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मध्य प्रदेश

पत्रकारों के लिए आज भी रोल मॉडल हैं कस्तूरचंद गुप्त

मिशन से प्रोफेशन में बदलने वाली पत्रकारिता का जब-जब उल्लेख होता है तब-तब कस्तूरचंद गुप्त का स्मरण सहज ही हो जाता है। अपने समय के प्रतिबद्ध पत्रकार श्री गुप्त पूरे जीवनकाल पत्रकारिता को समाजसेवा का आधार मानते रहे हैं। उनका मानना था कि समाज में जब सुनवाई की एक ऐसी जटिल प्रक्रिया है जहां एक गरीब पीड़ित व्यक्ति नहीं पहुंच सकता है, वहां पत्रकारिता ही एक ऐसा माध्यम है जो बिना किसी प्रक्रिया के पीड़ितों की आवाज बन कर खड़ा होता है। यह मध्यप्रदेश का सौभाग्य रहा है कि श्री गुप्त एवं उनके समकालीन पत्रकारों ने पत्रकारिता में एक ऐसी रेखा खींची है कि आज के दौर में भी मध्यप्रदेश की पत्रकारिता गौरव से भरी हुई है। शायद इसलिये ही उन्हें मध्यप्रदेश की पत्रकारिता की प्रथम पाठशाला भी कहते हैं। प्रदेश भर में उन्होंने पत्रकारों की एक बड़ी फौज खड़ी की जो विचारवान और अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्ध थे। उन्होंने नौजवानों से हमेशा इस बात की अपेक्षा की कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है और हम अंग्रेजी को इस पर हावी न होने दें। वे स्वयं भाषा के प्रति हमेशा सजग और सचेत रहे। उनकी प्रतिष्ठा महाकोशल की पत्रकारिता में ही न होकर समूचे मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में थी। अपने आखिरी दिनों में वे भोपाल में रहने लगे थे वह भी पूरी सक्रियता के साथ। 9 अगस्त का वह काला दिन हमारे बीच से एक यशस्वी पत्रकार एवं पत्रकारिता के विद्यार्थियों के स्कूल के रूप में कार्यरत श्री कस्तूरचंद गुप्त को हमसे छीन लिया। बारह बरस हो गये उनसे हमें बिछड़े हुए किन्तु आज भी वे पत्रकारों के लिये एक रोल मॉडल के रूप में उपस्थित हैं। उनके कार्य सदैव सकरात्मक पत्रकारिता की बात कहते है। आज जब पत्रकारिता संक्रमणकाल से गुजर रही है तब श्री गुप्त का स्मरण हो जाना स्वाभाविक है।

मिशन से प्रोफेशन में बदलने वाली पत्रकारिता का जब-जब उल्लेख होता है तब-तब कस्तूरचंद गुप्त का स्मरण सहज ही हो जाता है। अपने समय के प्रतिबद्ध पत्रकार श्री गुप्त पूरे जीवनकाल पत्रकारिता को समाजसेवा का आधार मानते रहे हैं। उनका मानना था कि समाज में जब सुनवाई की एक ऐसी जटिल प्रक्रिया है जहां एक गरीब पीड़ित व्यक्ति नहीं पहुंच सकता है, वहां पत्रकारिता ही एक ऐसा माध्यम है जो बिना किसी प्रक्रिया के पीड़ितों की आवाज बन कर खड़ा होता है। यह मध्यप्रदेश का सौभाग्य रहा है कि श्री गुप्त एवं उनके समकालीन पत्रकारों ने पत्रकारिता में एक ऐसी रेखा खींची है कि आज के दौर में भी मध्यप्रदेश की पत्रकारिता गौरव से भरी हुई है। शायद इसलिये ही उन्हें मध्यप्रदेश की पत्रकारिता की प्रथम पाठशाला भी कहते हैं। प्रदेश भर में उन्होंने पत्रकारों की एक बड़ी फौज खड़ी की जो विचारवान और अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्ध थे। उन्होंने नौजवानों से हमेशा इस बात की अपेक्षा की कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है और हम अंग्रेजी को इस पर हावी न होने दें। वे स्वयं भाषा के प्रति हमेशा सजग और सचेत रहे। उनकी प्रतिष्ठा महाकोशल की पत्रकारिता में ही न होकर समूचे मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में थी। अपने आखिरी दिनों में वे भोपाल में रहने लगे थे वह भी पूरी सक्रियता के साथ। 9 अगस्त का वह काला दिन हमारे बीच से एक यशस्वी पत्रकार एवं पत्रकारिता के विद्यार्थियों के स्कूल के रूप में कार्यरत श्री कस्तूरचंद गुप्त को हमसे छीन लिया। बारह बरस हो गये उनसे हमें बिछड़े हुए किन्तु आज भी वे पत्रकारों के लिये एक रोल मॉडल के रूप में उपस्थित हैं। उनके कार्य सदैव सकरात्मक पत्रकारिता की बात कहते है। आज जब पत्रकारिता संक्रमणकाल से गुजर रही है तब श्री गुप्त का स्मरण हो जाना स्वाभाविक है।

कस्तूरचंदजी का जन्म नरसिंहपुर जिले में जून महीने की तीन तारीख को साल उन्नीस सौ अठारह में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे अपने प्रदेश के सीमा पार राजस्थान आगे की पढ़ाई के लिये गये। शिक्षा पूरी होते ही अपने घर लौट आये। श्री गुप्त एक परम्परागत व्यवसायी परिवार के चिराग थे और व्यवसाय उन्हें विरासत में मिला था किन्तु जब सारा देश आजादी के तराने गुनगुना रहा था तब युवा कस्तूरचंद को विरासत का व्यापार रास नहीं आया। वे गाडरवाड़ा में स्वाधीनता सेनानी श्री हरनारायण राठी से देश सेवा का पाठ पढ़ा। श्री राठी ने उन्हें देशसेवा का माध्यम पत्रकारिता को बताया। युवा कस्तूरचंद को उनकी बात रास आ गयी और सौभाग्य से उन्हें उस समय आजादी का बीड़ा उठाने वाले दैनिक अखबार नवभारत में काम करने का अवसर भी मिल गया। मन में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश  और देशसेवा के जज्बे ने उन्हें एक स्थापित पत्रकार की श्रेणी में ला खड़ा किया। हालांकि उम्र और अनुभव के मान से वे कम थे किन्तु उनका हौसला अनुभव को भी मात दे रहा था। इसी समय जबलपुर से ‘जयहिन्द’ नाम से दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ हुआ। इस पत्र का मालिकाना हक सेठ गोविंददास जी के साथ ‘नवभारत’ के मालिक रामगोपाल माहेशवरी का था। यह वह समय था जब जबलपुर से नवभारत का प्रकाशन आरंभ नहीं हुआ था।

जबलपुर में जयहिन्द में युवा पत्रकार कस्तूरचंद गुप्त को एक बड़ा अवसर काम करने का मिला। नवभारत में अपने समय के दिग्गजों के साथ काम करते हुए श्री गुप्त ने इतना कुछ सीख और समझ लिया था कि अब आगे के दिनों में उन्हें केवल अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर चाहिए था और यह अवसर उन्हें ‘जयहिन्द’ में मिल ही गया। ‘जयहिन्द’ के आरंभिक दिनों में श्री विद्याभास्कर के साथ सहयोगी के रूप में कार्यारंभ किया। कहने को तो श्री गुप्त सहयोगी थे किन्तु लगभग सारा दायित्व उन पर ही था। एक समय आया जब श्री विद्याभास्कर के साथ स्थानापन्न सम्पादक श्री चंद्रकुमार ने ‘जयहिन्द’ से स्वयं को अलग कर लिया। ऐसी स्थिति में जयहिन्द के समक्ष श्री गुप्त को सम्पादक का दायित्व सौंपने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था किन्तु प्रबंधन के इस फैसले को उन्होंने अपनी सूझबूझ और लगनशीलता से सही प्रमाणित कर दिया। उन्होंने अपने आपको एक सफल सम्पादक के रूप में स्थापित कर दिखाया। कदाचित इस उम्र के सफल सम्पादकों की श्रेणी में उनका नाम सबसे पहले लिया जाता है। अमृत बाजार पत्रिका समूह ने इलाहाबाद से अमृत बाजार पत्रिका का हिन्दी संस्करण आरंभ किया। पत्रिका समूह ने श्री गुप्त को वरिष्ठ सह सम्पादक के रूप में अपने साथ लिया। इस समूह की तब भी अपनी बड़ी साख थी और ऐसे समूह में अवसर मिल पाना दुर्लभ था किन्तु अनुभव ने श्री गुप्त को यह अवसर दिलाया। इसी समय में वे एक साल तक जर्नलिस्ट एसोसिएषन इलाहाबाद के सचिव के रूप में भी अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया।

शब्दसत्ता के माध्यम से वे स्वाधीनता संग्राम का अलख जगाने का काम करते रहे किन्तु जिस उद्देश्य को लेकर वे निकले थे, शायद अभी उनका वह उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया था। बहरहाल, अब वह समय भी आ गया था जब उनकी मुलाकात समाज सेविका और अमेरिकी शिक्षाविद् श्रीमती बेन्दी फिशर से हुई। गुप्तजी से प्रभावित श्रीमती फिशर ने अपने साथ काम करने का आग्रह किया। इस समय महात्मा गांधी की प्रेरणा ने इलाहाबाद में साक्षरता निकेतन नामक संस्था की स्थापना श्रीमती फिशर ने कर लिया था। इस संस्था का उद्देश्य निरक्षरता उन्मूलन, सामूहिक विकास के लिये प्रशिक्षण, साहित्य का प्रकाशन एवं शोध कार्य करना था। श्री गुप्त को यह प्रस्ताव सार्थक लगा और उन्होंने अपनी सहमति दे दी। श्री गुप्त की पत्रकारिता का एक नया अध्याय आरंभ हुआ। अब वे श्रीमती फिशर के साथ जुड़ गये थे। यहां उन्हें साहित्यिक अभिरूचि का कार्य सौंपा गया। श्री गुप्त ने उजाला नाम से पत्रिका का प्रकाशन  आरंभ किया। उनके कार्यों का बेहतर लाभ लेने की दृष्टि से उन्हें लखनऊ भेज दिया गया। यहां उन्होंने साहित्य रचनालय के संयोजक के रूप में एक अलग किस्म की प्रतिष्ठा हासिल की। इस रचनालय में एक से तीन माह के आवासी 13 सत्र होते थे जिसके प्रत्येक सत्र में पच्चीस लेखक हुआ करते थे। श्री गुप्त के अथक प्रयासों का नतीजा था कि उजाला का उजाला अन्तर्राष्ट्रीय मंच तक फैलने लगा। पेरिस स्थित अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के सदस्य देशों को मार्गदर्शक अनुभव से परिचित कराने के उद्देश्य से एक विवरण प्रकाशित किया गया जिसमें श्री गुप्त द्वारा सम्पादित उजाला को शोधमुखी सम्पादन विधियों पर एक विस्तृत लेख भी आमंत्रित कर उसमें ससम्मान शामिल किया गया।

यह वह समय था जब विदेश यात्रा आज की तरह सहज नहीं था किन्तु श्री गुप्त के पत्रकारिय अवदान इतना व्यापक था कि उनकी ख्याति विदेश तक पहुंच गयी थी और उन्हें कई बार विदेश यात्रा का अवसर भी प्राप्त हुआ। फोर्ड फांउडेशन ने संयुक्त राज्य अमेरिका की ओहिया स्टेट यूर्निवसिटी कोलम्बस में सम्प्रेषण कला और सामुदायिक विकास विषय के अध्ययन हेतु फेलोशिप प्रदान की। श्री गुप्त ने यहां प्रोफेसर एडमडेस के मार्गदशरन  में अपना अध्ययन पूरा किया। इस अध्ययन का दूसरा चरण में सम्प्रेषण शोध के अन्तर्गत अमेरिका की मुख्य यूर्निवसिटी के विशेषज्ञों से विचार विनिमय किया। इसके साथ ही श्री गुप्त यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, स्विट्जरलैंड, इटली, ईरान, बर्मा, थाईलेंड व जापान आदि देशो की अध्ययन यात्रायें की। यूनेस्को ने ही श्री गुप्त का सन् 1966 में कार्यात्मक साक्षरता और पठनीय साहित्य विषयक एशियाई परियोजना सलाहकार का दायित्व सौंपा। उन्होंने परियोजना के प्रथम चरण में प्रधान कार्यालय पेरिस एवं द्वितीय चरण में एशिया क्षेत्रीय कार्यालय बैंकाक थाईलैंड में कार्य किया जिसका बाद में यूनेस्को की रिपोर्ट में प्रकाशन हुआ। अपने जीवनकाल में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के अनुभव लेने के बाद वापस अपने गृहनगर की तरफ श्री गुप्त लौट आये। समूची हिन्दी पत्रकारिता हिन्दी के सेवक श्री गुप्त की पुण्यतिथि पर उनका नमन करती है।

 

लेखक राजेन्द्र अग्रवाल भोपाल के युवा पत्रकार हैं।

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