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इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के इन चार सवालों पर “मेटा” ने चुप्पी साधी!

Close-up portrait of a man outdoors with mountains in the background, wearing a dark jacket.

प्रमोद रंजन-

फेसबुक को चलाने वाली कंपनी मेटा ने IFF के सवालों पर चुप्पी साध ली है।

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) भारत में काम करने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था है। यह इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता और आम लोगों के डिजिटल अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी तथा नीतिगत स्तर पर काम करती है।

IFF ने 22 जुलाई को मेटा से ये चार सवाल पूछे थे:

पहला : क्या दिल्ली के छात्र आंदोलन से जुड़ी पोस्टों की पहुंच जानबूझकर कम की जा रही है? क्या ऐसे अकाउंटों पर भी किसी प्रकार की पाबंदी लगाई गई है?

दूसरा : इन आंदोलनों से जुड़ी रीलों को ‘संवेदनशील सामग्री’ क्यों बताया जा रहा है? मेटा ने यह कार्रवाई अपने किस नियम के तहत की है?

तीसरा : क्या मेटा ने यह सब भारत सरकार या किसी सरकारी विभाग के कहने पर किया है? क्या सरकार ने सहयोग पोर्टल के माध्यम से या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत कोई कानूनी नोटिस भेजा था? और,

चौथा : जिन लोगों की पोस्टों या अकाउंटों पर पाबंदी लगी है, वे इसकी शिकायत कहां कर सकते हैं? यह पाबंदी हटवाने के लिए उनके पास क्या रास्ता है?

मेटा ने अब तक इन सवालों का कोई जवाब नहीं दिया है।

इसलिए अगर आप समझते हैं कि सोशल मीडिया आपको अपनी बात कहने की आजादी देता है तो आप गलत हैं।

वास्तव में अब आपके सामने सिर्फ राजसत्ता नहीं है। बल्कि दो सत्ताएं हैं, जिनसे आपको सवाल पूछने हैं। एक सरकार और दूसरी बिग टेक—यानी मेटा और एक्स जैसी विशाल तकनीकी कंपनियां।

ये कंपनियां तय करती हैं कि आपकी कौन-सी बात कितने लोगों तक पहुंचेगी, कौन-सी बात दबा दी जाएगी और कौन-सी बात आपकी स्क्रीन से पूरी तरह गायब हो जाएगी। लेकिन वे अपने इन फैसलों के बारे में आपको कुछ बताने के लिए बाध्य नहीं हैं।

संघर्ष आसान नहीं हुआ है। वह पहले से अधिक जटिल और कठिन हो गया है।

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