पत्रकार राहुल जैमन समेत कई मीडियाकर्मियों की सेलरी दाबे बैठा है जयपुर का ‘खास खबर’

पत्रकार राहुल जैमन ने सूचित किया है कि वे 9 महीने पहले तक खास खबर, लाजपत मार्ग, सी स्कीम, जयपुर में एक कंटेंट राइटर के तौर पर काम करते थे। उन्होंने 1 मई, 2016 को ज्वॉइन किया था। जनवरी, 2017 से आफिस में करीब-करीब सभी कर्मचारियों को सैलेरी के लिए परेशानी आने लगी। Continue reading

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‘प्रतिनिधि’ न्यूज चैनल में सेलरी के लिए बवाल, एडिटर इन चीफ घिरे, पुलिस आई (देखें वीडियो)

‘प्रतिनिधि’ न्यूज चैनल वैसे तो दिन भर उपदेश देता रहता है, नैतिकता पिलाता रहता है, सिस्टम ठीक करने के लिए कमर कसे दिखता रहता है लेकिन बात जब खुद के चैनल के भीतर शोषण की आती है तो यहां भी हाल बाकियों जैसा ही दिखता है. खबर है कि इस चैनल के इंप्लाई कई महीने से बिना सेलरी काम कर रहे हैं. एक रोज उनका धैर्य जवाब दे गया. कहा जा रहा है कि चैनल के एडिटर इन चीफ जब बिना सैलरी दिए सामान लेकर जा रहे थे तो कर्मचारियों ने उन्हें रोक लिया और खुद के बकाया पैसे की बात की.

इस पर एडिटर इन चीफ आलोक कुमार सेलरी दिलाने की बजाए कर्मियों से ही उलझने लगे. जब बात पुलिस तक पहुँची तो कर्मचारियों को 15 फरवरी का चेक दिया गया है. बताया जा रहा है कि यहां ऐसे भी कई इंप्लाई हैं जो एक साल से अपनी सेलरी का इंतज़ार कर रहे हैं. चैनल के कर्मियों ने साफ कह दिया है कि उन्हें उनका बकाया वेतन दे दिया जाए. वे इस माहौल में काम करने को अब बिलकुल इच्छुक नहीं हैं. नीचे तीन वीडियो दिए जा रहे हैं. ये वीडियो ही चैनल की वर्तमान स्थिति के गवाह हैं. देखें नीचे दिए तीनों वीडियो…

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रिपोर्टरों का पैसा खा गया यह चैनल!

सेवा में,
सम्मानित चैनल हेड / सीनियर्स / रिपोर्ट्स / स्टाफ
नेशनल वायस चैनल

आप और हम लोगों ने नेशनल वायस न्यूज़ चैनल को बड़ी मेहनत से आगे बढ़ाया और कम समय में मेहनत के बलबूते पर आगे तक लेकर गए और उस मेहनत की मलाई किसी ओर को समर्पित की गई। हमने दिन रात मेहनत कर लगभग दो साल तक चैनल को अपने खून पसीने से सींचा मगर हमारे सीनियर्स, चैनल के उच्चाधिकारियों ने हमारी मेहनत की मलाई खूब अच्छे से खाया और अपना पेट भरा। साथ ही उनका भी भरा जो उनके चाटुकार थे। मैंने अपनी मेहनत से चैनल को खूब काम करके दिया। खुद भूखा रहा। मगर चैनल को भूखा नहीं रहने दिया। उसका पेट भरता रहा। अपने करियर को देखते हुए घर में झूठा दिलासा देता रहा कि मैं एक अच्छे चैनल में काम कर रहा हूँ। मुझे अच्छा मेहनताना मिलता है। दिल टूट गया जब मेरे पिताजी ने एक दिन कहा कि अपनी कमाई से कुछ घर भी लेकर आया कर। मगर उन्हें कहाँ पता था कि मेरी मेहनत की कमाई तो चैनल के बड़े लोगों में बंट रही है।

सभी को यह बता दूं मुझे पत्रकारिता में लंबा समय हो गया है। मगर मैंने कभी चैनल के नाम पर दलाली नहीं की। मैंने मेहनत की और मेहनताना के नाम पर कुछ नहीं मिला। चैनल के उच्च साथियों से पता चलता कि हमें अगले माह से वेतन दिया जाएगा। मैं दुबारा काम शुरू कर देता। मगर आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। ईमानदारी का बड़ा अच्छा फल मिला। उसके लिए आप सभी का तहे दिल से धन्यवाद। उच्च अधिकारियों द्वारा लुभावने लड्डू जो दिए जाते रहे, उनका भी धन्यवाद। आप लोगों को मान गए कि आप लोग मैनेज करने में एक्सपर्ट हैं। मेरी अन्य सभी साथियों के लिए एक सलाह। आप लोगों को भी लुभावने वादे किये जा रहे हैं मगर वह पूरे नहीं होने वाले। बाकी क्या कहूं। सभी तो विद्वतजनों में गिने जाते हैं।

बड़े बुजुर्ग कह कर गये है कि जो गरीब की मेहनत को कुचलता है तो उसका जरूर बुरा होता है। मगर मैं यह नहीं चाहूंगा। मैं तो यह चाहूंगा कि आप लोगों का चैनल दिन रात तरक्की करे। सिर्फ इस बात से डरता हूँ चैनल को किसी मेहनती व्यक्ति की दिल से हाय न लग जाये क्योंकि जिसने मेहनत की होगी वह व्यक्ति चैनल के लिए की गयी मेहनत पर जरूर रोया होगा। दुःख तो इस बात का होता है जब चैनल का वरिष्ठ अधिकारी ये बात बताने पर जवाब देता है कि चैनल किसी रिपोर्टर से पूछ कर काम नहीं करता। बाद में वह अपने ही रिपोर्टर को कहता है कि आपको बात करने की तमीज नहीं। वैसे चैनल की दुकान चला रहे उस व्यक्ति को बता दूं, धंधे की इज्जत करना सीखो, साथ ही उनकी भी जो लोग आपकी दुकान चलाने में आपका सहयोग दे रहे हैं। हर आदमी बिकाऊ नहीं होता।

आप लोगों के साथ काम करने का मौका मिला उसके लिए आप सभी का धन्यवाद. और एक जरुरी बात… जितने भी लोग यह सोचते है की आपका ये चैनल ETV चैनल को टक्कर दे रहा है या देगा तो वह सरासर गलतफहमी में जी रहा है। अपने दिल से पूछें कि चैनल उस नेटवर्क के बराबर है या नहीं। यह चैनल कभी एक जगह पर नहीं टिक सकता। इसका उदाहरण यह खुद ही देता रहा है। कभी नोएडा तो कभी लखनऊ। सोचनीय विषय यह जो खुद ही एक जगह पर टिका नहीं हो वह दूसरे को कैसे टिका पायेगा। हो सके तो चैनल जो वायदे किये थे, जो बिल मंगवाए थे, उन्हें पूरा करे। भगवान न करे कि कोई मेहनत का मेहनताना न मिलने पर भूखा सोये। 

धन्यवाद
कुलदीप थपलियाल
thapliyalkuldeep312@gmail.com

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नेशनल वॉइस न्यूज़ चैनल पर टिहरी रिपोर्टर का 43800 रुपये बकाया!

उत्तराखंड के जनपद टिहरी गढ़वाल के नेशनल वॉइस के रिपोर्टर को नहीं मिला सितम्बर 2016 से स्टोरी का कोई भी पैसा… सितम्बर 2016 से जून 2017 तक 43800 रुपये बकाया… काफी समय से नेशनल वॉइस के bureau chief प्रखर प्रकाश मिश्रा के आश्वासन के बाद भी उत्तराखंड के सभी रिपोर्टर नेशनल वौइस चैनल में कार्य करते रहे… लेकिन कुछ समय पहले bureau chief प्रखर प्रकाश मिश्रा जी को उनके पद से हटा दिया गया है…

नये bureau chief सुरेंद्र जी अब सभी रिपोर्टरों को आश्वासन दे रहे हैं कि अब से सभी का पैसे टाइम पर मिलेगा.. पुराने पैसे की चैनल के नए मालिक से बात चल रही है.. उत्तराखंड में नेशनल वॉइस न्यूज़ चैनल नये रिपोर्टरो को रखने की कोशिशों में लगा हुआ है, जिससे पुराना पैसा देने से बचा जा सके… क्या इसी तरह नेशनल वॉइस न्यूज़ चैनल के द्वारा नये रिपोर्टरो को भी उल्लू बनाया जाएगा!

अंकित
टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड)   
9720470064
ankitmittalsml@gmail.com

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गुटका किंग के अखबार में 7 अगस्त तक सेलरी न मिलने का क्या है राज?

खबर आ रही है कि इंदौर में सबसे अधिक धनी अपने आपको मानने वाले एक अखबार दबंग दुनिया में 7 अगस्त तक कर्मचारियों को सेलरी नसीब नहीं हुई है। यानी 1 या 2 तारीख को वेतन देने वाले इस लखपति अखबार में इतने दिनों तक कर्मचारियों को वेतन नहीं मिलने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। वैसे रक्षाबंधन पर्व पर कर्मचारियों के हाथों में वेतन नहीं आने से कई मायूस दिखाई दिए। इधर ईमेल से मिली खबरों के अनुसार यह बात सामने आ रही है कि अखबार में इनकम टैक्स का डंडा चला है इस कारण 7 अगस्त तक कर्मचारियों के अकाउंट में वेतन नहीं पहुंचा है।

सूत्र बताते हैं कि संध्या दैनिक अखबार खोलने की घोषणा के बाद कई अखबार मालिकों ने खुलकर इनकम टैक्स का डंडा किया है, जिससे पिछले तीन दिनों से इनकम टैक्स की कार्रवाई चल रही है इस कारण कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया गया है। वैसे सत्य क्या है यह तो वे  ही जाने, लेकिन सूत्रों के हवाले से तो यही खबर आ रही है।

20 प्रतिशत कटौती का डंडा

सूत्र बताते हैं कि इस लखपति अखबार में 7 अगस्त तक वेतन तो नहीं दिया है ऊपर यह घोषणा कर दी है कि इंदौर सहित सभी जगह से प्रकाशित अखबार के कर्मचारियों के वेतन में 20 प्रतिशत की कटौती की जाएगी। सूत्र बताते हैं कि इसी कारण अब तक वेतन नहीं दिया गया है। वैसे इस 20 प्रतिशत कटौती को मजीठिया से भी जोड़कर देखा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि 20 प्रतिशत कटौती उन कर्मचारियों की गई है, जिन्हें आधे पैसे बैंक अकाउंट से और आधे बाउचर से दिए जाते हैं। इसके बाद सितम्बर में मजीठिया लागू करने की घोषणा कर दी जाएगी। वैसे अभी तक किसी भी कर्मचारी का वेतन बैंक में जमा नहीं होने से सभी के दिल की धड़कन बंद हो चुकी है।

नहीं हुआ 15 अगस्त को लांच

पहले यह घोषणा की जा रही थी कि 15 अगस्त को सांध्य दैनिक लांच किया जाएगा। लेकिन यह घोषणा हवा में उड़ गई। सूत्र बताते हैं कि फिलहाल जो अखबार निकल रहा है उसमें ही करीब 20 रिपोर्टर, सब एडिटर और ऑपरेटरों की आवश्यकता है। फोन लगाने के बावजूद कर्मचारी नहीं मिल रहे हैं, जो जा रहे हैं उन्हें विरोधी सीधे हकाल देते हैं। यानी अपने ही दुश्मन बनकर थाली में छेद करने के लिए लगे हैं। और इस पर 20 प्रतिशत की कटौती ने एक और नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। अब राय देने वालों का क्या वह तो मालिक को राय देते रहते हैं, लेकिन मालिक ऐसे चमचों की राय लेकर ऐसे निर्णय करें तो उसे क्या  कहेंगे।जो कुछ भी हो आगे क्या होगा इसका इंतजार करें।

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इंडिया वॉयस चैनल और जनसंदेश अखबार में सेलरी नहीं मिल रही

इंडिया वॉयस न्यूज चैनल में, जो यूपी और उत्तराखंड की खबरें प्रसारित करता है,  पिछले 2 महीने से ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारियों की सेलरी नहीं मिली है. हालात ये हैं कि कर्मचारियों के पास घर का किराया देने तक के पैसे नहीं है… यहां तक की 2017 विधानसभा चुनाव के बाद कई स्टॉफ को बाहर का रास्ता दिखाया गया, उनकी भी सेलरी अभी तक नहीं दी गई है…

उधर, जन संदेश कार्यालय सोनभद्र में तीन माह से वेतन न मिलने के चलते कर्मचारियों के समक्ष भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई है। 7 अगस्त को रक्षाांधन पर्व होने के बाद भी वेतन न मिलने से कार्य करने वाले कर्मचारियों में मायूसी देखी जा रही है। ब्यूरो चीफ राहुल श्रीवास्तव महीने में शायद एकाध बार ही आफिस आते हैं। पैसा मांगने पर अपशदों का प्रयोग किया जाता है। आफिस के सहारे रहने वाले कर्मचारी किस तरह से काम करें, यह उनको समझ में नहीं आ रहा है। बनारस आफिस से भी कर्मचारियों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

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न्यूज नेशन के मालिकों-प्रबंधकों! अप्रेजल फार्म तो पहले ही भरवा लिए, बढ़ी हुई सेलरी कब तक दोगे?

न्यूज नेशन की चिंदी चोरी… एक तरफ तो पत्रकार दुनिया में हो रहे अन्याय की आवाज उठाते हैं वहीं दूसरी ओर खुद पर हो रहे अन्याय को चुपचाप सह लेते हैं। इसके उदाहरण तो कई हैं मगर आज यह बात मीडिया के एक बहुत बड़े संस्थान से जुड़ी है। बात हो रही है न्यूज़ नेशन न्यूज़ चैनल की। प्रबंधन के 2 चैनल (न्यूज नेशन, न्यूजस्टेट) हैं। न्यूज नेशन टॉप 5 का चैनल है और न्यूज स्टेट यूपी-उत्तराखंड में काफी समय से पहले पायदान पर काबिज है। साथ ही तीसरे चैनल (न्यूजस्टेट MP-CG) की तैयारियां भी जोरों पर हैं। इससे साफ है कि संस्थान के पास पैसों की कमी नहीं है।

मगर फिर भी न्यूज नेशन लगातार 3 महीने से अपने कर्मचारियों का अप्रेजल करने से कतरा रहा है। मई के आखिर में अप्रेजल फॉर्म भरवाने को बाद 3 बार तनख्वाह आई लेकिन बस तनख्वाह अकेले ही आई, संग में अप्रेजल नहीं लाई। संस्थान में कुछ कर्मचारी अब भी आस लगाए बैठे हैं कि शायद अगले महीने अच्छे दिन आ जाएं। कुछ का अप्रेजल से भरोसा उठ चुका है।

कुछ मानते हैं कि मुख्य लोग जिन्हें मालिकान लोग अप्रेजल देना चाहते थे और जो उनके खास थे, उन्हें दे चुके हैं। कुछ का यह भी कहना है कि संस्थान से लोग छोड़ रहे हैं इसलिए भी अप्रेजल नहीं किया जा रहा है। वजह चाहे जो हो, इन सबके बीच पिसने वाला वही पत्रकार है जो जुर्म और अन्याय की आवाज बनता है, जो दूसरों के लिए कैमरा उठा जान पर खेल कर रिपोर्टिंग करता है, वही पत्रकार असहाय होकर सब कुछ चुपचाप झेलता है और किसी से कुछ बिना कहे काम करता रहता है।

संस्थान से पूछना चाहूंगा कि जब चैनल की पैसे देने की ताकत नहीं थी तो उसने अप्रेजल फॉर्म ही क्यों दिए। अगर संस्थान के पास पैसों की कमी है तो तीसरा चैनल लाने के बजाय कर्मचारियों को उनका पैसा ही दे देते। अगर अप्रेजल ना करना हो तो इस बात को साफ सरल और सीधे शब्दों में कर्मचारियों को मेल या किसी दूसरे तरीके से बता दिया जाय ताकि कोई भी इसकी उम्मीद मन में ना पाले।

न्यूज नेशन के एक कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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‘चक दे’ में काम कराते हैं लेकिन सेलरी नहीं देते

मेरा नाम रणजीत कौर है और मैंने ‘चक दे’ में 8 जून 2016 को ज्वाइन किया था, बतौर न्यूज़ एंकर इन पंजाबी. स्टार्टिंग में बड़ी बड़ी बातें की गयी थीं. पर था कुछ नहीं. नाईट ड्यूटी थी और सिक्योरिटी के नाम पर कुछ नहीं था. एक छोटी सी बिल्डिंग में इसका ऑफिस है, फरीदाबाद में. वहीं कॉल सेंटर चलते हैं. वहीं न्यूज़ चैनल भी है. इस चैनल का मालिक एनआरआई है.

यहां गणेश नायर है जो सुब कुछ देखते हैं. नाईट में जो लड़कियां रहती हैं उनकी सेफ्टी के लिये कुछ भी नहीं है. गणेश नायर अपने नीचे काम करने वालों का शोषण करते हैं. कहने को तो ये चैनल बताते हैं लेकिन इनके पास कोई लाइसेंस नहीं है चैनल चलाने का. ये दरअसल वेब न्यूज़ चैनल चलाते हैं. यहां पर लड़कियों को बिना कारण परेशान किया जाता है. जिसे भी इम्प्लॉयी को रखा जाता है उसे एक या दो महीने काम कराके बिना सेलरी के ही वापस भेज दिया जाता है.

मैंने नाईट शिफ्ट की है जिससे मेरी हेल्थ तो खराब हुई ही, साथ में मैं फाइनेंशली भी काफी वीक हुई. गणेश नायर फालतू की बातें करता था. वह लुभावनी बातें करके शोषण करने के मौके ढूंढत था. मेरे अलावा बहुत से लोग हैं जिनकी सेलरी उसने नहीं दी. साथ में मेंटली परेशान किया वह अलग से. बात मेरे लिए पैसों का नहीं है. ऐसे काम बंद होने चाहिए जहां काम करने वालों का हर तरह से शोषण किया जाता है. मैं नहीं चाहती मेरे बाद कोई दूसरा बंदा इस चैनल के झांसे में फंसे और अपना वक्त, पैसा बर्बाद करे.

रणजीत कौर
jesikajesus84@gmail.com

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Re-open the case against Dr. B. N. Goswami and Chabi Bardhan

atrocity, conspiracy, harassment, robbery of my salary… Misuse of government property and Power

To,
The Commissioner of Police,
Near Pune Station, Pune 411001

Subject: Re-open the case against Dr. B. N. Goswami (retired director of IITM, Pune) and Chabi Bardhan for atrocity, conspiracy, harassment, robbery of my salary, Misuse of government property and Power

Respected sir,

Herewith I request for arrest of Dr. B. N. Goswami and Chabi Bardhan for atrocity, conspiracy, harassment, robbery of my salary, Misuse of government property and Power. Kindly note that, I file the Atrocity case agaist Dr. B. N. Goswami (retired director of IITM, Pune) on 26/09/2013 at Chaturshrungi Police Thane (Mr. R. G. Devrukhkar, Police Hawaldar 4776 received it). On 22/10/2013 Sahayak V Police Nirikshak Shir V. R. Gaud took Jabab.

But Dr. B. N. Goswami and Chabi Bardhan pressurize IITM employees threating them that they will not give promotions; terminate them with false allegations similar to me. Hence submitted forceful sign collected paper to misguide police.

Dr. B. N. Goswami and Ms. Chabi Bardhan started blackmailing and threatening people saying that Dr. Shailesh Nayak is in Director’s pocket and even PMO office will not touch Dr. B. N. Goswami. Ms. Chabi Bardhan also tell people that each Governing council member including chairman and MoES Secretary get their Share (Money) so no one can do anything against them.  And Dr. B. N. Goswami says that he has ample of Government money and Gold that they can even Purchase Hon’ble Supreme Court of India with Government money.

Herewith I request for the inquiry regarding following persons and reasons for collective crime

1. Dr. P. Suryachandra Rao, 2. Dr. P Mukhopadhyay, 3. Shri A. B. Sikdar, 4. Mr. Kausar Ali, 5. Dr. Suresh Tiwari (IITM, New Delhi) for making false reports against me for conspiracy and removing me from Job and for creating forgery documents against me, with the hands of Ms. Chabi Bardhan and Dr. B. N. Goswami.

Kindly note that account officer had Hand over my salary to Dr. B. N. Goswami and Ms. Chabi Bardan illegally and creating forgery  documents for Income Tax Return statement for the year 2012-2013 with hands of Ms. Chabi bardhan and Dr. B. N. Goswami.

I also requesting to investigate Dr. D. K. Siingh as Ms. Chabi Bardhan send Dr. D. K. Siingh and Mr. Alok Sagar Gautam (student of Dr. D. K. Siingh) several times to force me to meet her at her home (alone as well as with wife and kids) and give Khoka or Pety (money) to cancel my transfer. They want to corrupt me. I refuse to do so because for official work I dislike to go anyone’s home also I don’t have money to give her and Dr. B. N. Goswami for transfer cancellation. Hence have been remove from to teach the lesson to employees what Dr. B. N. Goswami and Ms. Chabi Bardhan threatened me and done the same.

I also request to Initiate the inquiry against Dr. B. N. Goswami and Ms. Chabi Bardhan for encouraging to create forgery documents to above officials and robbery of my salary and Ms. Chabi Bardhan regarding the same as per the law of land.

I strongly request to reopen my case and take the statements of IITM employees again and re investigate the case.

I also request for the arrest of Dr. B. N. Goswami who stay at Panchwati, near IITM, Pashan (retired director of IITM, Pune) and Chabi Bardhan for atrocity, conspiracy, harassment, robbery of my salary, Misuse of government property and Power.

Hope I will get justice by making punishment and restore of my job.

Sincerely,
Kirankumar Johare
Mobile 9970368009
kkjohare@hotmail.com
Date:-13 March 2017

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सहारा मीडिया में सेलरी संकट से त्रस्त कर्मियों ने शुरू किया मेन गेट पर धरना-प्रदर्शन (देखें वीडियोज)

सहारा मीडिया के नोएडा स्थित मुख्य आफिस के गेट पर सहारा कर्मियों ने सेलरी के लिए धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है. कई महीने की सेलरी दबाए बैठे सहारा प्रबंधन ने अपने कर्मियों को भूखे मरने के लिए छोड़ दिया है. इससे परेशान कई कर्मचारी अब गेट पर धरना प्रदर्शन शुरू कर चुके हैं. दूसरे मीडिया हाउसेज इस आंदोलन को इसलिए कवर नहीं कर रहे क्योंकि चोर चोर मौसेरे भाई के तहत वे एक दूसरे के घर में चलने वाले उठापटक को इग्नोर करते हैं. धरना प्रदर्शन सात जनवरी से चल रहा है. धरने में करीब 25 कर्मचारी खुल कर हिस्सा ले रहे हैं.

देखें वीडियो>>

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चैनल वन प्रबंधन ने सेलरी मांगने पर अपने मीडियाकर्मी की जमकर पिटाई की

चैनल वन नामक न्यूज चैनल से सूचना है कि यहां कार्यरत मीडियाकर्मी आयुष तिवारी ने जब दो महीने की रुकी हुई सेलरी की मांग की तो प्रबंधन ने बुरी तरह पिटाई करवा दी. Channel One का संचालन पिता-पुत्र जहीर अहमद और काशिफ अहमद करते हैं. इन दोनों पर पहले भी कई तरह के गंभीर आरोप लग चुके हैं. जानकारी के अनुसार करीब 2 महीनों से रुकी सेलरी की मांग करने पर चैनल प्रबंधन ने अचानक आयुष तिवारी को सभी दस्तावेज़ किसी नए कर्मचारी को सौंपने के लिए कह दिया. 

आयुष ने ऐसा करने से मना कर दिया. आयुष ने कहा कि पहले सैलरी का हिसाब पूरा करो और 6 महीनों से रुके ऑफ़र लेटर को दो, उसके बाद दस्तावेज़ सुपुर्द कर दूँगा. इस मुद्दे को लेकर कई घंटों तक बहस चली. आयुष को झूठे आरोपों में फ़साने तक की धमकी दी गई. आयुष ने बाहर जाना चाहा तो गार्ड ने उसे रोक दिया और कहा आपको बाहर नहीं जाने दिया जाएगा, मालिक ने मना किया है.

आरोप है कि बाद में चैनल प्रबंधन के लोगों ने आयुष की पिटाई की. आयुष को तीसरे माले पर ले जाया गया. आयुष के मुताबिक़ बिल्डिंग में लगे cctv कैमरे में धक्का मुक्की और ज़बरन ऊपर ले जाते हुए तस्वीरें क़ैद हैं. तीसरे माले पर ले जाकर आयुष को कपड़े उतारने को कहा गया. उसे पूरी तरह निर्वस्त्र कर दिया गया. आरोपों के मुताबिक काशिफ़, उसके पिता और भाई ने आयुष के हाथ पैर बाँधकर डंडा फँसा कर उसे उलटा लटका दिया व नीचे पानी से भरे टब में सर डाल दिया.

आयुष ने बाद में अपने एक मित्र को फ़ोन कर पुलिस को सूचित करने के लिए कहा. उसके मित्र ने 100 नम्बर पर फ़ोन कर दिया. इसके बाद आयुष के पास एक पुलिस अधिकारी का फ़ोन आया और उन्होंने आयुष से 5 मिनट का समय माँगा. साथ ही कहा कि पुलिस के वाहन पहुँचने पर आपको सुरक्षित निकाल लिया जाएगा. इस बीच आयुष का फ़ोन छीन लिया जाता है. तब पुलिस से आयुष का सम्पर्क नहीं हो सका और नोएडा पुलिस के सिपाही वापस चले गए.

काफ़ी देर बाद जब आयुष के बड़े भाई और पिता को मामले की जानकारी आयुष के मित्र से मिली तब उन्होंने आयुष के मित्र से काशिफ़ का फ़ोन नम्बर लिया. काशिफ़ ने उन्हें अभिषेक का नंबर दिया. अभिषेक को फ़ोन करने पर उसने तक़रीबन 3 घंटे तक आयुष के घरवालों को गुमराह किया. उसने आयुष पर चोरी का आरोप लगाते हुए अब सब कुछ ठीक होने की बात कही. बाद में किसी तरह आयुष चैनल वन प्रबंधन के चंगुल से रात एक बजे मुक्त हुआ. आरोप है कि ज़हीर अहमद ने आयुष को चुप रहने की धमकी दी और कहा कि ज्यादा बोलोगे तो तुम ही जेल जाओगे. 

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हरियाणा में अमर उजाला ने मारा सर्वेयरों का वेतन!

नमस्कार सर

मैं अपना नाम पहचान छिपा कर यह पत्र लिख रहा हूं. मैं रोहतक हरियाणा का रहने वाला हूं. मैंने कई महीनों से अमर उजाला रोहतक का सर्वे ज्वाइन कर रखा था लेकिन पिछले तीन महीनों से सर्वे बंद है. वजह है कि अमर उजाला ने आखिरी दो महीनों का हमारा आधा आधा वेतन नहीं दिया. दरअसल अमर उजाला में सर्वेयर की सैलरी 7500 है, बिना किसी छुट्टी के. लेकिन अचानक से सितंबर महीने में हमारी सैलरी ये कहकर पूरी नहीं दी गई कि बाद में देंगे.

जब हमें बाद में भी वेतन नहीं मिला तो आखिर हमने 22 अक्टूबर को सर्वे का काम छोड़ दिया. उस समय सर्वे में लगभग सात लड़के थे. सबके छोड़ने के कारण ही अमर उजाला का सर्वे भी बंद हो गया. अब हमारी पूरी सर्वे की टीम जब भी अमर उजाला में सैलरी के लिए जाती है तो कभी कह दिया जाता है आज सर नहीं है. कभी कोई दूसरे किस्म का बहाना / आश्वासन मिलता है.

जब हमने पता लगाने की कोशिश की तो पता चल रहा है कि हमारी सैलरी आगे से आ चुकी है, कुछ छोटे पद के लोगों ने जानबूझ कर रोक रखी है. इस समय दूसरे अखबारों की वजह से अमर उजाला की कापियां लगातार कम होती जा रही हैं. ऐसे में अब अमर उजाला को अखबार में विज्ञापन निकालने के बाद भी सर्वेयर नहीं मिल रहे तो हमसे कहा जा रहा है कि तुम फिर से सर्वे चालू करो, पिछला हिसाब भी कर देंगे. लेकिन हम पहले हिसाब मांगते हैं तो उनका गोलमोल जवाब शुरू हो जाता है. फिलहाल एक बार फिर सर्वेयरों ने जीएम से मिलने की तैयारी की है. अगर बात नहीं बनी तो तो सभी सर्वेयर लेबर कोर्ट जाने की योजना बनाए हैं. यदि इसमें आप हमारी कुछ मदद कर सकें तो हम सभी आपके आभारी रहेंगे.

एक सर्वेयर द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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‘ओके इंडिया’ न्यूज चैनल नहीं दे रहा अपने पत्रकारों को पैसा

‘ओके इण्डिया’ नामक न्यूज चैनल कर रहा पत्रकारों का शोषण. आठ महीनों से नहीं दिए न्यूज का पेमेंट. अपने आपको नेशनल न्यूज चैनल बताने वाला ओके इण्डिया न्यूज चैनल फरवरी से आनएयर   हो गया था और तभी से न्यूज पत्रकारों से ली जा रही थी. पहली मीटिंग में जोगिन्द्र दलाल जो मालिक हैं, ने 200 रूपये पर न्यूज की बात की थी परन्तु आज आठ महीनों से हरियाणा के स्ट्रिंगरों को एक भी पैसा नहीं दिया.

दिवाली भी काली मनाई गई! सिर्फ असाइनमेंट वाले खबर मांगते हैं. पेमेंट की बात की जाये तो पता नहीं होता, कहते हैं मालिक जानें. अब हालात ये है कि हरियाणा का एक और नया ब्यूरो चंडीगढ़ में  बिठा दिया है जो न्यूज माँगता है. शिव शर्मा हरियाणा बुलेटिन के लिए रखा गया है परन्तु पेमेंट की बात नहीं करता है. चैनल की तरफ से कोई बात नहीं की जा रही है कि कब पेमेंट दी जाएगी.

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यूनीवार्ता में बिना सेलरी के काम करते हैं मीडियाकर्मी!

एक ऐसा संस्थान जहां लोग पैसे कमाने के लिए नहीं जाते. दिल्ली में एक मीडिया संस्थान ऐसा है जहां कर्मचारियों को हर महीने सैलरी नहीं मिलती. इसके बावजूद न कोई कर्मचारी छुट्टी करता है और न ही मजबूती से सेलरी न दिए जाने का विरोध ही करता है. एक एडमिन विभाग है लेकिन वहां सैलरी के बारे में नहीं पूछ सकते. अकाउंट्स विभाग भी है लेकिन वहां बैठे साहब महीना पूरा होने के बाद ‘इस हफ्ते इस हफ्ते’ कहकर हफ्तों निकाल देते हैं.

ब्यूरो के लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि किसी की पत्नी सरकारी नौकरी में है तो कोई बेधड़क कहीं और भी अपनी सेवायें दे रहा है. रेडियो में तो साथ साथ कइयों ने काम किया है और अब भी सकते हैं. तनख्वाह न मिलने पर भी कमाल ये है कि कुछ पत्रकार तो पार्टियां करते हैं तो एक हैं जो अभी प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की कार्यकारिणी चुनाव में भी उतरे थे. हालांकि वोटों की गिनती और फिर हार से ही सब पता पड़ गया लेकिन जहां 19-20 महीनों की सैलरी बैक लॉग में हो, वहां कोई चुनाव का क्या ही सोच सकता है. ये बात देश की दूसरी सबसे बड़ी न्यूज एजेंसी यूनीवार्ता की है.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सेलरी न मिलने पर राष्ट्रीय सहारा अखबार की कई यूनिटों में हड़ताल

सहारा मीडिया से बड़ी खबर आ रही है कि साल भर से सेलरी न मिलने से नाराज राष्ट्रीय सहारा अखबार के कर्मियों ने हड़ताल कर दिया है. हड़ताल से नोएडा, लखनऊ, बनारस, कानपुर यूनिटें प्रभावित हैं. बताया जा रहा है कि गोरखपुर और पटना की यूनिटों में हड़ताल नहीं हुआ है. कार्य बहिष्कार के कारण सहारा मीडिया के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने भागदौड़ तेज कर दी है. किसी तरह हड़ताल खत्म कराने की कोशिशें हो रही हैं.

हड़ताल से जुड़े कर्मियों का कहना है कि सेलरी के लिए कई तारीखें देने के बाद भी जब प्रबंधन सेलरी नहीं दे पा रहा है तो उनके पास सिवाय हड़ताल के कोई चारा नहीं रह गया है. आर्थिक तंगी के कारण सहारा कर्मी बेहद परेशान हैं. स्कूल फीस से लेकर मकान किराए तक के लाले पड़ गए हैं. बताया जा रहा है कि सुब्रत राय सेलरी के लिए पैसे रिलीज नहीं कर रहे हैं जिससे कर्मियों को तनख्वाह नहीं दिया जा रहा है. सहारा मीडिया के कई वरिष्ठ पदाधिकारी मार्केट से पैसे निकाल कर सेलरी देने का वादा किए थे लेकिन यह भी नहीं हो पा रहा है. अंतत: सभी को सिर्फ आश्वासनों के भरोसे जीना पड़ रहा है. इन हालात से आजिज सहारा कर्मियों ने हड़ताल का ऐलान कर दिया.

कल दिन से ही आज की हड़ताल की तैयारी शुरू हो गई थी. आज दोपहर तीन बजे से लोग आफिस पहुंचने तो लगे लेकिन काम नहीं किया. इस कार्य बहिष्कार की आग राष्ट्रीय सहारा की कई यूनिटों में फैल गई. सूत्रों के मुताबिक मैनेजरों और अन्य वरिष्ठ लोगों को तो लिफाफे में पेमेन्ट किया जा रहा है लेकिन कर्मियों को कोई पैसा नही दिया जा रहा. चर्चा है कि बीते 18 अप्रैल को लखनऊ में मैनेजर रैंक के एक अफसर को 1.90 लाख का चेक दिया गया.

अखबार के डेस्क और फील्ड के कर्मियों को वेतन नहीं दिया जा रहा. 18 को नोएडा में लोगों ने वेतन को लेकर घेराव किया था और चेतावनी दिया था कि यदि 20 को पूरी सेलरी नहीं आई तो सभी लोग हड़ताल पर चले जाएंगे और अगला अंक यानि 21 अप्रैल का अंक नहीं निकलेगा. हड़ताली कर्मियों ने बताया कि राष्ट्रीय सहारा के नोएडा और लखनऊ यूनिट के लोगों ने काम करना बंद कर दिया है. कानपुर और वाराणसी यूनिट में भी काम का बहिष्कार कर दिया गया है. गोरखपुर और पटना यूनिट के लोगों का दोगलापन भरा रवैया इस बार भी कायम है.

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एकजुट होने लगे सहारा कर्मी, सेलरी के लिए किया प्रबंधन का घेराव

सहारा कर्मी अपनी सेलरी के लिए एकजुट होने लगे हैं. सहारा मीडिया में सेलरी संकट और कर्मचारियों की अंदरखाने एकजुटता की खबर भड़ास पर प्रकाशित होने के कुछ घंटे के बाद ही सहारा के नोएडा आफिस में कई महीने से सेलरी न मिलने से नाराज सहारा कर्मियों ने प्रबंधन का घेराव कर लिया. आंदोलनकारी कर्मियों ने भड़ास को एक मेल के जरिए जानकारी दी कि कर्मचारियों की एकजुटता और घेराव देखकर वहां मौजूद सभी एचओडी अपनी अपनी केबिन में भाग निकले.

सहारा कर्मियों ने सुब्रत राय के प्रतिनिधि के तौर पर बैठे प्रबंधन के एक शख्स गौतम सरकार का पकड़ लिया और उनका घेराव किया. गौतम सरकार से सहारा कर्मियों ने तुरंत सेलरी देने की मांग रखी. इस पर हड़बड़ाए गौतम सरकार ने अड़तालीस घंटे का समय मांगा और सेलरी देने का वादा किया. इस घटना से सहारा मीडिया के वरिष्ठों के भी कान खड़े हो चुके हैं.

दरअसल सुब्रत राय और सहारा के पास पैसे की दिक्कत नहीं है. जेल संकट के नाम पर सारा ठीकरा कर्मचारियों पर फोड़ने की रणनीति प्रबंधन ने बनाई हुई है. ये लोग सेलरी देने के लिए पैसे तभी निकालेंगे जब कर्मचारी एकजुट होकर वरिष्ठों के केबिन में धावा बोलेंगे, उनका घेराव करेंगे और बंधक बनाएंगे. माना जा रहा है कि देर सबेर नोएडा से लेकर लखनऊ, पटना, देहरादून हर जगह सहारा कर्मी अपने अपने मीडिया हेड, संपादक, प्रबंधक आदि का घेराव कर उन्हें बंधक बनाएंगे. ऐसी स्थिति में सहारा में देर सबेर सामूहिक हड़ताल होने की भी संभावना है. प्रत्येक यूनिट के कर्मी अब आपस में संपर्क कर एकजुट होने लगे हैं.

मूल खबर:

सुब्रत राय जेल में प्रसन्न, सहारा मीडिया कर्मी जेल के बाहर भीषण सेलरी संकट से खिन्न

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सुब्रत राय जेल में प्रसन्न, सहारा मीडिया कर्मी जेल के बाहर भीषण सेलरी संकट से खिन्न

क्या कांट्रास्ट है. जो जेल में है वो प्रसन्न है. जो आजाद है वह खिन्न है. यह तीसरा महीना चल रहा है सहारा मीडिया में बिना सेलरी काम कराए जाने का. सुब्रत राय तिहाड़ जेल में दबा कर किताबें लिख रहे हैं, बाहर अखबारों में करोड़ों अरबों का विज्ञापन अपनी किताब से संबंधित छपवा रहे हैं और कह रहे हैं कि उनके पास अपने कर्मियों को देने के लिए पैसे नहीं हैं. सुब्रत राय खुद को रिहा कराने के लिए होटल जमीन सब बेचने का प्रस्ताव कोर्ट के सामने कर रहे हैं लेकिन अपने कर्मियों को सेलरी देने के नाम पर चुप्पी साधे हैं.

ज्ञात हो कि सेलरी संकट पहले भी सहारा मीडिया में था लेकिन तब सहारा कर्मियों ने मोर्चा बनाकर, एकजुट होकर हड़ताल आदि का सहारा लेकर प्रबंधन पर घनघोर दबाव बनाया जिसके परिणामस्वरूप सहारा मीडिया के वरिष्ठों को हटाकर कमान उपेंद्र राय को दे दी गई. तब लोगों में भरोसा जगा कि अब सब बेहतर होगा. उपेंद्र राय ने शुरुआत में एक महीने की सेलरी देकर और सेल्फ एक्जिट पालिसी बनाकर यह संकेत दे दिया कि वह सहारा मीडिया में अब सेलरी का संकट नहीं आने देंगे. पर वक्त बीतने के साथ उपेंद्र राय अपनी सीमाओं में सिमटते गए. असल में उपेंद्र राय या कोई भी तभी सेलरी दे पाएगा जब सुब्रत राय सेलरी देने के लिए बोलेंगे. उन्हें दिख रहा है कि बिना सेलरी भी लोग काम कर रहे हैं इसलिए वह खुद के जेल में होने के नाम पर अपने कर्मियों पर इमोशनल अत्याचार करते हुए उनके पेट पर लात मार रहे हैं.

सहारा मीडिया के सैकड़ों कर्मियों ने भड़ास को फोन और मेल कर के अंदरखाने की जानकारी दी. नोएडा से लेकर लखनऊ, कानपुर, पटना, मुंबई हर जगह सहारा मीडिया कर्मी बेहद उदास और निराश हैं. किसी के बच्चे की फीस नहीं जमा तो किसी ने मकान का किराया नहीं भरा. रोज उम्मीद के साथ आफिस आते हैं और बेहद निराशा में भरकर वापस लौटते हैं. इन हालात में सहारा मीडिया में फिर से एक बार हड़ताल की संभावनाएं बनती नजर आ रही हैं. तिल तिल कर मरने से अच्छा है कि अपने हक के लिए लड़ कर मरो. पिछले दफे जब सहारा मीडिया में जोरदार हड़ताल हुई तो प्रबंधन हिल गया था और सेलरी रिलीज करने के साथ साथ आगे सब कुछ बेहतर होने का भरोसा मिला था. यहां तक कि सुब्रत राय को भी तिहाड़ से पत्र जारी करना पड़ा था. लेकिन प्रबंधन फिर कर्मियों की चुप्पी और धैर्य का नाजायज फायदा उठाने में जुटा है.

उपेंद्र राय भी सुब्रत राय के पैसे रिलीज करने का इंतजार कर रहे हैं. जो हालात सहारा मीडिया में है उसमें उपेंद्र राय भी खुद को चक्रव्यूह में फंसा पा रहे हैं. हालांकि कहने वाले कहते हैं कि तिहाड़ में मीटिंग एसी कांफ्रेंस के नाम पर करोड़ों का बिल भरने वाले और अपनी किताब के विज्ञापन पर करोड़ों खर्च करने वाले सुब्रत राय सेलरी के अलावा बाकी अन्य सभी कामों आयोजनों के लिए जमकर पैसे रिलीज कर रहे हैं लेकिन जाने क्या है कि सेलरी के लिए पैसे देने नाम पर वह एक सैडिस्ट मुस्कान के साथ चुप्पी साध लेते हैं. ऐसे में अब आखिरी हथियार सहाराकर्मियों की एकजुटता और हड़ताल के साथ हल्लाबोल ही है. जितने दिन सहारा कर्मी अलग थलग और चुप चुप रहेंगे, उतने दिन उनकी पीड़ा दुख मुश्किल गहन होते जाएगी.

एक सहारा कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


सहारा मीडिया के संकट के बारे में अगर आपको कुछ बताना है तो भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं. मेल भेजने वालों का नाम पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

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जानिये अगर आप दैनिक भास्कर में हैं तो कितना होना चाहिये आपका वेतन

दूसरे समाचार पत्रों के पत्रकार भी वेतन तालिका बनाने में ले सकते हैं बिस्तर पर पड़े जुझारू पत्रकार हेमंत की मदद

प्रिय मित्रों,

मैं जब से मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई में भड़ास के यशवंत सर के आशीर्वाद से आप सबके साथ शामिल हूआ हूं, आप सबका लगातार समर्थन और उत्साह मिल रहा है। देश भर के पत्रकारों के फोन लगातार आ रहे हैं और लोग मुझसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय में जमा किये जाने वाले एफिडेविट के बारे में पूछ रहे हैं। साफ कहूं तो लगभग २०० फोन मेरे मोबाईल पर आये जिसमें लगभग १८० फोन दैनिक भास्कर के अपने पत्रकार भाईयों और भास्कर से जुड़े देश भर के लोगों के थे। उससे साफ है कि सबसे ज्यादा प्रताड़ना के शिकार लोगो में भास्कर के पत्रकारों की संख्या सबसे ज्यादा है।

उधेड़बुन में था कि भास्कर सहित देश भर के पत्रकार भाईयों की समस्याओं का समाधान कैसे होगा। वो टर्नओवर सहित दूसरे सवाल पूछ रहे थे। साथ ही यह जानना चाहते थे कि उनका वेतन कितना होना चाहिये। इसी उधेड़बुन के बीच अचानक मुझे आद आया कि मेरे एक मित्र हेमंत शिवदास चौधरी भी भास्कर के औरंगाबाद यूनिट में हैं। भास्कर के तेज तर्रार पत्रकारों में से एक हेमंत का प्रबंधन ने स्थानांतरण कर दिया तो उन्होंने इंडस्ट्रीयल कोर्ट से स्टे ले लिया और अब वे भास्कर प्रबंधन के खिलाफ एक मामला हाईकोर्ट में लड़ रहे हैं।

मैने हेमंत को फोन किया तो पता चला कि उनका इनकमिंग काल बंद है। मन में तमाम शंकाएं आईं। खैर इसी बीच हेमंत ने मुझे फोन किया। फोन पर हेमंत ने जो बताया वो सुनने के बाद उनके जज्बे को मैं सलाम करता हूं। हेमंत ने बताया कि पिछले आठ महीने से वे एक एक्सीडेंट के कारण बिस्तर पर पड़े हैं मगर फिर भी भास्कर प्रबंधन से उनकी मजिठिया की लड़ाई जोर शोर से जारी है। हेमंत से जैसे जैसे मैं बात कर रहा था मुझे लगा हेमंत जरूर देश भर के भास्कर सहित दूसरे पत्रकारों की मदद कर सकते हैं।

हेमंत से बात हुयी तो वे सहज तैयार हो गये भास्कर सहित देश भर के पत्रकारों के सवालों का जवाब देने के लिये। हेमंत ने मजिठिया के अनुसार अपने सीए से वेतन चार्ट और बकाया भी बनवाया वो भी पूरे चार साल का तथा महीना व घंटा के ओवरटाईम के हिसाब से भी। निवेदन किया तो वे अपना सीए के हिसाब से बनवाया गया वेतन चार्ट भी देने को तैयार हुये और आधी रात को ही हेमंत का मेल मुझे मिल चुका था।

हेमंत शिवदास चौधरी का नंबर आपको भी भेज रहा हूं। जिनको भी अपने वेतन तालिका या भास्कर से जुड़े कुछ सवाल पूछने हो वे हेमंत से उनके मोबाईल नंबर पर पूछ सकते हैं और उनका वेतन तालिका देख सकते हैं। इससे जान सकते हैं कि मजिठिया के अनुसार दैनिक भास्कर या दूसरे पत्रकारों का वेतन तालिका कैसे बनेगा। एक चीज और बता दूं आपको। माननीय सर्वोच्च न्यायालय में एफिडेविट जमा करने की अंतिम तिथि १० फरवरी है। अगर आपने अब तक एफिडेविट नहीं जमा किया है तो तुरंत उसे नोटरी कराके अपने वकील के जरिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय में जमा करवा दें। हेमंत का नंबर ०७८७५९७७७७८ और ७७९८२७९७८१ है। किसी तरह की कोई दिक्कत हो तो आ मुझसे भी संपर्क ९३२२४११३३५ पर कर सकते हैं।

वेतन चार्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें:  Salary Chart

शशिकांत सिंह
मीडिया एक्टिविस्ट
मुंबई


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‘दक्षिण मुंबई’ नामक अखबार की नीचता के खिलाफ युवा पत्रकार पहुंचा लेबर आफिस और पुलिस स्टेशन, पढ़ें शिकायती पत्र

मुंबई से एक अखबार निकलता है ‘दक्षिण मुंबई’ नाम से. इस अखबार में एक युवा पत्रकार ने पांच महीने तक काम किया. जब उसने सेलरी मांगी तो उसे बेइज्जत करके भगा दिया गया. इस अपमान से नाराज युवा पत्रकार ने लेबर आफिस में पूरे मामले की शिकायत की और भड़ास के पास पत्र भेजा. जब प्रबंधन को यह सब बात पता चली तो युवा पत्रकार को बुरी तरह धमकाया गया. इससे डरे युवा पत्रकार ने पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज कराई है.

युवा पत्रकार का नाम श्याम दांगी है. मुंबई का कोई वरिष्ठ पत्रकार साथी मदद करने और सेलरी दिलाने के लिए प्रबंधन पर दबाव बनाने हेतु श्याम दांगी से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 7506530401 या मेल shyamdangi22@gmail.com के जरिए कर सकता है.

नीचे लेबर आफिस और पुलिस स्टेशन में दी गई शिकायतों की कापी है…

मूल खबर पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें>

पांच महीने बिना सेलरी काम कराया और बेइज्जत करके निकाल दिया

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पांच महीने बिना सेलरी काम कराया और बेइज्जत करके निकाल दिया

माननीय संपादक जी
भड़ास4मीडिया

सर

मेरा नाम श्याम दांगी  है और मैं मुंबई में पत्रकारिता से जुड़ा हूँ। सर नौकरी के दौरान मैं कुछ कठिनाईयों का सामना कर रहा हूँ जिसके लिए आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता है। मैं पिछले पांच महीने से मुंबई से प्रकशित होने वाले  दैनिक अखबार दक्षिण मुंबई में बतौर सब एडिटर कार्यरत था। लेकिन मुझे इस दौरान कभी सैलरी नहीं मिली।

फिर मुझे किसी काम से गाँव जाना पड़ा। लौटने के बाद जब मैंने अपनी सैलेरी की मांग की तो मुझे बेइज्जत करके बाहर निकाल दिया गया। अब मेरे लिए क्या रास्ता बचता है इस विषय में मुझे आपके मार्गदर्शन की जरूरत है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें ताकि इस अखबार से जुड़े कई और पीड़ितों को न्याय मिल सके।

श्याम दांगी
7506530401
shyamdangi22@gmail.com

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न्यूज वर्ल्ड इंडिया के कर्मियों का वेतन दस फीसदी घटा, पढ़ें आंतरिक मेल

न्यूज वर्ल्ड इंडिया के सभी कर्मचारियों के वेतन में से दस फीसदी की कटौती की जा रही है… एचआर ने मेल भेज कर सूचना दी है… मेल के मुताबिक कंपनी पर आर्थिक दबाव की वजह से ये कदम उठाया गया है… ये है आंतरिक मेल…

Dear Colleagues,

As you are aware that our industry is going through a tough time, despite of our best efforts the organization is not getting sufficient revenue and we are facing financial crunch.

Despite financial challenges all of us are working hard and continuing our fight in the right direction. We are hoping to get good response from the market very soon. This is not  possible without the support of each one of you.  

However, the challenge continues to present itself with renewed vigor. In the face of extreme adversity and the financial crunch faced by the organization, some of our employees have come up with the suggestion to help the cause. As per their suggestion, it has been decided by the management that  the Total Fixed Pay (TFP) of all employees across the grades will be reduced by 10%. It will be effective from December 1, 2015.

The organization is grateful to all employees and  understand and acknowledge the care and compassion the employees has for the company.

We would like to reiterate that this is only a temporary measure and it shall be restored very soon, if we perform, which we definitely will, then all the reduced pay shall be restored.

However, this will not be applicable to our  colleagues getting CTC less than or equal to 25K PM.

Your kind cooperation will be highly appreciated

Best regards,

Human Resource Department.

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पिता की तेरहवीं में छुट्टी लेकर गए फोटो जर्नलिस्ट की चार दिन की तनख्वाह काट ली

राजस्थान पत्रिका समूह में उत्पीड़न और प्रताड़ना की ढेर सारी कहानियां सामने आती रही हैं. एक ताजे घटनाक्रम के मुताबिक पत्रिका ग्वालियर के फोटो जर्नलिस्ट शशि भूषण पाण्डेय अपने पिता की तरेहवीं में हिस्सा लेने के लिए अवकाश पर गए थे. जब वे लौटकर आए तो पता चला उनका अवकाश मंजूर नहीं किया गया है और उनके वेतन से चार दिन की सेलरी काट ली गई है. इससे आहत पांडेय ने प्रबंधन को पत्र लिखकर न्याय करने की गुहार की है.

सूत्रों के मुताबिक पिता जी की तेरहवीं पर अवकाश पर जाने की नियमानुसार सूचना पत्र के जरिए फोटो जर्नलिस्ट शशि भूषण पांडेय ने अपने इंचार्ज नीरज सिरोहिया को और वरिष्ठों को दी थी. इसके बाद वे अवकाश पर चले गए क्योंकि जाना जरूरी था. अवकाश से लौटने के बाद उन्हें 4 दिन की कम सेलरी दी गयी. उन्हें बताया गया कि बिना मंजूरी के अवकाश पर जाने की वजह से सेलरी काटी गयी है. क्या कोई कल्पना कर सकता है कि किसी के पिता की तेरहवीं हो और वह लिखित में छुट्टी की अप्लीकेशन देकर जाए और वह छुट्टी एसेप्ट न हो. इसी को कहते हैं ताकत के नशे में होने पर आंखों पर घमंड और पाप की पट्टी चढ़ जाती है और सब कुछ उलटा दिखने लगता है.

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बकाया वेतन के लिये यूएनआई के पूर्व मीडियाकर्मियों की कानूनी लड़ाई तेज हुई, मदद की अपील

सरकार ने अखबारों एवं संवाद समितियों के कर्मचारियों एवं पत्रकारों के लिये मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने भी इन अनुशंसाओं को अक्षरश लागू करने का निर्देश दिया है लेकिन इसके बावजूद दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान टाइम्स, स्टेसमैन, यूएनआई जैसे मीडिया संगठनों ने सरकार एवं उच्चतम न्यायालय के आदेशों को धत्ता बताकर या तो मजीठिया वेतन बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू ही नहीं किया है या मनमाने तरीके से लागू किया है। यही नहीं जिन पत्रकारों ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन वृद्धि लागू किये जाने की मांग की उनके प्रबंधकों ने उनका तबादला करने और उन्हें नौकरी से निकालने के हथकंडे अपनाये।

गौरतलब है कि यूएनआई में पिछले कई सालों से नियमित रूप से वेतन नहीं दिया जा रहा हे। वहां के जिन पत्रकारों एवं कर्मचारियों ने सही समय पर वेतन देने की मांग की उनका तबादला कर दिया गया अथवा उनका उत्पीड़न करके उन्हें नौकरी छोड़ने के लिये मजबूर किया गया। सबसे शर्मनाक यह है कि जिन पत्रकारों को नौकरी छोड़ने पर विवश किया गया या जिन पत्रकारों ने वेतन नहीं मिलने के कारण नौकरी छोड़ी उनका कई महीने का वेतन, पीएफ एवं मैचुयरिटी लाभ के पैसे अभी तक बाकी है, जबकि उन्हें नौकरी छोड़े हुये कई महीने और कई मामले में कई साल हो चुके हैं। यही नहीं यूएनआई प्रबंधन ने मनमाने तरीके से मनिसाना वेतन बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार अप्रैल, 2014 से नया वेतनमान लागू किया तथा कर्मचारियों को कोई भी एरियर देने से इंकार कर दिया, जबकि उच्चतम न्यायालय के फैसले तथा मनिसाना वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार 11/11/2011 से ही नया वेतनमान लागू करना था। दिलचस्प बात यह है कि यूएनआई प्रबंधन ने 11/11/2011 से लेकर अप्रैल, 2014 तक की वेतन वृद्धि को देने से भी इंकार कर दिया।

मैनेजमेंट के इस तानाशाही एवं मनमाने रवैये के खिलाफ यूएनआई के कुछ पूर्व पत्रकारों एवं कर्मचारियों ने दिल्ली सरकार के श्रम उपायुक्त के कार्यालय में अर्जी लगायी है, जहां मामले की सुनवाई हो रही है। यूएनआई का प्रबंधन का जो रूख है उससे साफ है प्रबंधन पत्रकारों एवं कर्मचारियों को उनका बकाया पैसा किसी भी कीमत पर देने को तैयार नहीं है और ऐसी स्थिति में एकजुट होकर लंबी लडाई लड़नी होगी।

श्रम उपायुक्त के कार्यालय में यूएनआई के पूर्व कर्मचारियों के अलावा दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान टाइम्स सहित कम से कम 16 मीडिया संगठनों के कर्मचारियों/पूर्व कर्मचारियों ने अर्जी लगायी है। दैनिक जागरण के कर्मचारियों ने धरना—प्रदर्शन भी किया। इस संबंध में आप सब से सहयोग की अपील है। यूएनआई अथवा अन्य मीडिया संगठनों के जो भी कर्मचारी और पत्रकार अपने हक के लिये इस कानूनी लड़ाई में साथ देना चाहते हैं, उनका स्वागत है। यूएनआई के जो कर्मचारी दिल्ली या दिल्ली से बाहर है और जो अपने हक को पाने के लिये कोई कदम उठाने के लिये सोच रहे हैं वे हमसे संपर्क कर सकते हैं — क्योंकि एकजुट होकर लड़ने से ही कोई परिणाम निकलेगा। वैसे तो पत्रकार दुनिया भर के लोगों के अधिकारों का ठेका लेने का दावा करते हैं, लेकिन जब अपने बिरादरी के लोगों के हितों और अधिकारों की बात आती है तो वे पीछे हट जाते हैं।

यूएनआई के पत्रकार रहे Vinod Viplav की रिपोर्ट. संपर्क: vinodviplav@gmail.com

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के.न्यूज वाले बकाया पैसा नहीं दे रहे… इस दिवाली अपनी तीन माह की बिटिया को क्या दूंगा?

संपादक

भड़ास मीडिया

मैं प्रहलाद गुप्ता वाराणसी में के.न्यूज वैनल का रिर्पोटर हूं। मुझे एक साल हो गया के.न्यूज चैनल के लिए रिपोर्टिंग का काम करते। इस दौरान मुझे वेतन के नाम पर चैनल ने वालों ने बस दस हजार रूपये दिए हैं, जब कि मैने अब तक सैकड़ों खबरें चैनल वालों को भेजा है।

मैं जब भी वेतन संबंधित बात करने के लिए फोन करता हूं ये लोग बात तक नहीं करते। हां, जब भी इन्हें कोई खबर चाहिए होता है तो मेरे मोबाइल की घंटी बजाने लगते हैं। खाली पेट और जरूरतों की दोस्ती खबरों से नहीं होती। उन्हें पूरा करने के लिए पैसे चाहिए होते हैं। यहां तो चैनल वाले मेरे मेहनत के पैसे तक नहीं दे रहे हैं।

अजीब बात है।

खबर लाने वाले का दर्द कभी भी क्यों नहीं चैनलों पर खबरों का हिस्सा बन पाती है। मेरी तीन महीने की बेटी है। दिपावली आने में चंद रोज बाकी रह गए हैं। मैं अपनी बेटी जिसकी ये पहली दिपावली है, उसे क्या दूंगा? अपनी जरूरतों से तो मैं समझौता कर सकता हूं। पर अपनी छोटी सी बेटी की खुखियों और उसकी जरूरतों को कैसे मार दूं?

इससे पहले भी मुझसे संबधित खबर भड़ास मीडिया पर चल चुकी है। कल मैने अपने चैनल के संपादक और मालिक को मेल भेज कर अपने हालात का ज्रिक करते हुए बकाया वेतन देने की बात की है। लेकिन उस मेल का जवाब अब तक नहीं आया है, लगता है मेरी जरूरते मेरे मेहनत के पैसे उनके लिए कोई मायने नहीं रखते। मैं उस मेल की कापी आपको भी भेज रहा हूं।

उम्मीद करता हूं भड़ास मीडिया मेरे इस आवाज को उपर तक पहुंचायेगा। साथ ही यह भी सबको बतायेगा कि मीडिया के इस चकाचैध के पीछे कितना अंधेरा है, कितना शोषण है।

धन्यवाद

प्रहलाद गुप्ता

के.न्यूज चैनल

संवाददाता

वाराणसी।

मोबाइल न.09336953194, 09454654698


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कानपुर से संचालित होने वाले के. न्यूज चैनल का सच : ”खुद कमाओ और हमे भी लाकर दो, तब हम जानेंगे तुम रिपोर्टर हो!”

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सहारा और जागरण के हजारों मीडिया कर्मियों के इतने बड़े-लंबे आंदोलनों को कवरेज नहीं दे रहे बड़े मीडिया हाउसों को अब बेशर्मी छोड़ने की जरूरत

आउटलुक मैग्जीन को धन्यवाद जो उसने सहारा मीडिया के हजारों कर्मियों की बड़ी पीड़ा को आवाज दी. साल भर से बिना सेलरी काम कर रहे और लगभग भुखमरी के शिकार हजारों मीडियाकर्मियों के सड़क पर उतरने और प्रधानमंत्री व सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखने के बावजूद देश के बड़े मीडिया हाउसों की कुंभकर्णी नींद नहीं खुली है. लगता है सहारा चिटफंड से अरबों खरबों का पैसा विज्ञापन के नाम पर डकारने के कारण ये मीडिया हाउस नमक का कर्ज अदा कर रहे हैं.

छोटी छोटी घटनाओं को ब्रेकिंग न्यूज बना देने वाले न्यूज चैनलों की नैतिकता भी बाजारू हो चुकी है जो उन्हें दिल्ली एनसीआर के इतने बड़े संकट से आंखें दो चार करने की हिम्मत नहीं पड़ रही है. अब वक्त आ गया है जब सहारा मीडिया के हजारों कर्मियों को उनका हक दिलाने के लिए सभी को एकजुट होकर लिखना पढ़ना और प्रयास करना चाहिए.

सहारा जैसा ही संकट दैनिक जागरण में है जहां नोएडा आफिस से सैकड़ों लोगों को इसलिए बर्खास्त कर दिया गया क्योंकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेशित मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने की मांग प्रबंधन से की. बर्खास्त किए गए सैकड़ों लोग रोजाना फिल्म सिटी से लेकर जंतर मंतर तक और दैनिक जागरण के आफिस से लेकर इंडिया गेट तक धरना प्रदर्शन के साथ-साथ रैली निकाल रहे हैं लेकिन कोई मीडिया हाउस इसे कवरेज नहीं दे रहा क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि एक डकैत दूसरे डकैत के इलाके में चल रहे संकट में नाक नहीं घुसाता.

उम्मीद करता हूं कि मीडिया हाउस खुद को डकैत नहीं कहलाना पसंद करेंगे, वो मीडिया हाउस ही रहना चाहेंगे. इसलिए सहारा और जागरण के कर्मियों के आंदोलन को कवर करना शुरू करें. ऐसा नहीं करके आखिर फिर आप किस मुंह से पत्रकारिता, नैतिकता, सरोकार, जनहित, मानवीय मूल्य, लोकतंत्र, समानता, कानून, संविधान, न्याय आदि शब्दों को उच्चारेंगे.

-यशवंत
एडिटर, भड़ास4मीडिया
yashwant@bhadas4media.com

आगे के पेजों पर देखें सहारा मीडिया के संगठित हो चुके कर्मियों की तस्वीरें और पीएम को लिखा पत्र.

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सहारा कर्मियों की तकलीफ को ‘आउटलुक’ मैग्जीन ने भी दी आवाज, पढ़िए भाषा सिंह की रिपोर्ट

आमतौर पर मीडिया वालों की पीड़ा को दूसरे मीडिया हाउस तवज्जो नहीं देते. सहारा मीडिया के कर्मियों की तकलीफ को मुख्य धारा के मीडिया हाउस नहीं उठा रहे क्योंकि हर किसी के यहां कर्मियों का किसी न किसी रूप में शोषण-उत्पीड़न है. यही वजह है कि दैनिक जागरण के सैकड़ों कर्मियों की बर्खास्तगी और उन कर्मियों का आंदोलन किसी मीडिया हाउस के लिए खबर नहीं है.

यही कारण है कि मजीठिया वेज बोर्ड का लागू न करके सुप्रीम कोर्ट को ठेंगा दिखाना किसी के लिए खबर नहीं है. फिर भी अपने अंतरविरोधों के कारण कुछ मीडिया हाउस दूसरे मीडिया वालों की निगेटिव खबरें छापते / दिखाते हैं. आजतक के रिपोर्टर द्वारा दारू का पैसा देकर मनमाफिक खबर गढ़ने का वीडियो जी न्यूज ने जोरशोर से दिखाया क्योंकि जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी के ब्लैकमेलिंग प्रकरण व जेल जाने के प्रकरण को सारे दूसरे न्यूज चैनलों से प्रमुखता से प्रसारित किया था, इसलिए जी न्यूज को जब मौका मिलता है, दूसरे मीडिया हाउसों को नंगा करने से नहीं चूकता.

इस आपसी लड़ाई से फायदा अंतत: दर्शकों / पाठकों को मिलता है क्योंकि उन्हें इसी बहाने मीडिया के अंदर की सच्चाई पता चल पाती है. इसलिए हम लोग दुआ करते रहें कि बड़े मीडिया हाउस वाले आपस में लड़ते रहें ताकि हम सब उनकी नंगई से अवगत रहें. ताजा घटनाक्रम सहारा मीडिया के कर्मियों की पीड़ा को आउटलुक मैग्जीन द्वारा उठाना है. आउटलुक में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने इस संकट पर एक रिपोर्ट फाइल की है जिसे आउटलुक की वेबसाइट पर भी अपलोड किया जा चुका है. आउटलुक से साभार लेकर वह स्टोरी अगले पेज पर प्रकाशित की जा रही है.

-यशवंत
एडिटर, भड़ास4मीडिया
yashwant@bhadas4media.com

स्टोरी पढ़ने के लिए अगले पेज पर जाएं>>

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लोकसभा टीवी : सबसे कम सेलरी प्रोडक्शन स्टाफ की, सबसे ज्यादा काम इन्हीं से करवाया जाता है..

सरकारी चैनल यूँ भी अपने काम के रवैये को लेकर बदनाम है और उनमे होने वाली भर्तियां कैसे होती हैं यह आप सभी जानते हैं.. लोकसभा टीवी को लगभग 10 साल हो गए है लेकिन सीमित संसाधनों में लोगों ने अच्छा काम किया है.. मगर भर्ती प्रक्रिया हमेशा सवालों के घेरे में रही है और कार्य प्रणाली भगवन भरोसे.. बहुत से लोग हैं जो वहां पिछले 9-10 साल से प्रोडक्शन असिस्टेंट या असिस्टेंट प्रोड्यूसर का काम कर रहे हैं.. तजुर्बा अच्छा खासा है लेकिन नियमों के अभाव में शोषण के शिकार हैं..

तनख्वाह नाम मात्र 30-35 हज़ार रुपए और कोई सुविधा भी नहीं.. इसी वर्ष एक महिला साउंड रिकार्डिस्ट की बीमारी से मौत हुई और उसके इलाज़ या उसके बाद उसकी इकलौती 7 साल की बेटी के निर्वहन तक के लिए एक पाई नहीं दी गई..  हालाँकि सहकर्मियों ने दो लाख की नाम मात्र राशि इकट्ठा की.. खुदा न खास्ता ये कर्मचारी या इनके परिवार का कोई किसी भी गम्भीर बीमारी से त्रस्त हो जाये तो उसका भगवान ही मालिक है..

पिछले सीईओ के कार्यकाल में इन्हीं मांगों के लिए कर्मचारियों ने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष के घर तक पैदल मार्च भी किया.. सोचिये प्रतिवर्ष इनका कॉन्ट्रैक्ट बढ़ाया जाता है.. ऐसे में ये क्या प्लानिंग करेंगे अपने परिवार के भविष्य की.. ये ऐसा चैनल है जहां कैमरामैन भी 50 हज़ार ले रहा है… टेक्निकल भी इसके आसपास… मगर काम करने वाले कुछ काबिल एंकर 45 हज़ार में हैं जबकि 2-4 यहाँ भी 80 हज़ार पा रहे है.. सबसे कम सैलरी प्रोडक्शन स्टाफ की है पूरे चैनल में.. जबकि सबसे ज्यादा काम उन्हीं से करवाया जाता है..

आपको अचरज होगा पिचले 7 साल में दो बार वैकेंसी निकली है मगर भीतरी स्टाफ को कोई प्रमोशान नहीं मिला… खासकर प्रोडक्शन अस्सिटेंट को.. लोकसभा टीवी प्राइवेट चैनल के तर्ज़ पर काम करने की कोशिश कर रहा है मगर वहां के hr पालिसी पर चुप्पी साधे हुए है.. खबर है कि पिछले बार वैकेंसी में भी नेताओ की सिफारिशों का ध्यान रखा गया और एक आध तो दोस्त का बेटे या स्टाफ की बेटी जैसे नियुक्त किये गए..

इस बार भी प्रोड्यूसर में 8 में से 4 मिश्रा चयनित हुए हैं और दो तीन मध्य प्रदेश से… ये लोग RTI के ज़माने में भी भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.. इन नियुक्तिओं पर rti के द्वारा सूक्ष्म पड़ताल करने की जरूरत है ताकि जुगाड़ू लालों पर लगाम लग सके क्योंकि साक्षात्कार सिर्फ दिखावा है क्योंकि इसमें पारदर्शिता नहीं है.. दूरदर्शन में भी पुराने लोगों को नोटिस दिया जा रहा है या कॉन्ट्रैक्ट कम बढ़ रहा है, आखिर क्यों? ये सरकारी संस्थान संघ या सरकार की रेवड़ियां नहीं हैं जो चहेतों और नाकाबिल लोगों को बाँट दी जाए..

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सात सौ रुपये, हजार रुपये, ढाई हजार रुपये… ये है सेलरी… बदले में 50 लाख से अधिक की विज्ञापन की वसूली

दैनिक हिन्दुस्तान से जुड़े रामगढ जिला अन्तर्गत गोला संवाददाता मनोज मिश्रा ने हिंदुस्तान अखबार को अलविदा कह दिया है. श्री मिश्रा ने इस बाबत एक आवेदन प्रधान संपादक श्री शशिशेखर और झारखण्ड के वरीय संपादक श्री दिनेश मिश्र को प्रेषित किया है. मनोज ने कहा कि सन 2000 से हिन्दुस्तान से जुड़ा. पत्रकारिता में काफी उतार-चढ़ाव देखे. जिले के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले पत्रकारों का आज भी काफी शोषण किया जा रहा है. उन्हें अखबार प्रबंधन से सम्मानजनक पारिश्रमिक नहीं मिलता है. इस कारण पत्रकार आर्थिक तंगी से जूझते रहते हैं. सभी का परिवार है. खर्चे भी काफी हैं. पारिवारिक दायित्व होने और आर्थिक तंगी के कारण ही अखबार को अलविदा कह दिया.

हिन्दुस्तान रामगढ जिला कार्यालय में कार्यरत पत्रकार व्यास शर्मा ने कार्यालय जाना बंद कर दिया है क्योंकि श्री शर्मा को पिछले आठ महीनों से वेतन नहीं मिला. उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिलता रहा. कार्यालय के पुराने पत्रकार अशोक मेहता को एक हजार रूपया और राजकुमार सिंह को मात्र सात सौ वेतन मिलता है। इसके अलावा जिले के अन्य संवाददाताओ को मात्र 2500 रुपया वेतन दिया जाता है. कई को आज तक पैसा नहीं मिला. इस थोड़े से पैसे के एवज में साल भर में 50 लाख से अधिक विज्ञापन की वसूली करवाई जाती है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मूल खबर :

आर्थिक तंगी से परेशान हिंदुस्तान अखबार के स्टिंगर मनोज मिश्र ने पत्रकारिता को गुडबाय कहा

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आर्थिक तंगी से परेशान हिंदुस्तान अखबार के स्टिंगर मनोज मिश्र ने पत्रकारिता को गुडबाय कहा

झारखंड में हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान, रांची के स्थापना वर्ष से कार्यरत गोला-रामगढ़ से स्टिंगर मनोज मिश्र ने आर्थिक तंगी से जुझते हुए 28 अगस्त 2015 को पत्रकारिता क्षेत्र को अलविदा कह दिया है. अलविदा कहते हुए मनोज मिश्र ने स्टिंगर पद को छोड़ने के संबंध में संपादक के नाम पत्र में कहा है कि मैंने 15 वर्षों तक निष्ठापूर्वक, इमानदारी से समर्पित भाव से अखबार में काम किया. अब मैं काम करते हुए असहज महसूस कर रहा हूं. साथ ही स्टिंगर पद छोड़ रहा हूं.

गोला-रामगढ़ के मनोज मिश्र ने 1989 में स्नातक की उपाधि प्राप्त कर पत्रकारिता प्रारंभ की. 10 वर्षों तक भिन्न-भिन्न अखबारों में काम करते हुए 1999 में हिन्दुस्तान से जुड़े. प्रारंभ में समाचार के बावत उन्हें 10 रुपया मिलता था. फिर 300 रुपया महीना. वर्षों तक 300 रुपया में एक उम्मीद के साथ स्टिंगर के पद पर डटे रहे. कुछ वर्षों से उन्हें 2500 रुपया मिलने लगा. इमानदार और सिद्धांत प्रिय मनोज मिश्र पत्रकारिता क्षेत्र में काम करते हुए अवैध वसूली से दूर रहे. उनका परिवार बढ़ा. एक पत्नी और दो पुत्रियों के खर्च को वहन करने में असमर्थ रहते हुए उन्होंने अंत में पत्रकारिता क्षेत्र को छोड़ कर दूसरे क्षेत्र में भाग्य आजमाने का फैसला किया है. क्षेत्र के अन्य अखबारों के स्टिंगरों ने कहा है कि मनोज मिश्र काफी लंबे समय तक पत्रकारिता क्षेत्र को अपनी जीविका का स्रोत बनाए रखा. उन्होंने अपना जीवन इस क्षेत्र में झोंक दिया. उनके पत्रकारिता क्षेत्र से अलविदा कहने पर क्षेत्र के पत्रकार मर्माहत हैं और कह रहे हैं कि वो समय दूर नहीं जब लोग इस क्षेत्र से दूर भागेंगे. अच्छा आदमी कोई इधर काम नहीं करना चाहेगा.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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नवभारत बस्तर के कर्मचारियों को दो महीने में एक दफे वेतन मिलता है!

नवभारत यूं तो एक प्रतिष्ठित अखबार समूह है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों की दुर्दशा यह है कि यहां उन्हें दो महीनों में एक दफे वेतन मिलता है। आपको बता दें कि बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर दफ्तर से संचालित है। दूसरी ओर वेतन में भी भारी विसंगति ​की जानकारी मिली है। कुछ लोगों का कहना है कि अन्य अखबार समूहों के बनिस्बत यहां काफी कम वेतन मिलता है। और तो और, पिछले महीने का वेतन इस महीने की 25 तारीख को दी जाती है। ऐसे में अपने परिवार का पोषण करने वाले विशुद्ध पत्रकार किस तरह से अपने दायित्वों को निभाते होंगे, इसे लेकर सहजता से अंदाजा लगाया जा सकता है।

अखबार के मालिक ने मैनेजमेंट में फेरबदल किया और भ्रष्ट लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद नये मैनेजमेंट से कुछ आस तो जरूर जगी है, लेकिन कब तक वे कर्मचारियों के हित में फैसला लेंगे, इस पर संशय बना हुआ है। कुछ महीनों पहले अगस्त माह से वेतन में वृद्धि का आश्वासन दिया गया था, लेकिन अब तक इसका कोई पता नहीं है। कर्मचारियों की स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही है। न तो अब तक जगदलपुर के कर्मचारियों को ही नियमित किया जा सका है और न ही वेतनवृद्धि को लेकर ही कोई सुगबुगाहट समझ आ रही है। कर्मचारियों को बाउचर पर वेतन दिया जाता है, ऐसे में यहां गड़बड़ी की आशंका बनी हुई है। कहीं कर्मचारियों के वेतन का हक तो नहीं मारा जा रहा, ऐसे ही और भी कई सवाल हैं, जो कर्मचारियों के दिमाग में दौड़ते चले जा रहे हैं। कभी उनका नियमितीकरण हो पायेगा क्या, कभी उनका वेतन बढ़ेगा क्या, इस बात को लेकर वे परेशान हैं और लगातार अवसाद की जद में आते जा रहे हैं।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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