यूपी में ब्राह्मणों की हालत मुस्लिम मतदाताओं जैसी हो गई है, जाएं तो कहां जाएं!

सत्येंद्र पीएस-

उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण मतदाता भाजपा आरएसएस से खासे नाखुश हैं। इसकी कुछ ठोस वजहें हैं।

1 ब्राह्मण वर्ग का मुख्य काम नौकरी और ठेकेदारी है। इस सरकार में नौकरियां गायब हैं। जो भी सरकारी वैकेंसी आई, वहां बेईमानी से नियुक्तियां हुई और आम, गैर राजनीतिक ब्राह्मणों के बच्चे नौकरी का मुंह ताकते रह गए। ब्राह्मण वर्ग जिस लेवल की ठेकेदारी करता है, वह अब कम्पनियों को दिया जा रहा है और उसकी कमाई बन्द है।

2 भाजपा ने टेनी जैसे लम्पट अपराधी ब्राह्मणों को प्रमोट किया। इससे उनकी शालीन छवि खराब हुई। साथ ही अगर किसी जाति में कोई गुंडा विकसित होता है तो सबसे पहले वह अपने पट्टीदार की लड़की से छेड़छाड़ करता है, उसकी सम्पत्ति कब्जिया लेता है। भाजपा द्वारा गुंडों को ब्राह्मण नेता के रूप में विकसित करने का नुकसान ब्राह्मणों को उठाना पड़ रहा है।

3 पहले उत्तर प्रदेश में मुरली मनोहर जोशी, अटल बिहारी वाजपेयी, कलराज मिश्र, केसरी नाथ त्रिपाठी जैसे बड़े ब्राह्मण नेता भाजपा में थे जो ब्राह्मण हितों की रक्षा के लिए सरकार से लेकर कोर्ट तक जी जान लगा देते थे। ओबीसी को त्रिस्तरीय आरक्षण न मिलने पाए, उसकी पूरी लड़ाई कोर्ट में पण्डित केसरी नाथ त्रिपाठी ने लड़ी। इन नेताओं को मोदी योगी ने खत्म कर दिया। ओबीसी में केशव प्रसाद मौर्य और स्वतन्त्र देव सिंह जैसे ओबीसी नेता हैं, जिनके पास पूरब से लेकर पश्चिम तक का कोई ओबीसी नेता सीधे पहुँचता है और ट्रांसफर पोस्टिंग से लेकर छोटे मोटे ठेके पट्टे के काम हाथ पकड़कर करा लेता है। लेकिन भाजपा में ब्राह्मणों में एक भी नेता नहीं जो अपना छोड़कर दूसरे किसी का काम करा पाए।

4 ब्राह्मणों की नई पौध की मन्दिर या पंडागीरी जैसे काम में कोई रुचि नहीं है। वहां कमाई इतनी सीमित और भीड़ इतनी ज्यादा है कि पेट भरना मुश्किल है। पहले से इस काम में लगे लोग जमे हैं और उधर धंधा मंद है। ब्राह्मण के बच्चे अगर एटीएम पर गार्ड की अच्छी नौकरी पा जाएं तो पंडागीरी से बेहतर उसे समझते हैं। मेरे ऑफिस के सामने पान बेचने से लेकर अखबार बेचने और पार्किंग में गाड़ी लगवाने तक के छोटे छोटे काम ब्राह्मण कर रहे हैं। उन्हें इस बात में कोई रुचि नहीं कि कौन सा मन्दिर कितना विकसित हो रहा है। यह नई पौध भाजपा शासन में पहले से बुरे आर्थिक हालात में पहुँच गया है।

5 ब्राह्मण कोई बुद्धिजीवी वगैरा नहीं हैं। वह भी भारत के सामान्य नागरिक की तरह जातिवादी, धार्मिक, स्वार्थी हैं। उसे भी भूख लगती है, प्यास लगती है। बच्चों की स्कूल फीस देनी होती है। वह भी खोज रहे हैं कि उनका अपना नेता हो, जो उनका काम करा पाए।

इन ठोस 5 वजहों के अलावा भी तमाम वजहें हैं, जिसके चलते यूपी के कम से कम 60% ब्राह्मण मौजूदा शासन से नाराज हैं। यह ब्राह्मण मित्रों से बातचीत के आधार पर मैंने लिखा है। 40% ब्राह्मण, जो नहीं नाराज हैं, वो ओबीसी वर्ग की तरह ही निरीह और भोले भाले हैं।

यूपी में आज की तारीख में सबसे बड़े व सुलझे, पढ़े लिखे नेता सतीश मिश्र हैं, उनके कद का कोई नहीं है। लेकिन बसपा मरणासन्न है। सपा में जनेश्वर मिश्र व बृज भूषण तिवारी के कद का कोई विद्वान नेता नहीं बचा है, जिसकी भरपाई सपा फरसा थामकर करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी भी जनेऊ उठाकर खुद को ब्राह्मण साबित कर रहे हैं। ब्राह्मणों की हालत इस समय मुसलमान मतदाताओं जैसी हो गई है कि वह जाएं तो कहां जाएं। ऐसे में पूरी उम्मीद है कि यूपी के 2022 चुनाव में ब्राह्मण मत एकतरफा किसी दल को नहीं मिलने जा रहा है।

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