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सवर्णों के खून सने हाथों का ज़िंदा दस्तावेज- ‘भंगी दरवाजा’! देखें तस्वीरें

दिलीप मंडल-

बड़े भाई रमेश भंगी ने मध्य प्रदेश के मांडू क़िले की ये तस्वीर लगाई है।

इसे देखकर पता चलता है प्राचीन भारत का इतिहास कितना हिंसक रहा है। इस दरवाज़े का नाम बदलने की माँग केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन काम करने वाली ASI से की गयी। ASI ने मना कर दिया।

मेरी माँग है कि नाम न बदला जाए पर इस क्रूर और हिंसक प्रथा और उन राजाओं के कुकर्मों के बारे में वहाँ एक बोर्ड लगे कि किस तरह क़िले और तालाब में लोग दबा कर मार डाले गए। राजाओं के अंधविश्वास का शिकार कोई ब्राह्मण-ठाकुर नहीं हुआ।

नाम परिवर्तन की मांग इतिहास नष्ट करने की मांग है. -रमेश भंगी

कहा जाता है कि जोधपुर के मेहरानगढ़ को बनाने में भी मेघवाल की बली दी गई थी। मेहरानगढ़ के द्वार पर ही राजाराम मेघवाल के नाम का पत्थर लगा हुआ है। -डॉ राजेंद्र राय

गुजरात में भी ऐसी एक घटना पाई जाती है 1100 के आसपास एक तालाब में पानी नहीं आ रहा था तो गुजरात के एक वीर माया मेघवाल को उस तालाब में बलि दी गई थी। राजाराम मेघवाल और वीर माया मेघवाल को एक ही समय में बलि दी गई थी। दोनो में बहुत अंतर नहीं है। -दीक्षित वनिया

मेहरानगढ़ दुर्ग जोधपुर,में भी बलि मेघवाल समाज के दलित ने दी थी -मुश्ताक़ अली

हां. पता लगाया जाना चाहिए कि बलि किन लोगों की दी गई है। एक ही को नजीर नहीं माना जा सकता है. संभव है कि कुछ ढाढ़ी, केवट, पासी, धोबी आदि ने भी कुर्बानी दी हो. केवल एक के आधार पर कुछ निष्कर्ष नहीं निकलता. -सत्येंद्र पीएस

जिस द्रष्टिकोण से समझा जा रहा है वास्तव में ऐसा नही है. भंगी शब्द का क्या अर्थ होगा इसकी जानकारी लेनी चाहिए. पंजाब में भंगी सफ़ाई करने वाले के लिए इस्तेमाल नही होता था, महाराजा रणजीत सिंह की सेना में भंगी मिसल थी जिसके अंतर्गत अंबाला से अमृतसर तक की सुरक्षा / प्रशासन था. लाहौर में उस समय की सबसे बड़ी “भंगी तोप” आज भी देखी जा सकती है. तब भंगी “अंग भंग” करने वाले सूरमाओं के लिए उपयोग होता था. -प्रमोद पाहवा

This darwaja should retained with a short cruel history of the then kings. The low castes should not forget their enemies. They should take a lesson from it and strive for own pride and honour which they have got by dint of Constitution of the country. -Bidyabhushan Shasani

क्रूरता के निशान बने रहने दीजिए।। इन सभी निशानियों को समस्त समुदाय तक पहुंचाया जाए। ताकि समस्त शुद्र अतिशुद्र अपने पुरुखों के साथ हुए अत्याचार को समझे और हिंदू कथित ब्राह्मण धर्म को त्यागकर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित कर सकें। -रवींद्र प्रकाश आर्या

मैं भी नहीं चाहता नाम बदला जाए।सच्चाई पता तो चलती रहेगी ब्राह्मणवाद की।और जो जातिय आतंकवादी कहते हैं जाति मुगलों की देन है उनके मुँह पर कालिख पोत रहा है यह दरवाजा। नमो बुद्धाय, जय भीम जय भारत, जय भारतीय संविधान! -देवेंद्र भारतीय

ये प्रथा हर स्टेट में थी. महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति के मुख्यतः मातंग लोगों की बली देने की प्रथा थी. -आकाश सखारे

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