मूर्ति नैन-
भारी कर्ज़ और वित्तीय दबाव के कारण अडानी ने अपनी कंपनियों में हिस्सेदारी अमेरिकी फाइनेंशियल दिग्गजों (जैसे Blackstone, GQG Partners) को बेच दी। मोदी सरकार ने अडानी को देश की सड़कें, एयरपोर्ट, बंदरगाह, बिजली, सीमेंट—सबकुछ सौंप दिया। अडानी ने कर्ज़ में डूबकर वही संपत्तियां अमेरिका की Blackstone और GQG जैसी कंपनियों को बेच दीं। भारत की अर्थव्यवस्था, संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर अब विदेशी कब्जे में जा रहे हैं।
ब्लैकस्टोन, जिसके पास 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की एसेट्स हैं, अब भारत में अडानी की कंपनियों का अधिग्रहण कर रही है, और रिलायंस के साथ 50-50 जॉइंट वेंचर कर चुका है।
ब्लैकरॉक का राजनीतिक प्रभाव इतना बड़ा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों तक को प्रभावित करता है। डोनाल्ड ट्रम्प पर हुए असैसिनेशन अटेम्प्ट में शामिल युवक का 2022 में ब्लैकरॉक का विज्ञापन सामने आ चुका है।
अमेरिका के सत्ता केंद्रों में इसकी पकड़ जगजाहिर है, और अब यह भारत में अडानी-अंबानी के जरिए अपने पैर जमा रहा है।
मोदी सरकार बताइए….
- पहले सरकारी संपत्तियां अडानी को मिलीं, अब अडानी की संपत्तियां अमेरिका को—यह सौदा पहले से सेट था या अडानी की कंगाली का बहाना बनाया गया?
- अडानी-अंबानी के माध्यम से ब्लैकरॉक और ब्लैकस्टोन को भारत में इतनी मजबूत पकड़ क्यों दी जा रही है?
- क्या भारत के स्ट्रेटेजिक एसेट्स अब विदेशी कंपनियों के हाथ में सौंपे जा रहे हैं?
- क्या अब हमारी संसद और सरकार भी विदेशी लॉबियों के इशारों पर चलेगी?
- “Make in India” का नारा देकर “Sell to America” की साजिश रची गई?
विपक्ष और मीडिया इस पर चुप क्यों हैं?
वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश के रे की टिप्पणी-
अदानी के 750 मिलियन डॉलर के क़र्ज़ को ब्लैकरॉक और सिटाडेल द्वारा अगर ख़रीदा जाता है, तो इसका मतलब है भारत की संपत्ति के एक हिस्से पर अमेरिकी संस्थाओं का अधिकार. दूसरा मतलब यह है कि भारतीय बैंकों के पास अब बड़ा धन देने की क्षमता नहीं है या फिर उन्हें भरोसा नहीं है. तीसरा अर्थ यह है कि अदानी कोई बड़ा एसेट लेने की कोशिश में हैं.


