लखनऊ के इस निडर पत्रकार की पत्रिका को न छपने देने के लिए आदेश जारी

अनूप गुप्ता (संपादक, दृष्टांत)

पत्रकार का नाम अनूप गुप्ता. मैग्जीन का नाम दृष्टांत. बड़े बड़ों की पोलखोल करने वाली इस पत्रिका की आंच से ब्यूरोक्रेसी तप रही है. इस जलन में अफसरों ने दृष्टांत मैग्जीन को छापने से रोक दिया है. लखनऊ समेत देश भर की सैकड़ों दलाल पत्रिकाएं जो सत्ताधारी योगी सरकार के नेताओं-मंत्रियों और इनके अफसरों के गुणगान में बिछी रहती हैं, धड़ल्ले से छप रही हैं और विज्ञापन भी खूब पा रही हैं. पर एक सच लिखने वाली पत्रिका इन लोगों को बर्दाश्त नहीं है.

दृष्टांत मैग्जीन के जरिए अनूप गुप्ता ने दर्जनों घोटालों घपलों का पर्दाफाश किया. इस कारण उन्हें बहुत सारी नोटिस मुकदमों धमकियों हमलों को झेलना पड़ा. बावजूद इसके वो डटे रहे और अपनी पत्रिका के तेवर को धारदार बनाए रहे. पर जब सरकार ही पीछे पड़ जाए और मैग्जीन बंद कराने पर तुल जाए तो कोई क्या कर सकता है. जाहिर है, सरकार की आड़ लेकर अफसर अपनी निजी खुन्नस निकाल रहे हैं. ऐसे में अनूप गुप्ता के पास अब एक ही विकल्प है कि वे इस निरस्तीकरण के खिलाफ कोर्ट जाएं, स्टे लाएं और पत्रिका छापें. या फिर किसी नए नाम से ये पत्रिका किसी दूसरे स्टेट से रजिस्टर्ड कराएं.

देखें दृष्टांत के घोषणापत्र के निरस्तीकरण का आदेश-



 

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Comments on “लखनऊ के इस निडर पत्रकार की पत्रिका को न छपने देने के लिए आदेश जारी

  • Rakesh Srivastava says:

    कितनी अजीब बात है कि एक जिलाधिकारी दूसरे जिलाधिकारी के कृत्यों को गलत ठहरा रहा है। सर्वविदित है कि घोषणा पत्र सत्यापन की कार्रवाई जिलाधिकारी कार्यालय स्तर से की जाती है। जाहिर है कि समस्त कार्रवाई विधि सम्मत से पूर्ण करायी जाती है। ऐसे में यह कहा जाना कि विधि विरुद्ध तरीके से घोषणा पत्र जारी किया गया है तो इसका दोष मुद्रक, प्रकाशक, सम्पादक को नहीं बल्कि सक्षम अधिकारी को दिया जाना चाहिए और एक नोटिस उन्हें भी भेजी जानी चाहिए। चूंकि ऐसा सम्भव नहीं है लिहाजा पत्रिका के मुद्रक, प्रकाशक और सम्पादक को ही बलि का बकरा बनाया जा रहा है जो पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है।
    एक पत्रकार होने की हैसियत से मैं इसकी भर्त्सना करता हूं और समस्त पत्रकारों से अपील करता हूं कि पत्रकार को नोटिस भेजने वाले स्थानीय प्रशासन और सक्षम अधिकारी के खिलाफ लामबंद होकर तब तक विरोध दर्ज करें जब तक स्थानीय प्रशासन अपनी नोटिस वापस नहीं ले लेता।
    हालांकि न्यायपालिका भी एक सशक्त माध्यम है इसका जवाब देने के लिए और उम्मीद है कि सम्पादक जी ने इस दिशा में कार्रवाई प्रारम्भ भी कर दी होगी लेकिन मेरा मानना है कि इस मामले में राजधानी लखनऊ के साथ-साथ अन्य जनपदों के पत्रकारों को भी एकजुटता का परिचय दिखाना होगा ताकि पत्रिका की गरिमा को प्रदूषित होने से बचाया जा सके।
    समस्त पत्रकारों से एकजुटता की अपीलः-
    राकेश श्रीवास्तव

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