नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार अनिल दुबे ने नवभारत समाचार पत्र समूह के खिलाफ एक बड़ी कानूनी लड़ाई जीत ली है। 17 वर्षों तक नवभारत महाराष्ट्र के दिल्ली ब्यूरो में स्पेशल कॉरेस्पोंडेंट के रूप में कार्यरत रहे अनिल दुबे को 2022 में बिना किसी औपचारिक रिलीज के मौखिक रूप से नौकरी से हटा दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अपनी ग्रेच्युटी मांगी, लेकिन संस्थान ने यह कहकर इनकार कर दिया कि ग्रेच्युटी वेतन के साथ दी जा चुकी है। अनिल दुबे ने कंट्रोलिंग अथॉरिटी अंडर पीजी एक्ट, 1972 एंड अस्सिटेंट लेबर कमिश्नर (सेंट्रल) नई दिल्ली में अपील की। यह मामला लगभग 2 वर्ष तक चलता रहा। अंततः एएलसी ने नवभारत समाचार पत्र समूह की उस दलील को ग्रेच्युटी एक्ट 1972 के तहत खारिज कर दिया और नवभारत प्रेस कंपनी को भुगतान का आदेश दिया है।
अनिल दुबे ने इसके खिलाफ लेबर कमिश्नर के समक्ष अपील दायर की थी, जो दो साल तक चली। 19 फरवरी 2025 को आए फैसले में लेबर कमिश्नर और कंट्रोलिंग अथॉरिटी ने नवभारत समाचार पत्र को निर्देश दिया है कि वे अनिल दुबे को ₹98,076 की ग्रेच्युटी राशि 10% वार्षिक ब्याज सहित भुगतान करें।
नवभारत समाचार पत्र समूह पत्रकार गैर पत्रकार कर्मचारियों का शोषण करता रहा है और पत्रकारों को वेज बोर्ड की सिफारिशों के तहत वेतन देना दूर की बात है, वह मिनिमम वेतन भुगतान भी नहीं करता। ग्रेच्युटी जो किसी भी सेक्टर के कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है, उसे भी वह नहीं देता। कर्मचारी के सेवा समाप्ति अथवा उसे निकालने के बाद वह ग्रेच्युटी को यह करके देने से इनकार करते रहे हैं कि उन्हें वेतन के साथ भुगतान कर दिया गया है। इस पर लेबर कमिश्नर ने अपने फैसले में कड़ी टिप्पणियां की हैं।
पत्रकारों के शोषण का मामला
इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए अनिल दुबे ने कहा “क्षेत्रीय अखबारों में पत्रकारों का लंबे समय से आर्थिक शोषण किया जा रहा है। उनका मूल वेतन बेहद कम था, और अब ग्रेच्युटी जैसा कानूनी हक की राशि का भुगतान देने में भी संस्थान आनाकानी कर रहा था। उन्होंने कहा, “यह जीत सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि उन सभी पत्रकारों की है, जिन्हें उनका हक देने से वंचित रखा जाता है। मैं चाहता हूं कि यह खबर उन सभी पत्रकारों तक पहुंचे, जो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ताकि शोषण, अत्याचारों और लोकतंत्र की रक्षा के लिए खबर लिखते रहे पत्रकार भी अपनी लड़ाई लड़ सकें और अपना हक मांग सकें”।
यह मामला उन सभी मीडिया संस्थानों के लिए एक सख्त संदेश है, जो अपने कर्मचारियों को उनके कानूनी अधिकारों से वंचित रखते हैं। अनिल दुबे ने कहा “मीडिया का अब पूरी तरह से कॉरपोरेटाइजेशन हो चुका है। सत्ता में उसकी पैठ गहरी हो गई है। इसी का ही परिणाम है कि वह संसद से बने कानूनों और माननीय अदालतों के फैसलों को भी नहीं मानता और ग्रेच्युटी लेने के लिए मुझे दो वर्ष से अधिक समय तक न्याय का दरवाजा खटखटाना पड़ा”।
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(नोट: यह खबर न्यायालय के फैसले और आधिकारिक दस्तावेजों पर आधारित है। आगे की कानूनी कार्यवाही या नवभारत प्रबंधन की प्रतिक्रिया आने पर अपडेट दी जाएगी।)







