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इलाहाबाद के किस्से (पार्ट-4) : मैं अपने को अखिलेश कुमार मिश्र से बोधिसत्व होते देख रहा था!

मुझे चलती क्लास में नहीं जाना चाहिए था। लेकिन उस समय इतना ध्यान न था। उन्होंने पूछा बोलो? मैंने कहा “सर कवितवा”! जगदीश सर भड़क गए “कवितवा” पर मुझे खूब प्यार से डांटा और बोले कविता को कवितवा न बनाऊं मैं। मुझे बात समझ में आई लेकिन गलती कर चुका था…

बोधिसत्व-

“मैं अखिलेश कुमार मिश्र उर्फ शिल्परत्न उर्फ शालिहोत्र उर्फ धूसर उर्फ नीलमेघ उर्फ बोधिसत्व”

वो इलाहाबादी ही क्या जो हर बात को कहने के लिए एक भूमिका न बनाए। सीधी बात कहने की परम्परा कभी नहीं रही इस शहर में। लेकिन अभी तो मुझे इस शहर में आए लगभग डेढ़ साल ही हुए हैं। ऐसा नहीं कि यह शहर मेरे लिए नया था। ऐसा कोई साल नहीं जब इलाहाबाद दो तीन बार न आया होऊं।

दारागंज में ताऊजी रहते थे। वे एजी ऑफिस में बड़े अधिकारी थे। एलेन गंज में चाचा जी रहते थे वे विश्व विद्यालय में इतिहास विभाग में लेक्चरर थे। बीच में कभी-कभार पिता जी भी ट्रांसफर होकर इलाहाबाद में नियुक्त हो जाते थे। दो बहनें इलाहाबाद में आबाद थीं। एक और ताऊजी करेली में रहते थे। उनके मकान से कुछ दूरी पर बहुत समय तक अमरकांत जी रहते रहे। इलाहाबाद मेरे लिए कोई अनजान शहर न था। वह मेरा परदेश कभी नहीं रहा। जब मैं चौथी या पांचवीं में था तब मेरे भाई निराला जी के पौत्रों के साथ दारागंज में पतंग उड़ाते थे। एक भाई स्वर्गीय तीर्थराज मिश्र रामजी राय और विभूति मिश्र जी के सहपाठी थे। इलाहाबाद के हिंदी विभाग में। आज भी एमए फाइनल वर्ष की ग्रुप फोटो में प्रो. प्रेम कान्त टंडन जी के साथ तीर्थ राज भैया और रामजी राय आदि की फोटो घर में फ्रेम करके टांगी हुई है। भैया रहे नहीं। उनकी तमाम यादें दीवारों पर ही टंगी हैं।

इलाहाबाद से ऐसा ही संबंध था कि विजय देव नारायण साही मेरे गांव मेरे घर कम से कम तीन बार आए। एक बार मेरे जन्म के पहले दो बार जन्म के बाद में। जब वे भदोही मिर्जापुर लोक सभा सीट से चुनाव लड़े 1967 में तब आए। उसके बाद इमरजेंसी के दौरान भी दो बार आए। उनके आने के माध्यम थे चाचा जी जो विश्व विद्यालय में पढ़ाते थे। साही जी। मूलतः बनारसी थे। और बहुत समय तक बनारस में पढ़ाए भी। आगे बहुत आगे वे बनारस से इलाहाबाद आए। उनका मोटे फ्रेम का चश्मा हमने अपने गांव के दरवाजे पर देखा हुआ रहा। इसलिए जब उनके न रहने पर उनकी पत्नी आदरणीया कंचन लता साही जी से मिलना हुआ तब यह कभी न लगा कि मैं इनको नहीं जानता। इलाहाबाद प्रसंग पर आगे बात करूंगा। अभी अपनी साहित्यिक बेचैनी और साहित्य में अपनी भटकन की बात कर लूं। ख़ास कर अपने नाम बदलाव और कवि होने की उठा पटक पर।

तो अश्क जी ने मुझे हिंदी विभाग में जिन लोगों से मिलने को कहा उनमें से मैंने जगदीश गुप्त जी को अपनी कविताएं कॉपी करके दीं थीं। करीब एक सप्ताह बाद मैंने उनसे जानना चाहा कि क्या उन्होंने मेरी कविताएं पढ़ लीं हैं। जिसका उत्तर जगदीश जी ने यह दिया कि कविता है बेटा धैर्य धरना सीखो। लेकिन मैं तो जैसे बावला हो रहा था। कैसे रुकूं। दो तीन दिन बाद उनके पास फिर गया। वे सेमिनार क्लास में थे और केशव दास या किसी रीति कवि को पढ़ा रहे थे। मुझे चलती क्लास में नहीं जाना चाहिए था। लेकिन उस समय इतना ध्यान न था। उन्होंने पूछा बोलो? मैंने कहा “सर कवितवा”! जगदीश सर भड़क गए “कवितवा” पर मुझे खूब प्यार से डांटा और बोले कविता को कवितवा न बनाऊं मैं। मुझे बात समझ में आई लेकिन गलती कर चुका था।

दो दिन बाद नाग वासुकी में उनके घर गया। उन्होंने बात कवितवा से शुरू की और बहुत देर तक कविता में सौम्यता और उदारता और धैर्य पर समझाए। फिर बोले कि ये कविताएं मैं कहीं न दूं। वे “त्रई” में छापेंगे। कुछ संशोधन करने होंगे और अवधी शब्दों के अर्थ लगाने होंगे। कविता के नीचे। किसी कविता में एक शब्द आया था “गरथा”। उस शब्द का अर्थ जान कर बहुत खुश हुए और बोले कि जो शब्द आएं यदि वे संदर्भ के साथ आएं तो अर्थ खुलने में दिक्कत न होगी। उन्होंने “गरथा” को मेरे लिखे वाक्य के अतिरिक्त कुछ शब्द जोड़े।

मैंने लिखा था :

गरथा पर रखा था पुआल
सोने जैसा पुआल
एक आंच में करिखा हुआ!

जगदीश जी ने कहा कि यहां दो सालों के जोड़ को “गरथा” कहने का अर्थ कैसे समझ आएगा। तो जोड़ कर देखो कि या साफ हो जाए कि “गरथा” पेड़ से जुड़ा शब्द है:

बड़े नीम के पेड़ का गरथा
जिस पर रखा था पीत पुआल
एक आंच में राख हुआ!
कृषक कैसे काटेगा अब दुकाल!

जगदीश जी ने कविता में छंद के प्रयोग पर बहुत जोर दिया और कम से कम तीन चार कविताओं को देखते देखते छंद में बदल दिया। मैं इस खेल से चकित था। उन्होंने कहा की छंद वाली कविताओं का प्रभाव अधिक व्यापक होता है। कुछ छंद सुनाए भी। तब शायद वे सभी छंद उनकी कृति “छंद शती” के थे। चलने के पहले उन्होंने त्रई का एक अंक भी मुझे दिया। बोले अगली त्रई में एक तुम रहोगे और बाकी दो कवि कोई और होंगे। जो त्रई मुझे दी उसमें तीन कवियों कि कविताएं संकलित की गईं थीं। उन्होंने देखते देखते उस अंक में एक चित्र भी बनाया। तारीख भी डाली। उनके रेखांकन से मैं चकित था। मुझे “कवितवा” जैसे भदेश भाव से दूर रहने के लिए फिर समझाया और कविताएं संशोधित करके आने के लिए कहा। मैं खुश था मेरी कविताएं संकलित होंगी। उस दिन नया पाठ सीखने को मिला शब्द को संदर्भ के साथ या उसके सांस्कृतिक वातावरण के साथ प्रयोग करो। लेकिन मैं छंद की ओर जाने के उनके प्रोत्साहन से थोड़ा उलझ गया था। छंद साधना तो मैं ज्ञानपुर में भरपूर कर चुका था। जहां प्रो. संत बख्श सिंह जी ने और प्रो. विभुराम जी ने मुझे उस छंद के मकड़ जाल से निकाला था और आधुनिक कविता की ओर लाए थे।

जगदीश जी से मिलकर रूम पर लौट कर मैंने कुछ कविताओं में आए अवधी शब्दों को वातावरण देने की कोशिश की। लेकिन बात फैल सी जाती। कुछ कविताओं को छंद बद्ध करना चाहा लेकिन बात वैसी न रह जाती जैसी मैं कहना चाहता था। मैंने जगदीश जी के सुझावों पर काम करना एक दो दिन के बाद रोक दिया। फिर अश्क जी के पास गया। उनको पूरी बात बताई तो अश्क जी ने कहा यदि कविता को पहले से छंद में नहीं लिखा है तो पूरी अतुकान्त कविता को छंद में बदलना अभी तुम्हारे लिए कठिन होगा। उन्होंने जगदीश जी की तारीफ की और बोले वे “छंद सिद्ध” कवि हैं। वे कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि त्रई के लिए जगदीश जी को कविताएं दे देना। उनके संपादन में प्रकाशित होना बड़ी बात होगी।

लेकिन मैं जगदीश जी से बचने लगा। एक तो वे हर मुलाकात में “कवितवा” पर मुझे समझाने लगते और दूसरा छंद पर जोर लगातार बना रहा था। इस बीच मैंने पता किया कि दूधनाथ जी कब और कितने बजे विभाग आते हैं तो चपरासी देवनाथ ने बताया कि वे कब आएंगे कहा नहीं जा सकता। बहुत जरूरी हो तो शंभू बारी (शंभू बैरक) चले जाओ। हाई कोर्ट के पीछे घर है उनका। लेकिन मैं घर न गया।

नवंबर या दिसंबर 1987 की बात होगी। एक दिन दूधनाथ सिंह जी के आने की सूचना मिली। मैंने जाकर प्रणाम किया और अश्क जी ने मिलने के लिए कहा है यह बताया। अश्क जी का नाम सुन कर दूधनाथ जी मुस्काए और बोले तुम उनसे कब मिले.. मैंने बताया कि लगभग साल सवा साल हुआ। फिर उन्होंने कहा कविताएं लाए हो। मैंने अपनी वही सौ कविताओं वाली फाइल उनकी ओर बढ़ा दी। जिसमें अभी करीब पच्चीस कविताएं और जुड़ गईं थीं। उस पर लिखा नाम अखिलेश कुमार मिश्र और उसके साथ बीए प्रथम वर्ष भी धुंधला हो रहा था। उन्होंने कुछ कविताएं पढ़ीं और बहुत खुश हुए। उन कविताओं में वह कविता “आवाज” भी थी जिस पर अश्क जी ने काम किया था और वह कविता “बकरी” भी थी जो आदरणीय जगदीश जी को बहुत पसंद आई थी।

दूधनाथ जी ने तत्काल अपने शोध छात्र बालकृष्ण पांडेय जी को बुलाया और बोले इसको निशीथ के घर का पता दे दो और जनवादी लेखक संघ की मीटिंग में आने की तारीख औरा रास्ता भी बता दो। बहुत अच्छी और रेयर कविताएं हैं इसकी। उन्होंने बालकृष्ण जी को मेरी दो कविताएं सुना कर उस की एक बड़ी मार्मिक व्याख्या भी की। जो मुझे खुद एकदम समझ में न आई।

अभी मैं बालकृष्ण जी के साथ था। आगे बालकृष्ण जी साहित्य के डॉक्टर हुए और फिर प्राध्यापक और राजकीय डिग्री कॉलेज के प्रिंसिपल हुए। लेकिन तब वे एक शोध छात्र भर थे। बहुत ही स्नेही और सहायक उनका स्वभाव था। नम्र और उदार। बाल कृष्ण जी ने मुझे निशीथ जी के घर का पता दिया। रास्ता एक कागज पर बना के मुझे दिया। वे मुझे जनवादी लेखक संघ की आगामी बैठक के लाभ और जनवादी लेखक संघ के इतिहास और वर्तमान के बारे में बहुत देर तक समझाते रहे। ऐसे-ऐसे नाम जो मैंने पहले कभी सुने न थे।

मेरी वह कविता की फाइल अभी दूधनाथ जी के पास थी। मैं जगदीश जी की त्रई के लिए कविताएं फेयर कर रहा था। अगले दो तीन दिन शायद रविवार और कोई छुट्टी थी। विश्व विद्यालय खुलने पर दूधनाथ जी मिले और उन्होंने आदरणीय सत्य प्रकाश जी से मिलाया कि यही है वह लड़का। सत्य प्रकाश जी ने भी कविताओं की खूब तारीफ की और बोले अच्छा लिखते हो। लिखते रहो। दूधनाथ जी ने कहा कि कहीं भेजी तो नहीं हैं ये कविताएं। मैंने जगदीश जी और त्रई की बात बताई तो वे बोले अरे छोड़ो त्रई। ये कहीं और छपेंगी। तुम जगदीश जी को देकर इन कविताओं की हत्या कर दोगे। ये रेयर कविताएं हैं। दूधनाथ जी को रेयर और यूनिक शब्द बहुत प्रिय थे और विभिन्न कविताओं के लिए इनका उपयोग करते रहते थे। ये कहीं और अच्छे से आएंगी। तुम जगदीश जी से मिलना ही नहीं। जब तक ये कहीं और न छप जाएं!

और मैंने वैसा ही किया, जैसा दूधनाथ जी ने कहा। मैं जगदीश जी से मिला ही नहीं। उन्होंने तय है कि प्रतीक्षा की थी। इस प्रकरण पर आगे बात करूंगा।

मैं वैसे भी उनसे थोड़ा डरा और खिन्न हो गया था। वे अब तक पांच से छः बार “कवितवा” पर मुझे सीख दे चुके थे। और मैं उनके “छंद” प्रस्ताव से भी डरा सा था।

अगले सप्ताह में बालकृष्ण जी ने मुझे जनवादी लेखक संघ का सदस्य बना लिया था। दूधनाथ जी और शायद रमाकांत पांडेय जी मेरी सदस्यता के प्रस्तावक थे। रमाकांत जी आगे शिव सेना में चेक गए थे और उत्तर प्रदेश की शिव सेना के सक्रिय कार्यकर्ता नेता रहे। कुछ ऐसा ही हुआ था उनके साथ।

मैं बालकृष्ण जी के बताए पते पर उनके दिए नक्शे की मदद से एकदम सही-सही पहुंचा। यह ज ले स की मेरी पहली बैठक थी। यहां पहली बार भैरव प्रसाद गुप्त जी, मार्कण्डेय जी, नित्यानंद तिवारी जी समेत कई बड़े साहित्यकारों के दर्शन हुए। जहां उस दिन हरीश चन्द्र पाण्डेय जी का काव्य पाठ आयोजित था। दूधनाथ जी ने मेरी कविताओं की कुछ कौंधती हुई पंक्तियां सुना कर वहां सबसे मेरा परिचय कराया। मेरी वे कविताएं जो नीलाभ जी के कारण जन संस्कृति मंच से जुड़ने से रह गईं जो जगदीश गुप्त जी की त्रई में न दी गईं वे अभी जनवादी कविताएं थीं। दूधनाथ जी ने मुझे भी मेरी कविताओं के अर्थ समझाए और न समझते हुए भी मुझे लगा कि मैं सब समझ रहा हूं।

इस बीच में इलाहाबाद की साहित्य नदी में बहुत सारा पानी बहा। बहुत सारी बातें हुईं। जिसका एक पक्ष यह था कि मैं विधिवत जनवादी और मार्क्स वादी कवि कहा जाने लगा। लेकिन कविताएं लगभग वही थीं जो पहले से मैंने लिखीं थीं। इस पर आगे कभी विस्तार से लिखूंगा।

उस पहली मीटिंग के आगे कुछ दस बारह दिन बाद दूधनाथ जी ने मेरी फाइल मुझे लौटाई तो साठ प्रतिशत कविताओं के ऊपर काटे का निशान लगा था। कुछ पर सही का निशान था और कुछ के शीर्षक बदले थे। उन्होंने कहा कि कोट कविताएं निरस्त हैं उनको निकाल कर अलग रख दो। बाकी को फेयर कर लो। कहीं भेजना है। उस समय आज के प्रसिद्ध कथाकार और तद्भव के संपादक अखिलेश जी हिंदी से एमए कर रहे थे। वे विभाग में मिलते। वे ज ले स में पहले से थे। दूधनाथ जी को एक साथ दो अखिलेश एक शहर एक संगठन में नहीं चाहिए थे। उन्होंने मुझसे कहा तुम अपना कविता के लिए एक नाम रख लो।

नाम की खोज में उन्होंने मुझे दो नाम दिए। एक “गौतम बुद्ध” और दूसरा “बुद्ध देव” इन दोनों नामों पर सबसे अधिक मार्कण्डेय जी ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि ये दोनों नाम बहुत वृद्ध लेखक या कवि होने का आभास करा रहे हैं। आदरणीय भैरव प्रसाद गुप्त जी तो नाम बदलने के सख्त खिलाफ थे। उनका कहना था कि जब भैरव प्रसाद, देवी प्रसाद, दूधनाथ, शिवकुटी लाल, बद्री नारायण आदि नाम चल रहे हैं अखिलेश क्यों नहीं चलेगा। नाम लिखे से चलता है। एक का नाम अखिलेश है तो दूसरा अखिलन कर ले या अखिलेश्वर या अखिलेश मिश्र रहे। नाम न बदले। कल जरूरी है कि दोनों एक ही शहर में रहें। लेकिन दूधनाथ जी नाम बदलने के लिए कटिबद्ध थे। उन्होंने कहा कि नाम बदलने से लाभ होगा। ये कविताएं अखिलेश नाम के साथ मैच नहीं करतीं।

कई दिन लग कर मैंने अपने लिए चार नाम खोजे। इस बीच कुछ अंश कालिक मित्रों ने बछड़ा उदंत, यमन कल्याण आदि नाम उपहास में सुझाए। लेकिन मैं नाम परिवर्तन के विचार से एकदम सहमत था और जुटा हुआ था नाम की खोज में। मैंने अपने लिए चार पांच नाम खोजे। जो क्रम से इस प्रकार हैं: एक शिल्प रत्न, दूसरा शालिहोत्र, तीसरा धूसर चौथा बोधिसत्व, पांचवां नील मेघ। इन सबके सामने मिश्र जुड़ा था। धूसर मैंने धूमिल की नकल पर खोजा था और बोधिसत्व तक मैं दूधनाथ जी द्वारा सुझाए गौतम बुद्ध और बुद्ध देव के धागे से पहुंचा था। बोधिसत्व मिश्र, धूसर मिश्र, शिल्परत्न मिश्र, शालिहोत्र मिश्र, नीलमेघ मिश्र।

ये सारे नाम लेकर एक मीटिंग हुई मार्कण्डेय जी के यहां, जहां मार्कण्डेय जी और दूधनाथ जी ने बोधिसत्व को तय किया, वह भी उसमें से मिश्र हटा कर। दोनों का तर्क था जैसे नागार्जुन या त्रिलोचन आगे जाति नहीं लिखते वैसे ही यहां भी जाति न लिखा जाए। मुझे भी यह सब अच्छा लग रहा था। मैंने अपने को अखिलेश कुमार मिश्र से बोधिसत्व होते देख रहा था! और उससे भी अधिक यह देख रहा था कि मेरी कविताएं जनवादी और मार्क्स वादी हैं……

इसी कड़ी का अगला पड़ाव है मेरी कविताओं का आलोचना में प्रकाशन और पहली किताब का आना। किताब का नामकरण किसने किया यह जानना काफी रोचक रहेगा। आगे इसपर भी बात करूंगा कि मेरे नाम बदले जाने पर अश्क जी और जगदीश गुप्त जी के साथ केशव चन्द्र वर्मा जी, अमरकांत जी, लक्ष्मी कांत वर्मा जी और मेरे घर के लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी!

क्रमशः

नोट: नाम बदलाव के समय ऐसा था कुछ कुछ मैं! (सबसे ऊपर की फोटो)

पिछला भाग…

इलाहाबाद के किस्से (पार्ट-3) : दूधनाथ सिंह के हाथों मेरे बदले गए नाम का प्रथम अध्याय शुरू हुआ!

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