज तक यह बात समझ नहीं पाई हूँ कि लड़का लड़कियों में इतना भेदभाव क्यों हैं? बेटी बचाओ, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ… क्या नॉनसेंस है। बेटी बेटा दोनों बराबर हैं। जो जीव गर्भ में आ गया उसे जन्म देना ही होगा। देयर शुड बी ए ला अगेंस्ट डिटरमिनेशन ऑफ़ प्रिगनैन्सी। वन्स यू हेव कन्सीवड यू हेव टू गिव बर्थ, में इट बी अ बॉय और गर्ल। बेटिया पिता को कितनी प्यारी होती हैं, ये बात एक पिता से ज्यादा कौन जानता है। यदि बेटियां बचानी हैं तो मेंटीलिटी पुरुषों की नहीं, औरतों की मैंटीलिटी को रिफाइंड करना पड़ेगा। 

जब तक एक औरत औरत को मजबूत नहीं करेगी, यह समस्या हल नहीं हो सकती। मैं अपने इतने साल के डॉक्टरी करियर में दावे के साथ कह सकती हूँ कि एक भी बाप ने चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो, मुझसे आकर यह नहीं कहा कि लड़की हुई तो मुझे नहीं चाहिए। मैं पूरे समाज से गुहार नहीं करती क्योंकि समाज बहुत ही अनस्टेबल विषय है। पर मैं सिर्फ हरेक गर्भवती माँ से ये विनती करती हूँ कि अपने पेट में पलने वाले बच्चे को इश्वर का अंश समझकर उसकी रक्षक बनें, भक्षक नहीं। 

एक औरत की ताकत इश्वर को भी झुका सकती हैं तो इस समाज के नियम क्या चीज हैं। एक नारी में पुरुष से ज्यादा अधिक आत्मिक, मानसिक और शारीरिक शक्ति होती है। बच्चे को पैदा करने में जो दर्द माँ को होता हैं वह एक हार्ट अटैक के दर्द से भी ज्यादा होता है। ये समाज मेल डोमिनेटेड नहीं, फीमेल डोमिनेटेड है साहब। यदि फीमेल डॉमिनेशन नहीं होता तो एक औरत ये फैसला नहीं लेती कि बच्ची को गिरवाना है। इग्नोरेंस इज द रुट ऑफ़ आल ईविल। बच्चों को पढ़ाओ, चाहे वह बेटी हो या बेटा हो। बेटे को पढ़ाओगे तो ये जन्म सुधर जाएगा और बेटी को पढ़ाओगे तो आने वाली पुश्तें सुधर जायेगी।

मैं एक बात जानती हूं। एक झूठ यदि १०० बार बोला जाए तो बात सच लगने लगती है। पुरुष इस सच्चाई को जानते थे कि स्त्री हमसे १००० गुना ज्यादा ताकतवर है। वो बहुत चालाक थे। इसलिए उन्होंने जोर जोर से बार बार बोलना शुरू कर दिया औरत करजोर है, उसे ताकतवर बनाओ, औरत लाचार है इसकी रक्षा हमें करनी है। ये पुरुष बुद्धिजीवियों ने इस सोसाइटी को मेल डोमिनेटेड का नाम दे दिया।

आज मैं इस बात को जोर जोर से और १०० बार बोलती हूं और हर औरत से कहती हूँ कि वह भी यही बोले कि ये सृष्टि, ये दुनिया हमारी है, हमसे है। कमजोर हम नहीं हैं, ये पुरुष हैं। तुम हमारी रक्षा क्या करोगे? हम अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं। तुम्हे भी संभाल लेते हैं और तुम अपनी सहूलियत के लिए ये ड्रामा बंद कर दो कि हम बेचारी हैं। आ जाओ और अपनी सच्चाई सबके सामने लाओ। अब समय आ गया है कि बेटी बेटा, औरत पुरुष का अलाप बंद होना चाहिए। दोनों ईश्वर की रचना हैं। दोनों कुदरत का हिस्सा हैं। दोनों को अपना कार्य करने दो और यदि तुम मर्दों को औरत से ज्यादा समझते हो तो फिर ये रिजर्वेशन का मुद्दा कहाँ से आ जाता है आदमियों के लिए?

मैं तो यह चाहती हूँ कि सब रिजर्ववेशन ख़त्म हो जाने चाहिए। सिर्फ एक रिजर्वेशन हो- फीमेल रिजर्वेशन। औरतों के लिए करके दिखाओ तो हम जानें कि तुम्हें औरतो की कितनी चिंता है। फिर देखिये कौन सा ऐसा परिवार है जो बेटी को नहीं पढ़ायेगा। ५० प्रतिशत मेल के लिए और ५० प्रतिशत फीमेल के लिए। हो जाने दो आमने सामने की टक्कर। बदल जाने दो समाज को। 

राकेश भदौरिया
पत्रकार
एटा / कासगंज
मो. ९४५६०३७३४६

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वीमन हेल्पलाइन के बड़े दरोगा नवनीत सिकेरा को पत्रकार कुमार सौवीर ने दिखाया आइना

Kumar Sauvir : 1090 यानी वीमन हेल्प लाइन के बड़े दरोगा हैं नवनीत सिकेरा। अपराध और शोहदागिरी की राजधानी बनते जा रहे लखनऊ में परसो अपना जीवन फांसी के फंदे पर लटका चुकी बलरामपुर की बीडीएस छात्रा की मौत पर सिकेरा ने एक प्रेस-विज्ञप्ति अपनी वाल पर चस्पा किया है। सिकेरा ने निरमा से धुले अपने शब्द उड़ेलते हुए उस हादसे से अपना पल्लू झाड़ने की पूरी कवायद की है। लेकिन ऐसा करते हुए सिकेरा ने भले ही खुद को पाक-साफ़ करार दे दिया हो, लेकिन इस पूरे दर्दनाक हादसे की कालिख को प्रदेश सरकार और पूरे पुलिस विभाग के चेहरे पर पोत दिया है।

सिकेरा प्रेस विज्ञप्ति में कहते हैं:- “गुडम्बा थाना क्षेत्र में एक लड़की रानू (नाम बदला हुआ) ने शोहदों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकरण में रानू के पिता ने आरोप लगाया कि 1090 ने कोई मदद नहीं की। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि रानू की कोई कॉल 1090 को प्राप्त नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में जब कोई शिकायत प्राप्त ही न हो तो मदद कर पाना असंभव है। रानू की कोई भी शिकायत 1090 में दर्ज नहीं है।”

सिकेरा जी, जब आप फोन ही नहीं उठाएंगे तो हर फोन अनआन्सर्ड ही रहेगी ही। मेरे पास ऐसी पचासों शिकायत हैं, लेकिन आपके पास एक भी नहीं। और, फिर जो दर्ज रिपोर्ट होती भी है तो आप करते क्या हैं उसका सिकेरा जी। कम से कम एक मामले में तो मैं जानता हूँ कि उसमें 15 हजार वसूल लिया था आपके विवेचक ने। वह मेरी 84 वर्षीय माँ का मामला था जो अकेले ही रहती थीं और उसे एक अपराधी ने भद्दी गालियां देते हुए मकान खाली न करने पर जान से मार देने की धमकी दी थी। उस खबर पर पुलिस के प्रवक्ता और सूचना विभाग के कुख्यात चोंचलेबाज़ डिप्टी डायरेक्टर डा.  अशोक कुमार शर्मा ने इस डाल से उस डाल तक खूब कुलांचें भरी थीं, केवल प्रदर्शन के लिए। ऐसे में आपकी ऐसी सफाई बहुत शर्मनाक लगती है। काम करना बहुत साहस का काम होता है। कुर्सी तो कोई भी तोड़ सकता है। है कि नहीं बड़े दारोगा जी?

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

मूल पोस्ट>

यूपी में ‘समाजवादी’ जंगलराज : लखनऊ में छेड़खानी से परेशान एक मेडिकल छात्रा ने फांसी लगाकर जान दी

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ये सायकिल न चला पाने वाली ‘बीमार’ लड़की कैसे पहले स्कूटी, फिर कार वाली बन गई?

Geetali Saikia : बचपन में सायकिल सीखने को लेकर अक्सर भाई से मेरी लड़ाई हो जाती थी. एक तो वो लाल रंग की हरकुलिस उसे बहुत पसंद थी. दूसरी मैं इतनी कमजोर थी कि मुझे चोट लगने के डर से वो मुझे छूने भी नहीं देता था. अकसर बीमार रहती थी मैं. दुबली पतली होने के कारण उससे जीत नहीं पाती थी तो मन मसोसकर या तो घर में आ जाती या फिर बाउंड्रीवाल के किनारे लगे नारियल के पेड़ों में पत्थर मारती थी.

फिर भी मन नहीं मानता था. वो सायकिल चलाता रहता और मैं उसके पीछे दौड़ती रहती. रोज माँ से शिकायत करती थी की “मुझे भी सीखना है सायकिल” तो माँ प्यार से मुझे कहती की “अभी तुम बहुत कमजोर हो, सायकिल का भर सम्हाल न सकोगी, जब तुम एकदम अच्छी हो जाओगी तो हम तुम्हे बिना डंडे वाली सायकिल दिला देंगे”.

भारतीय लड़कियों के वजूद को दिलासों से अलग नहीं किया जा सकता. दिलासे हमारी जीवन शैली में घर कर जाते हैं और हम एक अनजानी ख़ुशी की आहट को महसूस कर अकारण खुश हो लेते हैं. मैं भी खुश हो जाया करती थी और अपने जल्दी ही स्वस्थ हो जाने की कामना करती थी.

बहुत भोला होता है बचपन. इस उम्र में हमे राजनैतिक, सामाजिक मामलों से कतई सरोकार नहीं होता है. मैं उडती हुई चिड़ियों को देखकर उड़ने की कोशिश करती तो अक्सर गिर जाती. भाई को क्रिकेट पसंद था. वो दीवार के सामने बैट लेकर खड़ा हो जाता मैं उसे बोलिंग करती. बैटिंग मुझे भी पसंद थी पर बोलिंग और फील्डिंग से ही मैं थक जाती थी और बीच खेल में ही उसे वाक ओवर दे कर जाके सो जाती थी.

बच्चे दिनभर जूझते रहते हैं क्योंकि बच्चों को हारना अच्छा नहीं लगता. मैं भी जूझती पर हार जाती थी. कहीं न कहीं से मेरे जोश और जूनून के बीच में हर बार मेरी कमजोरी आ ही जाती. यही कारण है बचपन में बीमार बच्चे inferiority complex के शिकार हो जाते है और कहीं न कहीं से मैं भी इसकी गिरफ्त में आ चुकी थी.

समय बीतता गया.

हम स्कूल में पढने लगे थे. मेरी समस्या ज्यो की त्यों थी. मुझे इतिहास भूगोल जैसे सब्जेक्ट याद नहीं हो पाते थे. हाँ मुझे दीदी हिंदी पढ़ा देती और मैथ व साइंस में मुझे समस्या नहीं थी. इस बीच बीमारी से निजात मिल चुकी थी, यही एक अच्छी बात थी.

7th में साइंस की क्लास में पढने को मिला कि किसी भी कार्य को करने के लिए एक मिनिमम उर्जा की आवश्यकता होती है. किसी काम को नहीं कर पाने का मतलब है की आपने उसके लिए उसके लिए आवश्यक उर्जा की मात्रा को नहीं प्रदान किया.

बात समझ में आ चुकी थी.

बचपन ख़त्म हो रहा था और एक कोशिश तो करनी ही थी. बस जानना ये था कि कौन से काम मैं कर सकती हूँ?

घर पहुँचते देखा मेरा डोगी मुझे देखकर उछल रहा था. पता नहीं क्या मन में आया. बस कुत्ते को चेन से अलग किया, और दौड़ पड़ी उसके साथ. खूब दौड़ी थी मैं उस दिन. और तब तक दौड़ी जब तक थकी नहीं. बेशक उस दिन फिर हारी थी.. पर इतना तो मालूम चल गया था की वो “मिनिमम एनर्जी लेवल” मेरे अन्दर बहुत पहले से थी. ईश्वर ने कोई नाइंसाफी नहीं की थी मेरे साथ. गलती मेरी थी! अनजाने में मैंने अपनी कमजोरी को बहाना मानते हुए कोशिश करने से ही तौबा कर लिया था.

जीवन में सबसे बड़ी ख़ुशी अपने आपको पहचानने पर होती है, ये सच है कि आप हर काम नहीं कर सकते पर ये तो सब पर लागू होता है. वैसे भी कोशिश करके आप बड़ी से बड़ी मिथक तोड़ सकते हैं. हर समस्या का एक समाधान है .खोजिये. हार मत मानिए.

अब बारी थी अपने शौक पूरे करने की. महीने भर से भी कम समय में बिना किसी की मदद के मैं सायकिल चलाना सीख गयी थी. दीदी ने अच्छे खासे हिंदी पोएम और कहानिया रटा दिए थे और मैं गर्व से लोगो को अकसर अपनी हिंदी बोल पाने की शेखी मारती थी.

माँ को मुझ पर भरोसा हो चला था. कुछ दिन बाद ही एक नयी सायकिल मेरे लिए घर में आ चुकी थी. और, समय के साथ वो सायकिल स्कूटी में और स्कूटी कार में बदल चुकी है.

असम के तिनसुकिया की निवासी गीताली सैकिया ने गुवाहाटी विश्वविद्यालय से एमएससी की पढ़ाई की है और खुद का अपना उद्यम संचालित करती हैं उनसे संपर्क उनके फेसबुक एकाउंट facebook.com/geetali.saikia.7 के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्रतिमा भार्गव केस में प्रेस काउंसिल ने दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट को दोषी ठहराते हुए लताड़ा, …लेकिन बेशर्मों को शर्म कहां!

आगरा की रहने वाली प्रतिमा भार्गव ने मीडिया के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली है. लेकिन दुख इस बात का है कि बेशर्म मीडिया वाले इस खबर को कतई नहीं छापेंगे. अगर इनमें थोड़ी भी नैतिकता होती तो प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के इस फैसले को न सिर्फ प्रकाशित करते बल्कि खुद के पतने पर चिंता जताते, विमर्श करते. प्रतिमा भार्गव के खिलाफ एक फर्जी खबर दैनिक जागरण आगरा और आई-नेक्स्ट आगरा ने प्रमुखता से प्रकाशित किया. अनाप-शनाप आरोप लगाए.

प्रतिमा से कोई पक्ष नहीं लिया गया. खबर छपने के बाद जब प्रतिमा ने अपना पक्ष छपवाना चाहा तो दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों ने इनकार कर दिया. प्रतिमा ने लीगल नोटिस भेजा अखबार को तो इसकी भी परवाह नहीं की. अंत में थक हारकर प्रतिमा ने प्रेस काउंसिल आफ इंडिया में केस किया और वकीलों के साथ प्रजेंट हुई. अपनी पूरी बात बताई. प्रेस काउंसिल ने कई बार दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों को बुलाया लेकिन ये लोग नहीं आए.

अब जाकर प्रेस काउंसिल ने आदेश किया है कि दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट ने प्रतिमा भार्गव के मामले में पत्रकारिता के मानकों का उल्लंघन किया है. इस बाबत उचित कार्रवाई के लिए RNI एवं DAVP को आर्डर की पूरी कापी प्रेषित की है. साथ ही आदेश की कापी दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों-मालिकों को भी रवाना कर दिया है. क्या दैनिक जागरण का संपादक संजय गुप्ता और आई-नेक्स्ट का संपादक आलोक सांवल इस फैसले को अपने अखबार में छाप सकेंगे? क्या इनमें तनिक भी पत्रकारीय नैतिकता और सरोकार शेष है? क्या ये एक पीड़ित महिला ने सिस्टम के नियम-कानून को मानते हुए जो न्याय की लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसका सम्मान करते हुए माफीनामा प्रकाशित करेंगे व उसकी खराब हुई छवि को दुरुस्त करने के लिए प्रयास करेंगे?

शायद नहीं. इसलिए क्योंकि इसी को कहते हैं कारपोरेट जर्नलिज्म, जहां सरोकार से ज्यादा बड़ा होता है पैसा. जहां पत्रकारिता के मूल्यों से ज्यादा बड़ा होता है धन का अहंकार. जहां आम जन की पीड़ा से ज्यादा बड़ी चीज होती है अपनी खोखली इज्जत. प्रतिमा ने जो लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसके लिए वह न सिर्फ सराहना की पात्र हैं बल्कि हम सबका उन्हें एक सैल्यूट भी देना बनता है. अब आप सब सजेस्ट करें कि आगे प्रतिमा को क्या करना चाहिए.

क्या उन्हें दिल्ली आकर पूरे मामले पर प्रेस कांफ्रेंस करना चाहिए? क्या उन्हें सुप्रीम कोर्ट में इस बात के लिए केस करना चाहिए कि अगर ये दोषी अखबार माफीनामा नहीं छापते हैं तो कोई पीड़ित क्या करे? आप सभी अपनी राय दें, सुझाव दें क्योंकि ये कोई एक प्रतिमा का मामला नहीं है. ऐसे केस हजारों की संख्या में हैं लेकिन लोग लड़ते नहीं, देर तक अड़े नहीं रह पाते, लड़ाई को हर स्टेज तक नहीं ले जा पाते. प्रतिमा ने ऐसा किया और इसमें उनका काफी समय व धन लगा, लेकिन उन्होंने अपने पक्ष में न्याय हासिल किया. अब उन्हें आगे भी लड़ाई इस मसले पर लड़नी चाहिए तो कैसे लड़ें, कहां लड़ें या अब घर बैठ जाएं?

कहने वाले ये भी कहते हैं कि संजय गुप्ता और आलोक सांवल दरअसल संपादक हैं ही नहीं, इसलिए इनकी चमड़ी पर कोई असर नहीं पड़ता. संजय गुप्ता चूंकि नरेंद्र मोहन के बेटे हैं इसलिए जन्मना मालिक होने के कारण उन्हें संपादक पद दे दिया गया, पारिवारिक गिफ्ट के रूप में. आलोक सांवल मार्केटिंग और ब्रांडिंग का आदमी रहा है, साथ ही गुप्ताज का प्रियपात्र भी, इसलिए उसे थमा दिया गया आई-नेक्स्ट का संपादक पद.

यही कारण है कि इनमें संपादकों वाली संवेदनशीलता और सरोकार कतई नहीं हैं. ये सिर्फ अपनी कंपनी का बिजनेस इंट्रेस्ट देखते हैं और अखबार का प्रसार अधिकतम बना रहे, इसकी चिंता करते हैं. इनके पहाड़ जैसे अवैध साम्राज्य के नीचे हजार दो हजार आम जन दम तोड़ दें तो इनको क्या फरक पड़ने वाला है. खैर, न्याय सबका होता है, सिस्टम नहीं करेगा तो प्रकृित करेगी. वक्त जरूर लग सकता है लेकिन प्राकृतिक न्याय का सामना तो करना ही पड़ेगा. जिस कदर ये महिला प्रतिमा भार्गव पेरशान हुई है, उससे कम परेशानियां ये दोनों शख्स न झेलेंगे, ये तय है, मसला चाहे जो रहे. जै जै. 

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


आर्डर में क्या-क्या लिखा है और पूरा केस क्या है, इसे पढ़ने के लिए नीचे लिखे Next पर क्लिक करें.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पांच महिलाओं की लाश की जगह एक महिला से जुड़ी हस्तमैथुन की खबर को तूल दे रहा टाइम्स ऑफ इंडिया!

दो-चार दिनों से बहुत परेशान हूं। वजह है अखबारों की समझ, अदा, शैली और उनकी संवेदनशीलता। लगातार मनन-चिन्‍तन के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि अब बोलना जरूरी है। यह है लखनऊ से प्रकाशित अखबार टाइम्‍स ऑफ इण्डिया। विश्‍वविख्‍यात है, और अंग्रेजी-दां लोगों का पसन्‍दीदा भी। पांच महिलाओं की लाश की जगह एक महिला से जुड़ी हस्तमैथुन की खबर को तूल दे रहा है ये अखबार।

दिल्‍ली की एक खबर इस अखबार में दो पन्‍नों में अलग-अलग छापी है। मजमून यह है कि दिल्‍ली में जब एक युवती को साथ लेकर एक टैक्‍सी-ड्राइवर जा रहा था, अचानक उसने उस युवती की ओर कामुक मुस्‍कुराहट फेंकते हुए हस्‍त-मैथुन करना शुरू कर दिया। इस पर इस युवती ने विरोध किया और गाड़ी रुकवा कर चली गयी। बाद में उसने सोशल साइट्स पर हल्‍ला मचाया तो टैक्‍सी-मालिक ने उस ड्राइवर को बर्खास्‍त कर दिया। हैरत की बात है कि इस युवती ने अब तक पुलिस को इसकी सूचना देने की जरूरत नहीं समझी। 

मेरी समझ में नहीं आता है कि लखनऊ में मोहनलालगंज में एक साल पहले बरामद हुई रक्‍तरंजित युवती की लाश और उसके बाद ताबड़-तोड़ पांच अन्‍य युवतियों की लाश पर अपनी चिन्‍ता जताने के बजाय इस अखबार ने दिल्‍ली में हस्‍तमै‍थुन की घटना को इतना तूल क्‍यों दिया। क्‍या इसलिए कि लखनऊ में बरामद हुई युवतियों की लाशें बेहद गरीब परिवार की थीं और जो ड्राइवर के हस्‍तमैथुन और उसकी मुस्‍कुराहट से तिलमिला गयी थी, वह कम से कम एक हजार रूपये टैक्‍सी वाले को देने वाली थी।

मुझे खुद पर शर्म आ रही है कि मैं इस समय महिला-अस्मिता के आर्थिक मूल्‍यांकन जैसा घटिया काम कर रहा हूं। लेकिन टाइम्‍स ऑफ इण्डिया क्‍या कर रहा है दोस्‍तों

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जगेंद्र हत्याकांड : ताकतवर आरोपियों की साजिश-दर-साजिश, अब महिला बनी मोहरा

दुनिया भर में चर्चित शाहजहाँपुर के पत्रकार जगेन्द्र हत्या कांड को ‘हत्या और आत्म हत्या’ के बीच उलझाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रभावशाली नामजद आरोपी, पुलिस और कुछ मीडिया संस्थान शर्मनाक तरीके से दिवंगत पत्रकार का चरित्र हनन तक करने लगे हैं, जबकि बड़ा कारण हत्या, आत्म हत्या और चरित्र नहीं, बल्कि मृत्यु है। बड़ी बात यह नहीं है, जगेन्द्र मरे कैसे? बड़ी बात यह बात है कि जगेन्द्र मरे क्यों?

शाहजहांपुर में जगेन्द्र 1 जून को जला, उसी दिन गंभीर हालत होने के कारण जगेन्द्र को उपचार हेतु लखनऊ के लिए भेज दिया गया, जहां 8 जून को उसकी मृत्यु हो गई। अगले दिन राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा, उस समय के कोतवाल श्रीप्रकाश राय सहित छः लोगों को नामजद करते हुए कई अज्ञात लोगों के विरुद्ध जगेन्द्र के बेटे राहुल की ओर से पेट्रोल डाल कर जिंदा जला देने का मुकदमा दर्ज कराया गया। प्रत्यक्षदर्शी के रूप में एक महिला गवाह बनी, जिसने अब पुलिस को बयान दिया है कि जगेन्द्र ने स्वयं आग लगाई, इसी बयान को एक अखबार ने उछाला है और महिला को दिवंगत जगेन्द्र की मित्र बताया है।

अब बात 1 जून से पहले की करते हैं। जगेन्द्र राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा के विरुद्ध फेसबुक पर निरंतर खुलासे कर रहे थे, जिससे राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा का चिढ़ना स्वाभाविक ही है। उन्होंने इसी रंजिश में एक अमित भदौरिया नाम के व्यक्ति की मदद कर दी, जिसकी जगेन्द्र से रंजिश चल रही थी। जगेन्द्र के विरुद्ध राममूर्ति वर्मा का साथ पाकर अमित भदौरिया ने अप्रैल के महीने में जानलेवा हमला करने का एक फर्जी मुकदमा दर्ज करा दिया। राममूर्ति वर्मा के ही दबाव में पुलिस निष्पक्ष जांच करने की जगह जगेन्द्र की गिरफ्तारी करने में जुट गई। जगेन्द्र भूमिगत हो गया और पुलिस के अफसरों से गुहार लगाने लगा कि निष्पक्ष जांच करा दीजिये, पर उसके प्रार्थना पत्रों को किसी पुलिस अफसर ने गंभीरता से नहीं लिया, इसके बावजूद जगेन्द्र ने लिखना बंद नहीं किया। जगेन्द्र लगातार राममूर्ति वर्मा के खुलासे करते रहे। उनकी अवैध संम्पत्ति और खनन आदि में संलिप्त होने की खबरें छापते रहे, जिससे राममूर्ति वर्मा ने पुलिस पर और अधिक दबाव बनाया। जगेन्द्र को राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा की ओर से और भी कई तरह के खतरे महसूस होने लगे, तो जगेन्द्र ने 22 मई को फेसबुक पर लिखा कि राममूर्ति वर्मा उसकी हत्या कराने का षड्यंत्र रच रहे हैं और उसकी हत्या करा सकते हैं।

28 मई को एक आँगनबाड़ी कार्यकत्री ने आरोप लगाया कि कोतवाल श्रीप्रकाश राय उसे गेस्ट हाउस ले गये, जहां राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा आदि ने उसका यौन शोषण किया, इस मुकदमे के संबंध में जगेन्द्र ने न सिर्फ लिखा, बल्कि गवाह भी बन गया। इस मुकदमे के बाद राममूर्ति वर्मा और पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया। जो पुलिस अब तक राममूर्ति वर्मा के दबाव में जगेन्द्र को खोज रही थी, वो पुलिस अब खुद सीधे दुश्मन बन गई। एक जून को पुलिस ने जगेन्द्र को घर में घेर भी लिया, तभी जगेन्द्र के जलने की घटना हुई। उसी दिन जिला अस्पताल में जगेन्द्र ने मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दिया कि पुलिस ने उसे जलाया है और आरोपी कोतवाल श्रीप्रकाश राय ने मुकदमा लिखा कि जगेन्द्र ने आत्महत्या का प्रयास किया है।

अब बहस इस पर हो रही है कि जगेन्द्र ने आत्महत्या की, अथवा उसकी हत्या हुई? हत्या के पक्ष में जगेन्द्र का अपना बयान, फेसबुक वॉल पर मौजूद खबरें और 22 मई की वो पोस्ट, जिसमें उसने अपनी हत्या होने की आशंका जताई थी, वही काफी है। इसलिए आत्महत्या पर बात करते हैं। मान लेते हैं कि जगेन्द्र ने आत्महत्या ही की, तो सवाल यह उठता है कि आत्महत्या करने के हालात किसने उत्पन्न किये? जगेन्द्र ने खुशी में तो आत्महत्या की नहीं होगी। जाहिर है कि राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा और पुलिस के दबाव में ही उसने आत्म हत्या की होगी, तो आत्म हत्या करने को मजबूर कर देना भी कोई छोटा गुनाह नहीं है। भारतीय दंड संहिता में यह उल्लेख है कि आत्म हत्या को मजबूर कर देना भी हत्या की ही श्रेणी का अपराध है। इसीलिए प्रत्यक्षदर्शी गवाह का यह कहना कि जगेन्द्र ने आत्महत्या की थी, नामजद आरोपियों को दोष मुक्त नहीं कर देता।

जगेन्द्र की हत्या के मुकदमे की प्रत्यक्षदर्शी गवाह और राममूर्ति वर्मा आदि पर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली महिला एक ही है, जिसे एक अखबार ने जगेन्द्र की मित्र बताया है। मतलब चरित्र हनन करने का भी प्रयास किया है और यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया है कि जगेन्द्र की मित्र का ही यह कहना है। असलियत में महिला जगेन्द्र की मित्र नहीं, बल्कि दो पीड़ित एक साथ आ गये थे। महिला भी सत्ता पक्ष की सताई हुई थी। तभी उसने यौन शोषण जैसा आरोप लगा दिया। अब जगेन्द्र नहीं हैं, साथ ही आंगनबाड़ी कार्यकत्री की परेशानियां सुलझा दी गई होंगी, तो वो क्यों किसी से दुश्मनी बढ़ायेगी।

हाँ, मित्र होती, तो जरुर जगेन्द्र के न्याय के लिए स्वयं की बलि भी चढ़ा देती। अब संभावना यह भी है कि यौन शोषण के प्रकरण में भी वह यह कह दे कि राममूर्ति वर्मा और पुलिस आदि पर उससे जगेन्द्र ने ही आरोप लगवाये थे। 

स्वतंत्र पत्रकार बी पी गौतम से संपर्क : 8979019871

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मिस्टर पुरुष, बदल लो सिंगल रहने वाली लड़की के प्रति सोच

Mamta Yadav : लडकी सिंगल रहती है, जरूर परेशान होगी, मजबूर होगी, पैसों की तंगी होगी। मदद कर देते हैं, कुछ न कुछ तो मिलेगा। इस ‘कुछ न कुछ’ की हद एक लडकी के मामले में कहां तक जा सकती है, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। दिमागों के जाले वक्त से पहले साफ कर लिये जायें तो सरेबाजार बेपर्दा होने का डर कभी नहीं सतायेगा। या तो जो मुखौटा है उसे कायम रखा जाये या असली थोबडे के साथ घूमिये तथाकथित भैया, अंकल, दोस्त। उन लडकियों को थोडी नहीं, बहुत आसानी होगी जो आपकी नजर में कमजोर बेचारी हैं।

मौका समझने के मुगालते अब न पालें आप लोग। जब अकेली लड़की अपने पर आयेगी तो मुंह छुपाने की जगह नहीं मिलेगी। आमतौर पर कहा जाता है लडकियां एक—दूसरे की बहुत बुराईयां करती हैं लेकिन सच्चाई यह है कि हर आदमी या लडका दूसरे आदमी की बुराई लडकियों के सामने ज्यादा करता है। खुद को स्मार्ट दिखाने के लिये। बेशक इस पोस्ट के बाद ये कमेंट भी आयेंगे कि लड़कियां भीदोषी हैं तो लड़कियों पर उंगलियां उठाने वाले ये भी देख लें कि चार उनकी तरफ हैं। अपने दम पर आगे बढती लड़की की तरक्की बहुत कम लोगों को हजम होती है। बहुत ज्यादा नहीं, थोड़ी उम्मीद हम भी कर सकते हैं कि आप भी अपनी सोच बदलें अगर वाकई इस मॉडर्न सोच के साथ आप जी रहे हैं कि इतना मजाक तो दोस्त, बेटी, बहन के साथ भी चलता है। हम तो हैं ही पिछड़ी सोच के। सारा बहनापा, बेटियापा और दोस्ताना किसी खास मौके पर ही जागता है। माफ करो यार, मौका मत समझो, हमें मौका दो खुद को साबित करने का।

मध्य प्रदेश की पत्रकार ममता यादव के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

महिला पत्रकार के झूठी खबर फैलाने पर बीबीसी ने माफी मांगी

एक महिला पत्रकार अहमन ख्वाजा द्वारा ट्विटर पर महारानी के निधन की गलत सूचना दे देने बीबीसी को माफी मांगनी पड़ी। उसने ट्विटर पर लिखा, ‘महारानी एलिजाबेथ का निधन हो गया.’ पत्रकार ने महारानी के निधन की खबर के प्रसारण की रिहर्सल में हिस्सा लिया था और वह इस खबर को सच मान बैठी थी. 

इसके बाद कई ट्वीट हुए और बीबीसी को शर्मिदा होकर अंत में माफी मांगनी पड़ी. यह ट्वीट महारानी के निधन को लेकर किए जा रहे पूर्वाभ्यास के दौरान किया गया, लेकिन कुछ सूत्रों के अनुसार, ख्वाजा इस खबर को सच मान बैठी और उन्होंने ट्वीट कर दिया, जो उनके अनुसार ब्रेकिंग न्यूज थी.

ख्वाजा (31) ने ट्विटर पर लिखा, ‘ब्रेकिंग: महारानी एलिजाबेथ का किंग एडवर्ड सप्तम अस्पताल में उपचार चल रहा है. बयान जल्द बीबीसी वर्ल्ड पर जारी किया जाएगा.’ संयोगवश महारानी उस अस्पताल में अपने वार्षिक जांच के लिए भर्ती हुई थीं, हालांकि, सूत्रों के अनुसार ख्वाजा यह बात नहीं जानती थीं. ख्वाजा के ट्वीट के बाद उनके फॉलोअर्स ने कई ट्वीट किए और जब उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, तब उन्होंने इसे हटा दिया.

ख्वाजा ने लिखा, ‘झूठी खबर थी. सारे पुराने ट्वीट हटा दिए हैं.’ पत्रकार ने माफी मांगते हुए लिखा, ‘लोगों को दुख पहुंचाने के लिए माफी मांगती हूं.’ उनके निधन की खबर इतनी जल्दी फैल गई कि बकिंघम पैलेस के पास बयान जारी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

इसके बाद बीबीसी ने भी ट्वीट कर लिखा, ‘निधन संबंधी तकनीकी पूर्वाभ्यास के दौरान बीबीसी की पत्रकार ने गलती से ट्वीट कर दिया कि रॉयल परिवार की सदस्य बीमार हो गई हैं. यह ट्वीट हटा दिया गया है और हम इस अपराध के लिए माफी मांगते हैं.’

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दुनिया की सबसे प्रभावशाली 100 महिलाओं में शोभना भरतिया 93वें स्थान पर

दुनिया की सौ सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सालाना सूची में चार भारतीय महिलाएं भी शामिल हैं। इनमें एचटी मीडिया की चेयरपर्सन शोभना भरतिया, एसबीआई की प्रमुख अरुंधति भट्टाचार्य, आईसीआईसीआई बैंक की प्रमुख चंदा कोचर और बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार शॉ हैं। 

अमेरिकी मैग्जीन ‘फोर्ब्स’ द्वारा तैयार की गई इस 12वीं सालाना सूची में भट्टाचार्य को 30वें, कोचर को 35वें, मजूमदार शॉ को 85वें और भरतिया को 93वें स्थान पर रखा गया है। सूची में भारतीय मूल की इंद्रा नूयी (पेप्सीको प्रमुख) और पद्मश्री वॉरियर (सिस्को की चीफ टेक्नोलॉजी स्ट्रेटेजी ऑफिसर) भी हैं। सूची में जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल को पहले स्थान पर रखा गया है।

इस सूची में टॉप 10 महिलाएं हैं – 1. एंजेला मर्केल, जर्मन चांसलर, 2. हिलेरी क्लिंटन, अमेरिकी राष्ट्रपति पद की संभावित प्रत्याशी, 3. मेलिंडा गेट्स, परोपकारी, 4. जेनेट येलन, प्रमुख, फेडरल रिजर्व, 5. मैरी बारा, सीईओ, जनरल मोटर्स, 6. क्रिस्टिन लेगार्ड, प्रमुख, आईएमएफ, 7. डिल्मा रोसैफ, ब्राजील की राष्ट्रपति, 8. शेरिल सैंडबर्ग, सीईओ, फेसबुक, 9. सुजैन वाज्किकी, सीईओ, यूट्यूब और दसवें स्थान पर हैं, 10. अमेरिका की प्रथम महिला मिशेल ओबामा।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘आप’ के नेता महिला-रक्षक हैं या भक्षक

शादीशुदा महिला को उसके पति ने, विश्वास जी से अवैध सम्बन्ध के कारण बेघर कर दिया है ! पीड़ित महिला अपने नवजात बच्चे के साथ न्याय पाने के लिए दर-2 भटक रही है ! केजरीवाल जी से निवेदन है कि महिला को तत्काल 1 करोड़ रूपये की आर्थिक सहायता दे और घटना की न्यायिक जांच करायें ! यदि पीड़ित महिला सहमत हो तो बच्चे का डीएनए टेस्ट अवश्य कराना चाहिए ! 

केजरीवाल और उनकी चौकड़ी कभी मीडिया पर तो कभी बीजेपी पर झूठे आरोप लगाते हैं! 2 महीने की आआपा की सरकार में 3 मंत्री, 3 विधायक और स्वयं मुख्यमंत्री विवादों में घिर चुके हैं !

एक मंत्री ने रोडरेज करने वालों को बचाने का प्रयास किया ! दूसरा मंत्री फ़र्ज़ी कानून की डिग्री लेकर वकील बन गया ! तीसरे मंत्री ने राजस्थान से एक किसान को बुलाकर आत्महत्या के लिए उकसाया ! एक विधायक हत्या करने वाले सट्टेबाजों को बचाता है ! दूसरा विधायक थाने में घुसकर पुलिस पर हमला करता है ! तीसरा नगर निगम के इंजीनियर को खुलेआम पीटता है ! मुख्यमंत्री स्वयं नेताओ को लात से मारने की धमकी देते हैं!

केजरीवाल को पता था कि मीडिया कुमार विश्वास द्वारा महिला के शोषण की खबर चलाएगा इसीलिए अपनी कमियों और नाकामियों को छिपाने के लिए ही एक दिन पहले मीडिया पर हमला बोल दिया ! महिला सुरक्षा के नाम पर झूठी राजनीति करने वालों के राज में महिलाएं असुरक्षित महसूस कर रही हैं!

अश्विनी उपाध्याय संपर्क : aku.adv@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इंडियन वुमेन प्रेस कार्प (IWPC) के चुनाव में सभी पदाधिकारी निर्विरोध निर्वाचित

 

इंडियन वुमेन प्रेस कार्प यानि IWPC का वर्ष 2015-16 के लिए चुनाव संपन्न हो गया. टीके राजलक्ष्मी, शोभना जैन और रविंदर बावा सहित सभी पदधिकारी व कार्यकारिणी निर्विरोध निर्वाचित घोषित की गई है. महिला पत्रकारों के इस संगठन की स्थापना का 21वां वर्ष चल रहा है. इस संगठन में करीब 700 से अधिक महिला पत्रकार सदस्य हैं. इस वर्ष के लिये घोषित टीम इस प्रकार है…

अध्यक्ष- टीके राजलक्ष्मी (फ्रंटलाइन)
उपाध्यक्ष- शोभना जैन (वीएनआई), मंजरी चतुर्वेदी (नभाटा)
महासचिव- रविंदर बावा (बीबीसी)
कोषाध्यक्ष- अन्नपूर्णा झा (फ्रीलांसर)

कार्यकारिणी- अदिती कपूर (फ्रीलांसर), अंबिका पंडित (टीओआई), अमिती सेन (हिन्दू बिज़नेसलाइन), अरुणा सिंह (साउथ एशियन इन्साईडर), इश्पिता बैनर्जी (फ्रीलांसर), कमलजीत कौर संधु (हेडलाइन्स टुडे,) माधवीश्री (फ्रीलांसर), नारायणी गणेश (टीओआई), प्रीति प्रकाश (फेस एन फैक्ट्स.कॉम), प्रीतपाल कौर (फ्रीलांसर), रंजना सक्सेना (फ्रीलांसर), संतोष मेहता (फ्रीलांसर), सर्जना शर्मा (कबीर कम्युनिकेशन्स), सीमा कौल (न्यूज़ एक्स), श्वेता रश्मि (ललकार), सुमन कंसरा (फ्रीलांसर), सुनीता वकील (समाचार पोस्ट), सुषमा वर्मा (फ्रीलांसर), विभा जोशी (ग्रोथ स्टोरी), विमल इस्सर (फ्रीलांसर).

प्रबंध समिति का चुनाव 18 अप्रैल 2015 को कोर के नई दिल्ली स्थित कार्यालय 5, विंडसर पैलेस में संपन्न हुआ.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

गोपनीय दस्तावेज लीक करने पर चीन की महिला पत्रकार को सात साल कैद

गोपनीय पार्टी सर्कुलर को एक विदेशी वेबसाइट पर लीक करने के जुर्म में चीन की एक महिला पत्रकार को सात साल कैद की सजा सुनाई गयी है.

सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं पर आलोचनात्मक खबरों को लेकर मशहूर हुईं 71 वर्षीय गाओ यू चीन के प्रमुख पत्रकारों में से एक हैं. वह सरकार के नेताओं की आलोचना करने वाले लेखों के लिए जानी जाती हैं. उन्हें शुक्रवार को बीजिंग की नंबर 3 ‘इंटरमीडिएट कोर्ट’ ने कम्युनिस्ट पार्टी के आंतरिक दस्तावेज को लीक करने का दोषी पाया और सजा सुनाई. मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले को न्याय की अवज्ञा करार दिया है.

गाओ के वकील मो शाओपिंग के अनुसार सरकार ने गाओ पर सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व द्वारा 2013 में जारी एक अत्यंत गोपनीय ‘दस्तावेज नंबर 9’ को एक विदेशी चीनी भाषा के समाचार संस्थान को देने का आरोप लगाया था.   

इस दस्तावेज को पार्टी के वैचारिक संघर्ष की योजना की रूपरेखा बताया जा रहा है जिसमें कार्यकर्ताओं से समाज पर सात विध्वंसक प्रभावों से निपटने के लिए कहा गया था. 

लोकतंत्र का खुलकर समर्थन करने और प्रेस की आजादी की वकालत करने के लिए जानी जाने वाली गाओ पर मुकदमा पिछले साल नवंबर में शुरू हुआ था और उन्होंने आरोप से इनकार किया था जिसका इस्तेमाल अकसर चीन में पत्रकारों को जेल में डालने के लिए किया जाता है. रिपोर्ट में उनके भाई गाओ वेई के हवाले से कहा गया है कि गाओ ने फैसले के तत्काल बाद कहा कि वह फैसले के खिलाफ अपील करना चाहती हैं. वह शांत रहीं और मुस्कुरा रही थीं.

शुक्रवार के फैसले को राष्ट्रपति शी चिनफिंग द्वारा उनकी कम्युनिस्ट पार्टी के आलोचकों के खिलाफ कार्रवाई के ताजा वाकये के तौर पर देखा जा रहा है. इस तरह के आरोपों में कई पत्रकार, वकील और शिक्षाविदों को हिरासत में लिया गया और कई को जेल में डाला गया.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दिल्ली दूरदर्शन में महिला कर्मियों का यौन शोषण, शिकायत के बावजूद आयोग और मंत्री खामोश

दिल्ली : मीडिया में लड़कियों की स्थिति बहुत अच्छी नही है, यह बात किसी से छिपी नही है-तहलका का तरुण-तेजपाल मामला हो, या इंडिया टीवी की एंकर रही तनु शर्मा का मामला। अब तो दूरदर्शन भी महिला कर्मियों के लिए सुरक्षित नहीं रहा। दूरदर्शन में सेवारत कई महिला कर्मियों का यौन उत्पीड़न किया जा चुका है। हाल ही में दूरदर्शन की उत्पीड़ित महिला कर्मियों की लिखित शिकायतों के बावजूद उन पर न तो महिला आयोग गंभीर है, न अन्य कोई वह जांच एजेंसी, जहां वे अपनी शिकायतें कर रही हैं। महिला बाल विकास मंत्रालय का इस मामले पर खामोशी साध लेना तो और भी आश्चर्यजनक है। ये हाल तो तब है, जबकि उन पीड़ित महिलाओं में से एक उसी आरएसएस के दूरदर्शन में प्रसार भारती मजदूर संगठन बीएमस की नेता हैं, जिसकी इस समय केंद्र में सरकार है। एक पीड़ित महिला कर्मी ने न्याय की गुहार लगाते हुए शिकायती पत्र में लिखा है कि क्या बलात्कार हो जाने के बाद ही कोई कार्रवाई होगी? 

दूरदर्शन सूत्रों के मुताबिक एक वरिष्ठ अधिकारी ने तो अपने अधीनस्थ महिला कर्मी से कहा कि तुम मेट्रो में रहने वाली तीस वर्ष की जवान हो, तुम ये भी नहीं जानती कि वरिष्ठ अफसर से कैसे पेश आया जाता है। दिल्ली की लड़कियां तो सब कुछ जानती हैं। महिला कर्मी की शिकायत है कि सिर्फ उसके साथ ही ऐसा नहीं, दूरदर्शन की कई महिलाओं के साथ इस तरह की हरकतें हो चुकी हैं। 

दूरदर्शन में कार्यरत कई महिलाएं अपने अफसरों से डरी हुई हैं। एक पीड़िता महिला कर्मी ने साहस बटोर कर पुलिस में शिकायत भी कर दी है। एक अन्य महिला दूरदर्शन कर्मी को अपने विभागीय उच्चाधिकारियों से जब न्याय नहीं मिला तो उसने केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्री मेनका गांधी और महिला आयोग को लिखित में बताया है कि उसके अफसर अपर महानिदेशक ने ऐसी शर्मनाक हरकत उससे की है कि उसे कहने में भी शर्म महसूस हो रही है। इसके बाद उस पीड़िता पर दबाव डालने के साथ ही परिजनों को शिकायत वापस लेने के लिए धमकाया गया। बताया जाता है कि उसका यौन उत्पीड़न किया गया है। 

पता चला है कि इसी तरह आकाशवाणी भवन स्थित दूरदर्शन अभिलेखागार में कार्यरत एक अन्य महिला कर्मी ने प्रोग्राम एक्जिक्यूटिव पर यौन हरकतों का आरोप लगाया है। उसने इसकी लिखित शिकायत अपने विभाग के उच्चाधिकारियों के अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला बाल विकास मंत्री से की है। आरोप है कि संबंध न बनाने पर प्रोग्राम एक्जिक्यूटिव ने उसे कई बार धमकियां भी दीं। उसकी फरियाद पर कोई कार्रवाई तो नहीं हुई। उल्टे उसे ही मंडी हाउस स्थित दूरदर्शन मुख्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया। वहां भी उसे एक अफसर तंग करने लगा। इस दफ्तर में तैनात रहे एक अपर महानिदेशक पर भी एक महिला कर्मी ने पिछले वर्ष यौन शोषण का आरोप लगाया था। उस मामले में भी कोई कार्रवाई करने की बजाय अफसर को स्थानांतरित कर दिया गया था। 

इन घटनाओं से पूर्व विशाखा गाइडलाइंस के आने के बाद भी दूरदर्शन की एक महिला पत्रकार द्वारा एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत सहकर्मी पर यौन शोषण का आरोप लगाया जाना और उस पर दूरदर्शन के सर्वोच्च पद (डीजी-डीडी) पर एक महिला के आसीन होते हुए भी उसके द्वारा पीड़ित के आरोपों पर कार्रवाई न किया जाना एक खतरनाक कदम की ओर संकेत करता है। इसी तरह की अक्टूबर 2013 की एक घटना भी दूरदर्शन से ही संबंधित है। उस समय तो प्रसार भारती प्रबंधन ने यौन उत्पीडऩ के आरोपी दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी को निलंबित कर दिया था। अधिकारी की सहकर्मी ने उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसी तरह इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा ने अपने अधिकारियों द्वारा उत्पीड़ित किए जाने, दफ्तर की गुटबाजी और फिर बिना कारण बताए बर्खास्त कर दिए जाने पर दफ्तर के सामने ही जहर खाकर खुदकुशी करने की कोशिश की थी। 

डा. रीना मुखर्जी, तनु शर्मा प्रकरणों ने भी मीडिया कुपात्रों का भेद खोला था : प्रिंट मीडिया में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। ‘द स्टेटसमैन’ की एक सीनियर रिपोर्टर रहीं डा. रीना मुखर्जी ने अखबार के ही तत्कालीन न्यूज कोआर्डिनेटर ईशान जोशी पर यौन शोषण का आरोप लगाया था, जिसके बाद इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराए जाने के बजाय उन्हीं को नौकरी से निकाल दिया गया था।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बनारस के लेनिन रघुराम उर्फ लेनिन रघुवंशी ने अमेरिकी महिला से दिल्ली के होटल में किया दुष्कर्म !

नई दिल्ली : पहाड़गंज के होटल में 38 साल की अमेरिकी महिला के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया है। यह घटना 14 अप्रैल, 2013 की है। इस दौरान उन्होंने न तो दिल्ली पुलिस से शिकायत की थी और न ही अमेरिकी दूतावास से। अमेरिका में रह रहे घनिष्ठ मित्र को आपबीती बताने पर उन्होंने महिला को वापस अमेरिका लौट आने का सुझाव दिया, तब वह लौट गई थी।

(अमेरिकी महिला से बलात्कार के आरोप सोशल एक्टिविस्ट लेनिन रघुवंशी)

कुछ समय बाद फिर भारत आईं और आरोपी के वाराणसी में होने से वहां के थाने में मुकदमा दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन जब उनकी नहीं सुनी गई, तब दिल्ली पुलिस व दिल्ली महिला आयोग में शिकायत की। पुलिस आयुक्त भीमसेन से मिलने के बाद उनके निर्देश पर बुधवार को पहाड़गंज थाने में आरोपी लेनिन रघुराम उर्फ लेनिन रघुवंशी के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज कर लिया गया। पुलिस के मुताबिक, महिला शादीशुदा है। वह स्टूडेंट वीजा पर वर्ष 2000 से भारत आती-जाती थी। 2013 में जब उन्होंने अमेरिका में रहकर ही ऑनलाइन लेनिन रघुराम उर्फ लेनिन रघुवंशी की संस्था के बारे में पढ़ा तो काफी प्रभावित हुई। लेनिन ने वाराणसी में दलित, मुस्लिम व लाचार महिलाओं के वेलफेयर के लिए संस्था बना रखा है। संस्था के एजेंडे से प्रभावित होकर महिला ने फोन पर लेनिन से बात करनी शुरू कर दी। 2013 में उन्होंने संस्था को 200 डॉलर की आर्थिक मदद भी दी।

13 अप्रैल, 2013 को लेनिन के बुलाने पर महिला भारत आ गई। आईजीआई एयरपोर्ट पर वह खुद आया। उसने महिला के ठहरने के लिए पहाड़गंज के होटल में कमरा बुक करा दिया था। होटल पहुंचकर दोनों ने साथ में शराब पी और खाना खाया। महिला जब अपने कमरे में सो गई तब लेनिन ने दुष्कर्म किया और वारदात के बाद होटल से गायब हो गया। नींद खुलने पर उन्हें दुष्कर्म किए जाने का एहसास हुआ। तब उन्होंने अमेरिका में रह रहे अपने दोस्त को आपबीती बताई। दोस्त के सुझाव देने पर वह लौट गई। कुछ महीने बाद वह लेनिन को खोजने के लिए वाराणसी गई, लेकिन वह नहीं मिला। इस दौरान एक महिला से मुलाकात हुई, उसे भी लेनिन ने धोखा देकर यौन शोषण किया था। इसके बाद उन्होंने वाराणसी में पुलिस अधिकारियों से मिलकर आपबीती बताई, लेकिन मुकदमा दर्ज नहीं हो सका। तब अमेरिकी महिला ने दिल्ली महिला आयोग से संपर्क किया। अधिवक्ता शुब्रा मेंहदीरत्ता ने उनकी शिकायत सुनकर पहाड़गंज थाना पुलिस को मामले की जानकारी।


इस मामले पर आरोपी लेनिन रघुवंशी के संगठन की तरफ से जो बयान जारी किया गया है, उसने पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

अमेरिकी महिला से रेप के आरोपों पर लेनिन रघुवंशी के संगठन की तरफ से विस्तृत बयान जारी

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

किसानों और महिलाओं की चीख को दबाना चाहता है यूपी का शासन-प्रशासन

उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का नारा देने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार में ठीक विपरीत परिणाम आता नजर आ रहा है। अपराध और भ्रष्टाचार के बिन्दुओं पर तुलना की जाये, तो आज उत्तर प्रदेश बिहार से ज्यादा बदनाम नजर आ रहा है। कानून व्यवस्था को लेकर हालात इतने दयनीय हो चले हैं कि आम आदमी को कोई सांत्वना तक देने वाला नजर नहीं आ रहा, लेकिन खास लोगों के अहंकार को ठेस न पहुंचे, इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा है। 

फेसबुक की मामूली पोस्ट को लेकर इतने बड़े स्तर पर कार्रवाई की जाती है कि उच्चतम न्यायालय ने आईटी एक्ट की धारा- 66(ए) समाप्त करना ही उचित समझा, इसके बावजूद सरकार की कार्यप्रणाली में कोई अंतर आता नजर नहीं आ रहा। प्रदेश के अधिकाँश जिलों के हालात लगभग एक समान ही हैं। यौन शोषण, हत्या, लूट, राहजनी जैसी जघन्यतम वारदातों को लेकर प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में आम आदमी दहशत में हैं। बारिश और तेज हवाओं के प्रकोप से प्रदेश के किसान तबाह हो चुके हैं और लगातार आत्म हत्या कर रहे हैं। महिलायें घर के दरवाजे से बाहर कदम रखने से डरने लगी हैं। एसिड अटैक के मामलों में उत्तर प्रदेश का देश में पहला नंबर है, यहाँ वर्ष- 2014 में 185 बेकसूर महिलायें एसिड अटैक का शिकार हो चुकी हैं। बाल शोषण की भी ऐसी ही स्थिति है, अर्थात प्रदेश का हर वर्ग पूरी तरह त्रस्त नजर आ रहा है, लेकिन दबंग, माफिया व अपराधी मस्त नजर आ रहे हैं, वहीं सरकार खेल में व्यस्त है।

आयोजन सरकारी नहीं है, फिर भी सरकार राजधानी लखनऊ में चल रहे इंडियन ग्रामीण क्रिकेट लीग (आईजीसीएल) को बड़ी उपलब्धि मान रही है, जबकि सवाल यह है कि जीवन रहेगा, तभी तो कोई विकास करेगा? हाल-फिलहाल प्रदेश के हालत ऐसे हैं कि यहाँ लोगों का जीवन ही दांव पर लगा हुआ है, जिसे बचाने को सरकार को जैसे प्रयास करने चाहिए, वैसे प्रयास करती सरकार नजर नहीं आ रही।

असलियत में सरकार को जनता के हितों और उसकी भावनाओं से बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है। प्रदेश जब दंगों की आग में झुलस रहा था और प्रदेश के साथ समूचे देश में आलोचना हो रही थी, तब भी सब कुछ नजर अंदाज़ करते हुए सरकार सैफई महोत्सव का आनंद लेती नजर आ रही थी, इसलिए इंडियन ग्रामीण क्रिकेट लीग (आईजीसीएल) में व्यस्तता पर आश्चर्य नहीं होता, लेकिन स्तब्ध कर देने वाली बात यह है कि सरकार की राह पर ही प्रशासन भी चल पड़ा है। बदायूं में हाहाकार मचा हुआ है और बदायूं का जिला प्रशासन बदायूं महोत्सव आयोजित कर शोषित वर्ग की चीखों को दबाने का प्रयास करता नजर आ रहा है।

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और उनके परिजन इटावा के बाद बदायूं जिले को अपना दूसरा घर मानते हैं। मुलायम सिंह यादव सहसवान व गुन्नौर विधान सभा क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं। वे व प्रो. रामगोपाल यादव संभल लोकसभा क्षेत्र से सांसद भी रह चुके हैं। वर्तमान में बदायूं लोकसभा क्षेत्र से उनके भतीजे धर्मेन्द्र यादव सांसद हैं, उन्होंने 11 अप्रैल को जिला प्रशासन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय बदायूं महोत्सव का दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ किया। इससे पहले शासन-प्रशासन की मदद से अफसरों और कर्मचारियों के साथ जिले भर के धनपतियों, माफियाओं और व्यापारियों से बड़े स्तर पर उगाही की गई। विभिन्न सरकारी मदों और उगाही से मिले धन से खेल-कूद, कुश्ती, निशानेबाजी, रंगोली, साईकिल मैराथन, मुशायरा, कवि सम्मेलन और म्यूजिकल नाइट के नाम पर चंद लोग तीन दिन जमकर मस्ती करेंगे।

हालाँकि महोत्सव को प्रशासन साहित्यिक आयोजन करार देता है, लेकिन महोत्सव में शकील बदायूंनी का जिक्र तक नहीं किया जाता, जबकि दुनिया के तमाम देशों में बदायूं को विश्व प्रसिद्ध गीतकार शकील के कारण जाना जाता है, इसी तरह शौकत अली फानी का भी कोई नाम नहीं लेता और हाल ही के वर्षों में शरीर त्यागने वाले विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. ब्रजेन्द्र अवस्थी के नाम तक का कोई उल्लेख नहीं करता, ऐसे में बदायूं महोत्सव को साहित्यिक आयोजन कैसे कहा जा सकता है?

बदायूं जिले के हालातों की बात करें, तो बदायूं जिला उत्तर प्रदेश के उन जिलों में शीर्ष पर है, जिन जिलों में कानून व्यवस्था की स्थिति सर्वाधिक दयनीय है। कटरा सआदतगंज कांड के चलते देश को विश्व पटल पर शर्मसार होना पड़ा था, इसी तरह थाना मूसाझाग और कोतवाली उझानी परिसर में सिपाहियों द्वारा किशोरियों के साथ की गई यौन उत्पीड़न की वारदातों से भी प्रदेश की छवि खराब हो चुकी है, इन चर्चित घटनाओं के अलावा बदायूं जिले में हर दिन किसी न किसी क्षेत्र में जघन्यतम वारदात घटित होती ही रहती है। चार दिन पूर्व हुई वारदात के चलते तो जिले भर के लोग दहशत में हैं। बदायूं शहर के मोहल्ला ब्राह्मपुर में रहने वाले सेवानिवृत अभियंता वीके गुप्ता (72) और उनकी पत्नी शन्नो देवी (68) के 8 अप्रैल की रात में उनके घर में शव बरामद हुए थे। पति-पत्नी घर में अकेले रहते थे और दोनों को चाकू व रॉड से गोद कर मार दिया गया, जिसका खुलासा पुलिस अभी तक नहीं कर पाई है, जबकि मृतक चर्चित मुकुल हत्या कांड में वादी थे।

बता दें कि 30 जून 2007 को बरेली में एएसपी के पद पर तैनात प्रशिक्षु जे. रवीन्द्र गौड़ के नेतृत्व में बरेली जिले के फतेहगंज पश्चिमी क्षेत्र में एक मुठभेड़ हुई, जिसमें बदायूं निवासी एक युवा मुकुल गुप्ता को मार दिया गया था। पुलिस ने उसे खूंखार अपराधी बताया था, जबकि मुकुल बरेली में साधारण कम्प्यूटर ऑपरेटर था। पुलिस की कहानी को वीके गुप्ता ने झूठा बताया था और उन्होंने अदालत में प्रार्थना पत्र देकर मुठभेड़ करने वाले पुलिस कर्मियों के विरुद्ध एफआईआर लिखाने की गुहार लगाई थी, जिस पर अदालत ने मुकदमा लिखने का आदेश दे दिया, लेकिन पुलिस ने मुदकमे में फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, इसके बाद बदायूं शहर के उस वक्त के विधायक महेश चंद्र गुप्ता ने इस मामले को विधान सभा में उठाया था, जिस पर शासन ने सीबीसीआईडी जांच कराने के आदेश दे दिए थे, पर सीबीसीआईडी जांच में भी कुछ नहीं हुआ। हार कर बुजर्ग वीके गुप्ता ने हाईकोर्ट का सहारा लिया था और 26 फरवरी 2010 को हाईकोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच करने के आदेश दिए थे।

सीबीआई ने इस मामले में आईपीएस जे. रविन्द्र गौड़ के साथ दस आरोपी बनाये और जे. रविन्द्र गौड़ के विरुद्ध सुबूत जुटा कर शासन से अभियोजन की अनुमति मांगी, लेकिन शासन ने अनुमति नहीं दी है। मृतक अपने बेटे को न्याय दिलाने की जंग लड़ रहे थे, लेकिन स्थानीय प्रशासन न उनकी सुरक्षा कर सका और न ही अब तक उनके हत्यारों को खोज पाया है।

बारिश और तेज हवाओं ने समूचे प्रदेश में कहर बरपाया है, लेकिन सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में बदायूं जिला शीर्ष पर है, यहाँ अब तक दस से अधिक किसान आत्म हत्या कर चुके हैं, जिनके आश्रित जड़वत नजर आ रहे हैं। बर्बाद किसानों के परिवारों में कोहराम मचा हुआ है, उनकी आँखों का पानी सूख चुका है और शरीर में इतनी शक्ति नहीं बची है कि मुंह से आह भी निकल सके, उनकी हालत देख कर हर आँख नम है, लेकिन जिला प्रशासन इतना अमानवीय हो चला है कि उन्हें सांत्वना देने की जगह जश्न मना रहा है।

बी.पी. गौतम, स्वतंत्र पत्रकार

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘नेक्सजेन वीमन जर्नलिस्ट अवॉर्ड’ से नवाजी गईं पांच महिला पत्रकार

जयपुर : एंटरटेनमेन्ट नेक्सजेन की ओर से प्रारंभ किए गए ग्लोबल इनीशिएटिव ‘‘इंटरनेशनल वीमन जर्नलिस्ट डे’’ के अन्तर्गत रविवार को कानोडिया गर्ल्स कॉलेज में भव्य समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर हुए टॉक शो में स्त्री विमर्श की प्रखर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने संकीर्ण पुरूष मानसिकता पर कड़े प्रहार करते हुए कहा कि जब तक निर्भया काण्ड पर आधारित ‘इण्डियाज डॉटर’ जैसी डॉक्यूमेन्ट्रीज पर बैन लगता रहेगा, तब तक दीपिका पादुकोण की ‘‘माय च्वाइस’’ जैसी शॉर्ट फिल्में आती रहेंगी। 

कानोडिया गर्ल्स कॉलेज, जयपुर में कथाकार मैत्रेयी पुष्पा एवं अन्य के साथ सम्मानित महिला पत्रकार

उन्होंने अपने वक्तव्य में इण्डियाज डॉटर पर लगाई गई सरकारी रोक को पुरूषवादी सोच का एक षड़यन्त्र बताते हुए कहा कि जब तक एक बलात्कारी की मानसिकता को आमजन के सामने नहीं लाया जाएगा, तब तक निर्भया काण्ड जैसी घटनाओं पर पूरी तरह रोकथाम समाज के लिए संभव नहीं। समारोह में पत्रकारिता के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान के लिए राजस्थान की पांच महिला पत्रकारों को ‘‘नेक्सजेन वीमन जर्नलिस्ट अवॉर्ड’’ से सम्मानित किया गया।

सर्वप्रथम नेक्सजेन के डायरेक्टर अरशद हुसैन ने स्वागत भाषण किया। इसके बाद महिलाओं की वर्तमान स्थिति और पत्रकारिता विषय पर टॉक शो प्रारंभ हुआ। टॉक शो के दौरान महिला पत्रकारिता की स्थिति पर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि मेरे विचार में पत्रकारिता उसी प्रकार है जैसे कि किसी सिपाही का रणक्षेत्र में जाना। आज महिलाएं पत्रकारिता के कई क्षेत्रों में सक्रिय हैं, लेकिन आज भी पत्रकारिता में ग्रामीण महिलाओं की स्थिति कहीं नजर नहीं आती। उन्होंने कहा कि महिला पत्रकार शहर की सड़कों को ही नहीं देखें, बल्कि गांव की डगर भी खोजें, तभी उन्हें असली भारत की सच्ची तस्वीर नजर आएगी और वे सही मायने में पत्रकारिता को नये आयाम दे पाएंगीं। अपने वक्तव्य में मैत्रेयी पुष्पा ने पत्रकारिता में अंग्रेजी तथा द्विअर्थी शब्दों के अधिक उपयोग पर भी विचार रखे।

उन्होंने कहा कि विदेश फिल्मों तथा टीवी कॉमर्शियल्स के जरिए अब ऐसी सामग्री अखबारों और न्यूज चैनलों पर भी प्रकाशित-प्रसारित हो रही है, जिसे रोकने की महती आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हिन्दी के प्रसार के लिए शुरूआत अपने घर से होनी चाहिए क्योंकि अंग्रेजी रोजगार के लिए आवष्यक भाषा हो सकती है, जीवन के लिए नहीं। इस टॉक शो के दौरान मैत्रेयी पुष्पा के साथ पत्रकार अमृता मौर्या ने संवाद किया।

इन्हें मिला नेक्सजेन वीमन जर्नलिस्ट अवॉर्ड इंटरनेशनल वीमन जर्नलिस्ट डे आयोजन समिति की कोर्डिनेटर सृष्टि सक्सेना के अनुसार फीचर लेखन के लिए वर्षा भम्भाणी मिर्जा, फोटो पत्रकारिता के लिए मोलिना खिमानी, उर्दू पत्रकारिता के लिए जीनत कैफी, टीवी पत्रकारिता के लिए राखी जैन तथा महिला लेखन व रिपोर्टिंग के लिए लता खण्डेलवाल को ‘‘नेक्सजेन वीमन जर्नलिस्ट अवॉर्ड’’ से नवाजा गया। सम्मान स्वरूप उन्हें शॉल ओढ़ाकर स्मृति चिन्ह और प्रशस्ति पत्र भेंट किए गए। उन्हें समारोह की मुख्य अतिथि लेखिका मैत्रेयी पुष्पा, कानोडिया गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसीपल रश्मि चतुर्वेदी, नेक्सजेन के डायरेक्टर अरशद हुसैन, पं. सुरेश मिश्रा, एडवोकेट जय शर्मा तथा मुकेश गुप्ता ने पुरस्कृत किया।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

उबर के सीईओ ने कहा था- हम एक बूबर कंपनी हैं जिसके साथ महिलाएं सोना चाहती हैं!

: अमेरिकी महिला पत्रकार ने किया बड़ा खुलासा : बात इसी साल अक्टूबर की है जब सारा लेसी फ्रांस के शहर लियोन में थीं और कहीं जाने के लिए टैक्सी का इंतजार कर रही थीं। तभी उनकी निगाह एक ऐसे प्रचार पर पड़ी जिसमें लिखा था कि हॉट फीमेल ड्राइवर्स की सुविधा के लिए इस नंबर पर डायल करें। इस एड को देखते ही लेसी ने तय किया कि वह उस एप को ही डिलीट कर देंगी जो कैब की सुविधा देती है। लेसी को लगा कि वह खुद एक महिला हैं और अगर महिलाओं का इस्तेमाल इस तरह से किया जाएगा तो उनके साथ रेप जैसी घटनाओं को होने से कैसे रोका जा सकता है।

असल में सारा लेसी अमेरिका की एक टेक्नॉलेजी जर्नलिस्ट हैं जिन्होंने इसी साल अक्टूबर में अपने स्मार्टफोन से उबर एप को डिलीट किया और अपने जानने वालों से ही ऐसा करने की अपील की। उनके इस अभियान को शुरू हुए अभी दो महीने भी नहीं हुए थे कि उन्हें दिल्ली में उबर के कैब ड्राइवर द्वारा महिला के बलात्कार की घटना का पता चला। इस बारे में सुनते ही उन्होंने ट्विट कर कहा कि यह जानकर उन्हें बेहद दुख हो रहा है।

इस अमेरिकी महिला जर्नलिस्ट ने जिस सच्चाई की ओर संकेत किया वह इतनी शर्मनाक है जिसे जानकर किसी का भी सिर शर्म से झुक जाए। असल में लेसी भी कई बार उबर की सुविधाएं ले चुकी हैं लेकिन उनका कहना है कि असल मुद्दा ये नहीं है कि कौन सी कैब कंपनी कम खतरनाक है और कौन ज्यादा। असल समस्या ये है कि हमारी संस्कृति ही महिलाओं के अपमान को बढ़ावा देनी वाली है।

लेसी एक न्यूज वेबसाइट चलाती हैं। अभी हाल ही में उन्होंने एक इंवेस्टिगेटिव स्टोरी की ‌थी जिसमें उन्होंने उबर के उस दावे के खोखलेपन को साबित किया था जिसमें कंपनी कहती है कि उसके किसी भी ड्राइवर का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। लेसी ने अपनी रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि जैसे ही काोई उबर ड्राइवर्स की शिकायत कंपनी से करतीं कंपनी के लोग उलट कर पैसेंजर पर ही दोष मढ़ देते। यहां तक कहा जाता कि पैसेंजर ने इतने भड़काउ ड्रेस पहन रखे थे कि इस तरह की घटना को रोका नहीं जा सकता।

लेसी ने बताया कि उबर ऐसी कंपनी है जिसके सीईओ ट्रैविस क्लेनिक ने कंपनी की सफलता से खुश होकर कहा ‌कहा था कि हम एक बूबर (Boober) कंपनी है जिसके साथ महिलाएं सोना चाहती हैं। कंपनी तो यह तक कहती है कि महिलाएं टैक्सी ड्राइवर के हमले को सबसे ज्यादा शिकार बनतीं हैं। ऐसे में सिर्फ उबर को ही इसके लिए दोषी ठहराना गलत है। लेसी से तो यह तक कहा गया कि अगर उनके खुलासे के बाद भी महिलाओं के साथ इस तरह की घटना होती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी लेसी जैसी महिलाओं को लेनी चाहिए।

लेसी का कहना है कि जैसे ही इस तरह की घटनाओं के बारे में जिम्मेदारी लेने की बात आती है कोई भी आगे नहीं आना चाहता। लेसी की रिपोर्ट का सार है कि हमारे समाज में महिलाओं को जब तक उपभोग की वस्तु के रूप में प्रयोग किया जाता रहेगा उसे सम्मान दिलाना मुश्किल है। ऐसे में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सांस्कृतिक मूल्यों में बदलाव की गंभीर आवश्यकता है।

साभार: indianexpress.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बटंग में महिलाओं का मोर्चा, गांव में शराबियों की खैर नहीं

बटंग से लौट कर अमरेन्द्र कुमार आर्य की रिपोर्ट

भिलाई। जागो युवा, जागो नारी, खत्म करो शराब की बीमारी… नारी शक्ति जाग गई… गांव की रक्षा कौन करेगा, हम करेंगे, हम करेंगे। बटंग गांव मेंरोज रात १० बजे यही सीन देखा जा सकता है। इस गांव में जब पुरुष सोने की तैयारी कर रही होती हैं, तब गांव की महिलाएं हाथों में लाठी लेकर शराबियों और शराब की अवैध बिक्री करने वालों के खिलाफ मोर्चेबंदी की तैयारी करती हैं। हर रात महिलाएं बेखौफ होकर गांव में घूम घूम कर शराब माफिया को चुनौती दे रही हैं।

बटंग गांव में जनजागरुकता के नारों के साथ महिलाओं की आवाज पूरे गांव में गूंजती है। गांव में पहुंचते ही दो लोग करीब आए। परिचय पूछते हुए कई सवाल किए। इसके बाद मंच के पास चलने का इशारा किया। कबीर कुटी के बगल में बने मानस मंच पर सैकड़ों महिलाएं हाथों में लाठी-डंडा लेकर मार्च करने की तैयारी कर रही थी। साथ में कोटवार सुरेन्द्र सिंह चौहान नारे लगा रहा था। गांव के ज्यादातर अपने घर पर सोने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन महिलाएं महिलाएं मुस्तैदी के साथ शराब के खिलाफ मोर्चें पर डटी थी।

यूपी के बुंदेलखंड की गुलाबी गैंग की चर्चा आपने सुनी होगी। इसी तर्ज पर पाटन ब्लॉक के बटंग गांव में महिलाएं शराब बेचने और शराब पीकर गांव में हंगामा करने वालों का विरोध कर रही हैं। हालत यह है कि महिला जन चेतना मंच से जुड़ी इन महिलाओं का खौफ अब शराबियों और शराब माफिया पर छाने लगा है।

महिला चेतना मंच में गांव की लगभग ९० महिलाएं जुड़ी हैं। चूल्हा-चौका के काम निबटाने के बाद हर दिन महिलाएं शाम के समय गांव में लाठियां लेकर गश्त करती हैं। गश्त के दौरान शराबी मिल जाए तो पहले उसे समझाईश दी जाती है। इसके बाद भी न सुधरने पर उसे मानस मंच पर लाकर डंडे से पिटाई की जाती है। आर्थिक दंड भी दिया जाता है। इसके बाद भी शराब पीने वालों को पुलिस के हवाले कर दिया जाता है।

बटंग गांव रायपुर से लगभग ११ किलोमीटर दूर है। दुर्ग जिले के पाटन ब्लॉक का यह गांव अब शराबबंदी आंदोलन को लेकर चर्चित हो गया है।  शराब से उजड़ते परिवारों को बचाने के लिए दशहरा के बाद ५ अक्टूबर को महिलाओं ने महिला जन चेतना मंच बनाया। गांव की सरपंच चमेली ठाकुर ने समिति के गठन में महिलाओं को सहयोग दिया। महिलाओं ने संकल्प लिया कि वे शराब के खिलाफ अभियान शुरू करेंगी।

गश्ती दल में शामिल राम प्यारी नायक ने बताया कि गांव में शराब से कई परिवार तबाह हो रहे हैं। शराब के लिए अपने बीवी बच्चों का जीवन तक दांव पर लगा रहे हैं।  ऐसे माहौल में परिवार और गांव को बचाने के लिए महिला मंच का गठन किया गया। पिछले दो महीनों में गांव के शराबियों पर नकेल कसने के हर संभव प्रयास किए गए। हालत यह है कि अब इस सामाजिक बुराई पर काबू पाने में ८० प्रतिशत तक कामयाबी मिल चुकी है।  शीतला वैरागी ने बताया कि महिलाएं रोज रात के समय गांव में गश्त करती हैं। महिलाओं के सबसे बड़े दुश्मन हैं शराब और शराबी। पिछले कुछ महीनों में ही इस मंच ने कई लोगों को शराब की लत से मुक्त करा दिया है। सरस्वती वर्मा के अनुसार मंच के इस प्रयास में गांव के कई पुरूष भी उनकी ढाल बनकर इस लड़ाई में शामिल हो गए हैं।

महिलाओं की इस मोर्चेबंदी में सहयोग देने वाले दिलीप दास वैरागी बताते है कि शराब पीकर हंगामा करने वालों के  खिलाफ गांव की महिलाओं व बच्चों ने मोर्चा खोला है। देर रात गंाव में रतजगा कर रही महिलाओं में से एक सरस्वती नायक ने बताया  कि शराबी नशे में रोज घर आकर पत्नी व बच्चों से मारपीट करते थे। लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है। गांव की गलियों में गश्त कर रही महिलाओं और बच्चों का कहना है कि पहले लोग शराब पीकर हुड़दंग करते थे। हर दिन गाली-गलौच करते थे। इसका बुरा असर बच्चों व लड़कियों पर पड़ रहा था। तीज त्योहार के दौरान हंगामा होना आम बात थी। अब मंच की महिला सदस्यों कीेसक्रियता के कारण गांव में सभी लोगों ने मिलजुलकर शांतिपूर्वक दिवाली त्यौहार मनाया। महिला जन चेतना मंच की अध्यक्ष रमा नायक ने बताया कि शराबियों के कारण गांव का वातावरण खराब हो रहा था। गांव में शाम होते ही शराबियों का जमवाड़ा लगने से महिलाओं व लड़कियों का निकलना दूभर हो चुका था। कई बार शराबियों ने महिलाओं के साथ छेड़छाड़ भी की। अब इस बुराई से निजात मिलने लगी है।

मंच की पहल से छत्तीसगढ़ के कई गांवों में शराबबंदी आंदोलन को नई दिशा मिल सकती है। आदिवासी बहुल गांवो में शराब की लत से बीमार और बर्बाद होने वालों की बड़ी तादाद है। ऐसे गांवों में महिला चेतना मंच शराबखोरी जैसी सामाजिक बुराई को मिटाने की दिशा में बड़ा उदाहरण बन सकता है। शराब के खिलाफ इस मुहिम से महिलाओं के आत्मविश्वास और समाज में उनके रुतबे में भी इजाफा हो रहा है।

लेखक अमरेन्द्र कुमार आर्य कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में मीडिया स्टडीज संकाय के शोद्यार्थी हैं. इन्होंने यह खबर बटंग से लौट कर बनाई है. बटंग छतीसगढ़ का एक छोटा सा गांव है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: