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आज के अखबार : पीएम मोदी अपने शासन की बुराइयों की बात नहीं करते हैं, पढ़िए अब क्या बोल गए!

चुनाव आयोग पर दो फेट अकम्पली के बाद डिजिटल अरेस्ट पर चिन्ता, प्रदूषण की खबर?

घोषित और अघोषित इमरजेंसी का अंतर – इस चुनावी भाषण में वोट खरीदने के लिए किए गए अग्रिम भुगतान का प्रचार है। सरकारी नीति से लाभ होने (जीएसटी) की याद दिलाई गई है। मंदिर तो है ही। बदले में राज्य में मुस्लिम उम्मीदवारों को ढूंढ़ना पड़ रहा है। मोहम्मद जाहिद ने लिखा है मुस्लिम विधायक का क्या करेंगे, कम जालिम सरकार चुनिए।

संजय कुमार सिंह

आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, संविधान की प्रति और गुलाब का फूल थाम 210 नक्सलियों ने डाले हथियार, मुख्य धारा में लौटे। तथ्य यह है कि दक्षिण एशिया टेररिज्म पोर्टल (एसएटीपी) के अनुसार, 2014 से अब तक 1,963 नक्सलियों के मारे जाने की खबर है और ये सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए हैं। कुछ स्रोत यह आंकड़ा 2089 बताते हैं। स्पष्ट है कि 2014 के बाद की सरकार ने नक्सलवाद-विरोधी रणनीति तेज किया है। 2018 में सरकार का दावा था कि, “2014-17 के दौरान 3,500 से अधिक नक्सलियों ने समर्पण किया था।” मुझे लगता है कि इन तथ्यों के मद्देनजर यह खबर इतनी बड़ी नहीं है कि लीड बनाई जाए। सरकार को खुश करना हो तो बात अलग है।

हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है, कांग्रेस शासन के दौरान ‘शहरी नक्सलियों’ ने माओवादी आतंकवाद पर चर्चा को अवरुद्ध किया। खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को माओवादी हिंसा को आतंकवाद का एक रूप बताया और केंद्र में कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान “शहरी नक्सलियों” पर प्रमुख संस्थानों पर कब्ज़ा करने और वामपंथी उग्रवाद पर चर्चा को दबाने का आरोप लगाया। दिल्ली में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, “कांग्रेस शासन के दौरान, शहरी नक्सलियों का तंत्र इतना प्रभावशाली हो गया था कि देश के बाकी हिस्सों को माओवादी आतंकवाद की व्यापकता का पता ही नहीं चला।” तथ्य यह है कि प्रधानमंत्री अपने शासन की बात नहीं करते हैं। कांग्रेस के शासन या उस समय के कथित भ्रष्टाचार की जो बातें करते रहे हैं उसका हश्र सबको मालूम है। प्रमुख संस्थाओं पर कब्जे की बात अब कह रहे हैं जब हाल में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की घोषणा और कई मामलों में फेट एकम्पली से साबित हो चुका है कि अदालत को भी दबाव में लेने की कोशिश की जाती रही है। संस्थाओं को कब्जे में लेने का मामला तो पुराना हो गया भाजपाई कब्जे में चुनाव आयोग भी है। फिर भी, प्रधानमंत्री यह सब कहने की हिमाकत कर रहे हैं और अखबार उन्हें खुश करने वाली खबरें छाप रहे हैं। भाजपा शासन (कई बुराइयों के मामले में) कांग्रेस वाले से ना अलग है ना बेहतर है। उससे बहुत आगे जरूर कहा जा सकता है। जो भी हो, आतंकवाद खत्म करने के नाम पर और खत्म कर दिए जाने के दावों का हाल जानते ही हैं। बीच में घुस कर मारूंगा, ऑपरेशन सिन्दूर और फिर क्रिकेट में वही दोहराया जाना – शर्मनाक राजनीति है। हिन्दू आतंकवाद के आरोपी का बचाव और संरक्षण किसी से छिपा नहीं है। बलात्कारियों, अपराधियों दंगाइयों और आर्थिक लुटरों के मामले कम नहीं हैं। सब अलग मुद्दा है। भाजपा शासन में ही ऐसी बुलडोजर राजनीति हो रही है। बेशक इमरजेंसी इसके मुकाबले कहीं नहीं टिकती। वैसे भी वह घोषित थी।

नवोदय टाइम्स की लीड है, लेह हिन्सा की जांच के लिए आयोग गठित। तथ्य यह है कि सोनम वांगचुक को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है और जो स्थितियां हैं उनमें जमानत नहीं हुई है। यही नहीं, दिल्ली दंगों के मामले में गिरफ्तार कई लोगों की जमानत पांच साल से भी ज्यादा समय के बाद भी नहीं हुई है। दंगे में निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए अदालत में दिल्ली पुलिस की खिंचाई हो चुकी है, इसके बावजूद।

देशबन्धु में टॉप पर छह कॉलम की खबर है, दीवाली से पहले ही दिल्ली की हवा हुई जहरीली। तथ्य यह है कि प्रदूषण रोकने के लिए पुरानी गाड़ियों को कंडम करने का नियम बना था। इसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। इससे पहले कइयों को अपनी ठीक-ठाक और प्रिय गाड़ियां बेचनी पड़ी थी। लोग दादा-पिता की पुरानी और प्रिय गाड़ियां नहीं रख सकते हैं जबकि विन्टेज कारों का शौक और धंधा पुराना व बड़ा है। प्रदूषण रोकना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन पिछले साल पटाखों पर प्रतिबंध के बावजूद पटाखे चले। पुलिस और सरकार ने कुछ नहीं किया। भाजपा नेताओं ने भी चलाए थे। इस बार तो मुख्यमंत्री और दिल्ली भाजपा ने दावा ही किया कि उन्होंने (अदालत पर दबाव डालकर, भले कानूनी तरीके से) आतिशबाजी चलाने की मंजूरी दिलाई। इससे प्रदूषण बढ़ेगा, बढ़ गया है पर यह खबर प्रमुखता से नहीं है।

देशबन्धु की लीड है, हरिओम वाल्मीक के परिजनों से मिले राहुल गांधी। कहा, भाजपा राज में दलितों का उत्पीड़न हो रहा है। वैसे तो ऐसी कई खबरें हैं। तथ्य यह है कि सोशल मीडिया पर घोषित और वेतन भोगी प्रचारक ने भी लिखा है, हरिओम वाल्मीकि परिवार ने राहुल गांधी से मिलने से मना कर दिया है। हत्या के आरोपियों के पैरों में गोली मार दी गई है क्योंकि वे भागने की कोशिश कर रहे थे। अब वे नॉर्मल नहीं चल पाएंगे। 12 अरेस्ट हैं। वे लंबे समय के लिए नपे हैं और उनको फांसी भी हो सकती है। बहन और भाई को सरकारी नौकरी दी गई है। सीएम ने परिवार से मुलाकात की है और हर संभव मदद और सुरक्षा का वचन दिया है। परिवार को सरकारी घर व मुआवजा दिया जा रहा है। दो कैबिनेट मंत्री घर पर हो आए हैं। परिवार की बात राहुल जी को माननी चाहिए। हर जगह राजनीतिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति गलत है।

इसपर मैंने लिखा है, एक पीडि़त परिवार ने अगर राहुल से मिलने से मना कर दिया और इसलिए कि कार्रवाई हुई है तो यह भी मानिए कि ‘कार्रवाई’ क्यों हुई। कुछ समझे? मेरा मानना है कि ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान पाकिस्तान के हमले से जान-माल का जो नुकसान हुआ उसे देखने उसकी भरपाई करने सरकार की ओर जो गया उसकी खबर नहीं है। सरकार ने किसी को कोई मुआवजा दिया हो तो प्रचार नहीं है। तथ्य यह है कि राहुल गांधी यहां भी गए थे। अपने स्तर पर जो कर सकते थे किया ही होगा। तब किसी ने नहीं कहा था कि राजनीति कर रहे हैं। अब भाजपाई प्रचारक और संरक्षण प्राप्त ट्रोल सेना जो कर रही है वह देखने-समझने लायक है।   

द टेलीग्राफ की आज की लीड का शीर्षक है, डिजिटल अरेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की नजर। तथ्य यह है कि डिजिटल इंडिया के भरपूर प्रचार और प्रदूषण की स्थायी समस्या के बावजूद डिजिटल दीवाली के विकल्प को नहीं चुना गया। जजों पर दबाव का खुलासा कॉलेजियम की घोषणा से हो चुका है और इतने बड़े, गंभीर तथा भारी राशि और प्रभावशाली लोगों को ठगने वाले चर्चित मामले में पुलिस (सरकार) ने कुछ ठोस नहीं किया है। धनराशि नहीं के बराबर बरामद हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने अब चिन्ता जताई है। तथ्य यह है कि तब जब किसी पीड़ित ने मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई को चिट्ठी भेजी।

इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स औरदि एशियन एजकी लीड बिहार चुनाव पर है। दोनों अखबारों का शीर्षक यही बताता है कि इंडिया गठबंधन में सब ठीक नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस का इंट्रो है, पहले चरण का नामांकन पूरा हुआ। दर्जन भर से ज्यादा सीटों पर टकराव, कुछ पर राजद बनाम कांग्रेस। तथ्य यह है कि भाजपा गठबंधन में ऐसा नहीं है इसकी खबर लीड नहीं बनती है। वहां भी ऐसा ही है, ज्यादा हो सकता है लेकिन वह पहले पन्ने लायक भी नहीं है। बिहार चुनाव में अगर बिहारियों की चुनावी रणनीति या राजनीति गुजरातियों से खराब है तो खबर इस पर होनी चाहिए न कि इसपर कि एक में मतभेद है और दूसरे में नहीं है या दोनों में है। यह तो रहता आया है। लोग चुनाव जीत कर दल बदल करते हैं। ऐसे में इस तरह की खबरों का मकसद समझना मुश्किल नहीं है। वैसे भी, बिहार में एसआईआर और सुप्रीम कोर्ट के फेट एकम्पली के बावजूद भाजपा गठबंधन हार जाए तो कइयों को चुल्लू भर पानी ही ढूंढ़ना होगा। लेकिन खबर वह भी नहीं है। दि एशियन एज की खबर सरकारी प्रचार है कि (भाजपा जीती तो) नीतिश फिर मुख्यमंत्री हो सकते हैं। नीतिश से अमित शाह की मुलाकात के बाद ऐसी अफवाह को दम मिला है। इस खबर के शीर्षक के अनुसार विपक्ष और जनता दल एकीकृत में लड़ाई है। यह एशियन एज की खास प्रस्तुति है। वैसे खबर यह भी हो सकती थी कि नीतिश कुमार नाराज है और अमित शाह उन्हें मनाने गए थे। भाजपा के सत्ता में आने के बाद काडर पत्रकारिता के लिए बहुत दबाव बनाया गया है और यह कहा जाता रहा है कि सरकार के खिलाफ लिखने वाले उसका प्रचार भी करें।

हिन्दुस्तान टाइम्स में एक खबर है, बेलजियन अदालतों ने मेहुल चोकसी का प्रत्यर्पण क्लियर किया। तथ्य यह है कि कल ही इसी अखबार में खबर थी, अमित शाह ने प्रत्यर्पण को आसान बनाने के लिए विशेष जेलों की जरूरत बताई। हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विशेष जेलों की जरूरत है ताकि भगोड़ों के प्रत्यर्पण को आसान बनाया जा सके। सवाल उठता है कि क्या यह अभी तक पता नहीं था। अगर था तो क्यों नहीं किया गया और जेल बनाए बिना अगर मेहुल चोकसी का प्रत्यर्पण क्लियर है तो गरीब, आम या राजनीतिक कैदियों के लिए अच्छी जेल की जरूरत क्यों नहीं महसूस की गई। अब इस प्रचार से क्या साबित करना है या इसके पीछे की राजनीति क्या है? कोई बता पाएगा?

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड असम के रहने वाले गायक, अभिनेता, संगीतकार और गीत लेखक 52 वर्षीय जुबीन गर्ग के निधन से संबंधित है। आज की खबर के अनुसार सिंगापुर पुलिस ने कहा है कि अभी तक उसे जुबीन की मौत के संबंध में कुछ संदेहास्पद नहीं मिला है। खबर के अनुसार, पेशेवर विस्तृत जांच में समय लगता है। सिंगापुर पुलिस ने सभी पक्षों से अपेक्षा की है कि वे धैर्य रखें और स्थिति को समझें। जनता से यह अपील भी की गई है कि वे अटकल न लगाएं और अपुष्ट खबरें न फैलाएं। इस बीच असम के मुख्यमंत्री ने कह दिया कि राहुल गांधी भूपेन हजारिका के निधन पर नहीं आए थे। बाद में लोगों ने बताया कि मुख्यमंत्री ने खुद ही फेसबुक पोस्ट करके राहुल गांधी को श्राद्ध में शामिल होने के लिए धन्यवाद दिया था। द प्रिंट में  9 सितंबर 2025 की पीटीआई की खबर के अनुसार यह मुद्दा पहले भी उठा था। तब हिमंत बिस्व सरमा ने कहा था कि “राहुल गांधी ने श्रद्धांजलि देने में देर की और उनका ट्वीट बाद में ‘डैमेज कंट्रोल’ था।” दूसरी ओर, राहुल गांधी बिहार चुनाव से अलग कहीं जाते हैं तो ट्रोल सेना उनकी आलोचना करती है कि बिहार की चिन्ता नहीं कर रहे हैं।

ऐसे में यह कहा जा सकता है और पहले भी कहा गया है कि भाजपा झूठ की फैक्ट्री चलाती है और फैक्टचेक के नाम पर धोखाधड़ी कर रही है। ट्रम्प की टिप्पणी को लीपने-पोतने पर कल लिख चुका हूं। पीएफ से संबंधित नियम बदलने पर साकेत गोखले की पोस्ट को भ्रम फैलाने वाला कहा जा चुका है। इसपर गोखले ने लिखा, मजाक कर रहे हैं। राहुल गांधी के आरोपों का ऐसा ही फैक्ट चेक चुनाव आयोग कर चुका है। सरकार भ्रम फैलाने के तमाम उपाय करती है। इसमें पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री के भाषण याद किए जा सकते हैं। भाजपा शासन में स्वतंत्र, निष्पक्ष और संवैधानिक अधिकारों वाले चुनाव आयोग के बावजूद देश के गृहमंत्री सरकारी खर्च पर चुनावी सभा कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने एसआईआर के नाम पर जो किया वह अपनी जगह। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के साथ एसआईआर का मामला भी फेट एकम्पली हो चुका है और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का खुलासा हम जानते हैं। दिल्ली में आतिशबाजी पर रोक और अब हरित पटाखे की इजाजात, मुख्य मंत्री का दावा और पटाखों की बिक्री जारी रहने की खबरों के बीच यह बताने और साबित करने की जरूरत नहीं है कि अदालतें भी सरकार के दबाव में है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूलचूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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