मनीष सिंह-
क्या भारत के प्रधानमंत्री, किसी और देश के राष्ट्रपति के अधीनस्थ है? यदि नहीं तो इस रिपोर्टिंग का क्या मतलब है?
भारत के सुरक्षा सलाहकार, भारत के प्रधानमंत्री की किसी अन्य देश के नेता के साथ हुई गोपनीय बातचीत का विवरण, थर्ड पार्टी से क्यों साझा कर रहे हैं।
वीडियो देखें, जो रूसी समाचार एजेंसी, स्पूतनिक ने जारी किया है। मिमियाते हुए NSA पुतिन के सामने गिड़गिड़ा रहे है- “मेरे प्रधानमंत्री ने, जैसा कि फ़ोन पर कहा, वो आपको अपनी यूक्रेन की यात्रा के बारे में एवं प्रेसिडेंट जेलेंस्की से मुलाक़ात के बारे में बताने के लिए उत्सुक थे।
वो चाहते थे कि मैं उनकी मुलाक़ात का ब्यौरा आपसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर दूँ।
प्रेसिडेंट जेलिन्सकी से उनकी मुलाक़ात एक क्लोज फ़ॉर्मेट में हुई। मुलाक़ात में दो नेता मौजूद थे। साथ में उनके दो लोग और थे। और प्रधानमंत्री की तरफ़ से मैं भी मौजूद था।”
वीडियो यहीं कट हो जाता है।
इसे डिकोड कीजिए। समझ आयेगा कि डेढ़ होशियार, और विदेश नीति को महज फोटोबाजी समझने वाले पीएम ने, यूक्रेन में जेलिन्सकी के गले लगाकर, कंधे पर धौल मारकर, हाथ पकड़कर मसलते हुए जो फोटोबाजी की, उसे पुतिन ने सहजता से नहीं लिया, और नाराज हैं। जब झाड़ पड़ी, तो पीएम ने फोन करके मान मनव्वल करने की कोशिश की रही होगी।
फिर भी जब बात बनी नहीं, तो विशेष दूत को आपाधापी में भेजा गया है- जो मां कसम खाकर बता रहे हैं कि भैया, जेलिन्सकी के साथ हमारा कुछ गम्भीर नहीं हुआ। बस एवें ही यूक्रेन पर्यटन पर चले गए थे।
सच्ची-मुच्ची, कुछ खास नहीं हुआ। मैं तो खुद भी था न वहां, मैं गवाह हूँ।
यह विदेश में डंका बजने की सच्चाई है। नाक रगड़ी जा रही है। फॉरेन पॉलिसी का मलीदा बन चुका है। मजाक चल रहा है यहां।
देश की सोवर्निटी के घोड़े लगे हैं। भक्त चिल्ला रहे हैं- “वार रुकवा दी पों-पों” क्या ही चुनता है यह देश? दोषी ये नहीं, 38% मूर्खों का जमावड़ा है।
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