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बकाया वेतन के लिये यूएनआई के पूर्व मीडियाकर्मियों की कानूनी लड़ाई तेज हुई, मदद की अपील

सरकार ने अखबारों एवं संवाद समितियों के कर्मचारियों एवं पत्रकारों के लिये मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने भी इन अनुशंसाओं को अक्षरश लागू करने का निर्देश दिया है लेकिन इसके बावजूद दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान टाइम्स, स्टेसमैन, यूएनआई जैसे मीडिया संगठनों ने सरकार एवं उच्चतम न्यायालय के आदेशों को धत्ता बताकर या तो मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू ही नहीं किया है या मनमाने तरीके से लागू किया है। यही नहीं जिन पत्रकारों ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन वृद्धि लागू किये जाने की मांग की उनके प्रबंधकों ने उनका तबादला करने और उन्हें नौकरी से निकालने के हथकंडे अपनाये।

सरकार ने अखबारों एवं संवाद समितियों के कर्मचारियों एवं पत्रकारों के लिये मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने भी इन अनुशंसाओं को अक्षरश लागू करने का निर्देश दिया है लेकिन इसके बावजूद दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान टाइम्स, स्टेसमैन, यूएनआई जैसे मीडिया संगठनों ने सरकार एवं उच्चतम न्यायालय के आदेशों को धत्ता बताकर या तो मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू ही नहीं किया है या मनमाने तरीके से लागू किया है। यही नहीं जिन पत्रकारों ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन वृद्धि लागू किये जाने की मांग की उनके प्रबंधकों ने उनका तबादला करने और उन्हें नौकरी से निकालने के हथकंडे अपनाये।

गौरतलब है कि यूएनआई में पिछले कई सालों से नियमित रूप से वेतन नहीं दिया जा रहा हे। वहां के जिन पत्रकारों एवं कर्मचारियों ने सही समय पर वेतन देने की मांग की उनका तबादला कर दिया गया अथवा उनका उत्पीड़न करके उन्हें नौकरी छोड़ने के लिये मजबूर किया गया। सबसे शर्मनाक यह है कि जिन पत्रकारों को नौकरी छोड़ने पर विवश किया गया या जिन पत्रकारों ने वेतन नहीं मिलने के कारण नौकरी छोड़ी उनका कई महीने का वेतन, पीएफ एवं मैचुयरिटी लाभ के पैसे अभी तक बाकी है, जबकि उन्हें नौकरी छोड़े हुये कई महीने और कई मामले में कई साल हो चुके हैं। यही नहीं यूएनआई प्रबंधन ने मनमाने तरीके से मनिसाना वेतन बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार अप्रैल, 2014 से नया वेतनमान लागू किया तथा कर्मचारियों को कोई भी एरियर देने से इंकार कर दिया, जबकि उच्चतम न्यायालय के फैसले तथा मनिसाना वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार 11/11/2011 से ही नया वेतनमान लागू करना था। दिलचस्प बात यह है कि यूएनआई प्रबंधन ने 11/11/2011 से लेकर अप्रैल, 2014 तक की वेतन वृद्धि को देने से भी इंकार कर दिया।

मैनेजमेंट के इस तानाशाही एवं मनमाने रवैये के खिलाफ यूएनआई के कुछ पूर्व पत्रकारों एवं कर्मचारियों ने दिल्ली सरकार के श्रम उपायुक्त के कार्यालय में अर्जी लगायी है, जहां मामले की सुनवाई हो रही है। यूएनआई का प्रबंधन का जो रूख है उससे साफ है प्रबंधन पत्रकारों एवं कर्मचारियों को उनका बकाया पैसा किसी भी कीमत पर देने को तैयार नहीं है और ऐसी स्थिति में एकजुट होकर लंबी लडाई लड़नी होगी।

श्रम उपायुक्त के कार्यालय में यूएनआई के पूर्व कर्मचारियों के अलावा दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान टाइम्स सहित कम से कम 16 मीडिया संगठनों के कर्मचारियों/पूर्व कर्मचारियों ने अर्जी लगायी है। दैनिक जागरण के कर्मचारियों ने धरना—प्रदर्शन भी किया। इस संबंध में आप सब से सहयोग की अपील है। यूएनआई अथवा अन्य मीडिया संगठनों के जो भी कर्मचारी और पत्रकार अपने हक के लिये इस कानूनी लड़ाई में साथ देना चाहते हैं, उनका स्वागत है। यूएनआई के जो कर्मचारी दिल्ली या दिल्ली से बाहर है और जो अपने हक को पाने के लिये कोई कदम उठाने के लिये सोच रहे हैं वे हमसे संपर्क कर सकते हैं — क्योंकि एकजुट होकर लड़ने से ही कोई परिणाम निकलेगा। वैसे तो पत्रकार दुनिया भर के लोगों के अधिकारों का ठेका लेने का दावा करते हैं, लेकिन जब अपने बिरादरी के लोगों के हितों और अधिकारों की बात आती है तो वे पीछे हट जाते हैं।

यूएनआई के पत्रकार रहे Vinod Viplav की रिपोर्ट. संपर्क: [email protected]

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