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अमीश देवगन के शो में लाइव गाली गलौज, देखें वीडियो

भारतीय दर्शकों को टीवी पर यही सब देखना बाकी रह गया था, वो भी लाइव। गाली गलौज, माँ बहन और लात जूता। नीचे वीडियो देखिए। जबर्दस्त तरीके से वायरल है। भाजपा वाले कांग्रेस पर हावी हैं। उधर कांग्रेसी समर्थक आलोक शर्मा की गाली पर बलिहारी हैं। लेकिन एक पक्ष और है जो कह रहा है की टीवी माध्यम पर इस तरह की भाषा शब्दावली नहीं होनी चाहिए।


मुकेश माथुर-

एक्स (पूर्व में ट्वीटर) ने एआई वीडियो पोस्ट करने पर कड़ा कदम उठाने की पॉलिसी जारी की है लेकिन नेशनल टेलीविजन पर कांग्रेस के प्रवक्ता का गाली देते और एक एक्स सर्विसमेन के हल्का बोलते का यह वीडियो खतरे में नहीं डालेगा। वीडियो असली है।


आवेश तिवारी-

अमीश देवगन के शो पर गाली गलौज हो गई है। होली के वक्त किसी को गाली का बुरा नहीं मानना चाहिए। वैसे भी Alok sharmaa icc भाई का लहजा लाजवाब रहा है, एकदम संगीतमय, हृदय को बेधने वाला। टुच्चों को जवाब देने का यकीनन यही सही तरीका है।

AMISH DEVGAN तुम बच गए बे। अफसोस जाहिर करो कि तुम लपेटे में नहीं आए। तुम गाली खाते तो अंबानी जी तुम्हारा प्रमोशन कर देते।


गाली प्रकरण पर कांग्रेस प्रवक्ता आलोक शर्मा ने क्या लिखा है-पढ़ें

इज़राइल और ईरान जैसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर देश के मीडिया का यह कहना कि “कांग्रेस छाती पीट रही है” या “विपक्ष परेशान है” यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद के गिरते स्तर का प्रमाण है। जब बात इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव की हो, जब पूरी दुनिया शांति, कूटनीति और रणनीतिक संतुलन की बात कर रही हो, तब भारत के विपक्ष की जायज़ चिंता को उपहास में बदल देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

विपक्ष सवाल पूछेगा, यही उसका संवैधानिक धर्म है। अगर भारत की विदेश नीति, हमारे राष्ट्रीय हित, खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा, और ऊर्जा आपूर्ति जैसे गंभीर विषयों पर सरकार से स्पष्ट रुख माँगा जाता है, तो उसे “परेशानी” या “छाती पीटना” बताना दरअसल जवाबदेही से भागना है। असहमति लोकतंत्र की ताकत होती है, कमजोरी नहीं।

आज जरूरत है परिपक्व बहस की, तथ्यों पर आधारित चर्चा की, और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखने की। लेकिन जब मीडिया का एक वर्ग विश्लेषण छोड़कर व्यंग्य और ट्रोलिंग की भाषा अपनाता है, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की गरिमा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। देश यह देख रहा है कि किस तरह गंभीर कूटनीतिक संकट को भी राजनीतिक तंज़ और निम्न स्तर की शब्दावली में बदल दिया जा रहा है।

हम स्पष्ट कहना चाहते हैं, सवाल उठाना देशविरोध नहीं है, बल्कि देशहित में जिम्मेदारी निभाना है। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में विचारों की असहमति को सम्मान मिलना चाहिए, न कि उसे मज़ाक बनाकर दबाने की कोशिश। राष्ट्रीय मुद्दों पर संवाद गरिमा से होना चाहिए।

मीडिया द्वारा कांग्रेस पार्टी और देश के विपक्ष के लिए इस्तेमाल किए गए “छाती पीटना” जैसे शब्दों के प्रयोग की मैं घोर निंदा करता हूँ। यह भाषा न केवल निम्न स्तर की है, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भी विरुद्ध है।

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