पापा गये, क्या शिखा और शिवम क्या अब जा पाएंगे स्कूल ?

बाराबंकी : चार दिन पूर्व मान्यता प्राप्त पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ सुरेन्द्र यादव की जिन्दगी पर बीमारी के साथ-साथ गुरबत ने मौत के हस्ताक्षर कर दिए। इस कलमकार के घर पर बीमारी ने हाहाकार मचा रखा था, परेशानियों का भंवरजाल था, दस वर्षीय बेटी व बेटे का स्कूल जाना बंद था। अब तो पापा भी नहीं रहे। ऐसे में यह यक्ष प्रश्न सामने है कि क्या शिखा व शिवम स्कूल जा पायेंगे। क्योंकि पत्रकार के जिन्दा रहते उसकी मदद के लिए कोई भी आगे न आया।

दूसरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने व दूसरों की परेशानियों को शब्दों में सजाकर खबर के रूप में प्रशासन व आवाम तक पहुंचाने वाले पत्रकार सुरेन्द्र यादव वास्तव में स्वयं खबर बनकर रह गये। जी हां पत्रकारिता को मिशन मानने वाले इस महारथी की कलम अब खामोश हो गयी। 2007 में मान्यता और उससे पूर्व लगभग 10 वर्ष पहले पत्रकारिता शुरू करने वाले सुरेन्द्र काफी मिलनसार थे। लेकिन जब उन्हें लीवर की बीमारी ने जकड़ा तो घर की आर्थिक स्थिति काफी बिगड़ गई। 

बीपीएल कार्ड धारक इस पत्रकार को व उसके परिवार को बीमारी ने आर्थिक रूप से निचोड़ डाला। वे अधिकारी व नेता जो कभी सुरेन्द्र के सामने अपनी खबर के लिए मिन्नत किया करते थे उन्होंने भी दुःख के इस साये को देखकर मुंह मोड़ लिया। घर के माहौल पर तो फांकाकशी हुई ही अलबत्ता 10 वर्षीय बिटिया शिखा व 5 वर्षीय पुत्र शिवम का स्कूल जाना भी बंद हो गया। इधर शनिवार को आपकी हालत बिगड़ी तो रविवार को पत्रकारिता का यह ईमानदार महारथी बीमारी व गुरबत के हाथों जिन्दगी को हारकर चल बसा। आज हालात बिल्कुल अलग हैं पत्नी मालती देवी को समझ में नहीं आता कि वह गृहस्थी का भार कैसे उठायेगी? जब उसके पति के जिन्दा रहते कोई रहनुमा इलाज में मदद के लिए आगे नहीं आया तो अब उसका मददगार कौन बनेगा? 

कुछ पूछने पर बस मालती आंसुओं में डूब जाती है। शिखा व शिवम अपने पापा की बात करते हैं तो लगे हाथ यह भी पूछ लेते हैं कि अंकल अब हम स्कूल जा पायेंगे, पढ़ पायेंगे या नहीं? हमारी फीस कौन देगा? ड्रेस कौन बनवायेगा? अब तो पापा भी नहीं है। इस संबंध में श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के संयोजक रिजवान मुस्तफा ने चर्चा करते हुए कहा कि ईमानदारी की मिशाल थे सुरेन्द्र यादव। उनके घर का माहौल बड़ा करूण है। पत्रकार समाज को आगे आना होगा। फिलहाल कुछ भी हो लेकिन यह कटुसत्य सामने है कि पत्रकारिता को मिशन बनाकर काम करना आज भी अग्नि परीक्षा के समान है। व्यवसायिकता पत्रकारिता पर हावी है। जो इसकी आड़ में गड़बड़ करते हैं वे मौज उड़ाते हैं। इलाज के लिए तरसकर मौत को अंगीकार नहीं करते?



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