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सियासत

भव्य राम मंदिर बनने में नींव का पत्थर साबित हुआ फ़ैज़ाबाद का यह कलेक्टर और अयोध्या का ये सिटी मेजिस्ट्रेट!

अमित चतुर्वेदी-

बाबरी मस्जिद का आज से लगभग सौ वर्ष पुराना फ़ोटो….

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फ़ैज़ाबाद के तत्कालीन कलेक्टर के के नायर और अयोध्या के तत्कालीन सिटी मेजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह के चलते ही अब यहाँ भव्य राम मंदिर बनेगा। नायर केरल के रहने वाले थे और 1930 बैच के ICS ऑफ़िसर थे और गुरुदत्त सिंह यूपी के PCS ऑफ़िसर थे। इन दोनों ने इस विषय में जो किया वो इस फ़ैसले का बहुत बड़ा आधार बना। हालाँकि के के नायर बाद में इस्तीफ़ा देकर जनसंघ से चुनाव लड़े और संसद भी पहुँचे, उनकी पत्नी भी तीन बार सांसद चुनी गयीं, सिर्फ़ इतना नहीं बल्कि उनके इस कारनामे ने उन्हें इतना बड़ा हिंदू हृदय सम्राट बना दिया था कि उनका ड्राइवर तक चुनाव लड़कर विधायक बन गया।

अभय राम नाम के एक पुजारी जो बिहार का रहने वाला था और अयोध्या में रहता था, उसने गुरुदत्त सिंह (सिटी मेजिस्ट्रेट) को कॉन्फ़िडेन्स में लेकर एक योजनबद्ध तरीक़े से एक रात (23 दिसम्बर 1949) की रात चुप चाप राम भगवान की मूर्ति उस जगह रख दी जो आज रामलला विराजमान कहलाते हैं। इस पूरी योजना में मस्जिद के एक मुस्लिम गार्ड को भी शामिल किया गया था। ये काम सुबह तीन बजे अंजाम दिया गया, और ये कहा गया कि रामलला ख़ुद प्रकट हुए हैं। जगह तो पहले से ही विवादित थी, और पूरा संत समुदाय इस बात के लिए सैकड़ों साल से संघर्ष कर रहा था कि राम जी के जन्मस्थान पर बनाई गई मस्जिद अलग करके वहाँ मंदिर बनाया जाए। पूरे शहर में सुबह से ये बात आग की तरह फैल गई, हिंदू समाज के लोग भजन मंडलियाँ लेकर बाहर भजन गाने लगे, “भय प्रगट कृपाला दीन दयाला” से पूरा अयोध्या गूँजने लगा।

मुस्लिम समाज की ओर से FIR करवाई गई, मामला वैसे भी हाई प्रोफ़ाइल था, पूरे देश की धार्मिक आस्था से जुड़ा था तो बात नेहरु जी तक पहुँची, नेहरु जी ने तुरंत वो मूर्तियाँ वहाँ से हटाने का फ़रमान जारी किया। लेकिन कलेक्टर के के नायर ने साफ़ इंकार कर दिया, कलेक्टर ने जवाब दिया कि इससे दंगे भड़क जाएँगे। इसके बाद नेहरु ने फिर दुबारा मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत से मूर्तियाँ हटवाने के लिए कहा। दुबारा पंत ने कलेक्टर को फिर कहा कि मूर्तियाँ विधिवत पूजा अर्चना के साथ गर्भ गृह से निकलकर राम चबूतरे पर स्थापित करवा दी जाएँ। इस पर नायर ने एक चिट्ठी लिखकर जवाब दिया कि पूरे अयोध्या में एक भी ऐसा पुजारी मिलना असम्भव है जो रामलला की मूर्ति यहाँ से विस्थापित करवा दे, उन्होंने चिट्ठी में लिखा कि वर्तमान में यथास्थिति रखी जाए, और चूँकि प्रशासन मूर्तियाँ हटाने में असमर्थ है इसीलिए मामले को न्यायालय के माध्यम से सुलझाया जाए।

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इसके बाद उन्होंने ये भी लिखा कि उनसे तो ऐसा होना सम्भव नहीं अगर सरकार को लगता है कि कोई और कर सकता है तो वो उन्हें हटाकर दूसरा कलेक्टर ले आए। राज्य और केंद्र सरकारें सब समझ रही थीं, लेकिन उन्हें पता था, मामला गम्भीर है पूरे देश की आस्थाएँ जुड़ी हैं इससे, वरना शासन के लिए एक कलेक्टर को हटाना और मूर्तियाँ हटवाना कोई इतनी बड़ी बात नहीं थी।

घटना के दो साल बाद कलेक्टर ने ICS से इस्तीफ़ा दे दिया और बाद में वो बहराइच से चुनाव लड़े और संसद पहुँचे जहाँ उनकी मुलाक़ात नेहरु से हुई। नेहरु वैसे तो धर्मनिरपेक्ष थे लेकिन सच तो उन्हें भी पता ही था कि मस्जिद बाबर ने बनवाई थी और मंदिर तो सनातन काल से था उस जगह।

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इसी मामले में बाद में राजीव गांधी ने भी अशोक सिंघल की मदद की थी उन्हें एक क़ानूनी पहलू बताकर। राजीव गांधी ने अशोक सिंघल को ये बताया था कि हिंदू पक्ष की तरफ़ से मामला कमज़ोर है क्यूँकि हिंदू पक्ष आस्था को आधार बनाकर केस लड़ रहा है जबकि कोर्ट इसे ज़मीन का विवाद मानकर सुनवाई कर रहा है इसीलिए इसमें जब तक स्वामित्व की लड़ाई ना बनाया जाए हिंदू पक्ष का केस हारना तय है। इसके बाद हिंदू पक्ष की तरफ़ से इसमें रामलला विराजमान को व्यक्ति मानकर इस ज़मीन को उनके मालिकाना हक़ की लड़ाई बनाया गया।

और फिर जो हुआ वो इतिहास नहीं स्वर्णिम इतिहास है…

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