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रिपोर्टर यानि बाइट कलक्टर…

Priyabhanshu Ranjan : रिपोर्टरों को जब ‘बाइट कलक्टर’ बना कर रख दिया जाता है, तो वो नेताओं के ट्वीट्स को छोड़कर कोई बड़ी खबर ब्रेक कर नहीं पाते। सरकार को हिला नहीं पाते। तो पता है ऐसे में मीडिया हाउसेस क्या करते हैं?  कभी “HT Leadership Summit”, तो कभी “Times LitFest” जैसे आयोजन करते हैं। कभी “शिखर सम्मेलन” तो कभी “साहित्य आजतक” जैसा मजमा लगाते हैं। कल से “एजेंडा आजतक” के तौर पर ऐसा ही एक मजमा फिर लगने वाला है। समझिए दो दिन की खबर का पूरा जुगाड़ हो गया।

Priyabhanshu Ranjan : रिपोर्टरों को जब ‘बाइट कलक्टर’ बना कर रख दिया जाता है, तो वो नेताओं के ट्वीट्स को छोड़कर कोई बड़ी खबर ब्रेक कर नहीं पाते। सरकार को हिला नहीं पाते। तो पता है ऐसे में मीडिया हाउसेस क्या करते हैं?  कभी “HT Leadership Summit”, तो कभी “Times LitFest” जैसे आयोजन करते हैं। कभी “शिखर सम्मेलन” तो कभी “साहित्य आजतक” जैसा मजमा लगाते हैं। कल से “एजेंडा आजतक” के तौर पर ऐसा ही एक मजमा फिर लगने वाला है। समझिए दो दिन की खबर का पूरा जुगाड़ हो गया।

करना कुछ नहीं है। बस कुछ नेताओं, फिल्मी सितारों, स्वनामधन्य साहित्यकारों को मंच पर बुलाकर बिठा लीजिए, चिकनी-चुपड़ी बातें करिए, सत्ता में बैठे नेताओं से मीठे-मीठे और विपक्ष वालों से थोड़े तीखे सवाल करिए…..बस ऐसे ही चलती रहती है बयानों वाली स्टोरीज की दुनिया।बेचारे रिपोर्टर करें तो करें क्या? कहां से लाएं सरकार को हिलाने वाली खबर? कोई खोजी रिपोर्ट लाने के लिए पत्रकार को बाहर भेजने पर मीडिया मालिकों का बजट गड़बड़ा जाता है। और दिल्ली में रहें तो मोदी और केजरीवाल सरकार अड़ंगे लगाती है। केंद्र के मंत्रालयों और दिल्ली सरकार के सचिवालय में ‘रीढ़ वाले’ पत्रकारों की एंट्री पर ‘बंदिशें’ लगा दी गई हैं।  अब अंदर वही पत्रकार जाता है, जो सरकार के ‘काम’ आता है!

पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.

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