जेल-थानों में मर्डर को जायज ठहराने वाली ‘भक्त’ मानसिकता की पड़ताल

Ashwini Kumar Srivastava

मुन्ना बजरंगी के जेल में मारे जाने की घटना पर भाजपा समर्थक गजब प्रतिक्रिया दे रहे हैं। उन्हें गुस्सा आ रहा है, जैसे ही भाजपा विरोधी यह पूछ रहे हैं कि बताओ जेल में मार डाला…तो अब यूपी में योगी राज में क्या लोग थानों और जेलों में भी मारे जाएंगे? इस पर तुनक कर समर्थक जवाब दे रहे हैं कि साला क्रिमिनल था…अच्छा हुआ, जो किसी ने उसे मार डाला।

जेल में घुस कर मारा हो या थाने में, या फिर सरेआम बीच चौराहे पर, समर्थकों को जगह और हत्या से कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि वे हिंदुत्व के नाम पर जंगलराज की हद तक जाकर भीड़ द्वारा कबायली न्याय तक को वाजिब ठहरा ही चुके हैं। इसलिए उनके लिये जगह और हत्या की बजाय, यह जानना ज्यादा जरूरी है कि मारा गया व्यक्ति कौन था। जाहिर है, मारा गया व्यक्ति अपराधी था, हत्यारा था, भाजपा के एक नेता का हत्यारा था (तो हिंदुत्व का दुश्मन भी था)…वगैरह वगैरह…

बस इसी कारण समर्थकों की नजर में उसकी हत्या जायज है…और जब हत्या जायज है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि किसने मारा, क्यों मारा और कहां मारा? ये सवाल और इनके जवाब ही इनके लिए बेमानी हैं। फिर भी यदि कोई पुलिस / जांच संस्था, मीडिया, अदालत या कोई भी इन सवालों का जवाब जानने की कोशिश करे तो वह इनकी नजर में खान्ग्रेसी, राष्ट्र विरोधी और बजरंगी समर्थक है ही।

कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह कि अब अंडरवर्ल्ड के उन माफिया सरगनाओं और अपराधियों के अच्छे दिन आ गए हैं, जो भाजपा से जुड़े हैं। जाहिर है, भाजपा से जुड़े हैं तो हिंदूवादी हैं और राष्ट्रभक्त हैं। ऐसे में उनकी जान बचाना राष्ट्र की पुलिस, सेना आदि का कर्तव्य है। और उनके विरोधी (जो कि स्वाभाविक तौर पर अब राष्ट्र विरोधी हो गए, क्योंकि समर्थकों की नजर में केवल दो ही खेमे हैं) यदि सरकार की कस्टडी यानी कि पुलिस हिरासत, जेल या अदालत में मारे जा रहे हैं तो इसके लिए ये समर्थक अपने मुख्यमंत्री की जय जयकार करेंगे ही। और क्यों न करें भला, जब उनकी पार्टी की सरकार में सारे राष्ट्र विरोधी माफिया सरगना/अपराधी अब मारे जा रहे हैं।

इन्हें हिन्दू और राष्ट्र भक्त माफिया सरगना और अपराधी कुबूल हैं… उनकी हर कारगुजारी इन्हें कुबूल है, उनका हर सितम यह हंस कर झेल लेंगे, उनकी चलाई हुई हर गोली से बहा हुआ खून इन्हें पानी नजर आएगा, उनके किये हुए हर पाप में यह भागीदार बनने को तैयार हैं, उनके द्वारा की गई या करवाई गई हर हत्या, बलात्कार और अपहरण आदि की तरफ से यह नजरें मूंद लेंगे….सिर्फ इसलिए क्योंकि इन्हें हिंदुत्व को बचाना है, इस देश को बचाना है।

इस देश में जब सारे माफिया सरगना हिन्दू और राष्ट्रवादी हो जाएंगे, हर अपराधी भारत माता की जय या वंदे मातरम या फिर हर हर महादेव या जय माँ काली का गगनभेदी नारा लगाएगा, भगवा पहनेगा, तिलक लगाएगा…फिर हर चौराहे पर भीड़ भी कबायली इंसाफ कर रही होगी, हर आदमी के हाथ में जब हथियार होगा, जिससे वह हर राष्ट्रद्रोही और गद्दार की हत्या करेगा…इन्हें लगता है कि तब ही कहीं जाकर यह देश और यह धर्म बच पायेगा।

ये अदालतें, ये पुलिस, ये संविधान, ये संसद/विधानसभा, ये मीडिया, ये निष्पक्ष सेना…ये सब कुछ हिंदुत्व और इनके सपनों का राष्ट्र बनने की राह में अब शायद सबसे बड़ा रोड़ा है। पता नहीं, यह रोड़ा ये लोग मिलकर कब तक हटा पाएंगे…

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फ़िल्म ‘सत्या’ के भीखू म्हात्रे और यूपी के मुन्ना बजरंगी, दोनों की जिंदगी और मौत के बीच अद्भुत साम्यता है। फिल्मी किरदार भीखू म्हात्रे के दुःसाहस से जिस तरह समूचा अंडरवर्ल्ड तो दहशतज़दा और खफा था ही, खुद अंडरवर्ल्ड में उसके आका रह चुके माफिया सरगना व नेता भी नाराज थे। नतीजा यह हुआ कि उसे बिना एक सेकंड का मौका दिए ही उसके सिर में पीछे की तरफ से गोलियां उतार दी गईं।

ऐन इसी तरह मुन्ना बजरंगी के सिर में भी पीछे की तरफ ही ताबड़तोड़ गोलियां मारी गईं, जिससे शायद सेकंडों में ही मुन्ना बजरंगी के प्राण पखेरू उड़ गए। रामगोपाल वर्मा ने अंडरवर्ल्ड पर अपनी माइलस्टोन फिल्म में इसी हकीकत को भीखू म्हात्रे की सेकंडों में हुई मौत के जरिये ही दर्शाया है…कि दुःसाहस यहां इसी तरह की मौत देता है…भले ही भीखू म्हात्रे या मुन्ना बजरंगी जैसे किसी दुःसाहसी माफिया सरगना की तरह उसके जीते जी समूचा अंडरवर्ल्ड उसके आगे थर थर कांपता सा नजर आ रहा हो।

दरअसल, यहां भीखू म्हात्रे हमेशा ऐसे ही मारे जाते हैं और अंत में जीत सत्या की ही तरह भीखू को मारने वाले भाऊ ठाकुर दास झावले जैसे घुटे हुए किरदार की ही होती है, जो दुश्मनी करता है और दुश्मनों को भीखू की ही तरह बख्शता भी नहीं है…मगर वह यह काम किसी दुःसाहस या बड़बोलेपन से नहीं करता है बल्कि खामोशी से करता है, धैर्य के साथ करता और पूरे शांत दिमाग से प्लानिंग करके करता है।

वैसे, फ़िल्म सत्या में तो रामगोपाल वर्मा दिखाना चाहते थे इसलिए लोगों ने देख लिया कि भीखू म्हात्रे को किसने मारा। लेकिन यहाँ मुन्ना बजरंगी की मौत का दृश्य लिखने वाले राइटर ने महज गोली चलाने वाले किरदार को ही दुनिया के आगे किया है।

खुद वह भाऊ ठाकुर दास झावले की ही तरह राजनीति का झक सफेद खद्दर पहनकर विधानसभा या संसद के भीतर बैठा है या 2019 में बैठने की तैयारी कर रहा है।

मीडिया और पुलिस अटकलें लगा रही हैं कि आखिर हकीकत के अंडरवर्ल्ड का भाऊ ठाकुर दास झावले कौन है? किसी खबर में मनोज सिन्हा, बृजेश सिंह और धनन्जय सिंह की तिकड़ी को इस सनसनीखेज पटकथा का निर्देशक बताया जा रहा है तो किसी खबर में खुद मुख्तार अंसारी को ही इसके पीछे जिम्मेदार बताया जा रहा है।

इसके पीछे का तर्क यह है कि ऐन सत्या फ़िल्म के भीखू म्हात्रे की ही तर्ज पर उभरते हुए मुन्ना बजरंगी ने एक दिन अचानक अपने भाऊ यानी मुख्तार अंसारी की ही बात सुनने और उसे मानने से इनकार कर दिया। मुख्तार से अभयदान पाए धन पशुओं से ही बजरंगी ने वसूली शुरू कर दी और खुद मुख्तार के समझाने पर भी नहीं माना तो खफा होकर मुख्तार अंसारी ने ही बजरंगी का काम तमाम करा दिया।

एक कहानी यह भी पढ़ने को मिल रही है कि इससे पहले भी एक बार मुन्ना बजरंगी को जब कई गोलियां मारी गयी थीं तो उस वक्त छोटा राजन और बबलू श्रीवास्तव की सरपरस्ती में मुन्ना बजरंगी की जान बचाई गयी थी और उनके ही आदमी बजरंगी को लखनऊ में एक बड़े अस्पताल में भर्ती कराने से लेकर ठीक होने तक साये की तरह रहे।

जबकि बजरंगी पर हमला करवाने वाले उसके दुश्मन व मुख्तार के जानी दुश्मन रहे माफिया सरगना बृजेश सिंह के गुट को दाऊद इब्राहिम का सीधा प्रश्रय हासिल था।

बृजेश सिंह से इधर धन्नजय सिंह की भी नजदीकियां खासी बढ़ीं हैं और दिलचस्प बात यह है कि धनंजय सिंह से ही इधर कुछ महीनों से बजरंगी की खुली शत्रुता का चर्चा भी जोर पकड़े हुए था।

अब कौन जाने कि छोटा राजन और बबलू श्रीवास्तव जैसे कुख्यात एवं अंतरराष्ट्रीय माफिया सरगनाओं की सरपरस्ती में भीखू म्हात्रे की ही तरह खुद को पूर्वांचल का किंग कह कर ठहाके लगाने वाले मुन्ना बजरंगी को किस भाऊ ठाकुर दास झावले ने भीखू की तरह सेकंडों में टपका दिया।

मीडिया, सोशल मीडिया व गली-मोहल्ले की चर्चाओं और खुद बजरंगी की पत्नी की मानें तो वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री मनोज सिन्हा व दाऊद इब्राहिम की सरपरस्ती पाए हुए माफिया सरगना बृजेश सिंह व बृजेश सिंह के नजदीक आ चुके राजनीतिज्ञ व माफिया सरगना धनंजय सिंह की तिकड़ी ही यहां बजरंगी के लिए भाऊ बन गयी है। जबकि दूसरी तरफ कम ही सही मगर मीडिया में इस बात का भी चर्चा तो है ही कि मुख्तार अंसारी का हाथ भी इस हत्याकांड में हो सकता है।

अब सच क्या है, क्या पता …अगर सफेदपोश या कोई राजनीतिक रूप से ताकतवर इंसान इस समूचे कांड का सूत्रधार है…तो फिर समझ लीजिए कि सत्या की तरह यहां हकीकत में हम लोग उस भाऊ ठाकुर दास झावले का नाम कभी जान ही नहीं पाएंगे।

वह इसी तरह हमें हमेशा ही सफेद खादी के पीछे अपने खून से रंगे हाथ छिपाये किसी न किसी शहर या हो सकता है कि प्रदेश या देश का ही सबसे सम्मानित शख्स नजर आता रहे….

हां, एक बात जरूर तय है कि लोग और पुलिस भले ही न जान पाएं मगर समूचा अंडरवर्ल्ड अब तक जान चुका होगा कि यह हत्या किसने करवाई और अब इसके बाद क्या होने वाला है…

क्या पता यह हत्या ही अब निर्विवाद रूप से बजरंगी के हत्यारे को अंडरवर्ल्ड का बेताज बादशाह बना दे…और क्या पता अब तक इस हत्या के मास्टरमाइंड की हत्या के लिये भी अंडरवर्ल्ड में बजरंगी के सरपरस्तों ने अपने-अपने मोहरे चुन भी लिए हों।

बहरहाल, हमें तो पुलिस और मीडिया की ही तरह से खामोशी से बजरंगी या उसके सरपरस्त आकाओं के गिरोह में से किसी ‘सत्या’ के निकलने का इंतजार करना है…ताकि वह भाऊ को ढूंढ कर भीखू वाले दुःसाहस से ही बजरंगी का बदला ले सके…इसके लिए अंडरवर्ल्ड की इस खूंखार लड़ाई में हमें अगली किसी और बड़ी वारदात का इंतजार रहेगा…क्योंकि उसी से तो हम यह जान पाएंगे कि पुलिस या मीडिया हमें जिस हत्यारे का नाम बताएगी, वही भाऊ ठाकुर दास झावले है या फिर कोई और…

पत्रकार से उद्यमी बने लखनऊ निवासी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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