उन्नीस का चुनाव बीजेपी जीत गई तो हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए संविधान संशोधन हो जाएगा! देखें वीडियो

जाने-माने राजनेता और चिंतक शशि थरूर का दावा है कि भारतीय जनता पार्टी अभी केवल राज्यसभा में बहुमत में नहीं है इसलिए वह संविधान संशोधन अपने मन मुताबिक करके इसका हिंदूकरण नहीं कर पा रही है. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एक संप्रभु राष्ट्र को पर्दे के पीछे से हांकती अदृश्य शक्ति

यह प्रश्न पहले भी कई बार सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ चुका है कि क्या सप्रभुता सम्पन्न भारतीय गणराज्य को दो भिन्न-भिन्न शक्तियां संचालित कर सकती हैं? एक, संविधान सम्मत और दूसरी अंसवैधानिक। संवैधानिक व्यवस्था के तहत निश्चित प्रक्रिया का पालन करके जनता द्वारा निर्वाचित सरकार के विषय में सभी जानते हैं लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि आज देश पर शासन करने वाली सरकार का संचालन पर्दे के पीछे से एक अंसवैधानिक व्यवस्था कर रही है। यह है भारतीय जनता पार्टी का हाइ-कमान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नोएडा पुलिस ने संघ विचारक और प्रवक्ता राकेश सिन्हा को जबरन उठा लिया

Sheetal P Singh : हेडब्रेकिंग न्यूज़… दलित जैसा दिखने भर पर (दुबले पतले साँवले, मेहनतकश पर भोजनविहीन) संघी विचारक राकेश सिन्हा को योगी जी की पुलिस धर ले गई! बाल बाल बचे क्योंकि यूपी में तो आजकल एनकाउंटर का सीज़न चल रहा है! हाँफते काँपते मोदी जी और योगी जी को खबर किये ट्वीट से! मज़ाक़ नहीं है भई, एकदम सच्ची खबर है। उनका ट्वीट संलग्न है!

Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या आरएसएस के किसी आदमी ने ब्रिटिश हुकूमत से लड़ाई नहीं लड़ी?

Urmilesh Urmil : ‘आप’ वाले बीच-बीच में तमाम तरह के ग़लत फैसले और मूर्खताएं भी करते रहते हैं पर धीरे-धीरे उनमें कुछ राजनीतिक-प्रौढ़ता भी आ रही है। दिल्ली विधानसभा की गैलरी में में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले अनेक महान् योद्धाओं और नेताओं के कुल 70 चित्र लगे हैं। उनमें एक चित्र महान् योद्धा टीपू सुल्तान का भी है।

इसे लगाने के विरुद्ध जब भाजपाई नेताओं ने आपत्ति जताई तो पार्टी प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने भाजपा विधायकों-नेताओं से विनम्रतापूर्वक कहा, ‘ विधानसभा गैलरी में ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने वाले योद्धाओं के चित्र लगते हैं। जनसंघ-आरएसएस-भाजपा जैसे संगठनों के ऐसे तत्कालीन कुछ योद्धाओं के नाम भेजिए, हम उनके चित्र भी लगवायेंगे!’ यह प्रस्ताव दिए कई दिन हो गए पर भाजपा वाले अभी तक ऐसे लोगों के नाम की सूची लेकर नहीं आ सके!

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी और तोगड़िया : ये जंग हिंदू चहरे के लिए है!

देश में इन दिनों एक सवाल सबके पास है कि प्रवीण तोगड़िया और बीजेपी सरकार के बीच आखिर तकरार है क्या? क्या वजह है कि तोगड़िया ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और क्या वजह है कि वो ये कह रहे हैं कि एनकाउंटर की साजिश रची जा रही है। तो जरा लौटिए 2017 दिसंबर के महीने में, क्यों कि संघ से जुड़े सूत्र कहते हैं कि विश्व हिंदू परिषद जो कि संघ की अनुषांगिक शाखा है, इसके इतिहास में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए चुनाव करवाए गए। इसकी सबसे बड़ी वजह ये थी कि संघ के भीतर ही दो खेमे बन गए थे। एक खेमा चंपत राय को अध्यक्ष के रूप में देखना चाहता है तो दूसरा खेमा प्रवीण तोगड़िया को अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में देखना चाहता था। लिहाजा तय किया गया कि इसके लिए चुनाव करवाए जाएंगे।

विश्व हिंदू परिषद में ज्यादातर प्रचारक हैं। इनमें 40 फीसदी प्रचारक प्रवीण तोगड़िया के साथ हैं। इसके साथ ही सुब्रमण्यम स्वामी, आचार्य धर्मेंद्र, गोविंदाचार्य, रासबिहारी और महावीर जी भी तोगड़िया के पक्षधर हैं। दरअसल हमेशा नरेंद्र मोदी के साथ रहने वाले तोगड़िया पिछले कुछ समय से सरकार से खफा हैं, क्योंकि पिछले कुछ समय से तोगड़िया राम मंदिर, किसान और बेरोजगारी के मसले पर लगातार सरकार को अपने निशाने पर ले रहे हैं। सूत्र कहते हैं कि सत्ता और संघ के कई नेता नहीं चाहते थे कि प्रवीण तोगड़िया विश्व हिंदू परिषद की कमान संभालें। इसी विरोधाभास को खत्म करने के लिए चुनाव का रास्ता निकाला गया लेकिन इस चुनाव में कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना भी शायद संघ और मोदी सरकार ने कभी नहीं की थी।

सूत्र कहते हैं कि जब भुवनेश्वर में वोटिंग हुई तो करीब 60 फीसदी वोट प्रवीण तोगड़िया को मिले, जबकि संघ और मोदी सरकार चंपत राय को अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में देखना चाहते थे, जो मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय महामंत्री हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद प्रवीण तोगड़िया को सबसे ज्यादा वोट मिले। संघ के भीतर हुई इस घटना ने सबको सकते में डाल दिया था क्योंकि ये कोई छोटी बात नहीं थी, जब सरकार ने अपने ही संगठन में मुंह की खायी थी। इसी के बाद प्रवीण तोगड़िया के बेहोश मिलने वाली घटना होती है, जिस पर प्रवीण तोड़िया कहते हैं- ‘मैं सुबह अपने कार्यालय में पूजा कर रहा था तभी वहां मेरा एक परिचित आता है जो मुझसे कहता है कि आप यहां से तुरंत निकल जाइए क्यों कि कुछ लोग आपके एनकाउंटर के लिए निकले हैं’।

Z+ सिक्यूरिटी वाले प्रवीण तोगड़िया वहां से समय रहते निकल जाते हैं, जिसके बाद वो बेहोशी की हालत में मिलते हैं।

इसी समय राहुल गांधी देश भर के मंदिरों में हिंदू वोटबैंक खंगाल रहे हैं।

11 घंटे बाद बेहोशी की हालत में मिले प्रवीण तोगड़िया से मिलने के लिए हार्दिक पटेल पहुंचते हैं और ये इल्जाम लगाते हैं कि ‘इस पूरी घटना के पीछे मोदी और शाह का हाथ है’।  यहां एक अहम तस्वीर देखने को मिली क्योंकि विरोधी खेमे के हार्दिक पटेल तो अस्पताल में हालचाल जानने पहुंचे लेकिन पुराने साथी नरेंद्र मोदी और बीजेपी का कोई भी नेता प्रवीण तोगड़िया से मिलने अस्पताल नहीं पहुंचा। अलबत्ता तोगड़िया के इतने बड़े आरोपों पर बीजेपी एकदम खामोश है। वैसे ये वही बीजेपी है जिसने राम मंदिर का सपना अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया के कंधे पर बैठकर देखा था और ये वही प्रवीण तोगड़िया हैं जिन्हें 1979 में महज 22 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों का मुख्य मार्गदर्शक बनाया गया था।

इसी घटना के ठीक 24 घंटे पहले सर संघ चालक मोहन भागवत ने ये कहा था कि ‘सत्ता कृत्रम चीज है, वो बदलती रहती है’। आप इस बात का क्या मतलब निकालते हैं। जरा जोर देंगे दिमाग पर तो तस्वीर साफ हो जाएगी कि ये शब्द किसके लिए कहे गए थे और इसका आशय क्या था। अब जरा एक और तस्वीर देख लीजिए। राम मंदिर का संकल्प लेने वाले प्रवीण तोगड़िया पिछले 22 सालों से अपने घर नहीं गए हैं। बेटी की शादी में भी वो इसलिए नहीं पहुंच पाए थे क्योंकि उस दिन वो धर्म जागरण कार्यक्रम में थे। डॉ. प्रवीण तोगड़िया देश के सबसे बड़े कैंसर सर्जन में शुमार होते हैं। उन्होंने अपने पैसे से एक कैंसर इंस्टीट्यूट खोला है, जहां के मुनाफे के रुपयों में से 1 लाख रुपए उनके घर खर्च को जाता है। बाकी पूरा पैसा सेवा के काम में इस्तेमाल होता है। इतना ही नहीं, जब भी पैसे की कमी होती है तो विदेश जाकर सर्जरी करते हैं और उससे कमाए पैसे को संघ और सेवा कार्यों में खर्च करते हैं।

इसी तस्वीर के समानांतर एक और तस्वीर देखिए। देश में स्वर्गीय अशोक सिंघल और स्वर्गीय बालाजी साहब ठाकरे के बाद अगर किसी नेता की छवि हिंदू नेता के तौर पर सबसे प्रभावशाली थी तो वो नाम डॉ. प्रवीण तोगड़िया का है। संघ से जुड़े सूत्र खुद इस बात का दावा करते हैंं कि गुजरात हिंसा के समय सबसे प्रभावशाली हिंदू नेता प्रवीण तोगड़िया ही थे। उस दौर में तोगड़िया ने ही लाल कृष्ण आडवाणी से बात की थी और हालातों की जानकारी दी थी। लेकिन इसके बाद जो कुछ भी हुआ उसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। यही वो दौर था जब देश के हिंदू वोटबैंक ने एक चेहरे पर अपनी मुहर लगाई थी। ये चेहरा था गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी का। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी जिससे आज भी पर्दा नहीं उठा है। देश जिस हिंदू चेहरे को स्वीकार रहा था उसके पीछे सबसे बड़ा योगदान तो प्रवीण तोगड़िया का था। काम तोगड़िया कर रहे थे और नाम मोदी का हो रहा था।  कई बार ये क्रेडिट था तो कई मायनों में इसे डिसक्रेडिट भी कहा गया, क्यों कि जिस रीयल हिंदू नेता की छवि को देश देख रहा था असल में उसका जमीन पर कुछ भी आधार था ही नहीं। करते तोगड़िया जा रहे थे लेकिन सीएम होने के नाते उसका पूरा श्रेय मोदी लेते जा रहे थे।

मौजूदा समय में जो क्लेश है या जो विवाद है, वो यही है कि असल में हिंदू चेहरा है कौन? प्रधानमंत्री मोदी ने देश के सामने खुद को हिंदू चेहरे के रूप में पेश किया। लेकिन अगर इसे समझना हो तो उदाहरण के तौर पर क्रिसिटोफर मार्लो और विलियम शेक्सपीयर को देखा जा सकता है। कहा जाता है कि विलियम शेक्सपीयर ने क्रिस्टोफर मार्लो को अपने घर में रख रखा था। वो उनको खाना, कपड़े और पैसे देते थे। इसके एवज में क्रिस्टोफर लिखते थे लेकिन विलियम शेक्सपीयर उसे अपने नाम से प्रकाशित करवाते थे। ठीक इसी तरह से जो कुछ भी होता था वो करते तो प्रवीण तोगड़िया थे लेकिन उसका फल या प्रतिफल नरेंद्र मोदी को मिलता था। बल्कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सबसे बड़ा सपोर्ट भी प्रवीण तोगड़िया का ही था लेकिन पिछले कुछ समय से तोगड़िया ने खिलाफत का रास्ता चुन लिया था। वो चाहते थे कि राम मंदिर पर संसद में कानून लाया जाए। बेरोजगारी और किसानों की समस्या को सिरे से नकारा ना जाए। इनसे निपटने के लिए रणनीति बनाई जाए। असल में जो हिंदू वोटबैंक के मसीहा थे वो प्रवीण तोगड़िया ही थे, इसलिए सत्ता को उनकी खिलाफत नागवार लगने लगी। अंदर ही अंदर ये डर सताने लगा कि कहीं तोगड़िया ही सबसे बड़ा चेहरा ना बन जाएं इसलिए उनको संगठन से बाहर रखे जाने का फैसला किया गया।

यहां सबसे ज्यादा भटकी हुई कांग्रेस थी। अगर कांग्रेस ने 2002 में आरोपों के कटघरे में मोदी की जगह प्रवीण तोगड़िया को रखा होता तो शायद आज ये तस्वीर खड़ी ही नहीं होती लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया। उसने हमेशा अपने निशाने पर मोदी को लिया। मोदी खुद भी इस बात को बार बार कहते हैं कि उन्होंने अपनी परेशानियों को अपने मौके में तब्दील किया है। असलियत भी यही है। ये बिल्कुल वैसा ही नजारा है जैसा अगर आप मोदी की तस्वीर को साफ करेंगे तो उसके अंदर से तोगड़िया की तस्वीर को निकलकर सामने आना होगा।

अनुराग सिंह
प्रोड्यूसर
सहारा समय
नोएडा
singh.or.anu@gmail.com

इसे भी पढ़ सकते हैं…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कांग्रेस के दिग्गी राजा संघ के करीबी शंकराचार्य की शरण में पहुंचे! (देखें वीडियो)

मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम और कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा पहुंचे हरिद्वार. उनके साथ संत प्रमोद कृष्णम भी थे जो कांग्रेस के करीबी माने जाते हैं. ये दोनों कनखल स्थित जगतगुरु आश्रम पहुंचे. इन लोगों ने जगतगुरु शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज से मुलाकात की. जगतगुरु शंकराचार्य को आरएसएस का बेहद करीबी बताया जाता है. आश्रम स्थित भगवान शंकर के मंदिर में दिग्गी ने किया जलाभिषेक. दिग्विजय के पहुंचने से लगाई जा रही हैं कई तरह की अटकलें. संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

-विनीता खुराना की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

संघी वर्तमान को भी तोड़-मरोड़ देते हैं! (संदर्भ : गौरी लंकेश को ईसाई बताना और दफनाए जाने का जिक्र करना )

Rajiv Nayan Bahuguna : इतिहास तो छोड़िए, जिस निर्लज्जता और मूर्खता के साथ संघी वर्तमान को भी तोड़ मरोड़ देते हैं, वह हतप्रभ कर देता है। विदित हो कि महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ इलाकों में गंगा को गंगे, गीता को गीते, नेता को नेते और पत्रिका को पत्रिके कहा-लिखा जाता है। तदनुसार गौरी लंकेश की पत्रिका का नाम है- लंकेश पत्रिके। इसे मरोड़ कर वह बेशर्म कह रहे हैं कि उसका नाम गौरी लंकेश पेट्रिक है। वह ईसाई थी और उसे दफनाया गया। बता दूं कि दक्षिण के कई हिन्दू समुदायों में दाह की बजाय भू-समाधि दी जाती है। मसलन आद्य शंकराचार्य के माता पिता की भू-समाधि का प्रकरण अधिसंख्य जानते हैं।

गौरी के पिता पी लंकेश का नाम मैं अपनी पत्रकारिता के प्रारंभिक दिनों में कौतुक से सुनता था, उसके ‘लंकेश’ सरनेम के कारण। गांघी के बाद वह अकेला लोक प्रिय पत्रिका का मालिक था, जो बगैर विज्ञापन के पॉपुलर मैगज़ीन निकालता था। उसकी पत्रिका लाखों में बिकती थी, और दिल्ली तक उसकी धमक सुनाई पड़ती थी। जाहिल, अपढ़, बेशर्म, इतिहास विमुख संघियों का 1977 में लाल कृष्ण आडवाणी ने बड़े मीडिया हाउसों में धसान किया, जब आडवाणी सूचना मंत्री बना। फलस्वरूप जिन्हें पढ़ना भी नहीं आता था, वह लिखने लगे। कालांतर में इन्होंने पत्रकारिता में जम कर अंधाधुंध की।

हमारे समय मे व्यावसायिक पत्रकारिता के कठिन मान दन्ड थे। एमए और अधूरी पीएचडी करने के बाद मुझे नवभारत टाइम्स की नौकरी करनी थी। उसके सम्पादक मेरे पिता के निकट मित्र राजेन्द्र माथुर थे। उन्होंने बगैर परीक्षा के मुझ रखने से मना कर दिया, और प्रस्ताव रखा कि वह मुझे किसी यूनिवर्सिटी में हिंदी का लेक्चरर बना देंगे। लेकिन मुझे ओनली पत्रकार बनना था। सो मुझे कहा गया कि 15 दिन बाद नवभारत टाइम्स के जयपुर संस्करण के लिए परीक्षा होगी। तैयार रहूं। परीक्षा में हिंदी, सामान्य ज्ञान, इतिहास, अंग्रेज़ी आदि का कठिन पर्चा होता था। अन्य में तो मैं होशियार था, पर मुझे अंग्रेज़ी तब इतनी ही आती थी, जितनी आज सोनिया गांधी को हिंदी आती है। मैं डर कर, माथुर को बगैर बताए परीक्षा के वक़्त गांव भाग गया, और दो माह बाद लौटा। मुझसे पूछताछ हुई, डांट पड़ी। छह माह बाद फिर पटना संस्करण के लिए एग्जाम हुए। इस बार माथुर की नज़र बचा कर एक सीनियर कुमाउनी जर्नलिस्ट दीवान सिंह मेहता ने मुझे अंग्रेज़ी के पर्चे में नकल करवा कर पास कराया। बाद में मैंने अपनी अंग्रेज़ी सुधरी। ऐ, मूर्ख, आ मुझसे ट्यूशन पढ़ भाषा, हिस्ट्री, पोयम और जोग्राफी का।

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

संघियों की संकीर्ण मानसिकता देखिए

Priyabhanshu Ranjan : संघियों की संकीर्ण मानसिकता देखिए… ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के 75 साल पूरे होने के मौके पर RSS के प्रचारक रहे भाजपा नेता नरेंद्र मोदी ने हमेशा की तरह अपने भाषण (लफ्फाजी) में जवाहर लाल नेहरू का कहीं कोई जिक्र नहीं किया। न ही इशारों में कुछ कहा कि आजादी की लड़ाई में नेहरू का भी योगदान था। मोदी ने अपने भाषण में इस बात का भी जिक्र करना जरूरी नहीं समझा कि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का प्रस्ताव अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के बंबई अधिवेशन में 8 अगस्त 1942 को पारित हुआ था। भला, अपने मुंह से कांग्रेस का नाम कैसे ले लेते ‘साहेब’?

अपने आप को ‘निष्पक्ष’ दिखाने की लाख कोशिश के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की पक्षपाती राजनीति खुलकर सामने आ ही जाती है। महाजन ने अपने भाषण में ये तो कहा कि बंबई के गोवालिया टैंक मैदान में 8 अगस्त 1942 की शाम हुई एक बैठक में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन वो ये कहने में सकुचा गईं कि ये बैठक कांग्रेस की थी, प्रस्ताव कांग्रेस की तरफ से नेहरू ने ही पेश किया और पारित भी कांग्रेसियों ने ही किया।

अपने नेता नरेंद्र मोदी का अनुकरण करते हुए महाजन ने भी नेहरू का नाम लेना जरूरी नहीं समझा। पर दीन दयाल उपाध्याय का नाम लेना नहीं भूलीं, जिनके बारे में खुद भाजपा के लोग ढंग से 10 लाइन नहीं बता पाते कि आखिर उनका योगदान क्या था। पार्ट टाइम रक्षा मंत्री अरूण जेटली ने भी राज्यसभा में यही ‘नेक’ काम किए। संघियों को पता नहीं किसने सलाह दे दी है कि वो नेहरू का नाम और काम गिनाना बंद कर देंगे तो नेहरू खत्म हो जाएंगे। सबको अपनी तरह बेवकूफ समझ रखा है!

पीटीआई में कार्यरत पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

डा. आंबेडकर को ठिकाने लगाने की आरएसएस की एक और कोशिश

Kanwal Bharti : डा. आंबेडकर को ठिकाने लगाने की आरएसएस की एक और कोशिश…  दूरदर्शन पर खबर थी, रामानुजाचार्य की जयंती पर, प्रधानमंत्री मोदीजी ने कहा है कि रामानुजाचार्य के दर्शन से डा. आंबेडकर भी प्रभावित थे. यह जुमलेबाज़ मोदी जी का झूठ नहीं है, बल्कि यह वह एजेंडा है, जिसे आरएसएस ने डा. आंबेडकर के लिए तैयार किया है. इस एजेंडे के दो बिंदु हैं, एक- डा, आंबेडकर को मुस्लिम विरोधी बनाना, और दो, डा. आंबेडकर को हिन्दूवादी बनाना. वैसे, उन्हें मुस्लिम-विरोधी बनाना भी हिन्दूवादी बनाना ही है. यह काम वो नब्बे के दशक से ही कर रहे हैं.

1996 में मैंने “डा. आंबेडकर को नकारे जाने की साजिश” किताब लिख कर आरएसएस के इस एजेंडे का खंडन किया था. उनका सबसे खतरनाक प्रचार, जिसे वे आज भी जोरशोर से कह रहे हैं, वह यह है कि डा. आंबेडकर ने अपने संघर्ष की प्रेरणा भगवद्गीता से ली थी. इस संबंध में 7 दिसम्बर 1944 की वह कतरन आज भी देखी जा सकती है, जिसे फ्री प्रेस आफ इंडिया ने जारी किया था. उसमें के. सुब्रामणियम ने लिखा है, “डा. आंबेडकर ने गीता के अध्ययन में पन्द्रह वर्ष व्यतीत किये हैं. उनकी खोज यह है कि गीता का लेखक या तो पागल था, या मूर्ख था.” भला, ऐसा व्यक्ति गीता से क्या प्रेरणा लेगा?

अब नया शगूफा यह छोड़ा गया है कि डा. आंबेडकर पर रामानुजाचार्य का प्रभाव पड़ा था. एक झूठ को अगर हजार बार हजार लोग एक साथ बोलेंगे, तो वह लोगों को सच लगने लगता है. आरएसएस के झूठे एजेंडे का यही मकसद है. आरएसएस के सामने वह दलित समाज है, जो हिन्दू रंग में रंगा हुआ है और जिसका पढ़ाई-लिखाई से कोई वास्ता नहीं है. वह बस आंबेडकर की माला जपने वाला समुदाय है. ऐसा समुदाय आरएसएस के बहुत काम का है, क्योंकि वह उसका ब्रेनवाश आसानी से कर सकता है.

रामानुजाचार्य जैसों के दर्शन पर डा. आंबेडकर की किताब “रिडिलस आफ हिन्दुइज्म” को ही पढ़ना काफी होगा. रामानुजाचार्य वह दार्शनिक थे, जिन्होंने ब्रह्म में सगुण को प्रवेश कराया है, और नाम, रूप, लीला, धाम, वर्ण, का मार्ग प्रशस्त किया है. यादव प्रकाश उनके गुरु थे, जिनसे उन्होंने वेदों की शिक्षा ली थी. ऐसे वेद्मार्गी, सगुण मार्गी और वर्ण मार्गी रामानुजाचार्य अम्बेडकर को प्रभावित करेंगे. ऐसा सोचना भी हास्यास्पद होगा.

एक क्षण को अगर मान भी लिया जाये, कि रामानुजाचार्य से डा. आंबेडकर प्रभावित हुए थे, तो फिर उन्होंने हिन्दूधर्म का परित्याग क्यों किया? वेद-विरोधी, वर्ण-विरोधी और ईश्वर-विरोधी बौद्धधर्म को क्यों अपनाया था? आरएसएस के लोग शायद इसका भी तोड़ निकाल ही रहे होंगे. 

जाने-माने दलित चिंतक कँवल भारती की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हितेश शंकर जैसी स्पष्टता बीजेपी के लिए काम कर रहे पत्रकारों / प्रचारकों में कभी नहीं देखी

Prashant Rajawat : किसी भी राजनीतिक दल के मुखपत्र, अख़बार, पत्रिकाएं और वेबसाइट। इनमे काम करने वाले पत्रकार निश्चित ही अपने दल के लिए प्रचारक की भूमिका निभाते हैं। इसमें गलत भी कुछ नहीं यहीं इन पत्रकारों का कर्तव्य है। पर जब ये स्वतंत्र पत्रकार की भूमिका में खुद को प्रस्तुत करते हैं पार्टी सेवा से इतर तब पचता नहीं मुझे। इस मामले में पाञ्चजन्य सम्पादक हितेश शंकर जी का जवाब नहीं। वर्ष 2013 में नौकरी की तलाश करते हुए पाञ्चजन्य पहुंचा था वहां जगह निकली थी।

बड़े सम्मान से हितेश जी ने बिठाया, चाय पानी पिलाया। और अंत में स्पष्ट कहा की हम पत्रकार नहीं प्रचारक हैं। आप युवा हो अभी पाञ्चजन्य की पत्रकारिता आपके हित में नहीं क्योंकि पाञ्चजन्य संघ का मुखपत्र है और हम एक पक्षीय पत्रकारिता करते हैं। अभी आप अन्य संस्थानों में काम करिये। दिलचस्प और बेबाक़ बोल हितेश जी के। आज भी दिल खुश कर देते हैं। अरे जो है वो है। जो है उसे स्वीकारने में परेशानी क्या। इतनी स्पष्टता बीजेपी के लिए काम कर रहे पत्रकारों (प्रचारकों) में कभी नहीं देखी।

युवा पत्रकार प्रशांत राजावत की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

झूठ की फैक्ट्री तो आप चला रहे हैं राकेश सिन्हा जी!

आरएसएस विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा जी ने बीबीसी हिन्दी सेवा को दिये साक्षात्कार में यह दावा किया है कि -“संघ में कोई साधारण से साधारण कार्यकर्ता भी जातिवादी व्यवहार नहीं करता है.” सिन्हा ने यह दावा मेरे इस आरोप के जवाब में किया है, जिसमें मैने आरएसएस के लोगो द्वारा मेरे साथ किये गये जातिगत भेदभाव की कहानी सार्वजनिक की. मैं फिर से दौहरा रहा हूं कि- “आरएसएस एक सवर्ण मानसिकता का पूर्णत: जातिवादी चरित्र का अलोकतांत्रिक संगठन है, जो इस देश के संविधान को खत्म करके मनुस्मृति पर आधारित धार्मिक हिन्दुराष्ट्र बनाना चाहता है.”

मैं अपने साथ संघियों द्वारा किये गये अस्पृश्यतापूर्ण भेदभाव की कहानी के एक एक शब्द पर आज भी कायम हूं. मैं फिर से बताना चाहता हूं कि मैं महज 13 वर्ष की अल्पायु में खेल खेलने के लालच में आरएसएस के झांसे में आया. अपने गांव की शाखा का मुख्य शिक्षक रहा ,पहली बार कारसेवा में गया.टुण्डला में गिरफ्तार हुआ.दस दिन आगरा के बहुद्देशीय स्टेडियम की अस्थाई जेल में रहा. संघ का प्रथम वर्ष किया. एक वर्ष तक जिला कार्यालय प्रमुख रहा. भीलवाड़ा में 12 मार्च 1992 को हुई गोलीबारी का दृकसाक्षी रहा, पुलिस की लाठियां खाई और कर्फ्यू की तकलीफों को सहा.

मैं पूर्णकालिक प्रचारक बनना चाहता था, मगर मुझे कहा गया कि संघ को आप जैसे विचारक नहीं विचारधारा को बिना विचारे फैलाने वाले प्रचारक चाहिये. इतना ही नहीं. बल्कि यह कहकर भी मुझे संतुष्टि दी गई कि बंधु अभी हमारा हिन्दु समाज बहुत विषम है, कल प्रचारक बनने के बाद आपको जाति आधारित कटु अनुभव होने पर आप संघ के प्रति गलत धारणाएं बना लेंगे, इसलिये उत्तम यह होगा कि आप कुछ समय विस्तारक बन कर निकलो. फिर देखेंगे कि आप प्रचारक बनने की स्थिति में होते हो या नहीं .

बाद में मैं ना प्रचारक बना और ना ही विस्तारक बन पाया, क्योंकि अस्थिकलश यात्रा के साथ चल रहे संघियों ने मेरे घर पर खाना खाने से साफ मना कर दिया. भोजन पैक करवा कर ले गये और अगले गांव भगवानपुरा के मोड़ पर फेंक गये. इसका जब मुझे पता चला तो मैं स्पष्टीकरण मांगने पहुंचा. जवाब दिया गया हाथ से छूटकर गिर गया. अब गिरा हुआ खाना तो कैसे खाते? सच्चाई इसके विपरीत थी. मेरे घर से गया खाना सड़क किनारे फेंका गया और देर रात एक पण्डित के घर खाना बनवा कर खाया गया.
 
मैने इस घटना को लेकर जिला प्रचारक से लेकर सरसंघ चालक तक पत्र लिखे, जिनका कोई जवाब नहीं मिला. तब मैंने पहली बार जनवरी 1993 में इस पूरी घटना पर आर्टिकल लिखा जो उस वक्त भीलवाड़ा से प्रकाशित साप्ताहिक दहकते अंगारे नामक समाचार पत्र में विस्तारपूर्वक छपा. बाद में यह कहानी कई नामचीन समाचार पत्र पत्रिकाओं में कई बार प्रकाशित हुई. हजारों सभा सम्मेलनों में इसे मैंने सार्वजनिक रूप से खुलेआम माईक पर साझा किया. यूट्यूब तक पर कई वर्षों से यह मौजूद है. कभी कोई प्रतिक्रिया संघ की ओर से नहीं की गई.

हां, वर्ष 2012 में मुझ पर भाजपा में शामिल होने के लिये डोरे डाले गये. तब संघ के उच्चस्तरीय पांच वरिष्ठ प्रचारकों ने जरूर इस घटना पर यह कहकर मौखिक खेद जताया कि आपके साथ हुआ यह दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार संघ का अधिकृत व्यवहार नहीं था, बल्कि कुछ स्वयंसेवकों की व्यक्तिगत त्रुटि थी. लेकिन घटना के लगभग 25 साल बाद अब संघ के एकमात्र विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा कह रहे हैं कि – अगर कोई व्यक्ति ऐसा (संघ पर जातिवादी है) कहता है तो उसका निजी स्वार्थ होगा या फिर वह झूठ बोल रहा है.

प्रोफेसर सिन्हा मुझे व्यक्तिगत रूप से बिल्कुल भी नहीं जानते. हम कभी कहीं भी नहीं मिले. जिन दिनों मैं आरएसएस में रहा, तब तक मैंने ऐसे किसी विचारक का नाम तक नहीं सुना और ना ही उनके विचारों से लाभान्वित हुआ. तीन चार साल से उनका चेहरा टीवी चैनल्स की पैनल चर्चाओं में दिखने से पता चला कि वे आरएसएस के घोषित विचारक है तथा भारत नीति प्रतिष्ठान के मानद निदेशक होकर दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसियेट प्रोफेसर है. साथ ही मैने यह भी जाना कि वे संघ संस्थापक के बी हेडगेवार और गुरूजी गोलवलकर के अधिकृत जीवनीकार है. पता चला है कि उन्होंने और भी कई किताबें लिखी है. अच्छा लगा कि आरएसएस आजकल सिन्हा साहब जैसे प्रचारक किस्म के विचारकों की कद्र करने लगा है.

मुझे उनके आरएसएस विचारक होने पर कुछ भी नहीं कहना है,पर मेरी आपत्ति इस बात को लेकर जरूर है कि उन्होंने बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित अन्तर्राष्ट्रीय न्यूज नेटवर्क पर मुझे झूठ बोलने वाला कहा है. राकेश सिन्हा बिना मुझे जाने, बिना मुझसे बात किये, बिना मेरी कहानी सुने, बिना मेरा पक्ष जाने झट से बोल दिया कि संघ पर जातिवाद का आरोप लगाने वाला झूठा है. मुझे घोर आश्चर्य है कि उन्होंने तथ्य व सत्य जाने बगैर ऐसा कैसे कहा होगा? मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा मगर यह जरूर समझ पाया कि यह उनके झूठ बोलने के संघ प्रदत्त सहज संस्कारों और गोयबल्स सैद्धांतिकी की वजह से ही संभव हुआ होगा.

सिन्हा जी यह जानते है कि संघ अपने आप में आज के दौर में झूठ बोलना सिखाने की विश्व की सबसे बड़ी फैक्ट्री है,इसलिये उन्हे पक्का भरोसा है कि जो व्यक्ति पांच साल संघी रहा है ,वह झूठ बोलना तो अच्छे से सीख ही गया होगा.दूसरा उन्हें यह भी यकीन है कि हर संघी, चाहे हो वर्तमान हो या निवृतमान हो ,वह आवश्यक रूप से अनिवार्य तौर पर झूठा होगा ही. दरअसल उन्होंने अपने अनुभव और आरएसएस के चरित्र के आलोक में ही मुझे झूठा ठहराने की कोशिस की होगी, ऐसा मेरा मानना है.

खैर, मैं संघ विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा जी को बेहद आदर के साथ कहना चाहता हूं कि आप एक बार व्यक्तिगत रूप से कभी मिलकर मुझसे मेरा पक्ष जरूर जान लीजियेगा अथवा किसी भी जांच एजेन्सी है जांच करवा लीजिये. मैं अपने आरोप पर कायम हूं .रही बात झूठ बोलने की तो मैं तो झूठ की फैक्ट्री कभी की छोड़ आया.आप उसे अभी तक चला रहे है सिन्हा साहब.आपका यह दावा बेहद हास्यास्पद है कि आरएसएस का कोई साधारण से साधारण कार्यकर्ता भी जातिवादी व्यवहार नहीं करता ! आप साधारण स्वयंसेवक की बात कर रहे है और मेरा दावा है कि “संघ के पपू” (परम् पूज्य) सरसंघचालक श्रीमान मोहन भागवत तक घनघोर जातिवादी है. दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी हैं. आरक्षण के तो घोर निन्दक हैं ही, पक्के मनुवादी भी हैं. इतना ही नहीं अभी भी आपके संघ की अखिल भारतीय कार्यसमिति में आज तक 90 वर्ष बाद भी एक भी दलित या आदिवासी नहीं है. सारे महत्वपूर्ण फैसले आपकी आरएसएस नामक ब्राह्मण महासभा करती है, उन्हें धरातल पर लागू करने वाले हरावल दस्तों में जरूर कई दलित आदिवासी अपवाद रूप में मौजूद है, पर वे अभी भी शूद्रों की भांति सेवक ही बनकर प्रसन्न दिखाई पड़ते है. नेतृत्व तो उच्चवर्णीय हिन्दुओं के पास ही है.

सिन्हा साहब आपका संघ आज भी गाय सरीखे चौपाया को दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक इंसान से ज्यादा पवित्र मानता है और उसकी रक्षा के नाम पर इनकी जान लेने से भी नहीं चूकता है.आप लोगों ने एक पशु को इतना उपर उठा रखा है कि मानव की गरिमा गिर कर भूलुंठित हो चुकी है. आपके लाखों साधारण और असाधारण स्वयंसेवक आज भी दलितों का हाथ का छुंआ पानी पीने में हिचकते है पर गाय का पेशाब बड़ी शान से पी जाते है और बचा खुचा इत्र की तरह खुद पर छिड़क लेते हैं. आपका एक भी पपू सरसंघचालक अजा, जजा और पिछड़े वर्ग से नहीं आया .क्या यह जातिवाद नहीं है? सच तो यह है सिन्हा जी कि आपने गणवेश से सिर्फ हाफपैंट ही छोड़ी है, जातिजन्य वैचारिक नग्नता तो आज भी जस की तस है.

अंत में संघ विचारक जी मैं आपसे जानना चाहता हूं कि आज तक संघ ने जाति विनाश के लिये कोई आन्दोलन क्यों नहीं चलाया ? आपके कितने प्रतिशत स्वयंसेवकों नें जाति तोड़कर अन्तर्जातिय विवाह किये? आपके संगठन में कितने प्रतिशत प्रचारक दलित व आदिवासी वर्ग के है ? संघ ने आज तक दलितों के समानता के लिये किये गये कितने आन्दोलनों में शिरकत की? सच्चाई तो यह है सिन्हा साहब कि आज भी आरएसएस के लिये दलित, पिछड़े और आदिवासी सिर्फ उपयोग की सामग्री मात्र है और हर वो व्यक्ति आपकी नजर में झूठा और स्वार्थी है जो आपसे इस्तेमाल होने से इंकार कर देता है.

वैसे भी एक दोगले, पाखण्डी, संकीर्ण, जातिवादी और संविधानविरोधी तथा मनु समर्थक सवर्ण पितृसत्तात्मक अलोकतांत्रिक फासिस्ट संगठन से जुड़े शख्स से सत्यवादी होने का सर्टीफिकेट चाहिये किसको? हमें अच्छे से पता है कि आपकी फैक्टरी से  “झूठ बोलो, झट से बोलो और जोर जोर से बोलो” वाले उत्पाद तेजी से उत्सर्जित हो रहे हैं. कोई यूं ही आपको ‘रूमर्स स्प्रेडिंग सोसायटी’ (आरएसएस) थोड़े ही कहता है!

भंवर मेघवंशी
स्वतंत्र पत्रकार
bhanwarmeghwanshi@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

लोकसभा टीवी पर अब आरएसएस को महान बताने का कार्यक्रम चलता रहता है…

Dilip Khan : लोकसभा टीवी मुझे साल भर पहले तक अच्छा लगता था। मैं दूसरों को सजेस्ट करता था कि देखा करो। लेकिन इन दिनों ये चैनल बीजेपी भी नहीं बल्कि संघ का मुखपत्र बन गया है। जब-तब RSS को इस पर महान बताने का कार्यक्रम चलता रहता है।

अभी देखिए चैनल समझा रहा है कि संघ देश के लिए कितना ज़रूरी है!

राज्यसभा टीवी में कार्यरत दिलीप खान की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

संघ के मुताबिक टीवी पर ब्रेन लेश डिसकसन, इसमें शामिल होते हैं अपठित पत्रकार जिन्हें भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं (देखें वीडियो)

मऊ : भारत में चाहें जो बड़ी समस्या चल रही हो, सूखा हो, महंगाई हो, भ्रष्टाचार हो लेकिन आरएसएस वालों का हमेशा एक राग बजता है. वह है राग मुसलमान. घुमा फिरा कर कोई ऐसा मुद्दा ले आते हैं जिससे मुसलमानों को चुनौती दी जा सके और पूरे भारत की बहस इसी मसले पर शिफ्ट किया जा सके. दुर्भाग्य से मीडिया का बड़ा हिस्सा भी इसी उलझावों में बह जाता है और भाजपा-संघ का भोंपू बनते हुए मूल मुद्दों से हटते हुए इन्हीं नान इशूज को इशू बना देता है. हालांकि संघ नेता फिर भी टीवी वालों को बख्शते नहीं और कहते हैं कि चैनलों पर ब्रेनलेस डिसकशन चलती है और इसमें अपठित पत्रकार भाग लेते हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं. मतलब कि अगर संघ का चले तो वो सारे चैनल बंद करा के सिर्फ एक संघ नाम से चैनल चलाएं और उसमें जो कुछ ज्ञान दिया जाएगा, उसे ही प्रसाद के रूप में पाने के लिए देश भर के दर्शक बाध्य होंगे.

नीचे चार वीडियो लिंक हैं. ये आरएसएस के पूर्वी यूपी के क्षेत्रीय संयोजक राम आशीष वर्मा से संबंधित हैं. संघ के इस बड़े नेता ने मीडिया, मुसलमान और भारत माता की जय पर क्या क्या बातें की हैं, सुनिए. ये इशारे इशारे में जो जहर हिंदू मुस्लिम दिमागों में घोल रहे हैं, उसका क्या अंजाम होगा, इन्हें भी नहीं पता. आजम खान और औवैशी इस देश की मुख्य धारा नहीं हैं. ज्यादातर मुसलमान भारत के रंग, भारत की संस्कृति, भारत के नारे में रच बस घुल चुके हैं. लेकिन क्या आप इनसे नारे लगवा कर इनकी परीक्षा लेंगे, तभी इनकी देशभक्ति प्रमाणित करेंगे? ऐसे घिनौने कृत्य से देश का नुकसान ज्यादा होगा, फायदा कम.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वी यूपी के क्षेत्रीय संयोजक राम आशीष वर्मा ने पत्रकारों से बातचीत और संघ के एक जमावड़े के संबोधन में जो कुछ कहा, उसका लब्बोलुवाब ये है-

”डा. हेडगवार ने कहा था भारत वर्ष ही हिन्दू राष्ट्र है, उस समय भी लोगों ने प्रश्न उठाये थे उसमें हर तबके के लोग थे. आज जो टीवी चैनलों पर ब्रेन लेश डिसकसन चलती है और उसमें शामिल होने वाले अपठित पत्रकार हैं. भारत माता की जय न बोलने वाले पागल हैं, उनके इलाज की जरूरत है. भारत माता की जय न बोलने वाले पागल हैं. ऐसे लोगों की हत्या नहीं, इलाज होनी चाहिए. इनके पास दिल है, लेकिन दिल की आवाज दिमाग तक नहीं पहुंची है. इसलिए इलाज जरूरी है. हम अशफाकउल्‍ला खां जैसे लोगों को आदर्श मानते हैं… अशफाकउल्ला भारत माता के लिए फांसी पर चढ़ गए.  हम उन्‍हें आदर्श मानते हैं. इन पागलों को आदर्श नहीं मानते. आवैसी और आजम के नाम पर मैं नहीं जाता हूं, ये एक विचारधारा का प्रतिनिधित्‍व करते हैं. रही बात भारत माता की जय बोलने की तो आप किसी भी भाषा में बोलिए, लेकिन भारत माता की जय बोलिए और बस दिल से बोलिए. मैं ये नहीं कहता हूं भारत माता की जय उर्दू और इंग्‍लिश में नहीं बोलनी चाहिए. आप किसी भी भाषा में बोल सकते हैं. भाषा तो हमारी देश की परंपरा है. महात्‍मा गांधी ने कहा कि था ईश्‍वर अल्‍ला तेरो नाम. भाषा का प्रश्‍न नहीं, भाव का प्रश्‍न है.  दिल से बोलना चाहिए. जो व्‍यक्‍ति भारत माता की जय न बोले उसे प्रेरित करना चाहिए, भारत माता सबकी माता हैं.”

संघ पदाधिकारी राम आशीष मऊ जनपद में आर.एस.एस. द्वारा आयोजित नववर्ष प्रतिप्रदा की पूर्व संध्या पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सोनी धापा बालिका विद्यलय के मैदान में शामिल होने आये थे. इनकी बातों को पूरा सुनने के लिए नीचे दिए गए वीडियो लिंक को एक एक कर क्लिक करते जाएं.

RSS कहिन (1) : आजम खान और ओवैशी जैसे पागलों का इलाज होना चाहिए https://www.youtube.com/watch?v=IGnRK2oJmm0

RSS कहिन (2) : पागलों का इलाज किया जाता है, उनकी हत्या नहीं की जाती https://www.youtube.com/watch?v=rsGZY4pQ8oI

RSS कहिन (3) : उर्दू में बोलिए या अंग्रेजी में, भारत माता की जय तो बोलना पड़ेगा https://www.youtube.com/watch?v=NNj8zTuH6QI

RSS कहिन (4) : टीवी पर ब्रेनलेस डिसकशन, अपठित पत्रकारों को ज्ञान नहीं https://www.youtube.com/watch?v=hu7heuyTwVI

मऊ से DEEPAK GUPTA की रिपोर्ट. संपर्क : 9452068289 या gdeepak899@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भिंडरावाले और गोडसे के कितने पूजने वालों को देशद्रोह में जेल भेजा!

जेएनयू प्रकरण पर कुछ सवाल हैं जो मुंह बाए जवाब मांग रहे हैं। मालूम है कि जिम्मेदार लोग जवाब नहीं देंगे, फिर भी। लेकिन उससे पहले नोट कर लें-

1. देश को बर्बाद करने की कोई भी आवाज़, कोई नारा मंजूर नहीं। जो भी गुनाहगार हो कानून उसे माकूल सजा देगा।
2. कोई माई का लाल या कोई सिरफिरा संगठन न देश के टुकड़े कर सकता है न बर्बाद कर सकता है। जो ऐसी बात भी करेगा वो यकीनन “देशद्रोही” है।
3. किसी नामाकूल से या देशभक्ति के किसी ठेकेदार से कोई सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।
4. कोई भी किसी भी मुद्दे पर असहमत है तो ये उसका हक़ है। हां कोई भी। कोई माई का लाल असहमति को “देशद्रोह” कहता है तो ये उसकी समझ है।

आइये अब जेएनयू पर बात कर ली जाये। आज़ाद भारत के इतिहास में आधी रोटी पर दाल लेकर दौड़ पड़ने का ये सबसे जीवंत नज़ारा है। उस पर भी दाल में उन्माद का तड़का लग गया है।

1. जेएनयू में एक संगठन ने एक सभा की जिसका वीडियो एक चैनल के पास आया। हंगामाखेज नारेबाजी में पाकिस्तान ज़िंदाबाद और देश की बर्बादी के सुर सुनाई दे रहे हैं।
2. हल्ला मचा और मचना ही चाहिए।उन्माद के ताप में जलती भीड़ ने पूरे जेएनयू को देशद्रोही बता कर हांका लगाना शुरू कर दिया।
3. दूसरे दिन एक और वीडियो आया जिसमें दूसरा पक्ष पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा रहा है। अगर पहले वीडियो पर इतना भरोसा है तो इस पर भी कर लीजिये।
4. जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज़ हो जाता है जो कि न आयोजक था न भारत विरोधी नारे लगा रहा था।उसका बाद का भाषण कल से अनकट चल रहा है चैनलों पर सुन लीजिये क्या कह रहा है।
5. जिसने भी भारत की बर्बादी के नारे लगाये उसे पकड़ कर मुकदमा चलाइये लेकिन चार, चालीस या चार सौ के किये के लिए पूरी यूनिवर्सिटी को देशद्रोह का अड्डा किस आधार पर कहा जा सकता है?
6. झूठ का सहारा लेकर आग में घी के लिए हाफिज सईद के फ़र्ज़ी ट्विटर से ट्वीट करवा दिया। हद ये है कि दिल्ली पुलिस ने फ़ौरन आगाह कर दिया कि ये ट्वीट फ़र्ज़ी है। देश भर को अलर्ट भी किया।
7. गृह मंत्री शायद इसी फ़र्ज़ी ट्वीट पर भरोसा कर जेएनयू के पीछे हाफिज का हाथ बता रहे हैं। क्या विडम्बना है।

अब ज़रा कुछ और सवाल-

a) देशभक्ति के रंग में ऊभ-चूभ हो रही पार्टी अभी कल तक इस पीडीपी के साथ कश्मीर में सत्ता में थी जो ऐलानिया अफज़ल की आरती उतारती है। महबूब मुफ़्ती और उनके साथ पूरे कश्मीरी अवाम को भी देशद्रोह के मुक़दमे में बंद कब करेंगे? वहां आये दिन पाकिस्तान का झंडा कुछ ज्यादा ही फहरा रहा है। लेकिन फिर भी हर कश्मीरी देशद्रोही नहीं है न, कहा जाना चाहिए।

b) एक मोहतरमा हैं आसिया अंद्राबी। कश्मीर में दुख्तराने- मिल्लत की मुखिया। अभी बीते साल आसिया ने पाकिस्तान का जश्ने आज़ादी मनाया और मोबाइल से ही पाकिस्तान को तकरीर की। क्या हुआ, क्या कोई मुकदमा दर्ज़ हुआ? आपकी ही सरकार थी वहां और कल अगर महबूब एक जरा सा इशारा कर दें तो आप फिर शपथ लेने को उतावले बैठे हैं। तब भूल जायेंगे ये मोहतरमा भी अफज़ल को शहीद मानतीं हैं?

c) जरनैल सिंह भिंडरावाले का नाम याद है क्या ..! आज़ाद भारत का सबसे खतरनाक विद्रोह करने वाला। सबसे बड़ा देशद्रोही। पता है आपको कि पंजाब में आज भी तमाम लोग उसे पूजते हैं।लोग ही क्यों अब तो पंजाब सरकार ने अपने खजाने से उसके नाम पर स्टेडियम भी बनवा दिया है। तो क्या पूरे पंजाब को देशद्रोही मान लेंगे? कुछ किया क्या? एक भी देशद्रोह का मुकदमा? नहीं ना…। क्योंकि वहां भी आप सरकार में हैं।

d) और वो जो गोडसे की पूजा करते हैं ..! उसकी पिस्तौल की फोटू की आरती उतारते हैं ..! 26 जनवरी को काला दिवस मनाते हैं। कितने लोग जेल भेजे गए बताइये तो…! वो देशद्रोह नहीं है क्या?? आप अफज़ल की फांसी के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हैं उसी सुप्रीम कोर्ट ने गौडसे को फाँसी दी थी तो गौडसे को पूजना देशद्रोह नहीं है..?

अरे भाई ये देशद्रोह का ठप्पा भी आप इतना चीन्ह चीन्ह कर चस्पा करेंगे तो ठीक नहीं है…!

तुरंता न्याय पर आमादा भीड़…

अर्द्ध सत्य की आधी रोटी पर उन्माद की दाल लेकर लपलपाती दौड़ रही भीड़ तुरंता न्याय चाहती है। कोई जाँच नहीं, कोई सुनवाई नहीं ,कोई सबूत गवाही नहीं। बस भीड़ के एक अगुआ ने कह दिया है कि नारे लगाने वालों की जीभ काट ली जाये तो दूसरे ने फ़तवा जारी कर दिया है कि गोली मार दी जाये। बस..! एक बार फिर साफ़ कर दिया जाये कि देश की कीमत पर कोई नारा मंज़ूर नहीं है लेकिन झूठ और फरेब से गढ़े जा रहे किसी भी ज़हरीले जाल में फंस कर उन्मादी होना भी गलत ही है। कोई भी ये न भूले कि तुरंता न्याय करने को बौरा रही भीड़  किसी अफवाह से हरहरा कर जिस दिन आपकी घर की सांकल बजाएगी तब आपकी गुहार सुनने वाला कोई नहीं होगा।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया न्यूज पोर्टल के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इतने खराब अनुभव के साथ पांचजन्य से विदा लूंगी, कभी सोचा न था : अनुपमा श्रीवास्तव

Anupama Shrivastava : मैंने 1992 में पांचजन्य में अपनी सेवा आरंभ की थी। उन दिनों तरुण विजय जी संपादक हुआ करते थे। तब पांचजन्य का इतिहास पढ़ते हुए बड़ा गर्व महसूस होता था कि अटल जी, भानु प्रताप शुक्ल जी, यादव राव जी, देवेन्द्र स्वरुप जी और न जाने कितनी महान हस्तियों ने संपादक बनकर कर यहां काम किया। यहां काम करते हुए हमें लगता था कि हम भी एक मिशन में संघ कार्य कर रहे हैं। कभी लगा ही नहीं कि हम नौकरी कर रहे हैं। एक परिवार के नाते लड़ते झगड़ते 23 साल इस संस्थान में बिता दिए। लेकिन कभी सोचा नहीं था कि इतने ख़राब अनुभव के साथ पांचजन्य से विदा लूंगी। एक ऐसे संपादक के साथ 3 साल काम किया जिसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मुझे बुलाता और नमस्ते करता और कहता कि कल से आपकी सेवा समाप्त। कम से कम गर्व तो होता कि हितेश जी ने संपादक पद की गरिमा रखी। लेकिन अफ़सोस, पाञ्चजन्य का संपादक अब प्रबंधन का कर्मचारी बन गया है।

संस्थान में 22 साल से और अपने निजी सहायक के तौर पर 3 साल से कार्यरत एक सहकर्मी को सम्मान के साथ विदा करने का नैतिक बल जिस प्रबंधन और सम्पादक में नहीं, वे ख़ुद देश के सबसे बड़े वैचारिक पत्र का संचालन कर रहे हैं। मेरे अलावा 5 अन्य को भी ऐसी ही कायरता दिखाकर एक एक कर निकाला गया। उनके भी छोटे छोटे बच्चे हैं। पर हम सबसे खुद को एक परिवार कहने वाले संगठन का कोई एक अधिकारी तक भी सांत्वना देने के लिए एक शब्द नहीं बोल रहा। इसे कहते हैं अनुशासन। पाञ्चजन्य में प्रबंधन मतलब विजय कुमार क्षेत्रीय सह कार्यवाह और जितेंद्र मेहता जो अपनी व्यक्तिगत एजेंडा चला रहे है। एक संस्कार भारती चला रहे हैं और एक संघ चला रहे हैं। विजय कुमार तो खुले आम कर्मचारियों को निकाल कर ही दम लेंगे भले ही भारत प्रकाशन बंद करना पड़े। समय समय पर हमारी कम्बल परेड कराने की धमकी देते थे। कहते थे संघ तुम्हारा नहीं संघ मेरा है। 2012 में हमारी वार्षिक वृद्धि मात्र 120 रुपये तक रोक दी। जब हमने लेबर कमिश्नर से शिकायत की तो इनको मुंहकी खानी पड़ी।

कहां है मजदूर संघ?

गजब का दुस्साहस भरा हुआ है पांचजन्य-आर्गेनाइजर के प्रबंधन तंत्र में। स्थायी कमर्चारियों को लगातार निकाले जाने के बाद आज भी प्रबंध निदेशक मोहारिया धमकाते घूम रहे हैं कि स्थायी नौकरी छोड़कर ठेके के मजदूर बन जाओ वरना..। मोहारिया तो चलो संघ के क्षेत्र कार्यवाह विजय कुमार के मोहरे भर हैं। पर यह सब जानकर भी उसी गली में स्थित भारतीय मजदूर संघ के केन्द्रीय कार्यालय रामनरेश भवन में मौजूद पदाधिकारियों की चुप्पी आश्चर्य पैदा करती है। याद आते हैं दत्तोपंत ठेंगडी, जो सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ सार्वजनिक विरोध प्रकट करते थे। उनके द्वारा स्थापित भारतीय मजदूर संघ ठेकेदारी प्रथा का विरोध करता है। पर संघ के मुखपत्र में ही ठेकेदारी प्रथा को लागू करने पर मौन स्वीकृति प्रदान कर रहा है। शायद पूरे संगठन को भगवा प्रणाम की जगह लाल सलाम की गूंज सुनने का इंतजार है।

पांचजन्य में कार्यरत रहीं अनुपमा श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कभी सोचा नहीं था कि पांचजन्य हम लोगों के साथ अमानवीयता के इस स्तर पर उतर आएगा

Anil Kumar Choudhary : कभी सोचा ही नहीं था कि अपना ही संगठन हम लोगों के साथ अमानवीयता के इस स्तर तक उतर आएगा. 22 वर्ष पांचजन्य में आए हो गए. बुरे से बुरे दिनों में साथ निभाया. आज कंपनी के अच्छे दिन आ गए तो सभी पुराने साथी को एक एक कर निकाला जा रहा है. पिछले महीने जब चार पांच साथी को जबरन निकाल दिया गया तब सभी मित्र चिंतित हो गए.

जब हम सभी को कोई रास्ता न सूझा तो न्याय की आखरी उम्मीद के रूप में संगठन प्रमुख मा. भागवत जी एवं संघ के सभी वरिष्ठ अधिकारी को सभी बातों से अवगत कराते हुए हस्ताक्षर युक्त पत्र भेजा गया. न्याय की गुहार का असर अभी तक तो हुआ नहीं, हां, उल्टे 15 दिसम्बर को प्रबंध निदेशक एवं महाप्रबंधक ने अपने कक्ष में बुलाकर कहा कि किसी को पत्र भेजने का कोई फायदा नहीं, इस रिजायन पत्र पर अभी यहीं हस्ताक्षर करो.

मैं हैरान परेशां अनुरोध करता रहा कि साहब 52 वर्ष की उम्र में अब कौन नौकरी देगा. लेकिन मेरी एक न चली. कहा गया कि इस पत्र पर हस्ताक्षर करना ही पड़ेगा नहीं तो हम तुम्हें भी औरों की तरह टर्मिनेट कर देंगे. मैंने हस्ताक्षर नहीं किया और अगले दिन मुझे टर्मीनेट कर दिया गया. मैं तो चौराहे पर आ गया. क्या करूँ? कहाँ जाऊं? सामने परिवार का दायित्व और दूसरी तरफ संगठन का ऐसा व्यहार!

पांचजन्य में कार्यरत रहे अनिल कुमार चौधरी के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदीजी, नागपुर में बैठे पेशवा लोग बहुत डेंजरस हैं, उन्होंने चुनाव न जिता पाने पर आडवाणी जी को नहीं छोड़ा

Dilip C Mandal :  नरेंद्र मोदी साहेब, ये यूपी है यूपी. उत्तर के पेरियार ललई सिंह यादव की मिट्टी है. मान्यवर कांशीराम की प्रमुख कर्मभूमि. महामना रामस्वरूप वर्मा और चौधरी चरण सिंह का सूबा. वैसे तो यह कबीर और रैदास की भी जन्मभूमि है. इधर 2017 में भी आपके लिए ठीक नहीं है. यहां का मूड आज आप देख ही चुके हैं. वैसे, मुझे नहीं मालूम कि यूपी से पहले के जब आप सारे विधानसभा चुनाव हार चुके होंगे, तो RSS केंद्र में नेतृत्व परिवर्तन कर चुका होगा या नहीं. नागपुर में बैठे पेशवा लोग बहुत डेंजरस हैं. उन्होंने चुनाव न जिता पाने पर आडवाणी जी को नहीं छोड़ा, तो आप क्या चीज हैं.

मनुस्मृति ईरानी ने मूर्खतापूर्ण तरीके से जब देश भर के हजारों छात्रों की फेलोशिप रोकी थी, तभी नरेंद्र मोदी को उनसे छुटकारा पा लेना था. इसकी वजह से देश भर के हर जाति, धर्म, बिरादरी के छात्र मनुस्मृति ईरानी से खफा बैठे थे. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या ने एक चिंगारी लगा दी. वैसे भी यह इंसानियत का मामला था. एक चिंगारी पूरे जंगल में आग लगा सकती है. इससे पहले ईरानी अंबेडकर – पेरियार स्टडी सर्किल पर रोक लगाकर बदनाम हो चुकी थीं. छात्र तमाम तरह से नाराज थे. IIT रुड़की में बहुजन छात्रों को निकाले जाने का कांड हो चुका था. रोहित की हत्या के बाद देश भर के कैंपस उबल पड़े. आज यह नौबत आ गई कि मोदी सड़कों पर काला झंडा देख रहे हैं. मुर्दाबाद के नारे सुन रहे हैं…. महंगा पड़ेगा.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बीजेपी महासचिव राम माधव ने मोदी की लाहौर यात्रा पर संघी गोबर डाल दिया

Mahendra Mishra : भारत, पाक और बांग्लादेश एक ही जिगर के टुकड़े हैं। क्रूर हालात ने इन तीनों को एक दूसरे से अलग कर दिया। इनके बीच दोस्ती और मेल-मिलाप हो। एकता और भाईचारा का माहौल बने। अमन और शांति में विश्वास करने वाले किसी शख्स की इससे बड़ी चाहत और क्या हो सकती है । इस दिशा में किसी पहल का स्वागत करने वालों में हम जैसे लाखों लोगों समेत व्यापक जनता सरहद के दोनों तरफ मौजूद है। इसी जज्बे में लोग प्रधानमंत्री मोदी की लाहौर यात्रा का स्वागत भी कर रहे हैं। लेकिन इस यात्रा का क्या यही सच है? शायद नहीं। यह तभी संभव है जब मोदी जी नागपुर को आखिरी प्रणाम कह दें।

अगर कोई आरएसएस को जानता हो। या कि बीजेपी की राजनीति से उसका वास्ता हो। या फिर उसे मोदी की सियासत की परख हो। वह किसी भ्रम में नहीं रह सकता। एक तरफ मंदिर बनाने की तैयारी (सुगबुगाहट ही सही) और दूसरी तरफ पाकिस्तान से दोस्ती की लंबी पारी। दोनों एक साथ नहीं चल सकते। कहते हैं कि विदेश नीति और कुछ नहीं बल्कि घरेलू नीति का ही विस्तार होती है। कम से कम पाकिस्तान के मामले में यह 100 फीसद सच है। दोनों देशों के रिश्ते एक दूसरे की घरेलू राजनीति के साथ मजबूती से जुड़े हैं। विदेश नीति वैसे भी रोज-रोज नहीं बदला करती। यह किसी एक यात्रा या कुछ यात्राओं से तय नहीं होती। यह एक लंबे कूटनीतिक मंथन और रणनीतिक जद्दोजहद का नतीजा होती है। यहां तक कि सरकारें बदल जाती हैं लेकिन विदेश नीति नहीं बदलती। ऐसे में मोदी जी की लाहौर यात्रा का क्या मतलब निकाला जाए। यह एक बड़ा सवाल है। पहली बात तो यह यात्रा भले अचानक हुई है। लेकिन इसके पीछे अपने तरह की एक कूटनीति भी काम कर रही है। जो पूरी सोची और समझी है। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस यात्रा का एक तात्कालिक बड़ा कारण लोगों का ध्यान जेटली प्रकरण से हटाना है।

इस यात्रा को एक दूसरे नजरिये से समझा जाए तो शायद समझना ज्यादा आसान होगा। घरेलू मोर्चे पर जिस तरह से मोदी साहब जनता को कुछ नहीं देना चाहते। बल्कि उल्टा पिछले 65 सालों में जो कुछ मिला था उसे छीना जा रहा है। लेकिन सरकार है कि उसे जनता के लिए कुछ करते दिखना भी चाहिए। इस लाज में मोदी जी ने स्वच्छता अभियान और जनधन योजना जैसे कुछ लॉलीपॉप खोज लिए। लेकिन अब लोग भी नहीं समझ पा रहे हैं कि इस झुनझुने को लेकर वो हंसे कि रोएं। ठीक इसी तर्ज पर मोदी का पाकिस्तान के साथ रिश्ता भी है। जिसमें रिश्ते को ठीक करते हुए दिखना मजबूरी है। इसीलिए इसमें अनौपचारिकताएं ज्यादा हैं योजनाबद्ध काम कम। यात्राएं ज्यादा हैं ठहराव कम। मुलाकातें ज्यादा हैं समस्याओं पर बातें कम। इस तरह के रिश्तों के अपने फायदे हैं। गहरी जड़ न पकड़ने के चलते जब चाहे उन्हें तोड़ा जा सकता है। सचिव स्तर की वार्ता को हुर्रियत नेताओं के पाक उच्चायुक्त से मिलने के चलते रद्द कर दिया गया था।

रिश्ते गहरे हों और आपस में विश्वास हो तो उसके लिए मिलना जरूरी नहीं होता। अगर कोई रिश्ते को गहराई की तरफ नहीं ले जाना चाहता तो उसकी मंशा पर सवाल उठना लाजमी है। पिछले डेढ़ सालों के मोदी शासन का विश्लेषण पाकिस्तान के संदर्भ में करने पर निष्कर्ष उसी तरफ ले जाएगा। इस बीच मोदी और नवाज के बीच तीन मुलाकातें हो चुकी हैं। पहली मोदी जी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान। दूसरी पेरिस में जलवायु सम्मेलन के मौके पर। और अब एक महीने के भीतर यह तीसरी मुलाकात हुई है। लेकिन नतीजा सिफर है। न ही कोई जमीनी तैयारी। न ही कोई भविष्य की रणनीति और सोच। बस ऊपर-ऊपर माहौल। विदेश नीति इतनी लचर रस्सी पर नहीं चलती है। किसी भी रिश्ते की अनिश्चितता उसकी कमजोरी की प्रतीत होती है।

दरअसल मोदी साहब को लंबा रास्ता तय भी नहीं करना है। इसलिए उन्हें किसी जमीन और गहराई की जरूरत भी नहीं है। और आसमानी तौर पर कूद-फांद कर रिश्ते की औपचारिकता पूरी भर कर लेनी है। यह और कुछ नहीं बल्कि मोदी की विदेश नीति का टुटपुजियापन है। क्योंकि जिस पार्टी और सरकार की राजनीति मुस्लिम और पाकिस्तान विरोध पर टिकी हो। उससे किसी लंबे समय के लिए पाकिस्तान के साथ दोस्ती की आशा करना महज एक ख्वाब ही हो सकता है। या तो आरएसएस के अस्तित्व को खत्म मान लिया जाए। या फिर बीजेपी की राजनीति बदल गई है। शायद ही कोई राजनीतिक विश्लेषक अभी इस नतीजे पर पहुंचा हो।

रिश्तों का बीज अभी पड़ा भी नहीं कि संघी फावड़ा सक्रिय हो गया। अनायास नहीं बीजेपी महासचिव और संघ के प्रिय राम माधव ने लाहौर यात्रा पर संघी गोबर डाल दिया। उन्होंने भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की एकता का पुराना राग अलापा है जिसमें भगवा ध्वज के नीचे अखंड भारत के निर्माण की बात शामिल है। अब अगर नवाज शरीफ चाहें भी तो क्या पाकिस्तान की जनता और विपक्ष उनको आगे बढ़ने देगा? ऊपर से अलजजीरा चैनल के साथ बहस में उन्होंने एंकर को आईएसआईएस का एजेंट तक करार दे दिया। सत्ताधारी पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता से क्या ऐसी उम्मीद की जा सकती है? अगर यह मोदी जी की विदेश यात्राओं के सूत्रधार का पाकिस्तान को लेकर रवैया है। तो ऐसे में यह डगर कितनी आगे बढ़ेगी अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। नहीं तो भारत-पाक रिश्ते में विदेश मंत्रालय, सुषमा स्वराज और सरकार के किसी व्यक्ति से ज्यादा राम माधव क्यों रुचि ले रहे हैं। या फिर मोदी साहब उनसे इसके लिए मांफी मांगने के लिए कहेंगे?

खुदा ना खाश्ता रिश्तों की डोर किन्हीं परिस्थितियों में टूटी तो कहने के लिए मोदी साहब और उनके समर्थकों के पास अब बहुत कुछ रहेगा। मसलन उन्होंने रिश्तों को बढ़ाने का बहुत प्रयास किया। लेकिन पाकिस्तान नहीं सुधर सकता। उसे डंडे की ही भाषा समझ में आती है। अब क्या चाहते हैं कि मोदी जी जाकर नवाज शरीफ का तलवा चाटें आदि..आदि। इसके साथ ही पाकिस्तान से दोस्ती की हिमायत करने वालों के भी मुंह बंद कर दिए जाएंगे।

लेखक महेंद्र मिश्रा सोशल एक्टिविस्ट और प्रखर जर्नलिस्ट हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. महेंद्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़े लिखे हैं और कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

संघ ने बिहार हार का ठीकरा मीडिया पर फोड़ा, पढ़ें क्या छपा है ‘पांचजन्य’ में

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस यानि संघ के मुखपत्र ‘पांचजन्य’ के एक आलेख में मीडिया पर पूर्वाग्रह का आरोप लगाया गया है. आरएसएस समर्थित जर्नल में बुद्धिजीवियों द्वारा अवार्ड वापसी की घटनाओं और केरल हाउस गोमांस मामले को मीडिया द्वारा अधिक उछाले जाने का आरोप लगाया गया है. इसमें दावा किया गया है, ‘इन दिनों टीवी देखने वालों को ऐसा लगता होगा कि देश खतरे में है, सामाजिक सहिष्णुता घट रही है, गृह युद्ध जैसी स्थिति है, ऐसा कि जैसा चारों ओर रक्तपात हुआ हो.’ पांचजन्य के इस लेख में कहा गया है – ‘बिहार चुनाव के समय बनाया गया यह कृत्रिम माहौल टीवी देखने वाले किसी भी व्यक्ति को भयभीत कर देगा.’

पांचजन्य में छपा पूरा लेख हूबहू पढ़िए…

मीडिया की ‘असहिष्णुता’

त्योहारों का मौसम है। आम तौर पर यह वक्त खुशियों का होता है। लेकिन अगर आप कोई न्यूज चैनल देखने बैठ जाएं तो घबरा जाएंगे। टीवी के आगे ऐसा लग रहा है मानो देश पर कोई विपत्ति टूट पड़ी हो। समाज में अचानक सहिष्णुता कम हो गई है। हर जगह मार-काट मची हुई है। देश में गृहयुद्घ जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है। बीते बिहार चुनाव से पहले देश में जो माहौल बनाया गया है उसे देखकर किसी को भी ऐसा लग सकता है।

एनडीटीवी इंडिया ने ‘कलाकार से इतिहासकार तक बागी’ नाम से बहस में बताया कि कैसे यह ‘बगावत’ सभी क्षेत्रों में फैल चुकी है। इस बहस में रा. स्व. संघ का पक्ष रख रहे राकेश सिन्हा के तर्कों के आगे एंकर बार-बार तिलमिला जाता है। वह एक वामपंथी पत्रकार और पुरस्कार लौटाने वाला एक वैज्ञानिक, सभी एक ही पक्ष की दलीलें देते हैं। आम तौर पर ऐसी स्थिति में पत्रकार की भूमिका तटस्थ की होनी चाहिए, लेकिन एंकर का सारा जोर ऊंची आवाज में यह दोहराने पर है कि देश में माहौल ठीक नहीं है, लोगों की बोलने की आजादी छीनी जा रही है और विरोध करने वालों की हत्या हो रही है। यह वही एंकर है जिसके ‘पारिवारिक हित’ बिहार चुनाव से जुड़े हुए हैं। बेहतर होता कि एक ‘डिस्क्लेमर’ की तरह दर्शक को यह बात बताई जाती।

सहनशीलता को लेकर चल रही ‘राष्टÑीय बहस’ के बीच कुछ अति-सेकुलरवादी पत्रकारों ने हिंदुओं की परंपराओं को अपमानित करना जारी रखा है। बीते हफ्ते करवाचौथ का पर्व मनाया गया। ट्विटर से लेकर अखबारों के स्तंभों तक बाकायदा लेख लिखकर बताया गया कि कैसे करवा चौथ का व्रत दकियानूसी सोच वाला त्यौहार है।

दिल्ली के केरल भवन की कैंटीन में ‘बीफ’ को लेकर एक विवाद हुआ। बुलाने पर वहां पुलिस गई और मामला शांत करवा दिया। लेकिन देश का मीडिया कहां चुप बैठने वाला था। यह ‘अतिसक्रिय’ लेकिन पक्षपाती मीडिया का एक और चेहरा है। शाम होते-होते तमाम अंग्रेजी, हिंदी चैनलों पर बहस हो रही थी कि पुलिस ने शिकायत मिलने पर केरल भवन पहुंचकर कितना बड़ा पाप कर दिया। मीडिया बड़ी ही चालाकी से इस तथ्य को छिपाता रहा कि अगर केरल भवन में कोई गड़बड़ी हो जाती तो क्या पुलिस की जवाबदेही नहीं बनती। केरल भवन दिल्ली पुलिस के ही अधिकार क्षेत्र में आता है, वह किसी दूसरे देश का दूतावास नहीं है।

इसी मुद्दे पर सीएनएन-आईबीएन पर बहस में तटस्थ पक्ष रखने के लिए बुलाई गई महिला पत्रकार अचानक कांग्रेस की प्रवक्ता बन गर्इं। उन्होंने कहा कि ‘देश की जनता को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि उन्होंने भाजपा को वोट देकर कितनी बड़ी भूल की है’। यह हालत है देश के तथाकथित निष्पक्ष मीडिया की। तथ्यों और नियमों की अनदेखी करके अब भारत की जनता को कोसा जा रहा है कि उसने भाजपा को क्यों चुना, कांग्रेस को क्यों नहीं।

उत्तर प्रदेश में कब्र खोदकर एक मृत महिला के शव से दुष्कर्म की खबर आई। एक मनोरोग के कारण होने वाला यह अपराध विदेशों में आम है। वैसे तो यह मामला यूपी पुलिस का है, लेकिन इंडिया टुडे टीवी की एक पत्रकार ने मामले को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से जोड़ दिया। उस पत्रकार ने ट्वीट करके इस घटना के लिए भी मोदी सरकार को दोषी ठहरा दिया।

मीडिया और कुछ खास तरह के पत्रकार ऐसी पक्षपाती बातें भूलवश कर रहे हों, ऐसा कतई नहीं लगता। मशहूर शायर मुनव्वर राना के पुरस्कार लौटाने पर खुशी से फूले न समा रहे तथाकथित प्रगतिशीलों ने अब उनको गालियां देनी शुरू कर दी हैं। नाराजगी इस बात से है कि वे प्रधानमंत्री मोदी के बुलावे पर उनसे मिलने को क्यों तैयार हो गए। मुनव्वर राणा को ‘बिका हुआ’ और ‘दलाल’ साबित किया जा रहा है। इस असहिष्णुता पर प्रगतिशील मीडिया मौन है।

सरकार को लेकर वैज्ञानिक पुष्प मित्र भार्गव की टिप्पणियों को सभी चैनलों ने दिखाया, लेकिन उसी समय दूसरा पक्ष रख रहे देश के सबसे बड़े अंतरिक्ष वैज्ञानिक जी. माधवन नायर की बात अनसुनी कर दी गई।

फिलहाल निर्माता-निर्देशक का चेहरा सामने आ जाने के बाद भी पुरस्कार वापसी का नाटक जारी है। हर दिन एक कलाकार अवार्ड वापस करता है और मीडिया ताली बजाता है। मुनव्वर राणा के मामले में मुंह की खाने के बाद अब गुलजार और दूसरे कई फिल्मवालों को आगे किया गया। लगभग सभी चैनलों ने इसे खूब दिखाया। बस किसी ने यह नहीं बताया कि गुलजार मोदी के खिलाफ प्रचार करने बनारस भी गए थे। अब जब बिहार चुनाव अहम दौर में है, उनका पटना जाना क्या कुछ संदेह पैदा नहीं करता? दर्शकों को यह जानने का हक नहीं है कि उनका पसंदीदा गीतकार एक राजनीतिक निष्ठा भी रखता है। जिस दिन गुलजार मोदी सरकार को कोस रहे थे और बिहार में भ्रष्टाचारी गठबंधन को वोट देने की अपील कर रहे थे, उसी दिन दिल्ली में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिए गए। देश और दुनिया में धाक रखने वाले इन कलाकारों ने शाम को प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की। सभी कलाकारों का कहना था कि देश में डर या बंदिश का कोई माहौल नहीं है। मुख्यधारा मीडिया को इससे शायद मिर्ची लग गई और सबने इस खबर को सिरे से नजरअंदाज कर दिया।

पुरस्कार वापसी की इसी होड़ में नए-नवेले फिल्म निर्देशक दिबाकर बनर्जी ने तो वह राष्ट्रीय पुरस्कार वापस कर दिया, जो उन्हें कभी मिला ही नहीं। पुरस्कार वापस करने के उनके ऐलान को मीडिया ने खूब जगह दी। लेकिन बाद में जब फिल्म ‘खोसला का घोसला’ की निर्माता सविता राज हीरेमत ने सामने आकर सच्चाई खोल दी तो मीडिया ने चुप्पी साध ली। हालांकि सोशल मीडिया लगातार ऐसी ‘जालसाजियों’ की पोल खोलने में जुटा हुआ है।

समाचार चैनलों पर बयानों को बदलने और उन्हें दूसरा रंग देने का खेल जारी है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने टीवी टुडे से इंटरव्यू में कहा कि ‘हर मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री से जवाब मांगने की परंपरा गलत है। उनके बाद मैं हूं। करना है तो पहले मुझे टारगेट करें।‘ इस बात को समूह के दोनों बड़े चैनलों ने इस तरह दिखाया- ‘राजनाथ सिंह ने कहा है कि प्रधानमंत्री के बाद मैं नंबर-2 हूं।‘

भारत के बारे में आर्थिक संस्था मूडीज की रिपोर्ट को खूब दिखाया गया, क्योंकि इसमें भारत में ‘धार्मिक सहिष्णुता’ पर टीका-टिप्पणी की गई थी। सोशल मीडिया ने इस रपट का सच सामने ला दिया कि कैसे यह रपट एक प्रशिक्षु स्तर के व्यक्ति ने बनाई है और रपट में उसके अपने पूर्वाग्रह झलक रहे हैं। ऐसे समाचारों में देश का मुख्यधारा मीडिया अपनी अपरिपक्वता जता देता है, जबकि सोशल मीडिया सच्चाई के ज्यादा करीब दिखाई देता है।

उधर, फरीदाबाद में वंचित परिवार के घर में आग की फोरेंसिक रपट सामने आई है। इससे इशारा मिलता है कि शायद आग बाहर से नहीं, बल्कि घर के अंदर से ही लगी है। सीधे हरियाणा की भाजपा सरकार को दोषी ठहराने वाले मीडिया ने इस समाचार पर चुप्पी साध ली। इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर को किसी ने ज्यादा महत्व नहीं दिया। अगर यह रपट साबित हो गई तो क्या इस बेहद

कुछ अंग्रेजी अखबार और एबीपी न्यूज छोटा राजन को ‘हिंदू डॉन’ लिख रहे हैं। इनके संपादक फेसबुक पर दलीलें दे रहे हैं कि छोटा राजन को हिंदू डॉन लिखने में क्यों कुछ भी गलत नहीं है। ये वही लोग हैं जिन्होंने ‘हिंदू आतंकवाद’ की कहानी गढ़ी थी। अगर इनकी दलील से ही चलें तो क्या दाऊद इब्राहिम को ‘मुसलमान डॉन’ और कश्मीर में दहशत फैला रहे भाड़े के लोगों को ‘मुसलमान डॉन ही   कहा जाय? बिहार चुनाव की कवरेज में मुख्यधारा मीडिया और इसके कुछ संपादकों ने खुलकर अपनी लाइन ले रखी है। प्रधानमंत्री मोदी ने जब संसद में दिए एक भाषण के हवाले से बताया कि कैसे वंचितों, पिछड़ी जातियों के आरक्षण में बंटवारा करने का नीतीश कुमार ने सुझाव दिया था, तो इसे पंथ के आधार पर ध्रुवीकरण बताया गया। लेकिन जब लालू यादव ने कहा कि चुनाव ‘बैकवर्ड और फारवर्ड की लड़ाई’ है तो एक जाने-माने पक्षपाती संपादक ने इसे ‘लालू का मास्टरस्ट्रोक’ करार दिया। जब अपने चैनल पर यह बात कहने से पेट नहीं भरा तो हिंदुस्तान टाइम्स में संपादकीय लिखकर यह बात लिखी।

बिहार चुनाव पर मीडिया में एक और खेल भी चल रहा है। 31 अक्तूबर को राजस्थान पत्रिका ने समाचार छापा कि ‘आईबी की मानें तो राजग को बस 75 सीट’। इस अखबार के संपादक से कौन पूछेगा कि क्या आईबी चुनाव सर्वे करने वाली संस्था है? क्या उन्हें आईबी के काम करने के तरीके के बारे में कुछ पता भी है? झूठ फैलाने के लिए एक जिम्मेदार संस्था के नाम का इस्तेमाल कहां तक सही है? इस खबर को सुनियोजित ढंग से सोशल मीडिया पर फैलाया गया। फैलाने वालों में कई ऐसे संपादक भी थे, जो अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर दुबले हुए जा रहे हैं।

एक तांत्रिक के साथ नीतीश कुमार का वीडियो सामने आने के बाद समाचार चैनलों को भी अंधविश्वास फैलाने वाले प्रोग्राम दिखाने का मौका मिल गया। आजतक ने भूतों के अस्तित्व पर अपनी ‘विशेष पड़ताल’ की। बाकी चैनलों ने भी इसी बहाने टीआरपी के परनाले में डुबकी लगाने का मौका नहीं छोड़ा। किसी खबर का समाज पर क्या फर्क पड़ता है, इसकी चिंता न्यूज चैनलों को वैसे भी कभी नहीं रही है। मोहर्रम के मौके पर यूपी के कई शहरों में दंगों की घटनाएं हुईं। इन सभी में राज्य सरकार के प्रश्रय में पल रहे मुस्लमान बलवाइयों का हाथ था। कुछ में राज्य सरकार के मंत्रियों के भी नाम हैं। लगभग सभी चैनलों और अखबारों ने इन दंगों की खबर नहीं दिखाई। यह अच्छी बात है कि दंगों और हिंसा की खबरों को दिखाने से बचना चाहिए, लेकिन सोचिए अगर यूपी में भाजपा की सरकार होती तो भी क्या ऐसा ही होता।

उधर, एनडीटीवी कांग्रेस के आधिकारिक चैनल की भूमिका बखूबी निभा रहा है। संजीव भट्ट को सर्वोच्च न्यायालय की फटकार लगी, कथित ताबूत घोटाले के आरोपों की पोल खुली, नेशनल हेराल्ड घोटाले में गांधी परिवार पर शिकंजा कसा, लेकिन ये और ऐसी तमाम खबरें एनडीटीवी पर पूरी तरह गायब रहीं। वैसे भी चैनल के संवाददाता इन दिनों बिहार में घूम-घूमकर वहां पर नीतीश कुमार के ‘अदृश्य विकास’ की गाथा सुनाने में जुटे हैं। अच्छी बात है कि दर्शक अब ऐसी धांधलियों को समझने लगे हैं और इन पर अपनी नाराजगी सोशल मीडिया पर दर्ज कराना नहीं भूलते। नारद

(साभार- पांचजन्य)

अगली स्लाइड में पढ़ें ‘मोहन भागवत बोले- बीजेपी को कम्‍युनल कैंपेन की पालिसी बदलनी होगी’>

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एबीपी न्यूज़ पर संबित पात्रा के साथ राकेश सिन्हा ने तो मुनव्वर राना और अतुल अंजान को लगभग नोंच डाला था!

Sheetal P Singh : प्रो. राकेश सिन्हा ने आज RSS के ९० साल के होने और उसके राजनीतिक मंच के दिल्ली के तख़्त पर आसीत रहने के दिन गर्वोक्ति ज़ाहिर की है कि अब उनकी विचारधारा ही चलेगी और दिनोंदिन और बढ़ेगी, दुनिया इसे मान रही है, विश्व गुरू, आदि अनादि! टीवी की संध्या बहसों में वे पिछले कुछ वर्षों में संघ के विचारक के तौर पर स्थापित हैं, वामपंथ सेक्युलरिज़्म और भौतिकवाद को गया गुज़रा, इतिहास के “कूरेदान” में पड़ा मान कर ख़ारिज कर दिया करते हैं! हाल ही में एबीपी न्यूज़ पर मुनव्वर राना और अतुल कुमार अंजान को तो संबित पात्रा के साथ उन्होंने लगभग नोंच डाला था, कई बार लगा हाथापाई अब हुई तब हुई।

इनकी विचारधारा है क्या ? देश की करीब ८०% आबादी हिन्दू है और बाकी में सभी क़िस्म के अल्पसंख्यक। इन ८०% को २०% के संभावित ख़तरे और अतीत के कुछ वास्तविक और कुछ कृत्रिम मामलों के बदले के लिये भड़काकर सत्ता हथियाना! इसमें ऐसा विशेष क्या है जिससे कोई गौरवान्वित हो? दुर्योग से हिन्दू समाज की संरचना ने इनको विरासत से जाति के नाम पर इकट्ठा संगठन दे दिया जिसमें इन्होंने समर्थ घोड़ों पर सवारी गाँठ ली और स्वयं को विजयी घोषित कर लिया!

महाशय इस महादेश में कमज़ोर को सामर्थ्य देने का काम एक महती काम रहा है न कि ताक़तवर को और ताक़तवर बनाने के लिये शिलाजीत बेचना, जो कोई भी कर सकता है मसलन शिव सेना जैसे हिंसा और भयभीत करने वाले दल भी क्षेत्र विशेष में राजनैतिक रूप से सफल होते रहते हैं। तमाम अपराधी भी अपने प्रभाव क्षेत्रों में दशकों राजनैतिक मुखिया बने रहते हैं! कठिन काम गांधी जी ने किया आंबेडकर जी ने किया लोहिया जी ने किया कांशीराम जी ने किया वामपंथ ने किया, वे निर्बल की आवाज़ बने और सबल का सामना किया।

आप की सत्ता और कांग्रेस की सत्ता में फ़रक करना मुश्किल है सिवाय इसके कि जितनी मंहगाई वे दस साल में बढाते हैं उतनी आप एक साल में। वे मुसलमानों को लालीपाप दिखाते हैं आप बहुमत हिन्दुओं को। वे मीडिया में ३०% क़ब्ज़ा करते हैं आप १००%। उनके ज़माने में भी ब्राह्मणों के बहुमत नेतृत्व में नौकरशाही दिल्ली की सरकार पर क़ाबिज़ रहती है आपके भी! वे आलोचना होने पर थोड़ा बहुत शर्माते भी हैं आप तो ढीठ हैं आलोचक पर ही सवार हो जाते हैं! बारडर पर वे भी सैनिक मरवाते हैं आप भी, कुछ ज़्यादा ही!

एक काम उनसे ज़्यादा करते हैं कि समाज में अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ज़्यादा बढ़ा देते हैं जो मंहगाई बेकारी लूट पर बढ़ते असंतोष पर परदे के काम आ जाता है, बाकी त जो है सो हइयै है। दलित और पददलित किये जाते हैं पिछरे और पछारे जाते हैं। गाय गंगा गीता का गीत नेपथ्य में बजता रहता है और कभी कभी भाल्यूम बढ़ा दिया जाता है! हाँ आप टीवी पर उनसे कहीं ज़्यादा चिल्लाते हैं! और आपके पीएम उनके पीएम से सौ गुना ज़्यादा बार कपरा बदलते हैं! बाकी आप बोलते ही हैं लिखते तो कुछ हैं नहीं सिवाय प पू गोलवलकर पर किताब के तो आपको पकरा तो जा नहीं सकता?

जियत रहा बाबू रकेस सिन्हा
वन्दे मातरम

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मीडिया भी उसकी अंगुलियों पर नाच रहा

यह ‘सुपर पंच’ है! ‘मैं हिंदुओं को मारने आया था… मुझे हिंदुओं को मारने में मजा आता है…!’ तमाम खबरों के माथे पर बैठे इस हेडिंग ने एक झटके में वह काम कर दिया, जो पिछले कई दिनों से लगातार कभी अचानक कलाम की मौत का संयोग तो उसके बरक्स सचेतन कभी याकूब को फांसी, कभी डीएनए तो कभी पोर्न जैसे शिगूफ़ों की कूथम-कुत्था नहीं कर पा रही थी…! अब ललित-गेट क्या था… व्यापमं का व्यापक घोटाला क्या था… जाति जनगणना का सवाल कहां गया… इन सब सवालों को गहरी नींद में सुला दिया जा चुका है…!

मुद्दों के शतरंज पर खेलना है तो आरएसएस-भाजपा के बरक्स जितनी भी ताकतें हैं, उन्हें अभी बहुत सीखना है! आरएसएस-भाजपा अपने विरोधियों को बच्चा समझ कर उनके साथ खेल रही है और उसके विरोधियों के साथ मीडिया भी उसकी अंगुलियों पर नाच रहा है!

कोई उपाय नहीं है। आप कह के देखिए कि इस कथित पकड़े गए आतंकवादी ने जो बयान दिया है, वह शक करने लायक है… वह दोनों में से किसी भी पक्ष की ओर से प्लांटेड हो सकता है…, आपको सीधे-सीधे ‘हिंदू विरोधी’ घोषित किया जाएगा और अगर आप कथित मुख्यधारा की राजनीति से परहेज नहीं करते तो आप अपना मुंह बचाते फिरेंगे। कर लीजिए सामना इस आरोप का कि ‘आप हिंदू विरोधी’ हैं। कोई भी प्रशिक्षित ‘मुसलमान’ आतंकवादी इतना अधकचरा नहीं होगा कि वह पकड़े जाने के बाद यह कहेगा कि ‘मुझे हिंदुओं को मारने में मजा आता है…!’ अगर उसने ऐसा अपनी मर्जी से कहा है तो दो ही बातें होंगी- पहली, कि बेशक उसका दिमाग थोड़ा गड़बड़ होगा! अगर नहीं तो दूसरी कि यह सबूत है कि धार्मिकता के हथियार से किस हद तक दिमाग को नफरत और जहर से भर दिया जा सकता है। 

इस बयान के वीडियो में पीछे की साजिशों को अगर छोड़ भी दें तो राष्ट्रवाद की बेमानी दीवानगी के बरक्स यह धर्म के जहर से तैयार हुआ दिमाग है, जो खुद को गुलाम बनाने वालों के इशारों पर नाचते हुए एक गलीज मौत मरने को तैयार होकर कहता है कि ‘मुझे हिंदुओं को मारने में मजा आता है!’

असल में यह मुद्दों के शतरंज पर उन बाकी तमाम मुद्दों से ध्यान भटकाने की चाल है, जो फिलहाल कामयाब हुई है। अब देखना यह है कि इसका जोर धीमा पड़ते ही अगला कौन-सा मुद्दा हवा में उछाले जाने को तैयार रखा गया है। लेकिन एक बात तय है कि मुद्दों के मैदान में पेवेलियन में बैठा ‘सट्टेबाज’ अपने राज के मुद्दे फेंकता है और मैदान में मौजूद खिलाड़ी उसी मुद्दे को फुटबॉल की तरह खेलने लगते हैं। वह सट्टेबाज बस थोड़े अंतराल पर सीटी बजाता रहता है।

अरविंद शेष के एफबी वाल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आईआईटी पर बरसा आरएसएस का मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइजर’

आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर ने अब आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान को भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी गतिविधियों का केंद्र करार दिया है। कुछ आईआईएम द्वारा सरकार के कदमों के विरोध के पीछे राजनीतिक उद्देश्य होने का जिक्र करते हुए लेख में कहा गया है कि वामदल और कांग्रेस अभी भी प्रतिष्ठित संस्थाओं पर नियंत्रण किये हुए हैं और दोनों दल संचालक मंडल और निदेशकों के जरिये एक संस्थान पर ‘वैचारिक नियंत्रण’ के संचालक (मास्टर) हैं।

मुखपत्र में प्रकाशित लेख में आईआईटी बम्बई के संचालक मंडल के अध्यक्ष और जाने माने परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर और आईआईएम अहमदाबाद के अध्यक्ष ए एम नाइक की विभिन्न मुद्दों पर चुटकी ली गई है।

इसमें हरिद्वार के पवित्र शहर में आईआईटी रूड़की के छात्रों को सामिस भोजन परोसे जाने और राउरकेला में एनआईटी में छात्रों को सामुदायिक हाल में पूजा आयोजित करने से रोके जाने का दावा किया गया है और दोनों संप्रग सरकार के दौरान होने की बात कही गई है। इसमें कहा गया है कि करदाताओं के पैसों से पोषित संस्थान भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी गतिविधियों के स्थान बन गए हैं।

आएसएस के मुखपत्र में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि निम्न मनोबल वाले संकाय के लोग छात्रों को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। ऐसी गतिविधियां या तो संचालक मंडल के संज्ञान में नहीं आती या इन्हें नजरंदाज किया जाता है… संचालक मंडल को इन संस्थाओं में भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

सप्ताहिक में प्रकाशित लेख में काकोदकर पर चुटकी लेते हुए कहा गया है कि वह मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी पर निदेशकों की नियुक्ति को लापरवाही से लेने का आरोप लगाते हैं लेकिन आईआईटी मुम्बई द्वारा शिक्षकों एवं छात्रों के लिए ‘किस ऑफ लव’ मनाने पर एक शब्द भी नहीं कहते।

इसमें शिक्षा क्षेत्र में सरकार से बदलाव लाने का आग्रह किया गया है और इसमें हिन्दुत्ववादी संगठनों की विचारधारा समाहित करने का जिक्र किया गया है।

जनसत्ता से साभार

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘बजरंगी भाईजान’ मोहन भागवत और उनके ”हिंदू राष्‍ट्र” को दिया गया सलमान का रिटर्न गिफ्ट है

Bajrangi Bhaijaan देखे 24 घंटे हो गए। अब इस पर लिखना सेफ रहेगा। दरअसल, कल पहले हाफ के बाद इंटरवल में मेरा सिर दर्द करने लगा था। जब फिल्‍म खत्‍म हुई तो अच्‍छा फील होने लगा। कुल मिलाकर मैं कनफ्यूज़ हो गया कि फिल्‍म ठीक थी या बुरी, अलबत्‍ता एक निष्‍कर्ष तो कल ही निकाल लिया था कि यह फिल्‍म कमाई खूब करेगी। कल से लेकर अब तक दिमाग को फ्रीलांस स्थिति में छोड़ने के बाद मैंने इस फिल्‍म के बारे में कुछ निष्‍कर्ष निकाले हैं जो सामने रख रहा हूं। हो सकता है ईद पर ऐसी बातें शोभा न दें, लेकिन सलमान भाई अगर ईद के नाम पर ही इसे बेच रहे हैं तो इसका पंचनामा भी ईद पर ही किया जाना चाहिए।

1. सलमान खान को हाल में ही जेल की जगह बेल मिली है। वे नरेंद्र मोदी के साथ पतंग भी उड़ा चुके हैं। अब हम सुरक्षित तौर पर कह सकते हैं कि यह फिल्‍म मोहन भागवत और उनके ”हिंदू राष्‍ट्र” को दिया गया सलमान का रिटर्न गिफ्ट है। 

2. व्‍यावसायिक सिनेमा में मेरी स्‍मृति के हिसाब से पहली बार आरएसएस, उसकी शाखा, नमस्‍ते सदा वत्‍सले और मुसलमान-पाकिस्‍तान पर कट्टर हिंदू धारणा को साफ़ शब्‍दों में स्‍थापित किया गया है। इसलिए यह फिल्‍म खुले तौर पर आरएसएस की संस्‍कृति/कार्यशैली को स्‍थापित करती है। 

3. पाकिस्‍तान के लोगों से इसमें ”जय श्रीराम” कहलवाया गया है। याद करें कि गोधरा में ट्रेन के फूंके जाने के पीछे कारसेवा से लौट रहे हिंदुओं का भी कुछ मुसलमानों से यही आग्रह था। इसलिए यह फिल्‍म बाकायदा मार करवा सकती है। सरहद पर बनाए जा रहे माहौल और 1965 की जंग के पचासवें साल के प्रस्‍तावित सरकारी जश्‍न के आलोक में इसे देखें तो बात समझ में आएगी। 

4. फिल्‍म में मुसलमानों के Stereotype को कैसे गढ़ा गया है, उससे कहीं ज्‍यादा खतरनाक हिंदुओं की stereotyping है। मसलन, पाकिस्‍तान में एक मौलवी जब बजरंगी से पूछता है कि आपके यहां अभिवादन कैसे करते हैं, तो बजरंगी कहता है ”जय श्रीराम”। क्‍या वास्‍तव में इस देश के हिंदू नमस्‍ते, नमस्‍कार, राम-राम नहीं बल्कि ”जय श्रीराम” कहते हैं? लिहाजा, यह फिल्‍म औसत लिबरल हिंदू को आरएसएस के और नजदीक लाती है जबकि ”संघी” हिंदुओं के सामने बजरंगी का आदर्श चरित्र गढ़कर उसे थोड़ा लिबरल बनाती है। यानी सब धान बाइस पसेरी! 

5. फिल्‍म में वह मुसलमान अच्‍छा है जो बिना किसी आपत्ति के ”जय श्रीराम” बोल देता है (ओम पुरी)। वह मुसलमान खराब है जो शाहिद अफरीदी के छक्‍का लगाने पर खुश होता है। आरएसएस का भी यही एजेंडा है- भारत में रहना है तो हमारे तरीके से रहो। यानी यह फिल्‍म हिंदू राष्‍ट्र के प्रोजेक्‍ट में मुसलमानों को co-opt किए जाने का खाका बनाती है (अगर उन्‍हें मारा नहीं गया तो)। 

6. लड़की गोरी है, तो ब्राह्मण की बच्‍ची होगी। अगर मांस भी खाती है, तो क्षत्रिय होगी। यहां तक चलेगा। इसके बाद का विकल्‍प हिंदू मानस में कोई नहीं। ऐसे उदाहरणों से वर्ण व्‍यवस्‍था के मिथकों को मजबूत करने वाली यह फिल्‍म हिंदू का अर्थ केवल ”द्विज” के तौर पर स्‍थापित करती है। 

7. फिल्‍म में नायक पाकिस्‍तान में ”घुस” जाता है, लेकिन बार-बार कहता है कि मैं परमीशन लेकर आया। अंत तक उसके ”घुसने” पर कोई सवाल नहीं उठता। यह फिल्‍म पाकिस्‍तान को ”घुस कर मारने” की हिंदू आकांक्षा के लिए सिंकारा टॉनिक है, बिलकुल वैसे ही जैसे इस सरकार ने नगा विद्रोहियों को म्‍यांमार में कथित तौर पर ”घुस कर मारा” था। यह फिल्‍म इसीलिए अगले एक महीने में इस देश के समझदार लोगों को भी युद्ध के लिए तैयार कर पाने में समर्थ है। युद्ध भले न हो, युद्ध का माहौल भाजपा को बिहार में काम आएगा। नायक चूंकि प्रतापगढ़ का है, इसलिए इस फिल्‍म के निशाने से यूपी भी दूर नहीं है।

(बिलकुल ठंडे दिमाग से लिखे गए ये सारे बिंदु बहसतलब हैं)

अभिषेक श्रीवास्तव के एफबी वाल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दुनिया देखी तो समझ में आया, संघ का थॉट पूरा एक गोरखधंधा

मुझे संघ की थॉट प्रोसेस नापसन्द हैं। नापसन्द क्या मुझे वो सिस्टम वाहियात लगता है दरअसल। अब पूछेंगे क्यों? क्योंकि..मैं 10 साल संघ के सरस्वती शिशु मन्दिर से पासआउट हूँ। स्कूल से बाहर निकली और जब थोड़ी दुनिया देखी तो समझ आया कि वो तो पूरा एक गोरखधंधा है। कैसे? स्कूल छोटा था। अगर दोपहर की शिफ्ट के बच्चे जल्दी आ जाते थे तो उन्हें एक ही हॉल में बिठा देते थे। उस दिन हम कई क्लास के बच्चे साथ में बैठे थे। घण्टी बजी। मेरी शिफ्ट का समय हुआ। मैंने बैग लिया और अपनी एक सीनियर दोस्त को बाय कहकर अपनी जगह से उठी। जैसे ही मुड़ी। मुझे एक चांटा पड़ा। वो मेरी वाइस प्रिंसिपल थीं। वो बोलीं ‘अपनी सीनियर को बाय कहते हैं’।

उस वक़्त मैं क्लास 2 में थी। हम संस्कृत की प्राथनाएं और श्लोक रटने को मजबूर थे। हमें हर साल खण्ड खण्ड वाली एक कॉपी मिलती थी जिसमें हमें 1008 बार श्री राम राम लिख कर देना होता था। शहर के जितने भी मन्दिरों में गीता पाठ प्रतियोगिताएँ होती थीं वहां प्रेशराइज़ करके भेजा जाता था। नियम की तरह। जबकि मुझे नहीं याद कि हम स्कूल के बाहर कभी ड्राइंग, साइंस,कंप्यूटर, स्पोर्ट्स के लिए गए हों कहीं। प्रार्थना के बाद सारे टीचर्स के पैर पढ़ना नियम था। जो ऐसा नहीं करना था उसे या तो सजा मिलती थी या बॉयकॉट कर दिया जाता था।

12वीं तक क्लास में एक दूसरे को भैया बहन बोलना जरूरी था। दूसरी चीज़ स्कूल के बाहर भी अगर कोई लड़का लड़की साथ दिख गए तो उसका कुटना तय था। मुझे याद है एक 11वीं का सीनियर अधमरा टाइप तक पिटा था। क्लास में लड़के हमेशा एक तरफ लड़कियां दूसरी तरफ बैठती थीं। राखी में पूरी क्लास की लड़कियों को पूरे क्लास के लड़कों को राखी बंधवाई जाती थी। जो उस दिन स्कूल नहीं आता था या तो पिटता था या अगले दिन राखी बन्धवाता था। सारे त्यौहार मनाये जाते थे। लेकिन जबरन की तरह। गणेश चतुर्थी पर झांकी रखते थे। संक्रांति पर चावल दान करते थे। गुरु पूर्णिमा। ये वो सब। लेकिन और किसी और धर्म का नहीं बस हिन्दू रीती रिवाज़ वाले सब। फिर 5 दिन तक प्रतियोगिताएँ होतीं थीं। 

जैसे

मेंहदी कॉम्पिटिशन

रंगोली कॉम्पिटिशन

गणेश जी बनाओ कॉम्पिटिशन

आलतू कॉम्पिटिशन

फ़ालतू कॉम्पिटिशन

ये तब नहीं समझ आता था। पर अब आता है। लिख रही हूँ तो आ रहा है। वो सब कोई पढ़ाई का हिस्सा नहीं था। न ही उसका कोई मतलब हमारी ग्रोथ से था। वो एक तरह से संघ की विचारधरा को बहोत कट्टर तरह से बनाये और बचाये रखने की तरकीब थी। कहीं ऐसा न हो कि बच्चे ज्यादा पढ़ लिख कर प्रोग्रेसिव हो जाएं और भूल जाएँ कि सुबह उठ कर कराग्रे वस्ते, खाने से पहले भोजन मंत्र, नहाने से पहले नहाना मन्त्र और सोने से पहले और कोई कूड़ा मन्त्र मार कर सोना है।

मेरे स्कूल में 7 कंप्यूटर थे। हमेशा से। जो मेरे लिए उस समय भी बड़ी और सरस्वती में होते हुए हैरत की बात थी। लेकिन 10 सालों में हमने ज्यादातर वक़्त थ्योरी पढ़ी। अरे और तो और c++ तक सिर्फ थ्योरी में पढ़ा। संघ दरअसल आपको प्रोग्रेसिव होने से रोकने के लिए सारे बन्दोबस्त करता है। कंप्यूटर। इंग्लिश। इंटरनेट। स्पोर्ट्स। को एजुकेशन। ( सरस्वती में कोई को एज्युकेशन नहीं होता भैया बहन एज्युकेशन होता है) । स्कूल में हम किसी भी तरह के संगीत का फ़िल्म के बारे में बात नहीं कर सकते थे। मैंने 10 साल सिंगिंग कॉम्पिटिशन में सिर्फ भजन सुने और लगभग 10 साल डांस कॉम्पिटिशन में वन्दे मातरम् पर पर डांस परफॉर्म किया।

मेरे स्कूल में लोअर मिडिल क्लास या उससे भी नीचे के तबके के बच्चे थे। जिनके माँ बाप घरों में सफाई का काम करते थे। लेकिन 10 सालों में मैंने किसी आर्थिक रूप से कमज़ोर, दलित या मुस्लिम बच्चे को स्कॉलरशिप पाते नहीं देखा। स्कूल में अगर शिफ्ट के बाद या पहले अगर किसी भी काम से आना हो तो कैजुअल ड्रेस में नहीं आ सकते। आ भी गए तो लडकियां जीन्स में कतई नहीं। सॉरी लेकिन सबसे बड़े फ़र्ज़ी मेरे प्रिंसिपल थे। पूरे स्कूल पर सबकुछ थोपते थे। उनका बेटा विदेश में था। और जो बेटी स्कूल में मेरी सीनियर थी वो किसी विदेशी से कम नहीं थी। बोले तो.. मस्त रहना। घूमना फिरना। जीन्स। स्कर्ट। बैकलेस(अब) पहनना। उसके लिए कोई नियम नहीं थे। न स्कूल में न व्यक्तिगत जीवन में। हाँ बाकी सब पर था। 

ऐसी बहोत सारी चीज़ें हैं जिन्हें समझाना थोडा मुश्किल है लेकिन संघ का सिस्टम दरअसल एक कन्स्ट्रक्ट तैयार करता है। और उसके कोर्स में बहोत सारा हिंदुत्व है। राष्ट्रभक्ति है। सो कॉल्ड संस्कार हैं। झुकना है। विरोध न करना है। लॉजिकल न होना है। हाथ जोड़कर सिर झुकाए खड़े रहना है। पैर पड़ना है। 8 घण्टे के स्कूल में 2 घण्टे मन्तर मारना है। सोसायटी में जो सब चल रहा है उसे स्वीकार करवाना है। प्रोग्रेसिव न होना है। पुरानी चीज़ों को ढोना है। उन्हें हाँ हूँ करने वाला गधा बनाना है। और वो भी कट्टर गधा बनाना है।  ये जो आप सोचते हैं न कि ये जो ‘भक्त’ हैं ये आते कहाँ से हैं? ऐसे ही मन्दिरों से आते हैं साब। 

(हो सकता है कहीं कोई सरस्वती बड़ी मिसाल बना रहा हो। पर मेरी एज्युकेशन के दस साल में तो संघ का सच यही था।)

शोभा शमी के एफबी वाल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

केजरीवाल सरकार के मीडिया परिपत्र आरएसएस का निशाना

मीडिया के खिलाफ छह मई को जारी किए गए मानहानि संबंधी परिपत्र को तानाशाही वाला करार देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखपत्र आर्गनाइजर में अरविंद केजरीवाल सरकार की आलोचना की गयी है. इसमें कहा गया है कि यह भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने का कथित प्रयास है जो संदेश देता है कि  सिक्के के दोनों पहलू मेरे हैं.

उच्चतम न्यायालय के एक वकील ने ओर्गनाइजर के नवीनतम अंक में ड्रैकोनियन सर्कुलर शीर्षक से लिखे अपने एक आलेख में कहा कि परिपत्र के जरिए केजरीवाल और उनके मंत्रिमंडल ने दिखा दिया कि उन्हें अपने अनुकूल बातें ही प्यारी हैं और इस बात का ख्याल रखे बगैर ही उन्हें सिक्के के दोनों पहलू पसंद हैं कि मीडिया पर हमला अलोकतांत्रिक एवं असंवैधानिक हैं.

आलेख में कहा गया है, मीडिया के विरुद्ध अरविंद केजरीवाल द्वारा जारी परिपत्र भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने का स्पष्ट प्रयास है. वैसे उच्चतम न्यायालय ने इस परिपत्र पर स्थगन लगा दिया लेकिन मीडिया का इस्तेमाल करने और फिर उसे गाली देने के केजरीवाल के इरादे की जांच की जरुरत है.       

आलेख के अनुसार परिपत्र ने मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल एवं दिल्ली सरकार के अन्य अधिकारियों को आवरण प्रदान करने के लिए चौथे स्तंभ पर मानहानिकारक खबरें या कृत्य संबंधी शिकायतें दर्ज कराने की व्यवस्था उपलब्ध करायी है जिससे बहस का एक ज्वलंत एवं सनसनीखेज विषय सामने आ गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नसीबलाल, पेट्रोल मूल्यवृद्धि, विकसवा, काशी, संघ, शक्ति प्रदर्शन और जॉम (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : पिछले दिनों मैं बनारस गया हुआ था तो दिल्ली वापसी के वास्ते ट्रेन पकड़ने के लिए एक मित्र की बाइक पर सवार होकर स्टेशन की तरफ जा रहा था. भेलूपुर और रथयात्रा चौराहे के बीच पहुंचा तो देखा कि अचानक सड़क पर जाम लगने लगा है. थोड़ा आगे बढ़ने पर पता चला कि तंग गलियों-पतली सड़कों के लिए कुख्यात बनारस की इस मुख्य सड़क के दाहिने हिस्से पर संघियों का कब्जा हो चुका था. यूं लंबा रेला था. लाठी कंधे पर रखे संघी कार्यकर्ता पथ संचलन या पद संचलन, जो भी होता हो, कर रहे थे. लंबी लाइन और यूं सड़क कब्जा कर शक्ति प्रदर्शन करते देखकर अचानक मेरे मुंह से निकल गया- वाह… क्या बात है, ग़ज़ब. अगर दिल्ली या किसी शहर में किसान मजूर अपनी बात रखने के लिए प्रदर्शन करने आते हैं और सड़क जाम हो जाता है तो यही संघी कहते फिरते हैं कि ऐसे जनजीवन ठप कर देना ठीक नहीं होता, कितनी परेशानी होती है सबको, कोई बीमार व्यक्ति जाम में फंस जाएगा तो क्या करेगा.. ब्ला ब्ला ब्ला.

यशवंत सिंह

पर जब संघ के भाइसाहब लोगों को ही रोड कब्जाकर शक्ति प्रदर्शन करते देखा तो माथा ठनक गया. पर उपदेश कुशल बहुतेरे. अरे भाई सबको पता है कि देश में आपकी सरकार चल रही है. आपके चहेते मोदी जी प्रधानमंत्री हैं. आप लोग इस समय फुल फार्म में हैं. आप जो चाहें कर करा सकते हैं. आप सरहद से लेकर साइकोलाजी तक को बदल देने पर आमादा हैं. पर यह सब समझाने बताने के लिए आपको पीक आवर में भीड़ भरे सड़क पर पूरी की पूरी आधी सड़क कब्जाने की क्यों जरूरत है. थोड़ा तो खयाल करते हम सैलानियों का जिन्हें ट्रेन बस फ्लाइट पकड़ने के लिए जाना था. मैं बाइक पर था इसलिए जाम के कारण मुझे कोई खास दिक्कत नहीं हुई लेकिन जो दूसरी तरफ के साथी थे, जिस तरफ संघ के लोग लाइन लगाए पैदल मार्च आन किए जा रहे थे, उन्हें काफी भुगतना पड़ा. आप भी देखिए संघी भाइसाहब लोगों का काशी में शक्ति प्रदर्शन का दृश्य. यह वीडियो मैंने बाइक पर पीछे बैठे बैठे ही मोबाइल आन करके बना लिया था. इस लिंक पर क्लिक करें: http://goo.gl/cRQrjX

xxx

नसीबलाल ने 4 ₹ तक पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए। अब भक्तों ये मत कहना कि इंटरनेशनल दाम से तय होते हैं नेशनल प्राइस। जब पेट्रो प्रोडक्ट्स के दाम आधे से कम हुए थे तब नसीबलाल ने दाम कम करने की जगह कई सारे टैक्स लगा कर पेट्रोल का पैसा विकसवा के नाम पर पीने लगे थे। पता नहीं वो टैक्स हटे या नहीं। लेकिन दाम कई बार और अबकी खूब बढ़ गए। नसीबलाल के राज में बदनसीब बन चुकी जनता को जो जो न झेलना पड़ जाए। सुना है बचवा विकसवा आजकल कॉरपोरेट भईया लोगों के किलेनुमा घरों में कैद होकर हरे-भरे लॉन में झूला झूलते हुए वो सारे लॉलीपॉप चूस रहा है जिसे इलेक्शन के दिनों में फेकू भाईसाब जनता जनार्दन को दूर-दूर से दिखा कर चुनाव बाद जीतने पर विकसवा के हाथों चहुँपाने का वादा करके धर लिए थे 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आरएसएस, एल्विन टॉफलर और मोदी

अगर आपने एल्विन टॉफलर को नहीं पढा है तो पढ़ लीजिये। शुरुआत थर्ड वेब से कीजिये। क्योंकि आने वाले दिनो में मोदी सरकार भी उसी तरह टेक्नालाजी को परिवर्तन का सबसे बडा आधार बनायेगी जैसे एल्विन टाफलर की किताबों में पढ़ने पर आपको मिलेगा। डिजिटल भारत की कल्पना मोदी यू ही नहीं कर रहे हैं बल्कि उनके जहन में भी एल्विन टाफलर है। दरअसल, यह संवाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर स्वयंसेवको का हैं। और पहली बार सरसंघचालक मोहन भागवत को लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी भारत की दिशा को बदल सकते हैं।

इसलिये संघ को भी अब मोदी पाठ ही पढ़ाया जा रहा है और संघ हर स्वयंसेवक को मोदी पाठ पढाने को ही कह रहा है। यानी हर स्वयंसेवक के लिये नेता अब एक ही है। और उसका नाम है नरेन्द्र मोदी। मसलन अब संघ का प्रांत अधयक्ष भी हर जगह अपने नेता के तौर पर जिक्र मोदी का ही करेगा। और किसान संघ से लेकर स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ भी जो मोदी सरकार की नीतियों को लेकर कल तक रुठे नजर आते थे वह अब रुठ तो सकते है लेकिन उनके नेता का नाम भी नरेन्द्र मोदी ही होगा। इस सोच को कैसे विस्तार दिया जाये इस पर आरएसएस की प्रतिनिधी सभा और बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चर्चा जरुर हुई लेकिन इसे अमली जामा कैसे पहनाना है, इसपर माथापच्ची जारी है । आरएसएस के दत्तात्रेय होसबोले और बीजेपी के महासचिव मुरलीधर राव गुरुवार यानी 9 मार्च को नागपुर में इसी पर चर्चा करने जुटे। खास बात यह है नरेन्द्र मोदी को संघ ने अब किस तरह ढील दी है या सर्वमान्य तौर पर मोदी की अगुवाई में ही हर मुद्दे को अमली जामा पहनाने पर मुहर लगा दी है, उसे आगे कैसे बढ़ाना है और बीते दस महीने में राजनीतिक तौर पर भी जो धुंधलापन है, उसे कैसे साफ करना है इसपर भी अब संघ-बीजेपी की मिलीजुली राणनीति काम कर रही है। यानी पहली बार वह दौर खत्म हो चला है कि संघ अपने एजेंडे के तहत प्रधानमंत्री को चेता सकता है। जैसा वाजपेयी के दौर में होता रहा। उल्टे राजनीतिक तौर पर अब मोदी जो कहे और जिस दिशा में चले उसी दिशा में संघ को भी चलना है। यानी फील्ड में काम करने वाले स्वयंसेवकों को भी समझना है कि अब उनका नेता भी नरेन्द्र मोदी है। खास बात यह भी है कि संघ की तर्ज पर ही नरेन्द्र मोदी को भी राजनीतिक तौर पर स्थापित करने की दिशा में बीजेपी ही नहीं स्वयंसेवकों को भी लगना है। 

राजनीति की यह बेहद महीन रेखा है कि संघ जिस तरह अपने विरोधियों को भी हिन्दुत्व के नाम पर अपने साथ खड़ा करने से नहीं कतराता यानी लगातार अपने विस्तार को ही सबसे महत्वपूर्ण मानता है उसी तर्ज पर नरेन्द्र मोदी की छवि को भी राष्ट्रीय नेता के तौर पर कैसे रखा जाये जिससे संघ के प्रचारक या बीजेपी के नेता के आवरण के बाहर मोदी को खड़ा किया जा सके। यानी आने वाले दिनों में स्वयंसेवकों की सक्रियता अब समाजवादी, वामपंथी या कांग्रेसियों के बीच भी महीन राजनीतिक मान्यता बनाने के लिये दिखायी देगी। क्योंकि संघ का मानना है कि अगर नरेन्द्र मोदी को अंतराष्ट्रीय नेता के तौर पर खड़ा करते हुये स्टेट्समैन की मान्यता मिलती है तो फिर सवाल 2019 या 2024 के चुनाव का नहीं रहेगा बल्कि खुद ब खुद संघ के विस्तार की तरह बीजेपी भी चुनावी राजनीति से आगे निकल जायेगी। चूंकि राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर कांग्रेस के अलावे दूसरा कोई दल है नहीं और प्रधानमंत्री मोदी ही नहीं बल्कि बीजेपी के तमाम नेता भी काग्रेस मुक्त भारत का जिक्र करते रहे हैं। लेकिन नई रणनीति के तहत पहली बार कांग्रेस मुक्त भारत की जगह नेहरु-गांधी परिवार मुक्त भारत की दिशा में सरकार और संघ बढ़ रही है। यानी जवाहरलाल नेहरु से लेकर राहुल गांधी पर हमले ना सिर्फ तेज होंगे बल्कि राजनीतिक तौर पर गांधी परिवार को खारिज करने और अतित के कच्चे-चिठ्ठों के आसरे गांधी परिवार को कटघरे में खडा करने में भी सरकार दस्तावेजों के आसरे जुटेगी तो स्वयंसेवक भारत के मुश्किल हालातो को जिक्र कर मोदी के रास्तों को राष्ट्रीय तौर पर मान्यता दिलाने में जुटेंगे। लेकिन यह रास्ता बनेगा कैसे और जिस एल्वीन टाफलर का जिक्र विज्ञान और तकनीक के आसरे देश की राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन का सपना संजोया जा रहा है उसके नायक क्या वाकई मोदी हो जायेंगे। क्योंकि संघ के भीतर एल्विन टाफलर को लेकर पहली बार चर्चा नहीं हो रही है। 

दरअसल दिसबंर 1998 में नागपुर में संघ की 5 दिन की चिंतन बैठक में एल्विन टाफलर के “वार एंड एंटी वार” और सैम्युल हटिंगटन की “क्लैशेस आफ सिविलाइजेशन” पर मदन दास देवी की अगुवाई में संघ के स्वयंसेवक परमेश्वरन और बालआप्टे ने बकायदा दो दिन बौद्दिक चर्चा की। और संयोग से उस वक्त भी मौजूदा पीएम मोदी की तर्ज पर संघ के प्रचारक रहे वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। लेकिन उस वक्त वाजपेयी को स्टेटसमैन के तौर पर संघ के खड़ा करने की सोच से पहले ही देश ने वाजपेयी को स्टेट्समैन के तौर पर मान्यता दी थी। तो फिर मोदी के दौर में संघ के भीतर यह सवाल कुलांचे क्यों मार रहा है, यह भी सवाल है। और संघ जिस तरह अपनी सारी ताकत प्रधानमंत्री मोदी को दे रहा है या लगा रहा है उससे भी पहली बार यह संकेत तो साफ तौर पर उठ रहे हैं कि संघ अपनी सीमा समझ रहा है। यानी वह सक्रिय ना हो या सरकार की नीतियों का विरोध करे तो वाजपेयी की तर्ज पर मोदी के लिये भी मुश्किलात हो सकते है। लेकिन जब राजनीतिक सत्ता ही नहीं रहेगी तो फिर संघ को कोई भी सत्ता कटघरे में खडा करने में कितना वक्त लगायेगी। जैसा मनमोहन सिंह के दौर हिनदू आतंक के दायरे में संघ को लाया गया । यानी आरएसएस अब 2004 की गलती करने कौ तैयार नहीं है और बीजेपी दिल्ली की गलती दोहराने को तैयार नहीं है। यानी स्वयंसेवको की कदमताल अब बिहार-यूपी चुनाव के वक्त मोदी के नायकत्व में ही होगी । और 2019 तक संघ के भीतर से मोदी सरकार की किसी नीति को लेकर कोई विरोध की आवाज सुनायी देगी नहीं । क्योंकि संघ को भरोसा है कि आधुनिक भारत के विकास के जनक के तौर पर मोदी की पहचान दुनिया में हो सकती है।

पुण्य प्रसून बाजपेयी

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

RSS के ‘ऑर्गनाइजर’ ने ये क्या छाप दिया !!

नई दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मीडिया मोर्चे पर एक ऐसी चूक उजागर हो गई है, जिस पर उसे भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है। संघ के अंग्रेजी मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ में जम्मू-कश्मीर का एक भाग पाकिस्तान में दर्शाया गया है। 

आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ के ताजा संस्करण में दक्षिण एशिया का मानचित्र प्रकाशित किया गया है। मानचित्र में जम्मू-कश्मीर का एक भाग पाकिस्तान में दर्शाया गया है। ‘ऑर्गनाइजर’ को जल्द ही अपनी गलती का अहसास हो गया और ऑनलाइन एडिशन से यह मैप हटा लिया गया लेकिन इसके 15 मार्च के प्रिंट एडिशन में यही मैप छपा है। ‘ऑर्गनाइजर’ ने इस गलती को स्वीकार कर लिया है। संपादक प्रफुल्ल केतकर ने कहा है क ‘मानचित्र सार्क की एक वेबसाइट से लिया गया था और अगले एडिशन में यह गलती सुधार ली जाएगी। यह गलती लापरवाही की वजह से हुई, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। मैप का जो भी सोर्स रहा हो, ऑर्गनाइजर में इस तरह की गलती के लिए कोई जगह नहीं है।’

ऐसे में राष्ट्रभक्ति का दंभ भरने वाली आरएसएस पर हमला करने का एक सुनहरा मौका विपक्षी पार्टियों को मिल गया है। आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने ट्वीट कर पूछा है- ‘ आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने पूछा है कि क्या महर्षि कश्यप की तपस्थली, भारत माता का मणिमुकुट ‘कश्मीर’ पाकिस्तान को देने का मन बना ही लिया है!’ 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पूंजीपतियों की पक्षधरता के मामले में कांग्रेसी ममो के बाप निकले भाजपाई नमो!

: इसीलिए संघ और सरकार ने मिलजुल कर खेला है आक्रामक धर्म और कड़े आर्थिक सुधार का खेल : जनविरोधी और पूंजीपतियों की पक्षधर आर्थिक नीतियों को तेजी से लागू कराने के लिए धर्म पर बहस को केंद्रित कराने की रणनीति ताकि जनता इसी में उलझ कर रह जाए : सुधार की रफ्तार मनमोहन सरकार से कही ज्यादा तेज है। संघ के तेवर वाजपेयी सरकार के दौर से कहीं ज्यादा तीखे है । तो क्या मोदी सरकार के दौर में दोनों रास्ते एक दूसरे को साध रहे हैं या फिर पूर्ण सत्ता का सुख एक दूसरे को इसका एहसास करा रहा है कि पहले उसका विस्तार हो जाये फिर एक दूसरे को देख लेंगे।

यानी एक तरफ संघ परिवार ललचा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार वह मोदी सरकार के दौर में खासी तेजी से कर सकता है तो उसे अभी विकास की जनविरोधी नीतियों की तरफ देखने की जरूरत नहीं है। तो दूसरी तरफ मोदी सरकार को भी इसका एहसास है कि संघ के बगैर मौजूदा वक्त में दूसरी कोई राजनीतिक ताकत नहीं है जो उसे विश्व बैंक और आईएमएफ की सोच को आर्थिक विकास तले लागू करने से रोक सके।

सरकार और संघ ने उस रास्ते को धुआंधार तरीके से पकड़ लिया है जो दोनों को विस्तार दे और टकराव के हालात आने तक दोनों ही मान कर चलें कि सत्ता हाथ में रहेगी तो रोक लेगें या सत्ता की डोर खींच लेंगे। आने वाले वक्त में होगा क्या, इसे ताड़ना तो दूर की गोटी होगी लेकिन इस दौर के दो संकेत साफ हैं। पहला, आरएसएस धर्म को धारण करने की सोच से कही आगे ले जाना चाहती है। दूसरा सरकार खेती और खनिज संपदा को राष्ट्रीय धरोहर से आगे बाजार की धरोहर बनाने-मानने को तैयार है। इस रास्ते में धर्म आक्रामक होगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। इस रास्ते जनता संसदीय राजनीति करने वाले राजनेताओं के खिलाफ खड़ी हो सकती है, इंकार इससे भी नहीं किया जा सकता।

पहली बार कोयला खादान के मजदूरों ने हड़ताल इसलिये की है क्योकि उन्हे निजी हाथो में बेचा जा रहा है। बैंक के कर्मचारी हडताल इसलिये करना चाह रहे हैं क्योंकि वेतन में इजाफा किये बगैर सरकार के सारे घतकर्म को बैंक के जरीये ही पूरा करने की नीति अपनायी जा रही है। बड़े बड़े हाथों से एनपीए की वसूली कैसे हो कोई नहीं जानता। जनधन के हर खाते को कोई बैंक कैसे कोई संभाले इसकी कोई नीति नहीं है। महंगाई को साधने का कोई उपाय सरकार के पास नहीं है। विपन्न तबके की तादाद लगातार बढ़ रही है क्योंकि विकास का मॉडल रोजगार देते हुये चकाचौंध लाने के खिलाफ है। वहीं विपन्न तबके में धर्म और आस्था के जरीये ही अपने होने का एहसास तेजी से जाग रहा है।

राजनीतिक तौर पर सत्ता के लिये सियासी ककहरा भी इस दौर में विपन्न तबके की ताकत बनी है। देश में विपन्न तबके की ताकत सत्ता से इसलिये टकराने से कतराती रही है क्योंकि सत्ता की नीतियो से इतर खेती एक सामानांतर अर्थव्यवस्था के तहत पेट भरती रही है और धर्म की आस्था का पाठ संयम से जुडा रहा है। लेकिन यह दोनों हालात सत्ता की निगाहों में चढ़ जाये या सत्ता ही दोनो को प्रबावित करने लगे तो रास्ता क्या निकलेगा। इसकी संवेदनशीलता कौन कितना समढ रही है यह अपने आप में सवाल है। मौजूदा वक्त में धर्म राष्ट्रवाद से जुड़ रहा है, जो आक्रमक हो चला है। दूसरी तरफ विकास की थ्योरी भी आक्रामक है। राष्ट्र विकास की थ्योरी तले पूंजी को ज्यादा महत्व दे रहा है। जिस खेती पर टिका देश का साठ फिसदी दुनिया की मंदी से प्रभावित हुये बगैर भी बाकी चालीस फिसदी को भी संकट से उबार लेता है और मनमोहन सिंह सरीखे सुधारवादी अर्थशास्त्री भी यह कहने से नहीं चुकते कि भारत की इकनॉमी दुनिया की मंदी से प्रभावित नहीं हुई। उसी खेती की जमीन को अगर विकास की चकाचौंध तले मुआवजे के नाम पर हथियारे का जमीन सुधार शुरू होगा तो फिर रास्ता जाता किधर है।

ना तो बहुफसली जमीन मायने रखती है और ना ही छत्तीसगढ या बंगाल सरीखे राज्यो की खेती अर्थव्यवस्था। औघोगिक गलियारों के नाम पर रक्षा के लिये हथियारो के उद्योग लगाने के नाम पर या फिर ग्रामिण क्षेत्रो में बिजली पहुंचाने के नाम पर सरकार कोई भी जमीन ले सकती है। सिर्फ मुआवजा पहले की तुलना में ज्यादा मिल जायेगा। लेकिन इसकी एवज में सरकार के पास ऐसी कोई योजना भी नहीं है कि रोजगार बढे या विपन्न लोगों को रोजगार मिले। ध्यान दें तो मनमोहन सिंह के दौर में भी कई तरीकों से उदारीकरण के नाम पर उपजाऊ भूसंपदा कारपोरेट घरानो को सौपी गयी। जो रियल इस्टेट में खपा। अकूत मुनाफाखोरी हुई। आवारा पूंजी का खुला खेल नजर आया। कालाधन की उपज भी तो इसी खुली व्यापार योजना के दायरे में होती रही। तो यह खेल अब अलग कैसे होगा।
योजना आयोग की घिसी पिटी लकीरों को मिटाकर नयी लकीर खिंचने के लिये बने नीति आयोग की नयी भर्ती से भी समझा जा सकता है। याद कीजिये तो मनमोहन सिंह के दौर में योजना आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया बैठा करते थे और अब नीति आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर अरविन्द पानागढिया बैठेंगे। दोनों विश्व बैंक की नीतियों तले बने अर्थशास्त्री हैं। दोनों के लिये खुला बाजार खासा मायने रखता है। वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ में काम करते हुये दोनों ने ही आर्थिक सुधार को ना सिर्फ खासा महत्वपूर्ण माना बल्कि भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देशों के लिये दोनो के लिये विकास की रेखा कंजूमर की बढती तादाद से तय होती है। दोनों ही डब्ल्यूटीओ की उन नीतियों का विरोध कभी ना कर सके जो भारत के किसान और मजदूरों के खिलाफ रही। दोनों ही खनिज संपदा को मुक्त बाजार या कहे मुक्त व्यापार से जोड़ने में खासे आगे रहे। फिर योजना आयोग से बदले नीति आयोग में अंतर होगा क्या। महत्वपूर्ण यह भी है कि भारत में जितनी असमानता है और बिहार, यूपी, झारखंड सरीखे बीमारु राज्य की तुलना में महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे विकसित राज्य के बीच कभी मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी विकास को हर तबके तक पहुंचाने के लिये री-डिस्ट्रीब्यूशन आफ डेवलपमेंट की थ्योरी रखी। जिस वक्त नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिये लोकसभा के चुनावी प्रचार में जुटे थे उस वक्त अरविन्द पनगारिया ने भी बकायदा भारत में विकास की असमानता को लकेर कई लेखों में कई सवाल उठाये।

फिर विश्व बैंक और आईएमएफ का नजरिया भारत को लेकर इन दोनो अर्थशास्त्रियों के काम करने के दौरान ही कितना जन विरोधी रहा है, यह मनमोहन सिंह के दौर में बीजेपी ने ही कई मौको पर उठाये। और तो और, संघ परिवार का मजदूर संघटन बीएमएस हो या स्वदेशी जागरण मंच दोनो ने ही हमेशा विश्व बैंक और आईएमएफ की नीतियों को लेकर वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकार तक पर सीधी चोट की है । अब यहा नया सवाल है कि एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना और दूसरी तरफ भारत को विकसित देश बनाने के लिये सरकार की नीतियां। एक तरफ संघ के तीन दर्जन संगठन जो आदिवासी से लेकर किसान और मजदूर से लेकर देशी उत्पादन पर टिके स्वावलंबन के लिये बीते चालीस बरस से काम कर रहे हैं और उन्हें बीच से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता जो संघ परिवार की राष्ट्रीय सोच को ही धर्म की चादर में ही लपेटा हुआ दिखा रहे है। तो यह आपसी सहमति से है या आपसी अंतर्विरोध। या फिर सहमति और अंतर्विरोध के बीच की लकीर ही मौजूदा दौर में एक हो चली है। क्योंकि कल तक संघ परिवार के बीच काम करने वाले मुरलीधरराव हों या संघ के पांच सौ से ज्यादा प्रचारक। जो वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकर के दौर में उसी विदेसी निवेश और पूंजी पर टिके उसी विकास के खिलाफ थे जो रोजगार दे नहीं पा रही थी और पूंजीवालों को हर सुविधाओं से लैस कर रही थी।

मनमोहन सिंह के दौर में पूंजी पर टिके विकास ने 40 फिसदी मजदूरों के रोजगार छीने और 70 फीसदी स्वरोजगार में सेंध लगायी। २००५-२०१० के दौर में देश में कुल २७० लाख रोजगार हुये। लेकिन इसी दौर में करीब ढाई लाख स्वरोजगार बेरोजगार हो गये। इसी दौर में उद्योगों को टैक्स सब्सिडी हर बरस पांच लाख करोड़ तक दी गयी। और इस सब की हिमायत विश्व बैक और आईएसएफ से लेकर डब्लूटीओ तक ने की, जहां से निकले अर्थशास्त्री अब नीति आयोग को संभाल रहे हैं बल्कि मनमोहन सरकार के दौर में आर्थिक सलाह देने वाले डा विवेक देवराय भी नीति आयोग के स्थायी सदस्य नियुक्त हो चुके हैं। यानी सिर्फ अरविन्द पानागढ़िया का ही नहीं बल्कि मुक्त व्यापार के समर्थक रहे अर्थशास्त्री डॉक्टर बिबेक देवराय का भी सवाल है जो आर्थिक मुद्दों पर मनमोहन सिंह के दौर में सुझाव देते आये है और इन अहम सुझावों को कभी बीजेपी ने सही नहीं माना। या कहें कई मौकों पर खुलेआम विरोध किया। डा देवराय इससे पहले की सरकार में विदेशी व्यापार, आर्थिक मसले और कानून सुधार के मुद्दों पर सलाहकार रह चुके हैं। यानी मनमोहन सरकार के दौर की नीतियों का चलन यहां भी जारी रहेगा। तो सवाल है बदलेगा क्या। वैसे भी जमीन अधिग्रहण से लेकर मजदूरों के लिये केन्द्र सरकार की नीतियों से संघ परिवार में भी कुलबुलाहट है। जिस तरह मुआवजे के दायरे में जमीन अधिग्रहण को महत्व दिया जा रहा है और मजदूरों को मालिकों के हवाले कर हक के सवाल को हाशिये पर ढकेला जा रहा है उससे संघ का ही भारतीय मजदूर संघ सवाल उठा रहा है।

सवाल यह भी है कि खुद नरेन्द्र मोदी ने पीएम बनने के बाद संसद के सेंट्रल हाल में अपने पहले भाषण में ही जिन सवालों को उठाया और उसके बाद जिस तरह हाशिये पर पड़े तबको का जिक्र बार बार यह कहकर किया कि वह तो छोटे छोटे लोगों के लिये बड़े बड़े काम करेंगे तो क्या नयी आर्थिक नीतियां वाकई बड़े बड़े काम छोटे छोटे लोगों के लिये कर रही है या फिर बड़े बड़े लोगों के लिये। क्योंकि देश की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, जो कम होगी कैसे, इसकी कोई योजना नीतिगत तौर पर किसी के पास नहीं है। बड़़े पैमाने पर रोजगार के साधनों को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य पर है, लेकिन रोजगार कारपोरेट और कारोबारियों के हाथ में सिमट रहा है और पहले ना मनमोहन सिंह कुछ बोले और ना ही अब कोई बोल रहा है। गरीबों के लिए समाज कल्याण की योजनाएं सरकार को बनानी हैं। लेकिन मनमोहन सिंह के दौर में सारी योजना तो अब सारी नीतियां कल्याणकारी पैकेज में सिमट रही है। ऐसे में नीति आयोग क्या अपने उद्देश्यों पर खरा उतरेगा-ये किसके लिये कितना बड़ा, यह तो वक्त बतायेगा लेकिन असल मुश्किल है कि एक तरफ धर्म के नाम पर घर वापसी का सवाल आक्रामक हो चला है और देश को इसमें उलझाया जा रहा है मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में धर्म के नाम पर कही औवेसी तो कही आरएसएस का नाम लेकर राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का खुला खेल चल रहा है तो दूसरी तरफ आर्थिक सुधार की नीतियो की रफ्तार मनमोहन सिंह के दौर से कई गुणा तेज है और यह लगने लगा है कि निजी सेक्टर चुनी हुई सरकार से भी ताकतवर हो चले हैं।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

संघ की उड़ान को थामना सोनिया-राहुल के बस में नहीं : पुण्य प्रसून बाजपेयी

जिस सियासी राजनीतिक का राग नरेन्द्र मोदी ने छेड़ा है और जिस हिन्दुत्व की ढपली आरएसएस बजा रही है, कांग्रेस ना तो उसे समझ पायेगी और ना ही कांग्रेस के पास मौजूदा वक्त में मोदी के राग और संघ की ढपली का कोई काट  है। दरअसल, पहली बार सोनिया गांधी और राहुल गांधी की राजनीतिक समझ नरेन्द्र मोदी की सियासत के जादू को समझ पाने में नाकाम साबित हो रही है  तो इसकी बडी वजह मोदी नहीं आरएसएस है। और इसे ना तो सोनिया-राहुल समझ पा रहे है और ना ही कांग्रेस का कोई धुरंधर। अहमद पटेल से लेकर जनार्दन  द्विवेदी और एंटनी से लेकर चिदबरंम तक सत्ता में रहते हुये हिन्दु इथोस  को समझ नहीं पाये। और ना ही संघ की उस ताकत को समझ पाये जिसे इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी ने बाखूबी समझा।

इसलिये सोनिया गांधी और  राहुल गांधी की सियासत सिवाय मोदी सरकार के फेल होने के इंतजार से आगे बढ़  भी नहीं पायेगी। इसलिये कांग्रेस ना तो मोदी सरकार के लिये कोई चुनौती है ना ही संघ परिवार के लिये कोई मुश्किल। और यह चिंतन कांग्रेस में नहीं  बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हो रहा है। संघ के चितंन-मनन का दायरा  कितना बड़ा है या कांग्रेस संघ की उस थाह को क्यों नहीं ले पा रही है, जिसे  इंदिरा ने ७० के दशक में ही समझ लिया और राजीव गांधी ने अयोध्या आंदोलन  के वक्त समझा। असल में संघ परिवार के भीतर भविष्य के भारत के जो सपने पल  रहे है वह पहली बार नेहरु-गांधी परिवार के साथ अतित में रहे संघ परिवार  के संबंधों से आगे देखने वाले हैं। हिन्दु राष्ट्रवाद को अध्यात्मिक तौर  पर आत्मसात कराने वाले हैं।यानी हिन्दु धर्म का नाम लिये बगैर एकनाथ  राणाडे की उस सोच का अमलीकरण कराना हो जो विवेकानंद को लेकर राणाडे ने  १९७० में करा लिया था। लेकिन उस वक्त इंदिरा गांधी ने इस सोच की थाह को  पकड़ लिया था।

असल में एकनाथ राणाडे की सौवी जंयती के मौजूदा बरस में वह  सारे सवाल संघ के भीतर हिलोरे मार रहे है जिनपर अयोध्या आंदोलन के वक्त  से ही चुप्पी मार ली गई और संघ की समूची समझ ही राम मंदिर के दायरे में सिमटा दी गयी। मुश्किल यह है कि काग्रेस की राजनीति बिना इतिहास को समझे भविष्य की लकीर खिंचने वाली है और संघ अपने ही अतित के पन्नो को खंगाल  कर भविष्य का सपना संजो रहा है। जो कांग्रेस और तमाम राजनीतिक दल आज संघ परिवार के हिन्दु शब्द सुनते ही बैचेन हो जाते है उस हिन्दु शब्द का महत्व आरएसएस के लिये क्या है और इंदिरा गांधी ने इस शब्द को कैसे पकड़ा इसके लिये इतिहास के पन्नो को खंगालना जरुरी है। पन्नों को उलटे तो १९७०  में स्वयंसेवक एकनाथ राणाडे ने जब विवेकानंद शिला स्मारक का कार्य पूरा  किया तो इंदिरा गांधी ने राणाडे को समझाया कि स्वामी विवेकानंद के विचार  को दुनियाभर में फैलाने और भारत को दुनिया का केन्द्र बनाने में उनकी  सरकार राणाडे की मदद करने को तैयार है। बशर्ते स्वामी विवेकानंद को  हिन्दू संत की जगह भारतीय संत कहा जाये। राणाडे इसपर सहमत हो गये ।  लेकिन तब के सरसंघचाल गुरुगोलवरकर इसपर सहमत नहीं हुये कि इंदिरा सरकार के साथ मिलकर हिन्दू संत विवेकानेद की जगह भारतीय संत विवेकानंद के लिये  एकनाथ राणाडे काम करें। असर इसी का हुआ कि १९७१ की आरएसएस की प्रतिनिधि  सभा में विवेकानंद शिला स्मारक की रिपोर्ट एकनाथ राणाडे ने नहीं रखी।

संघ के जानकार दिलिप देवघर के मुताबिक संघ की प्रतिनिधी सभा में विवेकानंद स्मारक शिला पर रिपोर्ट ना रखने पर स्वयसंवकों ने जब वजह जानना चाहा तो गुरु गोलवरकर की टिप्पणी थी, इनका संघ के साथ क्या संबंध। तो पहली बार इंदिरा गांधी ने संघ की उस ताकत में सेंध लगायी जिसे मौजूदा वक्त में कांग्रेस के धुरंधर समझ पाने में नाकाम हैं। इंदिरा गांधी की सफलता इतनी भर ही नहीं थी बल्कि इसके बाद विवेकानंद केन्द्र को लेकर जो  काम एकनाथ राणाडे ने शुरु किया वह इस मजबूती से उभरा कि रामकृष्ण मिशन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामानांतर एक बडी ताकत का केन्द्र विवेकानंद केन्द्र बनकर उभरा। यानी १९२६ में महज १२ बरस की उम्र में जो एकनाथ  राणाडे आरएसएस के साथ जुड गये और जिन्होंने १९४८ में संघ पर लगे प्रतिबंध के दौर में गुरु गोलवरकर के जेल में रहने पर सरदार पटेल के साथ मिलकर तमाम समझौते किये। बालासाहेब देवरस और पी बी दाणी के साथ मिलकर आरएसएस  का संविधान लिखा। जिसके बाद संघ पर से प्रतिबंध उठा। उस एकनाथ राणाडे को अपनी राजनीति से इंदिरा गांधी ने साधा। हालांकि गुर गोलवरकर की मृत्यु के बाद बालासाहेब देवरस ने बैगलोर में संघ की सभा में एकनाथ राणाडे को हाथ पकड़कर साथ बैठाया और उसके बाद से विवेकानंद केन्द्र पर रिपोर्ट देने का सिलसिला शुरु हुआ। लेकिन यहा समझना यह जरुरी है कि राणाडे के शताब्दी वर्ष में ९ नवंबर २०१४ को अगर प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली के विज्ञान भवन के कार्यक्रम में शिरकत करते है और तीन दिन पहले नागपुर के न्यू इंग्लिश हाई स्कूल में सरसंघचालक मोहन भागवत भी एकनाथ राणाडे को याद कर स्वामी विवेकानंद के विचारों को ही देश में फैलाने के जिक्र कर हिन्दुत्व का सवाल उठाते हैं तो फिर इसके दो मतलब साफ है। पहला, संघ परिवार अब हिन्दू इथोस की उस सोच को देश मे पैदा करना चाहता है जिक्र जिक्र विवेकानंद ने किया और जिस सोच को राणाडे विवेकानंद के जरीये देश में फैलाना चाह रहे थे। और  दूसरा कांग्रेस आज इस हिन्दू इथोस को समझ नहीं पा रही है कि आखिर नेहरु गांधी परिवार हमेशा हिन्दुत्व को लेकर नरम रुख क्यों अपनाये रहा।

दरअसल इंदिरा गांधी ने इमरजेन्सी के दौर में जेपी के साथ आरएसएस के जुड़ने को भी खतरे की घंटी माना । यह वजह है कि १९८० में सत्ता वापसी के बाद इंदिरा गांधी ने खुले तौर पर हिन्दुत्व को लेकर साफ्ट रुख अपनाया । सत्ता संबालने के बाद विदर्भ जाकर इंदिरा गांधी ने विनोबा भावे के पांव छुये। उस दौर में उन्होने संघ की ताकत को लेकर विनोभा भावे से जिक्र किया । संघ के सामाजिक संगठनों को ही आरएसएस के भीतर संघर्ष कराने के हालात भी पैदा किये। असल में संघ परिवार के भीतर अब इस सवाल को लेकर मंथन चल रहा है कि विश्व हिन्दु परिषद को तो अध्यात्मिक रुख अदा करना था लेकिन अयोध्या आंदोलन को लेकर विहिप का रुख राजनीतिक कैसे हो गया। सच यह भी है कि विहिप के राजनीतिकरण में भी इंदिरा गांधी की बड़ी भूमिका रही। जिन्होंने धीरे धीरे विहिप के आंदोलन को राजनीति के केन्द्र में ला खड़ा किया। जिसे राजीव गांधी ने अयोध्या आंदोलन के दौर में शिला पूजन पर विहिप के साथ समझौता कर आगे भी बढाया और रज्जू भैया के साथ समझौते की दिशा में कदम भी बढाये। ध्यान दें तो राजीव गांधी ने एक साथ दो-तरफा सियासी बिसात बिछायी । एक तरफ सैम पित्रोदा के जरीये तकनीकी आधुनिकीकरण तो दूसरी तरफ बहुकेन्र्दीय सांप्रदायिकता । शाहबानो मामला, अयोध्या में शिला पूजन और नार्थइस्ट में मिशनरी। ध्यान दें तो मौजूदा कांग्रेस में ना तो सोनिया गांधी हिन्दु इथोस को समझ पायी है और ना ही राहुल गांधी काग्रेस के नरम हिन्दुत्व रुख के कारणो को समझ पाये। इसलिये जिस स्वामी विवेकानंद की धारा को इंदिरा गांधी ने संघ के ही स्वयसेवक एकनाथ राणाडे के जरीये की संघ के हिन्दुत्व पर चोट कर सामानांतर तौर पर खड़ा किया आज वही विवेकानंद केन्द्र मोदी सरकार की थिंक टैक हैं। और कांग्रेस की समझ से यह सियासत कोसो दूर है। असल में कांग्रेस की दूसरी मुश्किल तकनीक के विकास के जरीये विचारधारा और समाज में परिवर्तन की समझ भी है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के संबंध एल्विन टोफलर से भी रहे। दोनों ही भविष्य की राजनीति में तकनीक और टेकनाक्रेट दोनो की जरुरत को समझते थे। और आरएसएस के भीतर भी यह समझ खासी पुरानी रही है। १९९८ में संघ के चिंतन बैठक में बकायदा एचवी शेषार्दी ने बाल आप्टे और केरल के वरिष्ठ स्वयंसेवक परमेशवरन के जरीये एल्विन टॉफलर की किताब वार एंड एंटी वार और हेलिग्टन की क्लैशस आफ सिविललाइजेशन पर एक पूरा सत्र किया। यानी सोलह बरस पहले ही भविष्य के बारत को लेकर जो सपना भी संघ के भीतर चिंतन के तौर पर उपज रहा था वह नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कैसे लागू होगी या कैसे लागू की जा सकती है इस दिशा में काम लगातार चल रहा है। न्यूयार्क, सिडनी के बाद अब लंदन में भी प्रदानमंत्री मोदी की सार्वजनिक सभा के आयोजन में संघ का कोर ग्रूप लगा हुआ है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। आज की तारीख में बकायदा हर एनआरआई स्वयंसेवक की पूरी जानकारी संघ-बीजेपी के कम्प्यूटर में मौजूद है, जिनसे संपर्क कर मोदी सरकार का साथ और संघ के हिन्दू राष्ट्र के सपने को जगाने में एक मेल यानी कंप्यूटर की चिट्टी ही काफी है । जो विदेशी स्वयंसेवकों में राष्ट्रप्रेम जगा देती है। इसी तर्ज पर अब दुनिया के हर हिस्से में में मौजूद भारतीयो की सूची भी अब संघ-बीजेपी तैयार कर रही है।

जाहिर है अगर तकनीक के आसरे संवाद बन सकता है और विदेश में रह रहे भारतीयो पर एक मेल से राष्ट्रप्रेम जाग सकता है तो संकेत साफ है कि डिजिटल क्रांति,संचार क्रांति और तकनीकी संबंध के आसरे भविष्य के भारत को  बनाने की दिशा में संघ की पहल मोदी सरकार के आसरे जिस रफ्तार पर चल पड़ी है उसमें कांग्रेस कहां टिकेगी और बाकि राजनीतिक दलो की सोच कैसे असर डालेगी। क्योंकि कांग्रेस के भीतर भारतीय संस्कृति के उन सवालो को समझने वाला और सोनिया-राहुल गांधी को समझाने वाले कितने कांग्रेसी हैं, जो बता पाये कि नेहरु ने पारसी दामाद होने के बावजूद इंदिरा को हिन्दु रखकर भारत के सियासत के मर्म को समझा। इंदिरा गांधी ने ईसाई बहू होने के बावजूद राजीव गांधी को हिन्दू रखकर भारत के हिन्दू इथोस को समझा। और  सोनिया-राहुल के दौर में संघ परिवार को आंतक के कटघरे में खडा कर हिन्दू शब्द पर ही सवालिया निशान लगाया गया। तो संकेत साफ है हिन्दू शब्द पर ही राजनीति बंटेगी तो कांग्रेस की हथेली खाली रहेगी।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल से जुड़े हुए हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: