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मुख्य उप संपादक साहब आनंद के परम क्षण की आवाज मुझे सुना रहे थे!

2006-07 का साल। एकदम कच्ची 20-21 की उम्र। मैंने मास-कम्युनिकेशन में दाख़िला ले लिया था और मीडिया को सतही तौर पर ही सही लेकिन जानने लगी थी। उस वक़्त न सोशल मीडिया का इतना जोश था, न ही कोई पारंपरिक मीडिया प्रवेश सीढ़ी। आप किसी बड़े पत्रकार को जानते हैं तो नौकरी सहज है अन्यथा सालों मुफ़्त में घिसिये कहीं और फिर नौकरी मिलेगी।

अपने बूते कोई इंटर्नशिप या फिर नौकरी हासिल कर लेना बड़ी बात मानी जाती थी। उसी वक़्त अपने कुछ सीनियर्स को विभिन्न अख़बारों में बाई लाइन के साथ छपते देख मेरा भी फ्रीलांसिंग की ओर झुकाव हुआ।

मैंने इस बाबत सीनियर्स से सलाह माँगा तो पता चला कि अन्य पन्नों के मुक़ाबिल में फीचर डेस्क पर काम मिलना आसान होता है। भिन्न अख़बारों के फीचर एडिटर्स से मिल पाओ और अपनी योग्यता बता पाओ तो काम मिल जाएगा।

मैंने शुरुआत हिंदुस्तान से की क्योंकि वहाँ के तत्कालीन फ़ीचर्स एडिटर के विषय में जानकारी मिली कि बेहद सहज व्यक्ति हैं और नए बच्चों को ख़ूब तवज्जो देते हैं।

सचमुच वह बड़े भले थे। मैं गयी, रिसेप्शन पर नाम बताया कि उनसे मिलना है, उन्हें सूचित किया गया और कुछ ही देर में मैं उनके केबिन में थी। उन्होंने एक छोटा सा अनुवाद दिया, जिसे मैंने वहीं करके दे दिया। उन्होंने देखने के बाद एक फ़ीचर और उसकी डेडलाइन का ज़िम्मा थमा दिया। साथ ही हिदायत भी कि शुरू में तो हाथ से लिखा ले लेंगे मगर हिंदी टाइपिंग जल्दी सीखो।

आलेख लिख कर देने के हफ़्ते भर के भीतर मेरे द्वारा लिखा हुआ कुछ किसी राष्ट्रीय अख़बार में था।

अगली बार उन्होंने मेरी तारीफ़ की और अपने एक मातहत से मिलवाते हुए कहा कि मैं कहीं और जा रहा हूँ, अब से ये महोदय तुमसे लिखने को कहेंगे।

जिनसे उन्होंने मिलवाया था वह महानुभाव तब फ़ीचर विभाग के चीफ़ सब एडिटर थे।

मैं अब अपने आलेख इन महानुभाव को देने लगी और मुझसे एक के बदले दो आलेख लिखवाया जाने लगा। काम बढ़ा तो चीफ़ सब साहब का काम देने के लिये फ़ोन करने का सिलसिला भी। बातों की आवृत्ति बढ़ी तो मैं भी सहज होकर बात करने लगी। ख़ास बात यह कि काम देते हुए वह अक्सर कुछ अच्छी बात बता जाते, लिखने को लेकर।

मुझे अच्छा लगता जब भी वह फ़ोन करते। नहीं कोई क्रश नहीं था। कोई प्यार नहीं था। बस, सम्मान था।

दो-चार महीने के बाद एक दिन शाम में उनकी कॉल आयी। मुझे लगा कि कोई नया काम होगा। मैंने इस बाबत पूछा तो उन्होंने हँसते हुए मना कर दिया। सिर्फ़ इतना कहा कि “कुछ पढ़ रहा था तो तुम्हारे फ़लाने लेख की याद आयी। अच्छा लिखा था तुमने।”

मैंने शुक्रिया कहा तो उन्होंने कहा कि “एक बात और थी।”

मैंने पूछा कहिये, “तुम बहुत सुंदर हो।”

मैंने फिर से “शुक्रिया” कहा। उन्होंने आगे कहा “दिल करता है किसी दिन तुम्हें डेट पर लेकर जाऊँ, चलोगी।”

मैं हँस पड़ी और उनसे कहा “सर टाँग खींचने के लिए मैं ही मिली हूँ।” इसके बाद बात आयी-गयी हो गयी।

मैं उन्हें एक आम फ़्लर्ट मान बैठी थी इसलिए उनकी किसी बात को गंभीरता से नहीं लेती थी।

इस वाक़ये के क़रीब महीने भर की बात है। रात में तक़रीबन ग्यारह बजे उनकी कॉल आयी। मैंने फ़ोन उठाया, ‘हेलो’ किया। ‘हेलो’ का कोई प्रति-स्वर नहीं आया।

फ़ोन पर जो आवाज़ आ रही थी, वह सुनने के लिए मैं बिल्कुल तैयार नहीं थे।

मुख्य उप संपादक साहब अपनी किसी महिला मित्र अथवा पत्नी के साथ आनंद के परम क्षण भोग रहे थे। उन्होंने फ़ैसला किया था कि उन क्षणों की अंतरंगता को वह मुझसे भी साझा करें।

मैं फ़ोन से आती आवाज़ सुनकर सन्न थी। मेरे भाव क्या थे मुझे ठीक-ठीक नहीं पता, मगर मुझे कुछ भी ठीक नहीं लगा यह तय था। मैं उन्हें कनफ्रंट करना चाहती थी, कर नहीं पाती थी। अपनी लज्जा में ही सिमटी रह जाती। वह ऐसा दिखाते जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

मेरे ऊपर असर यह हुआ कि मैं उनसे और फिर हिंदी की दुनिया से भागने लगी। लेखन कब का बंद हो गया। एक दिन अचानक उन्होंने कॉल किया कि “तुम हमारे यहाँ अप्लाई कर दो, हो जाएगा।”

मैंने जवाब दिया कि मुझे ‘अंग्रेजी कंटेंट राइटिंग’ की नौकरी मिल गयी है सर। मुझे नहीं लिखना अब। उन्होंने उस दिन मुझे मीडिया की तमाम ख़ूबियाँ गिनाई थीं। बार-बार अपने अख़बार के ब्रांड इमेज की बात बता रहे थे। मैं चिढ़ रही थी। मैंने आख़िर में कह दिया कि “आप प्लीज् फ़ोन न किया करें।”

वह महानुभाव मेरा ऊपरी तौर पर कुछ बिगाड़ नहीं पाए थे परंतु उनकी हरक़तों ने मुझे विधा से ही सालों के लिए दूर कर दिया जहाँ मैं बेहतर कर सकती थी।

मीटू कोई बाहरी भूत नहीं है। यह हम सब स्त्रियों का भोगा हुआ सच है। हक़ीक़त यह भी है कि मैं इसे अब भी गाहे-बगाहे झेलती हूँ।

अंतराष्ट्रीय संस्था में काम करते हुए मेरे ही प्रोजेक्ट के वरिष्ठ सहकर्मी फ़ोटो खिंचवाते वक़्त अपनी उँगली मेरी कमर के उस हिस्से पर रख देने की हिमाकत कर देते हैं, जहाँ साड़ी बंधी होती है। जब मैं नज़रें कड़ी करती हूँ, तुरंत शरीफ़ भी बन जाते हैं।

कभी कोई महानुभाव काम के लिए कॉफी पर आमन्त्रित करते हैं। मैं कॉफी पर जाती हूँ तो काम के अतिरिक्त सारी चर्चा होती है। मैं बाय कहते हुए कह देती हूँ, “अगली बार काम का नाम लेकर मत मिलियेगा। बस मिलने की बात कीजियेगा, एल्स आई हेट टू साउंड रूड।”

मीटू को झूठ कहने से पहले गिरेबाँ में झांकियेगा ज़रूर… गहरे देखेंगे तो वहाँ हम सी कई लड़कियों की दिल तोड़ने वाली दास्ताँ दिख जायेगी। आपका अपना सच भी…

पत्रकार अणुशक्ति सिंह की एफबी वॉल से.

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