चीन से तिब्बत अपने अहिंसात्मक संघर्ष से उसी तरह आजाद होगा जैसे अंग्रेजों के चंगुल से भारत मुक्त हुआ : डॉ. लोबसांग सांगे

आचार्य कृपलानी स्मृति व्याख्यान- 2016

नई दिल्ली। शक्तिशाली चीनी ताकत से तिब्बत अपने अहिंसात्मक संघर्ष के जरिए उसी तरह स्वतंत्र होकर रहेगा जैसे भारत, दक्षिण अफ्रीका आदि ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्र हो गए। यह बात तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. लोबसांग सांगे ने आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित ‘आचार्य कृपलानी स्मृति व्याख्यान’ में बोलते हुए कही। डॉ. सांगे ने गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘तिब्बत का संकट और भारतीय नेतृत्व’ विषय पर बोलते हुए कहा कि तिब्बत की मुक्ति न केवल तिब्बत के हित में है बल्कि भारत और दुनिया के हित में भी है। उन्होंने कारण गिनाते हुए कहा कि तिब्बत में प्राकृतिक संसाधनों का चीन द्वारा जिस बर्बर तरीके से शोषण-दोहन-खनन हो रहा है, उससे तिब्बतियों का भविष्य तो दुरूह हुआ ही है, भारत के लोगों पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

ब्रह्मपुत्र समेत दुनिया की दस बड़ी नदियों में शुमार नदियां तिब्बत से गुजरती हैं। इन पर बड़े-बड़े बांध बनाकर चीन उनके पानी को रोक रहा है। ब्रह्मपुत्र पर बांध बनने से तो पूर्वोतर भारत समेत बांग्लादेश तक में जल संकट आ गया है। उन्होंने कहा कि तिब्बत में अत्यधिक खनन से ग्लोबल वार्मिंग में इजाफा हो रहा है और जलवायु प्रभावित हो रही है। दूसरी ओर चीन में साफ पेयजल का भयंकर अकाल है। चीनी नीति के कारण वहां की 40 प्रतिशत आबादी को साफ पानी उपलब्ध नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि जलवायु, संस्कृति, भूगोल के स्तर पर तिब्बत भारत के अधिक निकट रहा है बनिस्पत चीन के। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाले विद्वानों को याद कर उन्होंने भारत को तिब्बत का गुरू बताया। अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे डॉ. सांगे ने दुनिया भर के नेताओं से तिब्बत के प्रति मिल रहे समर्थन से लोगों को अवगत कराया और भारत समेत तमाम देशों के प्रति आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर उन्होंने भारतीय नेताओं आचार्य जेबी कृपलानी, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय आदि के तिब्बत के प्रति सकारात्मक विचारों और तिब्बत मुक्ति आंदोलन में उनकी भूमिका का भी आभार जताया। अध्यक्षीय भाषण में पूर्व लोकसभा महासचिव एवं संविधानविद् डॉ. सुभाष कश्यप ने कृपलानी से अपने संबंधों को बताते हुए तिब्बत पर कृपलानी के विचारों को रखा और भारतीय जनता की ओर से आश्वस्त किया कि तिब्बत के हित में जो कुछ भी सामने आएगा, यहां के लोग और सरकार जरूर करेगी।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी अभय प्रताप ने कहा कि ‘रिलीफ’ आचार्य कृपलानी का एक बड़ा मिशन था। 1934 में बिहार भूकंप के बाद पीड़ितों की सेवा के लिए उन्होंने रिलीफ कमिटी बनाया और बड़े पैमाने पर सेवा की। 1948 के बाद पंजाबी शरणार्थियों की सेवा के लिए उनके नेतृत्व में सेंट्रल रिलीफ कमिटी बनी जिसने बाद में तिब्बती शरणार्थियों के लिए बड़े पैमाने पर काम किया।

इस अवसर पर आचार्य कृपलानी की अंग्रेजी पुस्तिका ‘तिब्बत’ का लोकार्पण एवं वितरण भी किया गया। पुस्तिका में 1952 से 59 के बीच आचार्य कृपलानी द्वारा संसद में तिब्बत संकट के सवाल पर दिए गए भाषणों के अंश तथा लेख हैं जिसे 1959 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने छापा था। व्याख्यानमाला के शुरू में भारत-तिब्बत मैत्री संघ के महासचिव एवं समाजशास्त्री प्रो. आनंद कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया। धन्यवाद ज्ञापन आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट के सीनियर ट्रस्टी प्यारे मोहन त्रिपाठी ने किया।

इस अवसर पर श्रीमती लोबसांग सांगे व उनकी पुत्री भी उपस्थित रहीं। उपस्थित अन्य महत्वपूर्ण लोगों में वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नंदकिशोर त्रिखा, पूर्व सांसद आर.के. खिरमे एवं डॉ. महेशचंद शर्मा, बिहार सरकार के पूर्व मंत्री नवल किशोर शाही, विश्व युवा केंद्र के निदेशक उदयशंकर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय, पर्यावरणविद अनुपम मिश्र, गाँधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री अशोक कुमार, गाँधी स्मृति दर्शन समिति की पूर्व निदेशक मणिमाला व वर्तमान निदेशक दीपंकर श्रीज्ञान, बसंत भाई, राजीव रंजन राय के नाम शामिल हैं।

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