मायावती का धर्म परिवर्तन राजनीति से प्रेरित!

लखनऊ : ‘मायावती का धर्म परिवर्तन राजीनीति से प्रेरित है.’ यह बात आज एस. आर. दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक जनमंच उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उनका कहना है कि मायावती की धर्म परिवर्तन की धमकी के पीछे उसके दो उद्देश्य हैं- एक तो भाजपा जो हिंदुत्व की राजनीति कर रही है पर दबाव बनाना और दूसरे हिन्दू धर्म त्यागने की बात कह कर दलितों को प्रभावित करना.  मायावती की इस धमकी से बीजेपी और हिन्दुओं पर कोई असर होने वाला नहीं है क्योंकि हिन्दू तो बुद्ध को विष्णु का अवतार और बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म का एक पंथ मानते है.

गठबंधन की कोशिशों पर बहनजी का ग्रहण, माया के एक दांव से ढेर सारे धुरंधर हुए धराशायी

अजय कुमार, लखनऊ

बिहार की सत्ता से बेदखल होने के बाद लालू एंड फेमली जख्मी शेर की तरह दहाड़ रही है। उसको सपनों में भी मोदी-नीतीश दिखाई देते हैं। नीतीश के मुंह फेरने से लालू के दोनों बेटे आसमान से जमीन पर आ गिरे। सत्ता का सुख तो जाता रहा ही, सीबीआई भी बेनामी सम्पति मामले में लालू परिवार के पीछे हाथ धोकर पड़ गई है। ऐसे में लालू का तमतमा जाना बनता है। चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव ने बिहार खोया तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश, मायावती और कांग्रेस के सहारे वह मोदी को पटकनी देने की राह तलाशने में लग गये। वैसे भी लालू लम्बे समय से उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन की वकालत करते रहे हैं।

मायावती से तीखा सवाल पूछने वाली उस लड़की का पत्रकारीय करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया!

Zaigham Murtaza : अप्रैल 2002 की बात है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। मायावती की सत्ता में वापसी की आहट के बीच माल एवेन्यु में एक प्रेस वार्ता हुई। जोश से लबरेज़ मैदान में नई-नई पत्रकार बनी एक लड़की ने टिकट के बदले पैसे पर सवाल दाग़ दिया। ठीक से याद नहीं लेकिन वो शायद लार क़स्बे की थी और ख़ुद को किसी विजय ज्वाला साप्ताहिक का प्रतिनिधि बता रही थी। सवाल से रंग में भंग पड़ गया। वहां मौजूद क़रीब ढाई सौ कथित पत्रकार सन्न।

हरिशंकर तिवारी के यहां दबिश पर विधानसभा से वाकआउट करने वाली मायावती सहारनपुर के दलित कांड पर चुप क्यों हैं?

लखनऊ : “मायावती की सहारनपुर के दलित काण्ड पर चुप्पी क्यों?” यह बात आज एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व आई.जी. व प्रवक्ता उत्तर प्रदेश जनमंच एवं सस्यद, स्वराज अभियान ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उनका कहना है कि एक तरफ जहाँ मायावती हरीशंकर तिवारी के घर पर दबिश को लेकर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष को गोरखपुर भेजती है और विधान सभा से वाक-आऊट कराती है वहीं मायावती सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में दलितों पर जाति-सामंतों द्वारा किये गए हमले जिस में दलितों के 60 घर बुरी तरह से जला दिए गए, 14 दलित औरतें, बच्चे तथा बूढ़े लोग घायल हुए में न तो स्वयम जाती है और न ही अपने किसी प्रतिनिधि को ही भेजती है. वह केवल एक सामान्य ब्यान देकर रसम अदायगी करके बैठ जाती है.

नोटबंदी के बाद पार्टी एकाउंट में करोड़ों जमा कराने को लेकर चुनाव आयोग ने बसपा को दी भारी राहत

बहुजन समाज पार्टी द्वारा नोटबंदी के बाद दिल्ली के करोल बाग़ स्थित यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के अपने पार्टी अकाउंट में 02 दिसंबर से 09 दिसंबर 2016 के बीच 104 करोड़ रुपये के पुराने नोट जमा कराये जाने के सम्बन्ध में निर्वाचन आयोग ने पार्टी को भारी राहत दी है. इस सम्बन्ध में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में पीआईएल दायर करने वाले प्रताप चंद्रा की अधिवक्ता डॉ नूतन ठाकुर ने बताया कि निर्वाचन आयोग ने 29 अगस्त तथा 19 नवम्बर 2014 द्वारा वित्तीय पारदर्शिता सम्बन्धी कई निर्देश पारित किये थे.

मायावती और नसीमुद्दीन के बीच बातचीत के सारे टेप एक जगह सुनें

ये भी पढ़ें … मायावती विरोध में खबर लिखने / दिखाने वालों की हत्या की साजिश रचती थीं : नसीमुद्दीन सिद्दीकी (सुनें टेप) xxx …तो क्या तत्कालीन आईबीएन7 के यूपी हेड शलभ मणि त्रिपाठी को मारने की साजिश थी? कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बहनजी हार का कारण खुद को बतातीं तो समर्थक टूट जाते, इसलिए EVM को दुश्मन बनाया!

मायावती के निशाने पर ईवीएम के मायने… राजनीति में अक्सर ईवीएम को मोहरा बना दिया जाता है…  बीएसपी की हार से नाखुश दिख रहे दलित हितों को प्रमुखता से उठाने वाले एक संपादक ने मुझसे निजी बातचीत में बहन मायावती जी रवैये पर खासी नाराजगी जाहिर की. कहा, हार के कारणों की सही से समीक्षा नहीं होगी, तो ईवीएम को गलत ठहराने से बहुजन समाज पार्टी का कुछ भी भला नहीं होगा. बहन जी से मिलकर सबको सही बात बतानी चाहिए, भले ही उसमें अपना घाटा ही क्यों ना हो जाये. मैंने अपने संपादक मित्र से इस मामले पर एक घटना का जिक्र किया. जिसे आपके लिए भी लिख रहा हूं.

मायावती का दलित वोट बैंक क्यों खिसका?

हाल में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनाव में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी की बुरी तरह से हार हुयी है। इस चुनाव में उसके बहुमत से सरकार बनाने के दावे के विपरीत उसे कुल 19 सीटें मिली हैं जिनमें शायद केवल एक ही आरक्षित सीट है। उसके वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आयी है। एनडीटीवी के विश्लेषण के अनुसार इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा को दलित वोटों का केवल 25% वोट ही मिला है जबकि इसके मुकाबले में सपा को 26% और भाजपा को 41% मिला है। दरअसल 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 22% पर पहुँच गया है। इसी अनुपात में बसपा के दलित वोटबैंक में भी कमी आयी है। अभी तो बसपा के वोटबैंक में लगातार आ रही गिरावट की गति रुकने की कोई सम्भावना नहीं दिखती। मायावती ने वर्तमान हार की कोई ईमानदार समीक्षा करने की जगह ईवीएम में गड़बड़ी का शिगूफा छोड़ा है। क्या इससे मायावती इस हार के लिए अपनी जिम्मेदारी से बच पायेगी या बसपा को बचा पायेगी?

मायावती का खेल खत्म ही समझो : कंवल भारती

याद कीजिये मेरी 26 जनवरी की इस पोस्ट को…

”आज बसपा के एक जमीनी नेता से बात हुई, वह बहिन मायावती से बहुत नाराज दिखे. उन्होंने अपनी नाराजगी में दो सवाल तुरंत दाग दिए- 1. जब बहिन जी ने अंसारी बंधुओं को टिकट देने में कोई संकोच नहीं किया तो स्वामी प्रसाद मौर्य को तीन टिकट क्यों नही दिए, जबकि वह बीस साल से उनके साथ था? 2. मुसलमानों को 97 टिकट किस राजनीति के तहत दिए, जबकि यह स्पस्ट है कि वे मुस्लिम वोट ही डिवाइड करेंगे, और उसका लाभ भाजपा को होगा. मैंने कहा, आप कहना क्या चाहते हैं? उन्होंने जवाब दिया, बहिन जी भाजपा के दबाव में हैं. और वह अपने भाई को बचाने के लिए भाजपा की तरफ से खेल रही हैं. उन्होंने यहाँ तक कहा कि भाजपा ने सुरक्षित सीटों पर सबसे ज्यादा जाटव और चमार जाति के लोगों को ही टिकट दिए हैं. बोले, पूछो क्यों? मैंने कहा, क्यों? वह बोले, इसलिए कि बसपा का वोट डिवाइड हो, और वह कमजोर हो. मैंने कहा, फिर? वह बोले, फिर क्या, बसपा खत्म.”

मीडिया ने बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को चुनावी लड़ाई से बाहर कर दिया!

Ashwini Kumar Srivastava : अद्भुत है मीडिया और उसमें काम कर रहे तथाकथित पत्रकार। वरना बसपा और मायावती जैसी कद्दावर ताकत को ही इस बार के चुनाव में लड़ाई से बाहर कैसे कर देता! वैसे मुझे तो इसका कोई आश्चर्य नहीं है। क्योंकि एक दशक से भी ज्यादा वक्त तक दिल्ली और लखनऊ में देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थानों में बतौर पत्रकार नौकरी करने के बाद मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि ख़बरें और सर्वे कैसे बनाये-बिगाड़े जाते हैं। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण भी मैं अपने ही निजी अनुभव से आगे बताऊंगा। लेकिन सबसे पहले बात बसपा और मायावती की करते हैं।

क्या मायावती का दलित वोट बैंक खिसका है?

पिछले लोक सभा चुनाव के परिणामों पर मायावती ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था  कि उन की हार के पीछे मुख्य कारण गुमराह हुए ब्राह्मण, पिछड़े और मुसलमान समाज द्वारा वोट न देना है जिस के लिए उन्हें बाद में पछताना पड़ेगा. इस प्रकार मायावती ने स्पष्ट तौर पर मान लिया था कि उस का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला फेल हो गया है. मायावती ने यह भी कहा था कि उस की हार के लिए उसका यूपीए को समर्थन देना भी था.

एक ‘छुपा रूस्तम’ दल बसपा

संजय सक्सेना, लखनऊ

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) को उत्तर प्रदेश की सियासत का ‘छुपा रूस्तम’ कहा जाता है। चुनावी मौसम में अन्य दलांे की अपेक्षा बीएसपी के बारे में यह आंकलन करना मुश्किल होता है कि वह क्या गुल खिलायेगी। शहरी एंव गॉव-देहात के दबे-कुचलों की पार्टी समझी जाने वाली बीएसपी के समर्थकों की पहचान यही है कि वह तो न मीडिया के सामने अपना मुंह खोलते हैं न आम चर्चा में अपने दिल की बात जुबा पर लाते हैं। इसका कारण सदियों पुरानी मनुवादी शक्तियां को लेकर उनका भय और समाज में व्याप्त पिछड़ापन जैसे तमाम कारण गिनाये जा सकते है। लगभग 20 प्रतिशत दलित समाज को सियासत की मुख्यधारा में लाने के लिये बसपा ने भले ही काफी काम किया हो, लेकिन इस समाज का सामाजिक उद्धार करने की रूचि मान्यवर कांशीराम के बाद बसपा ने भी नहीं दिखाई।

मायावती ने आजमगढ़ में बसपा की रैली में नरेंद्र मोदी को साबुन लगा लगा कर खूब धोया…

यह मोदी सरकार भी कम घोटालेबाज नहीं है : मायावती

Yashwant Singh : मायावती ने आजमगढ़ में बसपा की रैली में नरेंद्र मोदी को साबुन लगा लगा कर खूब धोया… लाखों की भीड़ से बार बार पूछा कि महंगाई घटी, राशन सस्ता हुआ, नौकरी मिली, मकान मिला, रुपया एकाउंट में आया… जनता ने हर बार ना कहा. व्यापम घोटाला, विजय माल्या घोटाला, ललित मोदी घोटाला, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के घोटालों का जिक्र कर मायावती ने बताया कि यह मोदी सरकार भी कम घोटालेबाज नहीं है.

इस दलित-स्त्री विमर्श के स्वर्णकाल ने एक 12 साल की बच्ची को डॉक्टर के पास पहुंचा दिया

12 साल की है ये बच्ची। लेकिन, दलित नहीं है। किसी राजनीतिक दल के समर्थक भी इसके पीछे नहीं हैं। इसके पिता दयाशंकर सिंह भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष थे। एक शर्मनाक बयान दिया। उस पर तय से ज्यादा प्रतिक्रिया हुई। संसद भी चल रही थी। मोदी के गुजरात में दलितों पर कुछ अत्याचार की घटनाएं आ रही थीं। मामला दलित विमर्श के लिए चकाचक टाइप का था। उस पर महिला विमर्श भी जुड़ा, तो चकाचक से भी आगे चमत्कारिक टाइप की विमर्श की जमीन तैयार हो गई। सारे महान बुद्धिजीवी मायावती की तुलना भर से आहत हैं। देश उबल रहा है। दलित-स्त्री विमर्श अपने स्वर्ण काल तक पहुंच गया है। इस दलित-स्त्री विमर्श के स्वर्णकाल में एक 12 साल की बच्ची को डॉक्टर के पास पहुंचा दिया।

आरके चौधरी ने बसपा को गुडबॉय कहा, माया को लगा फिर बड़ा झटका

लखनऊ से ब्रेकिंग न्यूज ये आ रही है कि BSP प्रमुख मायावती को लगा एक और झटका. BSP के संस्थापक सदस्य और राष्ट्रीय महासचिव आरके चौधरी ने दिया इस्तीफा. BSP के संस्थापक कांशीराम के बेहद क़रीबी थे आरके चौधरी. माया सरकार में कई बार कैबिनेट मंत्री रहे हैं आरके चौधरी. हाल में ही बसपा छोड़ने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य एक मीटिंग करने वाले हैं. इस मीटिंग से ठीक पहले BSP को आरके चौधरी के इस्तीफे के रूप में एक और झटका लग गया है.

अखिलेश के मुंह में माइक घुसेड़कर सवाल पूछने वाले मीडियाकर्मी मायावती से 15 फीट दूर रखते हैं माइक!

Syed Yasir Raza Jafri : वाकई में क्या टेरर है। मान गया भाई। मायावती के बारे में आप सबने खूब सुना होगा और देखा भी होगा। वैसे तो मैंने भी मायावती की कई प्रेस कांफ्रेंस अटेंड की है, लेकिन बुधवार को ऐसा पहली बार हुआ जब स्वामी प्रसाद मौर्य के पार्टी से अलग होने के एलान के बाद आनन फानन में मायावती ने कोई प्रेस कांफ्रेंस बुलायी जिसमें मैं भी पहुंचा। मायावती की बेचैनी मेरे साथ मायावती के घर में दाखिल होते बृजेश पाठक के चेहरे पर साफ झलक रही थी। शायद उन्हें भी प्रेस वालों की ही तरह तत्काल आने के निर्देश दिये गये थे।

अदभुत हैं मायावती!

Abhishek Upadhyay : अदभुत हैं मायावती। बिजली की तेज़ी से फैसले लेती हैं। जिससे दुश्मनी ली। उसे खुद ही ठीक कर दिया। क्या स्वामी प्रसाद मौर्या। कौन बाबू सिंह कुशवाहा। कोई आहरी-बाहरी मदद नही। कोई ईआर/पीआर फर्म नही। कोई कॉर्पोरेट लॉबिस्ट साथ नही। किसी ईके/पीके (प्रशांत किशोर) की भी ज़रूरत नही। राजनीति रिश्ते बनाने का खेल है। मैंने मायावती के तौर पर पहला ऐसा राजनीतिज्ञ देखा है जो बिगड़े रिश्तों का मुंह हमेशा उल्टा ही रखता है। कभी कोई समझौता नही। मुलायम से दुश्मनी है तो खुलकर है। क्या मजाल कि नेता जी संसद में बहन जी से आँख भी मिला लें।

बसपा ने तय किया मिशन-2017 एजेंडा

अजय कुमार, लखनऊ

बसपा सुप्रीमों मायावती ने मिशन 2017 के आगाज के साथ ही सियासी एजेंडा भी तय कर दिया हैै। दलितों को लुभाने के लिये बसपा बड़ा दांव चलेगी तो मुसलमानों को मोदी-मुलायम गठजोड़ से बच के रहने को कहा जायेगा।  प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था, किसानों की दुर्दशा, बुंदेलखंड की बदहाली को अखिलेश सरकार के विरूद्ध हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जायेगा। एकला चलो की राह पर  बीएसपी केन्द्र की सत्ता पर काबिज बीजेपी को नंबर वन का दुश्मन मानकर चलेगी तो प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को नंबर दो पर रखा गया है। नंबर तीन पर कांग्रेस सहित अन्य वह छोटे-छोटे दल रहेंगे जिनका किसी विशेष क्षेत्र में दबदबा है। बसपा हर ऐसे मुद्दे को हवा देगी जिससे केन्द्र और प्रदेश सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा सके।  विधान सभा के बजट सत्र और इससे पूर्व के सत्रों मे बसपा नेताओं ने जिस तरह के तीखे तेवर दिखाये उससे यह बात समझने में किसी को संदेह नहीं बसपा सड़क से लेकर विधान सभा तक में अपने लिये राजनैतिक बढ़त तलाश रही है। 

बेइन्तहा पैसे वाली हो गई डाक कर्मचारी की बेटी मायावती पर टिकट बेचने को लेकर चौतरफा हमला :

: बसपा से बिदकते नेताओं की भाजपा पहली पसंद : बसपा सुप्रीमो मायावती के ऊपर एक बार फिर टिकट बेचने का गंभीर आरोप लगा है।यह आरोप भी पार्टी से निकाले गये बसपा के एक कद्दावर नेता ने ही लगाया है।मायावती के विरोधियों और मीडिया में अक्सर यह चर्चा छिड़ी रहती है कि बसपा में टिकट वितरण में खासकर राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में पार्दशिता नहीं दिखाई पड़ती है। विपक्ष के आरोपों को अनदेखा कर भी दिया जाये तो यह बात समझ से परे हैं कि बसपा छोड़ने वाले तमाम नेता मायावती पर टिकट बेचने का ही आरोप क्यों लगाते हैं। किसी और नेता या पार्टी को इस तरह के आरोप इतनी बहुतायत में शायद ही झेलने पड़ते होंगे। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि धुआ वहीं से उठता है जहां आग लगी होती है। आरोप लगाने वाले तमाम नेताओं की बात को इस लिये भी अनदेखा नहीं किया क्योंकि यह सभी नेता लम्बे समय तक मायावती के इर्दगिर्द रह चुके हैं और उनकी कार्यशैली से अच्छी तरह से परिचित हैं।

2017 का विधानसभा चुनाव जातिवादी राजनीति के सहारे नहीं जीता जा सकेगा, अखिलेश यादव को अहसास हो गया

अजय कुमार, लखनऊ

एक वर्ष और बीत गया। समाजवादी सरकार ने करीब पौने तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है। 2014 सपा को काफी गहरे जख्म दे गया। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार ने धरती पुत्र मुलायम को हिला कर रख दिया। पार्टी पर अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है। अगर जल्द अखिलेश सरकार ने अपना खोया हुआ विश्वास हासिल नहीं किया तो 2017 की लड़ाई उसके लिये मुश्किल हो सकती है। अखिलेश के पास समय काफी कम है। भले ही लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के पश्चात समाजवादी सरकार ने अपनी नीति बदली ली है, लेकिन संगठन वाले उन्हें अभी भी पूरी आजादी के साथ काम नहीं करने दे रहे हैं। सीएम अखिलेश यादव अब मोदी की तरह विकास की बात करने लगे हैं लेकिन पार्टी में यह बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। मुलायम अभी भी पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। निश्चित ही 2015 खत्म होते ही तमाम दलों के नेता चुनावी मोड में आ जायेंगे। भाजपा तो वैसे ही 2017 के विधान सभा चुनावों को लेकर काफी अधीर है, बसपा और कांग्रेस भी उम्मीद है कि समय के साफ रफ्तार पकड़ लेगी। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस ही नहीं सपा-बसपा भी 2014 में अर्श से फर्श पर आ गये।

मायावती के दबाव में बनी डीएसपी धीरेन्द्र राय के खिलाफ रिपोर्ट : अमिताभ ठाकुर

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने आज डीएसपी धीरेन्द्र राय को पत्र भेज कर रिटायर्ड आईपीएस बद्री प्रसाद सिंह द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के दवाब के कारण उनके खिलाफ रिपोर्ट लिखने के बारे में बताया है. ठाकुर ने कहा है बद्री प्रसाद ने पूर्व डीजी बृजलाल के ऑफिस में स्वयं बताया था कि वे इस मामले में जांच अधिकारी थे. तत्कालीन डीजीपी करमवीर सिंह और प्रमुख सचिव गृह फ़तेह बहादुर सहित सभी पुलिस और गृह विभाग के सभी अफसर चाहते थे कि ठोकिया द्वारा पुलिसकर्मियों की हत्या मामले में धीरेन्द्र राय दण्डित नहीं हों क्योंकि उनकी कोई गलती नहीं थी.

यादव सिंह ने समाजवादी नेता मुलायम और दलित नेता मायावती दोनों का साध लिया था

Nadim S. Akhter : असली शेर तो -यादव सिंह- निकले. एक साथ बहन मायावती और समाजवादी नेताजी मुलायम सिंह यादव, दोनों को साध लिया. अनेकता में एकता का -सूत्र- यादव सिंह जी से सीखिए. उनसे जानिए कि सरकार -दलितों- की हो, या -समाजवादियों- की या फिर किसी भी -वाद- वाले की, सबकी आंखों का तारा कैसे बना जाता है. आपके पास क्वालिफेकेशन हो ना हो, डिग्री हो ना हो, वैधानिक योग्यता हो ना हो, लेकिन अगर -जुगाड़ योग्यता- और -लक्ष्मी योग्यता- है तो इस सठिया चुके लोकतंत्र में और Media bombardment के युग में भी आप सबकी नाक के नीचे आराम से मलाई काट सकते हैं.

हैरानी तब होती है जब मायावती बेशर्मी के साथ कहती हैं कि….

Sumant Bhattacharya : अरबों रुपए देने वाले ये कौन हैं मायावती के शोषित और गरीब… जब मायावती कहती हैं कि राज्यसभा पहुंचाने के एवज में अखिलेश दास ने मुझे 100 करोड़ का प्रस्ताव दिया तो मुझे कोई हैरानी नहीं हुई। हैरानी तब होती है जब मायावती बेशर्मी के साथ कहती हैं कि… “देश के गरीब शोषित के छोटे-छोटे अनुदान से पार्टी चलती है।” तो देश के “वास्तविक गरीब-शोषित लोग” मेरी आंखों के सामने घूमने लगते हैं।

मायावती कभी मुख्यमंत्री बन गईं तो अखिलेश दास से सौ करोड़ का सौ गुना यानी एक खरब से भी ज्यादा दुह लेंगी!

Kumar Sauvir : मायावती ने एलान किया कि अखिलेश दास ने राज्यसभा की मेम्बरी के लिए बसपा को सौ करोड़ रुपया देने की पेशकश की थी। अखिलेश दास ने इस आरोप को ख़ारिज किया और कहा कि उन्होंने कभी भी एक धेला तक नहीं दिया। हालांकि सभी जानते हैं कि अखिलेश दास के पास बेहिसाब खज़ाना है। बस, वो खर्च तब ही लुटाते हैं जब उनकी कोई कर्री गरज फंसी होती हो। लखनऊ वालों को खूब याद है की लखनऊ संसदीय सीट के चुनाव की तैयारी में अखिलेश दास ने रक्षाबंधन, दीवाली, भैया दूज, होली, ईद-बकरीद तो दूर, करवा-चौथ तक के मौके पर घर-घर मिठाई और तोहफों के पैकेट भिजवाने के लिए सैकड़ों कार्यकर्ताओं की टीम तैनात कर रखी थी।

माया की इस मासूमियत पर कौन यकीन करेगा कि मिल रहा इतना सारा पैसा वह ठुकरा दें

Dayanand Pandey : मायावती और अखिलेश दास की आज हुई अंत्याक्षरी में मायावती ने कहा कि अखिलेश दास राज्य सभा सदस्यता कंटीन्यू करने के लिए उन्हें दो सौ करोड़ तक देने को तैयार थे फिर भी उन्होंने मना कर दिया। एक तो राज्य सभा सदस्यता की कीमत अभी इतनी मंहगी हुई नहीं है। दूसरे मायावती की इस मासूमियत पर भला यकीन करेगा कौन? कि मिल रहा इतना सारा पैसा भी वह भूल कर ठुकरा दें! रही बात अखिलेश दास की तो उन्हों ने यह तो बताया कि मायावती विधायक के टिकट खातिर दस लाख लेती हैं जब कि लोक सभा के टिकट खातिर एक करोड़ तक लेती हैं।

बसपा की मान्यता खत्म करने और मायावती व अखिलेश दास पर के खिलाफ एफआईआर की मांग

बसपा अध्यक्ष मायावती तथा राज्य सभा सांसद अखिलेश दास द्वारा लगाए गए आरोप-प्रत्यारोप अब चुनाव आयोग तक पहुँच गए हैं. सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने आज मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों को इस सम्बन्ध में ईमेल द्वारा शिकायत भेज कर इन आरोपों की जांच करने और इन पर तदनुसार कठोर विधिक कार्यवाही करने हेतु निवेदन किया है. उन्होंने कहा कि आईएनसी बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर सहित तमाम निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आयोग को किसी राजनैतिक दल द्वारा देश के स्थापित कानूनों को तोड़ने की दशा में उसे अपंजीकृत करने का अधिकार और दायित्व है, जैसा इस मामले में बसपा पर श्री दास द्वारा आरोपित किया गया है.