प्रधानों और ब्लाक-तहसील स्तर के अधिकारियों से उगाही करने वाले पत्रकारों की लिस्ट बनेगी

यूपी के विधायक संजय प्रताप जायसवाल ने पिछले दिनों विधानसभा में शिकायत की थी कि कई पत्रकार ग्रामीण इलाकों में जाकर प्रधानों को डरा धमका कर उगाही करते हैं. ब्लाक और तहसील स्तर के अफसरों को भी ब्लैकमेल करते हैं. इन पत्रकारों को चिन्हित कर इनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं!

Rohini Gupte : मेरे एक मि‍त्र सहारनपुर में पत्रकार हुए। सहारनपुर के नहीं थे, मगर नौकरी खींच ले गई। तनख्‍वाह तय हुई साढ़े पांच हजार रुपए महीना, साढ़े तीन सौ रुपए मोबाइल और साढ़े छह सौ रुपए पेट्रोल। मित्र महोदय खुश कि चलो फ्रीलांसि‍ंग से तो पांच हजार का भी जुगाड़ नहीं हो पाता था, यहां कम से कम साढ़े छह मिलेंगे। दि‍ल्‍ली से घर बार बीवी लेकर सहारनपुर पहुंचे और ढाई हजार रुपए में एक कमरा कि‍राए पर लि‍या। आठ दस साल पहले की बात है, ‘सस्‍ते’ का जमाना था। साथ में एक साथी पत्रकार काम करते थे, जि‍नका सहारनपुर में ही गांव था। वो गांव से आने वाली आलू प्‍याज में एक हि‍स्‍सा इन्‍हें भी देते, सो बेसि‍क सब्‍जी का भी खर्च कम हो गया। फि‍र भी बचते बचते महीने की बीस तारीख तक वो पैसे खत्‍म हो जाते, जो लाला हर महीने सात दि‍न देर से देता।

इसी बीच बीवी ने एक दि‍न खुशखबरी दी तो पत्रकार महोदय ने मंदि‍र में जुगाड़ लगाकर प्रसाद में चढ़े दो तीन कि‍लो लड्डू हथि‍याए और दफ्तर में सबका मुंह मीठा कराया। साथि‍यों ने जै-जै की, पत्रकार महोदय फूले। मैंने भी देखा, बाइचांस वहीं थी। सबकुछ ठीक चल रहा था कि पांचवे हफ्ते डॉक्‍टर ने कहा कि कुछ भी ठीक नहीं। बीवी को भर्ती कराया, बच्‍चा गंवाया। डॉक्‍टरनी ने तो फीस नहीं ली, मगर साढ़े नौ हजार की दवाइयां लि‍ख दीं। साथी पत्रकारों ने मदद की, फि‍र भी साढ़े चार हजार रुपए की कमी थी। पत्रकार महोदय को वही अधि‍कारी याद आए, जि‍न्‍हें उनके बड़े भाई ने सहारनपुर में उनका लोकल गार्जियन बनाया था। ये पहुंचे उनके पास, लेकि‍न मुश्‍किल ये कि बतौर पत्रकार तो उन्‍होंने उस अधि‍कारी की भी बेजा हरकतें अखबार-ए-आम की हुई थीं। अब बोलें तो बोलें कैसे। बड़ी मुश्‍किल से अटक-अटक कर मुसीबत के बारे में बताया। अंत में मदद की दरख्‍वास्‍त की- यह कहकर कि सात तारीख को पूरी रकम चुका देंगे। अधि‍कारी महोदय ने कहा- सोचेंगे।

पत्रकार महोदय के मुताबि‍क उन्‍हें अंदाजा हो गया था, सो अधि‍कारी के यहां से बाइक लेकर नि‍कले और पहुंचे सीधे मि‍स्‍त्री की दूकान पर। बाइक बेच दी और उसकी जगह ली एक और भी सस्‍ती और तीसरे दि‍न खराब रहने वाली बाइक। बचे हुए पैसों से दवा खरीदी और घर पहुंचे। कुछ समय पहले उनसे बात हो रही थी। बता रहे थे कि लाला ने मजीठि‍या न देने के लि‍ए चार बार साइन कराए हैं। फि‍र उसी अधि‍कारी की याद दि‍लाई। बोले कि दि‍ल्‍ली रोड पर वसूली करते वि‍जलेंस वालों ने पकड़ा। कहने लगे- आप तो वापस चली गई थीं, मगर इस अधि‍कारी ने संपादक के पास लि‍खकर शि‍कायत की थी और मेरी रि‍कॉर्डिंग भी कर ली थी। लेकि‍न रिकॉर्डिंग में भी मैंने कोई गलत बात नहीं की थी, इसलि‍ए संपादक जी ने छोड़ दि‍या। दफ्तर आकर भी उन्‍होंने बहुत हंगामा कि‍या तो संपादक जी ने उनसे कहा कि आप मुकदमा दर्ज कराइए। वो तो पुलि‍स में नहीं गए, मगर अब पुलि‍स उन्‍हें जरूर ले गई।

अब उन्‍हें महीने में साढ़े बारह हजार रुपए तनख्‍वाह, पांच सौ मोबाइल और हजार पेट्रोल के मि‍लने लगे हैं। आलू प्‍याज वैसे ही साथी पत्रकार के गांव से बि‍ला नागा आ जाती है, जैसे आठ दस साल पहले आती थी। पैसे पहले बीस बाइस को खत्‍म होते थे, अब तो 18 तक का भी इंतजार नहीं करते और अगर सात को संडे पड़ गया तो नौ तक ही मि‍लते हैं। हर महीने आधी तनख्‍वाह एडवांस में कटती है। मैंने उनको कई बार कहा कि वि‍चार से जीवन नहीं चलेगा, कुछ कमाई करि‍ए। रि‍पोर्टर हैं तो अधि‍कारि‍यों से या कि‍सी से भी कुछ कमाने की सेटिंग करि‍ए। बोले, एक जगह मैगजीन डि‍जाइन करने का काम मि‍ला है, महीने में दो बार करना है, ढाई दे देंगे। कुल मि‍लाकर वो वैसे कमाने के लि‍ए नहीं मान रहे हैं, जैसे कि मैं कह रही हूं।

बात सहारनपुर के पत्रकार की ही नहीं है, कहानी अकेले एक अखबार की भी नहीं। पहले संपादक भी सबकी सोचते थे, अब तो संपादक वह जीव है जो सबसे ज्‍यादा सैलरी इसलि‍ए लेता है कि पत्रकारों को सबसे कम सैलरी दी जा सके। तुर्रा ये कि पत्रकारि‍ता का ‘त’ भी न पहचानने वाले जब तब उन्‍हें भ्रष्‍ट कहते रहते हैं। जानते हैं, पत्रकार दुनि‍या का अकेला ऐसा जीव होता है जो दुनि‍याभर के लि‍ए आवाज उठाता है, पर खुद के लि‍ए ऐसे खामोश हो जाता है, जैसे कि‍सी ने जबरदस्‍ती उसके मुंह में कपड़ा ठूंसकर बांध दि‍या हो। याद करि‍ए आखि‍री बार शहर में कब पत्रकारों को अपने लि‍ए आवाज उठाते देखा।

पत्रकार अगर भ्रष्‍ट हैं तो मैं कहती हूं कि‍ उन्‍हें और भी भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए। तब तक पूरी तरह से भ्रष्‍ट होना चाहि‍ए, जब तक कि उनका और उनके परि‍वार का पेट तीन वक्‍त न भरे। धर्म भी यही कहता है। जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं। उन्‍हें अपने ही बच्‍चों की भूख भरी आह लगेगी। जि‍स कि‍सी को इस भ्रष्‍टाचार से दि‍क्‍कत है, तो पहले वह पत्रकारों की मदद करना शुरू करें, तभी उनकी भी दि‍क्‍कत खत्‍म होगी, पत्रकारों की भी। कुछ नहीं कर सकते तो कोई पत्रकार मि‍ले तो उसे खाना ही खि‍ला दीजि‍ए। जबरदस्‍ती। पत्रकारि‍ता हमेशा समाज के भरोसे ही आगे बढ़ती आई है, न कि सत्‍ता के। सत्‍ता के भरोसे होती तो सत्‍ता उसे कब की मिटा चुकी होती। चीन में देखि‍ए, मि‍टा ही चुकी है। दि‍ल्‍ली, लखनऊ, पटना, कलकत्‍ता का चश्‍मा उतारकर जरा उन शहरों के पत्रकारों की भी खबर लीजि‍ए, जहां से खबरें आती हैं। जोगेंद्र सिंह और राम चंदेर प्रजापति याद हैं या भूल गए?

रोहिणी गुप्ते की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

एक अहम बात और है. दुकानदार हमें उधार देने से डरते हैं. बाज़ार में नगद रूपए लेकर भी कुछ खरीदने चले जाओ तो कई बार दुकानदार कह देता है ये वस्तु मेरे यहाँ नहीं है. रही बैंक की तो बैंक में ये गाईड लाइन फिक्स है कि पत्रकारों को लोन नहीं देना है क्योंकि इन्होंने लौटाया नहीं तो इनका क्या हम करेंगे? लोग धंधे व्यापार की बात हमारे सामने करने से परहेज करते हैं. किसी का हाल पूछो तो वो ऐसे बताएगा जैसे दुनिया का सबसे पीड़ित और दुखी व्यक्ति वही है क्योंकि उसे पता है यदि अच्छा बता दिया तो न मालूम क्या होगा.
यह तो समाज का आईना है. यदि प्रोफेशन की बात करें तो बड़ी बड़ी खबरें लिखने वाले पत्रकारों को एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर तनख्वाह भी नहीं मिलती.

इसमें ज़्यादा बदतर हालत है आंचलिक पत्रकारों की. हम अधिकारियों और पुलिस वालों के साथ खड़े हुए दिखते हैं तो लोग सोचते हैं, इसकी खूब चलती है. लेकिन हकीकत यह है कि पास खड़ा अफसर या नेता सोचता है ये कब निकले. खबरों के लिए हमेशा ऊपर ताको. ऊपर वाले का आप पर लाड हो तो ठीक. वरना आपकी चाहे जितनी बड़ी खबर हो, रद्दी की टोकरी में जायेगी. आप रोते बिलखते रहो, खबर नहीं लगी. खबर जिनसे जुडी है,  नहीं लगने पर कह देंगे- सेटलमेंट कर लिया, इसलिए नहीं लगाई. अब उन्हें कैसे समझाएं कि भाई ऊपर की कथा कहानी अलग है. मुस्तफा भाई ने तो खबर पेल दी थी, रोये भी थे, लेकिन नहीं लगी तो क्या करें.

अब रिश्तों की बात करें तो मेरी आँख से पट्टी उस दिन हटी जब मैंने अपने दोस्त पुलिस अफसर को फोन लगाया. मेरा इनसे बीस साल पुराना याराना था. एक दिन दूसरे शहर में उनसे मिलने के लिए फोन लगाया तो वे बोले मैं बाहर हूं. इत्तेफाक से मैं जहां खड़ा रहकर फोन लगा रहा था, वे वहीं खड़े थे और अपने सहयोगी से कह रहे थे कि मुस्तफा मिले तो मेरी लोकेशन मत बताना. वह सहयोगी मुझे देख रहा था क्योंकि वो भी मेरा परिचित था. उसने यह बात बाद में मुझे बता दी. मैंने जब उनका इतना प्रेम देखा तो समझ में आया कि लोग बिठाकर जल्दी से चाय इसलिए मंगवाते हैं ताकि इनको फूटाओ. हम उसे याराना समझ लेते हैं और ज़िन्दगी भर इस खुशफहमी में जीते हैं कि हमें ज़माना जानता है.

इन्ही सब हालात के चलते अब स्थिति यह है कि मैंने तय किया कि जो नहीं जानता उसको कभी मत खुद को पत्रकार बताओ. ये बताने के बाद उसका नजरिया बदलेगा और आप उसे साक्षात यमदूत नज़र आने लगोगे. यह कुछ ज़मीनी हकीकत है जो बीस बाईस साल कलम घिसने के बाद सामने आयी है. पहले मैं सोचता था कि जिसे कोई काम नहीं मिलता वो स्कूल में मास्टर बन जाता है. लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गयी है. मेरा सोचना है कि जिसे कोई काम न मिले वो पत्रकार बने, वो भी आंचलिक. खबर छपे तो आरोप लग जाए कि पैसे मांगे थे, न दिए तो छाप दिया. न छपे तो कह दे, पैसे लेकर दबा दिया. यानि इधर खाई इधर कुआं.

देश में सुर्खियां पाने वाली अधिकाँश बड़ी खबरें नीचे से यानि अंचल से निकलती उठती हैं. लेकिन जब खबर बड़ी होती है तो माथे पर सेहरा दिल्ली भोपाल वाले बांधते हैं. आंचलिक पत्रकार की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह हो जाती है. उसकी कौन सुन रहा है. मैंने देखा जब स्व. सुंदरलाल पटवा का देवलोक गमन हुआ तब उनकी अंत्येष्टि पर पूरा मीडिया लगा था. दिल्ली भोपाल के पत्रकार अपने लाइव फोनो में न जाने क्या क्या कह रहे थे. लेकिन जिन आंचलिक पत्रकारों ने स्व. पटवा को कुकड़ेश्वर की गलियों मे घूमते देखा, उनके साथ जीवन जिया,  किसी चैनल वाले ने यह ज़हमत नहीं की कि अपने आंचलिक स्ट्रिंगर/रिपोर्टर की भी सुन ले. स्व.पटवा से जुडी बातें वो बेहतर बता पायेगा. किसी चैनल ने ये भी नहीं दिखाया कि कुकड़ेश्वर नीमच में उनके देवलोक गमन के बाद क्या हालात है. हर कोई सीएम और मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ अपने अज़ीज़ रिपोर्टर की वॉक स्पोक दिखा रहा था.

प्रदेश में कई पत्रकार संगठन हैं. वे बड़े बड़े दावे आंचलिक पत्रकारों की भलाई के लिए करते हैं. लेकिन जिन पत्रकारों को पच्चीस पच्चीस साल कलम घिसते हुए हो गए, ऐसे हज़ारों पत्रकार हैं जिनका अधिमान्यता का कार्ड नहीं बन पाया. कार्ड तो छोड़िये, जिले का जनसंपर्क अधिकारी उसे पत्रकार मानने को तैयार नहीं. फिर भी हम जमीनी पत्रकार और चौथा खंभा होने की खुशफहमी पाले बैठे हैं. हम हर रोज मरकर जीते हैं और फिर किसी को इन्साफ दिलाने की लड़ाई लड़कर खुद को संतुष्ट कर लेते हैं.

लेखक मुस्तफा हुसैन नीमच के पत्रकार हैं. वे 24 वर्षों से मीडिया में हैं और कई बड़े न्यूज चैनलों, अखबारों और समाचार एजेंसियों के लिए काम कर चुके हैं और कर रहे हैं. उनसे संपर्क 09425106052 या 07693028052 या mustafareporter@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नागरिक करे तो जागरूकता, पत्रकार करे तो धौंस

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। फेसबुक की एक छोटी मगर बहुत प्यारी पोस्ट के जिक्र के साथ बात शुरू करेंगे। पोस्ट ये कि एक दुकानदार ने वस्तु का मूल्य अधिक लिया। ग्राहक ने उलाहना देते हुए वीडियो शूट किया। दुकानदार ने सॉरी करना ही था। हर क्षेत्र मेँ जागरूकता जरूरी है। बधाई, उस जागरूक ग्राहक को। तारीफ के काबिल है वो। लेकिन अगर यही काम किसी पत्रकार ने किया होता मौके पर हँगामा  हो जाता। लोग पत्रकार कि वीडियो बनाते। सोशल मीडिया पर बहुत से व्यक्ति ये लिखते, पत्रकार है, इसलिए धौंस दिखा रहा है। पत्रकारिता की आड़ लेकर दुकानदार को धमका रहा है। चाहे उस पत्रकार को कितने का भी नुकसान हुआ होता। पत्रकार के रूप मेँ किसी की पहचान उसके लिए मान सम्मान के साथ दुविधा, उलझन, कठिनाई भी लेकर आती है। क्योंकि हर सिक्के दो पहलू होते हैं। एक उदाहरण तो ऊपर दे दिया। आगे बढ़ते हैं।

किसी दूसरे फील्ड का व्यक्ति कहीं सम्मानित हो तो सब यही कहेंगे, भई! काबिल था, इसलिए सम्मान तो होना ही चाहिए। योग्यता का सम्मान हुआ है। हकदार था इस सम्मान का। और यही सम्मान किसी पत्रकार का हो जाए तो सभी की भाषा बदल जाती है। लोग कहेंगे, चमचा है साला प्रशासन का। चापलूस है। दल्ला है….और भी ना जाने क्या क्या! जनाब, आप सम्मानित होंगे तो आपकी उपलब्धि की खबर प्रिंट मीडिया मेँ होगी। लेकिन किसी पत्रकार का सम्मान होने पर उसके साथी ही खबर को हिचकिचाते, किचकिचाते हुए लगाएंगे। ना लगे तो ना भी लगे। कोई पूछने वाला हो इन सबसे कि क्या पत्रकार योग्य नहीं हो सकता?

वे क्या सम्मानित होने लायक नहीं होते! उनमें क्या योग्यता का अभाव होता है! कोई सरकारी विभाग ऐसा नहीं जहां अपने काम के लिए सुविधा शुल्क ना देना पड़ता हो। उस काम के लिए भी जो सरकारी अधिकारी/कर्मचारी का दायित्व है, पैसा देना पड़ता है। बिना जान पहचान तो कोई सरकारी कर्मचारी किसी की बात सुन ले तो समझो वह भाग्यशाली है। पत्रकार किसी से विज्ञापन मांग ले तो उसका सब मिट्टी हो जाता है। कोई किसी गिफ्ट द्वारा ओबलाइज कर दे तो ऐसे ऐसे कमेन्ट सुनने और पढ़ने को मिलते हैं कि क्या कहने! बिकाऊ मीडिया। ब्लेकमेलर पत्रकार।

कमाल है! दूसरे पैसे लें तो वे बहुत बढ़िया। व्यावहारिक। और पत्रकार लें तो बिकाऊ, ब्लैकमेलर। किसी की तारीफ कर दो तो सुनने को मिलेगा कि कुछ मिल गया होगा। आलोचना छाप दो ये कहेंगे, कुछ मिला नहीं होगा। सामान्य नागरिक द्वारा अपने अधिकार के लिए आवाज बुलंद  करने पर सब उसकी तारीफ करेंगे। उसका सम्मान करेंगे। उसके जज्बे को सलाम करेंगे, किन्तु कोई पत्रकार अपने हक के लिए कुछ बोले या लिखे तो बात उलटी हो जाएगी। कुछ बोलेंगे और कुछ खामोश रहेंगे। ऐसा सुनने को मिलेगा, पत्रकार है ना! इसलिए अपने रुतबे का गलत प्रयोग कर रहा है। एक नहीं अनेक बातें हैं। जो वही जानता है जिसने ये सब भोगा है। भोग रहा है। दुनिया चाहे कुछ भी करे लेकिन पत्रकार को  कहीं से किसी शो का कोई पास भी मिले तो चर्चा होने लगती है।

जनाब, पत्रकार होना कोई आसान नहीं है। और उसके लिए तो बहुत मुश्किल है जिसकी पहचान पत्रकार के रूप मेँ बन चुकी है। ऐसा नहीं है पत्रकार गलत नहीं होते। वे अपनी धौंस नहीं दिखाते। अपनी पोजीशन का का बेजा इस्तेमाल नहीं करते। होंगे ऐसे भी। क्योंकि वे भी हैं तो तो इसी समाज के। पत्रकारिता भी वैसा ही पेशा है जैसे और हैं। दूसरे पेशे मेँ भी बहुत सी बुराइयाँ होंगी। पेशे से जुड़े लोगों मेँ कमियाँ होंगी। ऐसा ही कुछ पत्रकारिता मेँ है। पत्रकारों मेँ है। ये शब्द धौंस दिखाने वाले, अपनी पोजीशन का बेजा इस्तेमाल करने वाले पत्रकारों /पत्रकारिता का बचाव नहीं कर रहे, बस वो बताने की कोशिश है जो पत्रकारों और पत्रकारिता को क्या क्या सहना पड़ता है। पीना पड़ता है। आज चार लाइन पढ़ो-

मेरा एक एक शब्द अब तो बिकाऊ है जनाब
ज़मीर! ज़मीर तो अब बस दिखाऊ है जनाब।
शहर तो पूरा मेरा सम्मान करता है जनाब
मगर पेट तो रोटी से ही भरता है ना जनाब। 

लेखक गोविंद गोयल गंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकारों की उम्र 55 साल होने पर सरकारें इन्हें सत्ता में एडजस्ट करें!

वर्तमान में पत्रकारिता की जो दशा है, उस हिसाब से सरकार को एक उम्र के बाद हर पत्रकार को शासन में एडजस्ट करना चाहिए। दरअसल, आज पत्रकारिता की राह में अनेक बाधाएं आ चुकी हैं। काम का बोझ, तनाव, समस्याएं, अपर्याप्त वेतन तो है ही इसके ऊपर हर वक्त सिर पर नौकरी जाने का खतरा मंडराता रहता है। मुख्य धारा का एक पत्रकार अपने जीवन में इतना परिश्रम और तनाव झेल जाता है कि 50-55 की उम्र के बाद वह किसी काम का नहीं रह जाता है। शायद यही कारण है कि इस उम्र के बाद आज अनेक पत्रकार अपनी लाइन बदलने का असफल प्रयास करते हैं।

हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने एक सराहनीय फैसला लेकर वरिष्ठ पत्रकार दर्शन सिंह रावत को मीडिया को-आर्डिनेटर बनाया है। इस फैसले का विरोध नहीं हुआ। इसका अर्थ है कि श्री रावत इस पद के लिए बिल्कुल योग्य हैं और उनकी छवि साफ-सुथरी रही है। श्री रावत सीधे-सरल हैं। वे न राजनीति जानते हैं और न ही इसमें रुचि रखते हैं। हां, यह बात दीगर है कि कई बार ऐसा सीधा आदमी राजनीति का मोहरा बन जाता है। जितनी मेरी उम्र है, लगभग उतने वर्ष उन्हें पत्रकारिता में हो चुके होंगे। मैं जब अमर उजाला चंडीगढ़ में ट्रेनी और जूनियर सब एडीटर था, वे तब शिमला में अमर उजाला मंे सीनियर काॅरोस्पोंडेंट थे। अब तक उन्हें कहीं समूह संपादक बन जाना चाहिए था, लेकिन इसलिए नहीं बन पाए कि वे राजनीतिक लल्लो-चप्पोबाजी और चरणवंदना से बहुत दूर रहते हैं। मुझे खुशी है कि उन्हें सरकार ने उनके योग्य पद दिया, लेकिन सुखद आश्चर्य इस बात का भी है कि दर्शन सिंह रावत जैसा सीधा-सरल व्यक्ति इस पद तक कैसे पहुंचा! क्योंकि ऐसे पद प्रायः राजनीतिक सिद्धहस्त लोगों को ही मिलते हैं। अगर श्री रावत जैसे लोगों को यह मिले तो इसे सरकार की ईमानदार नीति का हिस्सा माना जाना चाहिए।

खैर, उत्तराखंड में ही पत्रकारों को सत्ता में एडजस्ट करने की परंपरा नहीं है। मैं यह हरियाणा में भी देख चुका हूं। दैनिक भास्कर में वरिष्ठ पत्रकार रहे बलवंत तक्षक को 14-15 साल पहले ओमप्रकाश चैटाला सरकार में एडजस्ट किया गया था। लबोलुआब यह कि अगर पत्रकार योग्य, ईमानदार है तो उसके अनुभव का लाभ सरकार द्वारा लिया जाना चाहिए। जो काम सरकार की मोटी तनख्वाह वाले सूचना विभाग के अधिकारी नहीं कर पाते हैं, वह काम एक वरिष्ठ पत्रकार आसानी से कर सकता है। वैसे भी उत्तराखंड का सूचना विभाग पत्रकारों और अखबारों में भेदभाव को लेकर अक्सर चर्चाओं में रहता है। पत्रकारों को मान्यता देने को लेकर यहां क्या खेल चलता है, यह पत्रकारों से छिपा नहीं है। छोटे अखबारों और अखबारों को विज्ञापन देने की तो बात ही छोड़ दीजिए।

मेरा सुझाव यह है कि पत्रकारों की उम्र 55 साल होने के बाद सरकार इन्हें योग्यता और क्षमतानुसार सत्ता में एडजस्ट जरूर करे। शर्त यह कि सरकार पत्रकार को एडजस्ट करते समय गुटीय भावना, पार्टी भावना से ग्रस्त न हो। आज कोई यह कहता है कि फलां पत्रकार फलां मुख्यमंत्री का चहेता रहा तो यह बात सरासर गलत है खासकर बड़े अखबारों के मामले में। क्योंकि बड़े अखबारों में सत्ता से संबंध पत्रकार का नहीं, सीधे प्रबंधन और मालिकों का होता है। आज कोई योग्य पत्रकार सत्ता का अंग बनता है तो पत्रकारों को ईर्ष्या के बजाय खुश होना चाहिए। जब आठवीं फेल कोई आदमी अपनी पार्टी की सत्ता आने पर राज्यमंत्री बन सकता है तो एक पत्रकार क्यों न शासन का अंग बने!  जीवनभर लोकतंत्र के चैथे स्तंभ की भूमिका निभाने के बाद अंततः उसे भी सुविधासंपन्न नागरिक का जीवन जीने का हक होना चाहिए। खासकर उसके परिवार को।

डॉ. वीरेंद्र बर्त्वाल
देहरादून
veerendra.bartwal8@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश के इस प्राइम टाइम शो को हम सभी पत्रकारों को देखना चाहिए

एनडीटीवी इंडिया पर कल रात नौ बजे प्राइम टाइम शो के दौरान रवीश कुमार ने पत्रकारों की विश्वसनीयता को लेकर एक परिचर्चा आयोजित की. इस शो में पत्रकार राजेश प्रियदर्शी और प्रकाश के रे के साथ रवीश ने मीडिया और पत्रकार पर जमकर चर्चा की.

आजकल भारत में जब सत्ता परस्त रिपोर्टिंग को ही पत्रकारिता माना जाने लगा है और सरकार पर सवाल करने वालों को संदेह की नजर से देखा जाता है, रवीश का यह शो हम सभी को एक बार फिर से पत्रकारिता की मूल भावना, मूल आत्मा की तरफ ले जाने का काम किया है और अपने भीतर झांकने को प्रेरित किया है. यह चर्चित प्राइम टाइम डिबेट देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=eDUADSnA7so

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर क्या कहते हैं, पढ़िए….

Nitin Thakur : रवीश कुमार अकेले हैं जो टीआरपी को ताक पर रख दर्शक और पाठक को भी ऑन एयर और ऑन मंच लताड़ सकते हैं। इसके लिए जो चाहिए उसे ‘ईमान’ कहते हैं। ये सुविधा हर किसी को नहीं मिलती। इसे हासिल करना पड़ता है मेहनत करके।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकार बंधु जान लें.. आपकी छुट्टी और ड्यूटी टाइम क्या होनी चाहिए

शशिकांत सिंह

कल एक मराठी दैनिक के पत्रकार भाई का फोन आया। उन्होंने बताया प्रबंधन उनसे 9 घंटे ड्यूटी कराता है। क्या करना चाहिए। ऐसे तमाम सवाल पूछे जाते हैं। कुछ के जवाब तुरंत देता हूँ लेकिन कुछ के लिए डॉटा खोजना पड़ता है। दोस्तों आपको बता दें कि वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट का चैप्टर 3 साफ़ कहता है कि दिन में 6 घंटे से ज्यादा ड्यूटी नहीं ली जा सकती और चार घंटे से ज्यादा लगातार काम नहीं कराया जा सकता। दूसरी चीज, चार घंटे के बाद कर्मचारी को 30 मिनट का रेस्ट मिलना चाहिए।

इसी तरह नाइट शिफ्ट में साढ़े पांच घंटे से ज्यादा ड्यूटी टाइम नहीं होनी चाहिए। इसमें साढ़े तीन घंटे बाद 30 मिनट का कर्मचारी को रेस्ट मिलना चाहिए। इसी तरह चैप्टर 3 की धारा 10 कहती है अगर किसी कर्मचारी ने जितने घंटे अतिरिक्त काम किया है, उतने घंटे उसे अतिरिक्त अवकाश दिया जायेगा। वर्किंग जर्नलिस्ट के चैप्टर 3 में धारा 11 कहती है किसी भी कर्मचारी से लगातार एक सप्ताह से ज्यादा नाइट शिफ्ट नहीं कराया जा सकता। अगर ऐसा बहुत आवश्यक हुआ तो सम्बंधित श्रम आयुक्त या सम्बंधित प्राधिकरण से लिखित अनुमति लेनी पड़ती है और इसकी ठोस वजह बतानी पड़ती है।

आपको बता दूं कि देश भर के अधिकाँश समाचार पत्र प्रतिष्ठान इसका पालन नहीं करते और अपने कर्मचारियों से कई कई साल तक नाइट ड्यूटी कराते हैं जो पूरी तरह गलत है। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के चैप्टर 4 में धारा 16 में बताया गया है कि अगर किसी कर्मचारी को उसके अवकाश के दिन बुलाया जाता है तो उसे उस दिन का वेतन दिया जाएगा। बहुत से समाचार पत्र के प्रबंधन अवकाश के दिन अपने कर्मचारियों को बुलाते हैं तो उन्हें वेतन की जगह एक दिन अतिरिक्त अवकाश देते हैं, जो पूरी तरह गलत है।

चैप्टर 4 की धारा 15 में यह भी लिखा है कि सभी कर्मचारियों को साल में 10 सार्वजानिक अवकाश मिलना चाहिए। सार्वजनिक अवकाश के दिन अगर कर्मचारी ड्यूटी करता है तो उस दिन का वेतन देने का प्रावधान है। बहुत सी कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों को सार्वजानिक अवकाश के दिन ड्यूटी पर बुलाती हैं मगर उन्हें वेतन न देकर बदले में किसी दूसरे दिन अवकाश देती हैं।

वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के चैप्टर 5 में लिखा है अगर आपका अवकाश रद्द होता है तो उसकी वजह प्रबंधन को लिखित रूप से कर्मचारी को बताना पड़ेगा। चैप्टर 5 की धारा 20 कहती है सार्वजानिक अवकाश के दिन लिए गए अवकाश को दूसरे किसी भी अवकाश में शामिल नहीं किया जा सकता है। अगर बहुत जरूरी हुआ तो इसके लिए सम्बंधित प्राधिकरण से लिखित अनुमति लेनी पड़ती है।

चैप्टर 5 की धारा 34 में ये भी लिखा है कि सभी कर्मचारियों को साल में 15 दिन का कैजुअल लीव (सीएल) मिलना चाहिए और एक साथ 5 दिन से ज्यादा सीएल नहीं लिया जा सकता। इसको अगले साल भी कैरी फारवर्ड नहीं किया जा सकता। ये नियम संपादक, संवाददाता और न्यूज़ फोटोग्राफर पर लागू नहीं होता, ऐसा चैप्टर 3 की धारा 7 में लिखा है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335
shashikantsingh2@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बड़े-बड़े अखबारों के प्रतिनिधि असल में पैसे कमाने के लिए ठेकेदारी से लेकर ब्लैकमेल तक के धंधे करते हैं!

Sanjaya Kumar Singh : बदल रहा है पत्रकारों का धंधा… हिन्दी पत्रकारों के बारे में अक्सर यह कहा सुना जाता है कि पत्रकार हैं ये तो ठीक है, गर चलाने के लिए क्या करते हैं? शुरू में यह मजाक लगता था बाद में पता चला कि देश के ज्यादातार हिस्से में बड़े-बड़े अखबारों के प्रतिनिधि असल में पैसे कमाने के लिए ठेकेदारी से लेकर ब्लैकमेल तक के धंधे करते हैं। कहने वाले कह देते हैं कि अंशकालिक संवाददाताओं के धंधे बुलंद होते हैं पर कुछेक अपवाद को नियम नहीं माना जा सकता।

सच ये है कि वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन देने से बचने के लिए इनसे बाकायदा लिखवाकर ले लिया जाता है कि पत्रकारिता उनका शौक है, पेशा नहीं और वे शौकिया खबरें लिखते हैं। लिहाजा जो मिल जाए वही पर्याप्त है और घर चलाने के लिए वे कुछ और धंधा करते हैं। यह सब पुरानी घिसी-पिटी कहानियां हैं। और ऐसे में यह जानना सुखद आश्चर्य है कि अगस्ता मामले में खुलासे न करने के लिए पत्रकारों को पैसे दिए गए थे। पत्रकारिता का जो हाल हैं उनमें इतने पैसे पा लेना वाकई गौरव की बात है। और यह जानने के लिए हर कोई उतावला है कि वो खुशकिस्मत पत्रकार कौन हैं और दरअसल क्या करते हैं। विवेक सक्सेना ने “मन की बात” लिख दी है, जो नीचे है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

पत्रकारः धंधों ‘के’ नहीं, ‘ये’ है!

विवेक सक्सेना

मैंने पहले एक कालम में इस घटना का जिक्र किया था वह फिर अगस्ता कांड के कारण याद हो आई। घटना कुछ इस प्रकार थी कि हम लोग 1982 में असम विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग करने गए थे। राज्य में करीब 8-10 दिन रहे। वहां के एक व्यवसायी गोयनका परिवार ने हमारी काफी मदद की और उनसे हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। जिस दिन हम लोग वापस लौटने वाले थे उसकी पूर्व संध्या पर उन्होंने हमारे सम्मान में रात्रि भोज का आयोजन किया जिसमें शहर की तमाम हस्तियां आयीं। बड़े गर्व से वे लोगों को हमसे मिलवाते हुए बता रहे थे कि देखों दिल्ली के पत्रकार मेरे दोस्त हैं।

खाना खत्म होने पर उन्होंने अपने दादा से हमें मिलवाने की इच्छा जताई। वे हमें लेकर एक कोठरी में गए। जहां उनके बुजुर्ग दादा लेटे हुए थे। उन्होंने कहा, ‘लाला इनसे मिलो ये दिल्ली से आए हुए पत्रकार हैं। बुजुर्ग लालाजी ने हमें ऊपर तक देखा और फिर पूछा पत्रकार है वो तो ठीक है। पर धंधों के है? रोटी पानी कैसे चले हैं?

तब हमें लगा कि जैसे किसी ने हम पर घड़ों पानी डाल दिया हो। उस समय एक आम आदमी के मन में पत्रकारों को लेकर कुछ इस तरह की धारणा रहती थी। पत्रकार का मतलब एक फक्कड़, तंगहाली से गुजरता हुआ इंसान माना जाता था। पर अब जब अगस्ता डील में पत्रकारों को करोड़ों रुपए बांटने की खबर पढ़ी तो मन गर्व से भर गया। सच कहूं तो इस पूरे विवाद में यह खुलासा होने के बाद मेरा और कुछ पढ़ने जानने का मन ही नहीं कर रहा है। मैं उन पत्रकारों के नाम जानने के लिए बेहद उत्सुक हूं। मेरा बस चले तो पत्रकारों को सम्मानित करने वाली किसी दुकान से अनुरोध कर इन सभी को पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके इस उत्कर्ष कार्य के लिए सम्मानित किए जाने का आग्रह करुंगा।

हां, मैं इसके लिए बाकायदा हस्ताक्षर अभियान भी चलाने को तैयार हूं। वजह यह है कि इस खबर ने पत्रकारों की जो हैसियत बढ़ाई हैं उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। आम धारणा यही रहती आयी थी कि पत्रकारों को महज मुरगा खिलाकर, शराब पिलाकर कुछ भी लिखवाया जा सकता है। इसी कालम में मैंने यह भी लिखा था कि जब पत्रकारश्रेष्ठ खुरानाजी को पहली बार ज्ञानी जैल सिंह से किसी बंदूक का लाइसेंस दिलवाने की एवज में डेढ़ लाख रुपए मिले थे तो वे बौखला गए थे। पूरी रात सो नहीं सके थे। यह किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि यार हम तो खा पीकर ही काम करवा देते थे। कोई बहुत खुश हुआ तो छोटी मोटी गिफ्ट थमा दिया करता था। जब एक बेहद उद्यमी भाजपा के अध्यक्ष बने जो कि केंद्रीय मंत्री भी हैं तो उनसे किसी ने कहा कि आप दिल्ली जा रहे हैं। वहां के पत्रकारों से जरा बचकर रहिएगा। बहुत तेज होते हैं तो उन्होंने छूटते ही कहा था कि तुम उनकी चिंता मत करो। पांच-पांच हजार के कुछ और पैकेट तैयार करवा लूंगा। हालांकि बाद में वे पत्रकारिता का ही शिकार हुए। उन्होंने पैकेट दिए नहीं या इतनी रकम से पत्रकारों को मोह पाने में नाकाम रहे, कह नहीं सकता।

आमतौर पर पत्रकारों को प्रेस कान्फ्रेस में छोटे-मोटे उपहार मिला करते हैं। पहले घड़ी का चलन शुरु हुआ फिर केलकुलेटर मिलने लगे। जब इलेक्ट्रानिक सामान की भरमार हुई तो सैलफोन, पैन ड्राइव, टेबलेट आदि दिए जाने लगे। मेरा मानना है कि उन्हें 50 रुपए के टंबलर से लेकर 10-15 हजार रुपए तक के गिफ्ट दिए जाते हैं। यह देने वाले की हैसियत और उसके उत्पाद पर निर्भर करता है। जैसे कि हाल में जिंगल बैल नामक सैल फोन कंपनी ने पत्रकारों को सेल फोन बांटे। बाबा रामदेव रिपोर्टरों को अपने उत्पाद का हैंपर और चैनल मालिक को विज्ञापन बांटते हैं। पत्रकारों की कितनी कम कीमत लगाई जाती रही इसका भी जिक्र पुनः करना जरुरी हो जाता है। दिल्ली के एक बहुत बड़ी हलवाई श्रृंखला के मालिक की बेटी ने पानी में नृत्य प्रस्तुत किया। इसका आयोजन तालकटोरा स्थित स्विमिंग पुल में किया गया था। जब पत्रकार प्रदर्शन देख रहे थे तभी वहां लालाजी आ गए। उन्होंने जोर से कहा, ‘अबे पम्मों, समय क्यों बरबाद कर रहा है, नाचवाच दिखवाना बंद कर इन्हें अंदर ले जा। दारु पिला। मुरगे खिला वरना खबर कैसे छपेगी।’

तब भी पत्रकारों की बहुत कम कीमत आंकी जाती थी। वैसे मैं पत्रकारों की इज्जत व हैसियत बढ़ाने का पहला श्रेय ‘नीरा राडिया’ टेप्स को देना चाहता हूं। जिनके प्रकाशन से यह खुलासा हुआ कि किस तरह से कुछ पत्रकार इस सरकार की नीतियां तक बदल देने की हैसियत रखते थे। महिला पत्रकारों की तो पहुंच प्रधानमंत्री के किचन कैबिनेट तक थी जहां वे कुछ भी पकवा सकने की ताकत रखती थीं। उनके तार इतने गहरे जुड़े थे कि यह सुनिश्चित करने लगी कि संचार मंत्रालय किसे सौंपा जाए। हालांकि किवदंती तो यह भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में कुछ पत्रकारों ने उत्तरप्रदेश सरीखे अहम राज्य में भाजपा के टिकट वितरण में बहुत अहम भूमिका अदा की थी। मुझे इस बात पर गर्व है कि कम से कम हिंदी के किसी पत्रकार को यह गौरव हासिल हुआ।

अभी तक अपना अनुभव यही रहा है कि हिंदी व भाषायी पत्रकारों की माल बांटते समय भी अनदेखी की जाती रही है। करीब डेढ़ दशक पहले हिंदी के तीन पत्रकारों द्वारा किसी इनकम टैक्स कमिश्नर का मनचाही जगह तबादला करवा देने के बदले में डेढ़ करोड़ रुपए लेने की खबर आयी थी। तब अनिल बंसल ने कहा था कि हिंदी पत्रकारिता के लिए यह बहुत गर्व की बात है क्योंकि उन पर तो बेल का शरबत या मिठाई, मुरगा, दारु लेकर ही काम करवाने की खबरें सुनने को मिलती रही है। वैसे अगस्ता कांड के खुलासे के मुताबिक हर पत्रकार को 10 लाख रुपए प्रतिमाह दिए जा रहे थे। पत्रकार तो क्या जब हिंदी के संपादक तक महज डेढ़ दो हजार रू के लिए अपना अखबार छोड़कर चैनल पर बहस करने पहुंच जाते हो, उनका इस सूची में नाम आना सचमुच गर्व की बात है। लगता है अगस्ता की सूची में अंग्रेजी के ही पत्रकार है। अगर किसी हिंदी के पत्रकार का नाम आया तो मैं तुरंत गुवाहाटी फोन मिलाकर लाला से जरूर कहूंगा, ‘असली धंधो तो ये हैं।’

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कानपुर में कांग्रेस नेता ने सम्पादक को दी जूतों से मारने की धमकी

कानपुर : स्वतंत्रता दिवस पर शहर में कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला द्वारा लगवाई गई त्रुटि पूर्ण होर्डिंग्स के बारे में खबर प्रकाशित करने पर ‘जन सामना’ के सम्पादक श्याम सिंह पंवार को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। शुक्ला ने कहा है कि ‘जन सामना’ समाचार पत्र का लाइसेन्स जब्त करवा दूंगा। पत्रकार को अपने घर बुलाकर जूते से मारने की दी धमकी। 

 

शुक्ला ने यह भी कहा कि कार्यालय का घेराव करवा दूंगा और भविष्य में खबर चलाने पर कहा कि गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार हो जाओ। पुलिस के पास जाकर देखो, नतीजा सामने आ जायेगा। कानपुर में छुट भैये कांग्रेसी नेताओं का बोलबाला है। गत 14 अगस्त को कानपुर दक्षिण के कई प्रमुख चैराहों पर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं के बैनर कथित कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला ने लगवा रखे थे, जिसमें आजाद हिन्द फौज के सेनानी शुभाष चन्द्र बोस की फोटो के नीचे चन्द्रशेखर आजाद का नाम छपा था और शहीद चन्द्रशेखर आजाद की फोटो के नीचे भगत सिंह का नाम छपा था। इसके अलावा इन्दिरा गांधी का भी नाम शहीदों में शुमार था।

कानपुर सहित पूरे यूपी में शहीदों के इस अपमान की चर्चा खूब वायरल हुई। कानपुर के एक साप्तहिक समाचार ‘जन सामना’ ने भी इस खबर को प्रमुखता से छापा। ये बात अम्बुज शुक्ला को बर्दाश्त नहीं हुई। उसने अखबार के सम्पादक को फोन कर अखबार का लाइसेंस जब्त करवाने, पत्रकार को जूते – जूते मारने, और कार्यालय का घेराव करवाने जैसी कई धमकियां दे डालीं। सम्पादक को खुली धमकी उनके मोबाइल में रिकार्ड हो गयी और उन्होंने इसकी शिकायत आईजी के एक भरोसे के नंम्बर पर की। खबर लिखे जाने तक सूत्रों के अनुसार एक कांग्रेसी विधायक के दबाव में एफआईआर दर्ज नहीं हो सकी थी। 

बड़ा सवाल ये है कि क्या पत्रकार खबर लिखना छोड़ दें, अगर नहीं तो अपनी जान जोखिम में डाल सच्चाई सबके सामने रखने वाले पत्रकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है ? दूसरी ओर एक बार फिर कानपुर के पत्रकार संगठनों ने इस मामले में उदासीनता दिखायी है क्योंकि इस मामले में एक दबंग कांग्रेसी विधायक का नाम भी आया है।

अपना कद ऊँचा करने की जद्दोजेहद में काँग्रेसी विधायक अजय कपूर और नेता अम्बुज शुक्ला और बर्रा इलाके में स्थित राशी एडवर्टाइज़र दोनों ने देश के वीर सपूतों का मज़ाक बनाया। “चंद्र शेखर आज़ाद” को बना दिया “भगत सिंह” और “सुभाष चन्द्र बोस” को बना दिया “चंद्र शेखर आजाद”। शहीदों के नाम भूल गए हवाबाज़ नेता। इंडिया न्यूज के रिपोर्टर ज्ञानेंद्र शुक्ला ने इस संबंध में आईजी को शिकायती पत्र लिखा है- 

श्री मान आईजी ज़ोन महोदय, 

थाना कल्याणपुर के छापेड़ा पुलिया इलाके में कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला और विधायक अजय कपूर ने होर्डिंग लगवाई थी जिसमे शहीदों के नाम गलत अंकित थे । इस पर सभी चैनल्स और अखबारों ने खबर छापी थी । कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला ने दैनिक जन सामना के पत्रकार महेंद्र कुमार को फोन से धमकी दी और अपशब्द कहे । ये पत्रकारिता का हनन है । लिहाजा इस मामले में कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला पर देश के लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर हमला करने का मुकदमा दर्ज किया जाए । फोन से धमकी का ऑडियो भेज दिया गया है ।

ज्ञानेन्द्र शुक्ला, रिपोर्टर – इंडिया न्यूज, कानपुर Mob. 9648330888

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बदायूं में पत्रकार पर हमला, कैमरा और मोबाइल तोड़ डाला

बदायूं में कबरेज के दौरान पत्रकार सुनील मिश्रा पर उपद्रवियों ने जानलेवा हमला कर दिया, कैमरा  और मोबाइल तोड़ डाला। सुनील मिश्रा दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, साधना न्यूज, न्यूज नेशन सहित कई संस्थानों में काम कर चुके है।

पिछले दिनो एक न्यूज ऐजेंसी के ब्यूरो चीफ सुनील मिश्रा पर करीब दो दर्जन उपद्रवियों ने जानलेवा हमला ही नहीं किया बल्कि मौके पर कबरेज करते समय उनका वीडियो कैमरा नष्ट करने के साथ- साथ लूटपाट भी की। सुनील मिश्रा ने जैसे-तैसे जान बचाई । मिश्रा ने अपने साथ हुई घटना की जानकारी सबसे पहले अपने संस्थान को दी । संस्थान के उच्च अधिकारियों ने तुरंत संबंधित थाने में मुकदमा लिखाने को कहां। सुनील मिश्रा ने तुरंत थाने पहुंचकर घटना की तहरीर पूलिस को सौपी ।

घटना तब हुई, जब वो बदायूं के कस्बा बिसौली में  वाट्सएप पर वायरल हुए एक वीडियो को लेकर नेशनल हाईवे पर पुलिस चौकी के सामने उपद्रवी जाम लगाकर बवाल कर रहे थे। हमले के वक्त मौके पर मौजूद पुलिस मूक-दर्शक बनी रही ।

पुलिस ने पत्रकार सुनील मिश्रा के साथ हुई घटना का मुकदमा दबाव में लिख तो लिया मगर एक और अन्य फर्जी मुकदमा उसी क्राइम नंबर पर  दर्ज कर लिया जिसमें सुनील मिश्रा को उपद्रवियों से बचाने वाले लोगों को भी कोशिश की है ताकि घटना के समय मौके पर तैनात पुलिस कर्मियों को बचाया जा सके । इस मामले की जानकारी होने पर ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन बदायूं के पदाधिकारियों और सदस्यों ने भारी रोष व्यक्त करते हुए मामले की सही जांच की माँग की है। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

उ.प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव के लिए कमेटी गठित

लखनऊ : वर्षों बाद उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव के लिए गत दिवस लखनऊ में आपसी सहमति हो जाने के बाद पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया है। 

गौरतलब है कि संगठन के अध्यक्ष एवं महासचिव समेत अन्य पदाधिकारियों एवं कमेटी सदस्यों द्वारा स्वयंभू तरीके से सारी प्रक्रिया संचालित की जा रही थी। सत्ता और शासन के बीच अपनी धमक के लिए येन-केन प्रकारेण अपना प्रभुत्व बनाए रखते हुए पदाधिकारी दो सत्र से संगठन पर मनमाना तरीके से हावी थे। इसके खिलाफ लगातार पत्रकारों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था। 

यहां गत दिवस चुनाव के संबंध में हुई विजय शंकर पंकज की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में कमेटी का गठन कर दिया गया। इस पांच सदस्यीय कमेटी में विजय शंकर पंकज, शिवशंकर गोस्वामी, किशोर निगम, संजय राजन महान एवं मनोज छाबड़ा को चुनाव प्रक्रिया संबंधी निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया गया है। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्रदीप सिंह ओपिनियन पोस्ट के चीफ एडीटर बने, ओमप्रकाश अश्क भी जुड़े

बाराखंबा रोड नई दिल्ली से शुरू होने जा रही राष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका ओपिनियन पोस्ट से एक और बड़ा नाम जुड़ गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह यहां बतौर प्रधान संपादक जुड़ चुके हैं और संपादकीय टीम का नेतृत्व करेंगे। 

प्रदीप सिंह हिंदी मीडिया के बड़े नाम हैं और जिम्मेदार, गंभीर पत्रकारों में उनकी गिनती होती है। जनसत्ता मुंबई और दिल्ली के संपादक रहे प्रदीप सिंह ने बाद में अमर उजाला, आउटलुक, सीएनईबी चैनल में बड़ी जिम्मेदारियां संभाली। कुछ दिनों तक इंडिया न्यूज वाले विनोद शर्मा के अखबार आज समाज के संपादक भी रहे।

एक और सूचना के अनुसार लंबे समय तक प्रभात खबर झारखंड के हेड और कुछ दिनों पहले तक हिंदुस्तान के संपादक रहे ओमप्रकाश अश्क भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े हैं और झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा को कोर्डिनेट कर रहे हैं। ओपिनियन पोस्ट में अमर उजाला में कई संस्करणों के संपादकीय प्रभारी रहे मृत्युंजय कुमार पहले ही बतौर संपादक जुड़ चुके हैं।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सरकार की मर्जी पर !

यह बेहद चिंताजनक स्थिति है कि आज भारतीय मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने लिए निर्धारित मानदंडों और आचरण संहिता को भूलकर किसी न किसी राजनीतिक दल का अनुयायी या उग्र राष्ट्रवादी संगठनों की तरह व्यवहार करने लगा है। एंकर चीख चीख कर अशोभन लहजे में अपनी परम देश निष्ठा का परिचय दे रहे हैं। अपने अलावा किसी और को बोलने का मौका वे नहीं देना चाहते। खबरों का प्रसारण यहां राजनीतिक मंतव्यों के तहत हो रहा है। 

कौन सी ख़बरें किस तरह कवर करनी और दिखानी है, इसका फ़ैसला वरिष्ठ पत्रकारों पर होता है लेकिन ऐसा नहीं लगता कि वे अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं। अब ये भी एक सच है कि आजकल अधिसंख्य पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों में संपादक नहीं ही होते हैं यदि होते भी हैं तो उनकी भूमिका बेहद सीमित होती है। होना तो यह चाहिये कि टीवी चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं में ख़बरों और विचारों के प्रकाशन एवं प्रसारण से पहले उन्हें कई स्तरों पर जाँचा-परखा जाए, ताकि एक संतुलन रहे और समाज में वैमनस्य या उन्माद न फैले। 

सच्चाई यह भी है कि अनुभवहीन पत्रकारों की वजह से भी ऐसा होता है।  लेकिन उन्हें प्रशिक्षित करने और उनकी योग्यता के अनुसार काम देने की ज़िम्मेदारी भी संपादकीय नेतृत्व की ही होती है। दरअसल अधिकांश जगहों पर संपादकीय व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, सवाल उठता है कि क्यों? क्या इसके लिए मीडिया में चलने वाली होड़ ज़िम्मेदार है या फिर और भी कारण हैं? इसमें शक़ नहीं कि टीवी चैनल और पत्र-पत्रिकाएं एक दूसरे से आगे निकलने के लिए खुद को ज़्यादा बड़ा राष्ट्रभक्त दिखाने की कोशिशों में जुट जाते हैं। नतीजा यह होता है कि छोटी-छोटी चीज़ें भी उन्माद की शक्ल ले लेती हैं। जाहिर है लोकप्रियता हासिल करके उसे व्यावसायिक लाभ में तब्दील करने की ख़तरनाक़ प्रवृत्ति दिनों-दिन मज़बूत होती जा रही है लेकिन इसका संबंध सिर्फ बाज़ार से ही नहीं, राजनीति से भी है। 

मीडिया जब सत्ता के एजेंडे से जुड़ जाता है या उसमें अपना स्वार्थ देखने लगता है तो सत्ताधारियों को खुश करने के लिए तमाम तरह के हठकंडे अपनाना शुरू कर देता है। इस समय यही हो रहा है। ये जगज़ाहिर तथ्य है कि कॉरपोरेट जगत, सरकार के साथ सदैव ही कदमताल करता रहा है जो आज कुछ जियादा ही तेजी में है। इसलिए यह भी स्वाभाविक है कि उसके नियंत्रण वाला मीडिया भी सत्तापक्ष की राजनीति का समर्थन करे और वह ऐसा कर भी रहा है। इसीलिए मीडिया के कंटेंट में अब बहुसंख्यकवाद हावी हो चुका है। वह पूरी कटिबद्धता के साथ उदार या भिन्न विचारों का विरोध कर रहा है उग्रता को धड़ल्ले से मंच मुहैया करवा रहा है। सोशल मीडिया का इस तरह बेकाबू हो जाना समझ में आता है। वहाँ कोई गेटकीपर नहीं है, कोई संपादक नहीं है जो लोगों की टिप्पणियों को सावधानीपूर्वक काटे-छाँटे। 

वहाँ कोई कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र है। मगर मुख्यधारा का मीडिया क्यों अपनी ज़िम्मेदारियाँ भूलकर समाज को बेकाबू करने में जुटा हुआ है? और बिडम्बना यह कि भारत सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय उन टी वी चैनलों को नोटिस थमा रहा है जो सत्ता की प्रोपेगंडा साझेदारी से बच रहे हैं और समाचारों को कुछ संतुलन, निष्पक्षता एवं कुछ समझदारी से पेश कर रहे हैं। हाल ही में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा पहले एन डी टी वी को सरकारी सूचनाओं को सार्वजनिक करने के आरोप में फिर ए बी पी न्यूज़, एन डी टी वी 24 तथा आजतक को याकूब मेनन की फँसी के बाद उसके पक्ष में उसके वकील एवं अन्य का साक्षात्कार लेने के लिए अदालत की अवमानना का नोटिस दे दिया। क्यों सरकार टी वी चैनलों के प्रसारण का नियमन नहीं करती। 

वह अन्धविश्वास, अवैज्ञानिकता और उन्माद फैलाने वाले चैनलों पर कोई कार्यवाई करने की बजाय उन चैनलों पर शिकंजा कस रही है जो उसके साथ नहीं हैं। यह सत्ता पक्ष की असहिष्णुता का परिचायक है। वह बदले की भावना से काम कर रही है। वैसे भी अधिकांश चैनेल सत्तापक्ष के शुभचिंतकों के पास हो चुके है। क्या आज की राजनीति की यही मंतव्य प्रेरित अदृश्य रणनीति है ?

लेखक शैलेन्द्र चौहान से संपर्क : shailendrachauhan@hotmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रघुवर सरकार ने बंद की पत्रकार दुर्घटना बीमा योजना

झारखंड : प्रदेश की रघुवर सरकार ने पत्रकार दुर्घटना बीमा योजना बंद कर दी है। हेमंत सोरेन सरकार ने इस योजना की शुरुआत की थी, जिसके तहत दुर्घटना में मौत होने पर पत्रकार के परिजन को 5 लाख रूपये मिलने का प्रावधान था। 

रघुवर सरकार का तर्क है कि प्रधानमंत्री बीमा योजना के तहत लाभुक को केवल 12 रूपये वार्षिक जमा करना होता है जबकि पत्रकार दुर्घटना बीमा योजना के तहत 137 रूपये । सवाल उठ रहे हैं कि सरकार क्या यह नहीं जानती कि 12 रूपये में केवल 2 लाख का बीमा होता है जबकि 137 रूपये में 5 लाख का? दरअसल राज्य सरकार पत्रकारों के लिए जमा करने वाले पैसे को बचाना चाहती है ।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

संदिग्ध हालात में बरामद हुए लापता पत्रकार चयन सरकार

अलीपुरद्वार (सिलीगुड़ी) : संदिग्ध हालात में पत्रकार चयन सरकार के बरामद होने के साथ उनके लापता होने को लेकर तरह तरह की अटकलों पर विराम लग गया। विगत रात यहां के कूचबिहार बस स्टैंड से पुलिस ने उन्हें बरामद किया। जबकि प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि चार पांच अज्ञात लोग चयन को वाहन से छोड़ गए। शनिवार को सीआइडी ने उन्हें कोर्ट में पेश किया। यद्यपि चयन के लापता और बरामद होने का घटनाक्रम अब भी तरह तरह के सवाल पैदा कर रहा है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि चयन जल्द मिल जाएंगे। 

गौरतलब है कि विगत 28 जुलाई को अलीपुरद्वार में तृणमूल युवा कांग्रेस पर लिखी एक रिपोर्ट के खिलाफ संगठन के पथावरोध के बाद चयन के मकान पर कथित रुप से तृणमूल समर्थकों ने हमला किया था। इस मामले में चयन सरकार ने अलीपुरद्वार थाने में शिकायत दर्ज कराई थी जिसमें नौ लोगों को नामजद किया गया था। एसपी के मुताबिक उसमें से केवल आठ को गिरफ्तार किया गया। एक की गिरफ्तारी नहीं किए जाने के विरोध में चयन सरकार ने थाने के सामने आमरण अनशन करने का कार्यक्रम बनाया था। उसके बाद से ही वह लापता हो गए थे।

सिलीगुड़ी में सीआइडी प्रभारी एसपी सुनील यादव के मुताबिक अपने एक पत्रकार सहकर्मी की मदद से चयन रात 8:55 मिनट पर दो अगस्त को अलीपुरद्वार के निकट सलसलाबाड़ी से लापता हुए थे। वह पारिवारिक अशांति की वजह से अवसाद से गुजर रहे थे। शांति की तलाश में वह उसी रोज कामाख्यागुड़ी से ट्रेन पर सवार होकर गुवाहाटी गए थे। लेकिन उनके पास केवल 1800 रुपए थे। इसलिए जब रुपए समाप्त हो गए तो वह शुक्रवार की रात को ही कूचबिहार स्थित ट्रक स्टैंड चले आए। वहां से पुलिस अपने हिफाजत में उन्हें ले आई। चूंकि चयन के अपहरण मामले में आइपीसी की धारा 364 के तहत शिकायत दर्ज कराई गई थी इसलिए उन्हें इस रोज अलीपुरद्वार अदालत में पेश किया गया। चयन के पिता ने मानसिक अवसाद की खबर को गलत बताते हुए कहा है कि चयन का उनकी पत्‍‌नी से तलाक सात माह पूर्व ही हो गया था इसलिए उनके अवसादग्रस्त होने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जब पत्रकार नौकरशाह-मंत्रियों को लड़कियां पहुंचाने लगें तो पत्रकारिता की गरिमा तार-तार होगी ही

गणेश शंकर विद्यार्थी जो अतीत से आज तक और आगे भी मिशन पत्रकारिता के पितामह जाने जाते रहेंगे, गांधी जी भी पत्रकार थे, अटल बिहारी वाजपेयी ने भी पत्रकारिता के गौरव पूर्ण काल के इतिहास को जिया है। लाल कृष्णा आडवाणी भी पत्रकार थे, बाला साहेब ठाकरे भी कार्टूनिस्ट पत्रकार थे लेकिन इन सभी ने कभी भी मिशन पत्रकारिता और उसकी गरिमा पर आंच नहीं आने दी. 

वर्तमान पत्रकारिता किस दौर से गुजर रही है ये स्थिति पूरे देश का एक एक नागरिक जानता है। पहले के अखबारों के मालिक कभी भी अपने संपादकों के काम में हस्तछेप नहीं किया करते थे और कभी कभार किया भी तो संपादक का चरित्र इतना मजबूत हुआ करता था कि संपादक मालिक को अपने काम में हस्तक्षेप करने के लिए मना कर दिया करता था लेकिन आज स्थिति इसके बिलकुल उलट है। आज अखबारों के मालिकों को संपादक नहीं विज्ञापन मैनेजर चाहिये। होते हैं और मिल भी रहे हैं।जब अखबारों के सम्पादक मालिकों के चाटुकार होंगे तो रिपोर्टर कैसा होगा, ये आप अनुमान लगा सकते हैं। 

आज आपको आसानी से भांड मिल जाएगा, दलाल मिल जाएगा, पत्रकार आसानी से नहीं, ब्लैक मेलर मिल जाएगा। स्थिति इससे और अधिक भयानक है, जब पत्रकार नौकरशाहों और मंत्रियों को लड़कियां पहुंचाने लगें तो मिशन पत्रकारिता की गरिमा तार तार होने ही लगेगी।

मैं पूछना चाहता हूँ उन पत्रकारों से, एक सीमित वेतन पाने वाला पत्रकार अकूत सम्पति का मालिक कैसे बन बैठा, बड़ी-बड़ी गाड़ियों का मालिक कैसे बन बैठा। ये सम्पन्नता किसी भी तरह से ईमानदारी से नहीं आ सकती है। इस सम्पन्नता को पाने के लिए पत्रकार को सबसे पहले भांड बनना होगा, दलाल बनना होगा, ब्लैक मेलर बनना होगा अथवा चकला घर का दलाल बनना होगा। कितनी शर्मनाक बात है। आज का पत्रकार कोठे का दलाल हो गया।

मेरी सभी ईमानदार पत्रकार भाइयों से अपील है कि मिशन पत्रकारिता को इस कठिन दौर से निकालने में अपनी भूमिका अदा कीजिये, नहीं तो कहीं देर हो गई तो आगे की पीढ़ियां हम सब को माफ़ नहीं करेंगी। हम सब मिलकर शपथ लें कि मिशन पत्रकारिता को भांड, दलाल, ब्लैकमेलर और कोठे के दलालों के हाथों से निकाल कर ईमानदार पत्रकारों के हाथों में कमान सौंपे। अब समय आ गया  है कि भ्रष्ट पत्रकारों के खिलाफ आंदोलन चलाया जाए और इनको पूरी तरह से उखाड़ फेंका जाए।

आप सभी ईमानदार पत्रकार इस आन्दोलन से जुड़ना चाहें तो आपका बहुत स्वागत है और एक बड़ी पहल की शुरुआत की जाए। आप सभी लोग इस पोस्ट को पढ़ने के बाद अपना मोबाइल नंबर जरूर देने का कष्ट करें।

लेखक एवं ‘दृष्टान्त’ मैगज़ीन के संपादक अनूप गुप्ता से संपर्क : 9795840775

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकार दधिबल यादव को मातृशोक

लखनऊ : वरिष्ठ पत्रकार दधिबल यादव की मां का 89 वर्ष की उम्र में पिछले दिनो निधन हो गया।

वह कुछ समय से बीमार चल रही थीं। वह अपने पीछे तीन बेटों-बहुओं, दो बेटियों का भरा-पूरा शोकाकुल परिवार छोड़ गई हैं। गौरतलब है कि करीब दो दशक तक राष्ट्रीय सहारा में वरिष्ठ पद पर कार्यरत रहे दधिबल यादव ने कुछ समय पूर्व इस अखबार को अलविदा कह दिया था। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राजेन्द्र माथुर की गैरहाजिरी के 25 साल

किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता, वो होते तो यह नहीं होता और यही खालीपन राजेन्द्र माथुर के जाने के बाद लग रहा है। यूं तो 8 अगस्त को राजेन्द्र माथुर का जन्मदिवस है किन्तु उनके नहीं रहने के पच्चीस बरस की रिक्तता आज भी हिन्दी पत्रकारिता में शिद्दत से महसूस की जाती है। राजेन्द्र माथुर ने हिन्दी पत्रकारिता को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया, वह हौसला फिर देखने में नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि उनके बाद हिन्दी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में किसी ने कमी रखी लेकिन हिन्दी पत्रकारिता में एक सम्पादक की जो भूमिका उन्होंने गढ़ी, उसका सानी दूसरा कोई नहीं मिलता है।

राजेन्द्र माथुर के हिस्से में यह कामयाबी इसलिए भी आती है कि वे अंग्रेजी के विद्वान थे और जिस काल-परिस्थिति में थे, आसानी से अंग्रेजी पत्रकारिता में अपना स्थान बना सकते थे लेकिन हिन्दी के प्रति उनकी समर्पण भावना ने हिन्दी पत्रकारिता को इस सदी का श्रेष्ठ सम्पादक दिया। इस दुनिया से फना हो जाने के 25 बरस बाद भी राजेन्द्र माथुर दीपक की तरह हिन्दी पत्रकारिता की हर पीढ़ी को रोशनी देने का काम कर रहे हैं।

राजेन्द्र माथुर की ख्याति हिन्दी के यशस्वी पत्रकार के रूप में रही है। शायद यही कारण है कि हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा हो और राजेन्द्र माथुर का उल्लेख न हो, यह शायद कभी नहीं होने वाला है। राजेन्द्र माथुर अपने जीवनकाल में हिन्दी पत्रकारिता के लिये जितना जरूरी थे, अब हमारे साथ नहीं रहने के बाद और भी जरूरी हो गये हैं। स्वाधीन भारत में हिन्दी पत्रकारिता के बरक्स राजेन्द्र माथुर की उपस्थिति हिन्दी की श्रेष्ठ पत्रकारिता को गौरव प्रदान करता है। पराधीन भारत में जिनके हाथों में हिन्दी पत्रकारिता की कमान थी उनमें महात्मा गांधी से लेकर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी थे। इन महामनाओं के प्रयासों के कारण ही भारत वर्ष अंग्रेजों की दासता से मुक्त हो सका। इस मुक्ति में हिन्दी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

भारत वर्ष के स्वाधीन हो जाने के बाद एकाएक अंग्रेजी ने ऐसी धाक जमायी कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजियत की छाया से भारतीय समाज मुक्त नहीं हो पाया था। स्वाधीनता के बाद ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता पर संकट स्वाभाविक था किन्तु इस संकट के दौर में मध्यप्रदेश ने एक बार फिर अपनी भूमिका निभाई और मालवा अंचल से राजेन्द्र माथुर नाम के एक ऐसे नौजवान को कॉलम राइटर के रूप में स्थापित किया जिसने बाद के वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी बल्कि यह कहना भी गैरवाजिब नहीं होगा कि अंग्रेजी पत्रकारिता भी उनसे रश्क करने लगी थी। यह गैरअस्वाभाविक भी नहीं था क्योंकि अखबारों की प्रकाशन सामग्री से लेकर प्रसार संख्या की द्ष्टि से हिन्दी के प्रकाशन लगातार विस्तार पा रहे थे। सीमित संचार सुविधायें और आवागमन की भी बहुत बड़ी सुविधा न होने के बावजूद हिन्दी प्रकाशनों की प्रसार संख्या लाखों तक पहुंच रही थी। अंग्रेजी पत्रकारिता इस हालात से रश्क भी कर रही थी और भय भी खा रही थी क्योंकि अंग्रेजी पत्रकारिता के पास एक खासवर्ग था जबकि हिन्दी के प्रकाशन आम आदमी की आवाज बन चुके थे। हिन्दी पत्रकारिता की इस कामयाबी का सेहरा किसी एक व्यक्ति के सिर बंधता है तो वह हैं राजेन्द्र माथुर।

बेशक राजेन्द्र माथुर अंग्रेजी के ज्ञाता थे, जानकार थे लेकिन उनका रिश्ता मालवा की माटी से था, मध्यप्रदेश से था और वे अवाम की जरूरत और आवाज को समझते थे लिहाजा हिन्दी पत्रकारिता के रूप और स्वरूप को आम आदमी की जरूरत के लिहाज से ढाला। उनके प्रयासों से हिन्दी पत्रकारिता ने जो ऊंचाई पायी थी, उसका उल्लेख किये बिना हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा अधूरी रह जाती है।

राजेन्द्र माथुर के बाद की हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा करते हैं तो गर्व का भाव तो कतई नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि राजेन्द्र माथुर के बाद हिन्दी पत्रकारिता की श्रेष्ठता को कायम रखने में सम्पादकों का योगदान नहीं रहा लेकिन सम्पादकों ने पाठकों के भीतर अखबार के जज्बे को कायम नहीं रख पाये। उन्हें एक खबर की ताकत का अहसास कराने के बजाय प्रबंधन की लोक-लुभावन खबरों की तरफ पाठकों को धकेल दिया। अधिक लाभ कमाने की लालच ने अखबारों को प्रॉडक्ट बना दिया। सम्पादक मुंहबायें खड़े रहे, इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है। हालांकि इस संकट के दौर में प्रभाष जोशी जैसे एकाध सम्पादक भी थे जिन्होंने ऐसा करने में साथ नहीं दिया और जनसत्ता जैसा अवाम का अखबार पाठकों के साथ खड़ा रहा।

ज्यादतर अखबारों बल्कि यूं कहें कि हिन्दी के प्रकाशन फैशन, सिनेमा, कुकिंग और इमेज गढऩे वाली पत्रकारिता करते रहे। इनका पाठक वर्ग भी अलग किस्म का था और इन विषयों के पत्रकार भी अलहदा। सामाजिक सरोकार की खबरें अखबारों से गायब थीं क्योंकि ये खबरें राजस्व नहीं देती हैं। इसी के साथ हिन्दी पत्रकारिता में पनपा पेडन्यूज का रोग। पत्रकारिता के स्वाभिमान को दांव पर रखकर की जाने वाली बिकी हुई पत्रकारिता। यह स्थिति समाज को झकझोरने वाली थी लेकिन जिन लोगों को राजेन्द्र माथुर का स्मरण है और जो लोग जानते हैं कि जिलेवार अखबारों के संस्करणों का आरंभ राजेन्द्र माथुर ने किया था, वे राहत महसूस कर सकते हैं कि इस बुरे समय में भी उनके द्वारा बोये गये बीज मरे नहीं बल्कि आहिस्ता आहिस्ता अपना प्रभाव बनाये रखे। अपने अस्तित्व को कायम रखा और इसे आप आंचलिक पत्रकारिता के रूप में महसूस कर सकते हैं, देख और समझ सकते हैं।

हिन्दी के स्वनाम-धन्य अखबार जब लाखों और करोड़ों पाठक होने का दावा ठोंक रहे हों। जब उनके दावे का आधार एबीसी की रिपोर्ट हो और तब उनके पास चार ऐसी खबरें भी न हो जो अखबार को अलग से प्रतिष्ठित करती दिखती हों तब राजेन्द्र माथुर का स्मरण स्वाभाविक है। राजेन्द्र माथुर भविष्यवक्ता नहीं थे लेकिन समय की नब्ज पर उनकी पकड़ थी। शायद उन्होंने आज की स्थिति को कल ही समझ लिया था और जिलेवार संस्करण के प्रकाशन की योजना को मूर्तरूप दिया था। उनकी इस पहल ने हिन्दी पत्रकारिता को अकाल मौत से बचा लिया। राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर पर हिन्दी पत्रकारिता की दुर्दशा पर विलाप किया जा रहा हो या बताया जा रहा हो कि यह अखबार बदले जमाने का अखबार है किन्तु सच यही है कि जिस तरह महात्मा गांधी की पत्रकारिता क्षेत्रीय अखबारों में जीवित है उसी तरह हिन्दी पत्रकारिता को बचाने में राजेन्द्र माथुर की सोच और सपना इन्हीं क्षेत्रीय अखबारों में है।

हिन्दी पत्रकारिता को बहुत शिद्दत से सोचना होगा, उनके शीर्षस्थ सम्पादकों को सोचना होगा कि वे हिन्दी पत्रकारिता को किस दिशा में ले जा रहे हैं? पत्रकारिता के ध्वजवाहकों द्वारा तय दिशा और दृष्टि से हिन्दी पत्रकारिता भटक गई है। हां, आधुनिक टेक्रालॉजी का भरपूर उपयोग हो रहा है और सम्पादक मोहक तस्वीरों के साथ मौजूद हैं। आज के पत्रकार राजेन्द्र माथुर थोड़े ही हंै जिनकी तस्वीर भी ढूंढ़े से ना मिले। यकिन नहीं होगा, किन्तु सच यही है कि जब आप हिन्दी के यशस्वी सम्पादक राजेन्द्र माथुर की तस्वीर ढूंढऩे जाएंगे तो दुर्लभ किस्म की एक ही तस्वीर हाथ लगेगी लेकिन उनका लिखा पढऩा चाहेंगे तो एक उम्र की जरूरत होगी।

लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकार की पत्नी से डॉक्टर ने की छेड़खानी, रिपोर्ट दर्ज

गाजियाबाद : जिला अस्पताल में जांच कराने पहुंची जर्नलिस्ट की पत्नी से डॉक्टर ने छेड़छाड़ की। पीड़िता ने डॉक्टर पर छेड़छाड़ और मारपीट का आरोप लगा है। डाक्‍टर ने आरोपों से इनकार किया है। कविनगर पुलिस को दोनों पक्षों ने तहरीर दी है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

मुरादनगर निवासी पत्रकार ने आरोप लगाया है कि वह अपनी गर्भवती पत्‍नी का अल्‍ट्रासाउंड कराने के लिए संयुक्‍त अस्‍पताल गया था। जांच के दौरान डॉक्टर ने उसकी पत्‍नी से अश्लील हरकत की। विरोध करने पर उसने मारपीट भी की। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मीडियाकर्मियों की मोर्चेबंदी से पकड़ा गया पर्स लुटेरा

इंदौर : तुकोगंज थाने के ठीक सामने एक बदमाश ने 10-10 के नोट सड़क पर फेंके और महिला को झांसा देते हुए उसका पर्स चुराकर भागने लगा। वारदात वहां खड़े दो मीडियाकर्मियों ने देखी। उन्होंने लुटेरे को पकड़ने के लिए करीब आधा किमी दौड़ लगाई। लुटेरे ने हाथापाई की, लेकिन मीडियाकर्मियों ने उसे पकड़कर पुलिस को सौंप दिया।

शाम करीब 5.15 बजे नईदुनिया के फोटो जर्नलिस्ट आशु पटेल और एक न्यूज चैनल के जर्नलिस्ट राहुल वावीकर थाने के सामने खिचड़ी खा रहे थे। तभी उनका ध्यान कुछ दूर एक महिला पर गया। वह सड़क पर गिरे 10-10 के नोट उठा रही थी। तभी एक लुटेरे ने महिला की कार से पर्स उड़ाकर दौड़ लगाई। यह देख आशु और राहुल भी उसके पीछे दौड़े। राहुल ने बताया कि लुटेरा सिटी सेंटर से भागकर हाई कोर्ट तिराहे तक पहुंचा और पलासिया की ओर भागने लगा। राहुल ने उसे मस्जिद के पास दबोच लिया। राहुल ने बताया कि जब लुटेरे को पकड़ने के लिए दौड़ रहे थे, तो उसने आधे रास्ते में पर्स फेंक दिया। आशु ने राहुल से कहा कि तुम उसका पीछा करो। पर्स मैं उठा लूंगा।

राहुल ने बताया कि दौड़ते समय मुझे एक पल अहसास हुआ कि लुटेरे के पास चाकू या हथियार हो सकता है, लेकिन आशु को आते देख साहस कम नहीं हुआ। मैंने ठान लिया था कि अब कुछ भी हो, मैं उसे पकड़कर रहूंगा।

पकड़े गए आरोपी ने खुद का नाम प्रतीक बताया है। आरोपी दक्षिण भारत का है। उसने पूछताछ में बताया कि वारदात के समय उसका एक साथी भी था। प्रतीक और उसकी गैंग से जुड़े सदस्यों के बारे में पुलिस जानकारी निकाल रही है। दरअसल, पिछले दिनों सी-21 मॉल की पार्किंग और 56 दुकान पर भी नोट फेंक कर लूटने की वारदात हो चुकी है। एसपी (ईस्ट) ओपी त्रिपाठी ने राहुल और आशु को बधाई देते हुए विभाग की ओर से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इसी तरह, शहर के सभी मीडियाकर्मियों द्वारा भी दोनों को शुक्रवार को सम्मानित किया जाएगा।

जिस महिला का पर्स बदमाश ने लूटा था, उनका नाम रोहिणी अरुण ताउसे (40) निवासी साईंकृपा कॉलोनी है। वे एक निजी कंपनी में नौकरी करती है। उनके मुताबिक मैं डीपी ज्वेलर्स पर सहेली को छोड़ने आई थी। जाते समय पिता का फोन आया। इस दौरान बदमाश ने सड़क पर नोट फेंके। उसने कहा- आपके नोट गिर गए हैं। उठा लो। मैं उठाने के लिए झुकी और दूसरी ओर से बदमाश ने अगली सीट पर रखा मेरा पर्स उड़ा लिया। इस घटना लगभग दो सेकंड में हुई।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पुणे में पत्रकारों पर हिंसक भीड़ का हमला, चार घायल

पुणे (महाराष्ट्र) : कामशेत में एक मनसे कार्यकर्ता के मर्डर की रिपोर्टिंग करने गये प्रिन्ट तथा इलेक्टॉनिक मिडिया के रिपोर्टर्स की जमकर पिटाई की गई. हमले में चार पत्रकार घायल हो गये। पत्रकार संगठनों ने घटना पर रोष जताते हुए दोषियों को शीघ्र गिरफ्तार करने की मांग की है। 

बंटी वालुंज नाम के मनसे कार्यकर्ता का कल मर्डर हुआ था. हत्या के बाद मनसे और मृतक के परिजनों का कहना था कि जब तक अपराधी पकड़े नहीं जाते, वे डेड बॉडी कब्जे में नहीं लेने देंगे। इससे माहौल काफी गरमा गया. पत्थरबाजी शुरू हो गयी. इसमे कुछ दुकानों और गाड़ियों के शीशे टूट गये. इस वारदात का फोटो ले रहे पत्रकारों पर भीड़ ने हमला बोल दिया. पत्रकारों की जमकर पिटाई की गई. चार पत्रकार घायल हो गये. इस घटना की पुणे जिला पत्रकार संघ ने कड़े शब्दों में आलोचना की है.

रत्नागिरी में भी जी-24 के पत्रकार प्रणव पालेकर को जान से मारने की धमकी दी गई. इसके विरोध में रत्नागिरी में पत्रकारों ने जिलाधिकारी से भेट कर उन्हे ज्ञापन दिया. दोनों वारदातों की पत्रकार हमला विरोधी कृती समिति ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए दोषियों को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग की है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

फेसबुक पर आतंकी बनने की इच्छा जताने वाला पत्रकार गिरफ्तार

सोशल साइट फेसबुक पर याकूब मेमन को शहीद बताने वाले पत्रकार जुबैर अहमद खान को वसंत बिहार (दिल्ली) की पुलिस ने मुंबई में गिरफ्तार कर लिया है। जुबेर अहमद खान ने अपनी पोस्ट में इस्लामिक स्टेट में शामिल होने की मंशा भी व्यक्त की थी। 

जुबैर नवी मुंबई के निवासी हैं। मुंबई पुलिस भी जुबैर की फेसबुक पोस्ट की छानबीन कर रही है। जुबेर ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि मुंबई छोड़ कर आतंकी संगठन आईएस में शामिल होने के लिए वह अपना पासपोर्ट जमा कर देगा। वह आईएस का प्रवक्ता बनना चाह रहा है। वह दिल्ली स्थित इराकी दूतावास जा रहा है। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दक्षिण भारतीय पत्रकार कुख्यात आतंकवादी संगठन आईएसआईएस में शामिल

मीडिया सूचनाओं के मुताबिक पालाक्‍कड के एक मलयालम समाचारपत्र से इस्तीफा दे चुके एक पत्रकार के कुख्यात आतंकवादी संगठन आईएसआईएस में सक्रिय होने की जानकारी मिली है।

आईबी और केरल गृह मंत्रालय स्तर पर मामले की छानबीन चल रही है। उस पर आईबी पिछले एक साल से नजर रखे हुए है। इन दिनो उसके सीरिया में होने का अंदेशा है। वह गया तो था खाड़ी देश नौकरी करने के लिए लेकिन आतंकी संगठनों के संपर्क में पहुंच गया। घर वालो के मना करने के बावजूद वह आईएसआईएस में सक्रिय हो गया है। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

देहरादून में वरिष्ठ पत्रकार अशोक पांडेय का मकान ढहाया गया

देहरादून : उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत के निजी सचिव आईएएस मोहम्मद शाहिद का स्टिंग ऑपरेशन करने वाले पत्रकार अशोक पांडेय का घर मंगलवार को मसूरी-देहरादून डिवेलपमेंट अथॉरिटी ने ढहा दिया। स्टिंग में शाहिद राज्य में शराब की बिक्री संबंधी नीतियों को बदलने के लिए रिश्वत की मांग करते दिखाए गए थे।

शासकीय सूत्रों के मुताबिक अशोक पांडेय ने अवैध तरीके से अपने मकान का निर्माण कराया था। उनको वर्ष 2012 में इस बारे में अवगत करा दिया गया था। मकान के अवैध हिस्से को पुलिस और संबंधित अधिकारियों के सामने तोड़ा गया।

गौरतलब है कि अशोक पांडेय दैनिक जागरण और अमर उजाला में लंबे समय तक शीर्ष पद पर रहे हैं। मकान को तोड़ने का आदेश 10 जुलाई को जारी किया गया और नियमों के मुताबिक पांडेय को बताया भी गया था। स्टिंग के बाद अशोक पांडेय ने अपनी जान का खतरा बताया था। पांडेय का कहना है कि स्टिंग के कारण ही उनका मकान तोड़ा गया है। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड के गवाहों को बचाना जरूरी : आईपीएस अमिताभ

लखनऊ : शाहजहांपुर के दिवंगत पत्रकार जागेंद्र सिंह के बेटे के अचानक मंत्री राममूर्ति वर्मा के पक्ष में बयान देने के बाद आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले में जागेंद्र के लड़कों सहित सभी गवाहों की रक्षा करने और सच्चाई सामने लाने के लिए राज्य सरकार को उपयुक्त माहौल बनाने के निर्देश देने का अनुरोध किया है।

उन्होंने कहा कि इन लड़कों ने उनके सामने ही कहा था कि उनके पिता को राममूर्ति वर्मा के इशारे पर जलाकर मारा गया और मुख्यमंत्री से 30 लाख रुपये की मदद मिलने के आश्वासन के बाद जिस प्रकार जागेंद्र के बेटे और अन्य गवाह बार-बार अपनी बात बदल रहे हैं, उससे यह साफ दिखता है कि उन पर भारी दवाब और लालच डाला जा रहा है। प्रथम दृष्टया यह दवाब मंत्री राममूर्ति वर्मा द्वारा किया गया दिखता है। ऐसा दिखता है कि वर्मा अपनी ताकत और सत्ता का उपयोग कर गवाहों और साक्ष्यों पर अनुचित दवाब दे रहे हैं। ठाकुर ने मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में न्याय की दृष्टि से दखल देकर राज्य सरकार को सभी गवाहों की पूरी रक्षा करने के निर्देश देने का अनुरोध दिया, ताकि सत्य सामने आ सके।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

फोटो पत्रकार की हत्या, अपार्टमेंट में मिले पांच लोगों के शव

मैक्सिको की एक खोजी पत्रिका प्रोसेसो के मुताबिक मैक्सिको सिटी में एक अपार्टमेंट में पांच लोगों के शव मिले, जिनमें एक फोटो पत्रकार का शव भी है। फोटो पत्रकार रूबेन एस्पिनोसा शुक्रवार से लापता थे और शनिवार दोपहर उनके परिवार के सदस्यों ने उनकी पहचान की। उनके शरीर पर दो जगह गोली लगने के निशान थे।

एस्पिनोजा अन्य मीडिया से भी जुड़े थे और हाल में वह खाड़ी तट के राज्य वेराक्रूज चले गए थे, जहां उन्हें उनकी जान को खतरा महसूस होता था। अन्य पीड़ितों की पहचान नहीं हो पाई। वेराक्रूज पत्रकारों के लिए बहुत खतरनाक राज्य रहा है। पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनी समिति ने जनवरी में इस बात की पुष्टि की थी कि काम के कारण 2011 से चार पत्रकारों की हत्या कर दी गई। समिति कम से कम छह अन्य की मौत की जांच कर रही थी।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

डीएम ने मुर्गा न बनने पर पत्रकार की बाइक पुलिस को सौंप दी

बाराबंकी (उ.प्र.) : जिलाधिकारी ने सरेआम मामूली सी बात पर कल सुबह 10.21 बजे डीएम ऑफिस मोड़ पर ‘क्राइम रिब्यू’ के पत्रकार रामशंकर शर्मा को पहले मुर्गा बनने को कहा। ऐसा न करने पर पुलिस को बुलाकर पुनः दबाव बनाया। 

शर्मा ने बताया कि वह कचहरी गेट से मोटरसायकिल चलाकर अंदर जा रहा थे। मोबाइल पर काल अटैंड करने के लिए बाइक किनारे खड़ी कर बात करने लगे। इसी समय डीएम की कार पीछे से आ गई। कार का हार्न सुनकर शर्मा ने बाइक थोड़ी और किनारे कर ली, फिर भी डीएम ने गनर से बाइक की चाबी निकालने और शर्मा को सबके सामने मुर्गा बनने को कहा। मना करने पर पुलिस बुलवाकर उनकी बाइक कोतवाली भिजवा दी।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हल्द्वानी में पत्रकार गौरव गुप्ता और दानिश खान का सम्मान

हल्द्वानी। समूह ग पेपर के लीक होने के मामले में खोजी पत्रकारिता करने वाले देवभूमि पोलखोल समाचार पत्र के सम्पादक गौरव गुप्ता व रामनगर के संवाददाता दानिश खान को जिलाधिकारी दीपक रावत और उत्तराखण्ड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन ने हल्द्वानी में शाल ओढ़ाकर व स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया। 

जिलाधिकारी कार्यालय में एक सम्मान समारोह आयोजित किया गया जिसमें जिलाधिकारी ने समाचार पत्र के सम्पादक व संवाददाता को सम्मानित किया। इस समाचार पत्र द्वारा खोजी पत्रकारिता करते हुए प्रदेश में समूह ग के लीक पेपर का खुलासा किया गया था जिसके बाद प्रदेश में समूह ग की परीक्षा निरस्त की गयी। अब इस मामले में एसटीएफ के अधिकारी आईपीएस डा. सदानंद दाते जांच कर रहे हैं।

इस मौके पर डीएम नैनीताल ने खोजी पत्रकारिता करने के लिए पत्रकारों की सराहना की। कार्यक्रम में उत्तराखण्ड श्रमजीवी यूनियन के प्रदेश उपाध्यक्ष पंकज वार्ष्णेय, जिलाध्यक्ष विपिन चन्द्रा ने देवभूमि पोलखोल समाचार पत्र द्वारा पत्रकारिता के माध्यम से घोटाले व भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने पर उनकी मुक्तकंठ से सराहना की। इस अवसर पर एडीएम आरडी पालीवाल, सिटी मजिस्ट्रेट हरवीर सिंह, एसडीएम पंकज उपाध्यक्ष, मलिन बस्ती सुधार समिति के सदस्य खजान पाण्डे, पत्रकार कमल सुयाल, हर्ष रावत सहित अनेक पत्रकार मौजूद रहे।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकार रमा पांडे को ब्रिटने का ‘भारत गौरव सम्मान’

बीबीसी की पूर्व पत्रकार और जानी मानी समाचार वक्ता रमा पांडे को लंदन में उनके जीवन भर की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया। रमा पांडे को पत्रकारिता व सामाजिक कार्यों के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भारत गौरव सम्मान से सम्मानित किया। वह भारत की जानी मानी पत्रकार के साथ-साथ कवियित्री, कलाकार और एक्टिविस्ट हैं।

रमा नें कई साल दूरदर्शन में काम किया और उन्हें बीबीसी के साथ काम करने का भी लंबा अनुभव है। उनके साथ गूगल बॉय कौटिल्य, मेजर ध्यानचंद, इंदिरा नूई को भी सम्मानित किया गया। रमा पांडे कहती हैं, ‘मुझे आज बहुत गर्व हो रहा है की आज मुझे यह सम्मान मिला है और इसके लिए में सभी का आभार प्रकट करती हूं की सब ने मुझे प्रोत्साहित किया और मेरे कार्य को सराहा। मुझे अपने भारतीय होने पर गर्व है और हमेशा यही कोशिश है में हमेशा अपने देश के लिए कुछ न कुछ करती रहूं।’

रमा पांडे को विभिन्न क्षेत्रों में 40 साल का व्यापक अनुभव है। बचपन से ही, उनकी रचनात्मक क्षेत्र में रुचि रही है और उन्होंने बाल कलाकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। उनके प्रोफेशन अनुभव में डीडी इंडिया और बीबीसी हिंदी के साथ काम करना शामिल है। बुश हाउस लंदन में बीबीसी हिंदी सेवा में, उन्होंने बीबीसी एशियन टेलिविजन को नियमित रूप से अपना योगदान दिया और एशिया में बीबीसी के कुछ प्रमुख क्षेत्र परियोजनाओं की दिशा में भी काम किया।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

होशियार ! साजिश का शिकार हो सकता है मजीठिया मामला

भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है कि मजीठिया मामले में गंभीर साजिश रची जा रही है। समझ में नहीं आ रहा है कि किस पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं। कुछ लोग व्‍यक्तिगत लाभ के लिए अखबार मालिकों के हाथों की कठपुतली बने हैं। वे सुप्रीम कोर्ट में भ्रम पैदा कर सकते हैं और मजीठिया का केस खराब कर सकते हैं। 

ऐसे स्‍वार्थी तत्‍वों से सावधान रहने की जरूरत है। उनका पर्दाफाश मैं अभी कर देता, लेकिन उससे हमारी जांच का कार्य प्रभावित हो सकता है। इसलिए अधिक विस्‍तार से कुछ भी बताने में असमर्थ हूं, लेकिन समय आने पर उनका पर्दाफाश हो जाएगा। अब जरूरत है अधिक मजबूती के साथ एकजुट रहने की। हमारी एकता को बड़ा विस्‍तार दिए जाने की जरूरत है। हम एकजुट नहीं होंगे तो हमारी जीती बाजी का लाभ कोई और उठा ले जाएगा। 

जब भी किसी अच्‍छे उद्देश्‍य के लिए काम किया जाता है, ऐसे स्‍वार्थी तत्‍व हरकत में आ जाते हैं। उसका लाभ उठाने का प्रयास प्रबंधन जरूर करता है लेकिन हमारी एकजुटता प्रबंधन के मंसूबों पर पानी फेर देगी। सुप्रीम कोर्ट में फिटमेंट दस्‍तावेज की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन उस पर कोई काम नहीं किया जा रहा है। मान लीजिए सुप्रीम कोर्ट में अखबार मालिकों ने कह दिया कि हम मजीठिया वेतनमान और एरियर दे रहे हैं और हमें उसका हिसाब बताया जाए। यदि मौके पर हिसाब किताब पेश नहीं किया गया तो सारा खेल खराब हो सकता है। इसलिए जरूरत है कि हम सब एकजुट होकर फिटमेंट के कागजात तैयार करा लें, ताकि उसे मौके पर पेश किया जा सके। अधिक जानकारी के लिए आप अपने अधिवक्‍ता की मदद ले सकते हैं।

श्रीकांत सिंह के एफबी वाल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: