खून खौला देता है यह विज्ञापन, फुरसत मिले तो पढ़िएगा !

खबरों की सुर्खियां  ही इतिहास नहीं बताती, कभी-कभी विज्ञापन भी बता देते  है।  4-5 सेंटीमीटर में छपे विज्ञापन भी खून खौला देते हैं। जैसे यह ! न्यू फ्लोरिडा मेल, अमेरिका अखबार के 8 मार्च 1846 को छपे इस विज्ञापन पर भी नजर डालें। यह कहता  है कि 19 साल की एक सुंदर निग्रो गुलाम युवती को , जो गर्भावस्था के प्रारंभिक दौर में है, कोई चुरा ले गया है या वह  भाग गई है। उसे पकड़कर लानेवाले को पचास डॉलर का नकद इनाम दिया जाएगा।

ऐसे विज्ञापन आम थे अखबारों में 

नीग्रो, उसकी बीवी और बच्चा बिकाऊ है!

हमेशा अखबारों के शीर्षक ही इतिहास नहीं बताते, कभी-कभी विज्ञापन भी इतिहास बताते है। कभी-कभी तो 4-5 सेंटीमीटर में छपे विज्ञापन भी इतिहास की ऐसी घटनाओं पर रोशनी डाल देते है कि उस अतीत से खून खौल उठता है। न्यू फ्लोरिडा मेल, अमेरिका अखबार के 8 मार्च 1846 को छपे इस विज्ञापन पर भी नजर डालें। यह विज्ञापन कहता है कि 19 साल की एक सुंदर निग्रो गुलाम युवती, जो गर्भावस्था के प्रारंभिक दौर में है, को कोई चुरा ले गया है या भाग गई है। उसे पकड़कर लानेवाले को पचास डॉलर का नकद इनाम दिया जाएगा।

विज्ञापन की यह अखबारी कतरन देखकर आप चौंक गए होंगे। आज के दौर में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। वास्तविकता यह है कि अमेरिका में 200 साल पहले अखबारों में ऐसे विज्ञापन आम थे। 19 साल की सुंदर युवती जो गुलाम थी और भाग गई थी, गर्भवती कैसे हुई होगी, उस पर कौन-कौन से जुल्म हुए होंगे और वे कौन सी स्थितियां रही होंगी, जिसके कारण वह भागने पर मजबूर हुई। एक छोटा सा विज्ञापन किसी मोटे उपन्यास से ज्यादा लम्बी दास्तां सुना देता है। यह तो एक छोटा सा विज्ञापन था। लड़की 19 साल की थी, इसीलिए उसको लाने वाले को पचास डॉलर का पुरस्कार घोषित था। दूसरे विज्ञापन जिनमें भागने वाले गुलाम पुरुष और ज्यादा उम्र के व्यक्ति होते थे, दस या बीस डॉलर के ईनाम की घोषणा के विज्ञापनों के साथ अखबारों में छपते थे। पुराने अमेरिकी अखबारों की कतरने देखें तो उनमें गुलामों की नीलामी की खबरें और विज्ञापन छपे होते थे। बाकायदा दुकानों पर बोर्ड लगे होते थे, जिनमें घोषणा होती थी कि हम गुलामों के खरीद-बिक्री के कमिशन एजेंट है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पहला अफ्रीकी गुलाम वर्जीनिया में 1619 में लाया गया था। यह गुलाम अफ्रीकी देशों के होते थे। लेटीन अमेरिकी, एशियाई मूल के लोग भी गुलामों की तरह खरीदे-बेचे जाते थे। यह गुलाम केवल अश्वेत ही होते थे। किसी गोरे आदमी की खरीदी-बिक्री गुलाम के रूप में नहीं होती थी। पूरे के पूरे परिवार ही गुलाम के तौर पर पकड़ ले आए जाते थे। अफ्रीकी देशों में गुलामों का शिकार और कारोबार करने वाले एजेंट होते थे। यह जरूरी नहीं होता था कि गुलाम के परिवार का खरीददार कोई एक व्यक्ति ही हो। पति किसी और को बिक जाता था, पत्नी किस और को और बच्चा किसी और को। ये लोग अमेरिकी के तम्बाखू और कपास के खेतों में काम करते थे और इनकी दशा की कल्पना भी करना आज के जमाने में मुश्किल है। इन गुलामों के इतिहास को याद करने के लिए हर साल फरवरी में एक आयोजन भी होता है, जिसे ब्लैक हिस्ट्री मंथ कहा जाता है। अमेरिका के इन गुलामों की सारी आबादी अनेक जातियों के समूहों से मिलकर बनी थी। मुख्यत: सात क्षेत्रों में इन गुलामों का कारोबार होता था।

गुलामों के इस कारोबार को कानूनी जामा

गुलामों के इस कारोबार को अमेरिका की तत्कालीन सरकारों ने कानूनी तौर पर मान्यता दे रखी थी। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार की तरफ से पूरी छूट थी कि आप किसी भी निग्रो को गुलाम के तौर पर खरीद लो और उससे मनमाना काम करवाओ। सन् 1641 में मसाचुसेट्स में पहला उपनिवेश बना जिसने इसे कानूनी जामा पहनाया। करीब डेढ़ सौ साल तक अमेरिका के अलग-अलग क्षेत्रों में इस कानूनी जामे को बढ़ावा दिया जाता रहा। 1787 में पहली बार गुलामों के कारोबार को अवैध करार देने की बात शुरू हुई। यह बात उठने लगी कि जो गुलाम मुक्त हो चुके है उन्हें आम अमेरिकियों के तरह अधिकार दिए जाए। 4 जुलाई 1773 को अमेरिका ब्रिटेन से आजाद हुआ। इसके बावजूद अमेरिका में गुलामी की प्रथा की समस्याएं जारी थी। गोरे अमेरिकी बड़े-बड़े खेतों के मालिक थे और वे अफ्रीका के देशों से काम करने के लिए लालच देकर निग्रो लोगों को ले आते थे।

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की आजादी के बाद भी इन अश्वेतों की समस्याएं जस की तस थी। अमेरिका के उत्तरी राज्यों के लोग गुलामी की प्रथा के खिलाफ थे। अमेरिका का संविधान नागरिकों की समानता पर आधारित है। फिर भी राज्यों में अलग-अलग कानून और प्रथाएं चल रही थी। अमेरिका के उत्तरी और दक्षिणी राज्यों में गुलामों को लेकर मतभेद बने हुए थे। 1850 की दशक तक यह समस्या भीषण रूप ले चुकी थी।

अश्वेतों के अधिकारों को लेकर बंटा हुआ अमेरिका

आजादी के 7 दशक बीतने के बाद भी अमेरिका के कुछ राज्यों में गुलामी का चलन जारी था। अब्राहम लिंकन गुलामी की प्रथा के एकदम विरोध में खड़े थे और वह दौर ऐसा था जब समान नागिरक अधिकारों की मांग करने वाला अमेरिका अश्वेतों के अधिकारों को लेकर बंटा हुआ था। 1860 में जब अब्राहम लिंकन संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति चुने गए थे, तब उन्होंने तय किया कि वे इस समस्या को समाप्त करेंगे, लेकिन दक्षिणी राज्यों के लोग इस बात के खिलाफ थे और वे चाहते थे कि गुलामों की खरीदी-बिक्री जारी रहे। हालात इतने बदतर हो गए कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की एकता खतरे में पड़ गई। दक्षिणी राज्य चाहते थे कि वे एक अलग देश बना लें और गुलामी की परंपरा को जारी रखते हुए अपने कारोबार को बढ़ाए। दूसरी तरफ अब्राहम लिंकन थे जो किसी भी तरह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का विघटन देखने को तैयार नहीं थे और किसी भी कीमत पर गुलामी की प्रथा को जारी रखना चाहते थे। हालात बदतर होते गए और 1861 में अमेरिका में नागरिक अधिकारों को लेकर गृह युद्ध की स्थिति बन गई। अब्राहम लिंकन ऐसे हालात मेंं वहां के लोह पुरुष बनकर उभरे और उन्होंने ऐलान किया कि कोई राष्ट्र आधा गुलाम और आधा आजाद नहीं रह सकता। 1 जनवरी 1863 को उन्होंने गुलामी की प्रथा को खत्म करने वाले आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए। और गृह युद्ध से निपटने के लिए अपनी तमाम सेनाओं को मैदान में उतार दिया। अमेरिका सेना ने हालात पर कब्जा कर लिया और अमेरिका टूटने से बच गया, लेकिन इसके बाद भी 100 साल तक अब्राहम लिंकन की ‘मुक्ति उद्घोषणा’ (जिसके तहत गुलामी को पूरी तरह खत्म किया जाना था)पर अमल नहीं हो पाया।

नीग्रो बेचने की दुकान / नीलामीघरनीग्रो बेचने की दुकान / नीलामीघर

44वां राष्ट्रपति कोई अश्वेत बन पाया

1950 के दशक में डॉ. मार्टिन लूथर ने महात्मा गांधी की विचारधारा अहिंसा और सत्य के जरिए अश्वेतों के पक्ष में समानता और स्वतंत्रता का आंदोलन चलाया। 1963 में अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में दो लाख से ज्यादा लोग इकट्ठे हुए, जिसमें मार्टिन लूथर ने एक ऐतिहासिक भाषण दिया, जो अश्वेतों के अधिकारों के हक में मिल का पत्थर साबित हुआ। 1963 में अमेरिका के 35वें राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी थे। उन्होंने कानून बनाकर इस बात की पूरी कोशिश की कि अमेरिका में अश्वेतों को मिलने वाला अधिकार सिर्फ कागजों पर न रहे। इतनी लम्बी लड़ाई और संघर्ष के बाद अब जाकर अमेरिका के इतिहास का 44वां राष्ट्रपति कोई अश्वेत बन पाया है।

अभी भी दुनिया के कुछ देशों में गुलाम प्रथा जारी है, लेकिन उसका स्वरूप बदल गया है। ऐसा माना जाता है कि नशीले पदार्थों और हथियारों के बाद गुलामी के लिए मानवों की तस्करी एक बड़ा व्यवसाय बन चुकी है, लेकिन उसे कहीं भी कानूनी मान्यता नहीं है।

“गुलामी की प्रथा को हटाना दुनिया के नक्शे से अमेरिका को हटाने के जैसा होगा”

एक बड़ी विचित्र बात है कि जब पूरी दुनिया गुलाम प्रथा के खिलाफ एक मत होने जा रही थी तब भी कई ऐसे लोग थे, जो यह मानते थे कि कारोबार के लिए गुलामों की प्रथा जारी रखना जरूरी है। ऐसे लोगों में साम्यवाद के जन्मदाता कार्ल मार्क्स  का 1846 में लिखा एक पत्र चर्चा में रहा है, जो उन्होंने अपने दोस्त पैवेल वी. अन्नकोव लिखा था। इस पत्र में कार्ल माक्र्स ने कहा था- गुलामी की प्रथा एक बहुत महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है। गुलामी की प्रथा के बिना दुनिया का सबसे प्रगतिशील देश अमेरिका पुरातनपंथी ही हो जाएगा। गुलामी की प्रथा को हटाना दुनिया के नक्शे से अमेरिका को हटाने के जैसा होगा। अगर नक्शे से आधुनिक अमेरिका को हटा दो, तो आधुनिक सभ्यता और व्यापार ही नष्ट हो जाएंगे और दुनियाभर में अराजकात छा जाएगी। पूरी दुनिया में अनंदकाल से गुलामी की प्रथा एक आर्थिक गतिविधि के रूप में चल रही है। अमेरिका संविधान के जनक माने जाने वाले जेम्स मेडिसन ने ही गुलामी की प्रथा खत्म करने वाले विधेयक की रचना की थी और अमेरिकी कांग्रेस में पारित करवाने में भी उनकी भूमिका प्रमुख थी। उन्होंने मेडिसन ने एलेक्जेंडर हेमिल्टन और जॉन जे. के साथ मिलकर 1788 में फेडरेलिस्ट पेपर्स नाम से एक दस्तावेज तैयार किए थे, जो अखबारों में लेखों की श्रंखला के रूप में प्रकाशित हुए थे। जेम्स मेडिसन की आलोचना इस बात के लिए की जाती है कि उन्होंने भले ही गुलामी प्रथा के खिलाफ कानून बनाने में मदद की थी, लेकिन वे खुद हजारों एकड़ खेती के मालिक थे और उनके यहां सैकड़ों अफ्रीकी गुलामों की तरह काम करते थे।

कोई भी किसी को गुलाम बनाने की कोशिश न करें : गुरु नानक देव

भारत में गुलामों की खरीदी-बिक्री के किसी तरह के दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। कई लोग मानते हैं कि बंधुआ मजदूरी भी एक तरह की गुलामी की प्रथा ही थी। कई लोग जातिवाद को भी गुलामी मानते है, लेकिन यह खुशी की बात है कि भारत ने हमेशा गुलामी की प्रथा और कारोबार का विरोध किया है। हाल ही में मिले एक दस्तावेज के अनुसार सिख गुरु नानक देव 1520 में वेटिकन गए थे। वहां उन्होंने तत्कालीन पोप से मिलकर विश्व शांति की बात की थी। उस वक्त आर्क बिशप डॉम जोम्स रोनाल्डो ऑफ पोप बेनेडिक्ट-12 वेटिकन के प्रमुख थे। गुरु नानक देव को वेटिकन के मुसोलियम में ठहराया गया था। तब गुरु नानक देव ने तत्कालीन पोप से जो चर्चा की थी उसमें इस बात पर भी जोर दिया गया था कि दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सारे लोग मिलजुलकर शांति से रहे। कोई भी किसी को गुलाम बनाने की कोशिश न करें। गुलामों की खरीदी-बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए। दस्तावेजों के अनुसार गुरुनानक देव जी के रोम और इटली के इस प्रवास में उनके भाई मरदाना जी भी साथ में थे। गुरु नानक देव ने पांच सौ साल पहले मानवता की जिस स्थिति की कल्पना की थी वह स्थिति अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं हुई है, लेकिन उस दिशा में कदम जरूर उठाया जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक प्रकाश हिंदुस्तानी से संपर्क : prakashhindustani@gmail.com

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं, क्लिक करें-

https://chat.whatsapp.com/CMIPU0AMloEDMzg3kaUkhs

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *