Connect with us

Hi, what are you looking for?

टीवी

ये कहाँ आ गए दीपक चौरसिया!

होकम देव-

मैंने बमुश्किल दर्जन भर लोगों को ही चोटी से घोटी तक लुढ़कते देखा हैं ! मगर दीपक दादा का किस्सा ही थोड़ा अलग है। जब हम कॉलेज में पत्रकारिता का (प ) सीख रहे थे,उस वक्त हमारे प्रोफेसर बात- बात में इनका गाहे बगाहे डिंडोर पीटते रहते थे क्योंकि मध्यप्रदेश का ये पत्रकार नेम -फेम के झंडे गाढ़ रहा था।

वैसे मुझे इस आदमी की चिल्ला पौ वाली पत्रकारिता तब भी पसंद नहीं थी। पत्रकारिता की डिग्री बांटने वाली यूनिवर्सिटी और कॉलेज वाले इन दादा को अक्सर बुलाकर बच्चों को ज्ञान झड़वाते थे।

एक मर्तबा हम भी जाने वाले थे इनके लेक्चर सुनने मगर इंदौर एयरपोर्ट पर फिसल जाने से पैर में चोट आ गई थी तो इनका प्रोग्राम रद्द हो गया। सोचो आदमी कि उस वक्त कितनी वैल्यू थी।

वैसे ढलान से लुढ़कने वाला आदमी,कहा जाकर रुकेगा उसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता । लेकिन ये दादा अब कहा जाकर रुके है सब देख रहे हैं ।

शायद ही किसी बुलन्दी पर पहुंचे हुए पत्रकार कि ऐसी दुर्गति हुई हो। कथा समाप्त हुई। विजय भवः दीपक दादा

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन