सुशोभित-
जातीय श्रेष्ठता का दम्भ सवर्ण समाज के अवचेतन में इतने गहरे पैठा है कि अकसर ऊपर से इसकी थाह नहीं मिलती। किसी और की बात क्या करूँ, मैं अपना ही उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ। वर्षों पुरानी बात है। मेरे एक मित्र ने नौकरी के एक अवसर की ओर मेरा ध्यान दिलाया। वो ब्राह्मण थे। उन्होंने कहा, तुम इसके लिए कोशिश कर सकते हो। मैंने उसके ब्योरे पढ़कर कहा, किन्तु यह तो पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित पदों के लिए है। मित्र ने कहा, तभी तो तुमसे कहा, क्योंकि तुम ‘ओबीसी’ हो! मैं तिलमिला गया। मैंने उसे दुरुस्त करते हुए बताया कि मैं सवर्ण हूँ। उसे सगर्व अपनी जाति बतलाई। आगे यह भी जोड़ दिया कि तुम्हारे मन में यह कल्पना आई भी कैसे कि मैं पिछड़ा वर्ग से हूँ? मानो वैसा कहकर उसने मेरा तिरस्कार कर दिया हो!
इस बात को अब पन्द्रह वर्ष होने को आए। तब से अब तक मेरी बुद्धि में बहुत परिवर्तन हुआ। किन्तु मैं तब तक भी विश्व भर का साहित्य पढ़ चुका था और अनीश्वरवादी तो इससे भी कई वर्ष पूर्व से था। उस रात मैंने आत्मचिंतन किया कि ‘पिछड़ा’ सुनते ही मैं क्यों तिलमिला उठा था? वैसी कौन-सी जातिगत श्रेष्ठता-ग्रंथि मेरे भीतर थी, जो ज़रा-सा कुरेदते ही उभर आई थी? क्या कारण था कि मेरी तमाम कॉस्मोपोलिटन शिक्षा-दीक्षा उस क्षण में तिरोहित हो गई थी? और अगर मेरे जैसा शिक्षित युवक भी वैसी प्रतिक्रिया कर सकता था तो फिर सामान्यजन की क्या कहें?
तब जाकर मुझे ठीक-ठीक तरह से अहसास हुआ कि यह जातीय श्रेष्ठता की विषबेल भारतीय-समाज में कितनी गहराई तक रोपी गई है। यह एक-दो दिन में नहीं हुआ। बचपन के उन असंख्य दिनों ने इसमें योगदान दिया है, जब हमसे सफ़ाईकर्मी (मेहतरानी) को रोटी देकर आने को कहा जाता था, किन्तु सख़्त हिदायत दी जाती थी कि रोटी ऊपर से ही उसकी झोली में फेंकनी है, उसे छूना नहीं है। और छू लिया तो फिर स्नान!
हमारे ही समाज के, हम जैसे ही कुछ लोग गंदे हैं, अछूत हैं, यह विचार सवर्णों के मन में सदियों से डाला गया है। अब यह गहरी जड़ें जमा चुका है। यह अकारण नहीं है कि मध्यप्रदेश में एक आईएएस अधिकारी जब यह बात कहते हैं कि आरक्षण की व्यवस्था तब तक जारी रखनी चाहिए, जब तक कि मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान नहीं देता तो बवंडर उठ खड़ा होता है। वे अगड़ों-पिछड़ों के बीच विवाह-सम्बंध को सामान्य बनाने की ही तो बात कह रहे थे, इस पर सवर्णों का इतना रोष क्यों फूट पड़ा था कि उनके पुतले जलाए गए और उनके चित्र पर चप्पलों की माला पहनाई गई? उन पर सरकारी कार्रवाई तक की गई। वे विवाह में होने वाली ‘कन्यादान’ की रीति की ओर ही तो संकेत कर रहे थे, अपने पुत्रों के व्यभिचार के लिए ब्राह्मण-बेटियों की माँग थोड़े ना कर रहे थे। किन्तु सवर्ण समाज के लिए तो पिछड़ी जाति से विवाह-सम्बंध की बात सोचना ही पाप की श्रेणी में आता है।
यही कारण है कि हाल ही में आई फिल्म ‘होमबाउंड’ में एक दलित-युवक यह कहता है कि अगर मैंने अपनी जातिगत पहचान उजागर कर दी तो पुलिस की नौकरी मिलने के बाद भी थाने में मुझसे झाडू ही लगवाई जाएगी!
महात्मा गांधी को भारतीय समाज की इस ग्रंथि की समझ थी, इसीलिए उन्होंने कहा था कि “मैं चाहता हूँ सभी हिन्दू स्वेच्छापूर्ण अपने को शूद्र घोषित कर दें।” उनकी यह बात सही है। क्योंकि ‘अदर बैकवर्ड कास्ट’ के विचार में भी ‘अन्यीकरण’ का भाव है, अपने से पृथक किसी दूसरे का भाव है। किन्तु अगर सभी हिन्दू शूद्र हों तो फिर कौन ऊँचा और कौन नीचा रहेगा? समाज-व्यवस्था में उच्चावच-क्रम तो निश्चित ही पूर्णतया त्याज्य है। ‘हरिजन’ के विचार में भी दूसरे कोण से यही प्रतीकात्मकता थी। गांधी जी स्वयं को भी ‘हरिजन’ कहने लगे थे। वे वाल्मीकि बस्तियों में रहते थे। पाखाना साफ़ करते थे। यह राजनैतिक लाभ के लिए किसी दलित के घर भोजन करते हुए फ़ोटो खिंचवाने के वर्तमान में प्रचलित-स्वांगों से भिन्न था। कालान्तर में उन्होंने सेवाग्राम आश्रम में अंतर्जातीय विवाहों को भी बढ़ावा दिया था।
वर्गभेद, नस्लभेद, रंगभेद तो दुनिया के लगभग सभी समाजों में है, किन्तु जाति के आधार पर ऊँच-नीच, छुआछूत की यह भावना भारतीय समाज की विशिष्ट है। अपने ही देशवासियों, सहधर्मियों के प्रति तिरस्कार की इस भावना ने सदियों से हिन्दू समाज को एक होने से रोका है। अगर ये एक होने का प्रयास करते भी हैं तो साम्प्रदायिक कारणों से। यह कि हमें मुसलमानों से युद्ध करना है, इसलिए सभी हिन्दू एक हों। कि बँटेंगे तो कटेंगे। किन्तु यह तो एकता का कोई वैध, स्वाभाविक कारण नहीं हुआ।
जो समाज विधर्मियों के प्रति घृणा के आधार पर एक होने का दिखावा करेगा, वह विजातीयों के प्रति अपनी नफ़रत को कब तक छुपा सकेगा?
होना तो यह था कि समय के साथ भारत से जातिगत-विभेद की बुराई शनै:-शनै: स्वयं ही समाप्त हो जाती, किन्तु यह तो उलटे लगातार बढ़ी है। ध्रुवीकरण समाज के हर वर्ग तक पहुँच चुका है। ऐतिहासिक रूप से प्रश्नांकित रही भारतीय-एकता फिर-फिर सवालों के दायरे में आ जाती है। सदियों से असंख्य जातियों-उपजातियों में विभक्त समाज अगर क्रिकेट मैच में जीत का जश्न एक होकर मना लेता है तो इससे वह एक नहीं हो जाता। एकता सामाजिक-व्यतिक्रम में भी दिखे तो ही वह ठोस धरातल पर आती है।
वैसे एक प्रश्न पूछा जाना चाहिए। 80 प्रतिशत हिन्दुओं के आधार पर अगर भारत को हिन्दू-राष्ट्र बनाने की माँग की जाती है तो हिन्दुओं में जिन दलितों-शूद्रों-आदिवासियों की आबादी 80 प्रतिशत से अधिक है, उपरोक्त तर्क के आधार पर क्या उनकी भूमिका उस हिन्दू-राष्ट्र में नेतृत्व और वर्चस्व की स्थिति की नहीं रहनी चाहिए?
सुशोभित वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित लेखक हैं।



