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आज के अखबार : आज ‘बंधु बिहारी’ पर ‘गुजराती जोड़ी’ के भारी पड़ने की खबर ढोता अमर उजाला अमर है

संजय कुमार सिंह

आज जब मेरे नौ में से आठ अखबारों ने विदेशी खबरों को लीड बनाया है तब अकेले अमर उजाला हेडलाइन मैनेजमेंट में फंसा दिख रहा है। बिहार चुनाव के लिए संयोग या प्रयोग वाली खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है – लालू प्रसाद, रबड़ी और तेजस्वी यादव पर आरोप तय, चुनाव से पहले बढ़ी मुश्किलें। आज जब युद्ध खत्म होने और सभी बंधकों के रिहा होने की खबर है तो ज्यादातर अखबारों ने इसी को लीड बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने कनाडा से संबंध सुधरने की खबर को लीड बनाकर हेडलाइन मैनेजमेंट में भागीदारी की है। शीर्षक है, भारत, कनाडा ने वैश्विक उथल-पुथल के बीच संबंधों को पुनर्जीवित करने के लिए रोडमैप तैयार। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। बिहार चुनाव का संयोग और प्रयोग हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया ने बंधकों और कैदियों की अदला-बदली को अधपन्ने पर लीड बनाया है। इस तरह, बिहार चुनाव के लिए खबर रोपण आज लगभग नाकाम रहा। इंडियन एक्सप्रेस की लीड है, बंधक वापस, कैदी आजाद; ट्रम्प ने कहा लंबा संकट टला। द हिन्दू के अनुसार, हमास ने बंधकों को रिहा किया और गाजा घोषणा तैयार। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, गाजा विजय अभियान के दौरान ट्रम्प ने बंधकों और कैदियों की अदला-बदली की। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, इजराइली बंधकों और फिलिस्तीनी कैदियों की एक बड़ी अदला-बदली। हिन्दी अखबारों में देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, हमास ने सभी 20 बंधकों को छोड़ा जबकि नवोदय टाइम्स की लीड है, सभी बंधक रिहा, युद्ध खत्म : ट्रम्प।

वैसे आज की खबर यह भी है कि आईपीएस अफसर की आत्महत्या पर दबाव बढ़ने के बाद हरियाणा के डीजीपी छुट्टी पर भेजे गए। यह इंडियन एक्सप्रेस में सिंगल कॉलम की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सेकेंड लीड है और शीर्षक है, आईपीएस अफसर की आत्महत्या पर परिवार के आंदोलन के बाद, हरियाणा के डीजीपी छुट्टी पर भेजे गए। द हिन्दू की खबर है कि परिवार की दृढ़ मांग के कारण पोस्टमार्टम रुक गया। आप समझ सकते हैं कि यह मामला कितना महत्वपूर्ण है और लालू परिवार के साथ साथ अन्य अदालती आदेशों के मुकाबले कैसी खबर है। पर वह सब अब मुद्दा नहीं है। हेडलाइन मैनेजमेंट चल ही रहा है। अगर खबरों की बात की जाए तो आज एक खबर यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के करुर में भगदड़ की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में जहरीले कफ सीरप से बच्चों की मौत के मामले में दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। तब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि राज्य सरकारें इस मामले में गंभीरता से कार्रवाई कर रही हैं और उनके पास उचित कानून प्रवर्तन तंत्र मौजूद है। दूसरी ओर, तमिलनाडु के करुर में भगदड़ की खबर के बारे में मैं शुरू से लिखता रहा हूं यह दिल्ली में ज्यादा छप रही है और इसका कारण यह लगता है कि इसका संबंध विधानसभा चुनाव से है और इसलिए सीबीआई जांच का आदेश और दूसरे मामलों में जांच की जरूरत नहीं समझने का मामला कानूनी नजरिए से जो हो, राजनीतिक दृष्टि से दिलचस्प है और खबर तो होनी ही चाहिए।

कुल मिलाकर, आज के मेरे सभी अखबारों में पहले पन्ने पर उन तमाम खबरों से हेडलाइन मैनेजमेंट नहीं किया गया है जो मैंने कल दिन में नोट किया था। ये खबरें बता रही थीं कि हेडलाइन मैनेजमेंट की कोशिश पूरी है। वशीकरण (या तालिबानीकरण) जबरदस्त है। वोट चोरी को चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट गंभीरता से नहीं ले रहा है (या ले पा रहा है)। ऐसे में इस सरकार को मनमानी से रोकने के लिए नीतिश-नायडू ही सहारा है। सरकार (असल में गुजराती जोड़ी) को चुनाव हराना अब लगभग असंभव हो चला है। एसआईआर में जो हुआ उसके बावजूद देश भर में एसआईआर की घोषणा हो चुकी है, जनगणना से जरूरी एसआईआर है और आधार कार्ड के बावजूद एपिक कार्ड और एपिक नंबर जारी होते रहेंगे तो सरकार जनहित के काम जब करेगी तब करेगी, अभी उसे इन्हीं सब कामों से बरसों फुर्सत नहीं मिलने वाली है। जाहिर है कि गुजराती जोड़ी यह सब चुनाव जीतने के लिए कर रही है। ऐसे अदालती आदेश सत्ता में रहने पर ही आएंगे। अब यह साफ हो चला है कि शक भाजपा पर हो तो जांच की जरूरत नहीं होती है। जज लोया की संदिग्ध मौत से लेकर वोट चोरी के गंभीर आरोप तक की कहानी देख लीजिए। दूसरी ओर, शक किसी और पर हो तो जांच जरूरी है। मामला नेशनल हेराल्ड का हो या आईआरसीटीसी घोटाले का। इतना ही नहीं, राहुल गांधी की नागरिकता पर विचार हो सकता है लेकिन प्रधानमंत्री की डिग्री की जांच जरूरी नहीं है जबकि चुनाव लड़ने के लिए शपथपूर्वक घोषणा करने का नियम है। यह घोषणा सही है कि नहीं, जांच करने और पुष्टि करने का काम तो होना ही चाहिए। वरना शपथपत्र लेने का क्या मतलब? कोई और इसकी मांग क्यों करे – चुनाव आयोग को ही चिन्ता होनी चाहिए कि जो शपथपत्र उसे दिया गया है वह सही है या नहीं। पर चुनाव आयोग ऐसी चिन्ता नहीं करता है, जांच से बचने के लिए शपथपत्र मांगता है और शपथपत्र के साथ शिकायत हो तो सार्वजनिक तौर पर झूठ बोल चुका है और याद दिलाने पर भी शपथ के साथ दी गई जांच का क्या हुआ नहीं बताता है। सुप्रीम कोर्ट में यह दावा कर चुका है कि वह अपने काम करने के लिए स्वतंत्र है और सुप्रीम कोर्ट इस बात की परवाह नहीं करता है कि चुनाव आयोग के मुखिया की नियुक्ति का मामला क्या है, कानून बदला गया था वह ठीक है कि नहीं। मैं नहीं कहता कि नियम बदलना गलत है पर सही है तो सुप्रीम कोर्ट कह क्यों नहीं रहा है और इस तरह फेट एकम्पली का मामला भी आम है। आरोपों पर सरकार समर्थक और प्रचारक कहते रहे हैं कि सबूत हैं तो अदालत क्यों नहीं जाते, बदनाम कर रहे हैं आदि।

सच्चाई यह है कि राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बेंगलुरू सेंट्रल निर्वाचन क्षेत्र के एक विधानसभा क्षेत्र, महादेवपुरा की मतदाता सूची में हुई हेर फेर के आरोप लगाए थे। इस पर चुनाव आयोग का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका के जरिए मांग की गई थी कि इसकी जांच एसआईटी से कराने का आदेश दिया जाए। इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने कल खारिज कर दिया। भले अदालत में यह मुद्दा नहीं रहा हो पर राहुल गांधी यह आरोप लगा चुके हैं और कोर्ट में यह भी मुद्दा न हो लेकिन हम जानते हैं कि कर्नाटक के ही आलंद विधानसभा क्षेत्र से नाम हटावने की कोशिशों की जांच कर रही राज्य सीआईडी को चुनाव आयोग ने 18 महानों में 18 पत्रों का जवाब नहीं दिया है। ऐसे में अदालत आदेश देती भी तो क्या होता? इसलिए कुछ होना नहीं है यह पहले से तय था। जाहिर है कि अदालत में जो होना था वह सबको पता था। इससे अगर यह साबित होता है कि राहुल गांधी के आरोप गलत हैं, बदनाम करने वाले हैं या पर्याप्त सबूत नहीं तो कार्रवाई चुनाव आयोग को करनी है। वह भी नहीं हो रहा है। कम से कम अभी तक तो नहीं हुआ है। सरकार अगर अभी तक यह सब कर या करवा रही है तो मकसद एक ही हो सकता है, सत्ता में बने रहना ताकि कार्रवाई नहीं हो। वरना जिसका कोई नहीं था उसने भाजपा का मुख्यालय बनवा दिया, संघ का दफ्तर बन गया – 11 साल पद पर रह लिए अब झोला उठाकर चल देने में क्या दिक्कत होती। वैसे भी, सपनों का भारत तो 50 दिन में बनना था और विदेश में रखा काला धन वापस लाकर हर नागरिक को लखपति तो 100 दिन में बना दिया जाना था। इसलिए चुनाव आयोग के काम के साथ अदालती आदेशों पर सत्ता का असर अब साफ दिखने लगा है। मुख्य धारा का मीडिया अब ना तो इसे छिपा पा रहा है और ना ही मुद्दा बदल पा रहा है। उदाहरण के लिए आम आदमी पार्टी के नेता सत्येन्द्र जैन के खिलाफ क्लोजर रिपोर्ट लगने की खबर तब आई जब चुनाव हो गए और भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली का चुनाव कई साल बाद, कई कोशिशों से जीत लिया।

अब बिहार चुनाव से पहले, कल अदालत का यह आदेश आया कि आईआरसीटीसी घोटाले में लालू यादव, उनकी पत्नी, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और मौजूदा उम्मीदवार तेजस्वी यादव के खिलाफ आरोप तय हो गए हैं और मुकदमा चलेगा। इस खबर को भी आज हेडलाइन मैनेजमेंट के लिहाज से जो महत्व मिलना चाहिए था वह नजर नहीं आया। इसका कारण यह हो सकता है कि तमाम खबरें अपेक्षित थीं और अब पक्षपाती मानसिकता वालों को भी ये सब खबर नहीं लग रही होगी। हेडलाइन मैनेजमेंज के लिए जो खबरें गढ़ी जाती रही हैं वो अब इतनी स्पष्ट हो चली हैं कि उनमें नयापन नहीं होता है। बिहार चुनाव से पहले यह आदेश संयोग हो सकता था लेकिन नरेन्द्र मोदी के राज में साबित हो चला है कि यह प्रयोग होता है और चुनाव जीतने के लिए चली जाने वाली चाल न भी हो तो चुनावी प्रयोग जरूर है। यहां यह गौरतलब है कि मामला ‘बंधु बिहारी’ बनाम गुजराती जोड़ी का भी है। बंधु बिहारी – संकर्षण ठाकुर की किताब द ब्रदर्स बिहारी का अनुवाद है। जो स्थितियां हैं उनसे साफ है कि मामला वाशिंग मशीन में नहीं धुलने का भी है। कल इस खबर के बाद सोशल मीडिया पर लालू यादव के पुराने चारा घोटाले का भी जिक्र चलने लगा और भाजपाई ट्रोल मौके का लाभ उठाने की कोशिश करने लगे। लेकिन चारा घोटाले में लालू यादव को सजा होने की बात की जाए तो तथ्य यह भी है कि लालू यादव मुख्यमंत्री रहते हुए, जांच के समय इतने दबंग तो थे ही कि पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया था। राजनीतिक विरोधी कुछ नहीं कर पाए। या जो कर पाए वह सार्वजनिक है। इसमें रेलवे का होटल बेच देना शामिल है। फिर भी कानून ने अपना काम किया। ‘भ्रष्ट’ कांग्रेस की सरकार में यह काम हो पाया और इस्तीफे तो होते ही थे. वहां बेटों और सांसदों को बचाने के उदाहरण याद नहीं आते हैं पर प्रचार जो किया गया वह सबको याद होगा। दूसरी ओर, भाजपा सरकार में किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है और वाशिंग मशीन में धुलने, नहीं धुलने वालों को जेल में रखने के तमाम उदाहरण हैं।

लालू यादव ने पैसे लिए भी हों तो यह याद रखना होगा कि बिहार के किसी ना मालूम राजनीतिक दल को 4300 करोड़ रुपये का चन्दा मिलने और उसपर सन्नाटा छा जाने का गुजरात जैसा मामला नहीं है। गुजरात में कोई प्रशांत किशोर और जन सुराज पार्टी भी नहीं है। प्रशांत किशोर खुद कह चुके हैं कि उन्हें दो घंटे के कंसलटेशन के लिए करोड़ों में फीस मिली है। इतनी मोटी फीस किसी ने क्यों दी और क्यों ली – जांच का विषय है। लेकिन जांच नहीं हो रही है किसी को जरूरत नहीं है तो कारण समझना मुश्किल नहीं है। जरूरी नहीं है कि कारण वही हो जिसे समझना मुश्किल नहीं है पर जांच का निर्णय लेने वाल कौन है और उसकी चाहतें, जरूरतें तथा चालें किसी से छिपी नहीं हैं। ऐसे में लालू यादव के खिलाफ प्रचार और गुजराती जोड़ी की राजनीति पर चुप्पी मीडिया का खास काम रहा है। इसलिए, आज यह खबर भी महत्वपूर्ण होनी चाहिए थी कि 2019 में आईएएस की नौकरी से इस्तीफा देने वाले कन्नन गोपीनाथन कल औपचारिक तौर पर कांग्रेस में शामिल हो गए। इस मौके पर उन्होंने जो कहा वह भी भक्ति में प्रचारक बन बैठे मीडिया वालों के लिए संदेश है। उन्होंने कहा है, हमारा देश जिस रास्ते पर बढ़ रहा है वह मुझे गलत लगता है। मैं गलत के खिलाफ लड़ना चाहता हूं। इसलिए अब वे कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। बिहार में कल ही राजग ने सीटों के बंटवारे की घोषणा की। यह बिहार में नीतिश कुमार को शिन्दे बनाने की दूसरी कोशिश का हिस्सा है। लेकिन खबर यह भी नहीं है। इससे पहले, इस सरकार पर आरटीआई कानून को कमजोर करने का आरोप भी है। द टेलीग्राफ ने कल उसपर विस्तृत खबर छापी थी, कांग्रेस ने आरोप भी लगाए थे पर मुख्य धारा की मीडिया में यह खबर भी नहीं थी। ऐसी ही एक खबर एसआईआर से संबंधित है। खबर के अनुसार, बिहार एसआईआर के लिए चुनाव आयोग ने फ्रॉड रोकने वाले सॉफ्टवेयर का उपयोग ही नहीं किया। इसका कोई फॉलोअप नहीं है। आश्चर्य की बात है सरकार का सहयोग करने वाले नीतिश-नायडू को भी यह सब नहीं दिख रहा है और दिख रहा हो, वे कुछ कर रहे हों तो वह खबर नहीं है।  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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