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उत्तर प्रदेश

एक ‘छुपा रूस्तम’ दल बसपा

संजय सक्सेना, लखनऊ

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) को उत्तर प्रदेश की सियासत का ‘छुपा रूस्तम’ कहा जाता है। चुनावी मौसम में अन्य दलांे की अपेक्षा बीएसपी के बारे में यह आंकलन करना मुश्किल होता है कि वह क्या गुल खिलायेगी। शहरी एंव गॉव-देहात के दबे-कुचलों की पार्टी समझी जाने वाली बीएसपी के समर्थकों की पहचान यही है कि वह तो न मीडिया के सामने अपना मुंह खोलते हैं न आम चर्चा में अपने दिल की बात जुबा पर लाते हैं। इसका कारण सदियों पुरानी मनुवादी शक्तियां को लेकर उनका भय और समाज में व्याप्त पिछड़ापन जैसे तमाम कारण गिनाये जा सकते है। लगभग 20 प्रतिशत दलित समाज को सियासत की मुख्यधारा में लाने के लिये बसपा ने भले ही काफी काम किया हो, लेकिन इस समाज का सामाजिक उद्धार करने की रूचि मान्यवर कांशीराम के बाद बसपा ने भी नहीं दिखाई।

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संजय सक्सेना, लखनऊ

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बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) को उत्तर प्रदेश की सियासत का ‘छुपा रूस्तम’ कहा जाता है। चुनावी मौसम में अन्य दलांे की अपेक्षा बीएसपी के बारे में यह आंकलन करना मुश्किल होता है कि वह क्या गुल खिलायेगी। शहरी एंव गॉव-देहात के दबे-कुचलों की पार्टी समझी जाने वाली बीएसपी के समर्थकों की पहचान यही है कि वह तो न मीडिया के सामने अपना मुंह खोलते हैं न आम चर्चा में अपने दिल की बात जुबा पर लाते हैं। इसका कारण सदियों पुरानी मनुवादी शक्तियां को लेकर उनका भय और समाज में व्याप्त पिछड़ापन जैसे तमाम कारण गिनाये जा सकते है। लगभग 20 प्रतिशत दलित समाज को सियासत की मुख्यधारा में लाने के लिये बसपा ने भले ही काफी काम किया हो, लेकिन इस समाज का सामाजिक उद्धार करने की रूचि मान्यवर कांशीराम के बाद बसपा ने भी नहीं दिखाई।

कांशीराम की मौत के बाद हार्डकोर दलित वर्ग की यह पार्टी सत्ता हासिल करने के चक्कर में सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूंले पर चल पड़ी थी, जिस दल में कभी सबसे अधिक टिकट दलित नेताओं को मिलते थे, उन्हें अब ओबीसी और मुस्लिमों ही नहीं सवर्ण जाति के उम्मीदवारों से भी कम सीटों पर संतोष करना पड़ता है। दरअसल, पिछले 20-25 वर्षो से दलित वोटर तो मजबूती के साथ माया के पक्ष में लामबंद होता रहा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। बसपा सुप्रीमों को इस बात अच्छी तरह से अहसास था कि इन 20 प्रतिशत दलित वोटरों के सहारे सत्ता की सीढ़िया नहीं चढ़ी जा सकती हैं,इसी लिये कंाशीराम के कमजोर पड़ने के बाद मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग की राह पकड़ ली और इसके बाद दलित बसपा की एक मात्र प्राथमिता नहीं रह गये। जो बसपा कभी ‘तिलक-तराजू और तलवार, इनको मारों जूते चार‘ का नारा देती थी,वह ही कालांतर में ‘हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है का नारा देने से भी नहीं चूकी।   

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बसपा सुप्रीमों द्वारा 2007, 2012 और 2017 के विधान सभा चुनाव में जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर टिकट बांटे गये हैं, उसके आधार पर यह अहसास भली प्रकार हो जाता है कि माया के लिये अब दलित समाज मात्र सत्ता साध्य का सहारा भर ही बचा है। माया ने बीएसपी के भीतर कभी भी किसी दूसरे दलित नेता को आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया। अब तो हालत यह हो गये हैं कि बीएसपी में जो एक-दो दलित चेहरे पहले दिख जाते थे, वह भी बसपा से दूर जा चुके हैं। माया भले ही अपने आप को दलित की बेटी कहती हों, लेकिन पिछले दो चुनावों और होने जा रहे विधान सभा चुनाव में टिकट वितरण पर नजर डाली जाये तो पता चलता है कि दलित बसपा में पिछड़ता जा रहा है। टिकटों के वितरण पर नजर डाली जाये तो 2007 में बसपा ने 139, 2012 में 117 और अबकी बार 113 सवर्णो को टिकट दिया है। सवर्ण समाज में से भी ब्राहमणों को ज्यादा अहमियत दी गई है। 2007 में जहां 86 तो 2012 में 74 और अबकी से 66 ब्राहमण चेहरे माया ने मैदान में उतारे हैं। अपर कास्ट के नेताओं को टिकट देने में ही बसपा ने दरियादिली नहीं दिखाई है अब तो बसपा सुप्रीमों आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण समाज के लोंगो को भी आरक्षण की वकालत करने लगी है। सवर्णो के बाद मायावती का सबसे अधिक भरोसा ओबीसी नेताओं पर नजर आता है।

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2007 में बसपा ने 114, 2012 में 113 और अबकी से 106 ओबीसी नेताओं को टिकट दिया है। माया को सवर्णो,ओबीसी और दलित प्रत्याशियों से भी अधिक मुस्लिम चेहरे आकर्षित करते हैं। इसी वजह से 2007 में मुस्लिमों को 61 सीट देने वाली मायावती ने इस बार 100 मुस्लिम उम्मीदवारों पर दांव लगाया है। प्रदेश में मुस्लिमों की आबादी 20 प्रतिशत के करीब है,लेकिन उन्हें सौ सीटें देना तो यही दर्शाता है। वैसे मुसलमानों को टिकट देना मायावती की मजबूरी भी हैं। अपनी प्रबल प्रतिद्वंदी समाजवादी पार्टी के मुस्लिम प्रेम की तोड़ निकालने के लिये ही माया को कांटे से कांटा निकालना पड़ रहा है। बसपा सुप्रीमों सपा के यादव-मुस्लिम समीकरण की काट के लिये ही दलित-मुस्लिम समीकरण की भूमिका रच रही हैं। इसके फायदा-नुकसान नतीजे आने के बाद ही मालूम होंगे, लेकिन माया ने कोई कोरकसर नहीं बाकी रखी है। हॉ, महिलाओं को टिकट देने के मामले में जरूर बसपा पिछड़ गई है। महिला नेत्री होने के बाद भी बसपा सुप्रीमों मायावती ने मात्र 21 महिलाओं को ही टिकट दिया है।

मायावती जहां दलितों से इतर बिरादरियों पर दांव लगा कर अपने राजनैतिक स्वार्थ साधने में लगी है, वहीं बीजेपी दलितों को अपने पाले में खींचने का भरसक प्रयास कर रही है। 2014 में जिस तरह से दलितों ने मोदी (बीजेपी) का दामन थामा था, वह बसपा के लिये करारा झटका रहा था। दलित वोटरों के मुंह मोड़ने के चलते बसपा का लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खुल सका था। परंतु न जाने किस आधार पर मायावती को अब लगने लगा है कि उनका दलित वोटर उनके पाले में वापस आ गया है।

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दरअसल, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा ने भले ही सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला तैयार कर प्रत्याशी उतारे हों पर उसे अपनों से ही जूझना पड़ रहा है। बसपा के कई कद्दावर नेताओं ने बहनजी का साथ छोड़कर भगवा दामन थाम लिया है। इसके अलावा भी प्रदेश में लगभग 40 से 45 ऐसी सीटें हैं जहां पर पुराने बसपाई ही बसपा के घोषित प्रत्याशी को टक्कर देते नजर आ रहे है। बसपा में दूसरे नंबर के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य अब भाजपा के टिकट पर अपनी पुरानी सीट पडरौना से मैदान में हैं। पडरौना में मौर्य बसपा के प्रत्याशी के लिए बड़ी चुनौती हैं। हालांकि बसपा ने वहां बहुत पहले ही उम्मीदवार उतारकर तैयारी का पूरा मौका दिया है। वहीं बृजेश पाठक लखनऊ मध्य से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। चिल्लूपार से मौजूदा बसपा विधायक राजेश त्रिपाठी भाजपा से उम्मीदवार हैं।

इसी प्रकार मुस्लिम वोटों की चाहत में कौमी एकता दल का बसपा में विलय करने और  बाहुबली अंसारी परिवार के तीन सदस्यों को बसपा का टिकट देने के बाद बसपा के पूर्व में घोषित दो प्रत्याशी निर्दलीय मैदान में उतर गये हैं। वहीं सपा छोड़ बसपा में आए अम्बिका चौधरी और नारद राय भी अपनी सीट से मैदान में हैं जहां से बसपा ने पहले ही प्रत्याशी घोषित कर दिया था। यहा भी पूर्व में घोषित प्रत्याशी परेशानी का सबब बन सकते हैं।  इसके अलावा, दर्जन भर ऐसे विधायक हैं जो दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं और मैदान में हैं। इनमें गाजियाबाद और फतेहपुर के प्रत्याशी भी शामिल हैं। इन सीटों पर पार्टी को नए प्रत्याशी के साथ मैदान में उतरना पड़ा जिन्हें पूरी तैयारी का मौका ही नहीं मिला।

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बहरहाल, बसपा के लिये एक समस्या बीजेपी भी है। पिछले कई चुनावों से बीजेपी उत्तर प्रदेश में मरणासन स्थिति में पड़ी हुई थी। इस वजह से हर पांच वर्ष के बाद बीएसपी और सपा के बीच सत्ता हस्तांतरण होता रहता था, लेकिन लोकसभा चुनाव में यूपी से ऐतिहासिक सफलता हासिल कर केंद्र में पूर्ण बहुत से आई बीजेपी भी अबकी से न पूरी ताकत के साथ डटी हुई है,बल्कि सत्ता की प्रबल दावेदार भी नजर आ रही है। हाल में ही अपना 61वां जन्मदिन मना चुकी माया की चिंता की बड़ी वजह ऐन चुनाव के समय  कई बड़े और 100 से अधिक छोटे नेताओं का बीएसपी छोड़कर जाना भी हैं। इनमें नेता प्रतिपक्ष रहे स्वामी प्रसाद मौर्य, कांशीराम के सहयोगी रहे आरके चौधरी और ब्राह्मण फेस ब्रजेश पाठक जैसे नामों के अलावा लगातार जीत रहे पलिया से विधायक रोमी साहनी, गोरखपुर के चिल्लूपार से राजेश त्रिपाठी और हरदोई के मल्लावां से विधायक रहे बृजेश कुमार भी शामिल हैं। बड़े चेहरों के पार्टी छोड़ने से इमेज को धक्का लगा है। उनका तोड़ निकालना चुनौती है। यह और बात है कि बीएसपी किसी तरह के नुकसान से इंकार कर रही है।

बसपाई कहते घूम रहे हैं कि पार्टी में मायावती ही सबसे बड़ी नेता हैं। बहनजी जिसे आगे कर देती हैं, वही नेता बन जाता है। उधर, राजनीतिक पण्डितों की माने तो ऐन वक्त पर पार्टी छोड़कर जाने से कैडर वोट पर असर पड़ता है। मुख्य वोट गुमराह होता है। इसलिए यह बड़ी चुनौती होती है। काम के वक्त दूसरे लोग होते हैं और चुनाव के समय दूसरे को मौका दे दिया जाता है। इस वजह से पुराने लोग जो जनता के बीच काम करते आ रहे हैं वह अपने व्यवहार की वजह से वोट बैंक को प्रभावित करते हैं।

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लेखक संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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