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आज के अखबार तो पक्षपाती हैं ही, खबरों से अदालतों के फैसले भी स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं लगते

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में कई दिलचस्प खबरें हैं और मेरे लिये यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि किधर से शुरू करूं। इसलिए, पहले वही दो खबरें जो आज लीड हैं। पहली खबर राज्य सरकारों के बुलडोजर न्याय पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। अखबारों ने इसे बहुत महत्वपूर्ण खबर के रूप में पेश किया है पर मुझे ऐसा नहीं लगता है। फिलहाल इससे कोई राहत नहीं मिलनी। कानूनी मसला है इसलिए उसे छोड़ता हूं। दूसरा मामला दिलचस्प है, कोलकाता के डॉक्टर बलात्कार और हत्याकांड की जांच करने वाली सीबीआई ने आरजी कर अस्पताल के प्रमुख को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया है। जाहिर है, जब हंगामा ड्यूटी पर हत्या, बलात्कार और महिला सुरक्षा पर था तो जांच भ्रष्टाचार की भी हो रही होगी।

यह तब हुआ है जब कोलकाता पुलिस ने बलात्कार के आरोप में अपने ही वालंटीयर को पहले ही गिरफ्तार कर लिया था। इससे साफ है कि मामला वह नहीं होता है जो दिखाया और बताया जाता है। इसीलिए द टेलीग्राफ में आज यह खबर लीड है और फ्लैग शीर्षक है, जब न्याय की मांग कम होने का नाम नहीं ले रही है, सीबीआई ने 15 दिन पूछताछ करने के बाद पूर्व प्राचार्य को गिरफ्तार किया। मुख्य शीर्षक है, रिश्वत के मामले ने आखिरकार आरजी कर के संदीप घोष को लपेटे में लिया। हेडलाइन मैनेजमेंट यही है और इससे मुझे लगता है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस को बदनाम करने और भाजपा का प्रचार करने (उसके कारनामों) पर पर्दा डालने, भले वह 100 ग्राम का हो, का काम कर रहा है। आज की प्रमुख खबरें इस प्रकार हैं – 

1. घृणा फैलाने वाले भाषण के लिए भाजपा विधायक (नीतेश राणे) के खिलाफ दो एफआईआर। यह एफआईआर पुलिस ने लिखाई है (विपक्षी दल ने नहीं) और आरोपी वंशवाद विरोधी पार्टी के विधायक पूर्व केंद्रीय मंत्री नारायण राणे के सुपुत्र हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि महाराष्ट्र में चुनाव है इसलिए इसकी जरूरत है और ऐसा ही हरियाणा में है।

2. आंध्र प्रदेश तेलंगाना की बाढ़ में हजारों बेघर। (दोनों खबरें द हिन्दू से)    

3. जम्मू में संदिग्ध आतंकी हमले में सैनिक की मौत। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक और खबर के अनुसार जम्मू कश्मीर में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर जम्मू के दूर-दराज के इलाको में आतंकवाद एक अलग समस्या है। 

4. जाति आधारित जनगणना पर आरएसएस की टिप्पणी और उसकी प्रस्तुति आज एक अलग कहानी है। मैं उसे छोड़ रहा हूं।

5. भारत में मानव अंगों की खरीद फरोख्त प्रतिबंधित है। ऐसे में वीआईपी लोगों को दान दाता जल्दी मिल जाते है पर आम आदमी दान दाता के इंतजार में मर रहा है। आज खबर है कि तीन बांग्लादेशियों (यह पता नहीं चला कि घुसपैठिये हैं या वहां सताये जाने वाले हिन्दू) को रोजगार का लालच देकर उन्हें उनकी किडनी से वंचित कर दिया गया। जाहिर है यह आम आदमी नहीं कर सकता और किसी वीआईपी के लिए किसी बड़े अस्पताल ने किया-कराया होगा। (3 से 5 टाइम्स ऑफ इंडिया से)

6. आज एक खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड और लगभग लीड की शक्ल में छपी है, सात कृषि परियोजनाओं के लिए 13,966 करोड़ की परियोजनाओं को मंत्रिमंडल की सहमति। अमर उजाला में इस खबर का शीर्षक है, 2817 करोड़ के डिजटल कृषि मिशन को मंजूरी मिली। उपशीर्षक है, किसानों को सौगात, 14,000 की सात योजनाएं, आय बढ़ाने और जीवन को बेहतर करने के लिए पहल। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, कृषि क्षेत्र को सात सौगात। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों शीर्षक (और फैसला भी) किसानों के लिए है और हरियाणा चुनाव के मद्देनजर लिया गया है।    

7. इंडियन एक्सप्रेस में मणिपुर के मुख्यमंत्री के दामाद का कहना छपा है, केंद्रीय बल (मूक) दर्शक हैं, मणिपुर से हटाया जाये। इस खबर के कई मायने हैं। फिलहाल तो यही कि वंशवाद का मतलब होता है राजा का बेटा ही राजा होगा। बेटा कोई भी नहीं, सिर्फ बड़ा। बाकी एक चौथाई का हिस्सेदार तो अब होता है, राजपाट तो बड़े को ही मिलता था। बड़ा वाला ही राजा बनता था। राम को राजा नहीं बनने देने की ही कहानी ही रामायण है। नरेन्द्र मोदी के वंशवाद में दामाद भी शामिल हैं लेकिन वे दूसरी पार्टियों के वंशवाद पर बोलने की हिमाकत करते रहते हैं। मणिपुर के मामले में मुख्यमंत्री के दामाद क्यों आगे बढ़कर यह सब कह रहे हैं वह अलग राजनीति है लेकिन उसपर फिर कभी।  

8. इंडियन एक्सप्रेस की एक और खबर बता रही है कि अस्पताल से लेकर आवभगत और खाद्य व पेय क्षेत्र के सब बड़े लोग (खिलाड़ी?) बिहार जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने भले 2015 में 1,25,000 करोड़ का पैकेज नहीं दिया अब बैसाखी बनते ही उसे मजबूती देने और गुजरात बनाने में लग गये हैं। पाठक अगली गोली (दवाई) का इंतजार करें। 

9. नवोदय टाइम्स की खबर है, शंभू सीमा किसानों की शिकायतों के लिए बनी समिति

10. वैष्णो देवी मार्ग पर भस्खलन, 2 महिलाओं की मौत, लड़की घायल।  

आज पहले पन्ने की इन खबरो के साथ सबसे खास बात यह बताना जरूरी है कि सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच के खिलाफ कल लगाये गये कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा का आरोप वैसे नहीं छपा है जैसी खबर है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में पहले पन्ने पर हो भी तो दिखी नहीं। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर सिंगल कॉलम में है। बताया गया है कि अंदर विवरण है। शीर्षक है, कांग्रेस का दावा कि सेबी में रहते हुए भी आईसीआईसीआई बैंक ने उन्हें पैसे दिये, बैंक ने मना किया। मुझे लगता है कि यह आरोप इतना आम नहीं है कि बैंक का खंडन छाप कर काम पूरा हो जाये। कायदे से अखबारों को अपनी पड़ताल कर रिपोर्ट लिखनी चाहिये थी कि उनकी राय में कौन सही है। यह काम या खुलासा तो अखबार भी कर सकते थे और अखबारों ने नहीं किया इसलिए कांग्रेस पार्टी को करना पड़ा और बैंक ने खंडन कर दिया तो इसका मतलब यह भी है कि खबर गलत है लेकिन गलत खबर है तो अखबार बता क्यों नहीं रहे हैं कि कांग्रेस गलत, झूठा या निराधार आरोप लगा रही है और इसीलिये यह खबर पहले नहीं छपी। कुल मिलाकर, अखबारों ने आज इस खबर के साथ जो भी किया है, उनकी साख की कीमत पर है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर दो कॉलम में है। यहां एक कॉलम में आरोप और दूसरे में खंडन है। वह भी दिलचस्प अंदाज में। मुख्य शीर्षक है, सेबी प्रमुख के खिलाफ कांग्रेस के नये आरोप; आईसीआईसीआई ने खंडन किया। दो उपशीर्षक हैं, पहला सेबी में रहते हुए आईसीआईसीआई समूह से आय प्राप्त की जबकि दूसरा शीर्षक है, भुगतान तब हुआ था जब वे नौकरी में थीं। मुझे लगता है कि आरोप यही है कि वे नौकरी में कैसे थीं? और थीं तो आईसीआईसीआई बैंक से पैसे क्यों ले रही थीं। सेबी का प्रमुख होना एक नौकरी है। जिसका एक काम शेयर बाजार में आईसीआईसीआई बैंक का नियमन भी है। कोई भी दो नौकरी नहीं कर सकता है। पर सेबी प्रमुख को आईसीआईसीआई बैंक से भुगतान हुए हैं। बैंक इससे इनकार भी नहीं कर रहा है पर (शीर्षक में) वह यह नहीं बता रहा है कि ये भुगतान किस अवधि में किस काम के लिए हैं।

तकनीकी तौर पर सब सच बोल रहे हैं और सही खबर को झूठ साबित करने की कोशिश हो रही है। जबकि खबर यह होनी चाहिये थी कि कांग्रेस ने एक सही आरोप लगाया या गलत आरोप लगाया। सही है तो कैसे और गलत है तो कैसे। इस खबर से मुझे लगता है कि सरकार की सेवा में सही कह नहीं सकते और गलत है नहीं। वैसे भी, अगर किसी के पास इतने पैसे हैं कि उससे पर्याप्त आय हो रही है तो उसे ऐसे पद पर क्यों रखना? क्यों नहीं ऐसे व्यक्ति को रखा जाये जो निष्पक्ष होकर काम कर सके और उसपर ऐसे आरोपों की संभावना ही नहीं हो जो मौजूदा सेबी प्रमुख पर लगे हैं।  टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का विवरण भी अंदर है। आज यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में ठीक-ठाक सिंगल कॉलम है अंदरी जारी भी। द टेलीग्राफ में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। द हिन्दू में यह खबर पांच कॉलम में है और अंदर जारी है लेकिन पहले पन्ने पर खंडन नहीं है उल्टे हाइलाइट कर बताया गया है कि कांग्रेस के अनुमान के अनुसार सेबी प्रमुख को इस पद पर रहते हुए आईसीआईसीआई बैंक से 16.80 करोड़ रुपये मिले हैं। 

न्यायपालिका से संबंधित फैसले भी हाल के समय में संदिग्ध होने का संकेत देते हैं। पिछले दिनों मैंने कुछ मामलों का जिक्र किया आज भी कुछ मामले हैं। उदाहरण के लिए, आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के घर पर उन्हीं की पार्टी की सांसद को बिना इजाजत और पहले से समय लिये बिना रोकने की कोशिश में खरोंच आने और अन्य शिकायतों व आरोपों में गिरफ्तार मुख्यमंत्री के सचिव बिभव को 100 दिन से अधिक जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली है। आप जानते हैं और सुप्रीम कोर्ट कहता रहा है कि निचली अदालतें जमानत नहीं देती हैं और इस कारण सारे मामले सुप्रीम कोर्ट में तय होते हैं और हाल में यह भी कहा गया था कि जिलों की न्यायपालिका कानून का शासन लागू करने में योगदान कर सकती है। कुल मिलाकर, बिभव अपनी ड्यूटी करने में गिरफ्तार हुए और 100 दिन जेल में रहे जबकि उनका अपराध अगर कुछ था भी तो खरोंच से ज्यादा नहीं था। दूसरी ओर, बलात्कारियों को मिलने वाले सम्मान और संरक्षण के बारे में आप जानते ही हैं।

आज ही इंडियन एक्सप्रेस में खबर है, गोमांस के संदेह में अपमानित और हिंसा करने के आरोप में गिरफ्तार तीन लोगों को जमानत मिलने के बाद फिर गिरफ्तार किया जाना तय। खबर के अनुसार मुंबई जाने वाली ट्रेन में 72 साल के एक मुसलिम व्यक्ति से मार-पीट, गाली-ग्लौज और हिंसा के आरोप में गिरफ्तार तीन लोगों को अदालत से जमानत मिलने के एक दिन बाद फिर गिरफ्तार कर लिये जाने की उम्मीद है। ठाणे जीआरपी ने सोमवार को इनपर डकैती और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप भी लगाया है। मामला महाराष्ट्र का है जहां चुनाव होने हैं। मुझे लगता है कि फैसले में भाजपाई माहौल का असर है पर बाद की कार्रवाई में चुनाव का असर दिख रहा है।

जहां तक सरकारी कार्रवाई की बात है, आज कई अखबारों में खबर है और अमर उजाला में शीर्षक है, वक्फ बोर्ड में भरती घोटाले में आप विधायक अमानतुल्ला गिरफ्तार। मामला सेबी प्रमुख की नियुक्ति का गर्म है लेकिन भर्ती घोटाले में कर्रवाई हो रही है और आज गिरफ्तारी की खबर उसी सिलसिले में है। इससे पहले भी नियुक्तियों में घोटाले क आरोप में दूसरे दलों के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई है और भाजपा सरकार पर आरोप है कि रोजगार नहीं हैं, पद खाली हैं। आप समझ सकते हैं कि क्या हो रहा है पर वह मुद्दा नहीं है जबकि जनहित में मुद्दा वही होना चाहिये था। और मामला सिर्फ कार्रवाई का नहीं है। यह कार्रवाई पीएमएलए के तहत होगी क्योंकि भर्ती में घोटाले का यह मामला धन शोधन का बताया जा रहा है। आज ही खबर है और इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, आम आदमी पार्टी के के विजय नायर को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए जमानत दी कि स्वतंत्रता का अधिकार अलंघनीय है। आप देख सकते हैं कि स्वाति मालीवाल पर खरोंच वाले हमले के लिए 100 दिन जमानत नहीं मिली और डकैती व सांप्रदायिक सद्भाव खराब करने वाले मामले में धारा ही नहीं लगाई गई और 72 साल के मुसलिम नाम वाले एक दाढ़ी वाले व्यक्ति पर खतरे में बताये जाने वाले धर्म के लोगों के हमले और उससे दुर्व्यवहार के मामले में एक ही दिन में जमानत मिल गई।

अमर उजाला में पहले पन्ने पर आज एक खबर तीन कॉलम में दो लाइन के शीर्षक से है जो दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं है। यह सब अखबारों को खास क्षेत्र में लोकप्रिय बनाने के लिए भी किया जाता है। इससे प्रसार बढ़ने की उम्मीद की जाती है। कल मैंने लिखा था कि बंगाल की खबर लीड है। इससे बंगाल के हिन्दी पाठकों में पैठ बन सकती है। फिर भी, अखबारों में खबर की प्रमुखता दूसरी खबरों और प्रकाशन स्थल (या संस्करण) से तय होती है। इसलिए कई बार विदेशी खबरें भी महत्व पा जाती हैं। फिर भी पटना की जो खबर पटना संस्करण में लीड होगी वह दिल्ली में अंदर भी हो सकती है। टेलीविजन खबरों के साथ ऐसी बात नहीं है। वहां विज्ञापन के लिए टीआरपी चाहिये होती है और उसके लिए अलग खेल होते है पर वह सब अलग मामला है। शीर्षक इस प्रकार है, केजरीवाल को राहत नहीं, कोर्ट ने कहा कीचड़ उछालने की अनुमति नहीं दे सकते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीएम के खिलाफ मानहानि का मामला रद्द करने से इनकार किया।

यह स्थिति तब है जब दिल्ली में निर्वाचित मुख्यमंत्री से ज्यादा प्रभावशाली (और राहत प्राप्त) बना दिये गये उपराज्यपाल को मारपीट के एक पुराने मामले में अदालत से राहत मिली हुई है क्योंकि वे संवैधानिक पद पर हैं। आतंकवाद के मामले के बावजूद टिकट देकर, चुनाव लड़वाकर सांसद बना दिया गया। पांच साल मामला नहीं चला और अब सबको पता है कि सत्तारूढ़ दल की है तो मामला क्यों चले। पर मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा यह है कि राहुल गांधी के खिलाफ मामला तब सुना गया (या जा सका) जब राजनीति को या सत्तारूढ़ पार्टी को उसकी जरूर थी। कहने की जरूरत नहीं है कि राहुल गांधी की गिरफ्तारी का मतलब उन्हें डराना चाहे न हो, दूसरों को डरा ही दिया गया। इसी तरह लोकसभा चुनाव से पहले प्रचार में प्रधानमंत्री ने कितना कीचड़ उछाला वह किसी से छिपा नहीं है और जसे देखना था उसने क्या किया वह भी जग जाहर है। इन सबका उसका असर क्या हुआ वह अलग मुद्दा है। पर राजनीति समर्थकों और कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं, संवैधानिक संस्थाओं के सहयोग से चल रही दिखती है। अखबारों का काम है कि इसे भी बताते रहें पर वह नहीं किया जाता है।

खबर के अनुसार, केजरीवाल (और आम आदमी पार्टी के अन्य नेताओं) पर जो आरोप हैं वो प्रथम दृष्टया भाजपा को बदनाम करने और अनुचित राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के इरादे से अपमानजनक है। अदालत ने कहा है और यह खबर है, किसी राजनीतिक दल को प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के खिलाफ कीचड़ उछालने व शरारतपूर्ण, झूठे और अपमानजनक आरोप लगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती  है। ठीक है कि अदालत की टिप्पणी उपलब्ध और पेश तथ्यों के आधार पर होती है लेकिन एक पाठक, लेखक, रिपोर्टर और संपादक के रूप में हम जानते हैं कि भाजपा की कार्यशैली के कारण ऐसे तथ्य हैं कि उसे वाशिंग मशीन पार्टी कहा जाता है। और भाजपा तथा उसके समर्थक अदालत में शिकायत करते रहते हैं। फिर भी कांग्रेस ने आरोप लगाया है और आज ज्यादातर अखबारों ने उसे आईसीआईसीआई बैंक के खंडन के साथ छापा है। हिन्डनबर्ग के आरोपों के खिलाफ मुकदमे की खबर नहीं है और बचाव में जो कहा गया उससे उसने अपनी अगली रिपोर्ट को भी सही साबित कर दिया।

अमर उजाला में आज पहले पन्ने पर एक और खबर है, बीकानेर में वायुसेना का मिग-29 हुआ क्रैश, पायलट सुरक्षित। इस खबर से याद आया कि मिग विमानों को उड़ता ताबूत कहा जाता था और लंबे समय से मांग रही है कि इनका उड़ना प्रतिबंधित किया जाये। कई युवा पायलट की मौत इन विमानों की दुर्घटना में हुई है। पर अभी भी ये सेवा में हैं। भले कल के हादसे में पायलट की जान बच गई। आजतक डॉट इन की 20 मई 2023 की एक खबर के अनुसार, लगातार हादसों के बाद एमआईजी-21 के पूरे बेड़े की उड़ान पर लगाई रोक। यह विमान मिग-23 था। किसी को भी पूरा मामला समझने की इच्छा होगी, कौन बतायेगा? तब कहा गया था, भारतीय वायु सेना ने उड़ान के दौरान लगातार हादसे का शिकार हो रहे मिग 21 विमान के पूरे बेड़े की उड़ान पर रोक लगा दी है। … हालांकि स्थायी तौर पर ये रोक अभी नहीं लगाई गई है। इस पुरानी खबर के अनुसार, भारतीय वायु सेना ने मिग -21 विमान के बेड़े की उड़ान पर रोक का फैसला राजस्थान में दो सप्ताह पहले हुए हादसे के बाद लिया है। अभी उस हादसे की जांच की जा रही है। शीर्ष सरकारी सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि मिग-21 लड़ाकू विमानों के उड़ान पर रोक लगा दी गई है क्योंकि 8 मई 2023 को हुई दुर्घटना के दुर्घटना के कारणों की जांच की जा रही है। मिग वैरिएंट के पहले बेड़े को 1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था और भारत ने बाद के दशकों में 700 से अधिक मिग-वैरिएंट खरीदे थे। भारतीय वायु सेना को अपने पुराने लड़ाकू बेड़े को बदलने में मदद करने के लिए, रक्षा मंत्रालय ने पिछले साल फरवरी में 83 तेजस लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ ₹48,000 करोड़ का सौदा किया था। लेकिन मिग विमानों पर रोक नहीं लगी। मीडिया पूरा मामला नहीं बतायेगा। देश के जाबांज पायलट शहीद हो रहे हैं सरकार बताने से रही और संबंधित अधिकारी रिटायर होने के बाद पूरी बात बताने के लिए किताब लिखें तो उसे रक्षा मंत्रालय अनुमति के नाम पर रोक देगा। और ऐसे लोग, इस व्यवस्था में देश भक्ति की बात करते हैं। इमरजेंसी को कोसते हैं।

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