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आज के अखबार (दो) : देश में आग लगाने की कोशिशों पर रेत में मुंह छिपाए शुतुर्मुर्ग, हाथ सेंकते मीडिया वाले!

संजय कुमार सिंह

रजत शर्मा के इंडिया टीवी डॉट इन की हाल की एक खबर के अनुसार, बांग्लादेश में हिंदुओं के ऊपर जुल्म पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का पहला बयान, बोले- ‘सुरक्षा के लिए वहां के हिन्दुओं को…’। आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनाव है और नरेन्द्र मोदी ने प्रचार शुरू कर दिया है। इंडिया टीवी ने खबर दी थी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में हैं। यहां एक कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बांग्लादेश में जारी हिंसा और वहां हिंदुओं पर हो रहे जुल्म को लेकर बयान दिया है। मोहन भागवत ने इस बात को स्वीकार किया है कि बांग्लादेश में हिंदुओं के लिए स्थिति काफी कठिन है और दुनियाभर के हिंदुओं को उनकी मदद करनी चाहिए। इसी खबर में आगे कहा गया था, बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे जुल्म को लेकर मोहन भागवत ने कहा- “हिंदुओं के लिए एकमात्र देश भारत है। भारत सरकार को इस पर संज्ञान लेना होगा। उन्हें कुछ करना होगा। हो सकता है कि वे पहले से ही कुछ कर रहे हों। कुछ चीज़ों का खुलासा हो चुका है, कुछ का नहीं। लेकिन कुछ तो करना ही होगा।” उन्होंने आगे कहा- “अगर हिंदू समाज एकजुट हो जाए तो बंगाल में हालात बदलने में देर नहीं लगेगी। अब जहां तक ​​राजनीतिक परिवर्तन पर मेरे विचार की बात है तो मैं आपको बताना चाहता हूं कि राजनीतिक परिवर्तन के बारे में सोचना मेरा काम नहीं है। हम संघ के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं।”

एक और खबर के अनुसार, कोलकाता में आयोजित ‘100 व्याख्यान माला’ कार्यक्रम में दिए गए अपने संबोधन में भागवत ने कहा था, भारत स्वाभाविक रूप से एक हिंदू राष्ट्र है। इसके लिए लिए किसी संवैधानिक संशोधन या मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि सूर्य पूर्व से उगता है, इसके लिए क्या संवैधानिक स्वीकृति चाहिए? ठीक वैसे ही भारत हिंदू राष्ट्र है और जब तक भारतीय संस्कृति का सम्मान होगा, यह हिंदू राष्ट्र ही रहेगा। भागवत ने स्पष्ट किया कि संसद चाहे ‘हिंदू राष्ट्र’ शब्द संविधान में जोड़े या न जोड़े, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि यह हकीकत पहले से मौजूद है। यह कई अखबारों में छपा और कहा जा सकता है कि इसी के प्रभाव से बांग्लादेश उच्चायोग का घेराव हुआ होगा जो आज की बड़ी खबर बन गई है। और अरावली की खबर अघोषित इमरजेंसी में अघोषित रूप से सेंसर हो गई या अखबारों ने हिन्दूस्थान का वह हाल नहीं बताया है जो द टेलीग्राफ ने बताया है। या इतनी प्रमुखता से तो नहीं ही बताया है और यही है हेडलाइन मैनेजमेंट जो अघोषित इमरजेंसी में सेंसर की जगह चल रहा है। इस खबर का उपशीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा –दक्षिणपंथी प्रदर्शनकारियों ने नई दिल्ली और कलकत्ता में बांग्लादेश के दूतावासों के पास लिंचिंग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया; हिंदुत्व कार्यकर्ताओं ने क्रिसमस समारोहों को निशाना बनाया, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता बैरीकेड तोड़कर अंदर घुसे 2) ‘हिंदुओं के रक्षक’ पुलिस से भिड़े 3) विक्रेताओं से कहा गया – ईसाइयों की यहां कोई नहीं सुनता और 4) भाजपा ज़हर और नफ़रत बांटती है: विपक्ष (क्रिसमस पर उपहार बांटने का रिवाज है उसे लगभग रोक कर या उसका विरोध करने वालों पर ऐसा आरोप है)।  

पश्चिम बंगाल चुनाव और अपनी रणनीति के अनुकूल भाजपा और उसके सहयोगी जब देश में सांप्रदायिकता फैलाने में लगे हैं, सत्ता में रहने का लाभ उठाकर धुंआधार कमाई कर रहे हैं। ज्यादातर अखबारों में ऐसी खबरें होती नहीं हैं और अक्सर सरकार का ही प्रचार होता है। अरावली क्षेत्र में खनन की अनुमति से संबंधित इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) की तीन डिग्री परिभाषा में अरावली की निचली पहाड़ियाँ शामिल हैं, जिन्हें मंत्रालय के 100-मीटर के पैमाने से बाहर रखा गया है। नई दिल्ली डेटलाइन से जय मजूमदार की खबर इस प्रकार है – 13 अक्टूबर को, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को अरावली के लिए एक नई 100-मीटर की परिभाषा का प्रस्ताव दिया। ठीक अगले दिन, सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) ने बेंच की मदद कर रहे एमिकस क्यूरी को लिखा कि उन्होंने इस सिफारिश की जांच या मंजूरी नहीं दी है। 20 नवंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय की 100-मीटर की सिफारिश को मान लिया। सीईसी एक ऐसी संस्था है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में पर्यावरण और वनों से संबंधित अपने आदेशों की निगरानी और अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए बनाया था। सीईसी ने अपने 14 अक्टूबर के पत्र में, इस बात पर ज़ोर दिया कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया द्वारा तैयार की गई परिभाषा को “अरावली पहाड़ियों और उसकी श्रृंखला की पारिस्थितिकी की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए अपनाया जाना चाहिए।”

एफएसआई ने राजस्थान के 15 जिलों में 40,481 वर्ग किमी क्षेत्र को अरावली के रूप में मैप किया था, जो न्यूनतम ऊंचाई से ऊपर के क्षेत्र हैं और जिनकी ढलान कम से कम तीन 3 डिग्री है। इस परिभाषा के अनुसार, निचली पहाड़ियाँ भी अरावली के रूप में सुरक्षित रहेंगी। एफएसआई ने यह काम 2010 में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के तहत सीईसी द्वारा नियुक्त किए जाने के बाद किया था। फ्लैग शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट के पैनल ने अरावली की सुरक्षा के लिए वन सर्वेक्षण के मानक (फॉरेस्ट सर्वे के बेंचमार्क) का समर्थन किया। अखबार ने अपनी खबर के साथ कोर्ट को एमिकस का का नक्शा भी प्रकाशित किया है। इसमें कहा गया है कि हरे और नीले रंग के बीच का क्षेत्र 100-मीटर के नियम के तहत सुरक्षा खो देगा। मंत्री जी इसे भले दो प्रतिशत बताएं पर यह काफी बड़ा क्षेत्र है और खुदाई करने वाले को खासी कमाई होगी। सवाल यह है कि इसके बदले किसकी कमाई कितने प्रतिशत में बढ़ेगी और उससे जनता को क्या लाभ होगा? (समाप्त)  

पहला हिस्सा भी पढ़ें – बांग्लादेश उच्चायोग पर प्रदर्शन और इंडियन एक्सप्रेस – अघोषित इमरजेंसी की कहानी है!

लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/bangla-desh-high-commission-par-pradarshan-aur-indian-express/

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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