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दिल्ली

खंडूड़ी साहब, लोगों के घर वोट मांगने क्या आप अपॉइंटमेंट लेकर जाते हैं?

रविवार, 28 सितम्बर को एक मित्र के आग्रह पर कार्यक्रम के लिए उत्तराखंड के सांसदों को न्योतने का प्रोग्राम बना। कुल जमा सात लोग थे। विश्वस्त सूत्रों से मालूम हुआ कि फिलहाल दिल्ली में सिर्फ एक सांसद माननीय बीसी खंडूड़ी मौजूद हैं। लिहाजा तय हुआ कि पहले उन्हीं से मिल लिया जाए।

रविवार, 28 सितम्बर को एक मित्र के आग्रह पर कार्यक्रम के लिए उत्तराखंड के सांसदों को न्योतने का प्रोग्राम बना। कुल जमा सात लोग थे। विश्वस्त सूत्रों से मालूम हुआ कि फिलहाल दिल्ली में सिर्फ एक सांसद माननीय बीसी खंडूड़ी मौजूद हैं। लिहाजा तय हुआ कि पहले उन्हीं से मिल लिया जाए।

नई दिल्ली के वीआईपी क्षेत्र के कामराज मार्ग स्थित खंडूड़ी जी के बंगले पर पहुंचकर उनके कार्यालय का दरवाजा देखा तो बंद था। लिहाजा सबने तय किया कि बंगले के भीतर चला जाए। मेरी छठी इंद्री का कमाल था या सुनी-सुनाई कुछ बातें। मैनें सबसे कहा कि खंडूड़ी जी कहीं ये न कह दें कि अपॉइंटमेंट है क्या आपके पास। तब शायद बाकी लोगों को मेरा ये कहना मजाक लगा होगा।

बातों ही बातों में हम खंडूड़ी जी के बंगले के भीतर के मुख्य तक पहुंचे जो अधखुला था। हममे से एक ने अधखुला द्वार खोला तो सामने साक्षात खंडूड़ी जी दिखाई दिए। भीतर शायद कुछ साज- सज्जा का काम चल रहा था और खंडूड़ी जी सामान्य से कपड़ों में थे। अचानक खुले द्वार और सात लोगों को देखकर खंडूड़ी जी भड़क गए। कौन हो तुम लोग…अंदर कैसे आ गए…?? इससे पहले खंडूड़ी जी और भड़कते मैनें कहा कि सर, हम लोग फलां संस्था से हैं और एक कार्यक्रम के लिए आपको इनविटेशन देनें आये हैं।

“तुम्हारे पास अपॉइंटमेंट है क्या…बाहर ऑफिस से संपर्क क्यों नहीं किया?” मैनें कहा सर, ऑफिस पर तो ताला है। “तुम लोगों को पता नहीं, आज संडे है” खंडूड़ी जी गरजे। मैनें कहा सर, आपको इनविटेशन देनें आया है, ले लीजिये। “लाइए” और लगभग कार्ड को झपटते हुए खंडूड़ी जी फिर बोले “आगे से अपॉइंटमेंट लेकर आइयेगा। बाहर निकलने के लिए तेजी मूड़ लिए इस डर के साथ कि न जाने खंडूड़ी साहब और क्या सुना दें।” तेज क़दमों से बाहर निकलते हुए सब सोच रहे थे कि मुहूर्त की ही ऐसी की तैसी हो गयी। मूड खराब हुआ सो अलग। अभी तो बहुत से सांसदों को इनविटेशन देना है। तभी पीछे से खंडूड़ी साहब की आवाज़ फिर सुनाई दी “इन लोगों अंदर किसने आने दिया?”

रविवार था लिहाजा कोई भी सांसद व्यक्तिगत तौर पर नहीं मिला लेकिन बाकी लोगों के स्टाफ ने कम से कम पानी के लिए तो पूछा ही। थका-हारा घर पहुंचा। खाना खाते हुए सोचा कि न्यूज़ हेडलाइंस तो सुन ही ली जाएं। टीवी ऑन किया तो न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर पर किसी भी पल प्रधानमंत्री मोदी जी के आने की खबरें फ़्लैश हो रही थी। सोचा कि खाना खत्म होने तक मोदी जी आ गए तो ठीक वरना टीवी बंद कर सो जाऊंगा। खाने के बीच ही मोदी जी मंच पर आ गए और फिर शुरू हुआ प्रधानमंत्री मोदी का ओजस्वी भाषण। रात सवा ग्यारह बजे भाषण समाप्त हुआ तो टीवी बंद कर सोने की कोशिश करने लगा। आंखों से नींद कोसों दूर और मोदी जी के शब्द लगातार कानों में गूँज रहे थे…देश के 125 करोड़ लोगों ने आशीर्वाद दे दिया जो ईश्वर का ही आशीर्वाद है। और ये भी कि मतदाता भगवान का ही रूप होता है। तब मैं सोच रहा था कि क्या खंडूड़ी ये देख रहे होंगे और क्या जो कुछ उन्होंने हमारे साथ किया उसके लिए उन्हें लेशमात्र भी पछतावा हो रहा होगा।

मैं हृदय से ये मानता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत गोपनीयता का हक़ होना चाहिए। चाहे वो जनसाधारण हो या खंडूड़ी जी जैसा कोई सांसद। इससे पहले कि मैं आगे बढूं, आपको थोड़ा सा उन परस्थितियों के बारे में बता दूं जिनके तहत हम लोग बैगैर बताये सांसद साहब के सरकारी घर पहुंच गए। दरअसल, हमारे साथियों को बिलकुल भी आभास नहीं था कि खंडूड़ी साहब किस मिजाज के आदमी हैं। मुझे थोड़ा बहुत अंदाजा था, लेकिन वो भी सुना सुनाया। जैसे कि वो अपॉइंटमेंट लेकर मिलने वालों से भी कौन बनेगा करोड़पति के अमिताभ बच्चन की तर्ज पर “आपका समय शुरू होता है अब” और समय समाप्त होने पर ये भी बोल देते हैं कि “आपका समय समाप्त होता है।”  जब खंडूड़ी जी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे तब मुझे एक विधायक जो कि सत्तारूढ़ दल ही के थे ने बताया कि महीने दो महीने में खंडूड़ी जी से मुलाक़ात के बाद अगर दुबारा मुख्यमंत्री जी से मिलने पहुंच गए तो समझो हो गया फजीता। खंडूड़ी साहब कहेंगे “अभी पिछले महीने तो तुम मिले थे, फिर आ गए!”  

चलिए, ये तो रही सुनी-सुनाई बातें। कितनी सच्ची हैं कितनी झूठी ये तो खंडूड़ी जी ही जाने। मुझे तो सिर्फ इतना पता है कि मेरे साथ क्या गुजरी। कुछ मित्रों ने कमेंट किया है कि हमें बिना अपॉइंटमेंट के माननीय सांसद के सरकारी आवास पर नहीं जाना चाहिए। उस दिन यानि, रविवार 28 सितंबर को हम लोग मोदी सरकार में मंत्री सुश्री उमा भारती और धर्मेन्द्र प्रधान के सरकारी आवासों पर भी निमंत्रण देने गए, लेकिन वहां तो ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला। बाकायदा, सुरक्षा जांच के बाद हमे भीतर जाने दिया गया। मैं ऐसा इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि खंडूड़ी साहब के आवास पर ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं थी। अगर होती तो इस अप्रिय घटना से बचा जा सकता था। के कामराज स्थित कोठी के बाहर बने कार्यालय के द्वार पर ताला लगा था। कोठी का बाहरी मुख्य द्वार खुला था और बंगले का मुख्य द्वार भी आधा खुला था। अब अगर किसी से ये पूछते कि जनरल साहब अंदर हैं कि नहीं तो कहां पूछते !

क्या ही अच्छा होता कि सांसद महोदय बाहर गेट पर सुरक्षाकर्मी तैनात कर देते, जो बाहर से ही अपने सांसद से बैगैर अपॉइंटमेंट लिए हुए लोगों को टरका सकते।

कौन कहता है कि खंडूड़ी साहब ऐसे ही हैं। बड़े कानून पसंद हैं। किसी से बिना अपॉइंटमेंट नहीं मिलते। अगर ऐसा है तो चुनाव के समय वो सब चोंचले कैसे कर पाते हैं जनरल साहब, जैसे और घाघ राजनेता कर लेते हैं। सन 2004 की बात है जब हम पौड़ी के सींकूखाल में एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। शूटिंग देखने वालों की अच्छी-खासी भीड़ जमा थी। चुनाव का समय था लिहाजा खंडूड़ी साहब भी चुनाव प्रचार कर रहे थे। अचानक खंडूड़ी साहब का काफिला वहां से गुजरा। भीड़ देखकर काफिला रुका और वहां से कुछ लोग उतरकर भीड़ को चीरते हुए यूनिट के पास आये और कहा कि खंडूड़ी साहब जनता को सम्बोधित करना चाहते हैं। चूंकि फिल्म मैं डायरेक्ट कर रहा था तो यूनिट के लोग उन्हें मेरे पास ले आये। मैनें कहा कि समय कम है और हम सड़क पर शूटिंग कर रहे हैं लिहाजा वे लोग आधे घंटे बाद आ जाएं। बस फिर क्या था वे लोग लगे आंखें तरेरने। खंडूड़ी साहब का हवाला देकर कहने लगे कि आप नहीं जानते कौन हैं। किसी तरह समझा बुझाकर मामला शांत किया और शूटिंग दुबारा चालू की। कुछ देर बाद नीचे किसी जनसभा को सम्बोधित कर खंडूड़ी जी का काफिला फिर शूटिंग स्थल पर पहुंच गया। शूटिंग तब भी चल रही थी। एक बार फिर वही चख-चख शुरू हो गयी। प्रवासी उत्तराखंडी होनें और किसी अप्रिय घटना से बचने के लिए शूटिंग रोकनी पड़ी। खंडूड़ी जी आये और उन्होंने वहीं सड़क पर जमा जनता को सम्बोधित कर वोट मांग डाले।

आप लोग कहेंगे कि इतनी लंबी चौड़ी दास्तां किसलिए ! वो इसलिए कि जब चुनाव लड़ने का समय हो तो वही सब पैंतरे आजमाओ जो घाघ से घाघ नेता इस्तेमाल करते हैं और जब चुनाव जीत जाओ तो ये दिखाओ कि मैं तो ऐसा हूं और सबसे अलग हूं। आखिर में माननीय खंडूड़ी जी से एक सवाल कि क्या वो मतदाताओं के घर अपॉइंटमेंट लेकर वोट मांगने जाते हैं क्या? मत भूलिए कि अभी 2017 में उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं। तब जनता भी आपसे शायद ये पूछे कि अंदर कैसे आ गये…….अपॉइंटमेंट है क्या!!!

 

वेद प्रकाश भदोला

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1 Comment

1 Comment

  1. purushottam asnora

    October 5, 2014 at 1:55 am

    agale chunav mai khanduri sahab ko appoimant le kar aana parega.

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