पीएमओ को लेटर लिखने पर ‘जनसंदेश टाइम्स’ पत्रकार विनायक राजहंस को पीएफ राशि देने को मजबूर हुआ

Vinayak Rajhans : पिछले करीब दो साल से अपने पीएफ की राशि को पाने के लिए मेरा संघर्ष रंग लाया. मेरे पूर्व नियोक्ता ‘जनसंदेश टाइम्स’ और पीएफ ऑफिस लखनऊ की उदासीनता के चलते इनके खूब चक्कर लगाने पड़े. मेरे पीएफ खाते में पैसे ही नहीं जमा किए गए थे जबकि वेतन से काटा गया था.

इस संबंध में मुझे अंतिम उम्मीद के तौर पर ‘प्रधानमंत्री कार्यालय’ को लिखना पड़ा. अंततः पीएमओ के हस्तक्षेप से मेरे दावे का निस्तारण हुआ. इस संघर्ष में लगातार मेरे साथ रहे मेरे तत्कालीन सहकर्मी Shyamal Tripathi और Shivani Sudirgh. बाकी लोग शायद संघर्ष या फिर पहल करने से डरते रहे.

रायबरेली निवासी पत्रकार विनायक राजहंस के एफबी वॉल से.

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जागरण कर्मचारियों से सीखो हक़ के लिए लड़ना

नई दिल्ली : मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य राज्यों में विभिन्न प्रिंट मीडिया समूहों में कार्यरत कर्मचारियों के बीच चर्चाओं का बाजार गर्म है। देश भर के मीडियाकर्मियों की नजर माननीय अदालत में होने वाली अगली सुनवाई पर है। लेकिन अत्याचारी अखबार मालिकानों से भिड़कर आंदोलन को इस मुकाम तक पहुँचाने वाले दैनिक जागरण के कर्मचारियों की हिम्मत की जितनी प्रशंसा की जाये, कम है।

जागरण की नोएडा, धर्मशाला, हिसार, जालंधर और लुधियाना यूनिट के आंदोलनकारी सिपाहियों ने यह तो दिखा दिया कि हक़-हुकूक के लिए संघर्ष कैसे किया जाता है। अखबार मालिकानों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि बरसों तक उनकी तानाशाही को बर्दाश्त करते रहे ये कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर सड़कों पर उतरकर संघर्ष करेंगे। चर्चा यह भी है कि दैनिक जागरण के नोएडा प्रबंधन में बैठे कुछ कथित महान लोग कर्मचारियों की बरसों की मेहनत से खड़ी की गई इस यूनिट को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। ऐसे में निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि इनकी धूर्तता की वजह से ही कर्मचारियों को संगठित होने का मौका मिला और वर्तमान में कर्मचारियों के आंदोलन को 4 महीने पूरे हो चुके हैं। अदालती कार्यवाही से लेकर एरियर की रिकवरी डालने का काम भी कर्मचारी पूरा कर चुके हैं।

जागरण एम्प्लाइज यूनियन के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रदीप कुमार सिंह कहते हैं कि जागरण कर्मचारी जिस जोश के साथ आंदोलन में उतरे थे वह अब कई गुना बढ़ चुका है और यह कहा जा सकता है कि कर्मचारी इतिहास लिखने जा रहे हैं। ऐसे में दिल्ली- एनसीआर के मीडिया संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों और इन संस्थानों के प्रबंधनों के बीच जागरण कर्मचारियों की हिम्मत के बारे में जमकर चर्चाएं हो रही हैं। अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ने के भगवान् कृष्ण के सिद्धान्त को आधार मानकर अपने हक़ की लड़ाई लड़ने वाले जागरण कर्मचारियों को सलाम।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है!

आकाशवाणी के दोहरे मापदंड एवं हठधर्मिता के चलते लंबे समय से काम रहे आकस्मिक उद्घोषकों का नियमितिकरण नहीं किया जा रहा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट भी संविधान पीठ भी दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश दे चुकी है। आकाशवाणी में आकस्मिक कलाकार/ कर्मचारी सन 1980 से अर्थात प्रसार भारती के लागू होने के वर्षों पहले से स्वीकृत एवं रिक्त पड़े पदों के स्थान पर आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर के रूप में काम कर रहे हैं।

विज्ञापन निकलने के बाद ही आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर नियुक्त किए जाते हैं, विज्ञापन में पात्रता की शर्तों के अनुसार आवेदन देने वाला किसी भी केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार एवं पब्लिक सेक्टर का कर्मचारी नहीं होना चाहिए।  आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति की प्रक्रिया भी स्थाई उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति के समान ही है। आकस्मिक उद्घोषकों / कम्पीयर की भी काम करने की अवधि 7 घंटे 20 के ही समान है।

वर्तमान में एक आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को 3 से 4 असाइनमेंट को पूर्ण करने में पूरा महीना काम करना पड़ता है। वेज़ेज़ एक्ट के हिसाब से व्यावहारिक एवं वास्तविक विधि द्वारा असाइनमेंट से कार्य दिवस की गणना का नया विधान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नई दिल्ली की सहमति से निर्धारित किया गया है, लेकिन इसका लाभ आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को नहीं दिया जा रहा है।

आकाशवाणी महानिदेशालय भारत सरकार नई दिल्ली ने आदेश संख्या – 102(14)/78-SVII , दिनांक 8 सितंबर 1978 के तहत कैज़ुअल कलाकारों/ कर्मचारियों के नियमितिकरण के लिए एक नियमितिकरण योजना/ स्कीम दिनांक 08/09/ 1978 को बनाई गई थी जिसमें आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट, आकस्मिक जनरल असिस्टेंट/ कॉपिस्ट, आकस्मिक संगीतकार के साथ आकस्मिक उद्घोषकों को भी नियमित किया गया है।

6 मार्च 1982 के पहले आकाशवाणी के सभी पद अनुबंध यानी कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित थे, वर्तमान में उद्घोषक/ कम्पीयर के सभी पद स्थाई पद हैं। इसी स्वीकृत एवं नियमित पदों की जगह आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर वर्षों से सेवाकार्य कर रहे हैं। O.A./563/1986 के मामले में ऑनरेवल CAT, प्रधान शाखा नई दिल्ली द्वारा पारित आदेश पर दूरदर्शन के सभी आकस्मिक कलाकारों का नियमितिकरण किया गया है और किया जा रहा है। O.A./563/1986 के मामले में 14 फरवरी 1992 को बनाई गई नियमितिकरण योजना को ही सादर दुहराने की बात ऑनरेवल CAT ने ही आकाशवाणी के आकस्मिक कलाकार सुरेश शर्मा एवं अन्य के मामले में O.A. 822/1991 में उल्लिखित की।

आकाशवाणी महानिदेशालय, नई दिल्ली ने दोहरे मापदंड के संग सिर्फ आवेदकों के संवर्गों के नियमितिकरण के लिए ही नियमितिकरण योजना बनाई और वर्ष में 72 असाइनमेंट्स पूरा करने वाले आकस्मिक कलाकारों, आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट एवं आकस्मिक जनरल असिस्टेंट को नियमित कर नियमितिकरण का लाभ दिया जा चुका है, इतना ही नहीं O.A. 601/2006 कंचन कपूर एवं अन्य के मामले में ऑनरेवल CAT द्वारा 6 जुलाई 1998 एवं पुनः 20 मार्च 2007 को पारित आदेश में वर्ष में 72 से भी कम दिन कार्य करने वाले आकस्मिक कलाकारों की सेवाओं का नियमितिकरण किया जा चुका है।

आकाशवाणी त्रिवेंद्रम के कैज़ुअल कम्पीयर पी. रामेन्द्र कुमार की सेवाओं का नियमितिकरण O.A. 743/ 2000 में पारित आदेश के अनुपालन में प्रोडक्शन असिस्टेंट/ ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव के पद पर किया जा चुका है। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा उमा देवी के मामले में 10 अप्रैल 2006 में पारित आदेश में दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश के बावजूद तथा समान रूप से समान सेवा शर्तों पर सेवारत हम आकस्मिक उद्घोषकों/ कम्पीयर का नियमितिकरण आज तक नहीं किया गया है।

आकस्मिक उद्घोषकों के अधिकार को हाशिये पर डाल दिया गया है। अवैध अंडरटेकिंग के सहारे आकाशवाणी पहले ही देश के अधिकांश आकस्मिक उद्घोषक और कम्पीयर से एफिडेविट पर हस्ताक्षर ले चुकी हैं और अब स्क्रीनिंग में उन्हें फेल करके हमेशा के लिए आकाशवाणी से बाहर करना शुरू भी कर दिया है, ये सब महज़ इसलिए कि अपना जायज़ अधिकार मांगने लायक भी कोई न रहे कोई न बचे।

पंद्रहवी लोक सभा में संसद की संयुक्त संसदीय समिति ने भी प्रसार भारती और आकाशवाणी को ये निर्देश दिया था कि आकस्मिक उद्घोषकों और कम्पीयर के साथ भेद भाव और शोषण को तत्काल ख़तम किया जाए। देश की दो सर्वोच्च संस्था एक माननीय सर्वोच्च न्यायालय और दूसरी हमारी संसद, हैरानी होती है जब इनका आदेश और निर्देश प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय नहीं मानती है और वही काम करती है, जो इनके मन में आता है और जब कभी प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय को ये याद दिलाया जाता है, कि आप माननीय सर्वोच्च न्यायालय और संसद के निर्देश को न मान कर उनकी अवमानना कर रहे हैं, तब ये अपना बदला आवाज़ उठाने वाले की ड्यूटी बंद करके निकालते हैं।

क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है जो इनके आदेश और निर्देश का अनुपालन नहीं करती ? अगर ऐसा है तो ये ग़लत है, इसके लिए प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय से मैंने सवाल किया था और परिणाम ये रहा कि मेरी बुकिंग (ड्यूटी) बंद कर दी गई है। सच बोलने पर सुना था इनाम मिलता है लेकिन मुझे तो सज़ा मिली है और पूछने पर आज तक मेरा क़ुसूर नहीं बताया गया है,अगर प्रसार भारती सही है और उसके दावे सच्चे हैं तो Honourable Supreme Court of India,  Central Administrative Tribunal  और संसद की संयुक्त समिति की रिपोर्ट प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय के ख़िलाफ़ क्यों है? आशा करता हूँ सच का साथ आप देंगे वरना संभव है आज सच बोलने की मुझे सज़ा मिली है कल आपका कोई अपना भी मेरी तरह फ़रियाद कर रहा होगा, आप ऐसा होने देंगे?

Ashok Anurag 
casual hindi announcer
AIR Delhi

जाने माने आकाशवाणी उदघोषक अशोक अनुराग का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं>

जहां सच्चाई दम तोड़ देती है उसे आकाशवाणी कहते हैं…

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नियमितीकरण के लिए आकाशवाणी के उद्घोषकों का जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन

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आह आकाशवाणी, वाह आकाशवाणी…

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बे-मन की बात : आकाशवाणी के कैजुअल एनाउंसरों पर लटक रही छंटनी की तलवार

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केंद्र सरकार ने केबल एक्ट 1995 में चुपचाप संशोधन कर चैनलों को नोटिस जारी कर दिया, हम सब कब जगेंगे!

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बकाया वेतन के लिये यूएनआई के पूर्व मीडियाकर्मियों की कानूनी लड़ाई तेज हुई, मदद की अपील

सरकार ने अखबारों एवं संवाद समितियों के कर्मचारियों एवं पत्रकारों के लिये मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने भी इन अनुशंसाओं को अक्षरश लागू करने का निर्देश दिया है लेकिन इसके बावजूद दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान टाइम्स, स्टेसमैन, यूएनआई जैसे मीडिया संगठनों ने सरकार एवं उच्चतम न्यायालय के आदेशों को धत्ता बताकर या तो मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू ही नहीं किया है या मनमाने तरीके से लागू किया है। यही नहीं जिन पत्रकारों ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन वृद्धि लागू किये जाने की मांग की उनके प्रबंधकों ने उनका तबादला करने और उन्हें नौकरी से निकालने के हथकंडे अपनाये।

गौरतलब है कि यूएनआई में पिछले कई सालों से नियमित रूप से वेतन नहीं दिया जा रहा हे। वहां के जिन पत्रकारों एवं कर्मचारियों ने सही समय पर वेतन देने की मांग की उनका तबादला कर दिया गया अथवा उनका उत्पीड़न करके उन्हें नौकरी छोड़ने के लिये मजबूर किया गया। सबसे शर्मनाक यह है कि जिन पत्रकारों को नौकरी छोड़ने पर विवश किया गया या जिन पत्रकारों ने वेतन नहीं मिलने के कारण नौकरी छोड़ी उनका कई महीने का वेतन, पीएफ एवं मैचुयरिटी लाभ के पैसे अभी तक बाकी है, जबकि उन्हें नौकरी छोड़े हुये कई महीने और कई मामले में कई साल हो चुके हैं। यही नहीं यूएनआई प्रबंधन ने मनमाने तरीके से मनिसाना वेतन बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार अप्रैल, 2014 से नया वेतनमान लागू किया तथा कर्मचारियों को कोई भी एरियर देने से इंकार कर दिया, जबकि उच्चतम न्यायालय के फैसले तथा मनिसाना वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार 11/11/2011 से ही नया वेतनमान लागू करना था। दिलचस्प बात यह है कि यूएनआई प्रबंधन ने 11/11/2011 से लेकर अप्रैल, 2014 तक की वेतन वृद्धि को देने से भी इंकार कर दिया।

मैनेजमेंट के इस तानाशाही एवं मनमाने रवैये के खिलाफ यूएनआई के कुछ पूर्व पत्रकारों एवं कर्मचारियों ने दिल्ली सरकार के श्रम उपायुक्त के कार्यालय में अर्जी लगायी है, जहां मामले की सुनवाई हो रही है। यूएनआई का प्रबंधन का जो रूख है उससे साफ है प्रबंधन पत्रकारों एवं कर्मचारियों को उनका बकाया पैसा किसी भी कीमत पर देने को तैयार नहीं है और ऐसी स्थिति में एकजुट होकर लंबी लडाई लड़नी होगी।

श्रम उपायुक्त के कार्यालय में यूएनआई के पूर्व कर्मचारियों के अलावा दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान टाइम्स सहित कम से कम 16 मीडिया संगठनों के कर्मचारियों/पूर्व कर्मचारियों ने अर्जी लगायी है। दैनिक जागरण के कर्मचारियों ने धरना—प्रदर्शन भी किया। इस संबंध में आप सब से सहयोग की अपील है। यूएनआई अथवा अन्य मीडिया संगठनों के जो भी कर्मचारी और पत्रकार अपने हक के लिये इस कानूनी लड़ाई में साथ देना चाहते हैं, उनका स्वागत है। यूएनआई के जो कर्मचारी दिल्ली या दिल्ली से बाहर है और जो अपने हक को पाने के लिये कोई कदम उठाने के लिये सोच रहे हैं वे हमसे संपर्क कर सकते हैं — क्योंकि एकजुट होकर लड़ने से ही कोई परिणाम निकलेगा। वैसे तो पत्रकार दुनिया भर के लोगों के अधिकारों का ठेका लेने का दावा करते हैं, लेकिन जब अपने बिरादरी के लोगों के हितों और अधिकारों की बात आती है तो वे पीछे हट जाते हैं।

यूएनआई के पत्रकार रहे Vinod Viplav की रिपोर्ट. संपर्क: vinodviplav@gmail.com

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एक मंच पर आए जागरण व सहारा के मीडियाकर्मी, मिलकर लड़ेंगे लड़ाई

नई दिल्ली/ नोएडा। प्रिंट मीडिया समूहों में कार्यरत कर्मचारियों के शोषण और अत्याचारी अखबार प्रबंधनों के खिलाफ अब कर्मचारी एकजुट होकर लड़ाई लड़ेंगे। इस क्रम में दैनिक जागरण कर्मचारी यूनियन ने आंदोलित सहारा समूह के मीडियाकर्मियों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ाई लड़ने का निश्चय किया है।

बृहस्पतिवार को नोएडा में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में दैनिक जागरण कर्मचारी यूनियन के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रदीप कुमार सिंह ने सहारा के मीडियाकर्मियों को विश्वास दिलाया कि अब दैनिक जागरण के कर्मचारी भी सहारा के कर्मचारियों की लड़ाई लड़ेंगे। दूसरी ओर सहारा के मीडियाकर्मियों ने भी जागरण कर्मचारियों के साथ पूरी ताकत से कर्मचारियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने की बात कही।

श्री प्रदीप कुमार सिंह ने कहा कि अख़बारों के मालिकान कर्मचारियों को कतई उनका हक़ नहीं देना चाहते। ऐसे में जरुरत इस बात की है कि कर्मचारी एक मंच पर आएं और मिलकर लड़ाई लडें और अख़बारों के मालिकानों को मुंहतोड़ जवाब दें। बैठक में उपस्थित अन्य कर्मचारियों ने भी अखबारों में कर्मचारियों के बढ़ रहे शोषण के खिलाफ आंदोलन की मशाल को जलाये रखने का आह्वान किया। गौरतलब है कि दैनिक जागरण के कर्मचारी डेढ़ महीने से मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की वाजिब मांग को लेकर दिल्ली, नोएडा, हिसार, धर्मशाला, लुधियाना और जालंधर में आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन अत्याचारी और तानाशाह जागरण प्रबंधन ने 350 से अधिक कर्मचारियों को अपना हक़ मांगने पर निलंबित कर दिया है।

इसी तरह सहारा मीडिया समूह के पत्रकार, गैर-पत्रकार 9 महीने से बिना वेतन के अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें मजीठिया मिलना तो दूर सहारा प्रबंधन उनका बकाया वेतन तक नहीं दे रहा है। सहारा के कर्मचारियों की कहानी दर्दनाक है। उनके बच्चों के स्कूल से नाम कट चुके हैं, भूख और बीमारी से सहारा के कुछ कर्मचारियों की मौत हो गयी लेकिन अत्याचारी सहारा का प्रबंधन कर्मचारियों को उनका हक़ देने को तैयार नहीं है। ऐसे में कर्मचारियों के पास आंदोलन को तेज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। माना जा रहा है कि जागरण और सहारा के कर्मचारियों के एक मंच पर आकर लड़ाई लड़ने से कर्मचारियों का शोषण बंद होगा और अत्याचारी प्रबंधन और उनके चमचों को झुकना पड़ेगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सहारा के कर्मचारियों ने मुंबई में गठित की यूनियन, नाम- ‘सहारा इंडिया कामगार संगठना’

हम सहारा इंडिया परिवार के पीड़ित कर्मचारी हैं जो मुंबई के गोरेगांव कार्यालय में कार्यरत हैं. सहारा के पीड़ित हम इसलिये हैं कि पिछले लंबे समय से हम आधी अधूरी तनख्वाह में निर्वहन कर रहे हैं और उसमें ६ महिनों का तनख्वाह बकाया है. सहारा इंडिया में पहली कर्मचारी यूनियन का गठन मुंबई में हो चुका है जिसका नाम सहारा इंडिया कामगार संगठना है. प्रबंधन के लाख दावों और झूठे आश्वासनों के बाद भूखे परिवार के दर्द ने हमें मजबूर कर दिया कि हम संगठन के तहत झूठ के पुलिंदों की खिलाफत करें. हमारे दर्द को दबाने के लिए मुंबई में प्रबंधन ने तथाकथित अधिकारियों की टीम खड़ी रखी है जो झूठे आश्वासन, धमकी देना और स्थानांतरण करने की बातें कहते हैं. लेकिन इस तानाशाही से पीड़ित करीब दो सौ लोगों का सब्र आखिरकार टूट गया और लोग गोरेंगाव पुलिस थाने में पहुंचे, चुंकि बातें तनख्वाह की थी इसलिए पुलिस ने हमारी शिकायत को श्रम आयुक्त के पास भेज दिया.

श्रम आयुक्त के कार्यालय के निर्देशों के अनुसार हमारी टीम ने काम शुरू किया और अपने ऊपर हो रहे अन्याय की आवाज़ को मुखर कर रहे हैं. सहारा इंडिया के प्रबंधन में तथाकथित वरिष्ठ श्रम कार्यालय में तलब किये गए थे जहां उन्होंने लोगों की बकाया तनख्वाह और हर महीने कम से कम अस्सी प्रतिशत तनख्वाह देने को कहा गया, लेकिन अफसोस पहली बार ही प्रबंधन फेल हो गया. अब अगली सुनवाई ७ सितंबर को है, जहां यह तथाकथित वरिष्ठों को जवाब देना है. इस दौरान हमारे संगठन को इन तथाकथित वरिष्ठों ने धमकी देना शुरू कर दिया है. जिसकी शिकायत हमने लाचार होकर गोरेगांव पुलिस थाने में किया है.

हमारे हालातों को भड़ास फॉर मीडिया बुलंद करता रहा है इसलिए धन्यवाद लेकिन मैं आपका ध्यान आकर्षित उन कर्मचारियों की तरफ करना चाहता हूं जिनकी तनख्वाह पंद्रह हजार के इर्द-गिर्द है और प्रबंधन उन्हें मात्र आधी तनख्वाह दे रहा है. आखिर सात हजार रूपये में और वह भी चार महीने में एक बार दिये जाने पर हम कैसे अपने परिवार का भरण पोषण करें यह सबसे बड़ा संकट था, जिसके लिए हमने अपने प्रबंधन से जुड़े सभी अधिकारियों को पत्र लिखा, बात की लेकिन मुंबई में बैठे झूठे तथाकथित वरिष्ठों ने हमें नौकरी छोड़ने की बात कही. हम उसके लिए भी तैयार थे लेकिन हमारी तनख्वाह, पीएफ, ग्रेच्युटी और आगे की सर्विस के बारे में कुछ बोलने से बचते रहे.

जब हम संख्याबद्ध होकर अपनी पीड़ा बताने गए तो उल्टा कारवाई करने की धमकियां मिलने लगीं. सहारा कामगार संगठन के अध्यक्ष के रूप में हम अब आरपार की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं. हम भूखों मर रहे हैं जबकि प्रबंधन के नाम पर एचआर हेड काशिनाथ झा को फोर्ड इको स्पोर्ट गाड़ी दी जा रही है, इससे गदगद झा कर्मचारियों को धमकी दे रहा है. इसी प्रकार सभी वरिष्ठ अय्याशी में लगे हैं कंपनी से यह  पेट्रोल, घर के बिजली बिल, फोन, मोबाईल बिल, खाने का खर्चा ले रहे हैं जो उनकी मोटी लाखों रूपए की तनख्वाह के अलावा है.. हमारी मांग है कि अब कर्मचारी तभी मानेगा जब मालिकों के परिवार का कोई हमारी बात सुने और उसपर कारवाई करे. हमने अपने पत्र में सचेत किया है कि सहारा इंडिया के मुखिया सुब्रत रॉय के छोटे बेटे सीमांतो रॉय विदेश भाग सकते हैं. जबकि हमारी वर्षों की मेहनत के बाद तनख्वाह से काटी गई पीएफ की रकम अब तक पीएफ अकाउंट में ही नहीं जमा की गई.

हमारे संगठन में सभी कर्मचारी दस वर्षों से ज्यादा समय से सहारा इंडिया के साथ जुड़े हैं. परिवार के नाम पर हमसे प्रबंधन छलावा कर रहा है जिसके तहत उसने कर्मचारी के हक पीएफ को डकार लिया और अब हमारी पूरी सर्विस को डकारने की फिराक में हैं. संगठन के सचिव वेदप्रकाश मिश्रा ने प्रबंधन को चेतावनी देते हुए कहा है कि प्रबंधन के द्वारा किसी भी कर्मचारी को दी जा रही धमकियों से यदि माहौल बिगड़ता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी. हमें पता है कि प्रबंधन साम दाम दंड भेद के तहत रोज़ी और रोटी की इस लड़ाई को कुचलने के लिए अपने दल्लों के बल पर पूरी कोशिश में लग गया है.

संपर्क सूत्र

विशाल मोरे
एम्प्लोई कोड नंबर – २११४७
मोबाईल नंबर – ८०९७३३०६५६

वेद प्रकाश मिश्रा
एम्प्लोई कोड नंबर – २०१०२
मोबाईल नंबर – ९९८७५५५१३१ 

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मजीठिया वेतनमानः अभी निर्णायक संघर्ष का समय, इसके बाद शुरू होगा मालिकों का नंगनाच

पत्रकारों के लिए अब निर्णायक समय आ गया है क्योंकि हर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार श्रम अधिकारियों की विशेष टीमें गठित कर दी हैं और ये टीम 31 जुलाई तक सक्रिय रहेंगी. 

हक के लिए हर पत्रकारों को अब सक्रिय होना होगा, नहीं तो ऐसे मौके बार-बार नहीं आते. मामला शांत होते ही मीडिया मालिक अत्याचार का नंगा नाच नाचेंगे, तब मीडिया में काम करना और दूभर हो जाएगा. इसलिए संपादक हो या चपरासी, सब के सब एकजुट होकर श्रम अधिकारी के सामने अपनी बात सबूत समेत रखें. 

खास बात यह है कि ब्यूरो आफिस के कर्मचारियों को और सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि श्रम विभाग वहीं जांच करेगा, जहां प्रींटिंग मशीन होगी और ब्यूरो आफिस को छोड़ देगा. इनकी जानकारी न तो हेड आफिस देगा, न ब्यूरो आफिस. इसलिए यहां के कर्मचारी स्वयं श्रम विभाग जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराए. अब सवाल यह उठता है कि हम श्रम विभाग गए और वहां पता चला कि मजीठिया वेतनमान के लिए कोई टीम नहीं बनी है तो. तो सहायक आयुक्त या अन्य अधिकारी के सामने लिखित शिकायत दें और पावती लें. बीच बीच में पता जरूर करें, नहीं मामला रफा दफा हो जाएगा.

संपादक का क्या होगा : चापलूसों के लिए बुरा समय आने वाला है. सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई में मुद्रक प्रकाशकों की गिरफ्तारी हो सकती है. वही मजीठिया आंदोलन को कुचलने में नाकाम रहने के आरोप में मालिक इन पर गुस्सा उतार सकते हैं. व्यापारी सिर्फ पैसे का भूखा होता है. इसलिए हर समाचार पत्र के कर्मचारी अपनी यूनियन बनाएं. बाहरी यूनियन पर निर्भर न रहें. तभी शोषण से मुक्ति मिलेगी. नहीं तो फिर ठेका श्रमिकों की नियुक्ति और शोषण होना तय है. 

लेखक एवं पत्रकार महेश्वरी प्रसाद मिश्र से संपर्क : maheshwari_mishra@yahoo.com

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मेरठ के ‘प्रभात’ अखबार के मीडियाकर्मी सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी से परेशान

मेरठ के सुभारती समूह द्वारा हिंदी दैनिक अखबार ‘प्रभात’ का प्रकाशन किया जाता है. आरोप है कि अखबार के सिटी इंचार्ज के रवैये से कई पत्रकार अखबार छोड़कर चले गए. इन दिनों छायाकार समीर सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी के रवैये से सकते में हैं. 31 मार्च को दैनिक प्रभात समाचार पत्र में सुबह के समय सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी कई पत्रकार एवं छायाकारों के साथ बैठक कर रहे थे. इस बीच छायाकार समीर की कार्यप्रणाली को लेकर सिटी इंचार्ज ने गलत शब्द बोले. सिटी इंचार्ज ने फोटोग्राफर समीर को सभी लोगों के सामने ही बैठक से बाहर निकाल दिया. इससे फोटोग्राफर के सम्मान को काफी ठेस पहुंची.

फोटोग्राफर अपने साथ हुए कृत्य को लेकर दो दिन तक मानसिक तनाव में रहा. स्वास्थ्य खराब होने के बाद परिजनों ने निजी अस्पताल में भर्ती कराया. इस छायाकार ने हमेशा कंपनी के नियमों एवं हित में रहकर कार्य किया. उधर, सिटी इंचार्ज के रवैये से परेशान होकर पत्रकार कपिल, प्रीति, प्रशांत गौड़, सुमेंद्र व संजू सिंह दैनिक प्रभात समाचार पत्र से त्याग पत्र देकर जा चुके हैं.  कुछ अन्य लोग त्याग पत्र देने की तैयारी में हैं. सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी पर कई किस्म के आरोप हैं. सिटी इंचार्ज ने क्राइम इंचार्ज जीवन कुमार को दो बार सस्पेंड किया. कंपनी में कार्यरत कर्मचारियों ने संपादक एके अस्थाना के समक्ष गुहार लगाई लेकिन संपादक सभी को सिटी इंचार्ज से जाकर मिलने को कह देते हैं, जिससे सभी लोग निराश हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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अब मीडिया की अदालत में अंशु : सुहाग लुटा फिर पूरी वसीयत, ‘मेरे मासूम की मदद करिए’ !

आगरा : ससुराल में पांव रखते ही किसी नवविवाहिता को पता चले कि उसके पति को तो कैंसर है….कुछ दिन बाद पति उसे हमेशा के लिए इस दुनिया में अकेला छोड़ जाए ! और उस पर लगातार वक्त कुछ ऐसी मार पड़ती जाए कि सुहाग लुट जाने से कुछ माह पूर्व वह संतान को जन्म दे, और फिर, उसे नवजात के साथ ससुराल से मायके खदेड़ दिया जाए !..उसके बच्चे के नाम बैंक में जमा सारे रुपये निकालने के साथ ही जालसाजी कर उसकी पूरी वसीयत उसके ही ननद-देवर एक कॉलेज के नाम पर हड़प लें तो ? और वह लाचार नवविवाहिता दस साल से न्याय की गुहार लगाते हुए हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंच जाए….!! 

यह झकझोर कर रख देने वाली दास्तान है आगरा (उ.प्र.) की अंशु वर्मा की, जिन्हें न समाज से न्याय मिल सका है, न मीडिया और कानून से। वह कैसे रो-रोकर असहनीय आपबीती सुनाती हैं, आइए, उन्हीं के शब्दों में जानते-पढ़ते हैं। भड़ास4मीडिया को प्रेषित दुखद आत्मकथ्य में अंशु वर्मा लिखती हैं –  

”..मेरे साथ जो हुआ, मैं आप (भड़ास4मीडिया) के माध्यम से वह सबको बताना चाहती हूं, और इसलिए बताना है ताकि हर इंसान का भारत के संविधान और सामाजिक न्याय-व्यवस्था में आस्था, विश्वास बना रहे। 

”मायके और ससुराली जनों की पूर्ण सहमति से मेरी शादी 4 फरवरी 2005 को आगरा निवासी प्रदीप वर्मा से हुई थी। शादी के एक महीने बाद पता लगा कि प्रदीप को कैंसर है और मैं प्रिगनेंट। अब अपनी दुनिया में आने वाले नये मेहमान की खुशी मनाती या पति की असाध्य बीमारी का गम! फिर भी उन दिनो में अपने ईश्वर के हाथों सब सौंपकर 8 नवंबर 2005 को अपनी संतानोत्पत्ति के बाद मैं खुश रहने लगी थी, लेकिन मेरे देवर प्रवीन वर्मा उर्फ रिंकू और ननद नीना वर्मा ने सुनियोजित तरीके से एक ऐसा षड्यंत्र किया, जिसका मुझे 12 फरवरी 2006 को पति की मृत्यु के बाद पता चला। अब तो मेरा सर्वस्व लुट चुका था।

” वह षड्यंत्र क्या था? ननद और देवर ने, जिनकी साझा साजिश में अन्य ननदें गीता, बीना, भारती आदि भी शामिल थीं, मरने से पूर्व मेरे पति से ऐसे कागजात पर हस्ताक्षर करा लिया गया था, जिसे अदालत में सुबूत के तौर पर पेश किया गया। उसमें उल्लेख था कि मृत्यु के बाद मेरे पति सारी संपत्ति ‘मायारानी गर्ल्स इंटर कॉलेज’ आगरा को दे दी जाए। उन्हीं कागजातों में यह भी दर्शाया गया था कि पति द्वारा मेरे पुत्र के नाम से बैंक में जमा लगभग दस लाख रुपये पर भी प्रवीन वर्मा आदि का हक होगा। सारी संपत्ति कालेज के नाम दान कर देने संबंधी उस कागजाती कूट रचना की तिथि 26 जून 2005 दर्शायी गयी थी। 

” मैंने बहुत खूबसूरत से बच्चे को जन्म दिया लेकिन मेरे ससुराली जनों ने ही उसकी किस्मत पर कालिख पोत दी। जब मेरा मासूम मात्र 36 दिन का था, मुझको घर से बाहर कर दिया गया। मैं अनाथ हो चली थी। इसके बाद भाई ने मुझे सहारा दिया और मेरे बेटे को प्यार। इसके बाद मैंने अपने बेटे की खातिर आगरा के कोर्ट नंबर 13 में एडीजे के.के. अस्थाना की चौखट पर न्याय की गुहार लगाई। यह मामला दस वर्ष चला। वर्ष 2012 में आगरा की कोर्ट नंबर-14 में मेरे पति की वसीयत ‘मायारानी गर्ल्स इंटर कॉलेज’ के नाम घोषित कर दी गई। साथ ही, न्यायालय ने बेटे को अपने साथ रखने का सुखद फैसला मेरे पक्ष में दिया। 

” ….लेकिन, अब तो मेरे और बच्चे के भविष्य में दूर तक अंधेरा छा चुका था। फिर भी मैं हिम्मत नहीं हारी। मायके में ही रहते हुए मैंने आगरा की अदालत के फैसले के विरुद्ध वर्ष 2013 में हाईकोर्ट इलाहाबाद में याचिका दायर कर दी, जो अभी विचाराधीन है। उन्हीं दिनों मैंने ठान ली कि अब मुझे एलएलबी कर खुद अपनी जंग लड़नी पड़ेगी। मैंने आगरा के डीआईजी से गुहार लगाई कि मेरे बेटे के नाम जमा जो रुपये मेरे देवर आदि ने कूटरचित कागजातों के आधार पर निकाल लिए हैं, वे मुझे दिलाए जाएं अथवा, जब तक हाईकोर्ट का पूरे मामले पर फैसला नहीं आ जाता, तब तक वह पूरी राशि उसके बेटे के नाम फिक्स करा दी जाए। 

” मेरे देवर ने पुलिस अधिकारियों के सामने स्वीकार किया वह ऐसा ही करेगा लेकिन आज तक स्थिति जस-की-तस है। जिस उम्र में मेरे बेटे को पढ़ाई-लिखाई में अपना भविष्य खोजना था, वह मेरे साथ थाना-कचहरियों के चक्कर काट रहा है। वह इस समय तीसरी क्लास में है। मैं पांच हजार की आय से कैसे उसका भविष्य संवारूं, कैसे उसे उसका हक दिलवाऊं, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। आखिर मेरे मासूम ने किसी का क्या बिगाड़ा है? समाज और कानून मेरी ईमानदारी और पतिव्रतित्व की आखिर कितनी बड़ी सजा देना चाहता है? मैंने जो लिखा है, सब सच है। मैं इसे प्रूफ कर सकती हूं। मेरे मासूम की मदद करिए।”

(पीड़िता अंशु वर्मा द्वारा प्रेषित पत्र पर आधारित)

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एक न्यूज चैनल जहां महिला पत्रकारों को प्रमोशन के लिए मालिक के साथ अकेले में ‘गोल्डन काफी’ पीनी पड़ती है!

चौथा स्तंभ आज खुद को अपने बल पर खड़ा रख पाने में नाक़ाम साबित हो रहा है…. आज ये स्तंभ अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिसक रहा है… खासकर छोटे न्यूज चैनलों ने जो दलाली, उगाही, धंधे को ही असली पत्रकारिता मानते हैं, गंध मचा रखा है. ये चैनल राजनेताओं का सहारा लेने पर, ख़बरों को ब्रांड घोषित कर उसके जरिये पत्रकारिता की खुले बाज़ार में नीलामी करने को रोजाना का काम मानते हैं… इन चैनलों में हर चीज का दाम तय है… किस खबर को कितना समय देना है… किस अंदाज और किस एंगल से ख़बर उठानी है… सब कुछ तय है… मैंने अपने एक साल के पत्रकारिता के अनुभव में जो देखा, जो सुना और जो सीखा वो किताबी बातों से कही ज्यादा अलग था…. दिक्कत होती थी अंतर आंकने में…. जो पढ़ा वो सही था या जो इन आँखों से देखा वो सही है…

कहते हैं किताबी जानकारी से बेहतर प्रायोगिक जानकारी होती है तो उसी सिद्धांत को सही मानते हुए मैंने भी उसी को सही माना जो मैंने अपनी आखों से देखा…  बहुत सुंदर लगती थी ये मीडिया नगरी बाहर से…. पर यहां केवल खबर नहीं बिकती… कुछ और भी बिकता है… यहाँ सिर्फ अंदाज़ नीलाम नहीं होते, यहां बिकता है स्वाभिमान… यहां क्रोमा के साथ और भी बहुत कुछ कट जाता है… यहां कटते हैं महिला पत्रकार के अरमान… यहां बलि चढ़ती है उसकी अस्मिता…. कामयाबी दूर होती है, लेकिन उसे पास लाने के यहां शॉर्टकट भी बहुत हैं… और उसे नाम दिया जाता है समझौता…

जब पहली बार एक नेशनल न्यूज़ चैनल के दफ्तर में कदम रखा तो सोचा था की अपनी काबलियत और हुनर के बलबूते बहुत आगे जाउंगी… आडिशन दिया… पीसीआर में खड़े लोगों ने अपनी आखों से ऐसे एक्सरे किया जैसे मेट्रो स्टेशन पर लगी एक्सरे मशीन आपके सामान का एक्सरे करती है… सिलेक्शन हुआ और शुरू हुआ मेरा भी करियर….. कुछ दिनों तक तो सब ठीक-ठाक चला, लेकिन अपनी काबिलियत के बलबूते शायद मैं कुछ लोगों की आँखों की किरकिरी बनने लगी…

जब एक नन्हा परिंदा खुले आसमान में उड़ने की कोशिश करता है तब उसी आसमान में उड़ती हुई चील उस पर झपट्टा मारकर उसे अपना शिकार बनाने की कोशिश करती है… कुछ वैसा ही मेरे साथ भी होने लगा… मैं परेशान होकर सबसे पूछती फिरती कि आखिर बात क्या है… लेकिन किसी से जवाब नहीं मिलता… हार कर सीधे चैनल के मालिक से मिलने पहुंच गई… सोचा था कि यहाँ से तो हल जरूर मिलेगा.. लेकिन दिलो-दिमाग़ को तब 440 वोल्ट का झटका लगा जब ये पता चला कि मालिक से मिलने के बाद उनके साथ अंतरंग में एक कप काफ़ी पीनी पड़ेगी जो मेरे काम भी करा देगी, साथ ही साथ प्रमोशन और सैलरी में अच्छी खासी बढ़ोतरी करा देगी… ऑफिस की कई लड़कियां वो काफ़ी पी चुकी हैं… तब समझ आया कि जिनको JOURNALISM का J नहीं आता वो कैसे इतनी ऊंची पोस्ट पर पहुंच गये… जाहिर है सारा कमाल उस गोल्डन काफ़ी का था…

अब दो आप्शन थे मेरे सामने… या तो नौकरी छोड़ दूं या उस काफ़ी का एक सिप ले लूं… लेकिन मैं बेचारी, अपने काबिलियत को एक कप काफ़ी की कीमत से नहीं तौल पाई… और नौकरी छोड़ दी मैंने…. अब दूसरे संस्थान में हूं… ये कैसा सच है, जिसे सब जानते हैं लेकिन सब झूठ मानकर अपनी नौकरी बचाने के लिए चुपचाप बस देखते हैं… आंखें बंद कर लेते हैं… बात होती भी है तो बड़ी गोपनीयता से अपने विश्वसनीय सहयोगी के साथ.. प्राइम टाइम में गला फाड़-फाड़ कर दुनिया भर को बात-बात पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले ये बातें करते समय शायद अपने चरित्र के बारे में भूल जाते हैं….  मैंने कहा था ना….. यहाँ सब बिकता है….. नैतिकता भी…..चरित्र भी….

एक युवा महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. महिला पत्रकार ने अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. उन्होंने जिस न्यूज चैनल के बारे में उपरोक्त बातें लिख कर भेजा है, वह चैनल कई वजहों से कुख्यात और विवादित रहा है. चैनल के बारे में कहा जाता है कि नाम बड़ा और दर्शन छोटे. चैनल हिंदुत्व के नाम पर चलाया जाता है और जमकर मीडियाकर्मियों का शोषण किया जाता है.

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द सी एक्सप्रेस : सेलरी मिलती नहीं, रिपोर्टरों और फोटोग्राफरों पर विज्ञापन लाने के लिए भारी दबाव

कभी आगरा में धमाकेदार लॉन्चिंग के कारण प्रसिद्ध हुआ हिन्दी डेली ‘द सी एक्सप्रेस’ कई महीनों से अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पा रहा है। पत्रकारों को पिछले चार माह से तनख्वाह नहीं मिली है। जो तनख्वाह की मांग करता है, उसका हिसाब करने की धमकी देते हुए इस्तीफा मांगा जाता है। जब इस्तीफा दे देता है, तो उससे कहा जाता है कि दस दिन में पूरा भुगतान हो जाएगा। वे दस दिन कभी नहीं आते हैं।

तनख्वाह न मिलने के कारण नौकरी छोड़कर गए एक दर्जन पत्रकारों और गैर पत्रकारों का अभी तक हिसाब नहीं हुआ है। वे चक्कर लगाकर और फोन करके थक चुके हैं। इनमें प्रमुख हैं सिद्धार्थ चतुर्वेदी, वीर प्रताप सिंह, अनूप चौधरी, सौरभ कुमार यादव, रवि भारद्वाज, ऋषभ कुमार जैन (पेजीनेटर इंचार्ज),  दीपक शर्मा, वीरेन्दर सिंह, कृष्णमुरारी सिंह, नवमेन्द्र प्रताप, सुनीता, कपिल खान, आदि।  इनमें से कुछ को तो 9-10 महीने हो चुके हैं। मैनेजमेंट वेतन नहीं दे रहा है। जो पत्रकार और गैर पत्रकार काम कर रहे हैं, उन्हें तीन महीने बाद चौथे महीने में तनख्वाह के चेक दिए गए। ये चेक बाउंस हो चुके हैं।

मैनेजमेंट द्वारा रिपोर्टरों और फोटोग्राफरों पर लगातार विज्ञापन का भारी दबाव बनाना जारी है। प्रत्येक रिपोर्टर और फोटोग्राफर को टारगेट दिए गए हैं। वह टारगेट पूरा नहीं करता है, तो उसकी क्लास लगाई जाती है। मीटिंग में बेइज्जत किया जाता है। मैनेजमेंट का मानना है कि फोटोग्राफर और रिपोर्टर फील्ड से पैसे कमाते हैं, इसी कारण बिना तनख्वाह के काम कर रहे हैं। मैनेजमेंट का तर्क है कि अगर पत्रकार फील्ड से पैसे नहीं कमा रहे हैं, तो बिना तनख्वाह के घर का खर्च कैसे चला रहे हैं और नौकरी क्यों कर रहे हैं। तनख्वाह न मिलने के कारण कर्मचारी बमुश्किल अपना घर चला रहे हैं। उनकी कोई सुनने वाला नहीं है। तनख्वाह के लिए कई बार काम ठप किया जा चुका है। इसका भी कोई असर नहीं है। वहीं विज्ञापन के लिए रिपोर्टर और फोटोग्राफर नेताओं के सामने लगातर याचना कर रहे हैं, पर अब आलम ये है कि नेताओं ने फोन तक उठाने बंद कर दिए हैं।

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कोटा के बाद दैनिक भास्कर भीलवाड़ा में भी बगावत, प्रबंधन पीछे हटा

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले कर्मियों को लगातार परेशान करने के कारण भास्कर ग्रुप में जगह-जगह विद्रोह शुरू हो गया है. अब तक प्रबंधन की मनमानी और शोषण चुपचाप सहने वाले कर्मियों ने आंखे दिखाना और प्रबंधन को औकात पर लाना शुरू कर दिया है. दैनिक भास्कर कोटा में कई कर्मियों को काम से रोके जाने के बाद लगभग चार दर्जन भास्कर कर्मियों ने एकजुटता दिखाते हुए हड़ताल कर दिया और आफिस से बाहर निकल गए.

बाएं से दाएं : आंदोलनकारी मीडियाकर्मियों के साथ बात करते भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह, अजमेर के वरिष्ठ पत्रकार रजनीश रोहिल्ला और जर्नलिस्ट एसोसिएशन आफ राजस्थान (जार) के जिलाध्यक्ष हरि बल्लभ मेघवाल.

यह सब कोटा में चल ही रहा था कि बगल के भीलवाड़ा एडिशन से खबर आई कि वहां भी प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट जाने के कारण दो लोगों को काम पर जाने से रोका तो दर्जनों मीडियाकर्मियों ने एकजुट होकर आफिस जाने से मना कर दिया. इससे प्रबंधन के हाथ पांव फूल गए. इन्हें अंदाजा नहीं था कि किसी एक को रोकने से दर्जनों लोग काम पर न जाने का ऐलान कर देंगे. ऐसे में कोटा एडिशन की बगावत से निपट रहे भास्कर प्रबंधन ने फौरन पांव पीछे खींचना ही बेहतर समझा और सभी को काम पर जाने की अनुमति दे दी. इस तरह भास्कर प्रबंधन की रणनीति भीलवाड़ा में फेल हो गई.

भीलवाड़ा एडिशन में बगावत की खबर सुनकर कोटा पहुंचे भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने भीलवाड़ा का रुख कर लिया और वहां पहुंचकर आंदोलित मीडियाकर्मियों के साथ बैठक की. उन्हें आगे की रणनीति और प्रबंधन से लड़ने-भिड़ने के तरीके समझाए. साथ ही स्थानीय लेबर आफिस में प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ शिकायत करने के लिए फार्मेट दिया. भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के साथ दैनिक भास्कर अजमेर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत रहे और सुप्रीम कोर्ट जाकर मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना हिस्सा भास्कर प्रबंधन से छीन लेने में सफल रहे पत्रकार रजनीश रोहिल्ला भी दैनिक भास्कर कोटा और भीलवाड़ा के कर्मियों से मिलते जुलते रहे और लड़ने पर ही हक मिलने की बात समझाते रहे. उन्होंने बताया कि मीडिया के मालिकान सिर्फ सुप्रीम कोर्ट से ही डरते हैं. वे लेबर आफिस से लेकर निचली अदालतों तक को मैनेज कर पाने में कामयाब हो चुके हैं. ये मालिकान डरा धमका कर किसी तरह सुप्रीम कोर्ट से केस वापस कराना चाहते हैं. जो इस वक्त डर गया, साइन कर गया, झुक गया, वह जीवन भर पछताएगा. यही वक्त है डटे रहने का. ये प्रबंधन आप का कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

इस बीच, भास्कर प्रबंधन की तरफ से तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं. भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने भास्कर कर्मियों से अपील की कि वे प्रबंधन की बातों पर भरोसा न करें क्योंकि प्रबंधन की अंतिम कोशिश यही होगी कि किसी तरह झूठ बोलकर, बरगला कर, अफवाह फैला कर, डरा कर, धमका कर सुप्रीम कोर्ट जाने वालों से फर्जी कागजातों पर साइन करा लें. साथ ही मीडियाकर्मियों की एकजुटता को खत्म कर दें. यशवंत ने कहा कि एकजुटता और संगठन ही वो ताकत है जो मालिकों को घुटनों पर बिठाने में सफल हो सकेगा.

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बगावत की आग दैनिक भास्कर तक पहुंची, कोटा में हड़ताल

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भास्कर प्रबंधन नीचता पर उतारू, आंदोलनकारी कर्मियों के खिलाफ थाने में झूठी शिकायत

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बगावत की आग दैनिक भास्कर तक पहुंची, कोटा में हड़ताल

मजीठिया वेज बोर्ड पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले मीडियाकर्मियों के प्रताड़ना का सिलसिला तेज हो गया है. दैनिक जागरण नोएडा के कर्मियों ने पिछले दिनों इसी तरह के प्रताड़ना के खिलाफ एकजुट होकर हड़ताल कर दिया था और मैनेजमेंट को झुकाने में सफलता हासिल की थी. ताजी खबर दैनिक भास्कर से है. यहां भी मीडियाकर्मियों को सुप्रीम कोर्ट जाने पर परेशान किया जाना जारी है. इसके जवाब में दैनिक भास्कर के कोटा के दर्जनों कर्मियों ने एकजुट होकर हड़ताल शुरू कर दिया है.

सूत्रों ने बताया कि भास्कर प्रबंधन ने कोटा संस्करण के कर्मियों को सुप्रीम कोर्ट जाने की बात पता चलने पर चार पांच लोगों को आफिस आने से रोक दिया. इसकी जानकारी मिलते ही हर विभाग के दर्जनों कर्मचारी भड़क गए और एकजुट होकर काम रोको हड़ताल शुरू कर दिया. आईटी, प्रोडक्शन, संपादकीय, मार्केटिंग, एकाउंट समेत सभी विभागों के करीब पचास-साठ कर्मियों ने आफिस का बायकाट कर नारेबाजी शुरू कर दी. हड़ताल की खबर भास्कर प्रबंधन के पास पहुंचते ही हाथ पांव फूल गए. हर विभाग के स्टेट हेड को कोटा की ओर रवाना किया गया. उधर, संपादक और मैनेजर ने अपने अपने खास चिंटूओं को बहला-फुसला कर काम पर लगा लिया और किसी तरह अखबार छापने में सफल रहे. कर्मचारियों ने श्रम विभाग में लिखित तौर पर काम से रोके जाने की शिकायत की है और इसकी एक कॉापी थाने को भी दी है.

इस बीच, कोटा में कर्मचारियों के शोषण-उत्पीड़न और कार्य बहिष्कार की जानकारी मिलते ही भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह दिल्ली से मेवाड़ एक्सप्रेस से कोटा के लिए रवाना हो गए. उन्होंने कर्मचारियों की टीम भावना और प्रबंधन से जूझने की क्षमता की सराहना की और पूरे भास्कर समूह के कर्मचारियों से अपील की कि वे किसी भी तरह के शोषण उत्पीड़न और अन्याय का न झेलें. जब तक गलत का विरोध नहीं किया जाएगा, तब तक मालिकों की मनमानी पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता.

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राजस्थान पत्रिका में मजीठिया वेज बोर्ड के साइड इफेक्ट : डीए सालाना कर दिया, सेलरी स्लिप देना बंद

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं

जब से मजीठिया वेज बोर्ड ने कर्मचारियों की तनख्‍वाह बढ़ाने का कहा व सुप्रीम कोर्ट ने उस पर मोहर लगा दी तब से मीडिया में कार्य रहे कर्मचा‍रियों की मुश्किलें बढ रही हैं. इसी कड़ी में राजस्‍थान पत्रिका की बात बताता हूं। पहले हर तीन माह में डीए के प्‍वाइंट जोड़ता था लेकिन लगभग दो तीन वर्षों से इसे सालाना कर दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए तनख्‍वा बढ़ी तो जहां 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी होनी थी तो मजीठिया लगने के बाद कर्मचारियों की तनख्‍वाह में मात्र 1000 रुपए का ही फर्क आया। किसी किसी के 200 से 300 रुपये की बढ़ोतरी।

इसके बाद बारी आई सालाना वेतन वृद्धि की जो इंक्रीमेंट के साथ डीए आदि मिलाकर देखा जाए तो कम से कम भी 1500 रुपये के लगभग बढती थी। राजस्‍थान पत्रिका में सालाना वेतन वृद्धि जनवरी एवं जुलाई में होती है। आज सालाना वेतन वृद्धि के बढ़ी हुई सैलेरी मिली लेकिन सैलेरी लेकर हंसी आ रही थी व दुख हो रहा था। अब डीए भी बंद व तनख्‍वाह बढी मात्र 200 रुपए यानि एक माह का सोलह रुपए 67 पैसा और एक दिन का हुआ लगभग 22 पैसा।

इतना वेतन एक साथ बढ़ने से मैं तो धन्‍य हो गया। अब तो मेरे बच्‍चे हमारे शहर की सर्वोच्‍च शिक्षण संस्‍था में पढ सकेंगे। मैं छुट्टियों के दौरान घूमने के लिए विदेश भी जा सकूंगा। अपने लिए एक गाड़ी व घर भी ले सकूंगा। आखिर लूं भी क्‍यों ना सकूंगा। आखिर एक साल में 200 रुपए की वेतन वृद्धि जो हुई है जो मैंने कभी सपने में नहीं सोचा था। खैर व्‍यंग्य को छोड़ दें।

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं ताकि दूसरे भाईयों का शायद कुछ भला हो जाए मेरा तो जो होगा देखा जाएगा बाकि पूरा परिवार साथ में होगा तो पीछे की चिंता भी नहीं रहेगी। एक बात और यदि सैलेरी के लिए पैसे कम हो तो कर्मचारियों से कह देना वो शायद चंदा इकठा करके आपके ऐशो आराम की जिंदगी जीन का प्रबंध कर ही देंगे इतने बुरे भी नहीं है कर्मचारी।

इसके अलावा राजस्‍थान पत्रिका ने सैलेरी स्लिप भी देना बंद कर दी। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसमें गुलाब कोठारी जी का संपादकीय छपता है। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसके संस्‍थापक कुलिश जी ने उधार रुपए लेकर अखबार की शुरुआत की। लेकिन कुलिश जी ने कभी कर्मचारियों का बोनस नहीं रोका अब तो सरकार से मिलने वाली सुविधाएं खुद तो ले रहे हैं लेकिन कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाएं रोकने का प्रयास किया जा रहा है। यह सत्‍य भी कि यदि कुलिश जी उधार के पैसे से अखबार चला सकते हैं कर्मचारी उधार रुपए लेकर क्‍या अपना जीवन निर्वाह नहीं कर सकते क्‍योंकि सबको पता है कि पत्रिका के कर्मचारी को दिया उधार वो चुकाएगा कैसे।

यहां एक बात का ओर उल्‍लेख करना चाहता हूं कि वितरण विभाग में जो टैक्सियों का पेमेंट होता है उसमें टेक्सियों का बिल तो ज्‍यादा बनता है लेकिन उनके चैक को पत्रिका के वितरण विभाग के कर्मचारी साथ जाकर कैश करवाते हैं व उसमें से लगभग दो रुपये प्रति किलोमीटर का पैसा गुलाब जी के घर पहुंचता है जो हर ब्रांच से कम से कम 10 लाख बनता है। ये है इनकी सच्‍चाई।

एक पत्रिका कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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संजय गुप्ता को रात भर नींद नहीं आई, जागरण कर्मियों में खुशी की लहर

बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ. इसे पहले ही हो जाना चाहिए था. डिपार्टमेंट का कोई भेद नहीं था. सब एक थे. सब मीडियाकर्मी थे. सब सड़क पर थे. सबकी एक मांग थी. मजीठिया वेज बोर्ड खुलकर मांगने और सुप्रीम कोर्ट जाने वाले जिन-जिन साथियों को दैनिक जागरण प्रबंधन ने परेशान किया, ट्रांसफर किया, धमकाया, इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाया, उन-उन साथियों के खिलाफ हुई दंडात्मक कार्रवाई तुरंत वापस लो और आगे ऐसा न करने का लिखित आश्वासन दो.

अखबार छपने का वक्त हो चुका था लेकिन दैनिक जागरण नोएडा के कर्मी सड़क पर थे. आफिस से बाहर. सारा कामकाज ठप था. पांच-दस चिंटू टाइप लोग काम पर लगे थे, जो खुद को स्वाभिमानी मनुष्य कम, दास प्रथा वाले समय का दास ज्यादा समझते हैं. करीब तीन-चार सौ कर्मियों के सड़क पर आ जाने से दैनिक जागरण नोएडा के मालिक संजय गुप्ता के आंखों की नींद चली गई. वे जहां थे, वहीं चौकन्ने हो गए. आफिस से हाटलाइन से जुड़ गए. मैनेजरों को तुरंत हड़ताल खत्म कराने के लिए कहने लगे. मैनेजर अंदर बाहर यानि कभी हड़ताली कर्मियों से बात करने आते तो कभी अंदर जाकर संजय गुप्ता को रिपोर्ट बताते. देखते ही देखते कई न्यूज पोर्टलों, न्यूज चैनलों और अखबारों के लोग इस हड़ताल को कवर करने पहुंच गए. यह नई परिघटना थी. अखबार के हड़ताली कर्मियों की खबर को भी कवर किया जाने लगा है. यह न्यू मीडिया का प्रताप है. यह बदलते दौर और बदलती तकनीक का कमाल है. भड़ास पर खबर फ्लैश होते ही देश भर के लोगों के फोन दैनिक जागरण नोएडा में काम करने वालों के मोबाइल पर घनघनाने लगे.

मैनेजरों की एक न चली. साले लालीपाप वापस कर दिए गए. मीडियाकर्मी अपनी मांग पर अड़े रहे. नोएडा के हड़ताल की आग हिसार यूनिट तक पहुंच गई. वहां भी मीडियाकर्मी काम ठप कर चुके थे. संजय गुप्ता के हाथ-पांव फूलने लगे. खुद को बहुत काबिल, विद्वान और बड़ा आदमी समझने वाला संजय गुप्ता इस रात लाचार था. दिल्ली चुनाव और नतीजों को लेकर अनुमान संबंधी खबरें छापी जानी थी. रविवार का एडिशन था. इस रोज बहुत ज्यादा अखबार बिकता है. अगर अखबार मार्केट में न आया तो जागरण की थूथू होने लगेगी, दूसरे अखबारों की चांदी हो जाएगी. ऐसे में किसी भी तरह हड़ताल को खत्म करना था. परम कंजूस और शोषक किस्म का आदमी संजय गुप्ता अंतत: समर्पण की मुद्रा में आ गया. दैनिक जागरण का मालिक संजय गुप्ता मीडियाकर्मियों की ताकत के आगे झुक गया. सभी तबादले और दंडात्मक कार्रवाई वापस करने की बात मान ली. आगे भी परेशान ना करने का वादा किया. मजीठिया वेज बोर्ड के लिए जो लोग सुप्रीम कोर्ट गए हैं, उनको भी नहीं छेड़ने का आश्वासन दिया. यह सब लिखित रूप में किया.

यह बात जब हड़ताली कर्मियों को बताई गई तो उन्होंने आपस में विचार विमर्श किया और इस वादे के साथ हड़ताल समाप्त करने का फैसला लिया कि अगर मालिकों ने फिर कभी किसी को परेशान किया तो ऐसे ही सभी साथी हड़ताल कर आफिस से बाहर आ जाएंगे. यह बहुत बड़ी परिघटना थी. बहुत दिनों बाद ऐसी एकजुटता दिखी. अगर यही एकजुटता शुरू से रही होती तो इन मालिकों की औकात न होती कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी न दें. देर आए दुरुस्त आए साथियों. यही भावना बनाए रखिए. मालिकों, मैनेजरों और संपादकों के लग्गू-भग्गू व चिंटू दस-पांच ही होते हैं और इनकी कोई औकात नहीं होती कि वे आप लोगों की एकजुटता में फूट डाल दें. ये हड़ताल बाकी मीडिया हाउसों के कर्मियों के लिए भी नजीर है. आप सब एक हो गए तो आप लोगों का खून पी पी कर मोटे बड़े हो गए इन मीडिया मालिकों को औकात में आना पड़ेगा. जिस तरह संजय गुप्ता को उनके मीडियाकर्मियों की हड़ताल के कारण रात भर नींद नहीं आई और अपने एकजुट व गुस्साए कर्मियों के आगे सरेंडर करना पड़ा, उसी तरह दूसरे मीडिया हाउसों के मालिकों के साथ भी यही होना है.

हड़ताल स्थल पर मोबाइल कैमरे के जरिए शूट किया गया वीडियो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=EA32dSYnbgY

हड़ताल स्थल से लौटे भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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संजय गुप्‍ता के लिखित आश्‍वासन पर काम पर लौटे हड़ताली जागरणकर्मी

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दैनिक जागरण, नोएडा के हड़ताल की आंच हिसार तक पहुंची

दैनिक जागरण, नोएडा में कर्मचारी सड़कों पर उतर गए हैं. प्रबंधन की दमनकारी और शोषणकारी नीतियों के खिलाफ कर्मचारियों का सालों से दबा गुस्‍सा अब छलक कर बाहर आ गया है. मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर एक संपादकीय कर्मचारी का तबादला किए जाने के बाद सारे विभागों के कर्मचारी एकजुट होकर हड़ताल पर चले गए हैं. मौके पर प्रबंधन के लोग भी पहुंच गए हैं, लेकिन कर्मचारी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं. प्रबंधन ने सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस बल को बुला लिया है, लेकिन प्रबंधन के शह पर सही गलत करने वाली नोएडा पुलिस की हिम्‍मत भी कर्मचारियों से उलझने की नहीं हो रही है. 

कई सौ कर्मचारी सड़कों पर उतर गए हैं. ये लोग मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं दिए जाने और कर्मचारियों को प्रताडि़त करने के लिए तमाम तरह के प्रयास किए जाने से नाराज थे. प्रबंधन के कुछ एक खास लोगों को छोड़कर सभी कर्मचारी हड़ताल में शामिल हो गए हैं. नोएडा की हड़ताल का असर हरियाणा की हिसार यूनिट तक भी पहुंच गया है. हिसार यूनिट के जागरण कर्मचारी भी प्रबंधन के खिलाफ हड़ताल पर उतर गए हैं. माना जा रहा है कि सूचना मिलने के साथ जागरण समूह के अन्‍य यूनिटों के कर्मचारी भी प्रबंधन की हरामखोरी के खिलाफ सड़कों पर उतर जाएंगे. 

हड़ताल की सूचना मिलते ही दैनिक जागरण के मालिक और संपादक संजय गुप्ता के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी हैं. वे हड़ताल की जानकारी मिलने के बाद सारे कार्यक्रम स्थगित कर किसी तरह हड़ताल तुड़वाने की कोशिशों में जुट गए हैं और कर्मचारियों में फूट डलवाने के लिए अपने चेले टाइप के मैनेजर नीतेंद्र को लगा दिया है. इस मैनेजर की सारी कोशिशें बेकार हो रही हैं. कर्मचारी प्रबंधन की कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं. उनकी मांग है कि मजीठिया मांगने वालों का तबादला रद्द करने के साथ सभी को वेज बोर्ड के हिसाब से सैलरी देने की लिखित घो‍षणा की जाए. साथ ही कर्मचारियों को हटाने या अन्‍यत्र भेजे जाने की कोशिश ना की जाए. 

कर्मचारियों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि उनकी मेहनत से प्रबंधन अरबों रूपए कमाता है और जब उनका हक देने की बारी आती है तो उन्‍हें तरह तरह से प्रताड़ित किया जाने लगता है. वैसे भी जागरण कर्मचारियों की सैलरी अन्‍य बड़े अखबारों की सैलरी से काफी कम है. संभावना जताई जा रही है कि कर्मचारी बिना अपनी मांगों के हड़ताल किसी भी कीमत पर खत्‍म नहीं करने वाले हैं. कई अन्य पत्रकार भी मौके पर मौजूद हैं. भड़ास के संपादक यशवंत सिंह समेत पत्रकार राजीव शर्मा, अभिषेक श्रीवास्तव, पंकज श्रीवास्तव, प्रशांत टंडन आदि हड़ताली जागरण कर्मियों के समर्थन में मौके पर डटे हुए हैं.

हड़ताल स्थल पर मोबाइल कैमरे के जरिए शूट किया गया वीडियो देखें: https://www.youtube.com/watch?v=EA32dSYnbgY

अंत में क्या हुआ, जानने के लिए इसे पढ़ें…

संजय गुप्ता को रात भर नींद नहीं आई, जागरण कर्मियों में खुशी की लहर

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मजीठिया वेज बोर्ड के लिए भड़ास की जंग : लीगल नोटिस भेजने के बाद अब याचिका दायर

Yashwant Singh : पिछले कुछ हफ्तों से सांस लेने की फुर्सत नहीं. वजह. प्रिंट मीडिया के कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से उनका हक दिलाने के लिए भड़ास की पहल पर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करने की प्रक्रिया में इनवाल्व होना. सैकड़ों साथियों ने गोपनीय और दर्जनों साथियों ने खुलकर मजीठिया वेज बोर्ड के लिए भड़ास के साथ सुप्रीम कोर्ट में जाने का फैसला लिया है. सभी ने छह छह हजार रुपये जमा किए हैं. 31 जनवरी को दर्जनों पत्रकार साथी दिल्ली आए और एडवोकेट उमेश शर्मा के बाराखंभा रोड स्थित न्यू दिल्ली हाउस के चेंबर में उपस्थित होकर अपनी अपनी याचिकाओं पर हस्ताक्षर करने के बाद लौट गए. इन साथियों के बीच आपस में परिचय हुआ और मजबूती से लड़ने का संकल्प लिया गया.

(भड़ास की पहल पर मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर शुरू हुई लड़ाई के तहत मीडिया हाउसों के मालिकों को लीगल नोटिस भेज दिया गया. दैनिक भास्कर के मालिकों को भेजे गए लीगल नोटिस का एक अंश यहां देख पढ़ सकते हैं)

ताजी सूचना ये है कि लीगल नोटिस संबंधित मीडिया संस्थानों को भेजे जाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की प्रक्रिया चल रही है. पांच और छह फरवरी को पूरे दिन यह प्रक्रिया चली और चलेगी. बचा-खुचा काम सात फरवरी को पूरा हो जाएगा जो कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में याचिका दायर करने का अंतिम दिन है. जितने भी साथियों ने खुलकर या गोपनीय रूप से लड़ने के लिए आवेदन किया है, उन सबके नाम पता संस्थान आदि को चेक करते हुए उनकी एक फाइल बनाकर अपडेट रखने का काम हम लोग करते रहे. कोई संस्थान नोटिस भेजने और याचिका में छूट न जाए इसलिए हर एक के अथारिटी लेटर व आवेदन को बार-बार चेक करते रहे. उधर, एडवोकेट उमेश शर्मा लीगल नोटिस बनाने, भेजने से लेकर याचिका तैयार करने में दिन रात जुटे रहे. अपने सहायक यशपाल के साथ एडवोकेट उमेश शर्मा ने दिन के अलावा रात-रात भर काम किया. परसों रात 11 बजे मैं खुद बाराखंभा रोड से लौटा क्योंकि गोपनीय रूप से लड़ने वाले लोगों की याचिका पर मुझे साइन करना था, साथ ही सभी याचिकाओं पर संबंधित संस्थानों के मालिकों के नाम-पते सही हों, यह चेक करना था.

इस तरह कड़ी मेहनत रंग लाने लगी है. नई खबर ये है कि कई पत्रकार साथियों ने अलग-अलग वकीलों के जरिए भी अपने अपने संस्थानों के खिलाफ खुलकर याचिकाएं दायर की हैं. जो याचिकाएं पहले से दायर हो चुकी हैं, उन पर आज सुनवाई है. जो याचिकाएं कल और आज में दायर हो रही हैं या दायर की जा चुकी हैं, उनकी लिस्टिंग आदि की प्रक्रिया होने के बाद पता चलेगा कि सुनवाई की तारीख कब है. यह संभावना जताई जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से मजीठिया वेज बोर्ड मामले से जुड़ी सारी याचिकाओं को एक साथ मिलाकर सुनवाई करने का फैसला लिया जाएगा ताकि सुनवाई में देरी न हो, सुप्रीम कोर्ट का भी टाइम बचे और मीडिया मालिकों को अलग-अलग झूठ बोलने गढ़ने का मौका न मिल सके. इस तरह सभी पीड़ितों के साथ न्याय होने की पूरी संभावना है.

आज यानि छह फरवरी को मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई केसों की सुनवाई है.. आज सुप्रीम कोर्ट में अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना के तीन और मामले सुनवाई के लिए आ रहे हैं. इन मामलों की सुनवाई माननीय न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्‍यायमूर्ति अरूण मिश्रा की खंडपीठ वाली अदालत संख्‍या 7 में होगी. केस नंबर 33, 34 और 38 ऑफ 2015 को सुनवाई का आइटम नंबर 10 है. सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर डिटेल इस प्रकार है…

COURT NO. 7
HON’BLE MR. JUSTICE RANJAN GOGOI
HON’BLE MR. JUSTICE ARUN MISHRA
PART A – MISCELLANEOUS MATTERS
10. CONMT.PET.(C) NO. 33/2015 IN
W.P.(C) NO. 246/2011
X FRESH-E
1ST LISTING
LAKSHMAN RAUT AND ORS
VS.
SHOBNA BHARTI AND ORS
(WITH OFFICE REPORT)
MR. AVIJIT
BHATTACHARJEE
WITH
CONMT.PET.(C) NO. 34/2015 IN
W.P.(C) NO. 246/2011
X FRESH-E
JAGJEET RANA
VS.
SANJAY GUPTA AND ANR
(OFFICE REPORT)
MR. DINESH KUMAR GARG
CONMT.PET.(C) NO. 38/2015 IN
W.P.(C) NO. 246/2011
X FRESH-E
RAJIV RANJAN SINHA & ANR.
VS.
CHAIRMAN D.B. CORP. LTD. & ANR.
(OFFICE REPORT)
DR. KAILASH CHAND

ज्ञात हो कि 6 फरवरी को हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स की मालकिन याोभना भरतिया के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने के मामले की सुनवाई है. भरतिया के खिलाफ कोर्ट नंबर 7 में आइटम नंबर 10 के तहत सुनवाई होगी. इसका केस नंबर 33 है. इसके शिकायतकर्ता लक्ष्‍मण राउत एवं अन्‍य हैं. हिमांशु शर्मा ने फेसबुक पर लिखा है: ”There are 6 fresh Contempt petitions filed in Supream Court of india. Three are against Daink Jagran with Diary No. 2515/15, 2795/15 and 3370/15. Two are against Dainik Bhaskar DN. 3633/15 and 3634/15 . And one against Patrika DN 2643/15. I hope many more to come in few days.”

कुल मिलाकर कहने का आशय ये है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अखबारों के मालिक बुरी तरह घिर गए हैं और इन्हें अब दाएं बाएं करके निकल लेने का मौका नहीं मिलने वाला. रही सही कसर भड़ास ने पूरी कर दी है. खासकर गोपनीय लोगों की लड़ाई को लड़ने का तरीका इजाद कर भड़ास ने मीडिया मालिकों को बुरी तरह बैकफुट पर ला दिया है. इस पूरे अभियान के लिए तारीफ के जो असली हकदार हैं वो हैं एडवोकेट उमेश शर्मा. इन्होंने यूं ही बातचीत के दौरान एक रोज एक झटके में यह फैसला ले लिया कि वह बेहद कम दाम पर देश भर के मीडियाकर्मियों के लिए मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ेंगे. उनके फैसला लेते ही भड़ास ने इस पहल को हर मीडियाकर्मी तक पहुंचाने का फैसला लिया और इस तरह हम सब आप मिल जुल कर अभियान में लग गए, जुट गए.  

(मीडियाकर्मियों को उनका हक दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा ने दिन-रात एक कर लीगल नोटिस भिजवाने के बाद अब याचिका दायर करा दिया है. उमेश शर्मा का कहना है कि उन्हें पीड़ित मीडिया कर्मियों को जीत दिलाने और मालिकों को हारत-झुकता देखने में खुशी होगी, ताकि एक मिसाल कायम हो सके कि जो न्याय के लिए लड़ेगा, वह जीतेगा और बेइमानी करने वाले अंततः हारेंगे.)

एक बात और कहना चाहूंगा. वो ये कि जिन लोगों ने अभी तक खुलकर या गोपनीय रूप से लड़ने के लिए आवेदन नहीं किया है, उन्हें भी साथ जोड़ने की योजना बनाई जा रही है. एडवोकेट उमेश शर्मा जी ने आश्वासन दिया है कि जो साथी बच गए हैं या सोचते ही रह गए हैं, उनके लिए भी रास्ता निकाला जाएगा. इस बारे में सूचना जल्द दी जाएगी. इसलिए जो साथी जुड़ चुके हैं, वो तो प्रसन्न रहें ही, जो नहीं जुड़ पाए हैं, वो निराश न हों, उनके लिए एक नया फारमेट तैयार किया जा रहा है, जिसकी सूचना जल्द भड़ास के माध्यम से दी जाएगी.

आखिर में… मजीठिया के लिए भड़ास की लड़ाई पर एक साथी ने भड़ास के पास अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए जो मेल भेजा है, उसे नीचे दिया जा रहा है. इस उदगार में नोटिस मिलने वाला है, का जो जिक्र किया गया है, उसको लेकर यह बता दूं कि इन दोनों अखबारों के मालिकों समेत ज्यादातर मीडिया मालिकों को लीगल नोटिस जा चुका है और याचिका दायर लगभग की जा चुकी है… पढ़िए, भड़ास के साथ मजीठिया के लिए लड़ रहे एक साथी के उदगार…


” हल्ला बोल : जयपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, बारां, बूंदी, झालावाड़ के पत्रकार हुए एकजुट… अब क्या बतायें. जिंदगी में कभी नहीं सोचा था कि राजस्थान के इन खबरदारों के अंदर कभी खुद के लिये भी कोई इंकलाब आएगा। लेकिन जो खो गया था या मर गया था, वो जिंदा हो गया है। देर से ही सही, दोनों अखबारों के पत्रकारों ने अबकी बार हल्ला बोल मचा दिया है। जयपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, बारां, बूंदी, झालावाड़ से सूचना है कि राजस्थान पत्रिका व दैनिक भास्कर के पत्रकार भाईयों ने प्रबंधन के खिलाफ एकजुट होकर मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू करने की एकजुट मांग को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में गुहार लगा दी है। जल्द ही मालिकों को नोटिस पर नोटिस मिलने वाले है। इस गुहार के बाद प्रबंधन का प्रकोप अब किस रूप मे और कैसे निकलता है, ये देखना होगा। इसके इंतजार में वे तमाम पत्रकार कैसे हल्ला बोल करते हैं, ये उनके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेवारी है क्योंकि अब सबसे बड़ा सवाल उनकी एकजुटता तोड़ने के लिये किया जायेगा। पत्रकारों का बढा हुआ कदम अब आगे और कितना पुख्ता होगा यह सब भविष्य की मुट्ठी में कैद है।

जो हाथों में कलम और कंधो पे आँखे रखते है
राजनीति कि भट्टी में जो गर्म सलाखें रखते है
ऐसे देश के वीरों को में शत शत शीश झुकाता हूँ
आंसू भी लिखना चाहूँ तो अंगारे लिख जाता हूँ

अखबारों के दफ्तरों की ऊँची अट्टालिकाओं पे तुमने ये जो इंकलाब की झंडियां लगाई है, ये बड़े हिम्मत की कोशिश है, इन कोशिशों को बनाये रखना। उपर वाला करे, इन्साफ तुम्हारे हक में हो…। यशवंत सिंह, आपके नाम का इस्तमाल करने की गुस्ताखी कर रहा हूं… माफ़ करना बड़े भाई… लेकिन आज आपकी वजह से हमें हिम्मत है…. अब हम आपके नाम को जिंदा रखेंगे…. अखबार के मालिकों, अब करो मुकाबला… अब यहां का हर पत्रकार यशवंत सिंह है… ”


भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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चैनल वन से बकाया सेलरी के लिए लड़ रहे एक मीडियाकर्मी का खुला पत्र

संपादक, भड़ास4मीडिया, सादर प्रणाम, मैं भड़ास4 मीडिया का एक नियमित पाठक हूं. आप लोगों ने ना जाने कितनी बार हम पत्रकार लोगों के साथ जो अन्याय कभी हुआ है उसके खिलाफ कदम से कदम मिला कर साथ दिया है, उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहूंगा. मैं आपको अपने साथ जो अन्याय हुआ है उसके बारे में अवगत कराना चाहूंगा. आशा करता हूं कि आप इसे प्रमुखता से छापकर मेरे जैसे ना जाने कितने लोगों को फर्जी स्टिंग, ब्लैकमेलिंग और कर्मचारियों का शोषण करने वाले इस बदनाम प्रवृति के न्यूज चैनल ‘चैनल वन’ से सावधान कर उनका सही दिशा में मार्ग दर्शन कर सकते हैं. 

महोदय

जिस चैनल की तुच्छ मानसिकता और घटियापन के बारे में जिक्र करने वाला हूं वो आपके लिए नया नहीं है उसकी बदनाम कार्यशैली और बलैकमेलिंग के किस्सों की सच्ची दास्तान अक्सर सुनने को मिल जाया करते हैं. मामला जून 2013 का है, जब मैने लोगों से नौकरी के नाम पर बंधुआ मजदूर की तरह काम कराकर, खून चूसने वाले नौएडा के एफ 42 सेक्टर 6 स्थित न्यूज चैनल वन के पीसीआर में कार्यरत अपने एक मित्र के कहने पर पैनल प्रोड्यूसर के पद पर ज्वाईन किया था।

ये चैनल अक्सर कर्मचारियों को जिस सैलरी पर नियुक्त करता है बाद में उससे कम सैलरी देने और आयाराम गयाराम के लिए मशहूर था, लेकिन मित्र ने बताया कि कुछ प्रोफेशन लोगों की टीम सहारा समय से आई है सब कुछ लिखित में होगा, लेकिन बदकिस्मती के ज्वाईनिगं के चार दिन बाद ही उस प्रोफेशनल टीम ने भी काम करने की आजादी ना होने और जहीर अहमद एंड कम्पनी के चापलूसों की वजह से इस घटिया चैनल को अलविदा कह दिया इसके बाद तो अस्थिरता का माहौल लगातार बना रहा और नए-नए तुगलगी फरमान जहीर अहमद एंड चमचा कंपनी की तरफ से कर्मचारियों पर थौपे जाने लगे, कभी 10 घंटे की शिफ्ट बना दी तो कभी पंचिंग मशीन की आड़ में कर्मचारियों का शोषण किया जाने लगा फिर अचानक कुछ नौसिखए पत्रकारों की चैनल में आई नई नवेली टीम को चैनल के मालिक ने कुछ नया करके दिखाने को कहा तो बेचारों ने प्रेशर के चलते उत्तराखंड के गृह सचिव जेपी जोशी का फर्जी स्टिंग ही प्रसारित कर दिया और जिसके बाद बड़ी कमाई के चक्कर में ब्लेकमेल करने लगा मामला ऐसा उल्टा पड़ की उत्तराखंड का रिपोर्टर तो जेल गया है साथ में काफी दिनों तक जहीर अहमद अपने दोनो बेटों एंड चमचा कंपनी के साथ चैनल से ही फरार हो गऐ और आज तक कोर्ट कचहरियों के चक्कर काट रहे है.

दूसरा मामला, देश के एक दूसरे प्रतिष्ठित प्रोफेशनल न्यूज चैनल न्यूज एक्सप्रेस का है जिसने चैनल वन की आड़ में स्ट्रिंगरों से जो अवैध उगाही करने के लिए कैसे जाल बिछाया जाता है, जहीर अहमद के अंगूठा टेक मानसिकता का स्टिंग करके दुनिया को इनका असली चेहरा दिखाया. साथ ही चैनल वन जो कि पत्रकारिता के पेशे को बदनाम कर रहा था, उसको बेनकाब किया. इसके लिए मैं न्यूज एक्सप्रेस को बधाई देना चाहूंगा.

खैर बात मेरे साथ हुए अन्याय की हो रही थी. चैनल वन ने दिसंबर 2013 तक तो मेरा ही नहीं लगभग सभी कर्मचारी, चमचे एंड कंपनी को छोडकर, तरह-तरह से शोषण किया. शायद ही कभी ऐसा हुआ कि पूरी सैलरी मिली हो. कभी पंचिंग मशीन की खराबी का शिकार होना पड़ा तो कभी चैनल के ऐसे चापलूसों का जिनका काम केवल मुफ्त की सैलरी लेकर कर्मचारियों की गलत चुगली करना था, लेकिन जब जनवरी 2014 में लोगों की सैलरी आई तो चैनल में अफरा तफरी मच गई. वजह, अपनी आदत के मुताबिक जहीर अहमद ने चापलूसों की सलाह पर हर किसी कर्मचारी की मनमाने ढंग से सैलरी कम कर दी गई. नतीजन बहुत ही कम लोगों ने समर्पण किया और ज्यादातर कर्मचारियों ने अपनी खुद्दारी को प्राथमिकता देते हुए नौकरी छोड़ दी. इनमें से मैं भी एक था लेकिन पीसीआर से सभी कर्मचारियों के एक साथ नौकरी छौड़ने से मालिक को बैकफुट पर आना पड़ा और केवल पीसीआर कर्मचारियों को पूरी सैलरी देने का आश्वासन देकर अगले दिन वापस बुला लिया गया, जिसमें से कुछ लोगों को 10-15 दिन तंग करने के बाद पूरी सैलरी मिलने लगी.

कुछ कर्मचारियों को चैनल की आर्थिक स्थिति की दुहाई देकर वित्तीय वर्ष समाप्त होने पर कटौती की गई सैलरी को देने का वादा किया गया. बेचारे कर्मचारी करते भी तो क्या. अचानक नौकरी का संकट जो खड़ा हो गया था जिनमें से मै भी एक था। खैर वित्तीय वर्ष भी समाप्त हो गए लेकिन आश्वासन के सिवा मुझे कुछ नहीं मिला. एक दिन चैनल के चापलूसों में से एक ज्योति खुराना जो कि चैनल का प्रशासनिक कार्य संभालती थी, से सैलरी को लेकर मेरा बहस करना उसके ईर्द गिर्द घूमने वाले दूसरे चमचों को बुरा लगा. 5 जून को दुबारा वेतन मांगने पर पूरी प्लानिंग के साथ ज्वानिंग के समय दिये गए फोटो लगाकर मेरे खिलाफ कुछ फर्जी कागजात तैयार करा रखे गए थे. ये ज्योति खुराना ने तैयार किये थे. ऐसे तरीके से कितने ही लोगों को फर्जी फंसाने की धमकी देकर सैलरी हड़प कर जाते हैं ये भेड़िये. साथ ही चैनल की फर्जी आईडी इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर मुझे आफिस के गेस्ट रुम में चैनल को लूट कर खाने वाले असली चोर पंकज, शम्मी ने पूरी प्लानिंग के साथ मेरे कुछ रिशतेदार जिनसे प्रापर्टी बंटवारे का झगड़ा था, जोकि लगातार जहीर अहमद के पीएसओ शब्बीर अहमद के संपर्क में थे, चैनल में बुलाकर पहले ही लिखी गई पटकथा के आधार पर मेरे साथ मारपीट की गई, जिसकी वीडियों फुटेज सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थी. इसे बाद में पुलिस में शिकायत होने पर डिलीट कर दिया गया.

अनहोनी की आशंका के चलते मुझे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा. बाद में पुलिस में शिकायत की लेकिन मामला चैनल के मालिकों से जुड़ा होने की वजह से कुछ हासिल नहीं हुआ. फिर अपनी मेहनत की कमाई जब मांगी तो फंसाने की फोन पर धमकी मिलने लगी. हारकर 7 जुलाई 2014 को कोर्ट का नोटिस भेजा जिसके जवाब की समय सीमा 15 दिन थी लेकिन मुझे मानसिक तौर पर परेशान करने के लिए एसपी सिटी नौएडा जोकि चैनल वन न्यूज के बराबर अथार्टी में बैठते हैं, वहा मेरे खिलाफ शिकायत की लेकिन जब मैंने डीआईजी मेरठ मंडल को सारे सबूते के साथ अवगत कराया तो सीओ प्रथम नौएडा ने जांच की और मेरे बयान दर्ज किए. साथ ही मेरे द्वारा की गई शिकायतों को सही तो पाया लेकिन चैनल के चमचों के खिलाफ नोटिस जारी होने के बाबजूद क्या कार्रवाई हुई, आज तक नहीं पता चला.

सब जगह से निराशा हाथ लगने के बाद 11 नवम्बर 2014 को सेक्टर 2 स्थित लेबर कोर्ट में शिकायत करने के बाद भी अपनी मेहनत की कमाई के लिए चक्कर काट रहा हूं. लेकिन बेशर्मी की हद तो देखो कि लेबर इंस्पेक्टर से भी आज साफ कह दिया की हम सैलरी नहीं देंगे. लेकिन मैं आपके माध्यम से समाचार चैनल के नाम पर कलंक इस न्यूज चैनल वन के मालिकों को सबक सिखा कर रहूंगा चाहे कुछ भी करना पड़े. सारे शिकायती पत्र आपको भेज रहा हूं. कृपा करके मेरी इस खबर को प्राथमिकता के आधार पर प्रकाशित करें ताकि मुझे मीडिया की आड़ में चैनल वन मालिक जैसे राक्षसों से लड़ने में कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़े. आशा करता हूं कि जिन सक्षम लोगों से मैने न्याय की उम्मीद लगाई थी उनसे आप सवाल पूछें कि क्या वो भी जहीर अहमद एंड चमचा कंपनी के पाप के उतने ही भागीदार हैं. साथ ही मेरा मार्गदर्शन भी करें कि इनके मुंह से अपनी मेहनत की कमाई कैसे निकाल सकूं. सदा आपका आभारी रहूंगा।

धन्यावाद

अकरम खान

Akram khan Khan

पुत्र
इस्लाम अहमद खांन
निवासी 24/225 देवी पुरा प्रथम
बुलंदशहर
09871954581, 09634766114

media.akram786@gmail.com

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संदर्भ- आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर की सरकारी घेराबंदी : …नहीं तो शेर खा जाएगा!

बचपन में एक कहानी सुनी थी। हांलाकि कहानी तो कहानी ही यानि मनघड़ंत होती है…मगर उससे कुछ सीख मिल जाए तो क्या बुराई है! कहानी कुछ यूं थी कि एक जंगल में चार भैंसे रहते थे। आपस में बेहद प्यार और मिलजुल कर रहते थे। वहीं एक शेर भी रहता था। जिसका मन उनका शिकार करने को हमेशा बना रहता था। लेकिन उनकी एकता के आगे उसकी कभी न चली। जब भी शेर हमला करता चारों मिलकर उसको खदड़े देते। तभी एक लोमड़ी से शेर की वार्तालाप हुई। लोमड़ी को भी शेर के शिकार में अपने पेट भरने के आसार नज़र आए और उसने शेर से कुछ वादा किया।

लोमड़ी ने एक भैसे से जाकर कुछ देर बात की और उसको समझाया कि तुम इस झुंड के सबसे सीधे सादे सदस्य हो और तुम्हारे हिस्से की घास दूसरे भैंसे चट कर जाते हैं। ये लोग तुम्हारे दोस्त ज़रूर हैं…. मगर हैं मतलबी। लोमड़ी ने एक एक करके चारों भैसों के पास जाकर यही बात उनसे कही।

कुछ ही दिनों बाद चारों भैसों में मनमुटाव हो गया… सभी एक दूसरे से खिचें खिचें और दूर रहने लगे। सब की कोशिश यही रहती थी कि अपना पेट भरें और दूसरे से पहले घास चर लें।

इस दौरान एक दिन शेर ने एक भैंसे पर हमला किया तो बाक़ी तीन तमाशा देखते रहे। नतीजा वही हुआ जिसको शेर का इंतज़ार था। कुछ ही दिनों में बड़े ही आराम से एक एक एक करके चारों का शेर ने शिकार कर लिया।

कहानी याद आने की वजह…. फेसबुक पर उत्तर प्रदेश के एक जुझारु और कप्शन के खिलाफ लड़ने वाले आईपीएस की वॉल पर उनका लेख है…. जिसमें उन्होने अपने ऊपर लगे रेप के झूठे इल्ज़ाम का जिक्र करते हुए शिकायत की है… कि करप्ट सिस्टम के खिलाफ बोलने वालों को झूठे मामलों में फंसाया जाता है। साथ ही इस मामले अपनी पत्नी तक को झूठे आरोपों में फंसाए जाने पर बेहद चिंता ज़ाहिर की है। 

हमारी तमाम हमदर्दी और सहयोग उनके साथ है। ये भी हम जानते हैं कि वो ईमानदार और करप्शन के खिलाफ लड़ने वाले इंसान हैं। इस मौके पर मैं निजी तौर पर उनके साथ हूं और सभी से अपील करता हूं…. कि इस लड़ाई में सड़क पर उतर कर उनका भरपूर साथ दिया जाए। नहीं तो जंगल का करप्ट सिस्टम रूपी शेर….. हमारे ही बीच मौजूद लोमड़ियों की मदद से सभी को एक एक करके खा जाएगा।

साथ ही आज मैं अपने साथियों की कोई शिकायत भी नहीं करूंगा। क्योंकि इसी करप्ट सिस्टम के खिलाफ आवाज़ उठाने की सज़ा मुझको 3 मई 2011 को कई एफआईआर और पुलिस उत्पीड़न के तौर पर सहनी पड़ी थी। और हमारे कई साथी ख़ामोश रहे थे। मेरे खिलाफ झूठे मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस बेनक़ाब हो चुकी है…और हाईकोर्ट के दखल के बाद मामला आज भी कोर्ट में लंबित है। लेकिन मेरे कई साथियों को उस वक्त मेरी बर्बादी का इंतज़ार था। हांलाकि उस वक्त भी भाई यशवंत और भड़ास जैसे कई जाबांज़ पत्रकार साथी पहाड़ की तरह मेरे साथ खड़े थे और आज भी वही लोग ऐसे किसी भी मुक़ाबले को हमेशा तैयार नज़र आते हैं। 

आज ज़ररूत इस बात की है कि अगर एक परिवार झूठे मामलों में फंसाया गया है तो उसका साथ दिया जाए। इस मामले में आप लोगों की तरफ से मेरे लिए कोई भी आदेश या मुझसे संपर्क करने के लिए मेरे नंबर 9718361007 पर या azad11khalid@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं सहारा समय, इंडिया टीवी समेत कई न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। साथ ही बतौर आरटीआई एक्टिविस्ट और समाजिक कार्यकर्ता सामाजिक मुद्दों को लिए संघर्ष करते हैं।


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यूपी में महिला आयोग और मंत्री की सांठगांठ से आईपीएस अमिताभ ठाकुर पर एक और बलात्कार का आरोप!

 

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रेप-उत्पीड़न की शिकार मेडिकल छात्रा का केस सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा लड़ेंगे, पीड़िता ने जारी की रेपिस्ट की तस्वीरें

(पीड़ित मेडिकल छात्रा द्वारा न्याय के लिए बनाए गए फेसबुक पेज के लैटेस्ट स्टेटस का स्क्रीनशाट जिसमें उसने रेपिस्ट की तस्वीरें जारी की हैं.)


भड़ास पर प्रकाशित दिल्ली की एक मेडिकल छात्रा के रेप-उत्पीड़न की खबर पढ़कर सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा ने अपनी तरफ से पहल करते हुए पूरे मामले की कानूनी लड़ाई को अपने हाथ में ले लिया है. इस सार्थक पहल से न्याय के लिए दर-दर भटक रही छात्रा के मन में उत्साह का संचार हुआ है और अब उसे यकीन है कि रेपिस्ट और चीटर मनोज कुमार को दंड मिलेगा.

एडवोकेट उमेश शर्मा ने पूरे मामले के कागजात देखे और पीड़िता को आश्वस्त किया कि अब उसके साथ अन्याय नहीं होगा. पूरे मामले की छानबीन में पुलिस की लापरवाही साफ दिख रही है. सबूत इकट्ठा करने से लेकर कोर्ट में पैरवी तक में हीलाहवाली बरती गई जो गंभीर मामला है. एडवोकेट उमेश शर्मा ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में कहा कि वह पीड़ित मेडिकल छात्रा के दोषी को दंड दिलाकर रहेंगे. उन्होंने बताया कि वह सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के ही मामले देखते हैं. लेकिन सामाजिक दायित्व के तहत उन्होंने डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में चल रहे इस मामले को अपने हाथ में लिया है और वह खुद हर तारीख पर संबंधित डिस्ट्रिक्ट कोर्ट जाकर पीड़िता छात्रा के वकील के बतौर मजबूत पैरवी करेंगे.

(सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा. भड़ास पर पीड़ित मेडिकल छात्रा की आपबीती पढ़ने के बाद एडवोकेट उमेश शर्मा ने अंतरात्मा की आवाज पर पूरे केस को अपने हाथ में लेने का फैसला किया ताकि दोषी को दंड दिलाया जा सके.)


इस बीच पीड़ित मेडिकल छात्रा ने रेपिस्ट मनोज कुमार की तस्वीर अपने जस्टिस वाले फेसबुक पेज पर सार्वजनिक की है. उसने लिखा है कि यही वो शख्स है जो अध्यात्म के नाम पर बहला-फुसला कर लड़कियों से रेप करता है. फिर शादी का झांसा देकर शोषण जारी रखता है. अंत में वह कानूनी तैयारी करके लड़की को पूरी तरह अलगाव में डाल देता है ताकि वह या तो आत्महत्या कर ले या फिर टूट कर डिप्रेशन में चली जाए. पीड़ित छात्रा ने अपील की है कि रेपिस्ट की तस्वीर को सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा शेयर किया जाए ताकि उसकी असलियत और उसका चेहरा सभी जान देख सकें.

पीड़ित मेडिकल छात्रा को सपोर्ट देने के लिए आप उसके द्वारा न्याय हेतु बनाए गए फेसबुक पेज को लाइक कर सकते हैं, इस लिंक पर क्लिक करके : Justice for victim of FIR No.947u/s376 IPC

पूरे मामले को जानने-समझने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें…

दिल्ली में रेप की शिकार और सिस्टम से उत्पीड़ित इस मेडिकल छात्रा को कैसे मिले न्याय?

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दिल्ली में रेप, उत्पीड़न और उपेक्षा की शिकार मेडिकल छात्रा ने खुद की कहानी फेसबुक पर विस्तार से बयान की

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कोयलांचल के पत्रकार वेद प्रकाश जिंदगी-मौत से जूझ रहे, मदद की जरूरत

कोयलांचल के जुझारू पत्रकार वेद प्रकाश आज जिंदगी और मौत से जब जूझ रहे हैं तो कोयलांचल के बहुत कम साथी हैं जिन्हें वह याद आते हैं. करीब दो दशक पहले भारतीय खनि विद्यापीठ की निबंध प्रतियोगिता में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करने के बाद धनबाद के एक स्थानीय दैनिक ने अपने यहां काम करने का अवसर दिया. और यहीं से शुरू हुई उसकी पत्रकारिता. दस साल पहले ‘प्रभात खबर’ के धनबाद संस्करण में काम करते हुए गिरिडीह राइफल लूट कांड, महेंद्र सिंह हत्याकांड और भेलवाघाटी उग्रवादी घटना की रिपोर्टिग के लिए काम निबटाकर रात तीन बजे धनबाद से गिरिडीह जाना हम साथी भूल नहीं सकते.

नक्सली वारदात की रिपोर्टिग के लिए गिरिडीह कूच करते समय किसी अंदेशा की बजाय तीर्थ की अनुभूति और एडवेंचर का रोमांच उसके चेहरे पर हम देखते थे. यह जज्बा और जुनून ही था कि घातक हादसे से उबरने के बाद वेद उसी पुराने जोशो-खरोश के साथ रिपोर्टिग के अपने पुराने काम में जुत गये थे. भीतर ही भीतर मधुमेह, गुरदा की परेशानी से टूट रहे वेद के चेहरे पर कभी किसी ने थकान या उदासी नहीं देखी. अपोलो और एम्स का चक्कर लगा रहा.

गैंग्रीन ने पीछा भी नहीं छोड़ा था कि फिर आ गये काम पर यह उम्मीद जताते हुए कि काम करते-करते सामान्य हो जायेंगे. पैर के अंगूठे का घाव सूखा भी नहीं था कि पट्टी बंधे पांव के साथ लंगड़ाते-लंगड़ाते धमक गये काम पर.  संपादक और दफ्तर के आग्रह के बावजूद यह हाल था. कभी हादसा तो कभी बीमारी के कारण बार-बार अस्पताल का चक्कर लगता रहा. हर बार थोड़ा ठीक होकर जिंदगी के लिए, हम सभी के लिए बची-खुची ऊर्जा जुटा कर और टूटती उम्मीद को छीन कर लाते रहे. लेकिन बार-बार किस्त-किस्त में बीमारियां भीतर ही भीतर उन्हें खाये जा रही थी. और हम थे कि खोखली होती उम्मीद से हौसला पा रहे थे कि हमारा वेद खुशी के सामानों के साथ लौट रहा है.

बिना किराये के कोई किसी मकान में कितने दिनों तक रह सकता है. लगभग यही हाल उसकी सेहत का होता रहा. शरीर अब सेहत का किराया देने में लगातार लाचार होता गया. कोयलांचल में जितनी मदद हो सकती थी मीडिया ने अलग-अलग क्षेत्रों से मदद जुटायी. उन्हें जिलाकर रखने में कोई कोताही नहीं की घर वालों ने. जहां इलाज में लाखों के मासिक खर्च आ रहे हों, वहां साजो-सामान जुटाने में उनके कुनबे, हमारे साथियों के दम टूटते जा रहे हैं. फिलहाल हमारा वेद कोलकाता के एक निजी अस्पताल सीएमआरआइ में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है. फिर भी हमें उम्मीद है कि हमदर्द साथी उसे छोड़ना नहीं चाहेंगे. उस जिंदादिल वेद को कौन यूं ही जाते देख सकता है. उम्मीद के जंगल में उस वेद को ढूंढ़ने की जी तोड़ कोशिश करें तो कुछ हो सकता है. वेद का हाल जानने के लिए उनकी पत्नी से 09431375334 पर संपर्क किया जा सकता है. अगर आप हमारे वेद प्रकाश के लिए कुछ करना चाहते हैं तो उनके लिए वेद के खाते का ब्योरा हम यहां दे रहे हैं :

बैंक का नाम : स्टेट बैंक आफ इंडिया
खाता सं. : 30030181623
आइएफएससी कोड : एसबीआइएन 0001641
एमआइसीआर कोड : 8260002006
ब्रांच कोड : 001641

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मजीठिया वेज बोर्ड : यशवंत के साथ ना सही, पीछे तो खड़े होने की हिम्मत कीजिए

Rajendra Hada


मंगलवार, 20 जनवरी 2015 की शाम भड़ास देखा तो बड़ी निराशा हुई। सिर्फ 250 पत्रकार मजीठिया की लड़ाई लड़ने के लिए आगे आए? दुर्भाग्य से, जी हां दुर्भाग्य से, मैंने ऐसे दो प्रोफेशन चुने जो बुद्धिजीवियों के प्रतीक-स्तंभ के रूप में पहचाने माने जाने जाते हैं। वकालत और पत्रकारिता। दुर्भाग्य इसलिए कि दुनिया को अन्याय नहीं सहने की सलाह वकील और पत्रकार देते हैं और अन्याय के खिलाफ मुकदमे कर, नोटिस देकर, खबरें छापकर मुहिम चलाते हैं लेकिन अपने मामले में पूरी तरह ‘चिराग तले अंधेरा’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। अपनी निजी भलाई से जुडे़ कानूनों, व्यवस्थाओं के मामले में बुद्धिजीवियों के ये दो वर्ग लापरवाही और अपने ही साथियों पर अविश्वास जताते हैं। यह इनकी निम्नतम सोच का परिचय देने को काफी है।

दस साल तक दैनिक नवज्योति अखबार और उसके बाद दस साल तक दैनिक भास्कर अखबार में रहते हुए साथियों के अनुभव से मैंने यही जाना कि सेठ यानि मालिक सिर्फ मालिक होता है और आप सिर्फ नौकर। आप मालिक के साथ कितनी भी भलाई करें, मालिक अगर आपको दूध में मक्खी की तरह निकालना होगा तो, निकालकर ही मानेगा। मेरे साथ गनीमत रही कि जहां भी रहे, अपनी योग्यता के बल पर टिके रहे। पार्ट-टाइम रहते हुए भी जब जी चाहा तब तक नौकरी की और इच्छा होने पर बाकायदा एक महीने का नोटिस दिया। नोटिस में दी तारीख से अखबार के दफ्तर जाना छोड़ दिया। मालिक या संपादक के फैसले का इंतजार नहीं किया। इसीलिए नोटिस और इस्तीफे आज तक संभाल कर मेरे पास रखे हुए हैं।

हां, तो मैं बात कर रहा था साथियों की। मजेदार बात यह है कि मालिक के मुहंलगे, हां में हां मिलाने वाले, चमचागिरी कर यसमैन बने पत्रकार भी जरूरत पड़ने पर ऐसे आंखे फेर लेते हैं जैसे साथियों को जानते तक नहीं। हालात ऐसे होते हैं कि कई बार तो वह मालिक तो क्या शहर के एमएलए और अफसरों के तलुए चाटते दिखते हैं लेकिन अपने साथियों को इस कदर उपेक्षित करते हैं कि वे सोचने को मजबूर हो जाते हैं। यह और बात है कि वक्त बदलते देर नहीं लगती और जो अन्याय खुद अपने साथियों के साथ करते हैं, कुछ समय बाद उनके साथ वैसा तो क्या उससे बुरा भी होता है। भले ही वह झूठी शान में मरे जाते हैं परंतु उनकी हकीकत किसी से छिप नहीं पाती। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं, भगवान ने चाहा तो बहुत जल्द बाकायदा नाम सहित आपके सामने वे नंगे खड़े होंगे। कुछ ऐसा ही हाल वकालत में है परंतु वह फिर कभी।

अभी तो जमाना यह है कि आप बेइमान को बेइमान, घोटालेबाज को घोटालेबाज और चोर को चोर भी कह नहीं सकते। ऐसा कहते ही वे आपसे बात करना छोड़ देते हैं। आपको देखते ही मुंह फेर लेते हैं। उन्हें लगता है जैसे आंख बंद कर ली है तो अंधेरा हो गया है। उनके घर में एक पैसे की मेहनत की कमाई नहीं होती परंतु करोड़ों के मकान में रहते हैं, बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं। कुर्सी पर जब भी ये लोग जमे तो फर्जीवाड़े ऐसे-ऐसे किए कि आज तक हाथ पैर चलाए बिना उन बेनामी ट्रांजेंक्शंस की फसले काट रहे हैं। तुर्रा यह कि बनते ऐसे ईमानदार हैं कि दुनिया में राजा हरीशचंद्र के बाद पैदा ही वे हुए हैं। कई संस्थाओं में पैसा लगा हुआ है। नरेंद्र मोदी की नकल में ना खाउंगा ना खाने दूंगा जैसे नारे लगा रहे हैं।

आप सोच रहे होंगे आखिर कहना क्या चाह रहा हूं। दोस्तों यह भड़ास ही है जिस पर आपके सामने इन बेइमानों, घोटालेबाजों, चोरों के गिरोह के सभी लोगों को नंगा करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा कहने की हिम्मत भी इसलिए है कि यह यशवंत और उनका भड़ास ही है कि कई मुद्दे इस पर उठाए जा चुके हैं और उठाए जाएंगे। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इनके पैरोकारों में तो वह ताकत रही नहीं कि कुछ लिखा जाए। वे खुद तो इतने पंगु है कि गलत होते हुए भी उसे गलत कहने का साहस नहीं रखते, अगर आप उस बारे में कुछ लिख देते हैं तो उसे छापने की हिम्मत भी नहीं रखते। अगर वह हिम्मत रखते हैं तो उनका सेठ इसकी इजाजत नहीं देता। परंतु वे कुर्सी पर जमे रहते हैं।

यशवंत से अपनी रूबरू मुलाकात सिर्फ दो दफा, और फोन व भड़ास के माध्यम से कई दफा की है। यशवंत को इतना विश्वास है कि अपन कभी गलत खबर नहीं भेजते और ना भेज सकते हैं। इसी कारण उन्होंने आज तक कोई इंक्वायरी नहीं की कि खबर क्यों छापी जाए। जो भेजा वह छापा। आप लड़ते हैं, यशवंत आपका साथ देते हैं। अजमेर से सवा तीन सौ किलोमीटर दूर बैठे और शायद आठ सौ किलोमीटर दूर के मूल बाशिंदे पर इतना विश्वास सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि यशवंत आपके लिए लड़ते हैं। जब मामला आपका निजी हो तो भी वे जी जान लगा देते हैं और आप हैं कि खुद ही पीछे हट जाते हैं। जैसे कि इस बार मजीठिया के मामले में कर रहे हैं।

मजीठिया मिलने और सुप्रीम कोर्ट जाने से यशवंत को कुछ नहीं मिलने वाला। वे आपके लिए लड़ रहे हैं। ऐसे में आप उनके साथ ना सही, पीछे तो खड़े होने का साहस कीजिए। आप खुशनसीब हैं कि आपको यशवंत के रूप में आपका कोई हमदम, कोई दोस्त है। उस दोस्त की कद्र कीजिए। उस पर विश्वास कीजिए। दोस्तों जिंदगी में अवसर कभी कभार दस्तक देता है। इस अवसर को मत चूकिए। मजीठिया की लड़ाई लड़ने की पहल यशवंत ने की है। आप कम से कम साथ तो दीजिए। साथ ना सही पीछे तो खड़े होने की हिम्मत कीजिए। 

राजेंद्र हाड़ा
वरिष्ठ पत्रकार और वकील
अजमेर
राजस्थान
संपर्क : 09829270160, 09549155160
rajendara_hada@yahoo.co.in


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भड़ास संग बोर्ड लड़ाई को 250 मीडियाकर्मी तैयार, 25 जनवरी तक कर सकते हैं आवेदन

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भड़ास की मुहिम पर भरोसा करें या नहीं करें?

जिन्हें हो खौफ रास्तों का, वो अपने घर से चले ही क्यों?
करें तूफानों का सामना, जिन्हें मंजिलों की तलाश है।

प्रिय साथियों,

समय कम बचा है। अब किसी सुखद अहसास का इंतजार मत करो। अपने कदम बढ़ाओ। वक्त निकलने के बाद आप के हाथ में कुछ भी नहीं रहेगा। मेरे पास देश के हर प्रदेश के पत्रकार साथियों के फोन आ रहे हैं। मैं सबसे हाथ जोड़कर निवेदन करना चाहता हूं कि मुझे फोन करना बंद कर दीजिए। कुछ पत्रकार भड़ास के संपादक यशवंतजी को लेकर आशंकाओं से भरे हैं। पत्रकार मुझसे पूछ रहे हैं कि भड़ास की मुहिम पर भरोसा करें या नहीं करें। मुझे ऐसे सवालों से दुख हो रहा है।

मुझे फोन करने वाले हर पत्रकार साथी को मैं कह रहा हूं कि ऐसी मानसिक स्थिति ने ही हमें कभी एकजुट नहीं होने दिया। यशंवत सर पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में किसी भी तरह की आशंका उनकी मुहिम और पत्रकारों के प्रति भावना को ठेस पहुंचा सकती है। आप यशवतं जी पर भरोसा ही नहीं आंख बंद कर भरोसा करें। मैं जानता हूं कि मजीठिया की इस पूरी लड़ाई के असली सलाम के वही हकदार हैं। मैं लंबे समय से देख रहा हूं।

यशवंतजी चाहते हैं कि देश के पत्रकारों को मजीठिया मिले। पत्रकार शोषण की स्थिति से बाहर आएं। मैंने वो किया जो मुझे उचित लगा। जो मेरे लिए बेहतर था। मेरी कंपनी से किए समझौते को मैं डिस्क्लोज नहीं कर सकता लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि देश के सभी मीडिया हाउस मालिक बिना लड़ाई लड़े आपको कुछ नहीं देने वाले हैं। कंपनियां शोषण के तरीके सीख चुकी हैं। मीडिया हाउस मालिकों के आस-पास ऐसे लोग हैं जो लाखों रुपए की तनख्वाह लेकर आप लोगों के शोषण के तरीके उन्हें सिखा रहे हैं। असल में यह बड़ी मछलियों जैसी कहावत को ही साबित कर रहे हैं। लेकिन अब समय क्रांति का झंडा उठाने का है।

आप लोग आशांकित मत रहिए। हमने वकीलों पर बड़ी राशि खर्च की है। भड़ास जिस राशि का निवेदन कर रहा है वह इतनी बड़ी लड़ाई के लिए कुछ भी नहीं है। हम गणित के जोड़ बाकी गुणा भाग में उलझ कर कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट आपको आपका हक दिलाने के लिए तैयार है। बस आपको अपना एक कदम बढ़ाना है। डरकर न कभी किसी ने कुछ पाया है न कभी कोई पाएगा। मेरा अनुभव कहता है कि निडरता ही आपको आपके लक्ष्य तक आसानी से पहुंचा पाएगी। यशवंतजी इस लड़ाई के असली हीरो हैं। असली सलाम उन्हें कीजिए। उन्हें मेरा सलाम है। किसी ने तो पत्रकारों की सुध ली। पत्रकार तो बेसुध हैं। पूरे समाज के हर तबके की सुध लेना वाला यह वर्ग खुद कभी अपनी सुध नहीं ले पाया है। दोस्तों समय कह रहा है बड़ा युद्ध लड़ो। इस बार नहीं तो फिर कभी नहीं लड़ पाआगे। यशवंत सर की यह मुहिम मीडिया हाउसों के लिए चिंता और चुनौती का सबब बनी हई है। इसलिए वे ऐन केन प्रकारेण इस मुहिम को असफल करने के लिए पत्रकारों में आशंकाएं पैदा करने समेत तमाम हथकंडे अपना रहे हैं।
आप सभी साथियों को धन्यवाद।

आपका

रजनीश रोहिल्ला

पूर्व चीफ रिपोर्टर
दैनिक भास्कर
अजमेर


पूरे मामले को समझने के लिए नीचे दिए गए तीन शीर्षकों पर क्लिक करें…

मजीठिया के हिसाब से पैसा मिलते ही रजनीश रोहिल्ला ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस ली (देखें कोर्ट आर्डर)

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मजीठिया वेज बोर्ड : रजनीश रोहिला समेत तीन मीडियाकर्मियों के आगे झुका भास्कर प्रबंधन, पूरे पैसे दिए

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भड़ास संग मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने को 250 मीडियाकर्मी तैयार, 25 जनवरी तक कर सकते हैं आवेदन

 

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बंद हो चुके ‘भास्कर न्यूज’ चैनल के मालिकों-संपादकों में घमासान, लेबर डिपार्टमेंट ने आरसी जारी की

‘भास्कर न्यूज’ चैनल के शीर्षस्थ लोगों में घमासान शुरू हो चुका है. खबर है कि राहुल मित्तल ने हेमलता अग्रवाल व समीर अब्बास के खिलाफ नोएडा के किसी थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया है. उधर, हेमलता अग्रवाल और समीर अब्बास ने भी राहुल मित्तल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने हेतु थाने में तहरीर पहले से दे रखा है. सूत्रों के मुताबिक चैनल के फेल होने के बाद इसका ठीकरा एक दूसरे पर फोड़े जाने की कवायद शुरू हो गई है.

उधर, चैनल के कर्मचारियों को जो चेक दिए गए वो बाउंस हो गए हैं. ये पीड़ित कर्मचारी अब कोर्ट में हेमलता अग्रवाल को घसीटने की तैयारी कर रहे हैं. दर्जनों कर्मचारियों ने पहले से ही लेबर डिपार्टमेंट में कई महीने की सेलरी और फुल एंड फाइनल सेटलमेंट न देने को लेकर चैनल के मालकिन के खिलाफ केस डाल रखा है. श्रम विभाग ने चैनल के मालिकों को कई बार नोटिस भेज कर सेटलमेंट करने को कहा लेकिन हर बार चैनल प्रबंधन फेल हुआ. अंततः अब श्रम विभाग ने चैनल संचालकों के खिलाफ आरसी जारी कर दी है. रिकवरी की नोटिस जारी होने से चैनल संचालकों में हड़कंप मच गया है.

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घर बैठे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करें और मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उठाएं

Yashwant Singh : अखबार मालिक अपने मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सेलरी, एरियर नहीं दे रहे हैं. जो-जो मीडियाकर्मी सुप्रीम कोर्ट गए, उनके सामने प्रबंधन झुका और उनको उनका हक मिल गया. पर हर मीडियाकर्मी सुप्रीम कोर्ट तो जा नहीं सकता. इसलिए भड़ास ने सुप्रीम कोर्ट के एक धाकड़ वकील Umesh Sharma को अपना वकील नियुक्त किया और देश भर के मीडियाकर्मियों का आह्वान किया कि अगर वो मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना हक सेलरी एरियर चाहते हैं तो सिर्फ मुझे एक निजी मेल कर दें, अपना नाम पता अखबार का नाम अपना पद अखबार का एड्रेस मोबाइल नंबर मेल आईडी आदि देते हुए. अब तक सैकड़ों मेल मिल चुके हैं.

जिन जिन ने कहा है कि वे गोपनीय रहकर लड़ेंगे, उनकी इच्छा का पूरा सम्मान करते हुए अलग गोपनीय कैटगरी में रखा गया है. जिन जिन ने कहा है कि वे खुलकर लड़ेंगे, उन वीरों को महावीर कैटगरी में रखा गया है. पूरा आलेख यहां http://goo.gl/JgDpS2 है. अब ये कहना है कि मेल भेजकर लड़ाई में शिरकत करने की इच्छा प्रकट करने की आखिरी डेट बीत चुकी है, जो 15 जनवरी थी. लेकिन आज और कल, दो दिन का समय बढ़ा दिया गया है. ये ही दो दिन हैं, जिसमें आपको तय कर लेना है कि आप चुप्पी मारकर मालिकों के हिसाब से जियेंगे, मालिकों के रहमोकरम पर या अपना हक लेकर अपनी लड़ाई लड़कर खुद को सच्चा मीडियाकर्मी साबित करेंगे. ध्यान रखिएगा. जिन लोगों को लगता है कि मजीठिया वेज बोर्ड मसले पर मालिकों के हिसाब से चलने के कारण उनकी नौकरी पक्की है तो सात फरवरी के बाद ये गलतफहमी दूर हो जाएगी.

मालिकों ने अगर आपसे साइन करा लिया है कि आपको मजीठिया नहीं चाहिए तो कोई बात नहीं. ये साइन कराना, ये लिखवा लेना सुप्रीम कोर्ट में अमान्य हो जाएगा. कोई मालिक अपने यहां काम करने वाले कर्मचारी से कुछ भी लिखवा ले, उसका कोर्ट में कोई मतलब नहीं है. यह केवल अपने कर्मचारियों को साइकोलाजिकली हरा देने की रणनीति है ताकि उन्हें लगे कि वे तो साइन कर चुके हैं मजीठिया न लेने का, इसलिए वे कैसे लड़ सकते हैं. अगर आपने साइन भी कर दिया हो तो आप लड़ सकते हैं. आप नौकरी छोड़ चुके हों तो भी आप क्लेम कर सकते हैं अपने एरियर का. आपको मजीठिया के हिसाब से नहीं बल्कि मालिक ने अपने हिसाब से थोड़ी सेलरी बढ़ाकर मजीठिया लाभ मिलने की बात कही हो तो आप भी क्लेम कर सकते हैं कि आपको उचित सेलरी नहीं मिल रही.

कुल मिलाकर कहने का आशय ये कि आप मजीठिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जाने की तैयारी करें, सिर्फ एक मेल भेजकर. आपको न तो कहीं आना है न कहीं जाना है. आप केवल छह हजार रुपये वकील साहब के एकाउंट में जमा करेंगे और एक अथारिटी लेटर मुझे मेल कर देंगे. इसके अलावा आपको कुछ नहीं करना है. जीत की गारंटी भड़ास दे रहा है, क्योंकि आलरेडी इस मामले में कई पत्रकार साथी जीत चुके हैं. अगर आपको मन में कोई सवाल हो तो मुझे मेल कर सकते हैं, yashwant@bhadas4media.com पर.

जिन सैकड़ों लोगों ने आलरेडी मुझे मेल कर दिया है, वह केवल दो दिन यानि 18 जनवरी तक इंतजार करें. उन्हें अथारिटी लेटर का फार्मेट और वकील साहब के बैंक एकाउंट का डिटेल मेल कर दिया जाएगा.

जिन-जिन के मेल आ गए हैं, उनका डिटेल एक जगह गोपनीय रूप से संग्रह कर लिया गया है और आगे का काम शुरू किया जा चुका है.

कहना चाहूंगा कि वकील साहब के लिखे इन दो आलेखों का अगर कोई पत्रकार साथी हिंदी अनुवाद कर दे तो ढेर सारे हिंदी भाषी पत्रकारों का भला होगा. लिंक ये हैं…

https://bhadas4media.com/print/3336-newspaper-establishment-definition-for-majithia-wage-board

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https://bhadas4media.com/print/2025-majithia-remedies

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह का एक पुराना इंटरव्यू

मीडियासाथी डॉट कॉम नामक एक पोर्टल के कर्ताधर्ता महेन्द्र प्रताप सिंह ने 10 मार्च 2011 को भड़ास के संपादक यशवंत सिंह का एक इंटरव्यू अपने पोर्टल पर प्रकाशित किया था. अब यह पोर्टल पाकिस्तानी हैकरों द्वारा हैक किया जा चुका है. पोर्टल पर प्रकाशित इंटरव्यू को हू-ब-हू नीचे दिया जा रहा है ताकि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और यशवंत के भले-बुरे विचारों से सभी अवगत-परिचित हो सकें.

यशवंत सिंह

 

कठघरे में ‘भड़ास4मीडिया’ के एडिटर यशवंत सिंह

साक्षात्कारकर्ता : महेन्द्र प्रताप सिंह

10.03.2011 11.30pm


(मीडिया साथी डॉट कॉम के कठघरे में इस बार हैं, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत सिंह। इस साक्षात्कार में हमने देशभर के मीडिया हाउसों की ख़बर लेने वाले यशवंत सिंह की ख़बर ली है और ‘मीडिया साथी डॉट कॉम’ के स्तर के अनुरूप बिना किसी लाग-लपेट के सीधी और खरी-खरी बातें की हैं। ‘भड़ास4मीडिया’ पर लगाए गए सभी आरोपों के जवाब में यशवंत ने जो कहा, उससे आप और हम असहमत हो सकते हैं, किन्तु इससे कम से कम ‘भड़ास4मीडिया’ से जुड़ी विचारधारा और यशवंत के पक्ष को तो समझा ही जा सकता है – महेन्द्र प्रताप सिंह)

-यशवंत जी, सीधे आरोपों से शुरुआत करते हैं। ‘भड़ास’ एक नकारात्मक शब्द है। क्या आपको नहीं लगता कि हमें विभिन्न मुद्दों पर सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने तक सीमित रहने के बजाय समस्या के समाधान के लिए कुछ सार्थक क़दम उठाने चाहिए?

–समाधान तो अंतिम चरण है। पर पहले तो हम लोग समस्या बताने वाले चरण से ही वंचित थे। कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं था, जो हम लोगों के सुखों-दुःखों को सामूहिक तौर पर व ईमानदारी से अभिव्यक्त करे। जब समस्या का प्रकटीकरण होता है, तभी समाधान की दिशा में क़दम बढ़ता है। और अब इसका असर दिख रहा है। पेड न्यूज़ से लेकर पत्रकारों को उत्पीड़ित करने तक में मीडिया प्रबंधन सतर्क हो गया है कि कहीं उनका भेद न खुल जाए।

-लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में बहुत लोकप्रिय वेबपोर्टल है और इस नाते केवल भड़ास निकालने के बजाय पत्रकारों की विचारधारा और रुचि में परिष्कार की भी आपकी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है?

–बिल्कुल सही कही कहा आपने, ये कैसे हो सकता है, इस दिशा में आपके भी सुझाव जानना चाहूँगा।

-जी, इसी पर चर्चा करते हैं। बहुत से लोगों को लगता है कि ‘भड़ास’ लोकप्रिय अवश्य है, किन्तु गंभीर पत्रकारिता में इसका नाम सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता और इसे एक-दूसरे की छीछालेदर करने और गाली-गलौज वाली वेबसाइट माना जाता है।

–आज जिन्हें गंभीर माना जाता है, वे कितने छिछले निकले, ये आपको भी पता है। पत्रकारिता के वे बड़े नाम जो कभी गंभीरता के प्रतीक थे, राडिया कांड के बाद दलाली के प्रतीक के रूप में सामने आए। और जब भी, कुछ भी आप कभी नया करेंगे तो जमी-जमाई व्यवस्था शीघ्र आपको स्वीकार नहीं करेगी। वे आप पर तमाम तरह के आरोप व लांछन लगाएँगे। ग़नीमत है कि हम लोगों पर अभी इसी तरह के आरोप लग रहे हैं। पर आज उनसे पूछिए कि ‘भड़ास’ क्या है जो कभी ‘भड़ास’ के आलोचक हुआ करते थे, तो वे भी मानेंगे कि ‘भड़ास’ चाहे जैसा हो इसे इगनोर नहीं कर सकते।

-लोगों का मानना है कि ‘भड़ास’ पर कैसा भी, कुछ भी आसानी से छपवाया जा सकता है। जहाँ तक कि झूठे-सच्चे आरोप और गालियाँ तक आसानी से जगह पा जाती हैं। इस पर आपकी क्या राय है?

–इसमें क्या दिक़्क़त है। कोई तो ऐसा खुला मंच हो। वैसे हम तो काफ़ी छानबीन करके छापते हैं। पर सोचिए गूगल के ब्लॉगों, बज़ व अन्य तमाम वेबसाइटों पर तो तमाम कुछ छपता रहता है। लेकिन लोग वहाँ नोटिस नहीं लेते, क्योंकि उनको लगता है कि गूगल को भला कैसे रोका जा सकता है। पर ‘भड़ास’ को लेकर आप उँगली उठा देते हैं, क्योंकि ‘भड़ास’ को भारत का एक बंदा चला रहा है और वह आपको फ़ोन-मोबाइल पर तत्काल उपलब्ध है, इसलिए उसे आप हड़का लोगे, मुक़दमा कर दोगे। पर आने वाले दौर में, यह जो मनुष्य व मीडिया के जनवादीकरण का दौर शुरू हुआ है, बहुत तेज़ होगा। सबका स्याह-सफ़ेद बाहर आना चाहिए और सब कुछ बेहद ट्रांसपेरेंट होना चाहिए।

-‘भड़ास’ पर न तो भाषा की शुद्धता का ख़याल रखा जाता है और न ही शालीनता का। भाषा पत्रकारिता का एक आधार स्तंभ है। ऐसे में आपको नहीं लगता ‘भड़ास’ पत्रकारों के भाषाई संस्कारों को परिमार्जित करने के स्थान पर उन्हें दूषित कर रहा है?

–पाखंडी क़िस्म की शालीनता से परहेज़ है हम लोगों को। ऐसे पाखंडी क़िस्म के शालीनों ने ही चुपके-चुपके सिस्टम करप्ट कर दिया है। थोड़ा बदज़ुबान ईमानदार चलेगा। और ‘भड़ास’ गुस्से व विरोध का प्लेटफ़ॉर्म है तो कई बार बात कहने में उग्रता, अशालीनता दिख सकती है, पर यह उससे तो अच्छा है, जो टीवी और अख़बारों में दिखाया-छापा जा रहा है। लिंगवर्धक यंत्र, बिग बॉस, सेक्सी सीरियल्स आदि-आदि।

-‘भड़ास’ पर गाली-गलौज और अभद्र भाषा का प्रयोग आम है। लेखों और टिप्पणियों में आपको ये खूब मिल जाएँगी। आपको नहीं लगता कि यह ग़लत है? जहाँ हमें सभी जगह गालियों का विरोध करना चाहिए, हम ख़ुद गालियाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

–मजबूर और भूखा आदमी गाली नहीं देगा तो क्या भजन गाएगा। भरे पेट वाले सुरुचि और शालीनता की ज़्यादा बातें करते हैं पर जिनके पेट खाली हैं, सिर पर सिपाहियों के डंडे हैं, वे कैसे शांत रह सकते हैं। मीडिया में एक बड़ा हिस्सा शोषित व उत्पीड़ित है। ये जब अपनी पीड़ा लिखते-बाँटते-बताते हैं तो कई बार उग्र हो जाते हैं।

-कंटेंट को लेकर भी ‘भड़ास’ तथ्यपरक नहीं होता और कई अप्रामाणिक और अपुष्ट समाचार यहाँ डाल दिए जाते हैं। जिन्हें बाद में लोग ग़लत ठहराते नज़र आते हैं। (जैसे पत्रकारों द्वारा भेजे पत्रों के आधार पर ख़बरें डाल दी जाती हैं और उनका नाम आदि भी नहीं दिखाया जाता।)

–पत्र प्रकाशित करना एक पक्ष होता है और उस पर आई टिप्पणियाँ दूसरा पक्ष। हम उन पत्रों को ही प्रकाशित करते हैं, जिन्हें हम लोग भी मानते हैं कि सही हैं। अगर कोई तथ्य ग़लत हो तो उसको लेकर आए स्पष्टीकरण को ससम्मान प्रकाशित करते हैं। बाक़ी जब आप काम करेंगे तो ग़लतियाँ तो होंगी ही। ग़लती वही नहीं करता, जो काम नहीं करता।

-आरोप यह भी है कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में चटपटी बातों, झूठे-सच्चे गॉशिप और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने को बढ़ावा दे रहा है।

–कोशिश करते हैं कि ऐसा न हो। लेकिन अगर मीडिया में गॉशिप है, घटनाएँ हैं, सरगर्मियाँ हैं तो वे प्रकाशित होंगी ही। न्यू मीडिया के लिए मीडिया के मायने काफ़ी बदल गए हैं। हम लोग गॉसिप व चर्चाओं को भी ख़बर मानते हैं। बदलते दौर में चीज़ें बदल जाती हैं।

-‘भड़ास’ पर एक कॉलम है ‘कानाफूसी’। उस पर कभी-कभी बहुत ही संवेदनशील ख़बरें बिना किसी प्रमाण और पुष्टि के डाल दी जाती हैं। जैसे, 15 फ़रवरी 2011 को ‘हिन्दुस्तान के भदोही, सोनभद्र, मिर्ज़ापुर ऑफ़िस पर भी लगेगा ताला’ और ‘राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर के संपादक और ब्यूरो चीफ़ आपस में भिड़े’ आदि। बाद में टिप्पणियों में ही लोग इन्हें ग़लत साबित करते हैं।

–हिन्दुस्तान के कई ऑफ़िसों में ताले लगे हैं और कई जगह लगने बाक़ी हैं। होता क्या है कि कई बार ख़बरें छपने के बाद मीडिया हाउस कुछ निर्णयों का एक्ज़ीक्यूशन रोक देते है या टाल देते हैं ताकि साइड इफ़ेक्ट कम से कम हो। दूसरे, अगर चर्चा है तो छाप दिया, वो ग़लत है या नहीं, लोग बता रहे हैं कमेंट में तो स्पष्ट हो गया कि पूरी तस्वीर क्या है। यहाँ आपको बता दूँ कि हम लोग न तो कोई मीडिया हैं, और न कोई अनुदान लाभ प्राप्त मीडिया हाउस। हमें आप मीडिया सेंट्रिक एक इनफ़ॉरमेशन सेंटर कह सकते हैं। इसलिए तथ्यों को सत्यापित करने का काम हमारे पाठकों का भी होता है, क्योंकि हमारे पास कोई लंबा-चौड़ा बजट व टीम नहीं है, जो हर स्टोरी पर पूरी गहराई से काम कर सके।

-‘भड़ास’ वैसे तो ‘भड़ास4मीडिया’ है, किन्तु यदि आपको लगता है कि कोई बात आपकी दर्शक संख्या बढ़ा सकती है, तो आप असंबद्ध बातें भी यहाँ प्रकाशित कर देते हैं। जैसे, ‘मैं मर्द हूँ-तुम औरत, मैं भूखा हूँ-तुम भोजन हो’ या ‘इसे माँ-बेटे का प्यार कहेंगे या रोमांस’ या ‘सरकार चिंतित है कि सेक्स करने की उम्र ज़्यादा क्यों?’ इत्यादि।

–‘भड़ास4मीडिया’ के पाठक आम लोग नहीं होते। पढ़े-लिखे लोग होते हैं। इन पढ़े-लिखे व वयस्कों के सामने सेक्स से संबंधित बात करने में क्या दिक़्क़त है। ट्रेडिशनल मीडिया ने जो दायरे बनाए हैं, अगर उसी दायरे में हम लोग फँस जाएँगे तो फिर काहे का न्यू मीडिया। न्यू मीडिया प्रयोगात्मक है। इसीलिए प्रयोग होते रहेंगे। कभी प्रयोग अच्छे लग सकते हैं और कभी बुरे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना। तो अगर किसी का कोई विचार है, जिससे आप भले असहमत हों तो उसे प्रकाशित करने में क्या दिक़्क़त। हमें विरोधी विचारों का सम्मान करना चाहिए। सीखना चाहिए और उससे सबक लेना चाहिए कि मनुष्य बहुत विविधता भरी चीज़ है, जिसे किसी एक डंडे से हाँक पाना अन्याय होगा। यह विविधता अगर हमारे यहाँ झलक रही है तो यह अच्छी बात है।

-आरोप यह भी है कि आप बेमतलब के लेखों को सनसनीख़ेज़ बनाते हुए शीर्षक लगाकर प्रकाशित करते हैं। जैसे ‘पत्रकार हैं, लुगाई कहाँ से लाएँ?’  

–ऐसा नहीं है। हेडिंग और कंटेंट में साम्य होता है। हम लोग टीवी और अख़बारों के द्वारा निर्जीव क़िस्म की हेडिंगों के आदी हैं। पर वेब पर तो प्रयोग होंगे। जिस शीर्षक का आपने ज़िक्र किया है, वह ठीक-ठाक रचना है, जिसका कंटेंट बढ़िया है। हेडिंग तो एक माध्यम होता है, कंटेंट पढ़ाने के लिए, आगे बढ़ने के लिए। इसी कारण हेडिंग में प्रयोग होते रहते हैं।

-‘भड़ास4मीडिया’ के विचार सेक्शन में एक सज्जन का नक्सलवाद पर गृहमंत्री को गरियाता हुआ एक लेख बहुत विवादास्पद हुआ था। उन सज्जन का आरोप था कि आपने पुलिस के डर से वो आलेख वेबसाइट से हटा दिया। बाद में आपने स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि प्रकाशन से पूर्व आपने वह पत्र पढ़ा नहीं था। क्या ये बात वास्तव में सच थी और क्या आपको नहीं लगता कि आपको निडर होकर अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर अडिग रहना चाहिए था?

–आपने पूरे प्रसंग के बारे में इसलिए जाना क्योंकि जिन्होंने विरोध किया था, उसका भी लेख हम लोगों ने छापा और अपना पक्ष भी रखा। तो ये अच्छी बात है कि हम लोग एक बेहद डेमोक्रेटिक प्लेटफ़ॉर्म बनने की तरफ़ तेज़ी से बढ़ चले हैं। कई बार सबकी बात रखने के चक्कर में कुछ चाइल्डिश या एक्स्ट्रीमिस्ट क़िस्म की चीज़ें भी छप जाती हैं, जिस पर ध्यान दिलाए जाने पर उसे हटा लिया या संशोधित कर दिया जाता है। मैं हर चीज़ नहीं देख पाता, क्योंकि सब कुछ पढ़ पाना मुश्किल है एक आदमी के लिए।

-क्या आपको नहीं लगता कि आप जिन वजहों से वर्तमान मीडिया हाउसों को कठघरे मे खड़ा करते हैं, वही काम ‘भड़ास’ पर आप ख़ुद भी करते हैं?

–जैसे बताएँ, उदाहरण दें कुछ। इतना जान लें आप कि हम लोग भी वही काम कर रहे होते तो भड़ास कभी का मर चुका होता। क्योंकि मीडिया के कई मगरमच्छ इसी फ़िराक़ में हैं कि यशवंत या भड़ास से कोई ग़लती हो, इनका कोई स्टिंग हो और इनका सत्यानाश हो जाए। हम लोग बेहद ट्रांसपेरेंट हैं। जो जानना चाहेंगे वो जानकारी पूरी ईमानदारी से आपको दी जाएगी। लेकिन यह ज़रूर मैं कह रहा हूँ कि हम लोग कहीं से कोई रजिस्टर्ड मीडिया नहीं हैं, न कोई अनुदान, भुगतान या लाभ पातें हैं सरकारों से। बावजूद इसके हम नब्बे फ़ीसदी ईमानदार हैं। 90 फ़ीसदी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करते। 10 फ़ीसदी करते हैं तो इसलिए ताकि ‘भड़ास’ का सर्वाइवल रहे। और इस दस फ़ीसदी में भी वो लोग हैं, जिन्हें हम बेहतर मानते हैं, नया ग्रुप मानते हैं, जिनको प्रमोट करना अपना धर्म मानते हैं ताकि जमे-जमाए व बेहद करप्ट बड़े मीडिया हाउसों को चेलेंज मिल सके।

-तथाकथित न्यू मीडिया को लेकर बहुत बवाल मचा हुआ है। न्यू मीडिया के लोगों का आरोप है कि मुख्य धारा के लोग इस क्षेत्र के अनाधिकृत मठाधीश बनने की कोशिश कर रहे हैं। आपके क्या ख़याल हैं?

–बेवजह का बवाल है। जो लोग हल्ला कर रहे हैं, दरअसल वे खुद मठाधीश बनने की फ़िराक़ में हैं। आप काम करते रहिए, मठाधीश अपने आप क़िनारे लग जाएँगे। कोई बनने से मठाधीश नहीं बन जाता।

-आपके मुताबिक़ न्यू मीडिया की ताक़त और कमज़ोरियाँ क्या हैं और इसका क्या भविष्य देखते हैं?

–परंपरागत अख़बारों व न्यूज़ चैनलों के बाज़ार व सरकार संरक्षित होते जाने की वजह से न्यू मीडिया का तेजी से विस्तार हो रहा है। भविष्य न्यू मीडिया का है। न्यू मीडिया का काम ही मीडिया के असली काम के रूप में प्रकट होगा। भारत में न्यू मीडिया की कमज़ोरी यही है कि अभी इसकी पहुँच गाँव-गाँव तक नहीं है। जिस दिन गाँव-गाँव में इंटरनेट-ब्रॉडबैंड होगा, उस दिन सही मायने में न्यू मीडिया के लोग क्रांति कर रहे होंगे और फिर मिस्र जैसी क्रांति भारत में संभव हो जाएगी।

-यशवंत जी, आइए अब आपकी निजी ज़िंदगी की ओर रुख़ करते हुए चलते हैं… अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताइए।

–मेरा गाँव अलीपुर बनगाँवा है। ग़ाज़ीपुर ज़िले से 22 किलोमीटर दूर। शहर में भी एक मकान है, जिसे बाबा ने बनवाया था, जहाँ रहकर हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई की। उसके पहले कक्षा आठ तक गाँव में रहकर पढ़ाई की। पिता का नाम लालजी सिंह है और माँ यमुना सिंह। पिता रिटायर्ड फ़ौजी हैं, माँ हाउस वाइफ। हम लोग तीन भाई हैं। बहन नहीं है। बहन न होने की कमी रक्षाबंधन के दिन ख़लती है।

-अपने बचपन के विषय में कुछ बताएँ।

–बचपन में हाईग्रेड की शरारतें करता था। पैसा चोरी से लेकर भुट्टा व गन्ना चोरी तक। इन्नोवेशन हर फ़ील्ड में करता था, बचपन में ही। सेक्स से लेकर समाधि तक में बचपन में प्रयोग किया। कभी परम पुजारी बन जाता था, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड याद करके, तो कभी गाँव से बाहर किसी खेत में हम कुछ मित्र अपने गुप्तांगों का सामूहिक प्रदर्शन कर इस छुपी दुनिया के रहस्य जानने की कोशिश करते।

-अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए।

–गाँव में ही प्राइमरी और मिडिल स्कूल की पढ़ाई की। बाद में ग़ाज़ीपुर ज़िले के इंटर कॉलेज से इंटर किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए किया और उसके बाद बीएचयू से बीजेएमसी की डिग्री ली।

-दिल्ली कब और कैसे आना हुआ और गाँव और शहरी जीवन तथा ग़ाज़ीपुर और दिल्ली में आपने कितना अंतर पाया और इसने आपको कैसे प्रभावित किया?

–दिल्ली चार साल पहले आया। पहले दिल्ली से डर लगता था, लेकिन दिल्ली आने की ठान भी चुका था, क्योंकि प्रतिभाओं को सही मुक़ाम दिल्ली-मुंबई में ही मिल पाता है। दिल्ली में सारी टेक्नोलॉजी और तरह-तरह के क्षेत्रों के वरिष्ठ लोग हैं। इससे अगर आप प्रयोगधर्मी हैं तो काफ़ी कुछ सीखने-करने की ग़ुंजाइश होती है। बाक़ी गाँव के लोगों को शहरी जीवन में जो मुश्किलें होती हैं, वो मेरे साथ भी होती रही हैं। भीड़ में अकेले होने का भाव, सामूहिकता का अभाव। तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में भावनाओं को न समझा जाना आदि-आदि।

-अध्ययन के दौरान आपने आजीविका के लिए कौन-सा क्षेत्र चुना था? और बाद में क्या परिस्थितियाँ बनीं? क्या मनचाही फ़ील्ड में कार्य किया या समझौता करना पड़ा?

–अध्ययन करने इलाहाबाद पहुँचा तो मक़सद था, आईएएस बनना, पर बीच पढ़ाई में भगत सिंह को आदर्श मानते हुए ग़रीबों के लिए लड़ने और सिस्टम से लोहा लेने को एक नक्सलवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गया और पूरी तरह, होलटाइमर के रूप में काम करने लगा। बाद में लगा कि इतना मुश्किल काम मैं नहीं कर सकता।

-पत्रकारिता में आपकी रुचि कब पैदा हुई? और किस-किस मीडिया संस्थान में कार्य किया? और वहाँ आपके अनुभव कैसे रहे?

–पत्रकारिता में रुचि पॉलिटिकल एक्टीविज़्म के दौर में पैदा हुई। अमर उजाला और जागरण में काम किया। दोनों जगहों के अच्छे व बुरे दोनों तरह के अनुभव रहे।

-साथी कर्मचारियों में आपकी छवि कैसी थी और उनका आपके प्रति कैसा व्यवहार था?

–चूँकि मैं ज़्यादा तेज़ी से और ज़्यादा इन्नोवेशन के साथ काम करता हूँ, और ऐसे ही लोगों को पसंद करता हूँ तो कई बार जो लोग मेरी सोच के अनुसार नहीं चल पाते, उनसे मतभेद-मनभेद आदि होते रहते हैं।

-बॉस और कर्मचारियों के रिश्ते बहुत नाज़ुक होते हैं। बॉसों की क्रूरता के बहुत से क़िस्से प्रचलित हैं। आपके और आपके बॉसों के रिश्ते कैसे थे?

–आम तौर पर मेरे बॉस ही मुझसे डरा करते थे, क्योंकि मैंने कभी किसी बॉस की चेलहाई नहीं की। वीरेन डंगवाल जैसे संपादकों के साथ काम किया, जो चेला नहीं, अच्छे दोस्त की तरह अपने अधीनस्थों से काम करते-कराते हैं।

-मीडिया छोड़कर कुछ दिनों आपने एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर भी काम किया। ये फ़ील्ड में परिवर्तन कैसे हो गया?

–एक टीवी संपादक से रात में फ़ोन पर गाली-गलौज हो गई और उन्होंने मेरी गालियों को रिकॉर्ड कर दैनिक जागरण के मालिक के पास भेज दिया तो इस स्टिंग में मैं नप गया। पत्रकार की नौकरी हर जगह तलाश की। नौकरी न मिली तो जो मिला उसको ग्रहण कर लिया। मार्केटिंग फ़ील्ड में जाने से बहुत कुछ नई चीज़ें समझ में आईं और उसी समझ के कारण मुझे लगा कि ख़ुद का काम करना चाहिए, किसी की नौकरी करने की जगह।

-नौकरी के वक़्त का कोई रोचक प्रसंग बताइए।

–अमर उजाला कानपुर की बात है. एक बार मेरे संपादक वीरेन डंगवाल ने मुझे डाँटा, तो मैंने उन्हें चुपके से इस्तीफ़ा थमा दिया और कमरे पर जाकर दारू पीने लगा। उन्होंने कुछ वरिष्ठों को मुझे मनाने के लिए भेजा, पर मैं नहीं माना। सुबह संदेशा भिजवाकर अपने कमरे पर बुलवाया। उन्होंने कहा कि तुम पहले तय कर लो कि जीवन में करना क्या है। तुम आईएएस बनने इलाहाबाद गए थे, वह न बन सके। लगे क्रांति करने। क्रांति करने के लिए निकले तो वो न कर सके। चल पड़े पत्रकार बनने। अब पत्रकारिता की राह छोड़ने की बात कर रहे हो। जीवन में इतनी अस्थिरता ठीक नहीं। अपनी प्रियारटीज़ तय कर लेनी चाहिए। उनकी इस बात ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया और तय किया पत्रकारिता के क्षेत्र में लगकर काम करना है, सो उनकी प्रेरणा से आज तक इस पेशे में बना हुआ हूँ।

-ब्लॉगिंग में रुचि कैसे हुई?

–वो हिन्दी ब्लॉगों के शुरू होने का दौर था। कई ब्लॉग खुल रहे थे, सो मैंने भी एक ब्लॉग बनाने का निश्चय किया और कुछ अलग-सा, कुछ हटके ब्लॉग बनाने की प्रक्रिया में ‘भड़ास’ ब्लॉग बनाया।

-ब्लॉग तो ठीक है, पर उसका नाम ‘भड़ास’ कैसे सूझा?

–यूँ ही। उन दिनों हिन्दी ब्लॉगों के जितने नाम थे, सबको देखने के बाद लगा कि अलग व विचित्र-सा नाम ‘भड़ास’ ही है, जो हिन्दी की देसज आत्मा को प्रतिध्वनित करता है और यह भी बताता है कि हम हिन्दीवालों में शहरों और अंग्रेज़ियत के ख़िलाफ़ काफ़ी भड़ास है, जिसे निकाले जाने की ज़रूरत है।

-और उसके बाद ‘भड़ास4मीडिया’ वेबसाइट शुरू करने का ख़याल कैसे आया?

–‘भड़ास’ ब्लॉग पर मीडिया से संबंधित पोस्टों को काफ़ी लोकप्रियता मिलने लगी। कम्युनिटी ब्लॉग होने के कारण ढेरों लोग डायरेक्ट अपनी जानकारियाँ पोस्ट करने लगे कि फलाँ पत्रकार ने फलाँ जगह ज्वॉइन कर लिया, उनको बधाई। इस तरह से करते-करते मुझे लगा कि मीडिया पर सेंट्रिक हिन्दी में एक अलग पोर्टल होना चाहिए।

-पाठकों का तो ‘भड़ास’ को खूब प्रतिसाद मिला, लेकिन आपके मित्रों और नज़दीकी लोगों ने इसे कैसे लिए और कितना सहयोग किया?

–मिला-जुला रहा। ‘भड़ास’ ब्लॉग के कारण जागरण में एक बार नौकरी जाते-जाते बची थी। तब ‘भड़ास’ को डिलीट करना पड़ा था। वहाँ से मुक्त होने के बाद फिर ‘भड़ास’ बनाया। कई दोस्त बने ‘भड़ास’ के कारण और कई दुश्मन भी पैदा किए ‘भड़ास’ ने।

-‘भड़ास’ के शुरुआती दौर में जब मैं आपसे मिला था, आपने बताया था कि उस वक़्त आपके किसी परिचित ने ‘भड़ास’ के नाम का ग़लत इस्तेमाल किया था। क्या इस तरह के वाक़ये भी हुए और आप उनसे कैसे निपटे?

–पहले मुझे लगता था कि ‘भड़ास’ का मतलब यशवंत सिंह होना चाहिए। अब मुझे लगता है कि भड़ास या कोई और शब्द किसी एक का नहीं है, सबका होना चाहिए। इसी कारण ‘भड़ास’ नाम से ढेरों ब्लॉग और पोर्टल बन रहे हैं और यह सब देखकर मुधे ख़ुद पर गर्व होता है कि मैंने एक शब्द को इतनी ताक़त दे दी।

-‘भड़ास’ के पहले और बाद में मीडिया को लेकर आपके नजरिए में कितना और क्या बदलाव आया?

–पहले मीडिया रूपी समुद्र में मैं एक तैराक भर था। अब मीडिया रूपी समुद्र का सर्वेयर हूँ जो तैराकों पर नज़र रखता है और उनके भले-बुरे को समझता-महसूसता है और दुनिया को बताता है। बहुत बदला हूँ अंदर से, यह काम करते हुए। कई बार मैं कन्फ़्यूज़्ड हो जाता हूँ कि सही क्या है और ग़लत क्या है। कई बार मुझे सही कहे जाने वाला व्यक्ति ज़्यादा ख़राब दिखता है, बजाय बुहरा कहे जाने वाले से।

-आपके जीवन का लक्ष्य क्या था और क्या ‘भड़ास4मीडिया’ ने इसे पूरा किया?

–लक्ष्य भी समय-समय पर बदलते रहते हैं पर मेरा एक मक़सद शुरू से रहा है मनुष्यता के लिए किसी बड़े स्तर पर काम आना और काम करना। मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, भगत सिंह जैसे लोग मेरे आदर्श रहे हैं और इसमें दर्शन सिर्फ़ एक है कि मनुष्य को कैसे उसके दुःखों से मुक्ति दिलाई जाए। मुझे लगता है कि अंततः मैं कोई आध्यात्मिक टाइप का जीव हो जाऊँगा जो अपने में मगन रहेगा, गाते-माँगते।

-‘भड़ास’ ने वेब-पत्रकारिता में अपना अलग मुक़ाम बनाया है। कैसा अनुभव है इतने लोकप्रिय पोर्टल का मॉडरेटर और मालिक होने का, जिससे इतने सारे लोग जुड़े हैं और रोज़ देखते-पढ़ते हैं?

–मालिक होने का भाव रोज़ सुख नहीं देता। इस सुख का अहसास तब होता है, जब कराया जाता है। जैसे आपने अभी अहसास कराया है, तो मुझे महसूस हो रहा है कि हाँ, मैं मालिक हूँ। लेकिन सही बात तो यह है कि मैं क्लर्क हूँ जो पूरे दिन लोगों के मेलों का निस्तारण करता रहता है, उनकी सूचनाओं पर काम करता है। इसी ऊर्जा ने ‘भड़ास’ को खड़ा किया और कोशिश करता हूँ कि यही ऊर्जा क़ायम रहे।

-‘भड़ास’ ने अनेक मामले ऐसे उठाए हैं, जो मीडिया हाउसों के मालिकों और प्रबंधकों को पसंद नहीं आए। इन लोगों ने आप पर अनेक मुक़दमे दायर किए हैं। हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि इस वक़्त आप पर कितने मुक़दमे चल रहे हैं; उनकी क्या स्थिति है और ‘भड़ास’ उनसे कैसे निपट रहा है?

–क़रीब एक दर्जन मुकदमे हैं। कई नोटिस हैं। हम लोगों ने भी एक लीगल सेल बना दिया है। जब तक आप ज़िंदा हैं, यह मानकर चलिए कि केस, मुक़दमे, थाना, पुलिस ये सब आपके जीवन के हिस्से हैं। इनसे अगर आप बचे हुए हैं, तो आप बहुत सीमित दुनिया में जी रहे हैं। जो लड़ते हैं, उन्हें हराने के लिए चौतरफ़ा घेराबंदी होती है और सिस्टम का हर अंग-प्रत्यंग उसे भाँति-भाँति से क़ाबू में करने की कोशिश करता है। पर अच्छी बात है कि अगर आप सही हैं तो बहुत देर तक कोई आपको परेशान नहीं कर सकता।

-इतना बड़ा और जटिल पोर्टल चलाना बहुत तनाव भरा काम है। कभी-कभी ये आपके लेखों में भी झलकता है। इतनी मुश्किलें, उलाहने, आलोचना और मुक़दमेबाज़ी से कभी निराशा भी होती होगी। ऐसे हालात में स्वयं को कैसे संभालते हैं और फिर से ऊर्जा और आशा कहाँ से जुटाते हैं?

–दारू पीकर, भजन गाकर। सच बता रहा हूँ। दारू मेरे लिए मुक्ति का माध्यम है। कुछ लोगों के लिए सेक्स होता है, कुछ लोगों के लिए सिर्फ़ संगीत होता है। पर मेरे लिए दारू और संगीत, दोनों मिक्स होकर परम मुक्ति के मार्ग बन जाते हैं और मैं अपने सारे अवसाद, दुःखों, तनावों को इसमें होम कर देता हूँ। किसी के प्रति कोई पाप जो होता है मन में, वो भी इसी अवस्था में तिरोहित हो जाता है।

-यदि ‘भड़ास’ न होता तो आज आप क्या कर रहे होते?

–किसी कंपनी में पत्रकार या मार्केटियर बनकर नौकरी कर रहा होता। बच्चों, पत्नी को जिलाने में अपनी ज़िंदगी होम कर रहा होता।

-अपनी रुचियों (हॉबीज़) के विषय में कुछ बताइए। फ़ुरसत का वक़्त कैसे बिताते हैं?

–इधर तो मेरी एक ही हॉबी है, भड़ास और सिर्फ़ भड़ास। इस कारण ज़्यादातर वक़्त भड़ास के लिए देना पड़ता है। बचे हुए वक़्त में दारू और म्यूज़िक।

-हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि ‘भड़ास’ का कामकाज कैसे चलता है? कितने लोग इस काम में आपका हाथ बँटाते हैं और ख़बरें कैसे जुटाते हैं और कैसे प्रकाशित की जाती हैं?

–ख़बरें जनता भेजती है। मीडिया के लोग भेजते हैं। छह लोगों की टीम है, जिनमें कुछ अंशकालिक और कुछ पूर्णकालिक हैं। अनिल सिंह कंटेंट एडिटर हैं, जो अमूमन ख़बरों के संपादन व प्रकाशन का काम करते हैं। पोर्टल के लिए पैसे वग़ैरह के जुगाड़ में मैं लगा रहता हूँ ताकि सर्वर का खर्चा और हम लोगों रहने-खाने का खर्चा निकलता रहे।

-‘माँ को न्याय’ ‘भड़ास4मीडिया’ का बहुत ही मार्मिक प्रसंग था। आपको क्या लगता है कि हम पत्रकार इतने कमज़ोर क्यों हैं कि अपनी माँ को छोड़िए, ख़ुद तक को इंसाफ़ नहीं दिला पाते?

–जैसा सिस्टम होता है, वैसा ही असर उस समय की जनता पर पड़ता है। मैं तो भाग्यशाली हूँ कि मैंने अपनी माँ के लिए अभियान चलाया। तमाम लोग तो पुलिस के चंगुल में फँसकर आत्महत्या तक कर लेते हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सिस्टम लगातार असंवेदनशील, क्रूर, भ्रष्ट और आपराधिक होता जा रहा है। जनविरोधी सिस्टम में आम जनता को न्याय नहीं मिल पाता। सिर्फ़ ताक़तवर और पैसे वाले लोग ही न्याय ख़रीद कर अपने को सुरक्षित रख पाते हैं। ऐसे माहौल में लगता है कि अब बिना किसी क्रांति से कम पर काम चलने वाला नहीं है। पत्रकार भी तो किसी मीडिया कंपनी में नौकरी करते हैं। अगर मीडिया कंपनी न चाहे, तो भला कौन पत्रकार अपने लिए लड़ पाएगा।

-वर्तमान मीडिया पर कुछ सवाल। मीडिया की वर्तमान स्थिति के बारे में आपकी क्या राय है?

–परंपरागत मीडिया जनता के सुखों-दुःखों से तेज़ी से कट गया है तथा विज्ञापन के लिए सिर्फ़ मेट्रो केंद्रित, शहर केंद्रित है जो बहुत दुःखद है। वर्तमान मीडिया में पेड न्यूज़ का चलन भयंकर रूप से बढ़ा है और इस पर नियंत्रण के लिए चारों ओर से आवाज़ उठने का क्रम शुरू हुआ है।

-आपके विचार मीडिया के क्या दायित्व है और क्या वर्तमान मीडिया अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन कर पा रहा है?

–मीडिया का उद्देश्य समाज को जाग्रत करना है, सही दिशा दिखाना है, वैज्ञानिक सोच पैदा करना है। पर दुःखद है कि कई चैनल व अख़बार समाज को मध्ययुगीन दौर में ले जाने का काम कर रहे हैं।

-हाल ही में राडिया टेप प्रकरण ने मीडिया की छवि को बहुत नुक़्सान पहुँचाया है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

–अब लोग पत्रकारों से पूछने लगे हैं कि आप मीडिया से हैं या राडिया से। यानी मीडिया में ऊपर के स्तर पर दलालों की जो बड़ी फ़ौज तैयार कर दी गई थी, उसके चेहरे का पहली बार ऐसा ख़ुलासा हुआ है। मुनाफ़ा कमाने के लिए मीडिया कंपनियाँ संपादक की नियुक्ति करती हैं और इसी वजह से राडियाएँ उन्हें जूती के नीचे रखने की कोशिश कर रही हैं।

-भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

–बहुत जल्दी मैं संन्यासी बनना चाहता हूँ। वैसे मन से तो मैं संन्यासी बन चुका हूँ, अब तन से भी बनना है। संन्यासी का यहाँ आशय भगवा पहनने और दाढ़ी-मूँछ बढ़ाकर राम-राम करने से नहीं बल्कि लोगों को ख़ुश रखने, लोगों को जागरूक करने, लोगों से इंटरेक्ट करने जैसे स्वांतः सुखाय काम में लगना है। आजकल मैं गाता भी रहता हूँ, कबीर को…”नइहरवा हमका न भावे..” और “मन लागा यार फ़क़ीरी में..”

-“मीडिया साथी डॉट कॉम” की ओर से आपको ढेर सारी शुभकामनाएँ और अपना बहुमूल्य वक़्त देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

–आपका भी बहुत धन्यवाद।

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7 फरवरी के बाद मजीठिया के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकेंगे, भड़ास आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार

जी हां. ये सच है. जो लोग चुप्पी साध कर बैठे हैं वे जान लें कि सात फरवरी के बाद आप मजीठिया के लिए अपने प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाएंगे. सात फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक साल पूरे हो जाएंगे और एक साल के भीतर पीड़ित पक्ष आदेश के अनुपालन को लेकर याचिका दायर कर सकता है. उसके बाद नहीं. इसलिए दोस्तों अब तैयार होइए. भड़ास4मीडिया ने मजीठिया को लेकर आर-पार की लड़ाई के लिए कमर कस ली है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील उमेश शर्मा की सेवाएं भड़ास ने ली है.

( File Photo Umesh Sharma Advocate )

इस अदभुत आर-पार की लड़ाई में मीडियाकर्मी अपनी पहचान छुपाकर और नौकरी करते हुए शामिल हो सकते हैं व मजीठिया का लाभ पा सकते हैं. बस उन्हें करना इतना होगा कि एक अथारिटी लेटर, जिसे भड़ास शीघ्र जारी करने वाला है, पर साइन करके भड़ास के पास भेज देना है. ये अथारिटी लेटर न तो सुप्रीम कोर्ट में जमा होगा और न ही कहीं बाहर किसी को दिया या दिखाया जाएगा. यह भड़ास के वकील उमेश शर्मा के पास गोपनीय रूप से सुरक्षित रहेगा. इस अथारिटी लेटर से होगा यह कि भड़ास के यशवंत सिंह आपके बिहाफ पर आपकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ सकेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में आपका नाम कहीं न खुलेगा न कोई जान सकेगा. दूसरी बात. जो लोग अपने नाम पहचान के साथ लड़ना चाहते हैं, उससे अच्छा कोई विकल्प नहीं है. उनका तहे दिल से स्वागत है. ऐसे ही मजबूत इरादे वाले साथियों के साथ मिलकर भड़ास मजीठिया की आखिरी और निर्णायक जंग सुप्रीम कोर्ट में मीडिया हाउसों से लड़ेगा.

बतौर फीस, हर एक को सिर्फ छह हजार रुपये शुरुआती फीस के रूप में वकील उमेश शर्मा के एकाउंट में जमा कराने होंगे. बाकी पैसे जंग जीतने के बाद आपकी इच्छा पर निर्भर होगा कि आप चाहें भड़ास को डोनेशन के रूप में दें या न दें और वकील को उनकी शेष बकाया फीस के रूप में दें या न दें. यह वैकल्पिक होगा. लेकिन शुरुआती छह हजार रुपये इसलिए अनिवार्य है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई लड़ाई लड़ने के लिए लाखों रुपये लगते हैं, लेकिन एक सामूहिक लड़ाई के लिए मात्र छह छह हजार रुपये लिए जा रहे हैं और छह हजार रुपये के अतिरिक्त कोई पैसा कभी नहीं मांगा जाएगा. हां, जीत जाने पर आप जो चाहें दे सकते हैं, यह आप पर निर्भर है. बाकी बातें शीघ्र लिखी जाएगी.

आपको अभी बस इतना करना है कि अपना नाम, अपना पद, अपने अखबार का नाम, अपना एड्रेस, अपना मोबाइल नंबर और लड़ाई का फार्मेट (नाम पहचान के साथ खुलकर लड़ेंगे या नाम पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ेंगे) लिखकर मेरे निजी मेल आईडी yashwant@bhadas4media.com पर भेज दें ताकि यह पता लग सके कि कुल कितने लोग लड़ना चाहते हैं. यह काम 15 जनवरी तक होगा. पंद्रह जनवरी के बाद आए मेल पर विचार नहीं किया जाएगा. इसके बाद सभी से अथारिटी लेटर मंगाया जाएगा. जो लोग पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर भेजना पड़ेगा. जो लोग पहचान उजागर कर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर देने की जरूरत नहीं है. उन्हें केवल याचिका फाइल करते समय उस पर हस्ताक्षर करने आना होगा.

हम लोगों की कोशिश है कि 15 जनवरी को संबंधित संस्थानों के प्रबंधन को सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा की तरफ से लीगल नोटिस भेजा जाए कि आपके संस्थान के ढेर सारे लोगों (किसी का भी नाम नहीं दिया जाएगा) को मजीठिया नहीं मिला है और उन लोगों ने संपर्क किया है सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए. हफ्ते भर में जिन-जिन लोगों को मजीठिया नहीं मिला है, उन्हें मजीठिया के हिसाब से वेतनमान देने की सूचना दें अन्यथा वे सब लोग सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने को मजबूर होंगे.

हफ्ते भर बाद यानि एक या दो फरवरी को उन संस्थानों के खिलाफ याचिका दायर कर दी जाएगी, सुप्रीम कोर्ट से इस अनुरोध के साथ कि संबंधित संस्थानों को लीगल नोटिस भेजकर मजीठिया देने को कहा गया लेकिन उन्होंने नहीं दिया इसलिए मजबूरन कोर्ट की शरण में उसके आदेश का पालन न हो पाने के चलते आना पड़ा है.

और, फिर ये लड़ाई चल पड़ेगी. चूंकि कई साथी लोग सुप्रीम कोर्ट में जाकर जीत चुके हैं, इसलिए इस लड़ाई में हारने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

मुझसे निजी तौर पर दर्जनों पत्रकारों, गैर-पत्रकारों ने मजीठिया की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ने के तरीके के बारे में पूछा. इतने सारे सवालों, जिज्ञासाओं, उत्सुकताओं के कारण मुझे मजबूरन सीनियर एडवोकेट उमेश शर्मा जी से मिलना पड़ा और लड़ाई के एक सामूहिक तरीके के बारे में सोचना पड़ा. अंततः लंबे विचार विमर्श के बाद ये रास्ता निकला है, जिसमें आपको न अपना शहर छोड़ना पड़ेगा और न आपको कोई वकील करना होगा, और न ही आपको वकील के फीस के रूप में लाखों रुपये देना पड़ेगा. सारा काम आपके घर बैठे बैठे सिर्फ छह हजार रुपये में हो जाएगा, वह भी पहचान छिपाकर, अगर आप चाहेंगे तो.

दोस्तों, मैं कतई नहीं कहूंगा कि भड़ास पर यकीन करिए. हम लोगों ने जेल जाकर और मुकदमे झेलकर भी भड़ास चलाते रहने की जिद पालकर यह साबित कर दिया है कि भड़ास टूट सकता है, झुक नहीं सकता है. ऐसा कोई प्रबंधन नहीं है जिसके खिलाफ खबर होने पर हम लोगों ने भड़ास पर प्रकाशित न किया हो. ऐसे दौर में जब ट्रेड यूनियन और मीडिया संगठन दलाली के औजार बन चुके हों, भड़ास को मजबूर पत्रकारों के वेतनमान की आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए एक सरल फार्मेट लेकर सामने आना पड़ा है. आप लोग एडवोकेट उमेश शर्मा पर आंख बंद कर भरोसा करिए. उमेश शर्मा जांचे परखे वकील हैं और बेहद भरोसेमंद हैं. मीडिया और ट्रेड यूनियन के दर्जनों मामले लड़ चुके हैं और जीत चुके हैं.

दुनिया की हर बड़ी लड़ाई भरोसे पर लड़ी गई है. ये लड़ाई भी भड़ास के तेवर और आपके भरोसे की अग्निपरीक्षा है. हम जीतेंगे, हमें ये यकीन है.

आप के सवालों और सुझावों का स्वागत है.

यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया
+91 9999330099
+91 9999966466
yashwant@bhadas4media.com


मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा द्वारा लिखित और भड़ास पर प्रकाशित एक पुराना आर्टकिल यूं है…

Majithia Wage Board Recommendations : legal issues and remedies

 

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”P7 में आपका दुबारा स्वागत है…” लेकिन ध्यान से, कहीं फंस मत जइहो भइये

पी7 यानि पीएसीएल उर्फ पर्ल्स ग्रुप का न्यूज चैनल.  लगातार फ्रॉड करते रहने वाले इस ग्रुप के चैनल का अंत भी फ्रॉडगिरी करके हुआ, सैकड़ों मीडियाकर्मियों की तनख्वाह मार के. लेकिन मीडियाकर्मी लड़े और जीते. लेकिन पर्ल्स ग्रुप ने पैंतरा मारते हुए फिर नया खेल किया है. सूत्रों के मुताबिक चैनल को कांग्रेस के नेता जगदीश शर्मा ने खरीद लिया है. इसे देखते हुए पर्ल्स ग्रुप का नया पैतरा ये है कि कर्मचारियों के फुल एंड फाईनल सेटेलमेंट से ठीक पहले पी7 मैनेजमेंट ने अपने आफिस के गेट पर लुभावने आफर वाला एक नोटिस चस्पा कर दिया है.

इस नोटिस में साफ तौर से कहा गया हैं कि जो भी कर्मचारी चैनल के पुन: शुरू होने की स्थिति में काम करना चाहता है, उसका स्वागत है. मतलब शिकारी तलाश में है कि शिकार दाना देखते ही जाल में फंस जाये. जी हाँ 15 जनवरी तक पी7 मैनेजमेंट को समस्त कर्मचारियों को उनका फुल एंड फाइनल सेटेलमेंट देना है, इसलिए मैनजमेंट ने अपने वफादारों के लिए रास्ते खोल दिए हैं यानी जो मैनेजमेंट के साथ है, उसका स्वागत है क्योंकि अगर जो भी कर्मचारी चैनल के साथ दुबारा जुड़े, उनको मैनेजमेंट को सेटेलमेंट का पैसा नहीं देना पड़ेगा.

इस पत्र की एक कॉपी सिटी मजिस्ट्रेट को भी दे दिया गया है. कर्मचारियों के बीच इस बात की चर्चा है कि जो नोटिस गेट पर चस्पा कर दिया गया है उससे साफ़ पता चलता है कि मैनजमेंट कर्मचारियों को सिर्फ प्रलोभन दे रहा है. वो भी दुबारा नौकरी देने के नाम पर. इस नोटिस में न ही मैनेजमेंट के किसी निदेशक के हस्ताक्षर हैं और न ही मैनेजमेंट के किसी अधिकारी का नाम. आखिर किसके द्वारा ये नोटिस निकलवाया और चिपकवाया गया है. नोटिस के नीचे सिर्फ प्रबंधन लिखा हुआ है. कल को अगर ये प्रलोभन वाकई प्रलोभन निकला तो कर्मचारी किसकी गर्दन पकड़ेगा. इसी से बचने के लिए नोटिस में किसी का नाम नहीं लिखा गया है. इससे साबित होता है कि यह सब कुछ ललचाने और सेटलमेंट का पैसा न देने की नई रणनीति का हिस्सा है. कर्मचारी अभी भी अपनी मांगों को लेकर मैनेजमेंट से लड़ाई लड़ रहे है. हालाँकि चैनल अपने पक्ष में कुछ हद तक अपने कुछ चम्पुओं और वफादारों को लाने में सफल साबित हुआ है. मज़ेदार बात ये है इसमें ज़्यादातर ऐसे लोग हैं जिन्होंने इस चैनल में पिछले छह सालों में मोटी तनख्वाह उठाई है और अय्याशी की है. पी7 न्यूज के आफिस पर चस्पा नोटिस की एक कॉपी भड़ास के पास है जिसे उपर प्रकाशित किया गया है. तो भइये, फंसना मत, अबकी सटे तो गए. कोई आंसू पोछने वाला भी नहीं मिलेगा.

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मजीठिया की लड़ाई : श्रम विभाग अवैध कमाई का सबसे बड़ा जरिया, सीधे कोर्ट जाएं

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मजीठिया न देना दैनिक भास्कर, जागरण के मालिकों के लिए गले का फंस बन सकता है। इन दोनों अखबारों के मालिक अपने अपने अखबारों के कारण ही खुद को देश का मसीहा समझते हैं। देश का कानून ये तोड़ मरोड़ देते हैं। प्रदेश व देश की सरकारें इनके आगे जी हजूरी करती हैं। लेकिन अब देखना होगा कि अखबार का दम इनका कब तक रक्षा कवच बना रहता है क्योंकि जनवरी में मानहानि के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। कारपोरेट को मानहानि के मामले में सिर्फ जेल होती है। अब देखना होगा कि सहाराश्री के समान क्या अग्रवाल व गुप्ता श्री का भी हाल होता है या फिर मोदी सरकार अखबार वालों को कानून से खेलने की छूट देकर चुप्पी साध लेती है। मोदी सरकार पत्रकारों को मजीठिया दिलवाने के मामले में बेहद कमजोर सरकार साबित हुई है। मालिकों को सिर्फ नोटिस दिलवाने से आगे कुछ नहीं कर पाई।

आश्चर्य तो तब होता है जब श्रम विभाग वाले अखबारों को मजीठिया वेज बोर्ड देने की नोटिस भेजता है तो अखबार प्रबंधन दो टूक लिखकर दे देता है कि यहां सभी को मजीठिया दिया जा रहा है, जो शिकायतें मिल रही हैं, वो झूठी हैं। श्रम विभाग इसके बाद समाचार पत्र संस्थानों से दोबारा यह पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाता कि किनको किनको मजीठिया मिल रहा है, कृप्या उनके नाम और एकांउट नंबर दें। पिछले माह किसे कितना मिला, किसका क्या पद था, ये बताएं। ये सब श्रम विभाग वाले नहीं पूछते। कई बार श्रम विभाग वाले पूछते कुछ हैं और जवाब कुछ और मिलता है। उधर, समाचार पत्र के मालिक यह भी कह देते है कि यहां कोई मजीठिया वेतनमान लेना ही नहीं चाहता। कल को ये लोग लिखकर दे देंगे कि उनके यहां कोई पत्रकार सेलरी ही नहीं लेना चाहता। मजदूर मजदूरी के लिए ही काम करता है। पर ये मालिक ऐसे ऐसे कुतर्क गढ़ देते हैं कि हंसी आती है। श्रम विभाग को इनके खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए।

दरअसल श्रम विभाग अवैध कमाई का सबसे बड़ा जरिया है। कोई भी निजी संस्थान श्रम कानूनों का पूरी तरह पालन नहीं कर पाता। इसलिए हर महीने इनका बड़ी कंपनियां, छोटी कंपनियां और दुकानों से वसूली बंधी होती है। इस वसूली पर प्रेस की नजर ना पड़े, इसलिए उनसे दूरी बनाकर रखते हैं। एक कपड़े के व्यापारी ने बताया कि लेबर इंस्पेक्टर पहली बार आया तो 50 गलती निकाला। जैसे किस दिन संस्थान बंद रहता है, दीवाल पर यह नहीं लिखा है। 14 साल से कम वाले बाल मजदूर संस्थान में एक भी नहीं है, इसकी घोषणा नहीं है। दीवार का रंग अलग नहीं है, श्रमिकों का रजिस्टर मेंटेन नहीं है आदि-आदि। अंत में बात यह तय हुई कि हर तीन महीने में एक-एक हजार आकर लेते जाना और कुछ मत पूछना, ना ही केस कोर्ट में लगाना। बस यही हाल हर संस्थान में है। और श्रम विभाग में यह पैसा नीचे से लेकर ऊपर तक बंटता है इसलिए शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं करता। नौकरी से निकालने की कोई शिकायत लेबर आफिस में किया तो शिकायतकर्ता की परेशानी और आफिस की बल्ले-बल्ले होती है। शिकायत के बाद अधिकारी कंपनी के महाप्रबंधक को फोन लगाकर इस बात की बोली लगाता है कि आप पैसा दे दो, मैं शिकायत को ठंडे बस्ते में डाल दूंगा या हल्का केस बनाऊंगा। फिर पेशी पर पेशी। अंत में श्रमिक नहीं माना तो बोल देते हैं कि हमने शासन को भेज दिया है। अब ऊपर स्तर से निर्णय होगा कि कोर्ट लगाएंगे या कुछ और करेंगे। इसलिए बेहतर होता है कि हर विवाद स्वयं कोर्ट में जाकर लड़ें। महज कुछ पैसों के चक्कर में लेबर आफिस के भ्रष्ट अधिकारी जिंदगी भर चक्कर लगवा देते हैं। हां वेतन भुगतान के मामले में जल्द कार्यवाही जरूर करते है। वह भी पैसा वसूली के कारण।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. पत्र लेखक ने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है.

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जनसंदेश टाइम्‍स कर्मियों के उत्‍पीड़न मामले में मानवाधिकार आयोग ने दिया कार्रवाई का निर्देश

बनारस में जनसंदेश टाइम्‍स कर्मियों को वेतन नहीं दिये जाने और उत्‍पीड़न के मामले में राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक महत्‍वपूर्ण निर्देश देते हुए संबंधित अथार्टी (प्रशासन) को कड़ी कार्रवाई कर रिपोर्ट देने को कहा है। प्रशासन को कृत कार्रवाई की सूचना शिकायतकर्ता को भी देने का निर्देश जारी किया गया है। महीनों से वेतन नहीं देने और उसके लिए आवाज उठाने पर प्रबंधन द्वारा प्रताडि़त किये जाने के संबंध में मिली शिकायत (172302/सीआर/2014) को गंभीरता से लेते हुए एक दिसंबर को राष्‍टृीय मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी आदेश में प्रशासन को इस संबंध में आठ सप्‍ताह के अंदर कार्रवाई कर रिपोर्ट देनी है।

यह जनसंदेश कर्मियों की बहुत बड़ी जीत के रूप में देखी जा रही है। किसी समाचार पत्र संस्‍थान में कर्मचारियों के उत्‍पीड़न मामले को लेकर किसी संवै‍धानिक संस्‍था द्वारा इतना त्‍वरित निर्णय लेने का संभवत: यह पहला मामला है। इस मामले में केन्‍द्रीय श्रम मंत्रालय भी राज्‍य के प्रमुख सचिव श्रम को कर्मचारियों को न्‍याय दिलाने के लिए कार्रवाई कर रिपोर्ट देने का निर्देश दे चुका है। गौरतलब है कि जनसंदेश टाइम्‍स प्रबंधन इस समय हिटलरशाही पर उतर गया है। कर्मचारियों को कई महीनों से तनख्‍वाह नहीं दी गयी है। पीएफ का पैसा भी मार्च के बाद नहीं जमा किया गया है। इसके बावजूद कर्मचारियों पर रौब गांठी जा रही है। यदि किसी ने वेतन मांगने की भूल कर दी तो अगले दिन उसे बिना बकाया अदा किये बाहर होने का फरमान सुना दिया जा रहा है। अखबार में न कोई नियम है और न कोई कानून। दर्जनों कर्मी पूर्व में कोई सूचना दिये बिना काम से रोक दिये गये। उनका कई माह का बकाया वेतन भी नहीं दिया गया। अब वे अपने बकाये वेतन के लिए रोज आफिस की दौड़ लगा रहे हैं, लेकिन उनसे कोई सीधे मुंह बात तक नहीं कर रहा है। तीन नवंबर को रोहनियां स्थित प्रेस अचानक बंद कर दिया गया। दर्जनों गरीब कर्मी एक झटके में सड़क पर आ गये। अब वे कर्मी न्‍याय के लिए श्रम कार्यालय का चक्‍कर लगा रहे हैं।

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