नई दिल्ली | अभी-अभी खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है- क्या वह YouTube और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अश्लील कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाने जा रही है? यह सवाल पहली नजर में नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में एक सामान्य हस्तक्षेप लग सकता है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव मीडिया की स्वतंत्रता पर भी पड़ सकते हैं।
‘अश्लीलता’ की परिभाषा और सरकार की सेंसरशिप नीति
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत में डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सरकार की निगरानी में हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय पहले ही IT नियम 2021 के तहत डिजिटल मीडिया को रेगुलेट करने के लिए दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। इन नियमों में सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह “आपत्तिजनक” कंटेंट को हटाने का निर्देश दे सके।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि ‘अश्लीलता’ की परिभाषा कौन तय करेगा? क्या यह केवल यौन सामग्री तक सीमित रहेगा, या फिर सरकार इसे किसी भी असहज करने वाली पत्रकारिता, राजनीतिक व्यंग्य या स्वतंत्र विचारों को दबाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है?
पिछले मामलों से सबक : क्या मीडिया की आवाज़ दबाने की कोशिश होगी?
भारत में पिछले कुछ वर्षों में सेंसरशिप की घटनाएं बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए—
2022 में बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री “इंडिया: द मोदी क्वेश्चन” को बैन कर दिया गया।
सरकार ने कई स्वतंत्र पत्रकारों के ट्विटर अकाउंट निलंबित कराए।
यूट्यूब चैनलों को “राष्ट्र विरोधी सामग्री” के आधार पर ब्लॉक किया गया।
इतिहास बताता है कि जब भी सरकार को डिजिटल कंटेंट पर नियंत्रण का अवसर मिला, उसने केवल ‘अश्लीलता’ ही नहीं, बल्कि आलोचनात्मक पत्रकारिता और असहमति को भी दबाने के प्रयास किए।
सोशल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता पर खतरा
आज के दौर में यूट्यूब और सोशल मीडिया स्वतंत्र पत्रकारों और वैकल्पिक मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। मुख्यधारा की मीडिया पर कॉर्पोरेट और राजनीतिक दबाव के कारण कई पत्रकार डिजिटल मीडिया की ओर रुख कर चुके हैं। यदि सरकार को यूट्यूब या अन्य प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट को नियंत्रित करने की अधिकारिक शक्ति मिलती है, तो यह न केवल स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है।
क्या सुप्रीम कोर्ट मीडिया स्वतंत्रता के पक्ष में स्टैंड लेगा?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(2) के तहत “अश्लीलता, नैतिकता और राष्ट्रीय सुरक्षा” जैसे कारणों से सीमित की जा सकती है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने बार-बार ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और ‘अश्लीलता’ जैसे कारणों का हवाला देकर कई मीडिया रिपोर्ट्स, वेबसाइट्स और डॉक्यूमेंट्रीज़ पर प्रतिबंध लगाया है।
अब सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सरकार को मात्र अश्लील कंटेंट तक सीमित रहने की सलाह देगा, या फिर इसका दायरा इतना बढ़ जाएगा कि सरकार को मीडिया सेंसरशिप के लिए एक नया औजार मिल जाएगा?
श्याम मीरा सिंह-
अगर सरकार इसे “संस्कृति की रक्षा” के नाम पर सेंसरशिप लागू करने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल करती है, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चिंता का विषय हो सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है—क्या यह केवल अश्लीलता तक सीमित रहेगा, या इसका इस्तेमाल व्यापक इंटरनेट सेंसरशिप के लिए किया जाएगा?
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