उप-चुनाव में सपा की प्रतिष्ठा, भाजपा का कट्टर हिन्दुत्व दांव पर

उत्तर प्रदेश के उप-चुनाव के नतीजे समाजवादी पार्टी ही नहीं भारतीय जनता पार्टी के लिये ‘मील का पत्थर’ साबित होंगे। हार-जीत के फैसले से दोनों पाटिर्यो का राजनैतिक भविष्य तय होगा। सपा ने मैनपुरी की लोकसभा सीट के अलावा विधान सभा की 11 में से दो-तीन सीटें भी जीत लीं तो पार्टी को नई ‘उड़ान’ मिल जायेगी और ऐसा नहीं हुआ तो कई प्रश्न चिंह पार्टी नेतृत्व की काबलियत पर लग जायेंगे। इसके पीछे कई कारण भी गिनाये जा सकते है। कहने को तो उप-चुनाव मात्र 11 विधान सभा और एक लोकसभा सीट का था, लेकिन जीत का स्वाद चखने के लिये सपा के कई कद्दावर नेता ही नहीं मुलायम सिंह यादव सहित उनका पूरा कुनबा पहली बार चुनावी जंग में ‘एड़ियां’ घिसता नज़र आया।

इस समय समाजवादी पार्टी को अपना चेहरा और अखिलेश सरकार की लाज बचाये रखने के लिये अच्छी खबर का बेहद इंतजार है। करीब तीस महीने पुरानी सपा सरकार इस समय प्रदेश के बिगड़े हालातों को लेकर विरोधियों के निशाने पर है। इससे उसे तभी छुटकारा मिल सकता है, जब उसके सिर किसी भी तरह से जीत का सेहरा बंधेगा। वहीं भाजपा की प्रदेश इकाई और हिन्दुत्व की भी परीक्षा इन चुनावों में होगी।

उप-चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस भी काफी संजीदा थे, लेकिन किसी भी दल ने उप-चुनावों को अपनी प्रतिष्ठा से नहीं जोड़ा। भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश पार्टी इकाई के सहारे ही पूरा चुनाव अभियान चलाया। दिल्ली से कोई भी बड़ा भाजपा नेता अपने प्रत्याशियों का समर्थन करने नहीं आया। मोदी की तो बात छोड़ ही दीजिये, केन्द्रीय मंत्री और यूपी का बड़ा राजनैतिक चेहरा समझे जाने वाले राजनाथ सिंह, उभा भारती, कलराज मिश्र, मेनका गांधी, संतोष गंगवार के साथ-साथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तक चुनाव से दूर ही दूर रहे।

अपवाद को छोड़कर कोई खास रूप से सक्रिय नहीं नजर आया। भाजपा आलाकमान को तो संभवता साफ-साफ इस बात का अहसास हो गया था कि चाहें भाजपाई जिनती भी ताकत लगा ले, इस चुनाव से उसकी साख को बट्टा पहुंचना निश्चित है। जहां उप चुनाव हो रहा है, वहां की सभी 11 विधान सभा सीटों पर 2012 में भाजपा को विजय मिली थी और ऐसा दोबारा होना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर लगता है। ऐसे में हालात में भाजपा आलाकमान ने अपनी साख बचाये रखना बेहतर समझा और प्रचार से दूरी बना ली।

कांग्रेस ने भी किसी नामचनी हस्ती को चुनाव प्रचार में नहीं उतारा, न राहुल और न ही सोनिया गांधी अपने प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार करने आईं। इसी तरह कांग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल, सलमान खुर्शीद, आरपीएन सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, पूर्व सांसद और कांग्रेस का दलित चेहरा समझे जाने वाले पीएल पुनिया भी करीब-करीब चुनाव से दूर ही रहे। बसपा ने तो अपने आप को उप-चुनाव से पहले ही किनारे कर लिया था। कहा तो यहां तक जाता है कि तमाम दलों के बड़े नेताओं की उप-चुनाव को लेकर बेरूखी के चलते इसका प्रभाव मतदान प्रतिशत पर भी देखा गया जो अचानक बुरी तरह से गिर गया। शहरी इलाके के वोटर तो तमाम कोशिशों के बाद भी घरों से नहीं निकले।

समाजवादी पार्टी ने अवश्य उप-चुनाव में पूरी ताकत झोंकी थी, इसी लिये उसे नतीजों को लेकर काफी चिंता है। भाजपा और कांग्रेस को तो पता है कि अगर नतीजे उनके पक्ष में नहीं आये तो उनके पास अपने बचाव के लिये कई दलीलें होंगी, लेकिन सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और उनका कुनबा मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा। सपा ने अपने सभी पत्ते खोल दिये तो भाजपा की तरह से कुछ राजनैतिक प्रयोग भी किये। अबकी बार समाजवादी पार्टी ने तुष्टिकरण की राजनीति को ज्यादा हवा नहीं दी। प्रत्याशियों के चयन से लेकर प्रचार अभियान तक में इस बात का अहसास साफ दिखाई दिया।

आजम खां जैसे नेताओं से थोड़ी दूरी बनाकर ही प्रचार अभियान चलाया गया। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने कट्टर हिन्दुत्व को लेकर बड़ा प्रयोग किया। भाजपा ने पूरा चुनाव कट्टर हिन्दुत्व के सहारे लड़ा जिसके नायक थे योगी आदित्यनाथ और अन्य कुछ साधू-संत। यह प्रयोग सफल रहा तो योगी आदित्यनाथ जो अब महंत बन गये हैं, का कद पार्टी के भीतर अपने आप बढ़ जायेगा और नतीजे उत्साहवर्धक नहीं रहे तो भाजपा नई राह तलाशेगी।

 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं और यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं। अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं।



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