ऐसे ढीले कानून की वजह से कोई भी नियोजक 1947 से आज तक जेल नहीं जा पाया

पिछले 59 वर्षों से सजा के इस कानून में संशोधन नहीं किया गया जिससे नियोक्ताओं की क्रूरता बढ़ती जा रही है…

श्री मोदी
प्रधान सेवक जी

पहले की सरकारें तो श्रमिक हितों के मामलों में सुप्त थी। आपकी सरकार से आशान्वित हूँ इसलिऐ सुझाव भेज रहा हूँ:-

१.  औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में बना। श्रम न्यायालय के निर्णय के बाद या समझोते का उलंघन करने पर धारा 29 में 17/9/1956 में संशोधन कर 6 माह की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान जोड़ा गया। ऐसे ढीले कानून की वजह से कोई भी नियोजक 1947 से आज तक जेल नहीं जा पाया।

59 वर्षो में इस धारा में संशोधन नहीं हुआ। कानून का उल्लंघन करने वालों को सजा का प्रावधान है परन्तु कोर्ट के निर्णयों की पालना न करने वालों को सजा का सख्त प्रावधान हो और सजा कार्यान्वित करने के लिऐ सरकार से अनुमति का नियम हटाया जाऐ तथा इसमें सजा का नियम कम से कम 5 वर्ष तथा अधिकतम 10 वर्ष किया जावे। जुर्माना राशि भी कम से कम 5 लाख किया जावे।

एक केस में 1996 में श्रम न्यायालय से भरतपुर कोर्ट में निर्णय हुआ। इन 10 मजदूरो में से 4 मर गये हैं। हाईकोर्ट की डबल बैन्च तक केस भी जीते परन्तु 30 सालों तक केस लड़ने के बाद भी एक पैसा भी नहीं मिला और न ही नियोजक को सजा मिली। सजा भी क्या अधिकतम 6 माह की, वह भी अपील करने पर जमानत।

ऐसे में श्रम न्यायालयो के निर्णयों को प्रभावी बनाने के लिए 59 वर्ष बाद अब संशोधन की जरूरत है।

बृजेन्द्र विहारी शर्मा
लोकतन्त्र सेनानी
एवं जिला उपाध्यक्ष बीएमएस
भरतपुर
atalbbihari@gmail.com

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