एक संप्रभु राष्ट्र को पर्दे के पीछे से हांकती अदृश्य शक्ति

यह प्रश्न पहले भी कई बार सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ चुका है कि क्या सप्रभुता सम्पन्न भारतीय गणराज्य को दो भिन्न-भिन्न शक्तियां संचालित कर सकती हैं? एक, संविधान सम्मत और दूसरी अंसवैधानिक। संवैधानिक व्यवस्था के तहत निश्चित प्रक्रिया का पालन करके जनता द्वारा निर्वाचित सरकार के विषय में सभी जानते हैं लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि आज देश पर शासन करने वाली सरकार का संचालन पर्दे के पीछे से एक अंसवैधानिक व्यवस्था कर रही है। यह है भारतीय जनता पार्टी का हाइ-कमान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

यह सही है कि देश के सभी राजनीतिक दल विधि-व्यवस्था का पालन करते हुए चुनाव में भाग लेते हैं और जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों के संख्याबल के अनुसार देश का शासन चलाते हैं लेकिन भाजपा के संदर्भ में यह प्रक्रिया एक अलग ही तरह से संचालित होती है। जिसके तहत पार्टी संगठन खड़ा करना, पदाधिकारियों का मनोनयन, चुनावी रणनीति तैयार करना, प्रत्याशियों को टिकट देना, चुनावों का संचालन करना, मंत्रि-मंडल का चयन, विभागों का बंटवारा तथा सरकार की नीतियों व कार्यक्रमों का निर्धारण व क्रियान्वयन आदि सभी स्तरों पर संघ का सीधा-सीधा हस्तक्षेप भाजपा के कार्यों में होता है। इस तरह संघ पर्दे के पीछे से सरकार को अपने एजेंडे के अनुसार हांकता है।

स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा संगठन प्रचारित करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके जेबी संगठन–भारतीय जनता पार्टी (पूर्व नाम जनसंघ) के अन्तर्सम्बंधों की हकीकत बहुत कम लोग जानते हैं। दरअसल, संघ ने अपने कथित सामाजिक-राजनीतिक कार्यों के लिए अनेक आनुषंगिक छोटे संगठन खड़े किये हुए हैं। इन सबको मिलाकर ‘संघ-परिवार’ भी कहा जाता है और इस कथित परिवार का मुखिया ‘सरसंघचालक’ कहलाता है। स्वाभाविक तौर पर सभी संगठन, उनके पदाधिकारी और सदस्यगण अंतिम रूप संघ की सर्वोच्च सत्ता ‘सरसंघचालक’ के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

अब यहां एक प्रश्न यह हो सकता है कि देश के आम नागरिक के लिए इसमें जानने की ऐसी क्या जरूरी बात है? लेकिन है साहब, जरूर है। तनिक सोचिये–

अपने लक्ष्य और मंतव्य को पूरा करने के लिए संघ एक राजनीतिक दल का गठन करता है जिसके भीतरी सांगठनिक ढांचे में लोकतंत्र की अवधारणा के लिए कोई स्थान नहीं है क्योंकि उसके प्रमुख व अन्य मुख्य पदों के लिए कोई चुनाव कराने की बाध्यता नहीं है। देश के कानूनी प्रावधानों के परे सबकुछ वरिष्ठ द्वारा अपना उत्तराधिकारी चुनने पर निर्भर होता है। और, उस पर भी तुर्रा यह कि ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम का कोई संगठन भारत सरकार की किसी भी सार्वजनिक प्रणाली या दफ्तर में पंजीकृत नहीं है।

पंजीकरण सम्बंधी क्या है पूरा मामला?
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि देश में 92 साल से सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ पंजीकृत नहीं है। इसी को देखते हुए पिछले साल नागपुर के कुछ लोगों ने संघ को अपने नाम करने की कोशिश की थी। इसके लिए नागपुर के पूर्व नगरसेवक जनार्दन मून ने धर्मादाय आयुक्त के पास ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के नाम से दस्तावेज जमा करवाये। संस्था के रजिस्ट्रेशन का प्रस्ताव पहले ऑनलाइन भरा गया और बाद में आवश्यक दस्तावेजों के साथ सह-धर्मादाय आयुक्त कार्यालय नागपुर में प्रस्तुत किया गया।

आवेदनकर्ता जनार्दन मून का कहना था कि संघ ने खुद को पंजीकृत नहीं किया है। ऐसे में यदि वे देशहित व मानव कल्याण के लिए संस्था को इस नाम से पंजीकृत करते है तो उनको इस नाम का फायदा होगा। साथ ही यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी एक सबक है कि 92 साल के बाद भी उसने अपने आपको देश के संविधान व कानून से ऊपर मानते हुए खुद को पंजीकृत नहीं करवाया। इसी बीच चंद्रपुर के एक व्यक्ति ने भी इस नाम पर दावा कर दिया।
इस आवेदन पर सार्वजनिक न्यास पंजीयन कार्यालय, नागपुर ने 8 सितंबर, 2017 को सुनवाई रखी थी लेकिन इस पर आपत्ति करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता व अधिवक्ता राजेंद्र गुंडलवार ने 5 सितंबर को सार्वजनिक न्यास पंजीयक के सम्मुख दावा प्रस्तुत किया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का पंजीयन चंद्रपुर में पहले ही हो चुका है, इसलिए नया पंजीयन न किया जाए। मामले की सुनवाई कर रही धर्मादाय आयुक्त करुणा पत्रे के छुट्टी पर चले जाने से सुनवाई तारीख 14 सितबर को होनी थी। उसके बाद क्या हुआ, नहीं मालूम।

संघ के पंजीयन को लेकर कांग्रेस व अन्य संगठन समय-समय पर सवाल उठाते रहे हैं। संघ की स्थापना के 92 वर्ष बाद अब पंजीयन को लेकर किये गये दावे पर यकीन करें तो संघ कार्यालय का पंजीकृत पता नागपुर नहीं, बल्कि चंद्रपुर का बताया गया है। गुंडलवार के अनुसार, उन्होंने पंजीयन के सम्बंध में संघ के पदाधिकारियों से चर्चा की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पंजीयन क्रमांक-एमएच 08-डी 0018394 और डिजिट कोड-94910 है। यह पंजीयन भारत सरकार ने अधिनियम-1860, सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन नियम-1950 के तहत जारी किया है।

विवाद का सिलसिला
– जनार्दन मून ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम पर संगठन पंजीयन का आवेदन सार्वजनिक न्यास पंजीयन कार्यालय, नागपुर में दिया।
– मून के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम पर फिलहाल कोई संस्था रजिस्टर्ड नहीं है। इसलिए उनकी संस्था का पंजीयन संघ के नाम से किया जाए।
– इस मामले में संघ के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम पर नये संगठन को रजिस्टर्ड करना धर्मादाय आयुक्त का अधिकार है। इस मामले पर अधिक और कुछ नहीं कहा जा सकता है।
संघ के लिए पंजीयन महत्वपूर्ण नहीं
– संघ के राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के सह-संयोजक विराग पाचपोर के अनुसार, संघ के लिए पंजीयन का विषय अधिक महत्व नहीं रखता।
– संघ के नाम पर किसी तरह का आर्थिक लाभ नहीं लिया जाता है। संघ के कार्यक्रमों में प्रायोजक नहीं होते हैं और दान भी नहीं लिया जाता।
– कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी संघ के नाम पर नये संगठन के पंजीयन का प्रयास किया था।
– संघ धार्मिक संस्था नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंजीयन का सम्बंध धर्मादाय आयुक्त (सार्वजनिक न्यास पंजीयक) से नहीं है।
– धर्मदाय आयुक्त के अंतर्गत पंजीबद्ध संस्थाओं को 6 श्रेणी में बांटा गया है–‘ए’ में हिंदू मंदिर ‘व’ धार्मिक संस्था, ‘बी’ में मुस्लिम, मदरसे, ‘सी’ में क्रिश्चियन चर्च, ‘डी’ बुद्धिस्ट, ‘ई’ पारसी व ‘एफ’ श्रेणी में खेल, स्वास्थ्य व सार्वजनिक उपयोग से सम्बंधित संस्थाओं का समावेश रहता है।
संघ के अनुसार उसका संविधान चोरी हो गया था
– संघ के संगठनात्मक पंजीयन के बारे में संघ पदाधिकारी खुलकर कुछ नहीं बोलते हैं लेकिन यह अवश्य बताते हैं कि संघ का संगठनात्मक संविधान चोरी हुआ था।
– 1925 में संघ ने स्थापना के साथ ही संगठनात्मक संविधान तैयार किया था, लेकिन संगठनात्मक पंजीयन नहीं कराया जा सका।
– 1947 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सरकार के साथ संघ का सम्बंध ठीक नहीं होने से संघ पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी की थी।
– 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया जो 12 सितंबर, 1949 तक प्रभावी रहा।
– उस दौरान सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर जेल में थे। कानूनी प्रक्रिया के तहत गोलवलकर ने तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को संघ का संगठनात्मक संविधान दिया था।
-उसमें भी कहा गया था कि संघ का लिखित संविधान चोरी हो गया है। उसके जो अंश याद हैं, उसके आधार पर नये संविधान का प्रारूप तैयार किया गया है।
– अब जब संघ का पंजीकरण ही घपले में है तो 92 वर्ष से संघ का लेखा-जोखा किस तरह रखा गया?
– संघ की आमदनी के स्रोत क्या हैं और उसने अब तक किस-किस से तथा कहां-कहां से धन प्राप्त किया?
– संघ का किसी सरकारी ऐजेंसी से अन्य संस्थाओं/संगठनों की तरह ऑडिट क्यों नहीं हुआ? यदि हुआ तो क्या वह सार्वजनिक है?
– यदि संघ एक पंजीकृत संगठन है तो क्या उसकी नियमावली में सरसंघचालक द्वारा अपना उत्तराधिकार मनोनीत करने का प्रावधान है? यदि है तो ऐसा अलोकतांत्रिक प्रावधान कैसे है?

संघ की पिछले 92 सालों से चली आ रही अंसवैधानिक यह कार्य-प्रणाली भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है जिसका प्रमाण वर्तमान मोदी सरकार और संघी नेताओं की कार-गुजारियों में स्पष्ट दिखाई देता है।

संघ द्वारा अपने सदस्यों को पर्दे के पीछे से दिशा-निर्देश देने के कारण ही 1979 में जनता पार्टी के बीच उभरे मतभेदों के निरंतर गहराते जाने से जनता पार्टी टूट गई और मोरार जी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई। जबकि जनता पार्टी के एक घटक के तौर पर अपना पूर्ण विलय करने के बाद जनसंघ नेता अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि ‘उनकी पुरानी पार्टी मर कर खत्म हो चुकी है’ लेकिन इसके बावजूद यह समझा जाता रहा कि जनता पार्टी के जनसंघी सदस्यों को संघ से दिशा-निर्देश मिल रहे हैं। उनसे कहा गया कि वे संघ से अपने सम्बंधों की समाप्ति की घोषाणा करें लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन मात्र है।

संघ घटक की दोहरी सदस्यता का वह विवाद जिस एकमात्र कारण से उभरा, वह मधु लिमये की प्रखर बुद्धि से उपजा यह सिद्धांत था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विश्वास हिन्दू राष्ट्र में है। इस विचारधारा को मानने वाले कभी धर्म-निरपेक्ष नहीं हो सकते। इसलिए जनसंघ के नेता अपना सम्बंध संघ से तोड़ें, नहीं तो जनता पार्टी छोड़ें। इस सम्बंध में मधु लिमये ने जनता पार्टी पर दो खंडों में लिखी अपनी पुस्तक–‘जनता पार्टी एन एक्सपेरिमेंट’ में ‘जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नामक एक अध्याय में अपने विचार लिखे हैं कि जनसंघ, संघ परिवार का अंग है और वह जनता पार्टी में सबसे अधिक सुगठित है। वह संघ से अपने सम्बंध बनाए रखता है तो जनता पार्टी में टकराव होगा, क्योंकि सेक्युलर नेशनलिज्म को खतरा पैदा हो जाएगा।

तो क्या मधु लिमये की सेक्युलर नेशनलिज्म को खतरे की भविष्यवाणी गलत साबित हुई?

–श्यामसिंह रावत

वरिष्ठ पत्रकार

ssrawat.nt@gmail.com


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