नोटबंदी के दौरान सभी दलों द्वारा जमा नकदी सार्वजनिक करने की बसपा की मांग खारिज

चुनाव आयोग ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) द्वारा भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी सहित सभी महत्वपूर्ण राजनैतिक दलों द्वारा नोटबंदी की अवधि सहित वर्ष 2016-17 में जमा की गयी नकद धनराशि का विवरण सार्वजनिक करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. ये तथ्य नोटबंदी के बाद बसपा द्वारा दिल्ली के करोल बाग़ स्थित यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के पार्टी अकाउंट में 02 दिसंबर से 09 दिसंबर 2016 के बीच 104 करोड़ रुपये के पुराने नोट जमा कराये जाने के सम्बन्ध में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जाँच के आदेश के संबंध में आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को आयोग द्वारा दिए गए अभिलेखों से सामने आया है. 

आयोग ने बसपा को 02 मार्च 2017 को नोटिस जारी किया था जिसपर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने 03 मार्च के पत्र द्वारा आयोग से निवेदन किया था कि मीडिया की खबरों के अनुसार नोटबंदी के बाद सभी बड़े राजनैतिक दलों ने बसपा से कई गुणा ज्यादा नकद धनराशि बैंकों में जमा कराया है. मात्र बसपा को नोटिस देने को भेदभावकारी बताते हुए उन्होंने कहा था कि पार्टी फण्ड में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व लाने और सभी पार्टियों में समानता के लिए सभी बड़े राजनैतिक दलों से पिछले 12 महीने के नकद जमाराशि का हिसाब माँगा जाये.

आयोग ने इस प्रस्ताव को नज़रंदाज़ कर दिया और बाद में अपने आदेश दिनांक 04 मई 2017 द्वारा बसपा द्वारा व्यवहारिक परेशानी की बात कहे जाने को स्वीकार करते हुए प्रकरण को समाप्त कर दिया. नूतन ने कहा कि यह दुखद है कि आयोग ने एक राजनैतिक दल द्वारा लाये गए ऐसे प्रस्ताव को ठुकरा दिया जो चुनावी शुचिता में सहायक होता.

ECI ignored BSP plea for parties to disclose cash deposit

The Election Commission of India had completely ignored the request made by Bahujan Samaj Party (BSP) to issue formal notices to all major political parties like Bhartiya Janata Party, Congress and Samajwadi Party to disclose the details of their total Cash deposits in their party bank accounts during 2016-17, covering the demonetization period.

This fact has emerged from the Commission response to RTI activist Dr Nutan Thakur, who had sought the Commission’s documents related to the High Court order about enquiring into the Rs. 104 crores cash money deposit by BSP between 02 to 09 December 2016 in the Party’s bank account in Karol Bagh branch, New Delhi.

The Commission had issued notice to BSP on 02 March 2017 to which its National General Secretary Satish Chandra Mishra had responded on 03 March saying that as per Media reports large amount of case has been deposited by all major national and regional parties, which is many times more than the BSP deposit. Calling the move discriminatory, he had said that to ensure transparency and accountability in party funds and for fair treatment all major political parties must be asked to disclose the cash deposited by them during the last 12 months.

The Commission ignored this plea, and later through its order dated 04 May, it accepted the BSP’s explanation of peculiar circumstances and practical difficulties and dropped the matter. Nutan said it was worrisome that the Commission chose to ignore such an important point being raised by a political party itself.

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नोटबंदी के बाद पार्टी एकाउंट में करोड़ों जमा कराने को लेकर चुनाव आयोग ने बसपा को दी भारी राहत

बहुजन समाज पार्टी द्वारा नोटबंदी के बाद दिल्ली के करोल बाग़ स्थित यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के अपने पार्टी अकाउंट में 02 दिसंबर से 09 दिसंबर 2016 के बीच 104 करोड़ रुपये के पुराने नोट जमा कराये जाने के सम्बन्ध में निर्वाचन आयोग ने पार्टी को भारी राहत दी है. इस सम्बन्ध में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में पीआईएल दायर करने वाले प्रताप चंद्रा की अधिवक्ता डॉ नूतन ठाकुर ने बताया कि निर्वाचन आयोग ने 29 अगस्त तथा 19 नवम्बर 2014 द्वारा वित्तीय पारदर्शिता सम्बन्धी कई निर्देश पारित किये थे.

इन निर्देशों में कहा गया है कि कोई भी राजनैतिक दल उन्हें चंदे में प्राप्त नकद धनराशि को प्राप्ति के 10 कार्यकारी दिवस के अन्दर पार्टी के बैंक अकाउंट में अवश्य ही जमा करा देगा और इन निर्देशों का उल्लंघन किये जाने पर पार्टी के खिलाफ निर्वाचन चिन्ह (आरक्षण एवं बटाई) आर्डर 1968 के प्रस्तर 16ए में मान्यता रद्द करने सहित तमाम कार्यवाही की जा सकती है.

प्रताप चंद्रा ने कोर्ट को कहा था कि नोटबंदी का आदेश 08 नवम्बर को आया था पर बसपा ने 2 दिसंबर के बाद 104 करोड़ रुपये जमा कराये, जो सीधे-सीधे इन निर्देशों का उल्लंघन है, जिसपर कोर्ट ने आयोग को तीन माह में कार्यवाही के आदेश दिए थे.

नूतन ने बताया कि आयोग के नोटिस दिनांक 02 मार्च 2017 पर बसपा ने अपने दिनांक 12 मार्च के उत्तर में स्वीकार किया कि उन्होंने नोटबंदी के बाद 104.36 करोड़ कैश जमा कराया पर साथ ही कहा कि पार्टी का एकमात्र अकाउंट दिल्ली में है, अतः पूरे देश से पैसा पहले दिल्ली लाया जाता है और फिर जमा होता है. यह सारा पैसा नेताओं की विभिन्न रैलियों में इकठ्ठा हुआ था. पार्टी ने नोटबंदी के तुरंत बाद बैंक से संपर्क किया लेकिन बैंक ने तत्काल पैसा जमा कराने के असमर्थता दिखाई और बैंक की सुविधानुसार धीरे-धीरे पैसा जमा किया गया.

इस पर आयोग ने अपने आदेश दिनांक 04 मई 2017 द्वारा मामले की असाधारण स्थिति और बसपा द्वारा बताई गई व्यवहारिक परेशानी को संज्ञान लेते हुए प्रकरण को समाप्त करने का निर्णय लिया. साथ ही बसपा को भविष्य में इन निर्देशों का कड़ाई से पालन करने के भी निर्देश दिए.

Election Commission major relief to BSP

The Election commission of India has given major relief to Bahujan Samaj Party as regards the Rs. 104 crores cash money deposited by it in old between 02 December 20 to 09 December 2016 in the Party’s bank account in Karol Bagh branch, New Delhi after the demonetization order.

Dr Nutan Thakur, counsel of Petitioner Pratap Chandra who had Public Interest Litigation in the Lucknow bench of Allahabad High Court told that the Election Commission had issued Guidelines for financial transparency on 29 August and 19 November 2014. These Guidelines say that any political party must deposit its cash collections in its bank account within 10 working days of the fund collection and any violation of these Guidelines would lead to action including cancelling the recognition of the political party under the provisions of Para 16A of the Election Symbols (reservation and Allotment) Orders 1968.

Pratap Chandra had told in the Court that BSP had deposited Rs. 104 crores cash money in old currency after 08 November, which is a clear violation of these Guideline, to which the Court had directed the Commission to take action in 03 months.

Nutan said that Election Commission issued notice to BSP on 02 March 2017 to which

it responded on 12 March, where it accepted depositing Rs. 104.36 crores during the said period. The Party said that it has only one Bank account in Delhi and all the cash is first transferred to Delhi where it is deposited. It said that the money was collected at various rallies held by Party leaders. The Party immediately contacted the Bank to get the cash deposited but the Bank officials showed inability to deposit such huge amount in one go. Hence the money was deposited based on the Bank’s ability to count and deposit it.

Through its order dated 04 May, the Commission has accepted the BSP’s explanation and dropped the matter, citing the peculiar circumstances and practical difficulties explained by BSP as the reason. It has also warned the Party to scrupulously follow the Instructions in future.

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मायावती को दौलत की बेटी बताते हुए वरिष्ठ नेता मुंशीलाल जयंत ने बसपा से इस्तीफा दिया

उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के रहने वाले और बसपा के वरिष्ठ नेताओं में शुमार मुंशीलाल जयंत ने आज बसपा सुप्रीमो पर गंभीर आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। गुजरात और तीन अन्य प्रदेशों के प्रभारी मुंशीलाल जयंत ने बसपा सुप्रीमो पर गुजरात चुनावों में टिकट के बदले रुपये मांगने का आरोप लगाया। यह कोई पहला मामला नहीं जब बसपा नेताओ ने अपने सुप्रीमो पर चुनाव में टिकटों के बदले रुपये मांगने का आरोप लगाया हो।

मायावती पर इस बार आरोप चार राज्यों के प्रभारी मुंशीलाल जयंत ने लगाया है। मुंशी लाल जयंत ने मायावती पर आरोप लगाते हुए कहा कि मायावती अब दौलत की बेटी बन चुकी हैं। मायावती ने गुजरात चुनाव में टिकट के बदले रुपये की मांग की थी जिसकी वजह से मैंने बसपा से इस्तीफा दे दिया है। मायावती सिर्फ रुपये देने वालों की सुनती हैं और उनसे ही मिलती हैं।

मुंशीलाल जयंत हापुड़ के थाना हापुड़ देहात क्षेत्र के सुभाषनगर के रहने वाले हैं और काफी लम्बे समय से बसपा में वरिष्ठ पद पर बने रहे हैं। मुंशीलाल जयंत ने मायावती पर आरोप लगाते हुए कहा है कि जो टिकट के बदले पैसे नहीं देता है मायावती उसको बाहर का रास्ता दिखा देती हैं। मुंशीलाल जयंत ने मायावती को दौलत की बेटी करार दिया।

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हापुड़ से राहुल गौतम की रिपोर्ट. संपर्क : 09548053751

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मीडिया ने बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को चुनावी लड़ाई से बाहर कर दिया!

Ashwini Kumar Srivastava : अद्भुत है मीडिया और उसमें काम कर रहे तथाकथित पत्रकार। वरना बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को ही इस बार के चुनाव में लड़ाई से बाहर कैसे कर देता! वैसे मुझे तो इसका कोई आश्चर्य नहीं है। क्योंकि एक दशक से भी ज्यादा वक्त तक दिल्ली और लखनऊ में देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थानों में बतौर पत्रकार नौकरी करने के बाद मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि ख़बरें और सर्वे कैसे बनाये-बिगाड़े जाते हैं। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण भी मैं अपने ही निजी अनुभव से आगे बताऊंगा। लेकिन सबसे पहले बात बसपा और मायावती की करते हैं।

मेरा ही नहीं, प्रदेश के तमाम ऐसे लोगों का मानना है कि इस बार चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष है और बसपा की सरकार आने की सम्भावना भी उतनी ही प्रबल है, जितनी मीडिया बाकियों की बता रहा है। मैंने खुद लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों में ढेरों लोगों से राजनीतिक चर्चा में इस बात को महसूस किया है। मीडिया तो अपने सर्वे और ख़बरों के जरिये ऐसी हवा बना रहा है, मानों लड़ाई सिर्फ सपा-कांग्रेस गठबंधन और भाजपा के बीच है। मायावती को तो मीडिया चर्चा के ही काबिल नहीं समझ रहा।
सचमुच बेहद शर्मनाक ही कही जायेगी ऐसी पत्रकारिता, जिसमें किसी पत्रकार या संपादक की निजी राय ही खबर या सर्वे बनाकर जनता को पेश किया जाता हो। पत्रकार और मीडिया का काम बिना किसी भेदभाव और लागलपेट के कड़ी से कड़ी आलोचना करना है और उतने ही मुक्त भाव से प्रशंसा भी करना है। सरकार बनाने के लिए पत्रकारों और संपादकों को भी हर भारतीय की तरह वोट की ताकत मिली ही है।

अगर मायावती या बसपा नहीं पसंद तो अपना वोट मत दीजिये उन्हें लेकिन यह क्या तरीका है कि आप अपने जमीर-पेशे को बेचकर फर्जी ख़बरों, फर्जी सर्वे और लेखों के जरिये अपनी राय ही जबरन थोप कर बाकी के वोटरों का भी मन बदलने का कुत्सित और घृणित प्रयास कर रहे हैं?

मैंने मीडिया में अपनी पूरी नौकरी के दौरान इस बात का हमेशा ख्याल रखा कि खबर और सर्वे गढ़ना मेरा काम नहीं है। मैं सिर्फ डाकिया हूँ, जो समाज और देश में घट रहे पल पल के घटनाक्रम को मीडिया के जरिये देश और दुनिया तक पहुंचाने की ड्यूटी कर रहा है। मेरी निजी राय कुछ भी रही हो और मैं किसी भी पार्टी या नेता को वोट देता रहा हूँ लेकिन मैंने अपना वह पक्षपात कभी मीडिया की नौकरी में नहीं घुसेड़ा।

अब मैं वह अनुभव बताता हूँ, जिसके बाद मीडिया आखिर है क्या, मुझे इस सच्चाई का अंदाजा बखूबी हो गया था। मैंने अपना पत्रकारीय करियर टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह में ट्रेनी पत्रकार के तौर पर 2002 में शुरू किया था। उस वक्त मीडिया में हर कहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी के ही मुरीद बैठे थे। फिर आया 2004 में चुनाव का वक्त और प्रमोद महाजन का इंडिया शाइनिंग लेकर मीडिया ने चापलूसी और पक्षपात के रोज नए अध्याय लिखने शुरू कर दिए।

उसी वक्त वाजपेयी जी लाहौर यात्रा पर गए तो साथ ही में हमारे संपादक भी (नाम नहीं लिखूंगा) लाहौर गए।

तब तक महज दो साल में मैं अपने अखबार में अपनी जगह अपने काम से बना चुका था और अखबार का पहला पन्ना तथा उसकी मुख्य खबर यानी लीड, फ्लायर, एंकर, टॉप बॉटम आदि ज्यादातर मुझसे ही एडिट करवाई या एजेंसी आदि की मदद से लिखवाई जाती थी। मैं खुद भी बराबर बिज़नेस आदि रिपोर्टिंग करके पेज वन पर एंकर या किसी न किसी रूप में बाइलाइन लेता रहता था।

बहरहाल, संपादक जी ने टाइम्स समूह के निर्देश पर लाहौर से ही एक स्टोरी की, जिसके लिए मुझे कार्यवाहक संपादक ने अपने केबिन में बुलाया। उन्होंने कहा कि अश्विनी यह स्टोरी बहुत ख़ास है और मालिक लोगों के निर्देश पर की गयी है। इसमें कुछ कटेगा या जुड़ेगा नहीं, इसे सिर्फ आप पढ़ लीजिये। पेज वन पर आज कोई और खबर जाए न जाए लेकिन यह जरूर जाएगा।

खैर, मैंने उसे पढ़ा और हतप्रभ रह गया। उसमें अटल जी की प्रशंसा के अलावा कुछ नहीं था। और, उसमें कई जगह यह लिखा गया था कि अटल जी का कद और लोकप्रियता अब दुनिया में इस कदर बढ़ चुकी है कि भारत में आने वाले लोकसभा चुनाव क्या, अटल जी अगर पाकिस्तान में भी किसी सीट से खड़े हो जाएंगे तो जीत जाएंगे। यह कोई मजाक नहीं था बल्कि बहुत गंभीरता से बाकायदा हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी नेताओं-जनता के कोट के साथ लिखा गया था।

अटल जी को गांधी जैसा विश्वव्यापी व्यक्तित्व बनाने के चक्कर में वह लेख पेज वन पर तो आधे से ज्यादा जगह पर काबिज हो गया बल्कि अंदर भी एक पेज पर उसके शेष भाग ने जगह घेर ली। मैं तो उस वक्त पद और अनुभव में किसी हैसियत में ही नहीं था कि उस लेख पर कोई टीका टिप्पणी भी कर पाता। इसी वजह से मैंने नौकरी धर्म का पालन करते हुए अटल जी की ही महानता पर आधारित एक शीर्षक लगाकर उसको अपने बॉस के पास भेज दिया।

अगले दिन जब लेख छपा तो हमारे ही अखबार के एक वरिष्ठ पत्रकार, जो अब कांग्रेस के बड़े नेता हैं और उन दिनों 10 जनपथ कवर करते थे, उन्होंने आकर बता दिया कि मैडम यानी सोनिया जी इस लेख से बहुत नाराज हैं। लेकिन अटल प्रेम में अंधे हो चुके टाइम्स समूह के मालिकों और पत्रकारों ने उनकी बात पर कान नहीं धरा।

उसके बाद चुनाव में जब नतीजे आने लगे और भाजपा का इंडिया शाइनिंग धूल फांकने लगा…. विश्वव्यापी नेता अटल विहारी वाजपेयी भारत में ही सर्वमान्य नेता नहीं रह गए तो अचानक टाइम्स समूह में हड़कंप मच गया। फिर जैसा कि मुझे वहां रहकर सुनने को मिला कि वही पत्रकार महोदय, जो सोनिया की नाराजगी की खबर लाये थे, उनकी लल्लो चप्पो होने लगी कि किसी तरह मैडम से क्षमा हासिल हो जाए। क्षमा कैसे मिली और कब मिली, ये तो मुझे नहीं पता चला लेकिन नतीजों के आने वाली रात ही उन्हीं सम्पादक ने उतना ही बड़ा-लंबा चौड़ा लेख लिखा, जिसमें राहुल को भारत ही नहीं, दुनिया को राह दिखाने वाला युवा नेता बताया गया। और मुझे ही बुलाकर उसे जब सौंपा गया, तो उस लेख में मैंने भी पूरे श्रद्धा भाव से शीर्षक लगाया ‘राह दिखाएँ राहुल’…

अब यह बात मत पूछियेगा कि राहुल जब 2004 में ही राह दिखा रहे थे तो आज खुद किसी मंजिल तक क्यों नहीं पहुँच पाये। आप तो बस यह देखिये कि मीडिया की खबर, लेख और सर्वे कैसे तैयार होते हैं।

जल्द ही मैं आपको अपनी अगली किसी पोस्ट में अपना एक ऐसा अनुभव भी बताऊंगा, जिससे पता चल जाएगा कि हर पार्टी या नेता के खिलाफ बिना किसी भेदभाव या लागलपेट के आलोचना या प्रशंसा करना कभी कभी कितना खतरनाक होता है।

आज जिन मायावती के समर्थन में मैंने मीडिया पर सवाल खड़े किये हैं, यही मायावती जी ने एक दिन मेरी वजह से हिंदुस्तान टाइम्स समूह के ऊपर 250 करोड़ की मानहानि का न सिर्फ मुकदमा ठोंक दिया था बल्कि मेरे समेत चार पत्रकारों को तुरंत बर्खास्त करने की मांग पर भी अड़ गयीं थीं। यह पूरा किस्सा भी मैं विस्तार से जल्द ही लिखूंगा।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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एक ‘छुपा रूस्तम’ दल बसपा

संजय सक्सेना, लखनऊ

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) को उत्तर प्रदेश की सियासत का ‘छुपा रूस्तम’ कहा जाता है। चुनावी मौसम में अन्य दलांे की अपेक्षा बीएसपी के बारे में यह आंकलन करना मुश्किल होता है कि वह क्या गुल खिलायेगी। शहरी एंव गॉव-देहात के दबे-कुचलों की पार्टी समझी जाने वाली बीएसपी के समर्थकों की पहचान यही है कि वह तो न मीडिया के सामने अपना मुंह खोलते हैं न आम चर्चा में अपने दिल की बात जुबा पर लाते हैं। इसका कारण सदियों पुरानी मनुवादी शक्तियां को लेकर उनका भय और समाज में व्याप्त पिछड़ापन जैसे तमाम कारण गिनाये जा सकते है। लगभग 20 प्रतिशत दलित समाज को सियासत की मुख्यधारा में लाने के लिये बसपा ने भले ही काफी काम किया हो, लेकिन इस समाज का सामाजिक उद्धार करने की रूचि मान्यवर कांशीराम के बाद बसपा ने भी नहीं दिखाई।

कांशीराम की मौत के बाद हार्डकोर दलित वर्ग की यह पार्टी सत्ता हासिल करने के चक्कर में सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूंले पर चल पड़ी थी, जिस दल में कभी सबसे अधिक टिकट दलित नेताओं को मिलते थे, उन्हें अब ओबीसी और मुस्लिमों ही नहीं सवर्ण जाति के उम्मीदवारों से भी कम सीटों पर संतोष करना पड़ता है। दरअसल, पिछले 20-25 वर्षो से दलित वोटर तो मजबूती के साथ माया के पक्ष में लामबंद होता रहा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। बसपा सुप्रीमों को इस बात अच्छी तरह से अहसास था कि इन 20 प्रतिशत दलित वोटरों के सहारे सत्ता की सीढ़िया नहीं चढ़ी जा सकती हैं,इसी लिये कंाशीराम के कमजोर पड़ने के बाद मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग की राह पकड़ ली और इसके बाद दलित बसपा की एक मात्र प्राथमिता नहीं रह गये। जो बसपा कभी ‘तिलक-तराजू और तलवार, इनको मारों जूते चार‘ का नारा देती थी,वह ही कालांतर में ‘हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है का नारा देने से भी नहीं चूकी।   

बसपा सुप्रीमों द्वारा 2007, 2012 और 2017 के विधान सभा चुनाव में जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर टिकट बांटे गये हैं, उसके आधार पर यह अहसास भली प्रकार हो जाता है कि माया के लिये अब दलित समाज मात्र सत्ता साध्य का सहारा भर ही बचा है। माया ने बीएसपी के भीतर कभी भी किसी दूसरे दलित नेता को आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया। अब तो हालत यह हो गये हैं कि बीएसपी में जो एक-दो दलित चेहरे पहले दिख जाते थे, वह भी बसपा से दूर जा चुके हैं। माया भले ही अपने आप को दलित की बेटी कहती हों, लेकिन पिछले दो चुनावों और होने जा रहे विधान सभा चुनाव में टिकट वितरण पर नजर डाली जाये तो पता चलता है कि दलित बसपा में पिछड़ता जा रहा है। टिकटों के वितरण पर नजर डाली जाये तो 2007 में बसपा ने 139, 2012 में 117 और अबकी बार 113 सवर्णो को टिकट दिया है। सवर्ण समाज में से भी ब्राहमणों को ज्यादा अहमियत दी गई है। 2007 में जहां 86 तो 2012 में 74 और अबकी से 66 ब्राहमण चेहरे माया ने मैदान में उतारे हैं। अपर कास्ट के नेताओं को टिकट देने में ही बसपा ने दरियादिली नहीं दिखाई है अब तो बसपा सुप्रीमों आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण समाज के लोंगो को भी आरक्षण की वकालत करने लगी है। सवर्णो के बाद मायावती का सबसे अधिक भरोसा ओबीसी नेताओं पर नजर आता है।

2007 में बसपा ने 114, 2012 में 113 और अबकी से 106 ओबीसी नेताओं को टिकट दिया है। माया को सवर्णो,ओबीसी और दलित प्रत्याशियों से भी अधिक मुस्लिम चेहरे आकर्षित करते हैं। इसी वजह से 2007 में मुस्लिमों को 61 सीट देने वाली मायावती ने इस बार 100 मुस्लिम उम्मीदवारों पर दांव लगाया है। प्रदेश में मुस्लिमों की आबादी 20 प्रतिशत के करीब है,लेकिन उन्हें सौ सीटें देना तो यही दर्शाता है। वैसे मुसलमानों को टिकट देना मायावती की मजबूरी भी हैं। अपनी प्रबल प्रतिद्वंदी समाजवादी पार्टी के मुस्लिम प्रेम की तोड़ निकालने के लिये ही माया को कांटे से कांटा निकालना पड़ रहा है। बसपा सुप्रीमों सपा के यादव-मुस्लिम समीकरण की काट के लिये ही दलित-मुस्लिम समीकरण की भूमिका रच रही हैं। इसके फायदा-नुकसान नतीजे आने के बाद ही मालूम होंगे, लेकिन माया ने कोई कोरकसर नहीं बाकी रखी है। हॉ, महिलाओं को टिकट देने के मामले में जरूर बसपा पिछड़ गई है। महिला नेत्री होने के बाद भी बसपा सुप्रीमों मायावती ने मात्र 21 महिलाओं को ही टिकट दिया है।

मायावती जहां दलितों से इतर बिरादरियों पर दांव लगा कर अपने राजनैतिक स्वार्थ साधने में लगी है, वहीं बीजेपी दलितों को अपने पाले में खींचने का भरसक प्रयास कर रही है। 2014 में जिस तरह से दलितों ने मोदी (बीजेपी) का दामन थामा था, वह बसपा के लिये करारा झटका रहा था। दलित वोटरों के मुंह मोड़ने के चलते बसपा का लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खुल सका था। परंतु न जाने किस आधार पर मायावती को अब लगने लगा है कि उनका दलित वोटर उनके पाले में वापस आ गया है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा ने भले ही सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला तैयार कर प्रत्याशी उतारे हों पर उसे अपनों से ही जूझना पड़ रहा है। बसपा के कई कद्दावर नेताओं ने बहनजी का साथ छोड़कर भगवा दामन थाम लिया है। इसके अलावा भी प्रदेश में लगभग 40 से 45 ऐसी सीटें हैं जहां पर पुराने बसपाई ही बसपा के घोषित प्रत्याशी को टक्कर देते नजर आ रहे है। बसपा में दूसरे नंबर के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य अब भाजपा के टिकट पर अपनी पुरानी सीट पडरौना से मैदान में हैं। पडरौना में मौर्य बसपा के प्रत्याशी के लिए बड़ी चुनौती हैं। हालांकि बसपा ने वहां बहुत पहले ही उम्मीदवार उतारकर तैयारी का पूरा मौका दिया है। वहीं बृजेश पाठक लखनऊ मध्य से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। चिल्लूपार से मौजूदा बसपा विधायक राजेश त्रिपाठी भाजपा से उम्मीदवार हैं।

इसी प्रकार मुस्लिम वोटों की चाहत में कौमी एकता दल का बसपा में विलय करने और  बाहुबली अंसारी परिवार के तीन सदस्यों को बसपा का टिकट देने के बाद बसपा के पूर्व में घोषित दो प्रत्याशी निर्दलीय मैदान में उतर गये हैं। वहीं सपा छोड़ बसपा में आए अम्बिका चौधरी और नारद राय भी अपनी सीट से मैदान में हैं जहां से बसपा ने पहले ही प्रत्याशी घोषित कर दिया था। यहा भी पूर्व में घोषित प्रत्याशी परेशानी का सबब बन सकते हैं।  इसके अलावा, दर्जन भर ऐसे विधायक हैं जो दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं और मैदान में हैं। इनमें गाजियाबाद और फतेहपुर के प्रत्याशी भी शामिल हैं। इन सीटों पर पार्टी को नए प्रत्याशी के साथ मैदान में उतरना पड़ा जिन्हें पूरी तैयारी का मौका ही नहीं मिला।

बहरहाल, बसपा के लिये एक समस्या बीजेपी भी है। पिछले कई चुनावों से बीजेपी उत्तर प्रदेश में मरणासन स्थिति में पड़ी हुई थी। इस वजह से हर पांच वर्ष के बाद बीएसपी और सपा के बीच सत्ता हस्तांतरण होता रहता था, लेकिन लोकसभा चुनाव में यूपी से ऐतिहासिक सफलता हासिल कर केंद्र में पूर्ण बहुत से आई बीजेपी भी अबकी से न पूरी ताकत के साथ डटी हुई है,बल्कि सत्ता की प्रबल दावेदार भी नजर आ रही है। हाल में ही अपना 61वां जन्मदिन मना चुकी माया की चिंता की बड़ी वजह ऐन चुनाव के समय  कई बड़े और 100 से अधिक छोटे नेताओं का बीएसपी छोड़कर जाना भी हैं। इनमें नेता प्रतिपक्ष रहे स्वामी प्रसाद मौर्य, कांशीराम के सहयोगी रहे आरके चौधरी और ब्राह्मण फेस ब्रजेश पाठक जैसे नामों के अलावा लगातार जीत रहे पलिया से विधायक रोमी साहनी, गोरखपुर के चिल्लूपार से राजेश त्रिपाठी और हरदोई के मल्लावां से विधायक रहे बृजेश कुमार भी शामिल हैं। बड़े चेहरों के पार्टी छोड़ने से इमेज को धक्का लगा है। उनका तोड़ निकालना चुनौती है। यह और बात है कि बीएसपी किसी तरह के नुकसान से इंकार कर रही है।

बसपाई कहते घूम रहे हैं कि पार्टी में मायावती ही सबसे बड़ी नेता हैं। बहनजी जिसे आगे कर देती हैं, वही नेता बन जाता है। उधर, राजनीतिक पण्डितों की माने तो ऐन वक्त पर पार्टी छोड़कर जाने से कैडर वोट पर असर पड़ता है। मुख्य वोट गुमराह होता है। इसलिए यह बड़ी चुनौती होती है। काम के वक्त दूसरे लोग होते हैं और चुनाव के समय दूसरे को मौका दे दिया जाता है। इस वजह से पुराने लोग जो जनता के बीच काम करते आ रहे हैं वह अपने व्यवहार की वजह से वोट बैंक को प्रभावित करते हैं।

लेखक संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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आरके चौधरी ने बसपा को गुडबॉय कहा, माया को लगा फिर बड़ा झटका

लखनऊ से ब्रेकिंग न्यूज ये आ रही है कि BSP प्रमुख मायावती को लगा एक और झटका. BSP के संस्थापक सदस्य और राष्ट्रीय महासचिव आरके चौधरी ने दिया इस्तीफा. BSP के संस्थापक कांशीराम के बेहद क़रीबी थे आरके चौधरी. माया सरकार में कई बार कैबिनेट मंत्री रहे हैं आरके चौधरी. हाल में ही बसपा छोड़ने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य एक मीटिंग करने वाले हैं. इस मीटिंग से ठीक पहले BSP को आरके चौधरी के इस्तीफे के रूप में एक और झटका लग गया है.

अब तक यूपी में बसपा को सबसे ज्यादा सीटें लाने वाली पार्टी माना जा रहा था. ऐसा सर्वे बता रहे थे. लेकिन लगातार बड़े विकेट गिरने से बसपा में कोहराम मचा हुआ है. हालांकि ये भी सच है कि जो बसपा से अलग हुआ, उसका करियर तबाह हो गया. लेकिन अबकी माना जा रहा है कि बसपा अब तक के सबसे बड़े मुश्किल दौर से गुजर रही है. मायावती के बेहद खास रहे बड़े नेताओं के लगातार इस्तीफे से यह तो तय है कि बसपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. कोई बहुत बड़ी दिक्कत है जिसे मायावती अगर ठीक नहीं कर पाईं तो वह पार्टी में अकेले बची रह जाएंगी. मायावती को अपने वर्क कल्चर और वर्किंग स्टाइल को जल्द बदलना होगा और एक डेमोक्रेटिक रवैया अख्तियार करना पड़ेगा.

बहुजन समाज पार्टी के महासचिव आरके चौधरी की गिनती बीएसपी के दिग्गज और राष्ट्रीय नेताओं में की जाती है. आरके चौधरी के इस्तीफे के पीछे की वजह क्या है, इसका खुलासा वह स्वयं प्रेस कांफ्रेंस करके कर रहे हैं. बीएसपी महासचिव आरके चौधरी का इस्तीफे चुनाव से पहले बीएसपी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. आरके चौधरी 2007-12 तक बीएसपी सरकार में मंत्री थे. चौधरी की पहचान पार्टी में बड़े दलित नेता के रूप में रही है. पार्टी महासचिव व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफे की वजह से पहले ही बसपा में हड़कंप मचा है. अभी स्वामी प्रसाद मौर्य का मामला ठंडा भी नहीं हुआ है कि आरके चौधरी ने इस्तीफा देकर बसपा सुप्रीमो मायावती की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.

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स्वामी प्रसाद मौर्य का भाजपा में शामिल होना तय (देखें वीडियो)

ऐसा कहना है केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री राम शंकर कठेरिया का. बहुजन समाज पार्टी से नाता तोड़ने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य के बारे में कठेरिया ने कहा कि स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा में शामिल होंगे और बहुत जल्द शामिल होंगे. ताजनगरी आगरा में सेवला स्थित खत्ताघर का लोकापर्ण करने के बाद रामशंकर कठेरिया पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे.

केंद्रीय मंत्री राम शंकर कठेरिया ने सपा और बसपा पर निशाना साधते हुए कहा कि सपा में भगदड़ मची हुई है और अंतर्कलह से अपने आप खत्म हो जाएगी. वहीं बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती पर रुपये लेकर टिकट देने का आरोप लगाते हुए कहा कि बहुजन समाज पार्टी में जो जाएगा उसे टिकट के लिए एक से पांच करोड़ रुपया देना पड़ेगा, इसलिए सब परेशान हैं और बसपा टूट जायेगी. उन्होंने कहा कि 2017 में यूपी में भाजपा की सरकार बनेगी.

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https://youtu.be/ebu8eU8Ssnc

आगरा से syed shakeel की रिपोर्ट.

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बसपा ने तय किया मिशन-2017 एजेंडा

अजय कुमार, लखनऊ

बसपा सुप्रीमों मायावती ने मिशन 2017 के आगाज के साथ ही सियासी एजेंडा भी तय कर दिया हैै। दलितों को लुभाने के लिये बसपा बड़ा दांव चलेगी तो मुसलमानों को मोदी-मुलायम गठजोड़ से बच के रहने को कहा जायेगा।  प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था, किसानों की दुर्दशा, बुंदेलखंड की बदहाली को अखिलेश सरकार के विरूद्ध हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जायेगा। एकला चलो की राह पर  बीएसपी केन्द्र की सत्ता पर काबिज बीजेपी को नंबर वन का दुश्मन मानकर चलेगी तो प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को नंबर दो पर रखा गया है। नंबर तीन पर कांग्रेस सहित अन्य वह छोटे-छोटे दल रहेंगे जिनका किसी विशेष क्षेत्र में दबदबा है। बसपा हर ऐसे मुद्दे को हवा देगी जिससे केन्द्र और प्रदेश सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा सके।  विधान सभा के बजट सत्र और इससे पूर्व के सत्रों मे बसपा नेताओं ने जिस तरह के तीखे तेवर दिखाये उससे यह बात समझने में किसी को संदेह नहीं बसपा सड़क से लेकर विधान सभा तक में अपने लिये राजनैतिक बढ़त तलाश रही है। 

बसपा में छोटे-बड़े सभी नेता मिशन 2017 को पूरा करने के लिये जिस तरह से तेजी दिखा रहे हैं उससे भाजपा-सपा भी बेचैन दिख रहे हैं।  2012 के विधान सभा चुनाव में पराजय और 2014 के लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खोल पाने वाली बहुजन समाज पार्टी की नेत्री मायावती अगर 2017 के विधान सभा चुनाव जीत कर सत्ता में वापसी का सपना देख रही हैं तो इसे माया का आत्मविश्वास या बढ़बोलापन दोनों ही कहा जा सकता हैै, लेकिन राजनैतिक पंडित इसे बसपा का आत्मविश्वास ही बता रहे हैं।  बात 2012 और 2014 में बसपा को मिली करारी शिकस्त के बाद मायावती की राजनीति और व्यक्तिग जीवन में आये बदलाव की कि जाये तो दोनों ही मोर्चो पर बसपा सुप्रीमों काफी सजग नजर आती है।  इसकी बानगी 15 जनवरी 2016 को देखने को मिली। माया ने अबकी से अपना जन्मदिन सादगीपूर्ण तरीके से मनाया।  इस बार हीरों के चमकते आभूषण बहनजी के चेहरे की शोभा भले ही नहीं बढ़ा रहे थे, लेकिन 2017 में सत्ता वापसी की चमक उनके चेहरे पर साफ दिखाई पड़ रही थी, जिसे देखकर बसपाई चकाचौंध हो रहे थे। 

विधान सभा चुनाव से एक वर्ष पूर्व बसपा को नंबर वन पर देखा जा रहा है तो इसका कारण उत्तर प्रदेश की केन्द्र की मोदी और यूपी की अखिलेश सरकार की नीतियां हैं। मोदी सरकार को दलित और मुस्लिम विरोधी साबित करने का प्रयास हो रहा है।  अयोध्या में भगवान राम का मंदिर निर्माण करने संबंधी बीजेपी नेताओं के बयानों, हैदराबाद में दलित छात्र की आत्महत्या, बीते साल हरियाणा में दो दलितों की जलकर हुई मौत, अखलाक की हत्या आदि तमाम ऐसी घटनाएं हैं जिसके सहारे मोदी सरकार को न केवल दलित बल्कि मुसलमान विरोधी भी साबित किया जा रहा। इसकी बानगी हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी के लखनऊ कार्यक्रम के दौरान तब देखने को मिली, जब इस बात का खुलासा हुआ कि हैदराबाद की घटना को लेकर ‘नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद और मोदी वापस जाओ’ के नारा लगाने वाले छात्र बसपा प्रमुख मायावती के समर्थक थे। इस पूरे प्रकरण को बेहद प्‍लानिंग के साथ अंजाम दिया गया था। इसमें बसपा का हाथ था।  मायावती दलित वोटरों को यह बताने का कोई भी मौका नहीं खोती हैं कि आरएसएस,  भाजपा व केंद्र सरकार के कट्टरवादी सांसदों,  मंत्रियों व उच्च पदों पर बैठे लोग दलितों को नुकसान पहुंचाने के लिये कभी भारतीय संविधान की तो कभी आरक्षण की समीक्षा करने की बात कर रहे हैं। वह कहती हैं कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद हर क्षेत्र में दलितों व अति पिछड़ों का उत्पीड़न बढ़ा गया है।  इन वर्गों के प्रति उनकी हिंदुत्व आधारित जातिवादी सोच नहीं बदली है।

मायावती जहां दलित वोट बैंक को लेकर चिंतित है, वहीं उन्होंने मुस्लिमों के बीच अपने समर्थन की जमीन तलाशने की कवायद भी शुरू कर दी है। इस क्रम में माया नेे सबसे पहले बसपा के मुस्लिम नेताओं को टिकट देने में दरियादिली दिखाई। इस बार करीब 25 फीसदी टिकट मुस्लिमों को देकर पार्टी अपने लिये बेहद खास अल्पसंख्यक वोटों पर निगाहें टिकाए हुए है। हालांकि यह और बात है कि लोकसभा चुनाव के बाद संगठन में हुए बड़े पैमाने पर बदलाव के बाद भी नए संगठन में मुसलमानों से अधिक दलितों को तवज्जो दी गई थी। मुसलमानों को टिकट देने में दरियादिली दिखाने वाली बसपा सुप्रीमों  अयोध्या के बहाने भी मुसलमानों पर डोरे डाल रही हैं।  एक तरफ वह अयोध्या में जल्द मंदिर बनने संबंधी बीजेपी नेताओं के ताजा बयानों को हवा दे रही हैं तो वहीं मुलायम के उस बयान को भी मुद्दा बना रही हैं जिसमें मुलायम ने कहा था कि कारसेवकों पर लाठचार्ज करने का उन्हें दुख है। अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद द्वारा मंदिर निर्माण के लिए राजस्थान से शिलाएं लाए जाने के सवाल पर बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्या तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहते है कि मामला सुर्प्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।  जो ऐसा कर रहे है वे देसी आतंकवादी हैं।  मौर्य ने कहा, ‘अयोध्या में ट्रकों से लद कर शिलाएं पहुंच गईं।  मगर सपा सरकार सोती रही।  इससे भी साबित होता है कि सपा भाजपा में सांठगांठ है। उन्होंने कहा यदि समाजवादी पार्टी सरकार सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करती तो शिलाएं वहां कतई न पहुंच पातीं।  मुस्लिमों का बसपा के प्रति झुकाव की वजह मुस्लिम आरक्षण भी बन सकता है।  2012 में मुसलमानों को लगता था कि समाजवादी सरकार बनेगी तो वह मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिये कोई न कोई रास्ता तलाश लेगी, परंतु ऐसा हुआ नहीं।

बसपा दलितों और मुसलमान वोट बैंक के अलावा ऊंची जाति के एक वर्ग के वोटों पर भी नजर रखे हुए है।  इसके लिए यह इस समुदाय के गरीब लोगों के लिए बसपा सुप्रीमों नौकरी में आरक्षण की जोरदार वकालत कर रही हैं। याद रखना जरूरी है कि 2007 के चुनावों में दलित-मुस्लिम और ब्राहमण वोटों की गोलाबंदी करके बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतने में सफलता हासिल की थी।  पार्टी को मिलने वाले कुल वोटों में 30.43 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं का था। जानकर कहते हैं कि केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार का कामकाज ठीकठाक  होता तो मायावती के पक्ष में संभावनाएं इतनी प्रबल न होतीं।  पर लोकसभा चुनाव में दूसरी तमाम पार्टियों को बौना बना देने वाली भाजपा दिल्ली-बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में भी अपना वर्चस्व कायम रखने में विफल होती दिख रही है।  लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का ताना-बाना बुनने वाले पार्टी के मुखिया अमित शाह भले ही दोबारा अध्यक्ष बन गये हों लेकिन उनका रुतबा काफी घटा है।

मिशन 2017 फतह करने के लिये बसपा केन्द्र की भांति ही अखिलेश सरकार के खिलाफ भी जाति,  धर्म और समुदाय से इतर कानून-व्यवस्‍था की बिगड़ी स्थिति को  प्रमुख मुद्दा बन सकती है। बसपा का प्रमुख वोट बैंक रहीं जाटव,  दलित समूह और अन्य पिछड़ी जातियां,  जिनका मायावती से मोहभंग हो गया था,  यादवों के वर्चस्व से त्रस्त होकर एक बार फिर उनके पक्ष में एकजुट हो रही हैं।  ब्राह्मणों की स्थिति भले उतनी खराब न हो,  लेकिन ग्रामीण इलाकों में बंदूक की नोक पर गुंडाराज करने वालों से वे भी आजिज आ चुके हैं। इसी प्रकार राज्य में बढ़ते कृषि संकट और खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को उनकी समस्याओं से निजात दिलाने में माया की भूमिका को उम्मीद भरी नजरों से देखा जा रहा है।  प्रदेश की सपा और केंद्र की भाजपा सरकार से त्रस्त किसान बसपा के शासन को याद करते हैं,  जब न केवल चीनी मिलों से समय पर गन्ने का भुगतान हो जाता था,  बल्कि कीमत भी वाजिब मिलती थी।  सपा सरकार द्वारा पिछले तीन वर्षो से गन्ना मूल्य नहीं बढ़ाया जाना भी गन्ना किसानों को खटक रहा है। 

कानून व्यवस्था के अलावा अखिलेश सरकार में प्रमोशन में दलित कोटा खत्म करना,  दलितों की जमीन की बिक्री के लिये बनाये गये नियमों में बदलाव ऐसे मुद्दे हैं जिससे दलितों को लगता है कि माया राज में ही उसके हित सुरक्षित रह सकते हैं। यही सोच माया की सत्ता में वापसी की राह आसान कर रही है। वैसे  तो समाजवादी सरकार में कानून-व्यवस्था की स्थिति सबके लिये दुखद है,  किंतु दलितों के प्रति अधिपत्यशाही समूहों का अन्याय बढ़ा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दलित कल्याण के मुद्दे पर या तो उदासीन है या ऐसी नीतियां लागू कर रहे है,  जिन्हें दलित हितों के खिलाफ माना जाता है। बीते वर्ष समाजवादी पार्टी सरकार ने अदालत के आदेश की आड़ में नौकरी में प्रमोशन में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (एससी – एसटी)कर्मचारियों के लिए नौकरी में निर्धारित किए गए कोटा को समाप्त करने के साथ-साथ ही एक ऑफिस आर्डर के तहत नौकरी में प्रोन्नत किए गए एससी-एसटी कर्मचारियों को पदावनत(डिमोशन) करने का निर्णय लिया था।  इस आदेश से  लाखों एससी-एसटी कर्मचारी प्रभावित होते दिखे।

इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग ने इस ऑफिस आर्डर को ध्यान में रख पूर्व में प्रोन्नत किए गए एससी/एसटी कर्मचारियों को पदावनत करने का आदेश दे दिया।  दलित समाज में समाजवादी पार्टी सरकार के इस पहल का काफी विरोध हो रहा है। इसको लेकर दलितों में वर्तमान सरकार के प्रति गुस्सा और नाराजगी बढ़ रही है। दलितों का प्रोन्नति कोटा खत्म किये जाने के अलावा अखिलेश सरकार का एक और निर्णय दलितों के हितचिंतकों को रास नहीं आ रहा है।  राज्य सरकार का यह निर्णय भी बसपा को 2017 के लिये संजीवनी दे रहा है।  खुद दलितों में भी एक बड़ी संख्या इस निर्णय से खफा है। समाजवादी सरकार ने बीते वर्ष ही दलितों की भूमि खरीद और विक्रय संबंधी कानून में भी एक बड़ा परिवर्तन किया था। गौरतलब हो,  1950 का भूमि कानून गैर दलितों द्वारा दलितों की भूमि के खरीद की इजाजत तो देता था,  किंतु 1.26 हेक्टेयर से ज्यादा होने वाली भूमि ही खरीदी-बेची जा सकती थी। दलितों की भूमि 1.26 हेक्टेयर से कम होने पर किसी दलित को ही बेची जा सकती थी, परंतु इसके  जिला प्रशासन द्वारा कड़ी छानबीन की जाती थी, लेकिन अखिलेश सरकार ने दलितों के भूमि विक्रय संबंधी इस नियम को खोखला करके फरमान जारी कर दिया कि अगर किसी दलित के पास न्यूनतम 1.26 हेक्टेयर भूमि भी है तो वह भी खरीदी-बेची जा सकती है।  कोई गैर-दलित भी उसे खरीद सकता है। 

इस नियम परिवर्तन का असर यह हुआ कि भूमि माफियाओं का उत्साह बढ़ गया तो दूसरी ओर दलितों को अपनी जमीन कैसे सुरक्षित रहेगी इसकी चिंता सताने लगी है। अखिलेश सरकार के इस निर्णय पर इस लिये भी सवाल खड़े किये जा रहे हैं, क्योंकि अक्सर खबरें आती रहती हैं कि सपा में भू-माफियाओं का दबदबा है।  यह और बात है कि कुछ दलित अपनी जमीन किसी को भी बेचने की छूट में लाभ भी देख रहे हैं,  पर इनका प्रतिशत काफी कम है और यह दलितों का प्रतिनिधित्व भी नहीं करते हैं।  दलितों का बड़ा तबका इस निर्णय से काफी नाराज हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती इन  निर्णयों की आलोचना कर चुकी है।  मायावती कहती हैं कि दलितों व अन्य पिछड़े वर्गों के मामले में प्रदेश की सपा सरकार की सोच लगभग बीजेपी व आरएसएस की तरह नजर आती है।  दलित वर्ग के कर्मचारी व अधिकारी पदोन्नति में आरक्षण को बरकरार रखने के लिए केंद्र व प्रदेश की सपा सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं।  सपा सरकार ने दलित कर्मचारियों व अधिकारियों को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा दिया है।

बसपा नेता और प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या कहते हैं कि सपा राज में दलितों की जमीन सुरक्षित नहीं रह गई है। काूनन बनाकर दलितों का हक छीनने का मार्ग अखिलेश सरकार ने प्रशस्त कर दिया है। इसी तरह मौर्या प्रोन्नति में आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आड़ में अनुसूचित जाति जनजाति के अधिकारियों कर्मचारियों की जिस मनमाने तरीके से पदावनति की जा रही है उससे भी खफा है।  मौर्यां के अनुसार प्रोन्नति में आरक्षण वापस लिये जाने से दलित समाज के आठ लाख से अधिक कर्मचारियों में उपेक्षा और पक्षपात का शिकार होने का भाव पैदा हो रहा है।

दलित समाज को अखिलेश सरकार की एक और बात भी कचोटती रहती है। सपा राज में दलित महापुरूषों के नाम पर बने स्मारकों, पार्कोे आदि के रखरखाव पर लाफी लापरवाही बरती जाती है, जबकि समाजवादी नेताओं के नाम पर बने पार्कों आदि पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है।  शायद इस बात का अहसास अखिलेश सरकार को भी हो गया होगा,  इसी लिये हाल ही में  अखिलेश सरकार ने लखनऊ में स्थापित किए जा रहे अत्याधुनिक हाईटेक सीजी सिटी परिसर में बाबा साहब डॉ0 भीमराव अंबेडकर का स्मारक बनाने के लिए अंबेडकर महासभा को भूमि उपलब्ध कराने का एलान किया है।  सीजी सिटी में अंबेडकर स्मारक के लिए जमीन देने का एलान कर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जहां बसपा सुप्रीमो मायावती के दलित एजेंडे में सेंध लगाने की कोशिश की है,  वहीं डॉ. अंबेडकर के सहारे चुनावी वैतरणी पार लगाने की भाजपा की मुहिम को भी कुंद करने का दांव चला है।   

बहरहाल,  बसपा सुप्रीमों मायावती और उनके समर्थक 2017 में अपना भविष्य जरूर तलाश कर रहे हैं,  तो 2012 में मिली करारी हार से सबक लेते हुए पिछले कार्यकाल की गलतियों से भी बचा जा रहा है। मायावती के तानाशाही रवैये और ब्राहमणों के प्रति बढ़ते उनके रूझान से नाराज होकर ही दलितों के एक बड़े धड़े ने 2014 में हाथी की जगह कमल खिला दिया था। ब्राहमण नेताओं के वर्चस्व के कारण  बीएसपी की पिछली सरकार में दलितों के अलावा पिछड़ा वर्ग भी अपने आप को उपेक्षा का शिकार समझ रहा था। माया की कैबिनेट से लेकर शासन तक में गैर दलितों का दबदबा देखने को मिला था। रामवीर उपाध्याय, बाबू सिंह कुशवाह,  स्वामी प्रसाद मौर्या, अंनत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू,  बादशाह सिंह, नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं का माया कैबिनेट में  रूतबा था तो अफसर शाही की कमान शंशाक शेखर ने संभाल रखी थी जिसने के सामने किसी की एक नहीं चलती थी। मायावती कभी किसी शादी समारोह में नहीं जाती है, परंतु सतीश मिश्र के वहां जब वह पहुंची तो यह बात उन दलित नेताओं को भी रास नहीं आई जो माया के काफी करीबी हुआ करते थे।  2012 में समाजवादी पार्टी  माया के तानाशाही रवैये और पिछड़ों की उपेक्षा के मुद्दे को भुना कर जीत हासिल करने में सफल रही तो 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी दलितों को अपने पाले में खींच ले गये।

बात 2017 की करें तो माया ने भले ही अपना एजेंडा तय कर दिया हो लेकिन उन्हें इस बात का भी अहसास है कि बीजेपी और समाजवादी नेता प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देकर कानून-व्यवस्‍था और कृषि संकट जैसे मुद्दों को हाशिये पर धकेल सकते है।  विश्व हिन्दू परिषद का राम मंदिर  राग अलाप। सपा में आजम खान जैसे नेताओं की उकसाने वाली बयानबाजी सांप्रदायिक माहौल बिगड़ने की आशंका को हवा देने का काम कर रही है। इसी बात को ध्यान में रखकर बसपा नेता भाजपा को दंगा वाली पार्टी का तमगा देने में जुट गये हैं। बसपा सुप्रीमों मायावती तय एजेंडे पर ही आगे बढ़ रही हैं, इसी लिये वह न तो इस बात से चिंतित होती हैं कि फेसबुक पर उनके साथ फोटो खिंचाने वाली बसपा उम्मीदवार का टिकट काटने पर विरोधियों के बीच क्या प्रतिक्रिया होती है और न ही इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि कौन उनका साथ छोड़ रहा है। बसपा नेत्री किसी भी तरह 2017 में अपनी बादशाहत कायम रखना चाहती है।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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फेसबुक पर आपत्तिजनक टिप्पणी की बीएसपी ने की शिकायत, सात पर रिपोर्ट

बहराइच (उ.प्र.) : फेसबुक पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी लिखने पर पुलिस ने विपुल शाह सहित सात युवकों के खिलाफ आईटी अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धारा 153 बी , 295 ए के तहत प्राथमिकी दर्ज कर ली है। 20 जून को आरोपी के फेसबुक एकाउंट पर यह सामग्री पोस्ट की गई, जिसे छह अन्य युवकों ने पसंद किया या उस पर टिप्पणी की। 

बीएसपी नेता शारिक खान की अगुवाई में समुदाय विशेष के लोगों ने कोतवाली में फेसबुक पर पोस्ट सामग्री के खिलाफ शिकायत की थी। फेसबुक और ट्विटर पर कमेंट करने या लाइक करने की वजह से कई विवाद हुए । जिसमें गिरफ्तारियां भी हुई। ताजे मामले में यूपी के बहराइच में 7 युवकों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में आईटी सेक्शन की धारा 66ए को रद्द कर दिया था। 

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि संविधान की धारा 19(1)(a) और 19(2) का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है लिहाजा आईटी की धारा 66ए गैरसंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद बहराइच का मामला बेहद नया है। 

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बसपा काल के भ्रष्टाचार पर सपा राज में चुप्पी

सपा-बसपा नेता भले ही जनता के बीच अपने आप को एक-दूसरे का कट्टर दुश्मन दिखाते रहते हों लेकिन लगता तो यही है कि अंदर खाने दोनों मिले हुए हैं,जिस तरह से बसपा शासनकाल के तमाम भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों के प्रति अखिलेश सरकार लचीला रवैया अख्तियार किये हुए है।वह संदेह पैदा करता है।सपा कोे  सत्ता हासिल किये तीन वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है लेकिन उसने अभी तक पूर्ववर्ती बसपा सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ जांच की इजाजत लोकायुक्त को नहीं दी है। आधा दर्जन से ज्यादा पूर्व मंत्रियों और लगभग दो दर्जन लोकसेवकों के खिलाफ लोकायुक्त की विशेष जांच रिपोर्टों पर कार्रवाई न होने से सीएम अखिलेश पर उंगली उठने लगी हैं।

प्रदेश की जनता को यह लग तो रहा है कि अखिलेश सरकार बसपा काल के भ्रष्टाचार को नजरंदाज कर रही है,परंतु वह कुछ कर नहीं सकती है,मगर राजभवन के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं है जो वह इस ओर से आंखें मूंद लें।राज्यपाल राम नाईक बसपा राज के भ्रष्टाचार और इसको लेकर अखिलेश सरकार की ढीले रवैये को लेकर सख्त हो गये है।राज्यपाल अखिलेश सरकार पर लोकायुक्त की जांच में दोषी पाए गए मायाराज के मंत्रियों पर कार्रवाई का दबाव बढ़ाये हुए हैंाराज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र भेजकर शासन स्तर पर ठंडे बस्ते में पड़े 23 मामलों में लोकायुक्त व उप-लोकायुक्त के विशेष प्रतिवेदनों पर अपना व मुख्य सचिव का स्पष्टीकरण जल्द उपलब्ध कराने को कहा है ताकि उसे विधानमंडल के पटल पर रखवाया जा सके और इसके साथ-साथ भ्रष्ट पूर्व मंत्रियों और अधिकारियों के खिलाफ लोकायुक्त जांच कर सके।

यह कहना गलत नहीं होगा कि जब अखिलेख सरकार सोई हुई है तब राज्यपाल राम नाईक ने प्रदेश में लोकायुक्त द्वारा की गई जांचों पर हुई कार्रवाई का ब्योरा मांगकर सही कदम उठाया है।ये जांचें भ्रष्टाचार और कदाचार की गंभीर शिकायतों के बाद शुरू हुई थीं। किसी लोकसेवक पर ग्राम पंचायत की जमीन पर कब्जा करने का आरोप है तो किसी पर भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति रखने का। किसी पर अवैध खनन कराने का इल्जाम है तो किसी पर नियुक्तियों में हेराफेरी का। सर्वाधिक शिकायतें अवैध खनन गुणवत्ताविहीन निर्माण कराने और आय से अधिक संपत्ति जुटाने की हैं। इसमें भी शिक्षाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायतें हैं। जिन पूर्व मंत्रियों के खिलाफ जांच प्रत्यावेदन दिये गए हैं उनमें चर्चित स्मारक घोटाला भी शामिल है। यह आरोप पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ है। इसी तरह पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या के खिलाफ संपूर्ण स्वच्छता अभियान योजना के धन वितरण में गड़बड़ी, पूर्व मंत्री अवधपाल सिंह पर भ्रष्टाचार और ऐसे ही आरोप दूसरे मंत्रियों विधायकों अधिकारियों पर भी हैं।

सब जानते हैं कि मौजूदा राज्य सरकार के स्पष्ट बहुमत से पदारूढ़ होने के पीछे भ्रष्टाचार का मुद्दा अहम रहा है।समाजवादी पार्टी की चुनाव प्रचार सभाओं में इन घोटालों का पर्दाफाश करने सहित दोषियों को कानून के हवाले करने के वादे किये गए थे।कहा तो यहां तक गया था कि सपा की सरकार बनते ही भ्रष्टाचार में लिप्त मायावती को जेल में डाल दिया जायेगा।यह अफसोसजनक है कि सामजवादी सरकार का वादों के अनुरूप भ्रष्टाचार के मामलों में घिरे लोकसेवकों पर कार्रवाई का जज्बा आशाजनक नहीं है।इसकी बानगी इसी में देखने को मिलती है कि अब तक सिर्फ एक मामला ही सदन पटल पर रखा जा सका। यदि मौजूदा सरकार भ्रष्टाचार और कदाचार के प्रति वाकई गंभीर है तो उसे त्वरित गति से कदम उठाने होंगे। जांच के बाद यदि इतने दिनों तक मामले लंबित रहेंगे तो जनता के प्रति सही संदेश नहीं जाएगा। जांच प्रकरणों पर लंबित प्रक्रिया को शीघ्र से शीघ्र पूरा कर उसे सदन पटल पर रखा जाना चाहिए और इसी अनुरूप कार्रवाई भी होनी चाहिए। तभी सरकार की भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रतिबद्धता पूरी होगी।

गौरतलब है कि लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा द्वारा उ.प्र. लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अधिनियम 1975 की धारा-12(5) के अंतर्गत राज्यपाल को कुल 43 विशेष रिपोर्टें भेजी गई हैं। राज्यपाल ने इन रिपोर्टों को सरकार के पास भेजकर स्पष्टीकरण मांगा था।जनवरी 2012 से 31 मार्च 2015 तक कुल 20 विशेष जांच रिपोर्ट पर ही मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव की ओर से स्पष्टीकरण ज्ञापन भेजा गया है। इनमें से केवल एक विशेष रिपोर्ट ही विधानमंडल के पटल पर रखी गई है। शेष रिपोर्ट अभी शासन स्तर पर दबी हुई हैं।सिर्फ पूर्व मंत्रियों ही नहीं, बल्कि शासन स्तर पर दो दर्जन से ज्यादा सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ भी कार्रवाई ठंडे बस्ते में पड़ी है। कई नगर निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों, अधिशासी अधिकारियों, बेसिक शिक्षा अधिकारियों, ग्राम पंचायत अधिकारियों व सचिवों, स्वास्थ्य अधिकारियों, खनन अधिकारियों, समाज कल्याण अधिकारियों के खिलाफ भी लोकायुक्त ने राज्यपाल को विशेष रिपोर्ट भेजी है लेकिन इसे भी सदन के पटल पर रखवाने में हीला हवाली की जा रही है।राज्यपाल राम नाईक ने इस संबंध में 27 अप्रैल 2015 को सीएम अखिलेश यादव को एक पत्र लिखा था। पत्र के जरिए राज्यपाल ने सीएम अखिलेश यादव से लोकायुक्त की स्पेशल रिपोर्ट पर कार्यवाही न किए जाने पर जवाब मांगा था ताकि इनको विधानसभा के पटल पर रखा जा सके।राज्यपाल ने पहली बार पत्र नहीं लिखा था।इस स्पेशल रिपोर्ट को लेकर पूर्व में भी राज्यपाल की ओर सेे 12 दिसंबर 2014 को एक पत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भेजा गया था। इसके बावजूद अभी तक मामले में कोई प्रगति देखने को नहीं मिली थी। जनवरी, 2012 से 31 मार्च, 2015 तक कुल 20 मामलों में राज्य सरकार की ओर से जवाब आया है कि इनमें कार्रवाई की जा चुकी है। राज्य सरकार की ओर से 20 मामलों में कार्रवाई किए जाने की जानकारी राज्यपाल को तो दी गई लेकिन अभी तक सिर्फ एक मामला  ही स्पेशल रिपोर्ट स्पष्टीकरण ज्ञापन के साथ विधानमंडल के सामने पेश हुआ है। 

बसपा शासनकाल में मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्या पर संपूर्ण स्वच्छता अभियान योजना के धन वितरण में गड़बड़ी,नसीमुद्दीन सिद्दीकी व बाबू सिंह कुशवाहा, 12 पूर्व विधायक, खनिज अधिकारी, राजकीय निर्माण निगम के इंजीनियर, 35 वित्त एवं लेखा अधिकारी पर स्मारक घोटाला,अवध पाल सिंह यादव, पूर्व मंत्री पर भ्रष्टाचार, रतन लाल अहिरवार, पूर्व मंत्री पर विधायक निधि का दुरुपयोग और जमीन पर कब्जा,अयोध्या प्रसाद पाल, पूर्व मंत्री पर वन विभाग व ग्राम समाज की जमीनों पर कब्जा, रामवीर उपाध्याय, पूर्व मंत्री पर आय से अधिक संपत्ति अर्जन का मामला,राजेश त्रिपाठी, पूर्व मंत्री पर पद का दुरुपयोग,एनपी ंिसह,महाप्रबंधक, जल निगम पर वित्तीय अनियमितता व सरकारी धन का दुरुपयोग, महेश कुमार गुप्ता, आबकारी आयुक्त पर गैर कानूनी तरीके से नियुक्तियां करने का इल्जाम,प्रमुख सचिव व डीजी चिकित्सा शिक्षा पर घूसखोरी व गैरकानूनी तरीके से नियुक्तियां करने का आरोप, डॉ. जीके अनेजा सहायक निदेशक चिकित्सा शिक्षा व डॉ. संगीता अनेजा प्राचार्य सहारनपुर मेडिकल कॉलेज पर नियम विरुद्ध नियुक्ति हासिल करना व पद का दुरुपयोग,रमेश चंद्र, एसडीएम मथुरा पर प्रॉपर्टी डीलिंग का कार्य करने वाली कंपनी को लाभ पहुंचाना और स्टांप ड्यूटी की चोरी, डॉ. कर्ण सिंह, पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी पर बिना पूर्व सूचना के महंगी संपत्ति खरीदने का आरोप,सोमनाथ विश्वकर्मा, सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी सीतापुर पर छात्रवृत्ति घोटाला व फर्जी प्रमाण पत्र जारी करने का आरोप, प्रदीप कुमार मिश्र, मुख्य कर अधीक्षक पर टैक्स आकलन में गड़बड़ी कर कई लोगों को लाभ पहुंचाना व भ्रष्टाचार, कमला प्रसाद पांडेय अधिशासी अधिकारी उतरौला पर वित्तीय अनियमितता कर सरकार को वित्तीय नुकसान पहुंचाने का,आरबी सिंह, खनिज अधिकारी पर अवैध खनन में संलिप्तता, बीएल दास, खनिज अधिकारी सोनभद्र पर अवैध खनन कराने का इल्जाम, सोमनाथ विश्वकर्मा, सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी, गोंडा पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला,राधेश्याम ओझा, पूर्व जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी व उत्तम कुमार सहायक अध्यापक हरदोई पर स्कूल भवन के निर्माण में खराब गुणवत्ता, कृपा शंकर शुक्ला, डवलपमेंट अफसर पर मिड-डे मील में घोटाला व भवन निर्माण की गुणवत्ता खराब,मंजू सोनकर, जिला समाज कल्याण अधिकारी पर गरीबों की मदद के धन वितरण में हेरफेर,एसपी ंिसह, डीडीओ देवरिया- भ्रष्टाचार, आय से अधिक संपत्ति अर्जन, जिला समाज कल्याण अधिकारी चंदौली पर वृद्धावस्था पेंशन वितरण में भ्रष्टाचार,राघव राम वर्मा, सचिव साधन सहकारी समिति, बाराबंकी पर सरकारी कार्य के साथ जीवन बीमा निगम के लिए भी कार्य करने का आरोप है।

युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को समझना चहिए कि यह काफी नहीं है कि उनकी छवि बेदाग है,बल्कि इसके साथ-साथ इस बात का भी आभास होना चाहिए कि वह हर तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ गंभीर है।उन्हें समय-बेसमय इस बात का जबाव देना पड़ सकता है कि जब सपा विपक्ष में थी तब उसके नेता मुलामय सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव,राम गोपाल यादव,आजम खाॅ,शिवपाल यादव आदि मायावती पर आरोप लगाते रहते थे कि बसपा सरकारा फोंटी और जेपी ग्रुप चला रहा है,लेकिन आज इसी गु्रप के लोगों को समाजवादी सरकार में भी पूरा महत्व मिल रहा है।बसपा राज के कई दागी अधिकारी अखिलेश सरकार की भी नाक के बाल बने हुए है।चाहें  भ्रष्टाचार पूर्ववर्ती बसपा सरकार के मंत्रियों ने किया हो या फिर अब सपा के कुछ मंत्रियों पर ऐसे आरोप लग रहे हों।मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को इस बात का ध्यान रखना होगा की जनता के बीच यह मैसेज नहीं जाये कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को दबाये रखने के मामले में हम(सपा-बसपा)साथ-साथ हैं।

एक तरफ भ्रष्ट मंत्रियों,नेताओं,अधिकारियों की जांच लोकायुक्त से करा कर दूध का दूध,पानी का पानी होने की उम्मीद लगाई जाती है,वहीं दूसरी तरफ जब लोकायुक्त की ही कार्यशैली पर उंगली उठने लगे तब यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि लोकायुक्त अपने काम(भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच) के प्रति कितना ईमानदार रह पाते होंगे। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने लोकायुक्त एन के मल्होत्रा द्वारा मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के छिपरी गाँव में एक धार्मिक कार्यक्रम में निजी हैसियत में भाग लेने के लिए सरकारी लाव-लश्कर और सरकारी हेलीकाप्टर का इस्तेमाल करने के सम्बन्ध में राज्यपाल राम नाइक को शिकायत भेजी है।उन्होंने कहा है कि 24 अप्रैल 2015  को श्री मल्होत्रा एक धार्मिक गुरु के निजी कार्यक्रम के लिए सरकारी हेलीकाप्टर से झाँसी गए जहां उनका पूरे राजकीय सम्मान से स्वागत किया गया और फिर उसी हेलीकाप्टर का उपयोग कर वे छिपरी गए और वहीँ से लखनऊ लौट गए।इसके पूर्व लोकायुक्त कार्यालय के उपसचिव ए के सिंघल ने डीएम झाँसी को 21 अप्रैल को इस सम्बन्ध में जो पत्र भेजा था उसमे मात्र सम्पर्क मार्ग से छिपरी जाने का ही कार्यक्रम था लेकिन बाद में व्यवस्था हो जाने पर श्री सिंघल झाँसी से छिपरी भी हेलीकाप्टर से ही गए।डॉ ठाकुर ने इसे कदाचार बताते हुए राज्यपाल को उत्तर प्रदेश लोकायुक्त एक्ट की धारा 6 में शिकायत भेज कर श्री मल्होत्रा द्वारा अपने कार्यकाल में निजी दौरों में सरकारी संसाधनों का प्रयोग किये गए  जांच कराते हुए सही पाए जाने पर श्री मल्होत्रा को पद से हटाने और की मांग की है।नूतन ठाकुर का कहना था कि श्री मल्होत्रा द्वारा इस प्रकार निजी कार्यों के लिए सरकारी व्यवस्था और सरकारी हेलीकाप्टर का प्रयोग प्रथम द्रष्टया कदाचार की श्रेणी में दिखता है।उन्होंने राज्यपाल राम नाईक से कहा है कि उत्तर प्रदेश लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम 1975 की धारा 6 (1) में प्रद्दत शक्तियों का प्रयोग करते हुए वह लोकायुक्त  एन के मल्होत्रा के उपरोक्त आरोपित कदाचार की जांच इस धारा के प्रावधानों ने अनुसार कराने और नियुक्त प्राधिकारी को निश्चित समय सीमा में इस धारा की उपधारा (2) के अधीन अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश देें।यदि श्री मल्होत्रा द्वारा व्यक्तिगत कार्यों के लिए सरकारी हेलीकाप्टर,संसाधनों का प्रयोग करने की बात प्रमाणित होती है तो उपरोक्त उपक्रम में व्यय हुई धनराशि भी श्री मल्होत्रा से निजी स्तर पर वसूले जाने के आदेश निर्गत करने करें।वैसे यह पहला मामला नहीं है जब लोकायुक्त मल्होत्रा के ऊपर इस तरह के आरोप लगे हैं।इससे पहले भी उनके ऊपर एक विधायक ने जिसकी लोकायुक्त जांच कर रहे थे आरोप लगाया था कि लोकायुक्त ने उन्हें घर पर बुलाकर पैसे की मांग की थी,लेकिन विधायक की जांच चल रही थी,इस लिये यह माना गया कि विधायक लोकायुक्त की छवि खराब करने के लिये इस तरह के आरोप लगा रहा 

अजय कुमार संपर्क : 9335566111

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2017 का विधानसभा चुनाव जातिवादी राजनीति के सहारे नहीं जीता जा सकेगा, अखिलेश यादव को अहसास हो गया

अजय कुमार, लखनऊ

एक वर्ष और बीत गया। समाजवादी सरकार ने करीब पौने तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है। 2014 सपा को काफी गहरे जख्म दे गया। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार ने धरती पुत्र मुलायम को हिला कर रख दिया। पार्टी पर अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है। अगर जल्द अखिलेश सरकार ने अपना खोया हुआ विश्वास हासिल नहीं किया तो 2017 की लड़ाई उसके लिये मुश्किल हो सकती है। अखिलेश के पास समय काफी कम है। भले ही लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के पश्चात समाजवादी सरकार ने अपनी नीति बदली ली है, लेकिन संगठन वाले उन्हें अभी भी पूरी आजादी के साथ काम नहीं करने दे रहे हैं। सीएम अखिलेश यादव अब मोदी की तरह विकास की बात करने लगे हैं लेकिन पार्टी में यह बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। मुलायम अभी भी पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। निश्चित ही 2015 खत्म होते ही तमाम दलों के नेता चुनावी मोड में आ जायेंगे। भाजपा तो वैसे ही 2017 के विधान सभा चुनावों को लेकर काफी अधीर है, बसपा और कांग्रेस भी उम्मीद है कि समय के साफ रफ्तार पकड़ लेगी। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस ही नहीं सपा-बसपा भी 2014 में अर्श से फर्श पर आ गये।

बात सपा के संकट की कि जाये तो चाहें सपा हो या अन्य कोई दल उसे कमोवेश सत्ता विरोधी लहर का खामियाजा भुगतना ही पड़ता है, अखिलेश सरकार भी इससे अछूती नहीं रह पायेगी। बदले राजनैतिक परिदृश्य में सपा के लिये भाजपा और मोदी से निपटना टेड़ी खीर लग रहा है। मोदी ने यूपी के तमाम गैर भाजपाई नेताओं की नींद उड़ा दी है। कांग्रेस पर इसका सीधा प्रभाव पड़ा है। वहीं मुलायम-माया जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी अपनी सियासत बचाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है। सपा का ग्राफ गिर रहा है वहीं केन्द्र में सत्ता हासिल करने के बाद आत्म विश्वास से लबरेज ‘भाजपा ब्रिगेड’ एक के बाद एक राज्य में भी जीत का परचम लहराती जा रही है। उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा है। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार ने सपा-बसपा के सूरमाओ को मुंह दिखाने लायक नहीं रखा। भला हो उप-चुनावों का जो सपा की थोड़ी-बहुत साख लौट आई। परंतु इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बीजेपी से भयभीत सपा-बसपा को भाजपा और मोदी का कोई तोड़ नहीं समझ आ रहा है। लोकसभा चुनाव में खत्म हो गई बसपा फिर से खड़ी होने की जददोजहद में लगी है तो समाजवादी सरकार और संगठन वैचारिक रूप से दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा है। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि भले ही सपा सरकार और संगठन का एकमात्र लक्ष्य 2017 के विधान सभा चुनाव जीतना है,लेकिन जीत हासिल करने के लिये दोनों अलग-अलग रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव राज्य में विकास की गंगा बहा कर 2017 का लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। औद्योगिक घरानो को यूपी में लाने का प्रयास,लखनऊ में आईटी हब बनाने या मेट्रो लाने का काम।सरकारी मशीनरी में तेजी लाने की कोशिश के साथ अखिलेश अपनी सरकार की छवि सुधारने की कोशिश में भी लगे हुए जिस पर उन्होंने लोकसभा चुनाव होने तक ध्यान नहीं दिया था। छवि सुधारने के लिये सीएम ने दागी छवि वाले दर्जा प्राप्त दर्जनों मंत्रियों को एक ही झटके में चलता कर दिया। अभी भी सरकारी स्तर पर उन नेताओं की तलाश जारी रखे हैं जिनके कारण सरकार की छवि कानून व्यवस्था सहित तमाम मोर्चो पर धूमिल हो रही है।

दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में मोदी के हाथों पिटे और मात्र 05 सीटों पर सिमट गये सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव परम्परागत रूप से जातीय गणित की राजनीति में उलझे हुए हैं। इस बात का अहसास उप-चुनावों और उसके बाद राज्यसभा के लिये प्रत्याशी तय करते समय नेताजी करा भी चुके हैं। सपा यादवों और मुस्लिमों को अपना वोट बैंक मानती है,इसी लिये पार्टी में उन्हे तरजीह मिलती है। इसी को ध्यान में रखते हुए मुलायम ने राज्यसभा चुनाव में भी छहः में से चार सीटें यादवों-मुसलमान(दो-दो) प्रत्याशियों के नाम कर दी। वहीं कुर्मी वोटों को सहेजने के चक्कर में मुलायम ने लखीमपुर खीरी की राजनीति में वजनदार माने जाने वाले रवि प्रकाश वर्मा को राज्यसभा भेजनेे का मन बनाया। सपा ने जिस एक मात्र राजपूत नीरज शेखर को राज्यसभा भेजा उसकी पहचान राजपूत से अधिक पूर्व सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चन्द्रशेखर के बेटे के रूप में अधिक होती है। नीरज को राज्यसभा भेजकर मुलायम ने चन्द्रशेखर जी से अपने रिश्तो का सम्मान रखा। प्रत्याशी तय करते समय मुलायम ने साफ संकेत दिया कि उनकी नजर 2017 के विधान सभा चुनाव पर लगी है।

खासकर,मुस्लिम वोटों पर पकड़ बनाये रखने के लिये मुलायम सिंह यादव ने लम्बे समय से नाराज चल रहे सपा के कद्दावर नेता और अखिलेश कैबिनेट में मंत्री आजम खॉ की पत्नी को राज्यसभा का टिकट देकर यह पूरी तरह से साबित कर दिया कि उनकी राजनीति अभी भी जातिवाद पर ही टिकी हुई है। उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि आजम खॉ अपनी राजनीति चमकाने के लिये कभी अमर सिंह पर तो कभी जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी के नाम पर भड़क जाते हैं तो कभी जावेद अली खान को राज्यसभा का टिकट मिलने से उनका पारा चढ़ जाता हैं। शिया धर्मगुरू मौलान कल्बे जव्वाद से तो आजम का विवाद इतना बढ़ा की सड़क तक पर आ गया।मुलायम ने भले ही आजम को अपनी आंख का तारा बना रखा हो, लेकिन अखिलेश के साथ ऐसा नहीं है। सपा सरकार चला रहे अखिलेश यादव का भरोसा आजम खॉ से अधिक अपने मंत्री अहमद हसन जैसे मुस्लिम नेताओं पर है जो सीएम के विकास के एजेंडे को सलीके से आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि आजम खॉ साहब अपना महकमा कायदे से संभालने की बजाये विभागीय अधिकारियों/कर्मचारियों में उलझे रहते हैं। आजम के विभाग में विकास के कौन से काम हो रहे हैं, इसके बारे में भले ही किसी को न पता हों, हां कहीं नफरत फैलाने का मौका मिल जाये तो इस मौके का फायदा उठाने से आजम खॉ जरा भी नहीं चूकते हैं। आजम के विवादास्पद बयानों के चलते चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव के समय उनके प्रचार पर रोक तक लगा दी थी।

ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव को तो इस बात का अहसास हो गया है कि 2017 का विधान सभा चुनाव जातिवादी राजनीति के सहारे नहीं जीता जा सकेगा। इसकी वजह भी है भाजपा अपनी छवि तेजी से बदल रही है।मुसलमानों के बीच मोदी और भाजपा को लेकर गैर भाजपाई नेताओं ने जो हौवा खड़ा किया था,वह अब धीरे-धीरे बदलने लगा है। मुसलमान भी तरक्की पंसद हो गया है।अगर ऐसा न होता तो दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैय्यद अहमद बुखारी द्वारा अपने बेटे शाबान बुखारी के इमाम के पद पर दस्तारबंदी के कार्यक्रम के समय पाक के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाये जाने और मोदी को न्योता नहीं देने की घटना पर मुस्लिम समाज में मोदी के पक्ष में इतनी तीखी प्रतिक्रिया नहीं होती। यहॉ तक की मुस्लिम की सबसे बड़ी धार्मिक और सामाजिक संस्था दारूल उलूम तक ने इस मसले पर बुखारी का पक्ष लेने की बजाये चुप्पी साधे रखना ही बेहतर समझा। दारूल उलूम के मोहमिम मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी ने इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी भले नहीं की लेकिन इशारों-इशारों में मोदी का पक्ष जरूर लिया। नौमानी ने मोदी के आमंत्रित नहीं किये जाने को सियासी स्टंट करार देते कहा कि हमने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कई कदमों की खुल कर सराहना की है। आखिर वे भारत के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं और भारत एक लोकतांत्रिक देश है।उनका कहना था दारूल उलूम शाही इमाम की ओर से पैदा किये गये विवाद से खुद को नही जोड़ना चाहता है।

बहरहाल,तमाम किन्तु-परंतुओ के बीच सच्चाई यह भी है कि तमाम कोशिशों के बाद भी समाजवादी सरकार जनता के बीच  अपनी विश्सनीयता को बरकरार नहीं रख पा रही है।मोदी मैजिक के चलते सपा सरकार और संगठन पर अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा हैं।हालात यह हैं कि लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद उप-चुनावों में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद सपाई सहमे हुए हैं।सपा के भीतर उप-चुनाव की सफलता से जो उत्साह का माहौल बना था उसेे महाराष्ट्र-हरियाणा में भाजपा के शानदार प्रदर्शन और समाजवादी प्रत्याशियों की दुर्दशा ने महीने भर के अंदर ही फीका कर दिया।महाराष्ट्र और हरियाणा में सपा की दुर्दशा तब देखने को मिली जबकि कुछ दिनों पूर्व लखनऊ में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में पार्टी को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का दर्जा दिलाने की चाहत कई नेता मंच पर उजागर कर चुके थे।

बात निकले और सपा के साथ बसपा की न हो, ऐसा नहीं हो सकता है।दोनों की राजनीति करीब-करीब एक की दिशा पर चलती है,लेकिन आश्चर्य तब होता है जब यह देखने में आता है कि अपने ओजस्वी भाषणों से मुलायम और मायावती जैसे नेता यूपी की राजनीति में तो धूमकेतु की तरह चमकते रहते हैं,लेकिन यूपी से बाहर के मतदाताओं द्वारा सिरे से उनकी अहमियत को बार-बार नकार दिया जाता है।यूपी के बाहर न तो मुलायम का मुस्लिम और पिछड़ा कार्ड काम आता है और न ही बसपा सुप्रीमों मायावती दलित वोटरों को लुभा पाती हैं जिनके सहारे वह यूपी में वर्षाे तक राज कर चुकी हैं।ताज्जुब तो इस बात का है कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कांग्रेस के दिग्गज नेता सपा-बसपा का सहारा ले लेते हैं,लेकिन उत्तर प्रदेश से बाहर कांग्रेस सहित कोई भी दल मुलायम-माया के साथ गठबंधन या साथ चलने को तैयार नहीं होता है।महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से हाथ मिलाकर चुनाव लड़ने की काफी कोशिश की लेकिन उसे सफलता हाथ नहीं लगी।शुरू-शुरू में जरूर इस बात की चर्चा हुई थी कि कांग्रेस-सपा के बीच गठबंधन हो गया है,परंतु बाद में कांग्रेस इस गठबंधन से मुकर गई।यह सब तब हुआ जबकि कांग्रेस की महाराष्ट्र में हालत पतली थी और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस से उसका 15 वर्ष पुराना नाता टूट चुका था।हॉ,वोट प्रतिशत के मामले मंे जरूर बसपा की स्थिति सपा से बेहतर रहती हैै।महाराष्ट्र और हरियाणा की नाकामयाबी के बाद सपा ने झारखंड और जम्मू-कश्मीर विधान सभा चुनाव में भी अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर दी है।देखना होगा कि आगे चलकर हालात कुछ बदलते हैं या फिर एक बार फिर महाराष्ट्र-हरियाणा दोहराया जायेगा।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को कई बार झूल चटा चुके यह दल अगर अन्य राज्यों में सफल नहीं होते हैं तो इसकी प्रमुख वजह है,इन दलों की सोच का दायरा काफी तंग होना।सपा-बसपा नेता चुनाव तो लड़ते हैं लेकिन उनके पास वीजन का अभाव रहता है।यूपी की तरह अन्य राज्य शैक्षिक,सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए नहीं हैं जो आंख मूंद कर नेताओं पर भरोसा कर लें।समाजवादी पार्टी के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी ने महाराष्ट्र की राजनीति को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश तो बहुत की लेकिन वह सफल नहीं हो पाये।इसे इतिफाक ही कहा जायेगा कि यूपी में तो सपा-बसपा अपनी प्रतिद्वंदी भाजपा को साम्प्रदायिकता और जातिवाद के मोर्चे पर घेर लेते हैं,लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा पहुंच कर उसकी यह कोशिशें नाकामयाब हो जाती हैं।यूपी में मायावती अपनी राजनैतिक चालों से  बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर दलित वोटरों को लामबंद कर ेलेती हैं,परंतु जब महाराष्ट्र में वह जाती हैं तो उनकी यह कोशिशें वहां परवान नहीं चढ़ पाती हैं,जबकि बाबा साहब की पहचान महाराष्ट्र से सबसे अधिक ही होती है।

उधर,तेजी से अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ाती जा रही भाजपा ने दोनों ही राज्यों(महाराष्ट्र-हरियाणा) में विरोधी दलों के बिखराव का फायदा उठाया।झारखं डमें भी उसकी सरकार बन गई है,उम्मीद तो यह भी की जा रही है कि जम्मू-कश्मीर में भी सत्ता उसके इर्दगिर्द ही रहेगी।सभी जगह भाजपा को विरोधियों के बिखराव का फायदा मिला।ठीक ऐसे ही राजनैतिक हालात उत्तर प्रदेश के भी हैं।यहां चार बड़े दलों के अलावा राष्ट्रीय लोकदल भी पश्चिमी यूपी में अपनी जड़े मजबूत किये हुए है।सपा को चिंता यह सता रही है कि अगर यूपी में मोदी विरोधी एकजुट नहीं हुए तो 2017 की लड़ाई आसान नहीं होगी।क्षेत्रीय दलों को लेकर भाजपा-आरएसएस के साथ-साथ मोदी की तल्खी और सोच भी किसी से छिपी नहीं है।विरोधी तो विरोधी अपने साथ खड़े क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की जोड़ीं सबक सिखाये जा रही है।बिहार में जदयू नेता नीतिश कुमार से दूरी बनाने के साथ यह सिलसिला शुरू हुआ था,जिसके कारण बिहार में 17 वर्ष पुराना भाजपा-जदयू गठबंधन ही नहीं टूटा भाजपा को बिहार सरकार से अलग भी होना पड़ गया,लेकिन लोकसभा चुनाव में इसका भाजपा को फायदा भी खूब मिला था।लोकसभा चुनाव आते-आते कई भाजपा के कई सहयोगी उससे दूर हो चुके थे,लेकिन भाजपा की सेहत पर इसका फर्क नहीं पड़ा।वह इन दलों की हैसियत को कम करके आगे बढ़ती ही गई। महाराष्ट्र और हरियाणा विधान सभा चुनाव में भाजपा ने जब अपने पुराने सहयोगियों शिवसेना और इंडियन नेशनल लोकदल को अपने से दूर किया तो यह समझते देर नहीं लगी कि भाजपा अब विस्तार में लग गई है।वह पूरे देश में बिना बैसाखी के चलना चाहती है।जल्द ही अकाली दल से भी भाजपा के रिश्ते खत्म हो जायें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।भाजपा का जब अपने सहयोगियों के साथ यह रवैया है तो विरोधी दलों के क्षत्रपों की तो बात ही दूसरी है।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी लगातार मोदी से खतरा बना रहता है।इसी लिये वह मोदी सरकार पर हमला करने का कोई भी मौका छोड़ती नहीं हैं।

बात उत्तर प्रदेश की कि जाये तो लोकसभा चुनाव के समय दोनों दलों(सपा-बसपा) के क्षत्रपों को इस बात का अहसास अच्छी तरह से हो भी चुका है।चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने चुन-चुन कर उन्हें (मुलायम-माया) निशाना बनाया था।इसी लिये समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव जातिवाद राजनीति को पीछे छोड़कर विकासवादी राजनीति की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है।मुलायम को भी यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जायेगी उतना अच्छा होगा।बहरहाल,सपा प्रमुख ने लालू यादव,शरद यादव,देवगौड़ा को साथ लेकर दिल्ली में धरना देकर अपनी ताकत का अहसास कराने की कोशिश तो जरूर की लेकिन वह इसमें ज्यादा सफल होते नीं दिखे।
 
लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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हैरानी तब होती है जब मायावती बेशर्मी के साथ कहती हैं कि….

Sumant Bhattacharya : अरबों रुपए देने वाले ये कौन हैं मायावती के शोषित और गरीब… जब मायावती कहती हैं कि राज्यसभा पहुंचाने के एवज में अखिलेश दास ने मुझे 100 करोड़ का प्रस्ताव दिया तो मुझे कोई हैरानी नहीं हुई। हैरानी तब होती है जब मायावती बेशर्मी के साथ कहती हैं कि… “देश के गरीब शोषित के छोटे-छोटे अनुदान से पार्टी चलती है।” तो देश के “वास्तविक गरीब-शोषित लोग” मेरी आंखों के सामने घूमने लगते हैं।

“कबीर पंथ” से गहन संबंधों की वजह से देश में हुए कबीर पंथियों के तमाम कार्यक्रम में मैं गया। दरभंगा, नेपाल के सिरहा, मधुबनी, छत्तीसगढ़ और हरियाणा समेत कई राज्यों में। कबीर साहेब के लाख से दो लाख तक अनुयायी इन सम्मेलन में जुटते हैं और मैं देखता हूं कि कैसे मायूस चेहरा लिए पुरुष, महिलाएं और बच्चे रुपए, दो रुपए के सिक्के या अधिकतम दस रुपए अपने आचार्यों के सामने रख कर प्रणाम करते हैं। और अधिकतर तो कुछ भी दे सकने की स्थिति में नहीं होते।

किसी भी कार्यक्रम में जुटने वाला धन लाख सवा लाख से ज्यादा नहीं हो पाता। और एक कार्यक्रम में ही पांच से छह लाख खर्च हो जाते हैं। यानि साल भर आचार्यों को मिलने वाले दान से सिर्फ एक कार्यक्रम संभव हो पाता है। समझ में नहीं आता, मायावती के शब्दकोश में गरीब और शोषित जनता से आशय किनसे हैं? कौन हैं ये गरीब और शोषित, जिनसे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमों ने दिल्ली के “कौटिल्य मार्ग” पर आलीशान खोठी खड़ी कर ली? जिसमें पत्थर के हाथी टहल रहे हैं।

नसीमुद्दीन और सुधाकर सिंह जैसे लोग अरबपति हो गए। लिस्ट तो बहुत ही लंबी हैं। मेरे यूपी के पत्रकार और भी नाम जोड़ने में सक्षम हैं। मुद्दा तो यह है कि मायावती के गरीब और शोषितों से मैं मिलना चाहूंगा। अब कोई विद्दान यह दावा करने की हिमाकत ना करे कि कबीर साहेब के अनुयायियों से भी गरीब और शोषित तबका कोई और भी है।

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य के फेसबुक वॉल से.

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बसपा की मान्यता खत्म करने और मायावती व अखिलेश दास पर के खिलाफ एफआईआर की मांग

बसपा अध्यक्ष मायावती तथा राज्य सभा सांसद अखिलेश दास द्वारा लगाए गए आरोप-प्रत्यारोप अब चुनाव आयोग तक पहुँच गए हैं. सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने आज मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों को इस सम्बन्ध में ईमेल द्वारा शिकायत भेज कर इन आरोपों की जांच करने और इन पर तदनुसार कठोर विधिक कार्यवाही करने हेतु निवेदन किया है. उन्होंने कहा कि आईएनसी बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर सहित तमाम निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आयोग को किसी राजनैतिक दल द्वारा देश के स्थापित कानूनों को तोड़ने की दशा में उसे अपंजीकृत करने का अधिकार और दायित्व है, जैसा इस मामले में बसपा पर श्री दास द्वारा आरोपित किया गया है.

उन्होंने यह भी कहा है कि ये आरोप-प्रत्यारोप आईपीसी की धारा 171ई (रिश्वत- एक साल की सजा) और 171एफ (निर्वाचन में असम्यक असर डालना- एक साल की सजा) के तहत अपराध हैं. अतः उन्होंने इस मामले में मायावती तथा श्री दास से पूछताछ कर बसपा और इन दोनों को दोषी पाए जाने की स्थिति तक उनके खिलाफ आपराधिक तथा निर्वाचन विधि में कार्यवाही की मांग की है. नूतन ठाकुर ने बसपा की मान्यता खत्म करने और दोनों मायावती व अखिलेश दास के खिलाफ मुकदमा चलाने का अनुरोध किया है.

Complaint sent by email to the CEC and 2 other ECs–

To,
The Chief Election Commissioner
and other Election Commissioners,
Election Commission of India,
New Delhi

Subject- Immediate enquiry into extremely serious allegations of corrupt practices/bribery by Ms Mayawati and Mr Akhilesh Das

Sir,

1. That I Dr Nutan Thakur, a social activist working in the field of transparency and accountability in governance, present the various news articles as regards the allegations and counter-allegations by Ms Mayawati, President of Bahujan Samaj Party (BSP) and Mr Akhilesh Das, Member of Parliament (MP) in Rajya Sabha as regards corrupt practices being undertaken by them. A few news articles are being attached as Annexure No 1

2. That as per the reliable media reports, on 05/11/2014 (Wednesday) Ms Mayawati said in a Press Conference at BSP Headquarters in Lucknow that Mr Das offered her Rs 100 crores for renominating him to the Upper House. She said-“Akhilesh Das had talked to me in Delhi and had offered money for repeating him as BSP candidate to the Rajya Sabha. Das had said that he was ready to give Rs 50 crores to Rs 100 crores for getting Rajya Sabha ticket saying that as the BSP is out of power now, I would need funds to run the party. Ms Mayawati said she told Mr Das that she would not make him RS candidate even if he offered Rs 200

3. That Mr Das countered Ms Mayawati’s allegations saying he had not offered any money and it was the BSP leadership that extorted money from candidates contesting assembly and parliamentary elections. He said-‘It’s the BSP culture to force MPs, MLAs and office-bearers to cough up funds for the party. It is upto you people to understand who offered and demanded money. She (Mayawati) is famous in America too as far as money is concerned.” He alleged that “in BSP, Rs 50 lakh was being taken from Dalits and Rs 1 crores from prospective candidates who wanted to contest 2017 Assembly polls.” He also alleged that the party had also taken Rs 10 lakhs from office bearers, legislators and MPs during Haryana and Maharastra Assembly elections.

4. That these allegations and counter allegations can be easily watched as various You-tube videos on links like http://www.youtube.com/watch?v=BcWAYfudvBY , http://www.youtube.com/watch?v=fZP74-hivG0  , http://www.youtube.com/watch?v=fb1BTywkPmA  and http://www.youtube.com/watch?v=783BkH8Qzdg.

5. That in each of these videos, both Ms Mayawati and Mr Das are seen making such serious allegations of corruption and bribery.

6. That coming to the legal aspects of the issue, section 29A of the Representation of People’s Act 1951 related with registration with the Election Commission of associations and bodies as political parties says among other things-“(5) The application under sub-section (1) shall be accompanied by a copy of the memorandum or rules and regulations of the association or body, by whatever name called, and such memorandum or rules and regulations shall contain a specific provision that the association or body shall bear true faith and allegiance to the Constitution of India as by law established, and to the principles of socialism, secularism and democracy, and would uphold the sovereignty, unity and integrity of India”, “(7) After considering all the particulars as aforesaid in its possession and any other necessary and relevant factors and after giving the representatives of the association or body reasonable opportunity of being heard, the Commission shall decide either to register the association or body as a political party for the purposes of this Part, or not so to register it; and the Commission shall communicate its decision to the association or body: Provided that no association or body shall be registered as a political party under this sub—section unless the memorandum or rules and regulations of such association or body conform to the provisions of sub—section (5)” and “(8) The decision of the Commission shall be final.”

7. That as per section 29B of the RP Act 1951, Subject to the provisions of the Companies Act, 1956 (1 of 1956), every political party may accept any amount of contribution voluntarily offered to it by any person or company other than a Government company

8. That as per section 29C of RP Act 1951,  the treasurer of a political party or any other person authorised by the political party in this behalf shall, in each financial year, prepare a report in respect of the following, namely:—(a) the contribution in excess of twenty thousand rupees received by such political party from any person in that financial year;(b) the contribution in excess of twenty thousand rupees received by such political party from companies other than Government companies in that financial year

9. That section 171B in the Indian Penal Code says-“(1) Whoever— (i) gives a gratification to any person with the object of induc­ing him or any other person to exercise any electoral right or of rewarding any person for having exercised any such right; or (ii) accepts either for himself or for any other person any gratification as a reward for exercising any such right or for inducing or attempting to induce any other person to exercise any such right; commits the offence of bribery: Provided that a declaration of public policy or a promise of public action shall not be an offence under this section. (2) A person who offers, or agrees to give, or offers or attempts to procure, a gratification shall be deemed to give a gratifica­tion. (3) A person who obtains or agrees to accept or attempts to obtain a gratification shall be deemed to accept a gratification, and a person who accepts a gratification as a motive for doing what he does not intend to do, or as a reward for doing what he has not done, shall be deemed to have accepted the gratification as a reward.

10. That section 171C says-“ Undue influence at elections.— (1) Whoever voluntarily interferes or attempts to interfere with the free exercise of any electoral right commits the offence of undue influence at an election. (2) Without prejudice to the generality of the provisions of sub-section (1), whoever— (a) threatens any candidate or voter, or any person in whom a candidate or voter is interested, with injury of any kind, or (b) induces or attempts to induce a candidate or voter to believe that he or any person in whom he is interested will become or will be rendered an object of Divine displeasure or of spiritual censure, shall be deemed to interfere with the free exercise of the elec­toral right of such candidate or voter, within the meaning of sub-section (1).

11. That section 171E is Punishment for bribery.—Whoever commits the offence of bribery shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to one year, or with fine, or with both: Provided that bribery by treating shall be punished with fine only

12. That section 171F is Punishment for undue influence or personation at an elec­tion.—Whoever commits the offence of undue influence or persona­tion at an election shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to one year or with fine, or with both.

13. That from the above legal positions, it is clear that-

14. (a) The Election Commission of India (Commission, for short) has the final right and duty to get a political party registered under section 29A of RP Act

15. (b) Every political party needs to bear true faith and allegiance to the Constitution of India as by law established

16. That in Kerala Vyapari Vavasayi Ekopana … vs State Of Kerala And Ors (AIR 2000 Ker 389) the Hon’ble Kerala High Court through its order dated 01/06/2000 had said-“Once an association or body of individual citizens thus get a registration under the Act, holding out that the body shall bear true faith and allegiance to the Constitution of India and to the principles of socialism, secularism and democracy and would uphold the sovereignty, unity and integrity of India, obviously, that association or body is bound to respect the law declared by the Supreme Court and the verdict of the apex Court…” and that-“The argument of counsel for the Election Commission that there is only a power in the Election Commission to register and there is no power to de-register has only to be stated to be rejected. It is clear that whenever a power to do something is conferred on a body, there is also conferred on that body the power to undo the same.”

17. That the Hon’ble Supreme Court in Petition for Special Leave to Appeal (Civil) No. 8738 of 1992 had said-“With respect, we cannot understand the said dismissal as laying down any law that the Election Commission has no power to initiate action under Section 29A of the Act in appropriate cases and deregister or withdraw the registration given to a party or association of persons if circumstances are made out justifying such withdrawal. We cannot agree with the stand adopted by the Chief Election Commissioner that he has no power to enquire into such complaints and he could act only under the circumstances he has referred to in his order in that case. The Election Commission can act as sentinel to ensure respect to the Constitution and democracy by the associations or parties registered under the Act.”

18. That the Hon’ble Supreme Court in Indian National Congress (I) vs Institute Of Social Welfare & Ors (Appeal (civil) 3320-21 of 2001), where through their order dated on 10/05/2002 they said-“The foremost question that arises in this group of appeals is whether the Election Commission of India under Section 29A of the Representation of the People Act, 1951 (hereinafter referred to as the ‘Act’) has power to de-register or cancel the registration of a political party on the ground that it has called for hartal by force, intimidation or coercion and thereby violated the provisions of the Constitution of India” and that-“We are, therefore, of the view that unless there is express power of review conferred upon the Election Commission, the Commission has no power to entertain or enquire into the complaint for de-registering a political party for having violated the Constitutional provisions. However, there are three exceptions where the Commission can review its order registering a political party. One is where a political party obtained its registration by playing fraud on the Commission, secondly it arises out of sub-section (9) of Section 29A of the Act and thirdly, any like ground where no enquiry is called for on the part of the Election Commission, for example, where the political party concerned is declared unlawful by the Central Government under the provision of the Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967 or any other similar law”

19. That the above orders of the Hon’ble Kerala High Court and the Hon’ble Supreme Court make it mandatory for the Commission to enquire into serious allegations of corruption alleged against the Bahujan Samaj Party under Ms Mayawati and to take appropriate action, including deregistering the party if the allegations made by Mr Akhilesh Das are found true

20. That on the other hand, the allegations made by Ms Mayawati against Mr Akhilesh Das very apparently fall under sections 171E (Punishment for bribery—imprisonment of one year) and section 171F (Punishment for undue influence- imprisonment of one year) because the contents of the allegations of Ms Mayawati fit exactly in the definition of section 171B and section 171C

21. That both these offences are Non-cognizable and bailable

22. That hence in the light of the above facts, the petitioner prays that the allegations made by Ms Mayawati and Mr Akhilesh Das, as presented in the petition and as narrated in the You-tube video links, be immediately enquired into by the Commission by questioning and/or interrogating both Ms Mayawati and Mr Das and legal actions (both necessary criminal and electoral- as per the Indian Penal Code and the Representation of People’s Act 1951, including de-registration of Bahujan Samaj Party and registration of offences against Ms Mayawati and/or Mr Akhilesh Das) be taken as per the facts obtained through the enquiry undertaken by the Commission

23. That it is kindly prayed that the matter being extremely sensitive and important, the enquiry be undertaken as soon as possible, say within a period of two months from the date of receipt of this petition

Lt No- NT/Complaint/14/14
Dated- 06/11/2014                                                                                              

Regards,
Yours,
Dr Nutan Thakur
5/426, Viram Khand,
Gomti Nagar, Lucknow
# 094155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

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सपा राष्ट्रीय अधिवेशन में बसपा पर चुप्पी का मतलब किसी को समझ नहीं आया

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन का पहला दिन अपने पीछे कई खट्टे-मीठे अनुभव छोड़ गया। उम्मीद के अनुसार मुलायम सिंह यादव को नौंवी बार अध्यक्ष चुने जाने की औपचारिकता पूरी करने के अलावा अगर कुछ खास देखने और समझने को मिला तो वह यही था कि समाजवादी नेताओं ने यह मान लिया है कि अब उनकी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के साथ ही होगी। यही वजह थी वक्ताओं ने भाजपा और खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर खूब तंज कसे। इसके साथ ही समाजवादी मंच से एक बार फिर तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट भी सुनाई दी। जनता दल युनाइटेड(जेडीयू) के अध्यक्ष शरद यादव की उपिस्थति ने इस सुगबुगाहट को बल दिया। मुलायम के अध्यक्षीय भाषण के बाद शरद यादव बोलने के लिये खड़े हुए तो उनके तेवर यह अहसास करा रहे थे कि दोनों यादवों को एक-दूसरे की काफी जरूरत है।

बात मुलायम के भाषण की कि जाये तो उन्होंने अखिलेश सरकार के कामों के खूब कसीदे पढ़े। इसके साथ उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि हम अपने कामों का प्रचार नहीं कर पाये। सपा प्रमुख ने डॉ. लोहिया के विचारों, लखनऊ की हिन्दू-मुस्लिम एकता, अल्पसंख्यकों का समाजवादी पार्टी के प्रति विश्वास, मोदी सरकार की नाकामी सहित तमाम मुद्दों को उठाया। गुजरात दंगों की याद ताजा करके और गुजरात के मुस्लिमों के दर्द से अपने आप को जोड़ने की कोशिश लोकसभा चुनाव की तरह नेताजी यहां भी करते नजर आये। उन्होंने यह भी बताया कि दंगों के बाद उन्होंने गुजरात जाकर मुस्लिमों के हालात का जायजा लिया था। मोदी पर तंज करते हुए सपा प्रमुख ने कहा कि मोदी को मुझसे बात करने के लिये छप्पन इंच का सीना चाहिए।

मुलायम अपने पुराने साथी शरद यादव की उपस्थिति से गद्गद नजर आये और पुराने साथियों के साथ आने पर मुलायम खुशी का इजहार करने से नहीं चूके। मुलायम के अध्यक्ष चुनने के बाद उम्मीद है कि समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय और उत्तर प्रदेश कार्यकारिणी का जल्द पुर्नगठन किया जायेगा। समाजवादी नेताओं का पूरा फोकस 2017 के चुनावों के इर्दगिर्द घूमता रहा।

बात शरद यादव की कि जाये तो उन्होंने मंहगाई, कालाधन, बेरोजगारी जैसी तमाम समस्याओं पर मोदी सरकार की घेराबंदी करने का भरपूर प्रयास किया। सपा को शरद यादव ने गरीबों की पार्टी बताया। बाबा साहब अम्बेडकर के कामों की चर्चा की। मंच पर सपा के सभी बड़े नेता अखिलेश यादव, शिवपाल यादव,आजम खां, राम गोपाल यादव मौजूद थे। सांसद और अभिनेत्री जया बच्चन भी अधिवेशन में मंच पर नजर आईं।

मुलायम के अध्यक्ष चुने जाने के बाद यह तय हो गया है कि 2017 का चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जायेगा। मुलायम के बाद अधिवेशन में जिसकी सबसे अधिक चर्चा हो रही थी वह युवा नेता और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे। बसपा को लेकर समाजवादी पार्टी की चुप्पी का मतलब किसी को समझ में नहीं आया।

खैर, इन सब बातों के बीच यह अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि सपा ने अधिवेशन के प्रचार-प्रचार के लिये पानी की तरह पैसा बहाया। पूरा शहर बडे़-बड़े होल्डिंग से पाट दिया गया। गरीबों की पार्टी का दम भरने वाले समाजवादी लग्जरी गाडि़यों में घूमते नजर आये।

 

 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं और यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं। अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं।

 

 

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