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इलाहाबाद के किस्से (पार्ट-3) : दूधनाथ सिंह के हाथों मेरे बदले गए नाम का प्रथम अध्याय शुरू हुआ!

मैंने अश्क जी से कहा कि नीलाभ जी तो मिल ही नहीं रहे तो उन्होंने कहा कि तुम हिंदी विभाग में दूधनाथ सिंह से मिलो। जैसे आजकल तुम आ रहे हो इसी तरह पहले यहां दूधनाथ आया करता था। मैं उसकी रचनाओं पर भी काम कर चुका हूं। और उसकी किताब आत्महंता आस्था मेरे प्रकाशन से प्रकाशित है। अश्क जी पीढ़ियों के निर्माता थे। उनके घर धर्मवीर भारती और कमलेश्वर आदि की दीक्षा हुई है…

बोधिसत्व-

कविताएं लेकर दिन भर इलाहाबाद में भटकना एक मात्र काम था जैसे!

अश्क जी मेरे लिए एक मात्र आश्रम और आश्रय दोनों हो गए थे। इस बीच में इतना बदलाव हुआ कि उनके साथ बात चीत में मैं कभी-कभार कुछ कवियों का नाम ले पाता था। कई बार वे नाम या कविताएं अनावश्यक और बचकानी होती थीं। एक दिन तो ऐसा हुआ कि वे फ़ैज़ की चर्चा के साथ फ़ैज़ के परिवार का हाल चाल ले रहे थे। मैं पहली बार किसी से किसी विदेशी लेखक का कुशल क्षेम लेते पाया। मैंने अश्क जी से पूछा कि वे लोग तो पाकिस्तान में हैं और आप यहां। अश्क जी ने कहा कि साहित्य में क्या भारत क्या पाकिस्तान। साहित्य की सीमा नहीं होती। उन्होंने बताया कि वे बेनजीर, मंटो की बेटियों और पता नहीं किससे किस्से निरंतर बात चीत करते रहते हैं। उनका आधा हिस्सा पाकिस्तान में है। उस बात चीत के बाद वे उदास से हो गए।

मैं अश्क जी से मिलता रहा। अश्क जी मुझे अन्य विधाओं को पढ़ने की ओर अग्रसर करते रहे।

एक दिन अश्क जी ने कहा कि तुमको देश और दुनिया का समूचा इतिहास सभ्यता के बड़े छोटे बदलाव इन सबसे ठीक से परिचित होना चाहिए। उनका कहना था कि इतिहास न जानने वाले कवि लेखक अक्सर मनमानी बातें करते पाए जाते हैं। सभ्यता का इतिहास व्यक्ति को अपने समय समाज को देखना सिखाता है।

अश्क जी के प्रभा मंडल में मैं पूरी तरह घिर चुका था। मेरे अक्षर तक उनकी लिखाई की तरह होसे गए थे। मैं उनकी नकल पर कुर्ता पायजामा और सदरी पहनने लगा था। पैरों में नागरा जूते। एक दिन अश्क जी ने कहा कि तुम अल्लापुर से आते हो तो वहां सत्य प्रकाश मालवीय जी के घर के सामने एक पान की गुमटी है। वहां से पान लेकर आया करो। सत्य प्रकाश मालवीय का घर बाघंबरी रोड पर था। मैं अश्क जी के बताएं तंबाकू वाले पान लेकर हाजिर हो जाता और देश दुनिया के साहित्य में उनके साथ चहल कदमी करता। उनका दायरा पाकिस्तान के साहित्यकारों के साथ उर्दू के सभी लोगों के साथ जुड़ा था। वे उर्दू हिंदी के अंतिम शामिल कवि लेखक हैं मेरी जानकारी में। वे उर्दू और हिंदी दोनों में लिखते थे।

अश्क जी ने एक दिन कहा कि तुम कहानी या उपन्यास क्यों नहीं लिखते? मैंने कहा कि कहानी लिखने का मन नहीं करता। अश्क जी ने कहा कि यह और कुछ नहीं तुम आलसी हो! कहानी और उपन्यास में लिखना बहुत पड़ता है। प्लॉट को निभाना पड़ता है। यदि लिखने का सुख चाहते हो तो उपन्यास और कहानी लिख कर देखो। फिर उन्होंने गिरती दीवारें के कई खंडों के लेखन का इतिहास बताया। उनका कहना था कि यह वार एंड पीस और सरस्वती चंद्र के बाद संसार का सबसे बड़ा उपन्यास है। मेरी रुचि नहीं थी फिर भी अश्क जी ने कैसे उपन्यास का प्लॉट तैयार करें इस पर कई बैठकों में बताते-समझाते रहे। उनका कहना था कि कोई भी पात्र किसी भी युग और परिवेश में पहुंचाए जा सकते हैं। फिर उन्होंने एक किताब का नाम बताया जिसमें लेखन कला पर अनेक निबंध थे। नाम था “लेखन कला और रचना कौशल”।

उन दिनों रूसी साहित्य की किताबें इलाहाबाद में मिल जागृत थीं। यह किताब भी आसानी से मिल गई। लेकिन मेरी खरीदी प्रति आज भी राजीव तिवारी के पास है। राजीव ने कहा कि सप्ताह भर में लौटा देंगे लेकिन आज तक वह सप्ताह पूरा नहीं हो पाया है। राजीव मेरी किताब अपने पास रखो और उसका कुछ सदुपयोग करें यह बेहतर है। वह किताब आज के सब युवाओं को पढ़ने के लिए मैं प्रस्तावित करता हूं।

आगे एक दिन अश्क जी मुझे कहानी और उपन्यास की रचना प्रक्रिया समझने लगे। वे मुझे पता नहीं क्यों अधिकतम समझा देना चाहते थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज नहीं तो हो सकता है कल कभी कहानी या उपन्यास या नाटक एकांकी लिखो या कभी कोई महाकाव्य लिखा या बड़ी कविता लिखे तो बिना चरित्र को समझे लिखना असंभव हो जायेगा। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति का एक अपना गुणधर्म और चरित्र होता है। यह चरित्र शहर नगर और गांव देश का भी होता है। अपने आसपास के लोगों और स्थितियों पर निगाह रखो। ऐसे जैसे तुम लेखक नहीं समाज में छुपे गुप्तचर हो।

धीरे-धीरे अश्क जी से मेरी अच्छी बातचीत होने लगी थी। उनसे मिले लगभग साल डेढ़ साल होने को आया। लेकिन लगता था कि मैं अश्क जिनको सैकड़ों साल से जानता हूं। एक दिन उन्होंने कहा कि मैं उनका एक इंटर व्यू करूं। मैंने कहा कि मैंने आपको बहुत पढ़ा नहीं है। अंजो दीदी, शहर में घूमता आईना और कुछ एकांकी ही पढ़ी हैं। अश्क जी ने कहा कि प्रश्न वे तैयार करवा देंगे। मैं उन प्रश्नों के आधार पर उनका इंटर व्यू कर लूं। जालंधर की किसी पत्रिका को यह इंटर व्यू चाहिए। यह उर्दू और हिंदी दोनों में प्रकाशित होगा। मैं एक तरह से मान गया था लेकिन दो तीन दिन बाद उन्होंने बताया कि उर्दू का कोई बड़ा आलोचक वह इंटर व्यू कर रहा है। उन्होंने कहा कि वे मुझे कोई इंटर व्यू दे देंगे।

अब तक अश्क जी मेरी करीब दस कविताओं पर काम कर चुके थे और आगे वे कविताएं जस की तस मेरे पहले कविता संग्रह में संकलित भी हुईं। आज कोई हो तो आराम से वे कविताएं उस की हो जाती। अश्क जी से सीख कर कविता को सही करने की तकनीकी का अभ्यास मैंने भी कुछ-कुछ कर लिया था। अश्क जी ने कहा कि कविता हड़बड़ी का काम नहीं है। यह मैराथन दौड़ने की तरह है। वे कहते थे कि कई लोग बड़ा पद पा कर लिखना छोड़ देते हैं। कई कवि एक कविता संग्रह वाले मिलेंगे। उसके जीवन को देखो आखिर उनका लिखना क्यों छूट गया होगा, इसपर विचार करना चाहिए।

सितंबर 1987 की बात होगी। अश्क जी ने कहा कि तुमको साहित्य में आगे जाना है तो तुम किसी लेखक संघ को ज्वाइन कर लो। लेखक संघ अपने कवियों और अपने लेखकों को आगे बढ़ाते हैं। अश्क जी ने संगठित होने में मेरी भलाई मुझे समझाई और कहा कि मुझे मार्क्स के सिद्धांतो का आध्ययन करना चाहिए। अब तक मैं मार्क्स वाद को केवल राजनीति के लिए विचार के रूप में देखता था। मेरे लिए यह नई बात थी। मार्क्स के सिद्धांत साहित्य में भी प्रभावी हो सकते हैं, खास कर लेखन में इसका कोई भान न था मुझे। मैंने सिविल लाइंस के एक बुक स्टोर से मार्क्स और एंगिल्स की किताब जो कि “साहित्य और कला” नाम से थी। जाकर खरीदी लेकिन मेरी रुचि बनी नहीं। और मैंने पढ़ा भी नहीं।

अश्क जी के कहने पर मैं फिर गुड्डा यानी नीलाभ जी से मिला। उस समय नीलाभ जन संस्कृति मंच में बहुत गहरे से सक्रिय थे। जब जन संस्कृति मंच से जुड़ने के लिए नीलाभ जी से उनके नीलाभ प्रकाशन में मैं मिला तो मुझे याद है उनके साथ कवि देवी प्रसाद मिश्र, चित्रकार अशोक भौमिक, कवि अनुवादक हरीश चंद्र अग्रवाल और संभवतः विमल वर्मा बैठे थे। नीलाभ जी मुझे पहचानते थे। उन्होंने कहा कि अभी वे किसी विमर्श में मुब्तिला हैं तो मैं किसी और दिन आ जाऊं। दो एक दिन बाद मैंने नीलाभ जी से मिलने की फिर कोशिश की तो वे बोले आज दिल्ली जा रहा हूं। हम सोमवार को मिलेंगे। फिर जन संस्कृति मंच से जुड़ने जोड़ने वाला वह सोमवार आज तक न आया। आगे जब मैं जनवादी लेखक संघ से जुड़ गया तो नीलाभ जी ने मेरी मूर्तियों की एक प्रदर्शनी रखी जिसमें मैं हां कह कर भी जा नहीं पाया। वह मेरा उनसे वादा तोड़ना एक लंबी गाथा है। उसपर आगे कभी बात करूंगा।

मैंने अश्क जी से कहा कि नीलाभ जी तो मिल ही नहीं रहे तो उन्होंने कहा कि तुम हिंदी विभाग में दूधनाथ सिंह से मिलो। जैसे आजकल तुम आ रहे हो इसी तरह पहले यहां दूधनाथ आया करता था। मैं उसकी रचनाओं पर भी काम कर चुका हूं। और उसकी किताब आत्महंता आस्था मेरे प्रकाशन से प्रकाशित है। अश्क जी का कथन इलाहाबाद का एक बड़ा साहित्यिक सच है। अश्क जी पीढ़ियों के निर्माता थे। उनके घर धर्मवीर भारती और कमलेश्वर आदि की दीक्षा हुई है। फिलहाल अश्क जी को अल्लापुर से खुसरो बाग तक मेरा दौड़ लगाना, आना जाना अच्छा नहीं लगता था। तब तक मैं दूधनाथ जी को विभाग में दूर-दूर से देख भर पाया था। वे बीए प्रथम वर्ष की कक्षाओं को नहीं पढ़ाते थे।

अश्क जी ने विश्व विद्यालय में तीन लोगों से मिलने को कहा। एक दूधनाथ सिंह जी, दूसरे जगदीश गुप्त जी और तीसरे विपिन अग्रवाल जी। सबसे पहले मैं विपिन अग्रवाल जी से मिलने साइंस फैकेल्टी गया। उन्होंने पता देकर घर आने को कहा। मैं दो तीन दिन बाद उनके घर गया। पांच सात मिनट की बात चीत में विपिन जी ने दो तीन बार मुझसे पूछा कि मैं क्या मदद चाहता हूं। मैंने बताया कि मैं कविता लिखता हूं। अश्क जी ने आपसे मिलने को कहा है। विपिन जी ने कहा कि तुम डॉ. सत्य प्रकाश मिश्र से मिलो। वे हिंदी विभाग में लेक्चरर हैं। फिर मैं विपिन जी से मिलने उनके घर नहीं गया। उस छोटी सी मुलाकात में मेरी कई कविताएं पढ़ कर विपिन जी ने मुझसे यह जरूर कहा कि तुम पढ़ो थोड़ा। हिंदी कविता के विकास को जान लो। उन्होंने मुझसे मेरा दागिस्तान पढ़ने की सलाह दी। मुझे विपिन जी की बात कुछ समझ में आई कुछ नहीं समझ में आई। लेकिन वे मुझे बहुत अच्छे लगे। बहुत अच्छी सी चाय के साथ जो नान खटाई बिस्किट उन्होंने खिलाया था वह आज भी याद है। उन्होंने समय कम दिया लेकिन स्नेह बहुत दिया। उन्होंने एक बात कही कि मैं मिलने जुलने की जगह अपने काम करूं और पत्र पत्रिकाओं में भेज कर कविताएं प्रकाशित करवाऊं।

विपिन जी की सलाह पर मैंने मेरा दागिस्तान खोजी जो उस समय नहीं मिली। आगे जाकर यह किताब मिल पाई। उसी सप्ताह मैं विपिन जी की सलाह पर हिमांशु रंजन जी से अमृत प्रभात अख़बार में जाकर मिला। मेरे पास तब अस्सी से सौ कविताओं की एक विचित्र सी फाइल होती थी। मैं किसी के पास जाता तो वह सारी कविताएं लेकर जाता। विपिन जी के सामने वह फाइल रख चुका था। मैं सबके सामने वह भारी भरकम फाइल रख देता। अक्सर लोग उस फाइल को देख कर मुझे देखते और पहली दो चार कविताओं के बाद आगे नहीं बढ़ते। तब मैं सामने वाले की मुश्किल एकदम नहीं समझता था। मुझे लगता कि इस तरह पढ़ने के लिए कहना मेरा “कवि अधिकार” है लेकिन यह तो एक तरह से यातना देने जैसा था। लेकिन मैं तब कुछ समझता नहीं था।

दूसरी ओर अश्क जी को मेरी “बकरी” कविता बहुत पसंद थी। वे अक्सर उसकी तारीफ कर देते। उस बकरी कविता में वे कबीर से जुड़ी हिंदी कविता की पूरी परम्परा देखते थे। उनको मेरी “सिकंदर” कविता भी बहुत पसंद थी। उनकी तारीफों से मेरा उत्साह बना हुआ था और मैं बिना कहीं छपे हुए भी लगातार लिख रहा था। बिना किसी लेखक संघ का सदस्य हुए भी अपने देसी ढंग से सक्रिय था। यहां लिख देना अच्छा लगेगा कि मेरी बकरी कविता एक समय इलाहाबाद में हिट थी। बनारस के कवि मित्र आशीष विद्यार्थी इस बात को गवाही देंगे।

उस शाम हिमांशु भाई ने उसी फाइल से तीन कविताएं देने को कहा। मैंने वहीं अमृत प्रभात के दफ्तर में ही जहां एनआईपी के स्वामी की सफेद आवक्ष प्रतिमा लगी थी, वहीं उसके समीप लगे एक बेंच पर बैठ कर तीनों कविताओं की कॉपी की और उनको देकर आया। हिमांशु भाई ने एक चाय पिलाई और जल्दी छापने के लिए भी कहा। हालाकि वे कविताएं कभी वहां न छपी न मुझ तक लौट कर आईं लेकिन इस सब के बावजूद न मैं रुका न लिखना बंद किया और न मिलना जुलना ही बंद किया। हिमांशु भाई को दी कविताएं आलोचना में प्रकाशित हुईं और मेरे पहले कविता संग्रह में भी शामिल हुईं। यह आलोचना में छपना और किताब का प्रकाशित होना आगे लिखा जाएगा।

अश्क जी मेरे अकेले आधार बन कर मुझसे मिलते रहे। लेकिन वे बीमार रहने लगे थे। उनको बहुत तकलीफ़ देना अच्छा न लगता। आगे उन्होंने फिर लेखक संगठन से जुड़ने की बात की। उन्होंने कहा कि अपने समय के संगठनों से जुड़ने से तुम अनेक लेखकों से आसानी से जुड़ जाओगे।

सितम्बर की ही किसी तारीख को मैं जगदीश गुप्त जी से हिंदी विभाग में मिला। उनको बताया कि अश्क जी ने आपसे मिलने को कहा है। उन्होंने अश्क जी का हाल चाल पूछा और मुझसे मेरी उस फ़ाइल में से मेरी चुनी हुई कविताएं देने को कहा। यह चुनी हुई कविता चुनना मेरे लिए एक दण्ड की तरह था। मुझे मेरी हर कविता चुनी हुई लगती थी तब। मैंने खूब विचार किया लेकिन कविता कोई भी चुन न पाया तो आधे के करीब कविताएं दो तीन दिन में कॉपी की और एक छोटी दुबली फाइल बना कर जगदीश जी को दे आया।

फाइल पर मोटे अक्षरों में लिखा था “कवि अखिलेश कुमार मिश्र की कविताएं” बी ए प्रथम वर्ष! (सबसे ऊपर)

आगे यह नाम बदला जाना है। अभी नाम बदलने वाले दूध नाथ सिंह जी से मेरी मुलाकात न हुई है! जल्दी ही वे मिलेंगे और मैं अचानक से जनवादी और मार्क्स वादी और प्रगतिशील हो जाऊंगा!

नोट: अश्क जी के हाथ से दुधारी कविताओं की फाइल अभी नहीं मिली है। यहां दो फोटो हैं
एक में दूध नाथ जी की एक पंक्ति का संदेश है मार्कण्डेय जी के नाम और दूसरे में मेरे नाम अखिलेश कुमार मिश्र के ऊपर बगल में दूध नाथ जी के सुलेख में लिखा है “बोधिसत्व की कविताएं”

क्रमशः

पिछला भाग…

इलाहाबाद के किस्से (पार्ट-2) : अश्क जी से दीक्षा और मेरे नाम का बदला जाना

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