जेल-थानों में मर्डर को जायज ठहराने वाली ‘भक्त’ मानसिकता की पड़ताल

Ashwini Kumar Srivastava

मुन्ना बजरंगी के जेल में मारे जाने की घटना पर भाजपा समर्थक गजब प्रतिक्रिया दे रहे हैं। उन्हें गुस्सा आ रहा है, जैसे ही भाजपा विरोधी यह पूछ रहे हैं कि बताओ जेल में मार डाला…तो अब यूपी में योगी राज में क्या लोग थानों और जेलों में भी मारे जाएंगे? इस पर तुनक कर समर्थक जवाब दे रहे हैं कि साला क्रिमिनल था…अच्छा हुआ, जो किसी ने उसे मार डाला। Continue reading

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अमृत चख कर लीडा की कुर्सी पर बैठे एसपी सिंह को योगी सरकार ने अब मृत्युलोक के तमाम आम प्राणियों की तरह नश्वर बना दिया

औद्योगिक विकास प्राधिकरणों को कोई अफसर अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह नहीं चला पायेगा…

Ashwini Kumar Srivastava : प्रदेश के औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में बरसों से कुंडली मारकर बैठे भ्रष्ट अफसरों-कर्मियों के लिए आज बड़ा ही बुरा दिन है। राज्यपाल ने आज आठ विधेयकों को अंतिम मंजूरी दी है, जिसमें वह संशोधन भी शामिल है, जिसके तहत अब औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अफसर-कर्मी भी प्रदेश के अन्य विकास प्राधिकरणों में ट्रांसफर करके भेजे जा सकेंगे।

राज्य के औद्योगिक विकास पर ग्रहण बनकर छाए हुए ये अफसर-कर्मी किस कदर भ्रष्ट और बेखौफ थे, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण तो मैं खुद रहा हूँ। लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण (लीडा) को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदल कर अपने ही खासमखास अफसरों-कर्मियों का गिरोह बनाकर वहां के वरिष्ठ अफसर एस. पी.सिंह ने हमारे प्रोजेक्ट की मंजूरी ढाई साल तक किसी न किसी बहाने से लटकाए रखी थी।

जब भी उससे मैं अपनी फ़ाइल आगे बढ़ाने की बात करने जाता था और शासन में उसकी शिकायत की उसे चेतावनी भी देता था तो वह बेहद बेशर्मी और दुःसाहस से एक ही जवाब देता था- ‘ मेरा ट्रांसफर तो प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं कर सकता…’

वह हमसे बेहद मोटी रकम की आस लगाए बैठा था, जो चलन आमतौर पर विकास प्राधिकरणों में नक्शा पास करवाने के लिए चलता भी है। अब हम सस्ते फ्लैट्स की योजना लेकर आ रहे हैं और शुरू में ही करोड़ों रुपये महज सरकारी मंजूरी के नाम पर घूस में ही दे देंगे तो क्या खाक सस्ते फ्लैट बना पाएंगे… अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही दिन-रात जनता को चीख-चीख कर बताते रहें कि उनकी सरकार जनता को सस्ते आवास देने के लिए बिल्डर की राह में कोई रोड़ा नहीं आने देगी…और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी यूँ ही दिन-रात जगकर प्रदेश के औद्योगिक विकास के लिए कड़ी मेहनत करते रहें…लेकिन एस. पी. सिंह जैसे भ्रष्ट अफसरों को इससे क्या लेना-देना है…उन्हें तो सिर्फ अपने महल-कोठियां खड़ी करने की ही चिंता है।

बहरहाल, अंत भला तो सब भला की तर्ज पर मेरा तो यह मानना है कि मेरे प्रोजेक्ट को ढाई बरस बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सीधा दखल देकर मंजूरी देने से बड़ा काम तो यही किया है कि अब औद्योगिक विकास प्राधिकरण को कोई अफसर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह नहीं चला पायेगा…और अगर ऐसा करने की अब कोशिश भी करेगा तो उसका तबादला तो कम से कम किया जा सकेगा।

लीडा में एस. पी. सिंह और उनके खासमखास अफसरों-कर्मियों को यह सरकार लीडा से बेदखल करके राजधानी के विकास के लिए बेहद अहम कम से कम एक विभाग को तो भ्रष्टाचार की गंदगी से मुक्त करके पतित-पावन बना पाती है या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा। फिलहाल मुझे तो इस बात की ही खुशी है कि अमृत चख कर लीडा की कुर्सी पर बैठे एस. पी. सिंह को भी योगी सरकार ने अब मृत्युलोक के तमाम आम प्राणियों की ही तरह नश्वर तो बना ही दिया…

दिल्ली के कई बड़े अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे और अब लखनऊ में रीयल इस्टेट फील्ड में सक्रिय अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. 

अश्विनी ने इसी के संबंध में 24 December 2017 को एक पोस्ट लिखा था, जो इस प्रकार है….

सुबह-सुबह इस छोटी सी खबर की एक पंक्ति को पढ़कर बहुत सुखद अनुभूति हुई… इसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाकायदा चेतावनी भरे लहजे में कहा कि बिल्डर की कोई भी फ़ाइल कागज पूरे होने की दशा में प्राधिकरण द्वारा रोकी न जाए। बाकी खबर में उन बिल्डरों को भी गंभीर चेतावनी दी गई है, जिनके चलते देश के लाखों निवेशक हलकान हैं।
इस खबर से साफ पता लग रहा है कि मुख्यमंत्री रियल एस्टेट उद्योग के सभी पहलुओं को अच्छी तरह से समझ रहे हैं। हमारे देश में बेशुमार बिल्डर धोखेबाजी और वादाखिलाफी करके लोगों की गाढ़ी कमाई को सरेआम लूट रहे हैं, यह सच है लेकिन यह भी एक सच है कि जो रियल एस्टेट कंपनियां नियम-कानून से चलकर निवेशक को तय समयसीमा के भीतर और वाजिब कीमत पर घर, फ्लैट या प्लॉट मुहैया कराना चाहती हैं, उन्हें और कोई नहीं बल्कि खुद विकास प्राधिकरण में व्याप्त भ्रष्ट अफसरों का मजबूत गिरोह ही ऐसा करने नहीं दे रहा।

ये भ्रष्ट अफसर इन्हीं बिल्डरों की फाइलें रोक-रोक कर अकूत सम्पति के मालिक भी बन चुके हैं। इसी वजह से नोएडा अथॉरिटी के यादव सिंह जैसे न जाने कितने भ्रष्ट अफसर शासन की पकड़ में भी आ चुके हैं। खुद हमारे प्रोजेक्ट की फ़ाइल को ढाई साल तक दबा कर बैठने वाले भ्रष्ट अफसर एस. पी. सिंह ने भी लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण को एक तरह से अपनी निजी कंपनी में बदल कर रख दिया है। वह इससे पहले भदोही में तैनात था और समाजवादी सरकार में बेहद रसूखदार आईएएस और शिवपाल खेमे के खासमखास अनिल गुप्ता का वरदहस्त पाकर लीडा में न सिर्फ स्थायी हो गया बल्कि एक के बाद एक करके उसने कई अफसर और कर्मचारी भी भदोही से वहां बुलवा कर अपना मजबूत गिरोह खड़ा कर लिया है। यह गिरोह अब एस. पी. सिंह को लीडा में हर गोरखधंधे करने में अपना पूरा योगदान दे रहा है।

जाहिर है, भ्रष्ट अफसरों की ऐसी भयंकर गिरोहबंदी के बाद अगर सरकार लीडा के क्षेत्र में काम करने वाले बिल्डरों को ही निवेशकों को प्रॉपर्टी देर से या महँगी देने का दोष देती है तो वह निश्चित तौर पर गलती ही करेगी। क्योंकि जहां करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाये बिना एक पत्ता न हिल पा रहा हो, वहां बिल्डर भला कैसे निवेशकों का हित देख पाएंगे। हमने तो भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली जंग छेड़कर पीएमओ और योगी सरकार की मेहरबानी से बिना घूस दिए ही प्रोजेक्ट अप्रूव कराकर तात्कालिक तौर पर एक जीत हासिल कर ली है लेकिन यह हमें भी पता है कि भ्रष्ट अफसरों का यह गिरोह जब तक वहां धूनी रमाकर बैठा है, तब तक न हम और न ही कोई और बिल्डर, इनकी कोपदृष्टि से कोई भी बच नहीं पायेगा।
सरकार को हर हाल में लीडा और अन्य प्राधिकरण में बरसों से जमे बैठे इस तरह के भ्रष्ट कॉकस को तोड़ना ही होगा वरना यूपी के विकास का स्वप्न महज स्वप्न ही रह जायेगा। ये अफसर और कर्मी अगर अलग अलग जगहों और जिम्मेदारियों पर नहीं भेजे गए या प्राधिकरण में बिल्डर की फ़ाइल के आगे बढ़ने को लेकर कोई पारदर्शी व समयबद्ध तंत्र नहीं बनाया गया तो फिर चाहे जितने इन्वेस्टर्स समिट करवा लिए जाएं… यूपी के विकास को ये भ्रष्ट अफसर ऐसे ही ग्रहण लगाए रखेंगे।

पूरे प्रकरण को समझने के लिए ये भी पढ़ें….

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रिश्वत के लिए फाइल पर कुंडली मार कर बैठ जाता है ये अफसर, कंप्लेन पर पीएमओ भी सक्रिय

Ashwini Kumar Srivastava : 2018 की तरफ बढ़ते हुए मुझे एक बेहद बड़ी खुशखबरी यह मिल रही है कि भ्रष्टाचार और एक भ्रष्टाचारी अफसर एसपी सिंह के खिलाफ चल रही मेरी लड़ाई को खुद प्रधानमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री कार्यालय ने संज्ञान में ले लिया है। दोनों ही जगहों से बाकायदा मेरी शिकायत पर न सिर्फ ताबड़तोड़ जांच आरंभ हो गई है बल्कि मेरी वह सितंबर में की गई सबसे पहली शिकायत को भी पीएमओ ने दोबारा जीवित करवा दिया है, जिसे इस भ्रष्टाचारी अफसर एसपी सिंह ने न जाने कैसे सांठ-गांठ करके निस्तारित करवा दिया था।

और, कार्यवाही की यह सारी सूचनाएं मुझे खुद पीएमओ और मुख्यमंत्री कार्यालय के शिकायत तंत्र द्वारा ही देखने के लिए पोर्टल व मोबाइल एप पर मुहैया भी करा दी गयी हैं।
यही नहीं, सूत्रों की मदद से सुनने में तो यहां तक भी आ रहा है कि ढाई बरस से लटकी हमारी फ़ाइल पर अपनी मुहर लगाते हुए हमारे प्रोजेक्ट की मंजूरी का पत्र भी संभवतः आज या कल तक शासन स्तर से ही हमें दे दिया जाएगा।

उम्मीद है कि केंद्र और राज्य सरकार अपने ही तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार से निपटने में इसी तरह भविष्य में भी हर आम आदमी का साथ देती रहेगी। मैंने भी इस लड़ाई को एक आम आदमी की ही तरह लड़ा है…प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के शिकायती तंत्र का ही इस्तेमाल किया, न किसी भाजपा नेता, विधायक, सांसद, मंत्री या अफसर के सामने जाकर सोर्स सिफारिश की और न ही उसी भ्रष्टाचारी अफसर के सामने घुटने टेक कर उसे भारी घूस देकर अपना प्रोजेक्ट कराने का रास्ता अपनाया। जबकि मुझे भिड़ने की बजाय ऐसा ही करने की कई लोगों ने सलाह भी दी।

मुझे पूरा यकीन है कि मेरी ही तरह अगर हर आदमी भ्रष्टाचारी और भ्रष्टाचार के सामने डट कर खड़ा हो जाये और घूस देने से मना कर दे…तो देर से ही सही लेकिन उसे जीत हासिल होकर रहेगी। बहरहाल, 2018 में एक अच्छी दिशा में और बेहतरीन खबर के साथ कदम रखते हुए मैं आभारी हूँ, उन सभी का, जिन्होंने हर सुख-दुख में मेरा दिल से साथ दिया है।

मेरी इस लड़ाई में भी कई लोग खुल कर मेरे साथ भी आये। उनमें सबसे ऊपर नाम Bhadas4media वाले औघड़ बाबा यानी Yashwant Singh का भी है। जो हर उस लड़ाई में खुद ही प्रकट हो जाते हैं, जो अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही होती है। उनकी शर्त बस इतनी ही होती है, जो इस बार उन्होंने लखनऊ में साथ जमी एक महफ़िल में खुद ही बताई थी कि जिसकी लड़ाई है, उसे अपना भय छोड़कर खुलकर एक बहादुर इंसान की तरह सामने आना होगा। क्योंकि कई बार उन्हें ऐसे लोगों के लिए भी कोर्ट, कचहरी या पुलिस का सामना करना पड़ चुका है, जो खुद डर कर दुबके रहते हैं, और यशवन्त जी को अपनी लड़ाई में सूली पर चढ़वा देते हैं।

काश, हम सभी के भीतर ऐसे ही एक बेबाक और निर्भीक यशवन्त का जन्म हो जाये और हम सभी गूंगे-बहरों की तरह भ्रष्टाचार और अन्याय को सहकर मुर्दे बने रहने की बजाय यशवन्त जी की तरह भड़ास निकाल कर इस दुनिया को ही बदल कर रख दें…

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. अश्विनी दिल्ली में नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, बिजनेस स्टैंडर्ड जैसे बड़े अखबारों में लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद कई साल से यूपी की राजधानी लखनऊ में बतौर रीयल इस्टेट उद्यमी सक्रिय हैं.

पूरे प्रकरण को विस्तार से समझने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक कर पढ़ें :

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एक बिल्डर का आरोप- ”योगी जी के सजातीय एसपी सिंह निरंकुशता और भ्रष्टाचार की जीती जागती मिसाल बन चुके हैं”

Ashwini Kumar Srivastava : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां एक तरफ इस वक्त देश और दुनिया के उद्योगपतियों को यह बताने में व्यस्त हैं कि उत्तर प्रदेश में अब सारे अफसर सुधर गए हैं और भ्रष्टाचार कहीं नहीं है इसलिए आइये और यहां उद्योग-धंधे लगाइये तो ऐन इसी वक्त यहां के बेखौफ और भ्रष्ट अफसर उद्योगपतियों और उद्योगों की ही खटिया खड़ी करने में जुटे हुए हैं। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री खुद और औद्योगिक विकास मंत्रालय के छोटे-बड़े हर अफसर समेत उप मुख्यमंत्री, कई वरिष्ठ मंत्री व कई अन्य विभाग इन दिनों राज्य में 2018 की फरवरी में होने वाले निवेश सम्मेलन की तैयारी में जीजान से जुटे हुए हैं।

जबकि राज्य की जमीनी हकीकत यह है कि उद्योगपतियों को लुभाने और उन्हें यहां उद्योग लगाने या प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए राज्य में बड़े पैमाने पर जमीन मुहैया कराने के लिए जिन विकास प्राधिकरणों को जिम्मेदारी खुद सरकार ने दी है, वह पहले की ही तरह बेखौफ होकर बेशर्मी से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। इसके बावजूद इन प्राधिकरणों का यह खुला भ्रष्टाचार भी न जाने कैसे खुद मुख्यमंत्री या उनके सभी वरिष्ठ अफसरों तक को नजर नहीं आ पा रहा, वह भी तब जबकि एक नहीं सैकड़ों-हजारों शिकायतें खुद मुख्यमंत्री कार्यालय, विकास प्राधिकरण या औद्योगिक विकास मंत्रालय आदि तक लगातार पहुंचाई जा रही हैं।

मिसाल के तौर पर, लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण (लीडा) को ही ले लीजिए, जो राजधानी लखनऊ से लेकर कानपुर और उन्नाव तक में औद्योगिक विकास के लिए मुख्यमंत्री की मुहिम में जुटी हुई है। जबकि वहीं के वरिष्ठ परियोजना प्रबंधक और योगी जी के सजातीय एस पी सिंह निरंकुशता और भ्रष्टाचार की जीती जागती मिसाल बन चुके हैं। वे मायावती सरकार के दौर में लीडा पहुंचे थे, एक अन्य प्राधिकरण से डेपुटेशन पर। लेकिन वहां पहुंच कर उन्होंने न सिर्फ धीरे-धीरे अपने पूर्व विभाग से ढेरों अपने चेले कर्मचारी भी वहीं लीडा में तैनात करवा लिए बल्कि खुद भी बाद में बनी अखिलेश सरकार की मेहरबानी से वहीं स्थायी रूप से समाहित भी हो गए।

जाहिर है, पहले बसपा, फिर सपा और अब योगी सरकार…इन तीनों सरकारों में अपना जलवा बुलंद रखने वाले और लीडा में अपने ही चेले चापड़ भर्ती करके यदि वह बरसों से अगर अपनी कुर्सी से हिल नहीं रहे हैं तो जरूर उन्हें लीडा में कुछ न कुछ तो मलाईदार नजर आया ही होगा। वह जब से लीडा में पहुंचे हैं, लीडा के क्षेत्र में इंडस्ट्री लगाने के लिए मंजूरी लेने या आवासीय/कमर्शियल प्रोजेक्ट करने के लिए सरकार से अप्रूवल लेने आने वाले रियल एस्टेट कारोबारी या उद्योगपति, तभी से बेहद परेशान हैं। सिंह के द्वारा इन सभी से नक्शा वसूली या मंजूरी आदि के लिए अनापशनाप धन की मांग की जाती है। जो पूरा कर देता है, उसे वह और उनके मातहत कई सारे नियम-कानूनों को ताक पर रखकर भी आननफानन में अप्रूवल दे देते हैं और जो ऐसा नहीं करता है, उसे वह महीनों-बरसों तक लीडा के चक्कर लगवा लगवा कर उसकी फ़ाइल या तो डंप कर देते हैं या प्रोजेक्ट को ही भयंकर घाटे में पहुंचा देते हैं।

खुद मेरी कंपनी ने प्रोजेक्ट मंजूरी की अपनी फ़ाइल 2015 में जमा की थी, जिसे किसी न किसी बहाने से लटका रखकर एस पी सिंह ने हमें भी बेहद गहरे घाटे में ला दिया है। कई कई महीनों तक पहले तो जवाब ही नहीं दिया और अगर दिया भी तो किश्तों में एक एक करके हमसे कुछ न कुछ कागज मांगते रहे। जब दो बरस से ज्यादा समय उनकी इसी कछुआ चाल के चलते बीत गया और हमारे प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं मिल सकी तो उकताकर हमने अपनी फ़ाइल, एसपी सिंह की मनमर्जी और भ्रष्टाचार को लेकर एसपी सिंह के खिलाफ राज्य के औद्योगिक विकास मंत्रालय और मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक शिकायतें पहुंचाईं।

लेकिन यह महोदय न जाने कैसे उन शिकायतों को बेहद आसानी से निस्तारित तो कभी ठंडे बस्ते में डलवाने में कामयाब हो जा रहे हैं। पहली शिकायत मैंने मुख्यमंत्री को इसी साल 29 अगस्त को की थी, जिसका निस्तारण सिंह महोदय ने फ़ाइल में चार मामूली कमियां निकाल कर और फ़ाइल दोबारा जमा करने को कह कर करवा दिया था। अब भला उनसे कौन यह जाकर पूछे कि ये जो चार कमियां हैं, ये दो बरस से जमा फ़ाइल में आपको या आपके विभाग को नजर नहीं आईं और आपने कई अन्य विभागों से एनओसी हमसे मंगवा कर और लाखों रुपए का शुल्क मंजूरी के नाम पर जमा भी करवा लिया।

सिंह साहब दी ग्रेट से यह सवाल तो वही पूछ सकता है, जो बसपा, सपा और भाजपा जैसे तीनों दलों की सरकार में भी बेखौफ होकर नियम-कानून को ताक पर रखकर गुलछर्रे उड़ाने की हैसियत रखता हो। बहरहाल, मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचाई गई मेरी एक शिकायत फिलहाल लीडा में दोबारा पहुंच चुकी है। लीडा के सीईओ उसे दाब कर बैठे हैं। शिकायत पहुंचने के बावजूद एस पी सिंह आज भी बेखौफ हैं और मेरी फ़ाइल आज भी उन्हीं के रहमो करम पर है। इससे पहले की शिकायत का निस्तारण सिंह साहब आसानी से करवा चुके हैं इसलिए शायद उन्हें पक्का यकीन है कि उनका इस बार भी कुछ नहीं बिगड़ेगा और फ़ाइल वह हमेशा की ही तरह किसी न किसी जुगत से रोक कर रख ही लेंगे।
अब मेरे सामने भी ज्यादा विकल्प बचे नहीं हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने और राज्य में औद्योगिक विकास की गंगा बहाने में जुटी योगी सरकार को अगर खुली आँखों से भी यह भ्रष्टाचार नजर नहीं आया…तो अंततः आरटीआई आदि की मदद से सूचना निकलवा कर मैं हाई कोर्ट में जल्द ही एक जनहित याचिका डालूंगा। मुझे पक्का यकीन है कि आज नहीं तो कल ऐसे भ्रष्टाचारी और निरंकुश अफसर को मैं उसके सही ठिकाने यानी जेल तक पहुंचाने में कामयाब हो ही जाऊंगा।

बिजनेस स्टैंडर्ड समेत कई अखबारों में पत्रकार रहने के बाद रीयल इस्टेट फील्ड में सक्रिय हुए अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा इस प्रकार हैं…

Bakhri Live जल्द से जल्द इस अधिकारी के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर किया जाना चाहिए। साथ ही सीबीआई की एंटी करप्शन विंग में भी पूरी शिकायत फाइल किया जाए तो कुछ संभव हो सकता है।

Ashwini Kumar Srivastava सीबीआई क्या राज्य सरकार के अफसरों के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामलों को लेती है? मुझे लगा था कि शायद यह केवल केंद्र सरकार के कर्मियों के मामले ही लेती है।

Vishal Sharma CBI won’t work… Only state vigilance can take any action against state Govt officials, even if the concerned official is an IAS officer

Ashwini Kumar Srivastava जी विशाल जी। यही मुझे भी जानकारी थी इसीलिए अभी तक सीबीआई के बारे में सोचा तक नहीं था। अब विजिलेंस में शिकायत दर्ज करवाने का प्रयास करूंगा।

Arun Khare सीबीआई यह जांच तभी कर सकती है जब राज्य सरकार अनुरोध करे । दूसरी बात योगी सरकार से उम्मीद बेकार है । तीसरी बात आप आरटीआई के बाद सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाएं वहीं थोडी सी उम्मीद है ।

Ashwini Kumar Srivastava जी सर। मुझे तो अब यही एकमात्र रास्ता नजर आ रहा है। इससे कम से कम इस अफसर को तो इसके किये हुए भ्रष्टाचार की सजा मिलने की उम्मीद है। वरना यह जब तक नौकरी में रहेगा, ऐसे ही शासन और प्रशासन में गंदगी फैलाता रहेगा।

Mukul Shrivastava यार Ranvijay Singh, कृपया संज्ञान लो और देखो क्या हो सकता है ।

Ashwini Kumar Srivastava धन्यवाद Mukul Shrivastava सर। मीडिया में अगर लीडा में व्याप्त इस निरंकुशता और भयंकर भ्रष्टाचार के बारे में खुलासा होगा, तब शायद कहीं मुख्यमंत्री और उनके अफसरों को राज्य की जमीनी हकीकत का पता चल पाएगा। जिस लीडा को मुख्यमंत्री सैकड़ों एकड़ जमीन अधिग्रहित करने की जिम्मेदारी देकर उन्हीं जमीनों को देकर उद्योग व उद्योगपतियों को बुलाने की कवायद कर रहे हैं, वह लीडा क्या अपने अधिकार क्षेत्र में जुड़ने वाली इन जमीनों पर लगने वाले उद्योग व उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार से इस कदर त्रस्त नहीं कर देगा कि वे भाग खड़े हों? वैसे भी लखनऊ, कानपुर और उन्नाव के जो पचासों गांव सरकार ने लीडा को दे रखे हैं, वहां से करोड़ों-अरबों रुपये की उगाही के चक्कर में लीडा के अफसर पहले से ही न तो उद्योग लगने दे रहे हैं और न ही जो लगाकर बैठा है, उसे चैन से कारोबार करने दे रहे हैं। अब ऐसे हालात में कौन उद्योगपति भला बरसों तक लीडा के चक्कर लगाने या मोटी रकम घूस में देने के लिए यूपी में आएगा? जब यह हाल राजधानी लखनऊ के औद्योगिक विकास प्राधिकरण का है, तो न जाने प्रदेश के बाकी प्राधिकरण क्या गोरखधंधा कर रहे होंगे…सरकार को कम से कम अपनी नाक के नीचे बैठे लीडा के भ्रष्ट अफसरों पर तो कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए ताकि राज्यभर के भ्रष्ट अफसरों में सरकार का भय व्याप्त हो।

Abhishek Srivastava भला आदमी हर धंधे में मिसफिट है।

Ashwini Kumar Srivastava अभिषेक बाबू देखना जरा अगर कहीं प्रिंट मीडिया में कोई स्टोरी हो सके या रीजनल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में। क्योंकि कोर्ट तो मुझे जाना ही है और शासन में कंप्लेंट भी मैं कर ही रहा हूँ लेकिन क्षेत्रीय मीडिया ही अगर इसे उठा देगा तो कम से कम सरकार समझेगी तो कि आखिर अफसर काम कैसे कर रहे हैं।

Akhilesh Pratap Singh आप धंधे के प्रचलित मानकों के खिलाफ जा रहे हैं…टेक केयर…शठे शाठ्यम् समाचरेत तो है ही लेकिन जल में रहकर मगर से वैर न पालने की लोकोक्ति भी है….सही बोलकर आपको तकलीफ न उठानी पड़े…इसी सरकार में किसी सबल को पकड़िए, आगे बढ़ जाइए….उलझने में रुकना पड़ेगा….
ऐसी सलाह भी मेरे जैसे कुछ लोग देते हैं… 🙁

Ashwini Kumar Srivastava  मगर से बैर करना नहीं चाहते थे, तभी तो दो-ढाई बरस खामोशी से बार बार किश्तों में बताई जा रही हर कमी दूर करते जा रहे थे। न जाने कितनी बार उनसे मुलाकात करके फ़ाइल को मंजूरी देने का अनुरोध भी किया लेकिन किसी व्यक्तिगत मगर अनजान कारण से अफ़सर महोदय ने जब तय ही कर लिया है कि लीडा के क्षेत्र में वह हमें कारोबार करने ही नहीं देंगे तो हमारे सामने अब विकल्प ही क्या बचा है? वह अफसर खुद इतने पावरफुल हैं कि सपा, बसपा और भाजपा में उनका कोई एक बाल भी टेढ़ा नहीं कर पाया तो किस भाजपा नेता से सोर्स सिफारिश लगवाया जाए? मुख्यमंत्री के सजातीय हैं और गोरखपुर के भी हैं तो मीडिया, कोर्ट में गुहार लगाने के अलावा हमारे पास अब बचा ही क्या है? यह प्रदेश अब ऐसे ही चल रहा है। यहां के अफसर अब निरंकुश और सत्ता तंत्र धृतराष्ट्र बना हुआ है। ठीक है, इस टकराव के बाद नहीं होगा प्रोजेक्ट लीडा के क्षेत्र में…वैसे भी दो ढाई साल से यह अफसर हमें करने ही कहाँ दे रहा है? कहीं और कर लेंगे प्रोजेक्ट तो…किसी और प्रदेश में जमीन खरीद लेंगे…लेकिन कम से कम यह भ्रष्टाचारी अफसर तो कोर्ट और मीडिया के जरिये अपनी करनी का फल पा ले। इस अफ़सर ने नियम कानून की धज्जियां खुलेआम उड़ाई हैं। किसी प्रोजेक्ट फ़ाइल की मंजूरी या उसके रिजेक्शन की एक तय समय सीमा होती है। यहां सरकार के मुखिया जनता और मीडिया को बताते हैं कि तीन दिन में फ़ाइल हो रही है। गाजे बाजे के साथ दुनियाभर के उद्योगपतियों को यहां यूपी में बुलाने जा रहे हैं कि आओ यहां पैसा लगाओ…अब कोई पागल ही होगा, जो अपनी सारी जमा पूंजी यहां के भ्रष्ट अफसरों की भेंट चढ़ाने के लिए उद्योग-धंधे लगाने आएगा। पहले मुख्यमंत्री सारे विकास प्राधिकरण और विभाग तो दुरुस्त कर लें, जहां से दर्जनों मंजूरी लेने में उद्योगपतियों को करोड़ों अरबों की घूस तो देनी ही पड़ जाती है, साथ ही समय भी कई कई महीने या बरस लग जाता है। आज ही नवभारत टाइम्स की खबर है कि दिल्ली में बिल्डिंग कंप्लीशन सर्टिफिकेट अब एक हफ्ते में मिल जाएगा। इसके लिए वहां की सरकार ने सारे इंतजाम भी कर दिए हैं कि उद्योगपति को कहीं दर्जन भर विभाग में भटकना नहीं पड़ेगा और न ही हर विभाग के अफसर की काली कमाई का खजाना भरवाना पड़ेगा बल्कि एक हफ्ते में मंजूरी या रिजेक्शन हो जाएगा। प्रोजेक्ट हो या न हो लेकिन अब इस अफसर की कारगुजारी को लेकर मैं कोर्ट में तो जरूर ही जाऊंगा।

Satyendra PS क्या कहा जाए ऐसे हरामखोरों के बारे में। पूरे प्रदेश में अहम कमाऊ पदों पर प्रदेश के छटे हुए भ्रष्ट अधिकारियों को बैठाया गया है, वह एकमात्र नमूना नहीं है जिससे आपका पाला पड़ा है।

Ashwini Kumar Srivastava आप बता ही रहे थे कि अपने गृह जनपद गोरखपुर में भी अपने सजातीय और महाभ्रष्ट पीसीएस अफसर को डीएम बना रखा है मुख्यमंत्री ने। अब ऐसी गंदी सोच रखकर शासन चलाने वाले मुख्यमंत्री से भी न्याय की उम्मीद क्या की जाए…इसी वजह से तो प्रशासन अब आम जनता या किसी के लिए भी बहुत खतरनाक बन चुका है। पहले गोरखपुर का सत्यानाश किया बरसों…अब प्रदेश का करने के लिए मुख्यमंत्री बन कर आ गए हैं। 2019 के चुनाव में इनको जनता अगर सबक सिखाएगी तभी कुछ आंख खुल सकेगी इनकी। इस बार के निकाय चुनाव में शहर वाले तो वैसे ही भाजपा समर्थक बने रहे लेकिन कम से कम गांव और कस्बों के नतीजों को देखने के बाद कहा जा सकता है कि इनकी खाट खड़ी होने के इस बार पूरे आसार हैं। अब इनको केवल ईवीएम ही बचा पाएगी।

Satyendra PS यह सही है। एक वरिष्ठ और तेज तर्रार पीसीएस अधिकारी ने यह जानकारी दी तो मैं आश्चर्यचकित रह गया था। अब तक महत्त्वपूर्ण जिलों में तेज तर्रार आईएएस को ही जिलाधिकारी बनाने की परंपरा थी। अब भ्रष्ट होना महत्त्वपूर्ण पोस्ट पाने की प्रमुख योग्यता बन गई है।

Ashwini Kumar Srivastava बताइये क्या अजब गजब हाल कर दिया है प्रशासन का। वह दिन दूर नहीं, जब यूपी की जनता खुद ही एक दिन अपनी करनी का फल भोगेगी। भाजपा और योगी को चुनकर भेज तो दिया धर्म और जाति के नाम पर लेकिन जब यूपी का बंटाधार हो जाएगा, तब ही अक्ल आएगी लोगों को। वैसे ही यहां उद्योग धंधे न के बराबर हैं, भ्रष्टाचार और अपराध चरम पर हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर न के बराबर है…उस पर मुख्यमंत्री और ऐसा बैठा दिया है, जो जाति के पैमाने पर चुन चुन कर भ्रष्ट अफसरों को बैठाने में जुटा हुआ है।

Satyendra PS ज्यादातर लोगों का प्रशासन से सीधा काम नही पड़ता और साइड इफेक्ट समझने भर को उन्हें दिमाग नहीं होता। जिनका प्रशासन से सीधा काम पड़ता है और काम अटका पड़ा है, वो समझ रहे हैं। यह सरकार तो बालू तक की दलाली खा रही है। साल भर पहले की तुलना में बालू का दाम तीन गुना हो गया है। भट्ठे वालों की हालत खराब है, ईंट नहीं बिक रहे। मेरे एक मित्र बताने लगे कि अब जबरी अवैध बालू खोदवा रहा हूँ वरना काम बंद हो जाएगा और 100 से ज्यादा मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे। इन गरीब गुरबों को लगता है कि बड़े लोग बर्बाद हो रहे हैं। हकीकत तो यहहै किबड़े लोग दो चार साल कुछ न करें तब भी शानदार जिंदगी जिएंगे। मरना मजदूरों को है जो मंथली सेलरी पर डिपेंड हैं।

Ashwini Kumar Srivastava ऐसा नहीं है। प्रशासन से जिंदगी का हर एक पहलू जुड़ा है और सभी को किसी न किसी रूप में प्रशासन को पंगु करने वाले इस जतिवादी भ्रष्टाचार का दंड भोगना ही पड़ेगा। अस्पताल, पुलिस थाना, शिक्षा, परिवहन, जमीन, नौकरी, खेती बाड़ी आदि सब कुछ इसी प्रशासन से तो ही कन्ट्रोल हो रहा है। यहां तक कि शमशान भी। इसलिए कोई मतदाता अपनी गलती की सजा भोगे बिना इस दुनिया से रुखसत भी तो नहीं हो सकता।

Satyendra PS सीधा सम्बन्ध नहीं होता। जो सीधे नहीं पहुंच पाते, अपने रिश्तेदारों, नेताओ को गरिया रहे हैं कि वो हमारा काम नही करा रहे, जबकि जिलाधिकारी सहित सक्षम अधिकारी सीधे कह दे रहे हैं कि अपना काम हो तो लेकर आइए, सिफारिश न करिए। किसी की कोई सुनवाई नहीं है लेकिन पब्लिक सरकार से जवाब न मांगकर अपने रिश्तेदार को गरिया रही है कि वो काम कराना नहीं चाह रहा है।

Ashwini Kumar Srivastava मैं अगर लीडा से त्रस्त और तबाह हूँ तो कोई किसी अस्पताल, थाने, स्कूल, तहसील, टैक्सी-बस, नौकरी या किसी भी प्रशासनिक संस्था या उसके अप्रत्यक्ष रूप से त्रस्त और तबाह होगा ही। अगर किसी व्यक्ति का सत्ता तंत्र में जुगाड़ हुआ या वह खुद या उसका कोई परिचित-रिश्तेदार सत्ता तंत्र में शामिल होगा तो शायद उसे यह गुमान होगा कि उसे इस भ्रष्ट तंत्र से कभी कुछ नुकसान नहीं होगा। लेकिन वह गलत सोच रहा है। क्योंकि एक न एक दिन वह या उसके परिजन इसी तंत्र में कहीं न कहीं तो फंसेंगे ही।

Mudit Mathur योगी आदित्यनाथ तक शिकायत पहुँचती ही कहाँ है? तथ्यों में दम है। ऐसे कई पीड़ितों को एकजुट कर के साथ में लेकर भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष हो तभी रास्ता निकलेगा। अपर मुख्य सचिव श्री अनूप पाण्डेय बहुत ही न्यायप्रिय अधिकारी हैं। उन तक पूरा मामला पहुँचाइए तो जरूर नतीज़ा निकलेगा। ऐसे अफसरों की नाजायज़ करतूतों से सरकार की नीतियों और नीयत पर सवाल उठते हैं।

Ashwini Kumar Srivastava अनूप चंद्र पांडेय तक तो जो शिकायत की गयी है, वह आज डेढ़ महीने से ज्यादा हो गया लेकिन अभी तक मार्क होकर प्रक्रिया में ही नहीं आयी है। अब बताइये, दो साल से ज्यादा समय हो गया फ़ाइल रुके हुए…इसकी शिकायत की जाए तो महीनों गुजर जाएंगे लेकिन उस पर सुनवाई ही नहीं होगी…अंधेर नगरी चौपट राजा वाला हाल हो गया है उत्तर प्रदेश में तो…किससे क्या शिकायत की जाए और कहां क्या कहा जाए, कुछ समझ ही नहीं आता…नीचे अनूप चंद्र पांडेय वाली शिकायत का स्क्रीन शॉट भेज रहा हूँ आपको सर…आप ही बताइए अब कैसे पहुंचाए उन तक अपनी शिकायत?

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यशवंतजी हमलावरों को अपनी कलम की ताकत से धूल चटा देंगे : अश्विनी कुमार श्रीवास्तव

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव

Ashwini Kumar Srivastava : दुनिया में कुछ लोग विलक्षण प्रतिभा के साथ आते हैं। जाहिर है, ऐसे लोग भीड़ और भेड़चाल से अलग होते हैं और अमूमन इसका खामियाजा भी भुगतते हैं…कभी रोजी-रोटी के बेहिसाब संघर्ष से जूझ कर तो कभी सभी तरह के आम इंसानों की आंख की किरकिरी बनकर। Yashwant Singh ने जब से भड़ास ब्लॉग लिखना शुरू किया था, तब ही से मैं उनका मुरीद रहा हूँ। उन्होंने बेबाकी और साहस से भड़ास फ़ॉर मीडिया का जो अद्भुत सफर तय किया, उस सफर में उनके साथ इस सफर की शुरुआत करने वाले तकरीबन सभी दोस्त उनके कोपभाजन का शिकार हुए और दुश्मन भी बने। उनके अलावा, यशवंत जी ने बेशुमार नए दुश्मन भी तैयार किये।

मगर इस दौरान हम जैसे बेशुमार मुरीद भी उनको हासिल हुए, जो शुरू के उनके किसी दोस्त या दुश्मन से या फिर खुद यशवंत जी से ही बरसों तलक सीधे तौर पर वाकिफ तो नहीं रहे लेकिन उनके जीवन के हर पहलू से अच्छी तरह वाकिफ जरूर रहे। मुझे याद है कि सन 2000-01 के बैच में आईआईएमसी करने के बाद मीडिया को लेकर जो ख्वाब और तस्वीर बुनी थी, वह जब हर रोज टूटती थी तो किस तरह यशवंत जी और उनका भड़ास फ़ॉर मीडिया हर रोज ही हमें संघर्ष करने की नई ताकत भी दिया करते थे। मीडिया और उसके मठाधीशों के चेहरे पर लगी कालिख दिखाने के लिए आईना पेश करके यशवंत जी ने जो अब तक किया है, उसका कोई जोड़ है ही नहीं। जब 2010-11 में मीडिया की नौकरी को अलविदा किया तो भी कभी भड़ास और यशवंत जी को पढ़ना नहीं छोड़ा। आज भी बदस्तूर यही सिलसिला जारी है।

आज भड़ास और यशवंत जी का जिक्र इसलिये किया क्योंकि उन पर हाल ही में हमला हुआ है और यह सुनकर मुझे बेहद दुख हुआ है। मीडिया में वैसे तो बड़े बड़े पत्रकार हैं लेकिन यशवंत जी को ही अभी तक मैंने वास्तविक पत्रकार माना है। इतने लंबे अरसे में उन पर हमले का दुःसाहस किसी ने नहीं किया। और ज्यादा दुख इस बात का है कि उन पर हमला उन लोगों ने किया है, जिन्होंने हथियार के तौर पर कलम ही थाम रखी है। न जाने ऐसी कौन सी मजबूरी आ गयी, जो कलम छोड़कर उन्हें किसी गुंडे की तरह जवाब देना पड़ गया।
खैर, यशवंत जी ने शारीरिक हमला भले ही पहली बार झेला हो लेकिन बाकी हर तरह के हमलावरों को वह अपनी कलम की ताकत से ही धूल चटा चुके हैं। उम्मीद है इस बार भी उनके दुश्मनों को हार माननी ही पड़ेगी। शुभकामनाओं के साथ यशवंत जी के जज्बे को सल्यूट… कहते हैं न- ”खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो।”

बिजनेस स्टैंडर्ड समेत कई अखबारों में कार्य कर चुके और इन दिनों लखनऊ में उद्यमी के तौर पर स्थापित अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मोदी सरकार ने रियल एस्टेट उद्योग को सबसे बुरे दिनों के दर्शन करा दिए!

Ashwini Kumar Srivastava : अच्छे दिन लाने के नाम पर आई मोदी सरकार ने देश के साथ क्या सुलूक किया है, यह तो पता नहीं लेकिन कम से कम रियल एस्टेट उद्योग को तो जरूर ही उन्होंने मनमोहन सरकार के 10 बरसों के स्वर्णिम दौर से घसीट कर सबसे बुरे दिनों के दर्शन करा दिए हैं। पहले तो सरकार में आते ही काले धन के खिलाफ अभियान छेड़ने की धुन में न जाने कितने सनकी कानून बनाये या पुराने कानून के तहत ही नोटिस भेज-भेज कर देशभर को डराया….फिर बेनामी सम्पति कानून का ऐसा हव्वा खड़ा किया कि शरीफ आदमी भी दूसरा फ्लैट/मकान या प्लॉट लेने से कतराने लगा। ताकि कहीं उसकी किसी सम्पति को बेनामी करार देकर खुद सरकार ही न हड़प ले।

इसके बाद, साहब ने बिना कोई तैयारी किये नोटबंदी करके महीनों तक देशभर के लोगों को महज अपनी जरूरतभर का सामान खरीदने की बेबसी देकर रियल एस्टेट उद्योग की कमर ही तोड़ दी। उससे भी मन नहीं भरा तो फिर रेरा का ऐसा चक्कर चलाया कि रियल एस्टेट कंपनियां महीनों से चकरघिन्नी बनी हुई हैं। क्योंकि रेरा कानून भले ही कागजों में बन गया हो मगर इसके चलते ही रियल एस्टेट कंपनियां न तो कोई भुगतान स्वीकार कर पा रही हैं और न ही अपना कोई प्रोजेक्ट लांच कर पा रही हैं। इसकी वजह है इसमें लगाई गई वह शर्त, जिसके मुताबिक अब कोई भी रियल एस्टेट कंपनी रेरा में रजिस्टर्ड हुए बिना कारोबार नहीं कर सकती। लेकिन हद देखिये कि महीनों बीत चुके हैं लेकिन अभी रेरा का रेजिस्ट्रेशन कहाँ होना है, कैसे होना है, कितने दिन में होगा, यह तक बताने वाला भी कोई नहीं है।

जाहिर है, पहले तो रेरा की कमेटी बने, वह रजिस्ट्रेशन का तौर-तरीका और बाकी नियम-कायदे बताए, फिर जाकर वहां कंपनियां अप्लाई करें… और तब न जाने क्या संसाधन और कितना स्टाफ होगा रेरा की कमेटी में… और न जाने कितने दिन-महीने और लग जाएंगे देश में रियल एस्टेट कंपनियों को अपना कारोबार दोबारा शुरू करने में…यह पता लगे, तब ही मोदी के दिखाए अच्छे दिनों को लेकर रियल एस्टेट उद्योग में कुछ उम्मीद की किरण जग पाएगी।

लेकिन यह सब करके भी तसल्ली नहीं मिल पा रही थी तो इन हालात में कोढ़ में खाज की कहावत को सच करते हुए मोदी सरकार ने जीएसटी का बम उद्योग जगत पर और दे मारा। इन सबके बीच अभी हाल ही में एक खबर और आई थी, जिसमें कहा गया था कि 50 लाख से ऊपर की सम्पति खरीदने के लिए प्रवर्तन निदेशालय यानी कि ईडी जैसे खतरनाक विभाग से लोगों को मंजूरी लेनी होगी। भले ही जिन लोगों के पास काले धन के भंडार न हों लेकिन वे भी 50 लाख से ऊपर की सम्पति खरीदने के लालच में ईडी की लालफीताशाही या धौंसपट्टी में फंसने से परहेज तो करेंगे ही।

बिलकुल उसी तरह, जिस तरह अच्छा-भला शरीफ आदमी भी अपने देश में थानों में कोई मामला ले जाने से परहेज करता है, इस डर से कहीं ऐसा न हो कि इस मामले में या किसी और ही मामले में शक की निगाह से देखते हुए पुलिस उसके ही पीछे पड़ जाए। इन्हीं वजहों से हाल यह हो चुका है कि देश का सारा रियल एस्टेट उद्योग इस समय अपने वजूद को बचाये रखने के लिए जूझ रहा है। पेशेवर श्रमिक के साथ-साथ मजदूरों के खाली बैठने से न जाने कितनी नौकरियां इस क्षेत्र की तबाही से जा चुकी हैं। न जाने कितना राजस्व, जो स्टाम्प/टैक्स आदि के रूप में सरकार को इस उद्योग के फलने-फूलने से मिलता था, का नुकसान देश को मूर्खतापूर्ण नीतियों के चलते हो चुका है। सीमेंट, स्टील, लकड़ी, ईंट-भट्ठा, कंस्ट्रक्शन, इंजीनियरिंग, आर्किटेक्चर, विज्ञापन जगत, पेंट, टाइल्स, अन्य बिल्डिंग मटेरियल, होम फर्निशिंग आदि के रूप में इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े न जाने कितने उद्योग रियल एस्टेट की बर्बादी की चपेट में आकर खुद भी मुश्किल दिनों से जूझ रहे हैं।

न जाने कितने बैंक, होम लोन में आई भारी गिरावट के बाद तेजी से घटते अपने कारोबार को वापस पटरी पर लाने की जुगत में परेशान हैं। ऐसे में क्या देश की जीडीपी नहीं धराशाई होगी, आर्थिक विकास की दर में गिरावट नहीं आएगी, खरबों रुपये के राजस्व की हानि नहीं होगी सरकार को, बेरोजगारों की फौज नहीं बढ़ेगी, बाजार और उद्योग जगत की कमर नहीं टूटेगी…. ?

इसी वजह से तो यही सब हो रहा है देश में। जो देश मनमोहन सिंह की सरकार के समय आर्थिक महाशक्ति का सबसे बड़ा दावेदार बनते हुए अमेरिका और चीन तक की नींदें उड़ाने में कामयाब था, वही देश मोदी सरकार के आते ही महज तीन बरस में ही आर्थिक महाशक्ति बनना तो दूर, आर्थिक बदहाली की राह पर न जाने कितना आगे निकल चुका है।
जहां तक अर्थशास्त्र से की गई मेरी उच्च शिक्षा और देश के शीर्ष मीडिया हाउस/अखबारों में बतौर आर्थिक पत्रकार काम करने के 10 साल से भी ज्यादा के अनुभव के बाद उपजे मेरे ज्ञान या समझ का सवाल है, वह यही कहते हैं कि रियल एस्टेट उद्योग की बदहाली देश की अर्थव्यवस्था की चूलें तक हिलाने की क़ुव्वत रखती है। ऐसा नहीं होता तो 2008 में अमेरिका के रियल एस्टेट उद्योग की तबाही के बाद दुनियाभर में आई मंदी दुनिया ने नहीं देखी होती।

इसी वजह से मोदी सरकार को चाहिए कि वह किसी भी कीमत पर रात-दिन एक करके देश के रियल एस्टेट उद्योग को पटरी पर लाएं….अगर 2019 में देश को आर्थिक बदहाली की कगार पर लाकर पटक देने वाले प्रधानमंत्री के रूप में चुनाव में उतरकर वह जनता के सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहते हैं तो…

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Satyendra PS आप यह जान लें कि मोदी यह सब करके चुनाव जीतेगा। औऱ आखिर में हिटलर टाइप देश बर्बाद करने के बाद आत्महत्या कर सकता है। आप रियल स्टेट बता रहे हैं। रेलवे को किस तरह बर्बाद किया और लूटा है इन सबों ने। किराया बढ़कर दोग्गुना हो चूका है। अब सरकार सब्सिडी छोड़ने की अपील करने जा रही है। इस साल परिचालन अनुपात 14 साल में सबसे घटिया रहा है।

Ashwini Kumar Srivastava “इजराइल से मिले समाचार से पता चला है कि मोदी जी ने 70 साल बाद किसी भारतीय पीएम के तौर पर इजराइल जाकर पूरे इजराइल के लोगों का दिल जीत लिया है। वहां उनके स्वागत में हर इजराइली लहालोट हो गया है। भारत और मोदी का डंका इससे दुनियाभर में बजने लगा है। और, अडानी ने वहां का सबसे बड़ा हथियारों का ठेका हथियाकर अपनी कंपनी और कारोबार को चार चांद लगा लिए हैं।” दरअसल, अडानी वाली लाइन गोल करके ही मीडिया और मोदी के अन्धभक्त मोदी को जनता के बीच में महानायक बनाकर पेश कर रहे हैं। यही तरीका वह मोदी के हर काम या फैसलों में अपनाते हैं। कोई नहीं जान पाता कि रेलवे को बर्बाद करने के पीछे किसको फायदा पहुंचाने का खेल चल रहा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे इजराइल जाकर इतनी मेहनत करने के पीछे किसका कारोबार बढ़ाने का खेल चल रहा है, यह जनता नहीं जान पा रही।

Arun Gautam बांग्लादेश गए थे तो अम्बानी के लिए ठेका ले आए थे… अभी इजराइल गए तो अडानी के लिए ठेका ले आये…  हमारे परिधानमंत्री प्राइवेट कंपनियों की एजेंटगिरी मस्त करते हैं.. ऐसा एजेंट PM पाकर देश धन्य है।

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योगी के रूप में हिन्दू राज लौटने से कबीलाई नृत्य कर रहे सवर्णों, जरा ये भी सुनो

Ashwini Kumar Srivastava : हिन्दू राज की आड़ लेकर ऊंच-नीच, छुआ-छूत वाली वर्णव्यवस्था को लाकर भारत को तलवारों/तीरों और राजा-सामंतों के युग सरीखी मानसिकता में वापस ले जाने में लगे बुद्धिमानों… क्या तुम्हें यह भी पता है कि नासा के जरिये अमेरिका इन दिनों बहुत ही जोरों शोरों से इस संसार में सबसे तेज चलने वाले प्रकाश यानी लाइट से भी तेज गति से चलने वाले रॉकेट बनाने में जुटा हुआ है?

वार्प इंजन की मदद से चलने वाले इस राकेट से स्पेस-टाइम में हलचल पैदा करके अमेरिका अब इंसानी सभ्यता के सामने खड़ी सबसे बड़ी रुकावट को आइंस्टाइन के सापेक्षवाद के सिद्धान्त के जरिये दूर करने में लगा हुआ है। इससे पहले भी जब हम जातीय अहंकार और भेदभाव में डूबकर तीर-तलवार में ही अपनी वीरता और धार्मिक ग्रंथों में विज्ञान खोजने में लगे थे तो पश्चिमी-इस्लामी सभ्यता तोप-बंदूकें लाकर हमें कीड़े मकोड़ों की तरह कुचलने और गुलाम बनाने में कामयाब रही थी।

आज जब हमारा इसरो दुनिया के बाकी देशों से मुकाबले में आगे चल रहा है तो हम अपने ही इतिहास में दफ़न अपने जातीय अहंकार की कब्रें खोदकर हिन्दू गौरव के कागजी महल बनाने में लगे हुए हैं… क्षत्रिय राज करेगा, ब्राह्मण पुरोहिती करेगा, कायस्थ प्रशासनिक लिखापढ़ी करेगा, पिछड़ा वर्ग खेती करेगा, वैश्य व्यापार करेगा, शूद्र सेवा करेगा… तो नासा या इसरो जैसे वैज्ञानिक कहाँ से लाओगे? आज हमारे इसरो में क्या सिर्फ ब्राह्मण, कायस्थ ही वैज्ञानिक हैं? वहां मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध, पिछड़ा, दलित सभी मौजूद हैं… और जो सवर्ण हैं भी, वे धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर या गुरुकुल से नहीं निकले हैं। उन्होंने भी वही पढ़ाई पढ़ी है, जिसको पढ़कर बाकी सभी जाति-धर्म के लोग उनके जैसे काबिल वैज्ञानिक बने हैं।

योगी के रूप में हिन्दू राज लौटने से कबीलाई नृत्य कर रहे सवर्णों को क्या यह नहीं पता है कि क्षत्रिय के डीएनए में अगर राज करना लिखा भी हो तो क्या यह जितनी आसानी से यूपी में सत्ता पा गए, क्या उतनी ही आसानी से दुनियाभर के बेमिसाल वैज्ञानिकों और उनकी बेजोड़ वैज्ञानिक खोजों-हथियारों से लैस अमेरिका-चीन जैसी ताकतवर फौजों के सैनिकों के सामने ये क्षत्रिय क्या सिर्फ अपनी जाति बताकर ही युद्ध जीत लेंगे?

बाकी जातियों को कायर, सेवक, पुरोहित बनाकर या करार देकर महज क्षत्रियों के प्राचीन युद्ध कौशल के भरोसे दुनिया से मुकाबला करके क्या हम फिर उसी तरह गुलाम नहीं हो जायेंगे, जैसे कि हजारों बरस से पहले भी रह चुके हैं?

दुनिया आगे बढ़ रही है। पश्चिमी सभ्यता का हर देश, हर समाज अपने यहाँ बराबरी ला रहा है। हालांकि उनके यहाँ कभी भी हमारे यहाँ जैसे वर्ण व्यवस्था का शोषणकारी सिस्टम रहा भी नहीं। फिर भी वे अपने यहाँ हर किसी को समान अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, सबको न्याय, संसाधनों का समान बंटवारा, राजनीति-प्रशासन-सेना-पुलिस में बराबरी की भागीदारी दे रहे हैं… कोई वर्ग, क्षेत्र या समूह अगर उनके विकास के कार्यक्रम से छूट जाता है तो वे एड़ी-चोटी का जोर लगाकर उन्हें अपने बराबर लाते हैं।

यहां तो सरकार ही इस लालच में बन रही है कि हमारी जाति सबसे आगे निकल जाए। हमारी जाति ही सब कुछ ज्यादा से ज्यादा हड़प ले।

जिस समाज में बराबरी नहीं होती, और ज्यादा से ज्यादा संसाधन हड़पने की लूट होती है, वह समाज इसी तरह अतीत के पन्नों में जीता है… और गुलाम होकर या लड़ झगड़ कर ख़त्म हो जाता है। जबकि बराबरी वाले समाज पश्चिमी समाज की ही तरह आकाश-पाताल-जमीन-अंतरिक्ष-समुद्र… हर कहीं अपना कब्जा कर लेते हैं…तभी तो दुनिया का हर देश आज पश्चिमी सभ्यता के ही दिए अविष्कारों-उपकरणों, राजनीतिक- वैज्ञानिक सिद्धान्तों के नक़्शे कदम पर चलने को मजबूर है।

इतना कुछ करने के बाद भी आज भी पश्चिमी सभ्यता दुनिया को हर रोज चौंकाने में लगी है। फिलहाल वार्प इंजन के जरिये लाइट से भी तेज रफ़्तार पाने की कोशिश करने में अगर अमेरिका को कामयाबी मिल गयी तो इसके सैनिक-असैनिक नतीजे कल्पना से परे होंगे।

पलक झपकते ही का मुहावरा फिर अमेरिका विकास और विनाश, दोनों में ही चरितार्थ करने में सक्षम हो जाएगा।

सकारात्मक पहलू देखें तो सबसे ज्यादा ख़ुशी की बात तो यह होगी कि अंतरिक्ष में भी इंसानी सभ्यता वहां भी जा सकेगी, जहाँ जा पाना मौजूद तकनीक की सीमाओं के कारण सैकड़ों बरसों में ही संभव हो पाता।

मसलन, हमारे सौरमंडल के सबसे नजदीकी तारा मंडल अल्फ़ा सेंटोरी, जो कि 4.3 प्रकाश वर्ष दूर है, वहां भी इस इंजन के जरिये महज दो हफ्ते में ही पहुंचा जा सकता है। हमारे सूर्य, बुध, शुक्र, बृहस्पति तो फिर कुछ मिनटों की ही दूरी पर रह जाएंगे।

चलिये हटाइये, इस फ़ालतू की बात को… आप तो यह बताइये कि योगी के राज में हिन्दू राज तो आ गया… अब सवर्णों के दिन बहुरेंगे या नहीं? म्लेच्छ-शूद्र तो अब फिर से औकात में आ ही जायेंगे… है न? तो फिर लगाइये नारा… योगी योगी योगी

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लखनऊ के पत्रकार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव को लगा चूना, डिजिटल बैंकिंग से किया तौबा

Ashwini Kumar Srivastava : 16-17 बरसों से क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और ऑनलाइन बैंकिंग करते रहने के बाद कल जीवन में पहली बार किसी महापुरुष ने मुझे भी डिजिटल बैंकिंग के खतरों से रूबरू करा दिया।  सिटीबैंक के मेरे क्रेडिट कार्ड से किसी ने बहुत ही काबिलियत के साथ रकम उड़ा दी और मैं कुछ भी नहीं कर पाया। हालाँकि रकम बहुत ही छोटी सी है और अब मैंने वह कार्ड ही बंद कर दिया है लेकिन उस घटना ने मेरे मन में भी डिजिटल बैंकिंग को लेकर खासी दहशत पैदा कर दी है।

कल जब मैं अपनी कंपनी के बाकी दो डायरेक्टर्स के साथ बैठकर किसी अहम् चर्चा में मशगूल था, उसी वक्त सिटीबैंक से मेरे मोबाइल पर 2500 रुपये के एक पेमेंट का मैसेज आया। कार्ड मेरे पास ही था और कई घंटों से हम लोग चर्चा में ही व्यस्त थे तो मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कौन सा पेमेंट है और किसने कर दिया? चूँकि पेमेंट गूगल को था तो मुझे लगा कि हो सकता है कि मैंने ही गलती से कभी कोई गूगल सर्विस सब्सक्राइब कर ली हो, जिसका मंथली बिल अब कटा हो। पर तुरंत मन में यह सवाल भी उठ गया कि बिना ओटीपी यानी वन टाइम पासवर्ड के मेरे मोबाइल पर आये या बिना मेरे द्वारा इंटरनेट पासवर्ड डाले ही यह ट्रांसेक्शन कम्पलीट ही कैसे हुआ? फिर मैंने गूगल के इंडिया कस्टमर केअर पर फ़ोन मिलाया तो वह कनाडा की किसी कन्या ने उठाया।

उसके बाद एक घंटे तक वह मेरे गूगल अकाउंट और अपने सर्वर आदि को खंगालती रही लेकिन नहीं बता पायी कि आखिर यह ट्रांसेक्शन किसने किया और कहाँ से किया गया था। बस उसने एक ही चीज की पुष्टि की कि यह पेमेंट भले ही मेरे कार्ड से किया गया था लेकिन मेरे गूगल अकाउंट की किसी सर्विस के लिए नहीं किया गया था।

यानी किसी महापुरुष ने कार्ड और पैसे तो मेरे उड़ाए थे लेकिन खरीदारी अपने लिए की थी। ऐसी कलाकारी तभी संभव थी, जब किसी व्यक्ति के पास मेरा कार्ड नंबर, उसके पीछे लिखा सीवीवी नंबर, मेरा इंटरनेट पासवर्ड भी मौजूद हो। खैर, मैंने सिटी बैंक में फ़ोन करके जब पड़ताल की तो पता चला कि यह पेमेंट ऑनलाइन हुआ ही नहीं है बल्कि किसी ने कहीं किसी मशीन पर कार्ड ही स्वाइप कराया है।

यह तो मेरे लिए और भी चौंकाने वाली बात थी। कार्ड मेरे पास, मेरे सामने ही रखा है लेकिन कहीं कोई और व्यक्ति ऐन मेरे जैसा ही कार्ड, वही एक्सपायिरेशन डेट, वही सीवीवी नंबर लेकर घूम रहा है। लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने की बात यह थी कि मशीन में स्वाइप कराने के बाद भी पिन एंटर करना पड़ता है, वह कैसे किया गया?

इसका साफ़ सा मतलब है कि भले ही डिजिटल बैंकिंग की कई स्तरीय सुरक्षा प्रणाली हमारे देश में बना दी गयी हो लेकिन आज भी वह सुरक्षित नहीं है। यही नहीं, जब भी कोई व्यक्ति डिजिटल बैंकिंग में फंसकर किसी लुटेरे के हाथ अपनी रकम गंवा बैठता है, तो हमारे देश में यह भी व्यवस्था कायदे की नहीं बनायी गयी है कि उड़ाई गयी रकम वापस मिल सके या फिर ऐसे चोर-लुटेरे पकड़े जा सकें।

बैंकिंग या साइबर फ्रॉड करने वाले ये लुटेरे इतने बेख़ौफ़ भी इसीलिए हैं क्योंकि उन्हें अच्छी तरह से पता है कि हमारा देश भले ही डिजिटल इंडिया में बदल रहा हो लेकिन उससे जुड़े खतरे भांपने और उनसे निपटने के लिए यहाँ कोई तैयारी ही नहीं है।

अब मेरे ही मामले को ले लीजिए, गूगल और सिटी बैंक में लंबी पड़ताल करने के बाद भी मैं अभी तक यह नहीं जान पाया हूँ कि यह पेमेंट गूगल की किस सेवा के लिए और कहाँ से किया गया?

लखनऊ, भारत या कहीं दूर विदेश में बैठकर किसी ने मेरे कार्ड का क्लोन बनाया और पैसा उड़ा लिया लेकिन कहाँ और कैसे हुआ यह कांड, यह कौन बता पायेगा, यही मुझे अभी तक नहीं पता… मैंने नेट पर सर्च करने की कोशिश की तो मुझे केवल इतना पता लगा कि लखनऊ में एक साइबर क्राइम सेल है लेकिन उसकी वेबसाइट, ईमेल, एफबी-ट्विटर अकाउंट का कोई अता पता नहीं। अब मैं पुलिस और अपने राजनीतिक संपर्कों से इस मामले की तह तक जाने की कोशिश तो करूँगा ही लेकिन बिना किसी संपर्क या रसूख वाले आम आदमी का क्या हाल होता होगा, यह तो मुझे समझ में आ ही गया।

कंप्लेंट या जांच-पड़ताल की इतनी लचर या नाकाफी व्यवस्था के बाद इतनी छोटी रकम के फ्रॉड के लिए तो शायद ही कोई अपने संपर्कों का इस्तेमाल करता होगा लेकिन मैं इसलिए इसे गंभीरता से ले रहा हूँ क्योंकि इसका राजफाश होने से न सिर्फ मैं भविष्य में अलर्ट रह पाऊंगा बल्कि यह भी जान पाउँगा कि आखिर मुझसे चूक कहाँ हुई, जिससे मेरी बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड और अति गोपनीय जानकारी ऐसे किसी अपराधी के हाथ लग गयी।

इसके अलावा, मेरे इसे गंभीरता से लेने से यह भी उम्मीद है कि भविष्य में कोई और भी इस अपराधी का शिकार होने से बच सकता है।

वैसे दिलचस्प बात यह भी है कि इतने लंबे अरसे में महज दो बार ही मुझे डिजिटल बैंकिंग के चलते चूना लगा है। इसमें भी एक बार तो मेरी ही लापरवाही और गलती थी। तब मैं दिल्ली में बिज़नस स्टैण्डर्ड अख़बार में सहायक समाचार संपादक हुआ करता था।

हुआ यूँ था कि जिस दिन मेरी सैलरी आयी, उसी दिन रात में मेरे मोहल्ले जीके-1 के नजदीक नेहरू प्लेस के एक एटीएम से मैंने ‘सिद्धावस्था’ में कुछ पैसे निकाले। एटीएम से निकले पैसे तो मैंने बटोर कर रख लिए लेकिन कार्ड वापस लेना ही भूल गया। दूसरे दिन सुबह जब मेरी सिद्धावस्था टूटी तो कार्ड याद आया लेकिन तब तक उससे किसी महापुरुष ने मेरी पूरी सैलरी भर की खरीदारी कर डाली थी।

उसके बाद तो वही हुआ, जो भारत में डिजिटल बैंकिंग में धोखा खाये हर व्यक्ति के साथ अमूमन होता आया है। कार्ड ब्लॉक कराया, कंप्लेंट दर्ज कराई लेकिन आज 8-9 साल बीत गए उस घटना को… न वे महापुरुष मिले और न ही उड़ाई गई रकम।

इस बार रकम भले ही कम है लेकिन क्राइम का तरीका बड़ा खतरनाक है इसलिए अपनी तरफ से तो मैं लिखित कंप्लेंट दूंगा ही… बाकी डिजिटल इंडिया जाने और उसके कर्णधार जानें…

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Manish Mishra ऐसा मेरे साथ तब हुआ था जब मैंने आईसीआईसीआई क्रेडिट कार्ड के लिये अप्लाई किया था। जन्म तिथि और माँ का नाम मालूम हो तो ऐसा संभव है। सावधान रहिये, ज़माना बहुत्ते डिजिटल हो रहा है…

Ashwini Kumar Srivastava मुझे तो पहली बार पता लगा कि डिजिटल में कंगाल करवाने का भी पूरा इंतजाम है। और लुटने के बाद किसने लूटा-कैसे लूटा- कहाँ बैठकर लूटा… ये सब जान पाने की भी कोई खास व्यवस्था नहीं है अपने यहाँ। मतलब यह कि जो गया, उसको डिजिटल इंडिया में अपना योगदान मानकर भूल जाइए… और भारत माता की जय, वंदे मातरम, पाकिस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाइये…

Manish Mishra एतना डिजिटल है देश कि होम मिनिस्ट्री की वेबसाइट हैक हो जाती है, गृहा मंत्रालय का योगदान तो देखिये।

Ashwini Kumar Srivastava यही तो कह रहे हैं कि ससुर एक तरफ तो हमारा इसरो गजब ढाए पड़ा है… और अमेरिका-चीन सब अकबकाये हुए हैं कि कभी बैलगाड़ी-साइकिल से राकेट ढोने वाला इसरो और भारत को क्या हो गया है… तो दूसरी तरफ खुद इंडिया वाले भौचक है, डिजिटल इंडिया के नाम पर देश में मचे ऐसे तमाशे से, जिसमें कब किसकी जेब कट जाये और कौन काट ले जाए, यह डिजिटल इंडिया के माई-बाप को भी नहीं पता लगेगा तो हम-आप क्या हैं… कुल मिलाकर अजब भांग खाया देश है हम लोगों का… ऐसी लूट को रोकने-पकड़ने की तैयारी किये बिना ही डिजिटल इंडिया का इतना बड़ा तंबू तानकर सबको दावत और दे दी है इस सरकार ने…

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इस सीट पर ईवीएम से छेड़छाड़ न कर सके तो हार गई भाजपा!

Ashwini Kumar Srivastava : यह है मेरठ की उसी सीट से जुड़ी खबर, जिस पर भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी इस भयंकर मोदी तूफ़ान में भी हार गए थे। ईवीएम के साथ वीवीपीएटी की चाक चौबंद व्यवस्था में यहाँ 11 फ़रवरी को मतदान हुआ। इसके बाद जहाँ ईवीएम मशीन रखी गयी, वहां हर समय मौजूद रहने वाले व्यक्ति की लाश गटर में मिली। यानी इस बात की पूरी सम्भावना है कि मतदान के बाद यहाँ रखी ईवीएम से छेड़छाड़ की कोशिश की गयी, जिसे इस व्यक्ति ने देख लिया और इसी के चलते यह हत्या हो गयी।

यह भी तो हो सकता है कि मारे गए इसी व्यक्ति के प्रतिरोध के चलते अंततः यहाँ की ईवीएम में छेड़छाड़ ही न हो पायी हो और वास्तविक नतीजे मिलने के चलते वाजपेयी हार गये हों। अगर ईवीएम में छेड़छाड़ हो जाती तो शायद मेरठ का विधायक आज कोई और ही होता।

जिस व्यक्ति की हत्या हुई, उसकी तैनाती यूपी की बहुचर्चित आईएएस और मेरठ की डीएम बी चंद्रकला ने की थी। तैनात व्यक्ति लंगूर का मालिक था। डीएम ने ईवीएम को रखे जाने वाले स्ट्रांग रूम में बंदरों के उत्पात को देखते हुए अचानक लंगूर को रखवाने का फैसला किया था। चूँकि लंगूर को रखवाने का फैसला अचानक ही लिया गया था इसलिए सम्भव है कि ईवीएम से छेड़छाड़ करने की कोशिश करने वालों को ईवीएम स्थल पर लंगूर मालिक की मौजूदगी का पता ही न चला हो। फिर अप्रत्याशित रूप से लंगूर मालिक का सामना होने पर उन्हें लंगूर मालिक की हत्या करके फरार हो जाना पड़ा हो।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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विपक्ष के हर मुद्दे और आरोप पर जवाब देने के लिए न्यूज चैनल एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं!

Ashwini Kumar Srivastava : भाजपा को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती… विपक्ष के हर मुद्दे और आरोप पर जवाब देने के लिए मीडिया ही एड़ी-चोटी का जोर लगा देता है… अब देखिये, जैसे ही मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ईवीएम पर अपने आरोपों को दोहराया, ऐन उसी वक्त टीवी चैनलों पर ईवीएम को अभेद्य साबित करने के लिए होड़ मच गयी…

यानी विपक्ष को यह समझना होगा कि मीडिया भी भाजपा के बाकी सहयोगी संगठनों जैसे एबीवीपी आदि की तरह ही है। लिहाजा विपक्ष को अपना संघर्ष अब प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मीडिया के जरिये न करके सड़कों पर उतर के, धरना प्रदर्शन करके या क़ानूनी दांवपेंच अपना कर करना होगा। वरना विपक्ष एक दिन यूँ ही भाजपा से बिना लड़े मीडिया के हाथों ही ख़त्म कर दिया जाएगा।

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जब से सत्ता पाये हैं मोदी जी, वह भी कांग्रेस की ही तरह अड़ गए हैं- ‘चुनाव तो अब ईवीएम से ही होगा!’ अब देखिये जब कांग्रेस ने 10 साल तक छक्के छुड़ा रखे थे, तब आडवाणी-स्वामी समेत सारी भाजपा ईवीएम को लेकर हाय तौबा मचाती रही। आज भाजपा के प्रवक्ता बने बैठे नरसिम्हा ने तो तब एक मोटी सी किताब ही लिख मारी इस मसले पर कि कैसे कांग्रेस ने ईवीएम के जरिये देश पर कब्ज़ा कर लिया है। फिर भाजपा सुप्रीम कोर्ट भी चली गयी। अभी तक केस चल रहा है। अब जब सुप्रीम कोर्ट भाजपा वाले ही केस में केंद्र सरकार को कह रहा है कि आपका आरोप सही है और ईवीएम से सही चुनाव नहीं हो पा रहा इसलिए आप वीवीपीएटी सिस्टम भी लगाइये तो भाजपा सरकार ही तीन साल से बहानेबाजी कर रही है और कह रही है कि ईवीएम में कोई दिक्कत नहीं है। सब आरोप झूठे हैं।

बताइये खुद ही के किये मुक़दमे में खुद ही कई साल बाद कह रहे हैं कि सब आरोप झूठे हैं और ईवीएम सही है। दरअसल आडवाणी जी को लगता था कि कांग्रेस ईवीएम से धांधली करके सरकार बनाती है। जब से मोदी जी आये हैं, उन्होंने आडवाणी समेत सारी पुरानी भाजपा को गलत बताते हुए साबित कर दिया है कि बिना ईवीएम में धांधली किये ही यूपी में तकरीबन सारी लोकसभा की सीट और 325 विधानसभा की सीट भी जीती जा सकती है। भाई अडवाणी के मुकाबले मोदी ज्यादा बड़े और पॉपुलर नेता हैं इसलिए ऐसा चमत्कार कर ले रहे हैं।

लेकिन पता नहीं क्यों जब से सत्ता पाये हैं मोदी जी, वह भी कांग्रेस की ही तरह से अड़ गए हैं कि चुनाव तो अब ईवीएम से ही होगा। ईवीएम में न तो कोई खराबी है और न ही ईवीएम के साथ कोई नया सिस्टम भी लगाया जाएगा। हो सकता है मोदी जी ऐसा इसलिए कर रहे हों क्योंकि वह लुप्तप्राय ईवीएम को देश में बचाना चाहते हों। वह न चाहते हों कि 15 साल से इस पर आरोप लगाने वाले सभी दल मिलकर इसे भारत से गायब ही कर दें। ईवीएम के संरक्षण के लिए मोदी जी का यह प्रयास अत्यंत सराहनीय ही माना जाएगा।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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घबराइये कि आप उत्तर प्रदेश में हैं…

संक्रामक बीमारियों का मौसम है इसलिए मुस्कराइये नहीं, बल्कि घबराइये…. क्योंकि आप लखनऊ में हैं। मैं खुद भी तब से बहुत ज्यादा घबराने लगा हूँ, जब दो साल पहले मुझे एक रिपोर्ट में स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई थी। यहाँ समूची व्यवस्था चरमराई हुई है। जब तक आपका वास्ता यहाँ के अस्पताल, थाने, कोर्ट जैसी मूलभूत जरूरतों वाली संस्थाओं और उनके तथाकथित रखवालों यानी डॉक्टर, पुलिस या वकील से नहीं पड़ता तब तक आपको भी मेरी ही तरह शायद यही गुमान होगा कि हमारे लिए सरकार और प्रशासन ने बहुत कुछ इंतेजाम कर रखे हैं।

मैं और लोगों की तरह बदस्तूर पूरे साल फैलने वाली इन खतरनाक बीमारियों, और हर साल ही सरकार की चाक चौबंद तैयारियों के बारे में पढता रहता था। हालांकि हर साल ही सैकड़ों हजारों लोग इन बीमारियों से मरते भी हैं मगर मुझे ऐसा लगता था कि कुछ खामियां भले ही हों मगर प्रशासन भी मुस्तैद तो हो ही जाता है। इसके उलट, सच तो ये है कि मीडिया में सरकारी तैयारी के जो दावे किये जाते हैं, उनका एक प्रतिशत भी सही नहीं होता है और यही वजह है कि सिर्फ वही मरीज इन बीमारियों के मृत्यु पाश से बच पाते हैं, जिनकी खुद की इम्युनिटी उन्हें बचा लेती है।

हुआ यूँ कि मेरी तबियत दो तीन दिन से ख़राब चल रही थी। शहर में बहुत बुरी तरह से स्वाइन फ्लू फैला हुआ था। रोज ही कई लोगों की मौत हो रही थी।  अखबार में जितनी जगह में स्वाइन फ्लू के कहर और मौतों की ख़बरें छप रही थीं, उतनी ही जगह में प्रदेश सरकार की तरफ से बिलकुल देवदूत वाले अंदाज में सीएमओ यादव जी के हवाले से चाक चौबंद व्यवस्था की ख़बरें भी आ रही थीं। मसलन, स्वाइन फ्लू से न घबराएं। शहर के हर बड़े अस्पताल में इसके इलाज की ख़ास तैयारी है। pgi, मेडिकल कॉलेज समेत कई जगह आधुनिक टेस्ट लैब है, जहाँ कुछ ही घंटों में जांच करके रिपोर्ट मिल जा रही हैं।

स्वाइन फ्लू की एक मात्र दवा पूरे लखनऊ में भारी मात्रा में उपलब्ध है, फ्री मिल रही है। ये भी बताया जा रहा था रोज के रोज कि कैसे किसी एक मरीज में जैसे ही पुष्टि होती है तो यादव जी समेत कैसे पूरा स्वास्थ्य विभाग कैसे चौकन्ना हो जा रहा है। मरीजों से अनुरोध किया जा रहा था कि रिपोर्ट में स्वाइन फ्लू निकलने पर घर पर ही रहें। सरकारी एम्बुलेंस आएगी और मरीज को अस्पताल ले जायेगी। यही नहीं, साथ में स्वास्थ्य विभाग का एक दस्ता भी आएगा, जो कि आपके अड़ोसी पडोसी रिश्तेदार परिवार सभी को स्वाइन फ्लू की दवा मुफ़्त में बांटेगा ताकि वह भी सुरक्षित रहें।

बहरहाल, ऐसे माहौल में मेरे बड़े भैया के एक दोस्त की लखनऊ के सबसे प्रतिष्ठित अस्पताल यानी pgi में स्वाइन फ्लू से मौत की खबर आई। वह विदेश में रहते थे और बरसों बाद चंद रोज पहले ही प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के हाथों अपनी जान गंवाने लखनऊ आये थे। इस खबर से डर कर ही मैंने डॉ लाल पैथोलॉजी वालों को घर पर बुलाया और हजारों रुपये खर्च करके स्वाइन फ्लू की जांच करा ली। उसके बाद मुझे अंदर से कुछ बेहतर लगने लगा तो मैं दूसरे ही दिन अपने ऑफिस चला गया। ऑफिस में पहुंचा ही था तो फ़ोन आया पैथालॉजी से कि आपको स्वाइन फ्लू है आप तुरंत एडमिट हो जाइए। मेरे पाँव तले जमीन खिसकी मगर मीडिया का आदमी होने के नाते अपने पत्रकार बंधुओं पर भरोसा करते हुए पुराने पेपर खंगाल कर उस नंबर पर फ़ोन किया, जिसे यादव जी हर रोज स्वाइन फ्लू की हेल्प लाइन कहके छपवा रहे थे।

यादव जी कह रहे थे कि आप इस नंबर पर फ़ोन करिये और भूल जाइए, बाकी काम हम करेंगे और आपको घर से एम्बुलेंस भेज कर बुलवायेंगे। मैंने फ़ोन किया तो हेल्प लाइन वालों ने कहा कि आप पहले pgi जाइए और जांच कराइये। हमारी यानी सरकारी रिपोर्ट निकलेगी तभी माना जाएगा कि आपको स्वाइन फ्लू है। खैर, मैंने टैक्सी मंगाई और मास्क भी। मेरे साथ मेरा एक पुराना कर्मचारी था तो मगर उसके पसीने छूट रहे थे और वह सोच रहा था कि कैसे इनसे पिंड छुड़ा कर भागूं।

टैक्सी वाला भी मास्क देख कर और pgi का नाम सुनकर डर गया और मना करने लगा तो उससे झूठ बोला कि भैया सिर्फ बचाव के लिए लगाया है कि हम लोगों को न हो जाए। खैर सुबह 11 बजे ही pgi पहुंचे, वहां स्वाइन फ्लू की जांच कहाँ होगी, यही पता करने में दो घंटे निकल गए। जांच केंद्र मिला तो जांच करने वाले डॉक्टर नदारद थे। डेढ़ दो घंटे बाद आये और जांच करके कहा कि कल आईयेगा रिपोर्ट लेने। फिर वहां मैंने स्वाइन फ्लू की दवाई लेने की कोशिश की तो कोई डॉक्टर कर्मचारी दवाई देना या भर्ती करना तो दूर बात ही करने को नहीं तैयार था।

मैंने पढ़ा था कि अगर दो दिन के भीतर दवा लेनी नहीं शुरू की तो फिर खुद बच गए तो ठीक वरना कोई नहीं बचा पायेगा। मुझे तो दो दिन आलरेडी हो चुके थे इसलिए मैं चाहता था कि मुझे कोई भर्ती करे न करे, मगर कम से कम दवा तो दे दे। दवा खुले बाजार में उपलब्ध नहीं थी। केवल pgi और लोहिया जैसे अस्पतालों में ही मिलेगी, ऐसा बताया जा रहा था। इसलिए मैंने वहां बहुत अनुरोध किया। मेरे साथ वहां कई लोग स्वाइन फ्लू की पुष्टि की सरकारी रिपोर्ट लेकर खड़े थे। कुछ ठीक ठाक दिख रहे थे तो कुछ जमीन पर निढाल पड़े थे।

ऐसे ही एक मुस्लिम महिला, जिनके पति सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के छोटे मोटे नेता थे, भी निढाल पड़ीं थीं। उनके पति ने कई दिग्गज लोगों से सोर्स लगाया था और वो बहुत हंगामा मचा रहे थे मगर न तो कोई उन्हें भर्ती करने को तैयार था और न ही कोई दवा ही दे रहा था। यहाँ तक की उन्हें या हमें कोई डॉक्टर देखने तक नहीं आया।  फिर मैंने भी भाजपा के एक कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री से सिफारिश लगवाई। उन्होंने व्यक्तिगत रूचि लेते हुए कई बार फ़ोन किया और कई लोगों को किया। तब कहीँ जाकर शाम को एक डॉक्टर भुनभुनाता हुआ बाहर आया। उसने आते ही कहा कि आप लोहिया जाइए। यहां वार्ड फुल है। गिनती के चार छः बेड हैं। दवा भी नहीं है। आप वहीँ से ले लीजिये। मेंरे बगल में खड़े समाजवादी नेता ने अपना परिचय देते हुए उनके हाथ जोड़कर विनती तो डॉक्टर भड़क गया और बोला सरकार तुम्हारी और दोष हम पर लगा रहे हो। जाओ अखिलेश से कहो कि बेड बढ़ाएं यहाँ या दवा पहुंचवाये। ये कह कर डॉक्टर निकल लिया।

समाजवादी पार्टी वाले सज्जन फिर कहाँ गए, मुझे पता नहीं मगर मेरी आँखों के सामने तो मौत ही नाच रही थी इसलिये वहां से मैं भागा शहर के दूसरे कोने में स्थित लोहिया अस्पताल में। मेरे हितैषी नेता ने अब लोहिया में फ़ोन करना शुरू किया। लंबे रास्ते में ही मैंने शहर के सबसे महंगे से लेकर हर अच्छे निजी अस्पताल में भी पता किया पर सबने मना कर दिया कि न तो उनके पास इसकी दवा है और न ही वे स्वाइन फ्लू का कोई मरीज भर्ती करते हैं। यानी कुल मिलाकर मेरी जिंदगी या तो सीएमओ यादव जी और अखिलेश यादव जी के हाथ में थी या फिर खुद मेरी रोग प्रतिरोधक क्षमता के हाथ में।

लिहाजा मैंने सीएमओ यादव जी तक तगड़ी सिफारिश लगवाई। सिफारिश वाकई तगड़ी थी इसलिए मेरे लोहिया पहुँचने से पहले खुद यादव जी का मेंरे पास फ़ोन आया। उन्होंने बिलकुल उसी अंदाज में मुझे न घबराने को कहा, जैसे कि वह न्यूज़ पेपर के जरिये लखनऊ भर को कह रहे थे। उन्होंने कहा कि लोहिया में आप फलाने से मिलिए आपको दवा मिल जायेगी। मैंने बहुत अनुरोध किया कि डॉक्टर साहब मुझे भर्ती कर लीजिये पर वह नहीं माने। उन्होंने कहा कि अभी कहीं जगह नहीं है आप घर जाइए। मैंने याद दिलाया कि वह एम्बुलेंस, वह पूरे मोहल्ले, परिवार को दवाई तो वह भड़क गए। बोले ऐसा क्या हो गया है, जो आप लोग बात का बतंगड़ बना देते हैं। आप अपने पर फोकस कीजिये, शहर की चिंता मुझे करने दीजिये। मैं कर तो रहा हूँ आपकी मदद।

मैं किसी तरह रात 8 बजे पहुंचा लोहिया तो जिस फलाने से मिलने को यादव जी ने कहा था, उन्होंने छूटते ही कहा कि दवा ख़त्म हो गयी है, कल आइये। फिर घंटों चिरौरी करने, सिफारिश के फ़ोन करने, यादव जी से कई राउंड फ़ोन पर अनुरोध कहा सुनी करने के बाद मुझे केवल एक दिन की खुराक दी गयी यानी दो कैप्सूल। बाकी दो दिन की दवा के बारे में कहा गया कि pgi से लीजिएगा। अब यहाँ कुछ नहीं मिलेगा। पर मेरे लिए देवदूत बन कर उतरे उन भाजपा नेता ने मुझे आश्वस्त किया कि कल तक कहीं से भी वह मुझे बाकी की दवा भी दिलवा देंगे। और वाकई उन्होंने दिलवा भी दी। खैर, कुछ दिन के कष्ट के बाद मैं ठीक हो गया और वापस अपनी जिंदगी में रम गया।

मगर आज दो साल बाद फिर अख़बारों में यादव जी की चाक चौबंद व्यवस्था वाले बयान, डेंगू से मरते लोग, अस्पतालों में हंगामा करते लोगों की ख़बरें देख कर मन में फिर वही दहशत ताजा हो गयी। मुझे याद है कि मेरा स्वाइन फ्लू ठीक होने के चंद दिनों बाद ही मुलायम सिंह यादव के भी बीमार होने की खबर आई थी। पहले तो एक दो दिन सबसे कद्दावर यादव जी pgi में रहे मगर जैसे ही यहाँ के डॉक्टरों ने उन्हें डराया कि स्वाइन फ्लू हो सकता है, वैसे ही वह उड़न खटोले से दिल्ली के मेदांता अस्पताल में पहुंच गए। और क्यों न जाते भला, जो सच्चाई मुझे मौत के मुहं में जाकर पता चली, वह सच्चाई तो वह तब से जानते हैं, जब 1989 में उन्होंने पहली बार बड़े बड़े वादे करके सत्ता हथियाई थी।

आज उनके लड़के के हाथ में सत्ता है। इतने बरस तक खुद और अब उनकी औलाद के हाथ में उत्तर प्रदेश होने के बावजूद जब वह खुद अपनी ही सरकार के दावों पर यकीं नहीं कर पा रहे हैं और अपनी जान बचाने के लिए अपने ही प्रदेश से पलायन कर जा रहे हैं तो भला हम आप क्यों न घबराएं? लेकिन किया क्या जाए? कल मुलायम थे, आज अखिलेश हैं, कल उनके नाती पोते इस प्रदेश के राजा बनेंगे…. और हमारे आपके जैसे लोग यूँ ही अखबार की ख़बरों को सच मानकर सरकारी इंतजामों की देहलीज पर सर पटकते रहेंगे।

लेखक अश्विनी कुमार श्रीवास्तव आईआईएमसी से पत्रकारिता की शिक्षा लेने के बाद नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान और बिज़नस स्टैण्डर्ड जैसे अखबारों में दिल्ली में 12 साल तक पत्रकारिता किया. फिलहाल अपने गृह नगर लखनऊ में अपना व्यवसाय कर रहे हैं. उनसे संपर्क srivastava.ashwani@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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