फेक न्यूज़ के साइड इफेक्ट

WHATSAPP

पिछले एक साल में भारत के कई राज्यों में व्हॉट्सऐप (WhatsApp) पर बच्चा चोरी की अफवाहों के कारण भड़की भीड़ ने लगभग २७ मासूम लोगों को पीट-पीटकर हत्या कर दी। लोग यह सोंचने समझने का प्रयास तक नहीं करते की फेक न्यूज़ फेक ही होती है, इस पर संयम बरतने के बजाय, लोग अचानक से आक्रोशित हो उठते हैं और कुछ ऐसा कर बैठते हैं, जिसका परिणाम पूर्णतः भयावह होता है। Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मंत्रीजी की इस एक फोटो से भाजपा की हो रही भरपूर किरकिरी

Yashwant Singh : भारी बारिश में खुद पर छाता तनवा कर पौधे को पानी देने में जुटे हैं मंत्री जी. सही पकड़ा आपने. ऐसा काम भाजपाई नेता ही कर सकते हैं. वैसे, पहले ऐसे अजब गजब काम करने वाले नमूने कांग्रेस में बहुतायत में पाये जाते थे. लेकिन जबसे बीजेपी ने खुद को कांग्रेस बना लिया है, तबसे सारे नमूने इधर शिफ्ट हो गए हैं. ये तस्वीर अपने देश के राजकाज और नीति-नियमों की सुंदर व्याख्या करने में सफल है. ध्यान से फोटो देखिए और थोड़ा खुलकर हंस लीजिए, सेहत पर असर पाजिटिव होगा. आनंदित करने वाले इस शानदार दृश्य को मुहैया कराने के लिए नेता जी और बीजेपी का आभार.

Asad Zaidi : Irresistible! Here is CP Singh, Urban Develeopment and Transport Minister of the BJP ruled Jharkhand, watering plants in heavy rain, with CRPF providing the umbrella cover. अतुलनीय भारत… भाजपा शासित झारखंड। शहरी विकास व यातायात मंत्री सी पी सिंह भारी बारिश में पौधों को पानी देते हुए। छाता सेवा : सीआरपीएफ़।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह और कवि-पत्रकार असद ज़ैदी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यशवंत की कुछ एफबी पोस्ट्स : चींटी-केंचुआ युद्ध, दक्षिण का पंथ, मार्क्स का बर्थडे और उदय प्रकाश से पहली मुलाकात

Yashwant Singh : आज मैं और Pratyush Pushkar जी दिल्ली के हौज खास विलेज इलाके में स्थित डिअर पार्क में यूं ही दोपहर के वक्त टहल रहे थे. बाद में एक बेंच पर बैठकर सुस्ताते हुए आपस में प्रकृति अध्यात्म ब्रह्मांड आदि की बातें कर रहे थे. तभी नीचे अपने पैर के पास देखा तो एक बिल में से निकल रहे केंचुए को चींटियों ने दौड़ा दौड़ा कर काटना शुरू किया और केंचुआ दर्द के मारे बिलबिलाता हुआ लगा.

मैंने फौरन मोबाइल कैमरा आन किया और पूरे युद्ध को रिकार्ड करना शुरू किया. क्या ऐसा लगता नहीं कि ये जो नेचर है, प्रकृति है इसने हर तरफ हर वक्त प्रेम के साथ साथ युद्ध भी थोप रखा है, या यूं कहिए प्रेम के साथ-साथ युद्ध को भी सृजित कर रखा है. हर कोई एक दूसरे का शिकार है, भोजन है. डिअर पार्क की झील के बारे में प्रत्यूष पुष्कर बता रहे थे कि जो पंछी मर झील में गिरते हैं उन्हें मछलियां खाती हैं और जब मछलियां मर कर सतह पर आती हैं तो ये पंछी खा जाते हैं. ये अजीब है न दुनिया. जितना समझना शुरू कीजिए, उतना ही अज्ञान बढ़ता जाएगा. इस नेचर के नेचर में क्या डामिनेट करता है, प्रेम या युद्ध? मेरे खयाल से दोनों अलग नहीं है. इनमें अदभुत एकता है. केंचुआ-चींटी युद्ध का वीडियो देखें :

xxxx

क्या यशवंत दक्षिणपंथी हो गया है? ये सवाल करते हुए एक मेरे प्यारे मित्र मेरे पास आए. उनने सवाल करने से पहले ही बोल दिया कि पूरा रिकार्ड करूंगा. मैंने कहा- ”मेरे पास और क्या है जनपक्षधर जीवन के सिवा.” उनकी पूरी बातचीत इस इंटरव्यू में देख सकते हैं. देखें वीडियो :

xxx

महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, कबीर… ये वो कुछ नाम हैं जिनसे मैं काफी प्रभावित रहा हूं. जिनका मेरे जीवन पर किसी न किसी रूप में गहरा असर रहा है या है. इन्हीं में से एक मार्क्स का आज जन्मदिन है. मार्क्स को पढ़-समझ कर मैंने इलाहाबाद में सिविल सर्विस की तैयारी और घर-परिवार छोड़कर नक्सल आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. मजदूरों, किसानों, छात्रों के बीच काम करते हुए एक दिन अचानक सब कुछ छोड़छाड़ कर लखनऊ भाग गया और थिएटर आदि करते करते पत्रकार बन गया. मार्क्स ने जो जीवन दृष्टि दी, जो बोध पैदा किया, उससे दुनिया समाज मनुष्य को समझने की अदभुत दृष्टि मिली. आज मैं खुद को भले मार्क्सवादी नहीं बल्कि ब्रह्मांडवादी (मानवतावाद से आगे की चीज) मानता होऊं पर जन्मदिन पर मार्क्स को सलाम व नमन करने से खुद को रोक नहीं पा रहा. हालांकि यह जानता हूं कि आजकल विचारधाराएं नहीं बल्कि तकनालजी दुनिया को बदलने का काम कर रही है, फिर भी मार्क्स ने जो हाशिए पर पड़े आदमी की तरफ खड़ा होकर संपूर्ण चिंतन, उपक्रम संचालित करने की जो दृष्टि दी वह अदभुत है.

xxx

You might be surprised to know that a spot on the surface of the Earth is moving at 1675 km/h or 465 meters/second. That’s 1,040 miles/hour. Just think, for every second, you’re moving almost half a kilometer through space, and you don’t even feel it.

xxx

भड़ास4मीडिया इसी 17 मई को 9 साल का हो जाएगा. 17 मई 2008 को यह डोमेन नेम बुक हुआ था. जिस तरह पशु प्राणियों वनस्पतियों मनुष्यों आदि की एक एवरेज उम्र होती है, उसी तरह की उम्र वेबसाइटों-ब्लागों अचेतन चीजों की भी होती है, खासतौर पर उन उपक्रमों का जो वनमैन आर्मी के बतौर संचालित होते हैं, किसी मिशन-जुनून से संचालित किए जाते हैं. भड़ास के इस नौवें जन्मदिन पर कब और कैसा प्रोग्राम किया जाएगा, यह तय तो अभी नहीं किया है लेकिन कार्यक्रम होगा, ये तय है. मीडिया के कुछ उन साथियों को भी सम्मानित करना है जो लीक से हटकर काम कर रहे हैं, जिन्होंने साहस का परिचय देते हुए प्रबंधन को चुनौती दी, कंटेंट के लिए काम किया, सरोकार को जिंदा रखा. आप लोग भी इस काम के लिए उचित नाम सजेस्ट करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

xxx

आजकल उन कुछ लोगों से मिल रहा हूँ जिनसे रूबरू बैठने बतियाने की हसरत ज़माने से थी। जिनको पढ़ पढ़ के बड़ा हुआ, जिनको हीरो की तरह प्रेम किया, उनसे आज दोपहर से मुखातिब होने का मौका मिला है।

इन्हें शानदार कवि कहूं या अदभुत कथाकार-उपन्यासकार या ग़ज़ब इंसान। इन्हें भारत का नाम विदेशों में रोशन करने वाला अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक व्यक्तित्व कहूं। वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ तब पढ़ा था मैंने जब फुल कामरेड हो गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुवेशन करने के बाद जब बीएचयू बतौर होलटाइमर कामरेड के रूप में पहुंचा तो Uday Prakash जी की लिखी पहली कहानी पढ़ने के बाद उनकी कई कहानियां-रचनाएं पढ़ गया, फिर खोजता पढ़ता ही गया। ये लिविंग लीजेंड हैं, भारतीय साहित्य जगत के। इनसे मिलवाने के माध्यम बने पत्रकार भाई Satyendra PS जी। चीयर्स 🙂 (photo credit : भाभी कुमकुम सिंह जी)

xxx

आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे का गाजीपुर में जो सम्मान समारोह आयोजित किया गया, उसमें सबसे मजेदार पार्ट था ट्वंटी ट्वंटी के अंदाज में फटाफट सवाल जवाब. कई सवालों पर उन्हें नो कमेंट कहना पड़ा. उस आयोजन की पूरी रिपोर्ट कई वेबसाइटों, अखबारों, चैनलों पर आई लेकिन अभी तक भड़ास पर कुछ भी अपलोड नहीं किया गया. जल्द ही पूरी रिपोर्ट भड़ास पर आएगी और यह भी बताया जाएगा कि आखिर भड़ास ने इस आईपीएस को सम्मानित करने का फैसला क्यों किया. फिलहाल यह वीडियो देखें. शायद कुछ जवाब आपको मिल जाए. वीडियो में खास बात यह है कि आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे पूरी ईमानदारी से बेलौस सब कुछ बता गए. इस दौरान कुछ यूं लगे जैसे यह शख्स हमारे आपके बीच का ही है. उनकी खासियत भी यही है. वह सबसे पहले आम जन के अधिकारी हैं. इसी कारण उन्हें खुद के लिए उर्जा आम जन के लिए काम करने से मिलती है. आगे और भी वीडियो अपलोड किए जाएंगे. फिलहाल इसे देखें…

xxx

ट्रेवल ब्लॉगर Yashwant Singh Bhandari पर दिल्ली पुलिस के जवानों ने बोला धावा। लाल किले की बाहर से तस्वीर ले रहे थे। एक डॉक्यूमेंट्री के लिए दूर से खड़े होकर लाल किले के आउटर साइड को शूट कर रहे थे। जवानों ने धावा बोलकर न सिर्फ पीटा बल्कि पैसे भी छीन लिए। जब उन्होंने मुझे कॉल किया मदद के लिए तो मैंने 100 नंबर डायल करने की सलाह दी। इस बीच पुलिस वाले भड़क गए और भंडारी की पिटाई करने लगे। किसी तरह वो जान बचाकर भागे। पर्यटन को ऐसे ही बढ़ावा देगी राजनाथ की दिल्ली पुलिस! हम सभी को इस घटना की निंदा करनी चाहिए और दोषी पुलिसवालों को बर्खास्त करने की मांग रखनी चाहिए।

xxx

मोदी जी लग रहा है नाक कटवा देंगे. भक्त बेहद निराश हैं. मोदी जी में अचानक मनमोहन सिंह नजर आने लगे हैं जो न कुछ करता है न बोलता है. इतना कुछ देश विरोधी हो रहा है. कैंची की तरह चलने वाली जुबानें खामोश हैं. पाकिस्तान से लेकर नक्सलवाद तक, कश्मीर से लेकर महंगाई तक, सब कुछ भयंकर उठान पर है. लोग तो कहने लगे हैं कि जब देश चाय वाले के हवाले कर देंगे तो यही सब होगा. कुछ कर डालिए मोदी जी, आपसे भक्तों की पुकार आह्वान सुन सुन कर मेरी भुजाएं फड़कने लगी हैं. अब ऐसे में कैसे चुप रह सकते हैं. जरूर आप कोई नई योजना बना रहे होंगे. न भी बना रहे होंगे तो चैनल वाले अपने तीसरे आंख से योजना की भनक लगा लेंगे और आपके इंप्लीमेंट करने से पहले ही ‘दुश्मनों’ को मारे काटे गिराते जाते हुए दिखा देंगे और भक्त समेत पूरा देश एक बार फिर मोदीजीकीजैजै करने लगेगा… आंय.. मुझे कुछ आवाजें धांय धूंय धड़ाम की सुनाई पड़ने लगी हैं, वाया रजत शर्मा के इंडिया टीवी… कई अन्य चैनलों के एंकर भी तोप और राइफल तानने लगे हैं अपने अपने स्टूडियो में… आप आनंद से सोइए, मीडिया वाले आपका काम कर ही डालेंगे… आइए हम सब बोलें भामाकीजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रोमियो शब्द का अर्थ प्रेमी नहीं, रसिक या कामुक है!

Sujata Mishra : शैक्सपीयर के प्रसिद्द नाटक “रोमियो-जूलियट” का चर्चित पात्र रोमियो महज़ एक नाट्य चरित्र था, कोई वास्तविक व्यक्ति नहीं. रोमियो मूलत: इटालियन भाषा का शब्द है. इस शब्द का अर्थ है रसिक, कामुक, इश्कबाज़. आप इसे प्ले बॉय या कैसनोव शब्द से भी समझ सकते हैं. यानि ऐसा पुरुष जो स्त्रियों के प्रति जरुरत से ज्यादा रूचि रखता हो या जिसके एकाधिक स्त्रियों से सम्बन्ध हो. शैक्सपीयर के नाटक रोमियो जूलिएट में भी जूलियट से मिलने से पूर्व रोमियो रोसलिन की तरफ आकर्षित दिखाया गया है.

हालांकि यह एक दुखांत नाटक है और हम सब लोग रोमियो जूलियट को आदर्श प्रेम चरित्र के रूप में जानते हैं. किन्तु अंततः यह मात्र काल्पनिक रचना ही है. शेक्सपियर का रचनाकाल मूलत: यूरोपीय पुनर्जागरण का काल ही है जहाँ कैथोलिक चर्च की रूढ़िवादी मान्यताओं के विरुद्ध साहित्यकार, चित्रकार, कलाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से आवाज़ उठा रहे थे. इसीलिए शैक्सपीयर की अधिकाँश रचनाएं प्रेम कहानियों पर आधारित हैं और उनका अंत ट्रेजेडी में हुआ है, क्योंकि उस समय तक यूरोपीय देशों में प्रेम या प्रेम विवाह करना कल्पना से परे था. लोगों की निजी ज़िन्दगी तक में चर्च का सीधा दखल होता था.

संभवत: इसलिए शैक्सपीयर ने अपने पात्र का नाम “रोमियो” रखा, जो समाज पर एक कटाक्ष भी था. हमारे यहाँ भी समाज की मान्यताओं से विरुद्ध जाकर कई लेखक, कलाकार अपना अजीबोगरीब नामाकरण करते रहते हैं, जिसके जरिये वो समाज की मान्यताओं और चली आ रही परिपाटी पर चोट करते हैं। अतः रोमियो शब्द का अर्थ प्रेमी नहीं है, रसिक या कामुक है। यह अपने आप में एक नकारात्मक शब्द है, अतः इस पर हल्ला मचाना ही मूर्खता है। हालांकि उत्तर प्रदेश में बनाई गयी एंटी रोमियो स्क्वायड को मैं भी अनुचित मानती हूँ, क्योंकि इसका दुरूपयोग ज्यादा होगा। किन्तु इस के नामकरण से मुझे कोई आपत्ति नहीं है, नामकरण बिल्कुल सही है।

डा. सुजाता मिश्रा की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एयर इंडिया वाले लतखोर होते ही हैं!

Yashwant Singh : उपराष्ट्रपति के साथ वेनेजुएला जा रहा था तो एक मेरे पत्रकार मित्र एआई वन के मेल फीमेल एयरहोस्टेस की विनम्रता देख दंग थे. कहते थे यशवंत जी पहली बार इन्हें इतना विनम्र देखा हूं. जरूर इन्हें प्रायश्चित पोस्टिंग मिली है ये. वे कहते रहे कि ये ऐसे बात-बिहैव करते हैं जैसे ये खुदा हों. पत्रकार मित्र आने-जाने के दौरान एयर होस्टेस और एयर इंडिया स्टाफ की विनम्रता देख-देख आंखे फाड़ रहे थे.

तब मुझे लगा कि ये सरकारी जहाज कंपनी के लोग यात्रियों को रुला के रखते हैं. ऐसी हालत में जूता मारना तो ठीक लगता है भाया. 😀

वैसे भी, टिकट बिजनेस क्लास का है और बैठाते इकानामी क्लास में हो तो जूता मार काम तो है ही. ये अलग बात है जूता वही मार पाया जो प्रभावशाली है वरना कोई यात्री मारता तो न सिर्फ एअर इंडिया वालों से हिक भर लात खाया होता बल्कि सूजे मुंह के साथ जेल में होता. एयर इंडिया वाले अगर एक लाख बार बदतमीजी करें तो कम से कम एक बार तो जूता मारना बनता है भाऊ :) नो हाय हाय.. बी प्रैक्टिकल…

वैसे जूता मारने का यह काम कोई कामरेड किया होता तो बाकी कामरेड कहते कि जनता कितना बर्दाश्त करेगी, इन्हीं हालात में नक्सलवादी पैदा होता है… शिवसेना वाले ने जूता मार काम कर दिया तो गलत कैसे… जहां पानी रुक जाए, सड़ जाए, गंधला हो जाए… वहां कोई पत्थर मार दे ताकि यथास्थितिवाद खत्म हो, प्रवाह के नए रास्ते खुलें… माफ कीजिएगा… मैं भाजपाई बिलकुल नहीं हूं लेकिन चीजों को एक चश्मे से देखने की जगह मौलिक तरीके से देखने की कोशिश कर रहा हूं ताकि मूल समस्या, मूल बात सामने आ सके, न कि कौवा कान ले गया के आधार पर कौवे के पीछे पड़ जाएं, बगैर अपना कान देखे….

(अपने राइट विंग के फक्कड़ मित्र Kamal Kumar Singh की इस बारे में एफबी पोस्ट देखा तो वहीं कमेंट किया, उसी को यहां अलग से पोस्ट कर रहा हूं)

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

Chandan Srivastava : किसी की गुंडागर्दी के बारे में सुनकर गुस्सा आना स्वाभाविक है। लेकिन एक सांसद द्वारा एयर इंडिया के किसी कर्मचारी की चप्पल या सेंडिल से पिटाई की खबर पर मुझे गुस्सा आ नहीं रहा। अगर मैं कहूं कि यह कुछ और नहीं शेर को सवा शेर मिलने जैसी बात है और एयर इंडिया वाले कई बार यह या इससे थोड़ा कम तो डिजर्व करते ही हैं। (मतलब 25 नहीं चार-पांच चप्पल) तो अतिश्योक्ति या असहिष्णुता नहीं होगा।

तीन साल पहले एक दोस्त अमौसी एयरपोर्ट से अपने शहर जा रही थी। एक एयर इंडिया के कर्मचारी से चेक-इन के दौरान कुछ कहा-सुनी हुई। कर्मचारी ने उसके साथ अभद्रता की। हमने अमौसी एयरपोर्ट में ही बने एयर इंडिया के ऑफिस में जाकर घटना की लिखित शिकायत की। तीन साल बीत गए, अब तक उस शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं हुई सिवाय कुछ दिनों बाद शिकायत प्राप्त होने का एक लेटर मिलने के। अब तो शिकायत की कॉपी पता नहीं मेरे पास भी सुरक्षित है भी कि नहीं। लेकिन इस बार एयर इंडिया वालों ने किसी ऐसे शख्स को उंगली कर दी जो उनसे भी बड़ा बद्तमीज था। That’s it. मामला बस इतना ही है।

लखनऊ के पत्रकार और वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मैं तो अपने कप्तान के खिलाफ भी एफआईआर लिखने से न झिझकता : अमिताभ ठाकुर

Amitabh Thakur : जब मैं 1996 में एसपी सिटी मुरादाबाद था तो मैं एक मामले में एफआईआर दर्ज करने की बात कह रहा था क्योंकि कोई व्यक्ति खुद को पीड़ित बता कर अपनी एफआईआर लिखवाना चाहता था. मेरे सीनियर एसएसपी मुरादाबाद एफआईआर नहीं चाहते थे, कहीं से कोई दवाब था.

मीटिंग में इस पर चर्चा होने लगी. उन्होंने कहा एफआईआर क्यों लिखा जाएगा, मैंने कहा सीआरपीसी में उसका अधिकार है. एसएसपी ने कहा तो क्या यदि मेरे खिलाफ कोई एफआईआर ले कर आएगा तो आप उसे भी लिखेंगे. मेरे मुंह से तुरंत निकला- “क़ानून तो यही कहता है”. मेरी जो समस्या 1996 में थी वही आज 2017 में भी है.

यूपी के चर्चित आईजी अमिताभ ठाकुर की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इस सीट पर ईवीएम से छेड़छाड़ न कर सके तो हार गई भाजपा!

Ashwini Kumar Srivastava : यह है मेरठ की उसी सीट से जुड़ी खबर, जिस पर भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी इस भयंकर मोदी तूफ़ान में भी हार गए थे। ईवीएम के साथ वीवीपीएटी की चाक चौबंद व्यवस्था में यहाँ 11 फ़रवरी को मतदान हुआ। इसके बाद जहाँ ईवीएम मशीन रखी गयी, वहां हर समय मौजूद रहने वाले व्यक्ति की लाश गटर में मिली। यानी इस बात की पूरी सम्भावना है कि मतदान के बाद यहाँ रखी ईवीएम से छेड़छाड़ की कोशिश की गयी, जिसे इस व्यक्ति ने देख लिया और इसी के चलते यह हत्या हो गयी।

यह भी तो हो सकता है कि मारे गए इसी व्यक्ति के प्रतिरोध के चलते अंततः यहाँ की ईवीएम में छेड़छाड़ ही न हो पायी हो और वास्तविक नतीजे मिलने के चलते वाजपेयी हार गये हों। अगर ईवीएम में छेड़छाड़ हो जाती तो शायद मेरठ का विधायक आज कोई और ही होता।

जिस व्यक्ति की हत्या हुई, उसकी तैनाती यूपी की बहुचर्चित आईएएस और मेरठ की डीएम बी चंद्रकला ने की थी। तैनात व्यक्ति लंगूर का मालिक था। डीएम ने ईवीएम को रखे जाने वाले स्ट्रांग रूम में बंदरों के उत्पात को देखते हुए अचानक लंगूर को रखवाने का फैसला किया था। चूँकि लंगूर को रखवाने का फैसला अचानक ही लिया गया था इसलिए सम्भव है कि ईवीएम से छेड़छाड़ करने की कोशिश करने वालों को ईवीएम स्थल पर लंगूर मालिक की मौजूदगी का पता ही न चला हो। फिर अप्रत्याशित रूप से लंगूर मालिक का सामना होने पर उन्हें लंगूर मालिक की हत्या करके फरार हो जाना पड़ा हो।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सागरिका घोष ने मुख़्तार परिवार के महिमामंडन वाला लेख लिखा!

ये एक दिन में नहीं हुआ है। और, ये स्थापित करने में सबसे बड़ी भूमिका बड़का टाइप के सरोकारी साबित पत्रकार, लेखकों ने निभाई है। ताज़ा सागरिका घोष का मुख़्तार परिवार का महिमामंडन वाला लेख पढ़ लीजिए या किसी हरिशंकर तिवारी, रघुराज प्रताप सिंह जैसों के बारे में दिल्ली लखनऊ से इन आरोपी अपराधियों के इलाक़े में गए पत्रकारों की रिपोर्टिंग पढ़िए। सब राबिनहुड छवि बनाने का ठेका लिए दिखते हैं।

इन बड़का पत्रकारों ने समाज में अपराधियों को मान्यता दिलाने में अथक परिश्रम किया है। और दोष ये स्टूडियो में बैठकर समाज को देते हैं, अपनी जातियों के अपराधी छवि वाले नेताओं को मत देने का। इन पत्रकारों की रिपोर्ट ध्वस्त कीजिए। अपने इलाक़े के किसी हरिशंकर तिवारी, अमनमणि त्रिपाठी, रघुराज प्रताप सिंह, मुख़्तार अंसारियों को, उनके नाम पर किसी को वोट मत दीजिए।

वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हां मोदी जी, आपके माथे पर एक नहीं, कई कई कलंक हैं, लीजिए सुनिए…

Deshpal Singh Panwar :  बड़े सरकार आज मेरठ की धरती पर दहाड़ रहे थे -है कोई कलंक मेरे माथे पर-बिना किसी की सुने खुद ही फैसला सुना रहे थे-नहीं है ना। तो सुनिए मैं बताता हूं आपके माथे पर कलंक क्या-क्या हैं, ना तो अाप मानेंगे और ना ही आपके चेले फिर भी–

आपकी नोटबंदी के कारण सौ से ज्यादा लोगों ने लाइन में दम तोड़ा-ये कलंक है आपके माथे पर -उनके घर वालों से पूछ लीजिए।

लाखों लोग बेरोजगार हो गए, धंधे बंद हो गए, देश की हालत खस्ता हो गई वो आपके माथे पर कलंक है-किसी से पूछ लीजिए।

सीमा पर जो जवान शहीद हुए आपके राज में वो कलंक है आपके माथे पर-उनके घर वालों से पूछ लीजिए। पठानकोट समेत कई जगह जो आतंकी हमले हुए वो कलंक है आपके माथे पर।

राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़ में आपकी सरकार के समय में जो घपले-घोटाले हुए और आप चुप्पी साधे बैठे रहे, ये कलंक है आपके माथे पर।

गिनाने को 10-20 और कलंक गिना सकता हूं लेकिन आपने तो केवल एक पूछा था… अगर आपके चेले और जानना चाहते हैं तो वो भी बता सकता हूं।

मेरठ के रहने वाले और देश के कई शहरों / प्रदेशों में संपादक के रूप में कार्य कर चुके वरिष्ठ पत्रकार देशपाल सिंह पंवार की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

डीआईजी विजय भूषण ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मनोरोगी’ बताया!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में तैनात डीआईजी विजय भूषण ने एक अजीबोगरीब पोस्ट को साझा किया है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मनोरोगी’ बताया गया है. एक बड़े पद पर आसीन पुलिस अफसर द्वारा अपने प्रधानमंत्री पर अभद्र टिप्पणी का यह मामला तूल पकड़ता, उससे पहले ही अफसर ने सफाई दे दी कि सिस्टम जनरेटेड इरर के कारण यह पोस्ट कई ह्वाट्सएप ग्रुपों में गलती से शेयर हो गया.

वाराणसी मंडल के पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) विजय भूषण की तरफ से जब प्रधानमंत्री को ‘मनोरोगी’ बताने वाली पोस्ट कई लोगों के पास पहुंची तो ज्यादातर सन्न रह गए. इस पोस्ट में मोदी को किसी मनोरोगी की तरह न चिल्लाने की सलाह दी गई थी. ये सलाह वाट्सअप में एक खुले पत्र के अंदाज में डाली गई. बाद में डीआईजी ने बताया कि यह पोस्ट उनके द्वारा नहीं लिखी गई है.

डीआईजी विजय भूषण के मुताबिक कई वाट्सअप ग्रुपों में उनका नंबर जुड़ा है. किसी में यह मैसेज बाहर से आया था. सिस्टम जेनरेटेड एरर के जरिए यह बाहर के ग्रुपों में चला गया. बाद में उन्होंने अपने आप को ग्रुप से हटा लिया है.

उत्तर प्रदेश के डीजीपी जावीद अहमद का कहना है कि यह मामला उनके संज्ञान में नहीं है. ज्ञात हो कि विजय भूषण राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी रहे हैं. 2003 में प्रमोशन पाकर आईपीएस बने. मूल रुप से इलाहाबाद जिले के रहने वाले इस पुलिस अधिकारी ने एम.ए. तक की शिक्षा ग्रहण की है. इन्हें सेवा में सराहनीय कार्य के लिए गैलेंट्री अवार्ड भी मिल चुके हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वो ‘मीडिया को ही विपक्ष’ बना लेंगे. डोनल्ड ट्रंप कई बार मीडिया संस्थानों के लिए भद्दी भाषा का प्रयोग कर चुके हैं और कई स्थापित चैनलों को फ़र्ज़ी तक कह चुके हैं. ऐसा करके वो अपने एक ख़ास समर्थक वर्ग को ख़ुश भी कर देते हैं.

दुनिया में नया ऑर्डर स्थापित हो रहा है. इसमें पत्रकारों को भी अपनी नई भूमिका तय करनी होगी. जब अपनी बात पहुँचाने के लिए नेताओं के पास ‘सोशल मीडिया’ है तो वो ‘स्थापित मीडिया’ से दूरी बनाने में परहेज़ क्यों करेंगे?

मुझे लगता है कि ऐसे बदलते परिवेश में वो ही पत्रकार कामयाब होंगे और पहचान पाएंगे जो संस्थानों के समकक्ष स्वयं को स्थापित कर लेंगे. ‘बाइट-जर्नलिस्टों’ की जगह ‘विषय विशेषज्ञों’ की पूछ होगी.

जिस दौर में स्थापित मीडिया को विलेन बनाया जा रहा है उस दौर में पत्रकारों के पास ज़मीनी रिपोर्टिंग करके ‘हीरो’ बनने का मौक़ा भी है.

पत्रकार दिलनवाज पाशा की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हे अखिलेश, जब मुजफ्फरनगर में दंगा और सैफई में नाच हो रहा था तब आपने क्यों नहीं आवाज निकाली?

प्रिय अखिलेश भैया,

जब 2012 में चुनाव था, तब मेरे पास वोट नही था। सपा नापसन्द होते हुए भी मैंने आपको सपोर्ट किया, दूसरों को कहा आपको वोट दें। ऐसा सुनने में आता रहा कि आप तो इस परिवारवाद से ऊपर आना चाहते हैं लेकिन आपके ही घर के लोग आपको फैसले नहीं करने देते, वगैरह!! तो मुझे आपसे यह कहना है कि फैसले कदम दर कदम लिए जाते हैं। आपने तब क्यों नहीं आवाज़ निकाली जब मुजफ्फरनगर दंगे हो रहे थे, और सैफई में नाच होता रहा।

जिस ढंग से पार्टी ऑफिस पर कब्ज़ा हुआ, उससे क्या जताना चाहते हैं? जैसे कि उत्तर प्रदेश आपकी सल्तनत है और आप इसके शहज़ादे जो तख़्तापलट करेंगे! नेता जो थे, वो आपके पिता श्री हैं । उनका संघर्ष है ये पार्टी । कांग्रेस के भक्ति काल में जब वो प्रचार के लिए गांव गांव जाते थे तब काले झंडे से ले कर जूते तक, सब उन्होंने सहा है और हिम्मत नहीं हारी है । आज इटावा में अहीरों को जो इज़्ज़त मिली है, उनकी देन है, भले इसका गलत फायदा उठाया जा रहा है तब भी । आपको उनकी बे इज़्ज़ती करने का कोई अधिकार नहीं है।

आपने पार्टी पर कब्ज़ा कर के ये सिद्ध किया कि आपको स.पा. की बैसाखी की जरूरत है, आपका अचानक से यह दुस्साहस आपकी बौखलाहट दिखा रहा है । आप परिवारवाद से निकले ही नहीं, एक चाचा छोड़ा तो दूसरे को लाद लिया !! आप को खुद को सिद्ध करना ही था तो छोड़ते पार्टी, और करते संघर्ष ! इस बार नहीं भी तो अगली बार बनते मुख्यमंत्री और तब कहलाते आप नेता, अपने पिता की तरह!

सपा को उसके हाल पर छोड़ते, पिता जी की जिंदगी भर की मेहनत थी वो ! आपके पिता में लाख़ कमी रही लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वो आपसे बेहतर देख पा रहे होंगे कि आप के पिछलग्गू क्या कर रहे हैं । आपको चने के झाड़ पर चढ़ाया जा रहा है और आप चढ़ रहे हैं! अगर आप चुनाव जीतते हैं तो उम्मीद है कि आप अपनी अक्ल चलाएंगे, सलाहकारों की नहीं!

इस बार एक वोटर!

लेखिका अपूर्वा प्रताप सिंह आगरा की निवासी हैं और सोशल मीडिया पर बेबाक टिप्पणियों के लिए जानी पहचानी जाती हैं. उनका यह लिखा उनकी एफबी वॉल से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

इसे भी पढें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बरखा दत्त और रवीश कुमार का ईमेल व ट्वीटर एकाउंट हैक

रवीश कुमार ने ईमेल-ट्वीटर एकाउंट हैक किए जाने को लेकर अपने ब्लाग नई सड़क पर एक पोस्ट का प्रकाशन किया है, जो इस प्रकार है…

हम फ़कीर नहीं हैं कि झोला लेकर चल देंगे..

रवीश कुमार

मेरे हमसफ़र दोस्तों….

किसी को मेरे ईमेल और फोन में क्या दिलचस्पी हो सकती है वो हैक करने की योजना बनाएगा। शनिवार की मध्यरात्रि मेरी वरिष्ठ सहयोगी बरखा दत्त का ईमेल हैक कर लिया गया। उनका ट्वीटर अकाउंट भी हैक हुआ। उसके कुछ देर बाद मेरा ट्वीटर अकाउंट हैक कर लिया गया। उससे अनाप शनाप बातें लिखीं गईं। जब मैंने एक साल से ट्वीट करना बंद कर दिया है तब भी उसका इतना ख़ौफ़ है कि कुछ उत्पाति नियमित रूप से गालियां देते रहते हैं। ये सब करने में काफी मेहनत लगती है। एक पूरा ढांचा खड़ा किया जाता होगा जिसके अपने ख़र्चे भी होते होंगे। ढाई साल की इनकी मेहनत बेकार गई है मगर उस डर का क्या करें जो मेरा नाम सुनते ही इनके दिलों दिमाग़ में कंपकपी पैदा कर देता है। ज़रूर कोई बड़ा आदमी कांपता होगा फिर वो किसी किराये के आदमी को कहता होगा कि देखता नहीं मैं कांप रहा हूं। जल्दी जाकर उसके ट्वीटर हैंडल पर गाली दो। दोस्तों, जो अकाउंट हैक हुआ है उस पर मेरा लिखा तो कम है, उन्हीं की बदज़ुबान और बदख़्याल बातें वहां हैं। मैं चाहता हूं कि वे मुझसे न डरें बल्कि मेरा लिखा हुआ पढ़ें।

मेरी निजता भंग हुई है। मेरा भी ईमेल हैक हुआ है। बरखा दत्त की भी निजता भंग हुई है। मैं सिर्फ रवीश कुमार नहीं हूं। एक पत्रकार भी हूं। कोई हमारे ईमेल में दिलचस्पी क्यों ले रहा है। क्या हमें डराने के लिए? आप बिल्कुल ग़लत समझ रहे हैं। ये आपको याद दिलाया जा रहा है कि जब हम इन लोगों के साथ ऐसा कर सकते हैं तो आपके साथ क्या करेंगे याद रखना। पत्रकारों को जो भी ताकतें डराती हैं दरअसल वो जनता को डराती हैं। अगर हमारी निजता और स्वतंत्रता का सवाल आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं है तो याद रखियेगा एक दिन आपकी भी बारी आने वाली है। जिस लोकतंत्र में डर बैठ जाए या डरने को व्यापक मंज़ूरी मिलने लगे वो एक दिन ढह जाएगा। आपका फर्ज़ बनता है कि इसके ख़िलाफ़ बोलिये। डरपोकों की बारात बन गई है जो किसी मुख्यालयों के पीछे के कमरे में बैठकर ये सब काम करते हैं। अभी तो पता नहीं है कि किसकी हरकत है। जब राहुल गांधी के बारे में ठोस रूप से पता नहीं चल सका तो हम लोगों को कौन पूछ रहा है। आख़िर वो कौन लोग हैं, उन्हें किसका समर्थन प्राप्त है जो लगातार हमारे ट्वीटर अकाउंट पर आकर गालियां बकते हैं। अफवाहें फैलाते हैं। आपको बिल्कुल पता करना चाहिए कि क्या यह काम कोई राजनीतिक पार्टी करती है। ऐसा काम करने वाले क्या किसी राजनीतिक दल के समर्थक हैं। पता कीजिए वर्ना आपका ही पता नहीं चलेगा।

आप सोचिये कि आपका पासवर्ड कोई चुरा ले। आपके ईमेल में जाकर ताक झांक करे तो क्या आपको ठीक लगेगा। क्या आप ऐसी साइबर और राजनीतिक संस्कृति चाहेंगे? आपका जवाब हां में होगा तो एक दिन आपके साथ भी यही होगा। हैकरों ने बता दिया है कि भारत साइबर सुरक्षा के मामले में कमज़ोर है। हैकिंग पूरी दुनिया में होती है लेकिन यहां की पुलिस भी इसके तार को जोड़ने में अक्षम रहती है। साइबर सुरक्षा के नाम पर अभी तक दो चार चिरकुट किस्म के नेताओं के ख़िलाफ़ लिखने वालों को ही पकड़ सकी है। वो नेता चिरकुट ही होता है जो अपने ख़िलाफ़ लिखी गई बातों के लिए किसी को अरेस्ट कराता है या अरेस्ट करने की संस्कृति को मौन सहमति देता है। जब हम लोगों के अकाउंट हैक किये जा सकते है तो ज़रूरत है कि लोगों को बेहतर तरीके साइबर सुरक्षा के मामले में जागरूक किया जाए। गांव देहात के लोगों के साथ ऐसा हुआ तो उन पर क्या बीतेगी। हमारा तो लिखा हुआ लुटा है, अगर ग़रीब जनता की कमाई लुट गई तो मीडिया ही नहीं जाएगा। ज़्यादा से ज्यादा किसी रद्दी अख़बार के कोने में छप जाएगा जिसके पहले पन्ने पर सरकार का ज़रूरत से ज़्यादा गुणगान छपा होगा।

मैं ढाई साल से इस आनलाइन सियासी गुंडागर्दी के बारे में लिख रहा हूं। आख़िर वे कितने नकारे हो सकते हैं जो किसी का ईमेल हैक होने पर खुशी ज़ाहिर कर रहे हैं। क्या अब हमारी राजनीति और फोकटिया नेता ऐसे ही समर्थकों के दम पर घुड़की मारेंगे। ये जिस भी दल के समर्थक या सहयोगी है उसके नेताओं को चाहिए कि अपने इन बीमार सपोर्टरों को डाक्टर के पास ले जाएं। इनकी ठीक से क्लास भी लें कि ये ढाई साल से मेरे पीछे मेहनत कर रहे हैं और कुछ न कर पाये। अगर किसी नेता को दिक्कत है तो ख़द से बोले न, ठाकुर की फौज बनाकर क्यों ये सब काम हो रहा है। अगर इतना ही डर हो गया है तो छोड़ देंगे। लिखा तो है कि अब छोड़ दूंगा। ऐश कीजिए। चौराहे पर चार हीरो खड़ा करके ये सब काम करने वाले इतिहास के दौर में हमेशा से रहे हैं। इसलिए भारतीय साहित्य संस्कृति में चौराहा बदमाश लंपटों के अड्डों के रूप में जाना जाता है। हमारी भोजपुरी में कहते है कि लफुआ ह, दिन भर चौक पर रहेला। ज़ाहिर है अकाउंट हैक होने पर इन जश्न मनाने वाले लोगों के बारे में सोच कर मन उदास हुआ है।ये घर से तो निकलते होंगे मां बाप को बता कर कि देश के काम में लगे नेताओं का काम करने जा रहे हैं। लेकिन वहां पहुंच कर ये गाली गलौज का काम करते हैं। आई टी सेल गुंडो का अड्डा है। दो चार शरीफों को रखकर बाकी काम यही सब होता है। लड़कियां ऐसे लड़कों से सतर्क रहें। इनसे दोस्ती तो दूर परिचय तक मत रखना। वो लोग भी बीमार हैं जो ऐसे लोगों का समर्थन करते हैं।

तो दो बाते हैं। एक तो किसी का भी अकाउंट हैक हो सकता है। हैक करने वाला अक्सर दूर देश में भी बैठा हो सकता है। आई टी सेल इस तरह का काम करने वालों को ठेका भी दे सकता है. आपको ताज़िंदगी मालूम न चलेगा। मैं तो यह भी सोच कर हैरान हूं कि आख़िर वो कौन लोग होंगे जो बरखा दत्त का ईमेल पढ़ना चाहेंगे। मेरा ईमेल पढ़ना चाहेंगे। अगर इतनी ही दिलचस्पी है तो घर आ जाइये। कुछ पुराने कपड़े हैं, धोने के लिए दे देता हूं। जाने दीजिए, समाज में ऐसे लोग हमेशा मिलेंगे लेकिन आप जो खुद को चिंतनशील नागरिक समझते हैं, इस बात को ठीक से समझिये। हमारे बाहने आपको डराया जा रहा है। हमारा क्या है। फिर से नया लिख लेंगे। आप नहीं पढ़ेंगे तो भी लिख लेंगे। हम फ़कीर नहीं हैं कि झोला लेकर चल देंगे। हम लकीर हैं। जहां खींच जाते हैं और जहां खींच देते हैं वहां गहरे निशान पड़ जाते हैं। सदियों तक उसके निशान रहेंगे। मैं किसी के बोलने देने का इंतज़ार नहीं करता हूं। जो बोलना होता है बोल देता हूं। कुलमिलाकर निंदा करते हैं और जो भी भीतर भीतर गुदगुदा रहे हैं उन्हें बता देते हैं कि आप एक बेहद ख़तरनाक दौर में रह रहे हैं। आपके बच्चे इससे भी ख़तरनाक दौर में रहेंगे। पासवर्ड ही नहीं, राजनीतिक निष्ठा भी बदलते रहिए। साइबर और सियासत में सुरक्षित रहने के लिए आप इतना ही कर सकते हैं। इतना कर लीजिए।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वरिष्ठ पत्रकार वेद विलास उनियाल ने देहरादून के किस अखबार का लंबा-चौड़ा पोस्टमार्टम कर डाला

Ved Uniyal : उस ईश्वर का धन्यवाद जिसने अपने इस प्यारे राज्य उत्तराखंड के हित में सच लिखने कहने का साहस दिया है। प्लीज जानिए कि मैं कहना क्या चाहता हूं । मेरा निवेदन कि अखबार के मालिक इस पोस्ट को जरूर पढें। मान्यवर कुछ समय तक हम देखते रहे कि शायद ठीक हो जाएगा। लेकिन अब बहुत गंद मच गई है। आपसे निवेदन पत्रकारिता के जरिए इस पहाड को बचाइए। आपके संस्थान का और पहाड का एक नाता रहा है। यह विवशता में लिखना पडा रहा है। कोई और चारा नहीं है हमारे पास।

देहरादून का एक अखबार…

-फिर माफीनामा। आए दिन गलत खबर, बार बार खबरों का दोहराव। कभी कभी गलती होना स्वभाविक है। मगर बार बार गलत तथ्य। उदाहरण के लिए – उत्तराखंड 16 साल पहले आजाद हुआ था इनके लिए।

वजह – अति बडे पदो पर एकदम छलांग। बीच की सीढी गायब। दरअसल यह योग्यता नहीं,अयोग्यता और तिकडम की पहचान है। साथ में लाए आए, बुलाए लोगों को भी बिना अनुभव , ज्ञान, पर्याप्त योग्यता के हैसियत से कहीं ऊंचा पद मिल जाना। जैसे आम सैनिक से सीधे तिकडम लगाकर कोई ब्रिगेडियर बन जाए। फिर वो सीमा पर क्या करेगा जान लीजिए। पत्रकारिता में कुछ पद ऐसे ही हासिल किए गए हैं। उनका खामियाजा पाठक या दर्शक भुगतता है। एक गांव , क्षेत्र के लोग पूरे अखबार पर जकड बनाए हुए हैं। न ये बाढ में जाते न भूकंप में जाते, न किसी दूरस्थ गांव में जाते, न किसी सामाजिक सरोकर से जुडते। न ये इस राज्य में आकर इसे जानने की कोशिश करते, न अध्ययन करते न अध्ययन की जरूरत समझते। केवल देहरादून में बैठकर इनकी तिकडमी पत्रकारिता।

नतीजा –  समाज को आए दिन गलत तथ्यों पर खबरें मिलना, गलत जानकारी मिलना। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य के साथ खिलवाड करना ।

सोच – क्षेत्रीयता कूट कूट कर भरी। पहाडियों के प्रति इतनी नफरत और अविश्वनीयता कि ब्यूरो के पांच पद और महत्वपूर्ण पदों पर एक भी पहाडी नहीं। भले ही योग्यता में कम अपने लोग बिठा दिए हों। जरा महसूस तो कीजिए कि जिन्हें लखनऊ में प्राइमरी कामों में अयोग्य होने के नाते दरवाजा दिखाया गया हो वो पिछली खिडकी से देहरादून में आकर स्टेट ब्यूरो चीफ बना हुआ हैं। जिन्हें उत्तराखंड का कुछ भी पता नहीं वो पोलिटिकल काम देख रहे हैं। दिखाने के लिए ही सही, एक पहाडी को तो रखते ब्यूरों में.।

लेकिन मन में खुराफात भरी हो तो कैसे संभव है। ऐसे अयोग्य उत्तराखंड पर लादने के लिए हैं। खुद स्थानीय मुखिया कभी अपने अखबार में दो लाइन नहीं लिख पाए जबकि पहाड के पत्रकारों का इस अखबार से गहरा नाता रहा है। इस अखबार ने भी हमेशा पहाडी पत्रकारों को अपना माना। अखबार के मालिक और पहाडों की जनता के बीच भावनात्मक लगाव रहा है। अच्छे अच्छे पहाडी और पहाड के पत्रकारों ने इस अखबार में जुडकर अपना योगदान दिया। उत्तराखंड आंदोलन में भी इस अखबार ने उत्तराखंड की जनता की भावनाओ का सम्मान किया।

लेकिन अब यहां देहरादून में गंदे सर्कीण लोग आकर अखबार के मालिक को यहां के सच से दूर ऱखने की कोशिश करते हैं। अपने साथ एक दो लोग तो हर कोई मुखिया लाता है पर यहां तो पूरा चक्रव्यूह ही बिछाया है, कोई बडा पद, कोई बडा काम किसी पहाडी पत्रकार के लिए नहीं छोडा। और जिन लोगों को काम सौंपा है वो अयोग्य हैं, पात्रता भी नहीं रखते। ये राज्य से दूर बैठे उच्च संपादकों को गुमराह कर रहे हैं। इस तरह यहां के पहाडी पत्रकारों पर अविश्वास किया जा रहा है।

काम-  अपनी ही तरह गैर अनुभवी, जुगा़डू लोगों की बडे संवेदनशील महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति करना। उनके जरिए अक्सर भ्रमपरक, तथ्यरहित खबरें लिखा जाना। उनकी खबरों को देख पाने का कौशल न होना।

कुशलता – अपने पत्रकारिय काम की क्षमता की कमी को दूसरे आयोजनों के प्रबंधन से छुपाना। अपने नंबर बढाना। मालिकों और अपने से उच्च संपादकों को एक्टिव, दक्ष – कुशल होने का आभास कराना। लेकिन इसका पाठक और समाज को कोई सीधा फायदा नहीं।

परिणाम – अखबार की बनी बनाई प्रतिष्ठा को निंरतर आघात पहुंचना।

अखबार के जरिए अच्छी रिपोर्टिंग न हो पाना। ढंग के विश्लेषण न हो पाना, गांववदूर दराज की संवेदनशील जरूरी चीजों का अखबार में समावेश न हो पाना। हर चीज कुछ नेता ,अधिकारियों तक सीमित हो जाना।

शातिरता – स्टेट ब्यूरो प्रमुख देहरादून बिराजता हैं तो कई बीजापुर गेस्ट हाउस में ठहराया जाता हैं। संस्थान किसी आने -जाने, बदली में बाकायदा पैसा देता हैं। लेकिन संस्थान के मालिक को नहीं बताया जाता कि मान्यवर कई दिन बीजापुर में रुके हैं।

निष्कर्ष – राज्य भर में ऐसे कई पत्रकार फेले हैं। ऐसे लोगों को पत्रकारिता छोडकर कोई दूसरा काम करना चाहिए। अपनी कई तरह की कमजोरियों के साथ वो इस अच्छे पेशे के साथ खिलवाड करते हैं। उत्तराखंड की राजधानी मैं बैठकर इस संवेदशील और कठिन हालात में चल रहे राज्य को रौंदते हैं। दबाव, धमकी, ब्लेकमैलिंग को अपना जरिया बनाते हैं। फिर शहर राज्य में तरह तरह की खबरें उड़ती हैं।

समय आया है कि इन बातों की तरफ हमें सबका ध्यान खींचना पडेगा। वरना राज्य खत्म हो जाएगा। उस अखबार के लिए भी ये शुभ है कि ऐसे लोग छोडकर जाए। देश में कहीं के भी रहने वाले हो लेकिन मेधावी , पढे लिखे, क्षेत्रीय आग्रहों से दूर संवेदनशील लोग उत्तराखंड , देहरादून की मीडिया में आएं। और सौभाग्य से कुछ ऐसे लोग हैं भी। उनका स्वागत।

मैंने स्वयं महाराष्ट्र, राजस्थान , पंजाब उप्र , हरियाणा तमाम राज्यों में पच्चीस साल पत्रकारिता की। आज भी पूरे समर्पण से दूसरे राज्य में मीडिया में हूं। लेकिन जहां भी रहा , वहां के लोगों के प्रति मन में रखा है।

वहां के बडे -छोटे पत्रकारों की इज्जत की। उनसे आज भी हमारे पारिवारिक संबंध हैं। पहाडों के हर पत्रकार ने इसी भावना से काम किया है। लेकिन स्वयं अपने राज्य में इन लोगों का ये बर्ताव बहुत खेदजनक हैं। इस पर सोचा ही जाना चाहिए। जब पानी सिर से ऊपर चला गया तब हमें यह खुला पत्र लिखने को मजबूर होना पडा।

अमर उजाला में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार वेद विलास उनियाल की एफबी वॉल से. वरिष्ठ पत्रकार वेद विलास उनियाल पच्चीस साल से ज्यादा समय से पत्रकारिता कर रहे हैं. वे आठ राज्यों में और कई बड़े अखबारों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

शिवराज चौहान ने भोपाल के चर्चित वीडियो ब्लागर अभिषेक मिश्रा को गिरफ्तार कराया, देखें वीडियो

अभिषेक मिश्रा

भोपाल के अभिषेक मिश्रा नामक एक चर्चित वीडियो ब्लॉगर को ग्यारह नवम्बर को मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज चौहान के इशारे पर गिरफ्तार कर लिया गया. यह आरोप खुद अभिषेक मिश्रा ने लगाया है. बताया जा रहा है कि अभिषेक को सिर्फ इसीलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि इन्होंने शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ एक खबर चला दी थी. इस खबर में कहा गया था कि शिवराज सिंह चौहान अपनी कार में करोड़ों रुपये ले जा रहे थे. अभिषेक ने व्यापम घोटाले के बारे में भी कई तथ्य शेयर किए. ये सारी खबरें रातों रात वायरल हो गईं.

ज्ञात हो कि अभिषेक मिश्रा भड़ास4मीडिया के आठवें स्थापना दिवस समारोह में विशिष्ट मेहमान थे और उन्होंने यूट्यूब और सोशल मीडिया की मदद से लाखों रुपये कमाने के बारे में एक प्रजेंटेशन दिया था. अभिषेक मिश्रा एक ज़माने में मोदी भक्त हुआ करते थे. यूट्यूब पर इनके चैनल के 85 हज़ार subscriber हैं. अभिषेक का मोदी भक्ति का भूत उतरा और इन्होंने मोदी सरकार की आलोचना शुरू की.  मोदी सरकार की नीतियों की बखिया उधेड़नी शुरू की. तब भाजपा सरकार और संघी लोग इन्हें लगातार परेशान करने लगे. अभिषेक का कहना है कि एक रात उन्हें आधा दर्जन से ज्यादा पुलिस वालों ने उठा लिया और उनकी आंख पर पट्टी बांध कर रात भर यहां वहां घुमाते रहे.

बाद में उन्हें साइबर सेल थाना ले जाया गया. उनसे पुलिस वालों ने कहा कि वे शिवराज के खिलाफ खबर डिलीट कर दें तब उन्हें छोड़ दिया जाएगा और इस बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं की जाएगी. डरे हुए अभिषेक ने ऐसा ही किया. लेकिन जब हिंदुस्तान टाइम्स में अभिषेक की गिरफ्तारी के बारे में खबर छप गई तो अभिषेक ने अपना पक्ष पूरे साहस के साथ सोशल मीडिया पर रखा.

पूरा वीडियो देखें, अभिषेक मिश्रा की कहानी उनकी खुद की जुबानी : https://www.youtube.com/watch?v=AAufJ8X-cA4

हिंदुस्तान टाइम्स में छपी खबर इस प्रकार है…

MP police arrest student for social media post lampooning CM Chouhan

Shruti Tomar
Hindustan Times

Madhya Pradesh police arrested a 19-year-old engineering student for a social media post on demonetisation and attacking chief minister Shivraj Singh Chouhan and the BJP on the issue. Nineteen-year-old Abhishek Mishra, a resident of Chhatarpur, was first detained on November 11 and then arrested by cyber cell of Bhopal police on November 12 from a private hostel. Initially, the police kept the news of his arrest a secret. He was bailed out on November 13.

Police sources said cops seized the student’s laptop, mobile phone, accessed his accounts and deleted the controversial posts. Calling himself an RTI activist and video maker “in order to spread awareness among people” Abhishek has been a critic of the saffron brigade. The demonetisation issue was his latest topic.

He has 16,000 followers and after his ‘controversial posts’ were deleted the number of his tweets on his Twitter page read 45 on Sunday evening. Police registered an FIR under section 469 of Indian Penal Code (IPC) and 66C of Information Technology Act, 2000 against him at the cyber crime cell.

Town inspector cyber cell, Bhopal, Ravikant Dehariya confirmed the arrest. “Abhishek was involved in posting offensive comments and posts against the chief minister and other important dignitaries. He was also running a website. We arrested him, deleted all the posts from his Facebook and also blocked his website,” he said.

But Dehariya refused to disclose the exact complaint against Abhishek. “The arrest was made after collecting all the evidence against Mishra by the technical wing of cyber cell.”

Despite efforts Abhishek Mishra could not be contacted.

However, Abhishek’s lawyer Ajay Mishra said, “After demonetisation, a newspaper had published news that police had seized money from the car of a BJP leader in Hoshangabad district. According to charges levelled against him, Abhishek had shared a photograph of the news and pasted the picture of chief minister Shivraj Singh Chouhan.”

He added, “Someone in the CM’s house saw the post and informed the cyber cell and the police took action against him. The police also seized his laptop, dongle and mobile phone and some other electronic gadgets. Despite repeated requests, police are not providing the copy of the FIR,” he added. Additional inspector general of cyber cell (crime) Vijay Khatri said the cell was dealing with the case and it is the town inspector (TI) who would give all the details.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जेटली के लौंडे को कार पार्किंग का तरीका समझाने वाले दिल्ली पुलिस के दो सिपाही सस्पेंड

Anand Sharma : जेटली साहब पूरे देश पर कड़ा टैक्स शिकंजा थोपना चाहते हो पहले अपने गोबर औलाद के पुत्र मोह से निकलो. उस कांस्टेबल से मुआफी मांगो और लौंडे को चौराहे पर जूतों से पीटों ताकि तुम बाप बेटों का अहंकार तुम्हारे सड़े दिमाग से निकले…..साले औलाद को पार्किंग की तमीज सीखा नहीं पाए पूरे देश को ईमानदारी सिखाएंगे….ब्लडी इम्पोस्टर….loser…. लीच

Sheetal P Singh : दिल्ली के वसंत कुंज स्थित देश के सबसे मंहगे “माल” emporio में कल देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली के पुत्र से दिल्ली पुलिस के दो सिपाहियों की कार को ठीक से पार्क करने के क्रम में “बातचीत”हो गई! आज दोनों सिपाही निलंबित पाये गये! यह ख़बर कहाँ कहाँ दिखी?

शरद सिंह : दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल गजराज और सुनील को भाजपा के सत्तामद का दंश झेलना पड़ा है। ‘गलती’ सिर्फ इतनी थी कि दोनों ने वित्तमंत्री अरुण जेटली के बेटे रोहन की वसंत कुंज में इम्पोरियो मॉल के पास व्यस्ततम इलाके में कार गलत पार्क करने का विरोध किया था, दोनों को निलंबित कर दिया गया। सत्ता का अहंकार यहीं नहीं रुका, मामले को लिखने पर एडवोकेट विजय बहादुर सिंह का ट्विटर अकाउंट सस्पेंड करा दिया गया। खूब हल्ला हुआ, लेकिन न किसी चैनल पर चर्चा हुई और न किसी अखबार ने एक लाइन भी लिखी… क्या अंतर है भाजपा और सपा जैसे गुंडई को प्रश्रय देने वाले दलों में?

Suraj Sahu : AAP का कोई विधायक बलात्कार पीड़ित लड़की की FIR न लिखे जाने पर पुलिस से भिड़ जाए तो विधायक गिरफ्तार. और उसी दिल्ली में अरुण जेटली का लड़का गलत पार्किंग कर पुलिस कॉन्स्टेबल को थप्पड़ जड़ देता है तो कॉन्स्टेबल सस्पेंड. “एक ध्वज – एक निशान – एक संविधान” का नारा देने वाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी के चेलों का दोगलापन…… “अमर रहे”.

Kashyap Kishor Mishra : अरूण जेटली मोदी सरकार में ताकतवर मंत्री हैं, खासे पढ़े लिखे और समझदार दिखते हैं पर अपने बेटे को सिविक सेंस सिखाने जैसी समझ भी इनमें नहीं है। जेटली के बेटे गौरव नें, दिल्ली में अपनी गाड़ी व्यस्त और गलत जगह पार्क की, जिन दो कान्सटेबिलों नें उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश की, उनसे उलझ पड़े। होता तो यह कि जेटली अपनी औलाद को कानून का पाठ पढ़ाते और सरे आम दस जूते लगाते, पर हुआ यह कि दोनों कांसटेबिलों को निलंबित कर दिया गया है। हर हर मोदी – घर घर मोदी। 

सौजन्य : फेसबुक

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मुलायम कुनबे में झगड़े से जो बड़े खुलासे हुए, उसे आपको जरूर जानना चाहिए….

Nikhil Kumar Dubey : घर के झगड़े में जो बड़े ख़ुलासे हुए…

1: यादव सिंह घोटाले में रामगोपाल और अक्षय फँसे हैं, बक़ौल शिवपाल. 

2: अमर सिंह ने सेटिंग करके मुलायम को जेल जाने से बचाया था: ख़ुद मुलायम ने बताया.

3: शिवपाल रामगोपाल की लड़ाई में थानों के कुछ तबादले अखिलेश को जानबूझकर करने पड़े थे: ख़ुद अखिलेश ने कहा.

4: राम गोपाल नपुंसक है : अमर सिंह ने कहा.

5: प्रतीक काग़ज़ों में पिता का नाम एम एस यादव लिखते हैं लेकिन मुलायम के किसी हलफ़नामे में उनके दूसरे बेटे का नाम नहीं

6: प्रमुख सचिव बनने की योग्यता मुलायम के पैर पकड़ने से तय होती है : अखिलेश.

Shamshad Elahee Shams: मैं पहलवान मुलायम सिंह का न कभी प्रशंसक रहा न कभी उसके साईकिल छाप समाजवाद का वकील. बहुत दिनों से सैफई में कब्बड्डी का मैच देशभर का मनोरंजन कर रहा है उसे मैं भी देख रहा हूँ. मुलायम सिंह की घटिया राजनीति जिसका इतिहास सिर्फ और सिर्फ अवसरवादिता, धोखेबाजी-टिकियाचोरी का रहा हो आखिर उस पर वक्त क्यों जाया किया जाय? ताश के पत्तो का महल एक न एक दिन ढहना ही है, आज नहीं तो कल. मुलायम सिंह की राजनीति को गौर से देखने वाले सभी जानते है कि उस पर भरोसा करना खुद को धोखा देना है. जिसका मुलायम सिंह दोस्त उसे दुश्मन की जरुरत नहीं. मुलायम सिंह ने चौधरी चरण सिंह, वी. पी. सिंह, काशीराम-मायावती, भाकपा-माकपा, नितीश कुमार, लालू प्रसाद किस किस को धोखा नहीं दिया? प्रदेश की सारी सत्ता का केंद्रीयकरण सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार में ही कर देने वाले के दिमाग की मैपिंग करें तो यही पता चलेगा कि उसे खुद पर और अपने परिवार के लोगों के आलावा किसी दूसरे पर कभी विश्वास नहीं रहा. मुलायम सिंह ने लोहिया छाप समाजवाद के नाम पर सिर्फ अपने परिवार का एकाधिकार जिस तरह स्थापित किया वह राजनीति के किसी भी मापदंड के अनुसार निंदनीय है. आखिर जो जीवन भर बोया, अंत में वही काटेगा. आज तक दूसरो के साथ जो किया वक्त ने दिखा दिया कि उसका जवाब खुद उसका लड़का ही एक दिन उसे देगा. कल्याण सिंह और मुलायम सिंह, दोनों के राजनीतिक चरित्र एक जैसे रहे है दोनों की गति एक ही होनी है, एक की हो चुकी दूसरे की प्रक्रिया चल रही है.

Vishnu Nagar : लखनऊ की राजनीतिक ड्रामेबाज़ी में मुलायम सिंह यादव ने खुद स्वीकार किया है कि उन्होंने कोई ऐसा अपराध किया था, जिसमें उन्हें जेल हो सकती थी लेकिन तिकड़मेश्वर ने उन्हें किसी तरह बचा लिया। वह केस क्या था, क्या यह वही था, जिसमें आय से अधिक संपत्ति का मामला था और सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि प्रमाण के अभाव में वह इस मामले को बंद करना चाहती है मगर उसने अभी तक मामला बंद नहीं किया है और मोदी सरकार बंद होने देगी भी नहीं। कांग्रेस -भाजपा दोनों इसका इस्तेमाल मुलायम सिंह को चंगुल में फँसाये रखने के लिए करती रही हैं और सब जानते हैं कि सीबीआई का रुख़ सरकार के हिसाब से बनता -बिगड़ता है। तो क्या यही मामला है या कोई और मामला, जिसमें तिकड़मेश्वर ने उन्हें बचाया?यह जानना दिलचस्प होगा और तिकड़म से बचाया गया है उन्हें तो कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए?

Vivek Dutt Mathuria : तस्वीर साफ है मुलायम अखिलेश को ट्रेंड कर रहे हैं बस ….जो मुलायम के मन में है उसे न शिवपाल जानते और न अमर सिंह. इतिहास गवाह है मुलायम सियासत में खुद के अलावा किसी के नहीं हुए….वीपी सिंह, चन्द्रशेखर, वामपंथी, मायवती, अजित सिंह और न जाने कितने हैं ज़िनके कांधे पर पैर रख कर यहां तक पहुंचे हैं अब भाजपा के नजदीक दिख रहे हैं.

Khushdeep Sehgal : समाजवादी कुनबे की हालत देखकर एक किस्सा याद आ गया. एक बुजुर्ग सेठ को मौत से बड़ा डर लगता था. उसने खूब पूजा-पाठ करने के बाद ईश्वर से मौत से बचने का वरदान ले लिया. वरदान ये था कि यमदूत जब भी उसे लेने आएगा तो वो उसे दिख जाएगा, ऐसे में वो अपने पैर तत्काल यमदूत की ओर कर दे, जिससे यमदूत उसे ले नहीं जा पाएगा. साथ ही सेठ को ये ताकीद भी किया गया कि वो इस वरदान का किसी और से भूल कर भी ज़िक्र नहीं करेगा. एक बार सेठ बीमार होने के बाद बिस्तर पर पड़ गया. फिर वो घड़ी भी आ गई जब यमदूत उसे ले जाने के लिए आ पहुंचा. लेकिन सेठ के पास तो वरदान था, झट अपने पैर उसने यमदूत की ओर कर दिए. यमदूत फिर उसके सिर की ओर पहुंचा. सेठ ने फुर्ती से फिर अपने पैर यमदूत की ओर कर दिए. अब यही चक्कर काफी देर तक चलता रहा. यमदूत जिधर जाए, सेठ उधर ही अपने पैर कर दे. सेठ इस तरह जान बचाता रहा. यमदूत थक कर सेठ को छोड़कर जाने ही लगा था. लेकिन सेठ को पैर इधर-उधर करते देख घरवालों ने समझा कि उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है. घरवालों ने रस्सियों से सेठ के पैर बांध दिए. यमदूत का काम हो गया. अब जैसे ही वो सेठ के सिर की तरफ आया तो सेठ के मुंह से निकला…”साला जब भी मरवाया, घरवालों ने ही मरवाया”…

सौजन्य : फेसबुक

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बॉब डिलन का एक गीत “Masters of War” तो वाकई क़माल का है!

Om Thanvi : बीकानेर में छात्रजीवन में मेरे कमरे की दीवार पर बॉब डिलन का एक पोस्टर चिपका रहता था, लाल और काले महज़ दो रंगों में। JS (जूनियर स्टेटसमन) में कुछ अंकों में क़िस्तों में छपा था, जोड़कर टाँग दिया। मगर डिलन के बारे में जाना बाद में। उनका काव्य, उनके गीत और गान। फिर बरसों बाद कवि-मित्र लाल्टू ने डिलन के गीतों का एक कैसेट दिया। मैंने उसे आज तक नहीं लौटाया। अक्सर उसे सुना और अपनी सम्पत्ति बना लिया।

गीत हमारे यहाँ तो ज़्यादातर रूमानी होते हैं; डिलन ने उनमें विद्रोह का रंग भरा। उस रंग को जिया। नोबेल समिति ने डिलन का अभिनंदन कर अपनी जड़ता को ख़ूबसूरती से तोड़ा है। मित्र Tribhuvan ने बॉब डिलन को नोबेल घोषित होने पर सुंदर टिप्पणी लिखी है। साझा करता हूँ। प्रतिरोध का जज़्बा अमर रहे – इस जज़्बे के धारक जो भी हों, जहाँ भी हों! और हां, मेरे निजी संग्रह में बॉब डिलन पर बनी एक फ़िल्म है- ‘नो डायरेक्शन होम बॉब डिलन’। वृत्तचित्र (डॉक्युमेंटरी)। मार्टिन स्कोरसेज़ी ने ग्यारह साल पहले बनाई थी। अपने जलसाघर (होम थिएटर) के बड़े परदे पर फिर चलाने का मन है। इतवार को चार-छह मित्र बुलाता हूँ। गीत, संगीत, यायावरी और हादसों से भरी साढ़े तीन घंटे की फ़िल्म पता नहीं कितने लोग देखने को तैयार होंगे!

Tribhuvan : कितनी सुहानी घड़ी है कि बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल मिला है। मैंने बॉब डिलन का नाम पहली बार अपने बच्चों से सुना और उन्होंने मुझे और मेरी पत्नी को उनके “Blowin’ in the Wind”, “The Times They Are a-Changin'”, “Subterranean Homesick Blues” and “Like a Rolling Stone” जैसे गीत सुनने बाध्य किया। यह मेरे लिए एक अलग अनुभव था और साहित्य के नभ का एक नया वातायन भी। मेरे बच्चों ने ये गीत गंगानगर, जयपुर, दिल्ली और जहां भी मैं रहा, हर जगह खूब गाए और सुनवाए।

बॉब डिलन के कितने ही तराने मैंने बाद में सुने और पढ़े। कई बार मैं महससू करता रहा हूं कि आख़िर ऐसी भाव-व्यंजनाएं हमारे यहां लोकगीतों में क्यों नहीं आती हैं? और क्यों हमारे यहां गीतकारों और ऐसे गैरफ़िल्मी गायकों को ज़्यादा लोकप्रियता नहीं है। बॉब डिलन का एक गीत “Masters of War” तो वाकई क़माल का है। युद्ध पिपासु लोगों के लिए लिखा गया यह गीत मनुष्यता को गहराई से देखता है और बताता है कि युद्ध और हिंसा के कारोबारी कितने विकराल दैत्य और मानव भक्षी राक्षस हैं।

बॉब डिलन के अलावा कई ऐसे गीतकार हैं, जो जादू सा जगाते हैं। मुझे बॉब डिलन की तरह ही बहुत ज्यादा झकझोरा जॉन लेनन ने। उनका गीत “इमेजिन” तो मेरे लिए त्रिकाल संध्या और पांच बार की नमाज़ जैसा है। ऐसे लगता है, जैसे गुरबाणी को जॉन लेनन ने किसी लिरिकल प्रार्थना में पिरो दिया है। यही क्यों, बच्चों ने जब पहली बार ऑजी ऑसबॉर्न का गीत “मा-मा आई ऐम कमिंग होम” सुनवाया या कभी घर में बजाया तो इस गीत ने चुपचाप राेने को विवश कर दिया।

सचमुच, मुझे लगता है, मेरे बच्चे किसी नोबेल पुरस्कार समिति से कम प्रतिभा नहीं रखते हैं। चलिए तो आप सुनिए “मास्टर्स ऑव वार”…बॉब डिलन की गीतिका, जो मनुष्य की संवेदनाओं और हिंसक इरादों वाले रक्तपिपासुओं को आत्मग्लानि में दबा देती है।

“Masters Of War”

Come you masters of war
You that build all the guns
You that build the death planes
You that build all the bombs
You that hide behind walls
You that hide behind desks
I just want you to know
I can see through your masks.

You that never done nothin’
But build to destroy
You play with my world
Like it’s your little toy
You put a gun in my hand
And you hide from my eyes
And you turn and run farther
When the fast bullets fly.

Like Judas of old
You lie and deceive
A world war can be won
You want me to believe
But I see through your eyes
And I see through your brain
Like I see through the water
That runs down my drain.

You fasten all the triggers
For the others to fire
Then you set back and watch
When the death count gets higher
You hide in your mansion’
As young people’s blood
Flows out of their bodies
And is buried in the mud.

You’ve thrown the worst fear
That can ever be hurled
Fear to bring children
Into the world
For threatening my baby
Unborn and unnamed
You ain’t worth the blood
That runs in your veins.

How much do I know
To talk out of turn
You might say that I’m young
You might say I’m unlearned
But there’s one thing I know
Though I’m younger than you
That even Jesus would never
Forgive what you do.

Let me ask you one question
Is your money that good
Will it buy you forgiveness
Do you think that it could
I think you will find
When your death takes its toll
All the money you made
Will never buy back your soul.

And I hope that you die
And your death’ll come soon
I will follow your casket
In the pale afternoon
And I’ll watch while you’re lowered
Down to your deathbed
And I’ll stand over your grave
‘Til I’m sure that you’re dead.

Som Prabh : बॉब डिलन का पुरस्कृत होना बराक ओबामा को शांति का नोबेल मिल जाना नहीं है। जो चौंक रहे हैं वे शायद छपी हुई किताबों को ही साहित्य समझते हैं। साहित्य सिर्फ छपी हुई किताबें नहीं है। 75 साल के बुजुर्ग गायक और गीतकार बॉब डिलेन के चुनाव का मजाक उड़ाने वाले दरअसल अपना ही उपहास कर रहे हैं। यह दूर की कौड़ी लग सकती है, लेकिन इससे सीख लेकर भारतीय साहित्य में आंदोलनों में सक्रिय या समाज को किसी तरह उद्वेलित करने वाले ऐसे गायकों, गीतकारों को पहचानने और पुरस्कृत करने की परंपरा की शुरुआत करनी चाहिए, जो समाज में मरियल हो चुके साहित्य से कहीं अधिक प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं और उनमें राजनैतिक प्रतिरोध और समकालीन सवालों से भिड़ंत की अद्भुत क्षमता है। इससे जनांदोलनों के तमाम अदृश्य चेहरे भारतीय समाज की पहचान बन सकेंगे। इससे वह खाई भी पाटी जा सकेगी जो लिखित और मौखिक परंपराओं में पैदा हुई है। जानता हूं कि यह होेगा नही? साहित्य का कारोबार जिनके हाथों में हैं उनके पास इतनी हिम्मत नहीं है कि वे ऐसा कर सकें। फिर भी सपने देखने से खुद को क्यों रोका जाए।

कल्बे कबीर : साहित्य के सद्य-नोबल-पुरस्कार से सम्मानित कवि-गायक बॉब डिलेन अमरीका-यूरोप में अपने देसी गीत-संगीत के लिये कितने लोकप्रिय हैं – मुझे कुछ ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं है, लेकिन यह तय है कि बॉब की ख्याति अपने ज़माने के हिंदुस्तानी शाइर जिगर मुरादाबादी से कम ही होगी । कहते हैं कि जिगर को देखने के लिये रेलवे-स्टेशनों पर भीड़ लग जाती थी। रेलें थम जाती थीं। जब जिगर अपनी लहकदार-खरज़दार आवाज़ में अपनी ग़ज़लों को गाते थे तो हज़ारों की भीड़ में सन्नाटा खिंच जाता था । समकालीन शाइर जिगर से इस बात पर रश्क़ रखते थे। उनमें जोश मलीहाबादी भी थे, जो गा नहीं सकते थे और अपनी बुलन्द आवाज़ में तरह में अपनी शाइरी पढ़ते थे। एक बार जोश ने तंज़ कसते हुये कहा – जिगर, तुम्हारा टेंटुआ तो किताबों में छप नहीं सकता! जोश अगर ज़िंदा होते तो देखते कि अब टेंटुआ भी किताबों में छपने लगा है! जो Bob Dylan की तुलना फ़िल्मी और मंचीय गीतकारों से कर रहे हैं वे मूर्ख हैं ग़रीबों-वंचितों के पक्ष में, कुलीनों के विरुद्ध और युद्ध के ख़िलाफ़ गीत लिखकर गाने वाले बॉब डिलेन की तुलना सिर्फ़ इकतारे पर गाने वाली मीरा, अभंग गाने वाले तुकाराम से की जा सकती है या किसी बाउल गायक से!

Nishant Jain : मुझे लगता है कि जाने-माने अमेरिकी गीतकार और गायक Bob Dylan को लिटरेचर का नोबेल मिलना साहित्य जगत में एक नए बदलाव की आहट है। उम्मीद है, इससे हिन्दी और भारतीय भाषाओं का अकादमिक साहित्य जगत थोड़ा उदार होगा और लोकप्रिय साहित्य-संगीत को ‘साहित्य’ के रूप में स्वीकारना शुरू करेगा। अकादमिक जगत के कुछ (सब नहीं, अतः कृपया दिल पर न लें) मठाधीश टाइप के लोग लोकप्रिय गीतकारों और लोक कवियों को ‘साहित्यकार’ की श्रेणी में नहीं गिनते। हिन्दी साहित्य जगत में तो स्थिति और भी ख़राब है।ऐसी कविता, जो एक सुशिक्षित व्यक्ति के भी पल्ले न पड़े, सिर्फ़ उसे ही साहित्य मानने की जिद और आम बोल-चाल की भाषा में रचे गए लयबद्ध गीतों और कविताओं को दोयम दर्जे का साहित्य मानना कहाँ तक तर्कसंगत है, उम्मीद है, कुछ विद्वान ही इस पर प्रकाश डालेंगे।

भूलना नहीं चाहिए कि साहित्य की तीन मूल विधाएँ -गीत, कहानी और नाटक, सभ्यता की शुरुआत से ही लोक-जीवन में रचे बसे हैं और अपनी लोक भाषा, लय और नाद सौंदर्य के बल पर आम जन की ज़ुबान पर चढ़ते रहे हैं। कबीर से लेकर निराला तक, कविता की तुकांतता ने निरंतर उसके नाद सौंदर्य के माध्यम से साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हिन्दी वाले अकादमिक लोग भी अब पुनर्विचार करते हुए गुलज़ार साहब, गोपालदास नीरज, दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, प्रसून जोशी, इरशाद कामिल, स्वानन्द किरकिरे जैसे बेहतरीन गीतकारों के लोकप्रिय गीतों के लिटरेरी योगदान को कुछ तवज्जो देंगे।

Arun Maheshwari : बॉब डिलेन को नोबेल पुरस्कार… अभी-अभी हम बीकानेर से हरीश भादानी समग्र के लोकार्पण समारोह से कोलकाता लौटे हैं । हरीश जी के गीतों और धुनों से सरोबार इस समारोह की ख़ुमारी अभी दूर भी नहीं हुई कि आज यह सुखद समाचार मिला – अमेरिकी गीतकार और गायक बॉब डिलेन को इस साल का साहित्य का नोबेल पुरस्कार घोषित किया गया है । शायद रवीन्द्रनाथ के बाद यह दूसरा गीतकार है जिसे उसके गीतों के लिये नोबेल दिया जा रहा है। बॉब डिलेन अमेरिका के पॉप संगीत के एक ऐसे अमर गीतकार और गायक रहे हैं जिनके छ: सौ से अधिक गीतों ने अमेरिका की कई पीढ़ियों को मनुष्यता और प्रतिवाद की नई संवेदना से समृद्ध किया है। यहाँ हम उनके एक प्रसिद्ध गीत – Blowin’ In The Wind को मित्रों से साझा कर रहे हैं और साथ ही तुरत-फुरत किये गये उसके एक हिंदी अनुवाद को भी दे रहे हैं –

Blowin’ In The Wind Lyrics

How many roads must a man walk down
Before you call him a man ?
How many seas must a white dove sail
Before she sleeps in the sand ?
Yes, how many times must the cannon balls fly
Before they’re forever banned ?
The answer my friend is blowin’ in the wind
The answer is blowin’ in the wind.

Yes, how many years can a mountain exist
Before it’s washed to the sea ?
Yes, how many years can some people exist
Before they’re allowed to be free ?
Yes, how many times can a man turn his head
Pretending he just doesn’t see ?
The answer my friend is blowin’ in the wind
The answer is blowin’ in the wind.

Yes, how many times must a man look up
Before he can see the sky ?
Yes, how many ears must one man have
Before he can hear people cry ?
Yes, how many deaths will it take till he knows
That too many people have died ?
The answer my friend is blowin’ in the wind
The answer is blowin’ in the wind

कितने रास्ते तय करे आदमी
कि तुम उसे इंसान कह सको ?
कितने समंदर पार करे एक सफ़ेद कबूतर
कि वह रेत पर सो सके ?
हाँ, कितने गोले दागे तोप
कि उनपर हमेशा के लिए पाबंदी लग जाए?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है ।

हाँ, कितने साल क़ायम रहे एक पहाड़
कि उसके पहले समंदर उसे डुबा न दे ?
हाँ, कितने साल ज़िंदा रह सकते हैं कुछ लोग
कि उसके पहले उन्हें आज़ाद किया जा सके?
हाँ, कितनी बार अपना सिर घुमा सकता है एक आदमी
यह दिखाने कि उसने कुछ देखा ही नहीं ?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है ।

हाँ, कितनी बार एक आदमी ऊपर की ओर देखे
कि वह आसमान को देख सके?
हाँ, कितने कान हो एक आदमी के
कि वह लोगों की रुलाई को सुन सके?
हाँ, कितनी मौतें होनी होगी कि वह जान सके
कि काफी ज्यादा लोग मर चुके हैं ?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी, त्रिभुवन, सोम प्रभ, कल्बे कबीर, निशांत जैन, अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सोशल मीडिया नाम के बेकाबू भस्मासुर को फलने फूलने का आशीर्वाद देने वाले तमाम देवता हुए चिंतामग्न!

Amitaabh Srivastava : सोशल मीडिया नाम के बेकाबू भस्मासुर को फलने फूलने का आशीर्वाद देने वाले तमाम देवता अब घुटनों में सर दिए चिंता में डूबे हुए हैं. कहाँ जाएँ इससे बच के. मनमोहन सिंह की खिल्ली उड़ाने में सबको बड़ा आनंद आ रहा था और समर्थकों को उकसा उकसा कर ऊल-जलूल किस्म का हंसी ठट्ठा खूब चला, अब भी चल रहा है. लेकिन अब पृथ्वीराज चौहान के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले हिन्दू ह्रदय सम्राट (स्वर्गीय अशोक सिंघल साहब का बयान याद करें) नरेंद्र मोदी जी को भी लोग कायर और डरपोक कह रहे हैं.

लोगों को लग रहा है कि मोदी भी बस लव लेटर वाली पालिसी को गिफ्ट देकर आगे बढ़ा रहे हैं. काहे नहीं एक के बदले सौ सर ला रहे हैं फटाफट. डीजीएमओ साहब ने एकदम ग़दर वाले सनी देओल की तरह बयान दिया कि जगह और वक्त अपने हिसाब से चुन कर कार्रवाई होगी -चुन चुन कर. फिर भी लोग संतुष्ट नहीं है, उन्हें तो ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में सिर चाहिए, खेलने के लिए सिर चाहिए, गणित सीखने, पहाड़े पढ़ने के लिए सिर चाहिए, गंगा का रुख लाहौर तक मोड़ना है, पाकिस्तान को परमाणु बम से उड़ाना है, बलूचिस्तान को हिंदुस्तान में मिलाना है. और ये सब फटाफट चाहिए बिलकुल फ्लिपकार्ट और अमेज़न के सामान की होम डिलीवरी की तरह. नहीं करोगे या ऐसा करने के बारे में नहीं कहोगे तो गाली खाने के लिए तैयार रहो.

ये जो ऑन डिमांड सप्लाई वाली परंपरा शुरू हुई है राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रो में, बिलकुल फरमाइशी फ़िल्मी गानो के विविध भारती वाले प्रोग्राम की तरह और जिसका चौबीसों घंटे मीडिया के ज़रिये प्रसारण होता रहता है, इसके चलते किसी भी सरकार, विचार, व्यक्ति और समूह के सामने तुरंत प्रिय और अप्रिय होने का संकट खड़ा हो गया है. ये दबाव लोगों के लिए, संस्थाओं और समाज के लिए प्राणघातक है. बचना है तो इससे बचिए.

आजतक समेत कई चैनलों-अखबारों में काम कर चुके पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पुलिस वाले की नजर में एक पत्रकार की औकात (देखिए तस्‍वीर)

sach

पाकुड़ : पुलिस वाले की नजर में एक पत्रकार की क्या औकात है? ये तस्वीर उसी सच को बयाँ कर रही है। टेबल पर दोनों पैर चढ़ाए ये महानुभाव पाकुड़ जिले के महेशपुर सर्किल के पुलिस निरीक्षक सह थाना प्रभारी रामचंद्र राम हैं। यह तस्वीर बुधवार की संध्या में एक मित्र ने चोरी से लिया उस वक्त जब महेशपुर प्रखंड के दैनिक  प्रभात खबर के प्रतिनिधि सरदार माधव सिंह कुछ जानकारी थाना लेने गए थे।

जब यह तस्वीर पोस्ट किया तो देखकर आश्चर्य हुआ और शर्मिंदा भी, कि आखिर हो क्या रहा है महेशपुर में? थानेदार रामचंद्र राम पैर उठा कर बैठे हैं और मीडिया के श्री सिंह शायद कुछ बैठ कर लिख रहे हैं। ऐसी परिस्थिति दोनों के लिए डूब मरने जैसी स्थिति है। दोनों महाशय संदेश क्या देना चाह रहे हैं, नही पता, पर हमें बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर रहा है यह हाल। इस बारे में जब पुलिस अधीक्षक से बात करने की कोशिश हुई तो उन्‍होंने फोन नहीं उठाया।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पैलेट गन संबंधी सवाल पर CRPF DG का पत्नी पिटाई वाला जवाब बना चर्चा का विषय

Sushmita Verma : CRPF DG on being asked that when the usage of pellets will be stopped in Kashmir, says that this is like asking when will you stop beating your wife!

These are officials at the highest ranks of security etc. Comparing domestic violence with State violence, this is a perfect example of how all these forms of violence work together for a ‘desired’ idea of ‘nation’. Who is the nation ? The Hindu Suvarna Upper Caste Class male!

सुष्मिता वर्मा की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ब्राज़ील की संसद में डिबेट करते हुए बच्चे को स्तनपान कराने वाली महिला सांसद की तस्वीर वायरल

Chandra Mohan : प्रस्तुत चित्र मित्र डा. विजय मलिक की वॉल से लिया हूँ। यह दृश्य ब्राज़ील के नेशनल एसेम्बली में बहस में हिस्सा लेते हुए एक महिला सांसद का है। सैल्यूट है मातृत्व भाव की पराकाष्ठा और नारी के इस कुंठामुक्त अस्तित्व को। सच है नारी को ख़ुद उस ज़ंजीर को तोड़ना होगा जिससे हज़ारों साल से पुरूष ने मर्यादा और संस्कार के नाम से उसे जकड़ रखा है। गंदगी उसके निगाह में है और वर्जना नारी के अस्तित्व पर।

पुरूष समाज के मनीषी अपनी दमित काम-वासना की कुंठा से सम्पूर्ण नारी जाति को ही कुठिंत दमित बना दिया है जबकि वास्तविकता यह है कि मुक्त और स्वतंत्र नारी अस्तित्व ही पुरूष समाज के इस कुंठा का इलाज है। उन्मुक्त नारी अस्तित्व ही विश्व में सौन्दर्यबोध और प्यार उत्पन्न कर उसे नफ़रत और हिंसा से मुक्त कर सकता है। नहीं तो तब तक बुद्ध, गांधी सब बेमानी रहेंगे।

तस्वीर देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

social media viral picture

वाराणसी निवासी चंद्र मोहन की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Devendra Arya : भाई वाह। आपने इस पोस्ट को लगा कर तमाचा मारा है यत्र नार्यस्त पूज्यंते वाली पाखंड़ी संस्कृति और उनके कीर्तनियों को। हमें अपनी कमज़र्फी पर शर्म आती है।

Chandra Mohan : काश मेरी पोस्ट और आपकी प्रतिक्रिया कम से कम हमारे सभी मित्रों तक पहुँचती, उनका ध्यान आकर्षित करती।

शशि शर्मा : बच्चे को आँचल से ढँककर दूध पिलाना आपको कमजर्फ़ी लगता है? आपको कमजर्फ़ी पर शर्म नहीं आती आपको यह खुलापन आनंद देता है।

Chandra Mohan : शशि शर्मा जी शायद आप मेरी बात को अन्यथा ले रहीं है।सवाल नारी के बदन को ढकने या प्रदर्शित करने का नहीं है सवाल नारी-शरीर के प्रति पुरुष दृष्टि का है ।आपने तो सारे विमर्श को ही उल्टा कर दिया। फिर भी यदि आप भारतीय समाज में नारी की स्थिति से संतुष्ट है तो मुझे आगे कुछ नहीं कहना है।

शशि शर्मा : नारी का कुंठामुक्त अस्तित्व और मातृत्व भाव की पराकाष्ठा? इतने महान शब्द एक माँ के सार्वजनिक रूप से दूध पिलाने के लिए? किस बात पर सलामी दे दे कर दुहरे हुए जा रहे हैं पुरुष? हमारे यहाँ तो दिहाड़ी मज़दूरिन सड़क किनारे बैठकर अपने बच्चे को दूध पिलाती है किसी का ध्यान नहीं जाता। किसी को अकुण्ठ मातृत्व नज़र नहीं आता। शायद इसलिए कि हमारे यहाँ ऐसे सीना खोला नहीं जाता आँचल से ढँक लिया जाता है। तो वह कुण्ठित मातृत्व हो गया। कौन सी ज़ंजीर? कोई पुरुष कब रोकता है किसी स्त्री को अपने बच्चे को दूध पिलाने से? वाह! क्या बात है! ‘मुक्त और स्वतंत्र नारी अस्तित्व ही पुरुष समाज की इस कुंठा का इलाज है।’ पुरुषों की कुंठा का इलाज?

Arun Rai : नेता जी हमारे और आप जैसे लोग तो इसमें भी गुंजाइश ढूँढ लेंगे… बहुत समय लगेगा हमें राम रहीम होने में…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अखिलेश यादव जी सुनहरे विज्ञापनों से उत्तर प्रदेश की वास्तविकता छुपाना चाहते हैं!

अवधेश पाण्डेय : आज के द इण्डियन एक्सप्रेस अखबार के साथ सूचना एवं जनसंपर्क विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित 24 पेज का टेबलायड विज्ञापन आया है, जिसमें पंपिंग सेट का फोटू चेप कर उसे अखिलेश सरकार की उपलब्धि बताया गया है। दूसरे पेज पर एक कविता छपी है, जिसमें कहा गया है कि महिलाएँ बेखौफ बाहर जाती हैं और हवा में भाईचारा घुला हुआ है। आँखो में सीधे सीधे धूल झोंकने का काम उस हाईटेक गौतमबुद्ध नगर जिले में हो रहा है, जहाँ कि महिलाओं ने आभूषण पहनने बंद कर दिये हैं और अभी कल ही एक व्यक्ति के परिवार पर गौकशी की प्राथमिकी दर्ज हुई है। अपना मानना है कि अखिलेश जी वह धूलझोंकू मुख्यमंत्री हैं, जो सुनहरे विज्ञापनों से प्रदेश की वास्तविकता छुपाना चाहते हैं।

Sachin Kumar Jain : एटा के अलीगंज में जहरीली शराब पीने से 21 लोगों की मृत्यु। पिछले साल जनवरी में मलीहाबाद में 35 लोग मरे थे। ये मौतें हल्की और गैर-उल्लेखनीय हैं,  क्योंकि इससे फायदा नहीं मिलता और विद्वेष फैलाने का अवसर भी नहीं मिलता। हम एक दोगले समाज में रहते हैं, जहाँ फायदा होने पर हिंसा को स्वीकार कर लिया जाता है। दानवों का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वे एक हिंसा का विरोध करवाते हैं और अपने द्वारा की गयी हिंसा को धर्म का आवरण ओढ़ा देते हैं।

Akash Kumar Baranwal : 12 जुलाई को सैदपुर (गाजीपुर) में आयोजित मंत्री शिवपाल की सभा में आत्मदाह करने वाले किशोहरी के सत्येंद्र की मौत ने आज सरकार की खामियों और अव्यवस्था की पोल खोल दी। वैसे कमी तो 12 जुलाई को साबित हो गयी थी लेकिन आज सत्येंद्र की मौत ने सरकार को पूर्णतः हाशिये पर खड़ा कर दिया। सत्येंद्र की जगाई इस अलख का शासन प्रशासन पर कितना असर होता है ये भविष्य में निर्धारित होगा लेकिन इतना तो साफ है कि जहाँ नौकरशाह यानी अधिकारी वर्ग में अब सत्ता का खौफ पूरी तरह से खत्म हो गया है वहीं शासन कर रहे मंत्री नेताओं में भी कानून का भय ख़त्म हो गया है जिसका नतीजा है सत्येंद्र की मौत। शासन और प्रशासन,  दोनों यही सोच रखते हैं कि हमारा कोई क्या कर लेगा। वक़्त है जनता के उबलने का। जब जनता उबलेगी तो दोनों को डरना होगा,  और जब जनता से ये दोनों डरेंगे तो इन्साफ हर किसी को मिलेगा।  वैसे इतनी संवेदनहीनता तो कसाई अपने जानवर के प्रति नहीं दिखाता है जैसा शासन प्रशासन ने सत्येंद्र के साथ दिखाया। जिस दिन सत्येंद्र ने आत्मदाह किया उस दिन उसकी वजह तलाशने और जांच की बजाय आत्महत्या करने के खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई शुरू की जाने लगी।  भला हो सपा विधायक सुभाष पासी और बसपा प्रत्याशी राजीव किरण का जो वाराणसी स्थित अस्पताल पंहुचे और उसके परिजनों को ढाढ़स बंधाकर आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। हम इस दुख की घडी में उसके परिजनों के साथ हैं।

Ajay Prakash : क्या आप इस खबर को देश की खबर बनाएंगे। देश की सबसे बड़ी इलेक्ट्रानिक कंपनियों में शुमार ‘एलजी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ की ग्रेटर नोएडा,  कासना रोड यूनिट में 11 तारीख से करीब 620 कर्मचारी हड़ताल पर हैं। कर्मचारियों ने हड़ताल प्रबंधन की मनमानी और तानाशाही के खिलाफ की है। लेकिन एक लाइन भी किसी मीडिया में कोई खबर नहीं है। हड़ताल में शामिल दर्जनों माएं,  बहनें कई दिनों से अपने घर नहीं लौटी हैं,  इनमें कई छोटे बच्चों की मांए भी हैं। एलजी कर्मचारी मनोज कुमार से मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने स्थानीय मीडिया को बुलाया भी पर किसी ने कोई एक पंक्ति की खबर नहीं लिखी। कर्मचारी और प्रबंधन के बीच टहराहट बहुत मामूली मांगों को लेकर है। कर्मचारियों की मांग है कि उनकी शिफ्ट 8 घंटे की जाए जो कि अभी 12 से 13 घंटे की है। साथ ही कर्मचारी चाहते हैं कि डीए,  ट्रांसपोर्ट अलाउंस दिया जाए। कर्मचारियों का कहना है कि इस मांग को पूरा करने के लिए कर्मचारियों ने एक यूनियन बनाने की कोशिश की। मगर एलजी प्रबंधन ने रजिस्ट्रार को पैसा खिलाकर उनकी यूनियन का रजिट्रेशन रद्द कर दिया। प्रबंधन यूनियन का रजिस्ट्रेशन रद्द कराने के बाद जो 11 लोग यूनियन के अगुआ थे उनका ट्रांसफर नोएडा से हैदराबाद,  जम्मू,  मध्यप्रदेश आदि जगहों पर कर दिया। ऐसे में अब कर्मचारियों की पहली मांग है कि पहले उनके नेताओं का ट्रांसफर रद्द हो और फिर उनकी सभी मांगों पर प्रबंधन वार्ता करे और निकाले। पर प्रबंधन इस पर कान देने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि वह विज्ञापन देकर मीडिया को खरीद चुका है। मगर क्या हम आप तो नहीं बिके हैं,  इसे आप अपनी खबर बनाईए और कर्मचारियों की आवाज बनिए, उनके आंदोलन का समर्थन कीजिए।

सौजन्य : फेसबुक

इसे भी पढ़ें….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जब फेसबुक की खुबसूरत “बला” ने मुझे ब्लॉक कर दिया… पढ़ें लाइव चैट

बच गया गुरु आज एक खुबसूरत दिखाई देने वाली फेसबुकिया मोहतरमा के हाथों नंगा होने से…आप भी अलर्ट रहें… इस फेसबुक पर खूबसूरत सी दिखाई देने वाली कई मोहतरमायें मर्दों को इनबाक्स में घर बैठे बैठे ही नंगा करने का इंतजाम करे बैठीं हैं… खूबसूरत चेहरे वाली जलील मोहतरमा और मेरी चैट को पढ़ें….

-Meri help kardo

-क्या मदद कर दूं मैडम

-Mujhe 500 rs ki jarurat h hafte bhar me lauta dungi

-मोहतरमा आज तक तुम्हारी मेरी दुआ सलाम राम राम तक हुई नहीं है…और तुम सीधी इनबाक्स में पहली बार जब लैंड करी हो तो सीधे सीधे 500 रुपये की मदद की डिमांड…क्या है यह सब…अपना तो दिमाग ही चकरा गया…कहानी क्या है जरा पूरा माजरा तो खुलकर समझाओ….

-Darsal mayke aayi thi. mobile tut gyi whi bnwani h

-मैं तुम्हें किस बिना पर 500 थमा दूं….और क्यों मोहतरमा …जरा मुझे समझायेंगी कि मैं आपको 500 रुपये बिना दुआ सलाम या पुरानी दोस्ती के क्यों थमा दूं यूं ही 500 रुपये… आज से पहले तुमने कभी मुझसे राम राम तक नहीं की…और मांग रही हो पांच सौ रुपये….क्या इस फेसबुक पर मैं ही तुम्हें दुनिया का सबसे कम दिमाग प्राणी दिखाई पड़ा हूं…

-Koi bat nhi sorry

-दोस्त तुमने तो मेरे दिमाग को ही सुन्न कर दिया है.. बहुत बढ़िया… आज से पहले तुम्हें कभी संजीव का हालचाल लेने की फुर्सत नहीं मिली… क्यों? आज पहली बार जिंदगी में आई में तो सीधे सीधे 500 रुपये लेने… तुम्हारी आंख में तो दोस्ती के नाम पर दो बूंद पानी है या नहीं…लगता है तुम सिर्फ दाम की दोस्त हो….अच्छे इंसान तुम्हारे लिये जायें भाड़ में क्यों है न सही….मैंने सही पकड़ा न… थोड़ा तो आंख में शरम का पानी रखतीं कि जिस इंसान से आज तक तुमने हलो हाय तक नहीं किया उससे 500 रुयपे ऐसे मांग रही हो जैसे मैने तुम्हारा कर्ज खा रखा हो लेकर पहले से….शाबास बहुत बढ़िया.. कहां रहती हो, क्या करती हो…

-Ab bht hogya bas kro mafi mangli na majbur thi kya karti

Chat Conversation End

इसके बाद इस खुबसूरत बला ने मुझे ब्लाक कर दिया…..फेसबुक के रसियों जरा बच के रहना ऐसी बहुत मिलेंगीं…. जो तुम्हें दूर से ही ठंडा करके तुम्हारी जेब खाली कर लेंगी.

Sanjeev Chauhan
9811118895
Crimes Warrior channel on YouTube
क्राइम वॉरियर ब्लॉग
patrakar1111@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा #ArrestCHORasia : टीआरपी के लिए झूठी-फर्जी खबरें दिखाने वाले दीपक चौरसिया की गिरफ्तारी की मांग

नई दिल्ली । इंडिया न्यूज नामक चैनल का संपादक दीपक चौरसिया इन दिनों सोशल मीडिया के निशाने पर है। इस टीआरपीबाज और बाजारू संपादक की गिरफ्तारी की मांग उठ रही है। टीवी पत्रकार दीपक चौ‍रसिया रविवार को अचानक सोशल मीडिया के निशाने पर आ गए हैं जिसके कारण रविवार को Twitter पर #ArrestCHORasia ट्रेंड करने लगा।

ज्‍यादातर ट्वीट्स में दीपक को झूठी खबरें दिखाकर लोगों को गुमराह करने वाला पत्रकार बताया गया है। लोगों का आरोप है कि दीपक चौरसिया ने अपने चैनल पर टीआरपी के लिए कई झूठी और फर्जी खबरें दिखाईं। सोशल मीडिया पर दिल्‍ली पुलिस को टैग कर लोग चौरसिया को गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं।

ट्विटर पर जाकर ट्रेंड कर रहे ‘अरेस्टचोरसिया’ हैशटैग के रिजल्ट देखने पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करें: #ArrestCHORasia

इस बीच, प्रतिष्ठित अखबार जनसत्ता की वेबसाइट पर भी दीपक चौरसिया के गिरफ्तार किए जाने संबंधी सोशल मीडिया पर उठी मांग से संबंधित खबर का प्रकाशन कर दिया गया है. देखें स्क्रीनशॉट…

दीपक चौरसिया की गिरफ्तारी की मांग से संबंधित नीचे कुछ ट्वीट दिए जा रहे हैं….

In a Major Development, Various Organisations DEMAND #ArrestCHORasia ASAP as Patna Court issues Non-bailable warrant
-Nirmala Pandey ‏@nirmpandey

Is Deepak Chaurasia above all law & order just bcoz he is a mediaperson?
-bani singh @SinghhhBani

Dear Police, #ArrestCHORasia to restore people’s faith in you. Non-bailable warrants are serious!
-racy motwani @racymotwani

Believe me, Chaurasia never went to any war site. He stood in his studios & did fake reporting. #ArrestCHORasia
-Lakshmi @omji01

He is a journalist, a degenerated jornalist. #ArrestCHORasia for denigrating the standards of journalism. pic.twitter.com/O4OLH5f2wn
-Jyoti Gambhir @jyotigambhir1

कुछ अन्य ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट देखें….


दीपक चौरसिया के रंग-ढंग जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करते जाइए :

राम जेठमलानी ने दीपक चौरसिया को भगाया!

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘आजतक’ ने अरनब को मोदी का चमचा बताने वाले ट्वीट के लिए मांगी माफी

पीएम नरेंद्र मोदी के अंग्रेजी चैनल टाइम्‍स नाऊ को दिए इंटरव्यू का मजाक उड़ाती एक फोटो, जिसमें लिखा अरनब को मोदी का चमचा बताया गया है, को आजतक चैनल की तरफ से ट्वीट किए जाने के बाद से बवाल बच गया. यह फोटो न्‍यूज चैनल ‘आज तक’ के टि्वटर हैंडल से शेयर हुआ. सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ‘आज तक’ को आड़े हाथों लेते हुए जमकर निशाना साधा. बहुत सारे सोशल मीडिया यूजर्स ने आरोप लगाया कि उनके चैनल को इंटरव्यू का मौका न मिलने की वजह से वे यह अनाप शनाप बिलो द बेल्ट ट्वीट कर रहे हैं.

आज तक के ऑफिशियल टि्वटर अकाउंटर से मंगलवार को एक फोटो शेयर हुई. इस तस्‍वीर का कैप्‍शन है, ‘Ahem Ahem! Yuki ye maine nahi bola:)’ इसमें ऊपर के फ्रेम में अरनब गोस्‍वामी और पीएम नरेंद्र मोदी आमने-सामने नजर आते हैं. नीचे के फ्रेम में मोदी इंडिया टुडे के एंकर करन थापर के साथ दिखते हैं. अरनब और मोदी वाली तस्‍वीर में लिखा है, ‘जब एक चमचा इंटरव्यू लेता है।’ वहीं, थापर वाली तस्‍वीर में लिखा है, ‘जब एक जर्नलिस्‍ट इंटरव्यू लेता है.’

दरअसल, दूसरे फ्रेम की तस्‍वीर मोदी के एक पुराने इंटरव्यू की है, जो थापर ने लिया था. इस इंटरव्यू को मोदी बीच में छोड़कर चले गए थे. इसमें थापर ने गुजरात दंगों से जुड़े कुछ सवाल पूछे थे. मोदी इंटरव्यू के दौरान पानी पीते नजर आए थे. मोदी विरोधियों का कहना है कि वे थापर के सवालों से असहज हो गए और बाद में इंटरव्यू बीच में ही छोड़ दिया. 

बाद में आजतक ने अपनी सफाई में कहा कि यह फोटो किसी के पर्सनल अकाउंट से ट्वीट की जानी थी, लेकिन वो गलती से ‘आज तक’ के अकाउंट से शेयर हो गया, लेकिन इस गलती के लिए बार बार माफी और अब यह ट्वीट डिलीट किया जा रहा है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जानो कानून : : सुप्रीम कोर्ट का फैसला- फेसबुक पर किसी की आलोचना करना अपराध नहीं, एफआईआर रद्द करो

Facebook postings against police… criticising police on police’s official facebook page…. F.I.R lodged by police….

HELD – Facebook is a public forum – it facilitates expression of public opinion- posting of one’s grievance against government machinery even on government Facebook page does not by itself amount to criminal offence – F. I.R. Quashed.

(Supreme Court)
Manik Taneja & another – Vs- State of Karnataka & another
2015 (7) SCC 423

पूरी खबर…..

Comments on Facebook : Supreme Court quashes FIRs against couple

In a fillip for free speech on social media, the Supreme Court quashed FIRs registered by the Bengaluru Traffic Police for criminal intimidation against a couple for posting adverse comments on its Facebook page. A bench of Justices V. Gopala Gowda and R. Banumathi quashed the criminal prosecution against the couple in their judgment, observing that they were well within their rights to air their grievances in a public forum like Facebook.

“The page created by the traffic police on the Facebook was a forum for the public to put forth their grievances. In our considered view, the appellants might have posted the comment online under the bona fide belief that it was within the permissible limits,” the 10-page judgment observed.

‘End to harassment’

“The police sought to suppress free speech by intimidating us with serious charges…this judgment will have a larger impact. We had the resources to get our charges squashed, but many will find it hard to counter police harassment. I hope this will be an example to stop intimidation by the police,” said Manik Taneja, the petitioner.

On June 14, 2013, Manik Taneja and his wife Sakshi Jawa, were booked by the police under charges of using ‘assault or criminal force to deter a public servant from discharging his duty’ (Section 353 of the Indian Penal Code) and criminal intimidation (IPC 506).

The previous day, the couple were driving in their car, when they collided with an autorickshaw, resulting in a passenger being injured.

Though they had paid due compensation to the injured, Ms. Jawa – who had driven the car – was summoned to Pulakeshi Nagar Traffic police station where the police had allegedly misbehaved with her.

The couple then vent their anger on the police’s Facebook page, and even sent an email complaining about the alleged harassment to the police.

The police reacted by lodging a criminal complaint against the couple.

The Karnataka High Court had refused to intervene when the couple approached it for relief, following which they had moved the Supreme Court.

This judgment comes even as another bench of the Supreme Court is hearing the legality of Section 66A of the Information Technology Act, 2000, which prescribes arrest and three years imprisonment for social media comments considered to be of a “menacing character” by the authorities.

‘We had the resources to get our charges squashed, but many will find it hard to counter police harassment’

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अरविंद केजरीवाल ने अरनब गोस्वामी को मोदी का चमचा कह दिया

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने टाइम्स नाऊ के एडिटर इन चीफ अरनब गोस्वामी को मोदी का चमचा करार दिया. दरअसल भाजपा नेता और पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान को राष्ट्रीय फैशन टैक्नालॉजी संस्थान (निफ़्ट) का नया निदेशक बनाए जाने पर अरविंद ने ट्वीटर पर चुटकी ली और एक ट्वीट में कहा, “मोदी जी ने भी चुन-चुन के चमचों की फ़ौज जमा की है। गजेंद्र चौहान, चेतन चौहान, पहलाज निहलानी, अरणब गोस्वामी और स्मृति इरानी।”

@ArvindKejriwal

Modi ji ne bhi chun chun ke chamchon ki fauj jama ki h- Gajendra Chauhan, chetan chauhan, pahlaj nihalani, arnab goswami, smriti irani

ज्ञात हो कि पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान को राष्ट्रीय फैशन टैक्नालॉजी संस्थान निफ़्ट का नया निदेशक बनाया गया है. इससे पहले गजेंद्र चौहान को भारतीय फ़िल्म और टेलीविज़न संस्थान का निदेशक बनाए जाने पर विवाद हुआ था. एफ़टीआईआई के छात्रों ने महीनों तक गजेंद्र चौहान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था. सीबीएफ़सी यानी केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड के चेयरमैन पहलान निहलानी एक साक्षात्कार में स्वयं को ‘मोदी की चमचा’ कह चुके हैं.

अरनब गोस्वामी के नाम से संचालित एक फ़र्ज़ी अकाउंट से केजरीवाल को जवाब दिया गया, “आपका एक आशुतोष उन सब पर भारी है।” एक सज्जन किंशू कुमार ने केजरीवाल को हिदायत देते हुए लिखा, “श्री केजरीवाल जैसी भाषा का इस्तेमाल आप ट्वीट में करते हैं वो बताता है कि आप कैसे परिवार से हैं और आपके परिजनों ने आपको क्या सिखाया है।” रितिका झा ने लिखा, “कितने शर्म की बात है। एक केंद्र शासित प्रदेश का मुख्यमंत्री एक कैबिनेट मंत्री स्मृति इरानी को चमचों की फ़ौज में गिन रहा है. ये बेईमान आचरण है।” राजीव हेगड़े ने लिखा, “केजरीवाल जी आपको क्या हो गया है? आलोचना में भी मर्यादा बनाए रखिए, आप दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं. लेकिन आप तो स्कूल के बच्चों जैसे ट्वीट कर रहे हैं।”

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आजतक में कार्यरत शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर और शादाब मुज्तबा की फेसबुक पर क्यों हो रही है तारीफ, आप भी पढ़िए

Vikas Mishra : मेरे दफ्तर में शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर, शादाब मुज्तबा हैं, उच्च पदों पर हैं ये लोग, बेहद जहीन। जानते हैं कि इनमें एक समानता क्या है, इन सभी की एक ही संतान है और वो भी बेटी। वजह क्या है, वजह है इनकी तालीम, इनकी शिक्षा। क्योंकि इन्हें पता है कि जिस संतान के दुनिया में आने के ये जरिया बने हैं, उसके पालन-पोषण में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। इन्हें नहीं रटाना है कम संतान-सुखी इंसान।

मेरे गांव में मेरे हमउम्र दयाराम के आठ बच्चे हैं। मेरे खुद दो सगे भाई और तीन बहनें हैं। मेरे लखनऊ के एक साथी पत्रकार के 11 मामा और चार मौसियां हैं। सुभाष चंद्र बोस अपने पिता की नौवीं संतान थे। इसके बाद भी प्रोडक्शन जारी था, 14 भाई बहन थे। तो दूसरे की संतानों की तादाद गिनने से पहले जरा अपना भी इतिहास देख लेना चाहिए। अभी हाल में मैंने एक चुटकुला पढ़ा था कि एक कलेक्टर साहब गांव में नसबंदी के लाभ बताने पहुंचे थे। एक ग्रामीण ने पूछा-साहब आपने नसबंदी करवाई है? साहब बोले-नहीं, हम पढ़े-लिखे हैं। ग्रामीण बोला-तो साहब हमें भी पढ़ाओ-लिखाओ, नसबंदी करवाने क्यों आ गए।

फेसबुक पर लिखने वाले तमाम लोग विद्वान हैं, जानकार हैं, लेकिन अपनी विद्या का इस्तेमाल नफरत फैलाने में ज्यादा कर रहे हैं। हिंदू हो या मुस्लिम, दोनों समुदाय की मूल समस्या है शिक्षा। जो पढ़कर आगे बढ़ गए, वो भी शिक्षा के लिए प्रेरित नहीं करते, बल्कि अपने ही समुदाय के उन लोगों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें अक्षर ज्ञान हो गया है और जो सोशल मीडिया पर फेंका उनका कचरा उठाकर अपने दिमाग में डालने के लिए अभिशप्त हैं। दो समुदाय जो इंसानियत के तकाजे से एक-दूसरे के करीब आ सकते हैं, उन्हें बरबस ये दूर करना चाहते हैं। मुस्लिम समुदाय के अच्छे लिखने वाले अपने ही सहधर्मियों को बरगला रहे हैं। उनके अपने घर में अपनी बेटी तो डॉक्टरी-इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है। लेकिन फेसबुक पर वो ‘मोदी की डियर’ पर मौज ले रहे हैं।

कोई मुस्लिम अगर इस्लाम या कट्टरता के खिलाफ अगर कोई पोस्ट लिखता है तो उसमें कमेंट करने वालों में हिंदू लोगों की भरमार होती है, जो उस पोस्ट का स्वागत करते नजर आते हैं। उस पोस्ट के कमेंट्स में मुस्लिमों की तादाद भी होती है। या तो वो अपने उस साथी को गालियां दे रहे होते हैं या फिर कुछ ऐसे भी होते हैं जो पोस्ट का समर्थन कर रहे होते हैं। ठीक इसी तरह, जब कोई हिंदू कट्टर हिंदुत्व और धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वास के विरोध में कुछ लिखता है तो उस पोस्ट पर मुस्लिम साथियों के कमेंट थोड़े से आते हैं, अगर पोस्ट पब्लिक है तो फिर उस पर हिंदू धर्म वालों की गालियां पड़नी तय है। मेरी फ्रेंडलिस्ट में भी ऐसे साथी हैं, जिनमें से कुछ कभी परशुराम के भक्त बन जाते हैं, तो कभी देखते ही शेयर करें वाली तस्वीरें भेजते हैं, बेवजह मोदी-मोदी करते रहते हैं।

व्हाट्सएप के ग्रुप में तो कई मूर्खतापूर्ण मैसेज चलते रहते हैं। और हां, फेसबुक पर कई मुस्लिम मित्र जान बूझकर बड़े शातिराना तरीके से पोस्ट लिखते हैं। आरएसएस पर हमला करने की आड़ में हिंदुओं की ‘बहन-महतारी’ करते हैं। कई लोग मुझसे फोन करके कह चुके हैं कि ये आदमी आपकी फ्रेंडलिस्ट में क्यों है ? दरअसल ऐसी पोस्ट का अंजाम क्या होता है, मैं बताता हूं। उसमें एक मुसलमान लिखता है, बाकी मुसलमान पढ़ते हैं, वाह-वाह करते हैं, कई हिंदू पढ़कर कुढ़कर रह जाते हैं, कुछ से रहा नहीं जाता तो पोस्ट पर पहुंचकर तर्क-वितर्क करना शुरू करते हैं, तो वहीं कुछ सीधे ‘मां-बहन’ पर उतारू होते हैं। ‘मां-बहन’ करने वाले दोनों तरफ हैं। कोई डायरेक्ट परखनली से पैदा नहीं हुआ है, सबके घर में मां-बहन हैं।

दरअसल सोशल मीडिया को कई लोग अपने अपने तरीके से यूज कर रहे हैं। असली मुद्दे पर कोई आना नहीं चाहता। अपने मजहब वाले सही बात नहीं सिखा रहे हैं, सिर्फ डरा रहे हैं। दूसरे मजहब वालों से वो सीखना-पढ़ना चाहेंगे नहीं। खासतौर पर ये मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ ज्यादा हो रहा है, यही वजह है कि भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान हैं, लेकिन एक भी मुसलमान उनका सर्वमान्य नेता नहीं बन पाया। क्षेत्रीय स्तर पर आजम, ओवैसी उभरे, लेकिन इन्होंने भी तो मुसलमानों का सिर्फ इस्तेमाल ही किया है।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के एफबी वॉल से यह मैटर कापी कर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बददिमाग युवा आईएएस अफसर की यह तस्वीर हो रही है सोशल मीडिया पर वायरल

ये हैं छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के रामानुजगंज के एसडीएम और प्रशिक्षु आईएस अफसर. इनका नाम है डॉक्टर जगदीश सोनकर. ये गए रामानुजगंज के जिला हॉस्पिटल का निरीक्षण करने. वे अस्पताल में पोषण पुनर्वास केंद्र भी गए. इस दौरान वहाँ भर्ती कुपोषित बच्चे और पास बैठी उनकी माँ से एसडीएम महोदय बतियाने लगे. लेकिन अपने पद के गुरुर में वे अपने जूते को मरीज और महिला के बेड पर रख दिए.

अपने चमचमाते हुए जूते को बिस्तर पर रख कर उनके बात करने के अंदाज को वहां एक शख्स ने अपने कैमरे में कैद कर लिया. यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. लोग कह रहे हैं कि 2013 बैच का यह आईएएस क्या इतना भी तमीज नहीं जानता कि आखिर अस्पताल में भर्ती एक बच्चे और उसकी मां से बात करने के दौरान जूते को बेड पर नहीं रखना चाहिए. हमारे देश के बाबू लोगों की मनबढ़ई का यह जीता जागता नमूना है. इस आईएएस अफसर को चार जूते देने चाहिए ताकि फिर ये कभी अपने जूते को किसी गरीब के बिस्तर पर रखने की हिम्मत जुर्रत न कर सके.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: