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सुमंत भट्टाचार्य फेसबुक पर भक्तों के बीच वैसे ही लोकप्रिय हैं जैसे टीवी पर राकेश सिन्हा!

Sanjaya Kumar Singh : भक्ति या आस्था समर्थन, नहीं रोग है… मित्र सुमंत भट्टाचार्य फेसबुक पर भक्तों के बीच वैसे ही लोकप्रिय हैं जैसे टीवी पर राकेश सिन्हा। दोनों जनसत्ता में रहे हैं। राकेश सिन्हा सिर्फ परिचित हैं। सुमंत मित्र रहे हैं। विमर्श के बड़े पैरोकार हैं। मुझसे भी उलझते रहते हैं और कहते हैं कि विमर्श का फलक खुला रहना चाहिए। जब आप सवाल उठाते हैं तो कोई भी आपसे सवाल पूछ सकता है। आपकी निष्पक्षता जांच सकता है। यहां तक कि मैं कन्हैया को जमानत मिल जाने की बात करूं तो वे मुझसे पूछ सकते हैं कि मैं शाहबानो मामले में क्या जानता हूं। और फिर ऐसे ही विमर्श करते रहना चाहते हैं जिसमें मुद्दा गोल हो जाता है। जो अक्सर भाजपा, संघ या सरकार के खिलाफ होता है। मैंने उनसे सार्वजनिक रूप से हार मान ली है और मानता हूं कि वे विमर्श के बहाने लोगों को विषयांतर करने का महान काम कर रहे हैं।

Sanjaya Kumar Singh : भक्ति या आस्था समर्थन, नहीं रोग है… मित्र सुमंत भट्टाचार्य फेसबुक पर भक्तों के बीच वैसे ही लोकप्रिय हैं जैसे टीवी पर राकेश सिन्हा। दोनों जनसत्ता में रहे हैं। राकेश सिन्हा सिर्फ परिचित हैं। सुमंत मित्र रहे हैं। विमर्श के बड़े पैरोकार हैं। मुझसे भी उलझते रहते हैं और कहते हैं कि विमर्श का फलक खुला रहना चाहिए। जब आप सवाल उठाते हैं तो कोई भी आपसे सवाल पूछ सकता है। आपकी निष्पक्षता जांच सकता है। यहां तक कि मैं कन्हैया को जमानत मिल जाने की बात करूं तो वे मुझसे पूछ सकते हैं कि मैं शाहबानो मामले में क्या जानता हूं। और फिर ऐसे ही विमर्श करते रहना चाहते हैं जिसमें मुद्दा गोल हो जाता है। जो अक्सर भाजपा, संघ या सरकार के खिलाफ होता है। मैंने उनसे सार्वजनिक रूप से हार मान ली है और मानता हूं कि वे विमर्श के बहाने लोगों को विषयांतर करने का महान काम कर रहे हैं।

इसी क्रम में उन्होंने एक महिला मित्र से कहा (फेसबुक पर लिखकर), ”तुम्हारी वाल पर विमर्श क्यों नहीं होता… कब तक देह के प्रदर्शन से लाइक और कमेंट बटोरोगी”। इसे उन्होंने बुरा मान लिया। और पोस्ट करके इन्हें भला-बुरा कहा। भक्त अपने हिसाब से छौंक लगाते रहे। और जब इन्होंने मान लिया कि जीत गए तो फिर एक पोस्ट डाली अपने जवाब के साथ। और उसपर एक समर्थक की यह टिप्पणी और उनके इस जवाब ने मेरा संयम तोड़ दिया। पिछली बार उनके कमेंट को पोस्ट बनाकर मैंने बाकायदा उन्हें विमर्श के लिए आमंत्रित किया था पर हार गया। तभी मैंने तय किया था कि उनसे नहीं भिड़ूंगा। लेकिन आदत से मजबूर कल फिर थोड़ी बहुत हो ही गई।

एक महिला से विमर्श की उनकी अपील (उसका अंदाज) और उसपर उनकी प्रतिक्रिया से मुझ लग रहा है कि भक्ति, आस्था नहीं रोग है। (हालांकि वे मुझसे कह चुके हैं कि मैं भक्ति के बारे में नहीं जानता, समस्या यह है कि मैंने इतिहास नहीं पढ़ा (मैं विज्ञान का छात्र रहा हूं) और विश्वविद्यालय में धक्के नहीं खाए। अब उन्होंने खुद साबित कर दिया कि जो हुआ अच्छा ही रहा। जानबूझकर टैग नहीं कर रहा हूं वरना वे विमर्श का निमंत्रण मान लेते हैं। दरअसल यह सार्वजनिक रूप से हार मानना है। भक्त इसे सुमंत की निन्दा ना मानें (है भी नहीं) और मुझे बख्श दें। मैंने आपके महान गुरू, श्रेष्ठ, सलाहकार और काबिलतम फेसबुकिए के बारे में अपने अनुभव भर बताए हैं। इसे उसी रूप में लिया जाए। बस।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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1 Comment

1 Comment

  1. Ramji tiwari

    June 6, 2023 at 6:27 pm

    Sumant dada want to talk u
    Ur younger brother ramji tiwari
    Want to talk
    Please call 9140831573

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