पत्रकारों के अधिकारों को बचाने वाले अदालत के फैसलों का स्वागत
दिल्ली की एक श्रम अदालत ने अखबार नवभारत को आदेश दिया है कि वह वरिष्ठ पत्रकार अनिल दुबे को ग्रेच्युटी का भुगतान करे। पत्रकार संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है।
अनिल दुबे 17 साल तक नवभारत के दिल्ली ब्यूरो में विशेष संवाददाता रहे, लेकिन 2022 में बिना कोई नोटिस दिए उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। वेतन तो मिला, लेकिन ग्रेच्युटी नहीं दी गई। यह मामला दिखाता है कि मीडिया कंपनियां अक्सर कर्मचारियों का पूरा हक़ नहीं देतीं।
दुबे ने दो साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, और 19 फरवरी 2025 को श्रम आयुक्त ने नवभारत को ₹98,076 ग्रेच्युटी देने का आदेश दिया, साथ ही 10% वार्षिक ब्याज भी लगाने को कहा। मीडिया कंपनियों में कर्मचारियों को उनका पूरा हक़ न देना आम बात हो गई है।
सिर्फ नवभारत ही नहीं, बल्कि कई मीडिया संस्थानों में वेतन में कटौती, महंगाई भत्ता और PF की ग़लत गणना, TDS में देरी जैसी समस्याएँ हैं। कई राज्यों में मीडिया मालिकों के ख़िलाफ़ केस चल रहे हैं, क्योंकि वे निकाले गए कर्मचारियों को उनका हक़ नहीं देते। अगर केंद्र सरकार नए श्रम कानून लागू करती है, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
पुराने पत्रकारों के लिए हालात और भी बुरे हैं। रिटायरमेंट के बाद बहुत से पत्रकार आर्थिक रूप से कमज़ोर हो जाते हैं और उनके पास अदालत में लंबी लड़ाई लड़ने के पैसे नहीं होते। ऐसे में वे सिर्फ वही स्वीकार करने को मजबूर होते हैं, जो नियोक्ता ‘अच्छे दिल’ से देना चाहता है।
टीवी पत्रकार भी इसी समस्या से जूझ रहे हैं। टीवी इंडस्ट्री संगठित होने के बावजूद वहां मज़दूर संघ (ट्रेड यूनियन) नहीं हैं, जो कर्मचारियों की लड़ाई लड़ सकें।
अगर कोई मीडिया कंपनी दिवालिया हो जाए, तो कर्मचारियों का बकाया फँस जाता है। UNI न्यूज एजेंसी इसका बड़ा उदाहरण है, जहाँ कर्मचारियों ने ₹100 करोड़ से ज़्यादा की लंबित सैलरी, PF और ग्रेच्युटी के दावे किए हैं। लेकिन समाधान होने के बावजूद शायद सिर्फ 25% रकम ही मिलेगी।
हम पत्रकारों के संघों के रूप में सभी पत्रकारों से अपील करते हैं कि वे अपने अधिकारों और लंबित बकाया के लिए आवाज़ उठाएँ।
गौतम लाहिरी
(अध्यक्ष, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया)
सुझाता मधोक
(अध्यक्ष, दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स)
प्रेस विज्ञप्ति


