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सियासत

दुनिया का बड़ा हिस्सा बदहाल है क्योंकि चंद धनपशुओं ने श्रम और पैसे को अपनी तिजोरी में खींच लिया है

छः अरब से ज़्यादा हम जैसे लोगों की इस दुनिया को बस कुछ हज़ार लोग खिलौने की तरह नचा रहे हैं, वे इस खिलौने से खेल रहे हैं, अरबों-खरबों डालर कमा रहे हैं। वे इतना पैसा पीटते है कि अब तक पैदा हुए किसी महाराजा या शहंशाह को भी मात देते हैं। पहले तो भारत में पांच सौ से ज़्यादा रियासतें थीं। अब तो पूरे भारत में बस कुछ सौ खरबपति हैं जिन्हें फ़ोर्ब्स ने लिस्ट किया है।

छः अरब से ज़्यादा हम जैसे लोगों की इस दुनिया को बस कुछ हज़ार लोग खिलौने की तरह नचा रहे हैं, वे इस खिलौने से खेल रहे हैं, अरबों-खरबों डालर कमा रहे हैं। वे इतना पैसा पीटते है कि अब तक पैदा हुए किसी महाराजा या शहंशाह को भी मात देते हैं। पहले तो भारत में पांच सौ से ज़्यादा रियासतें थीं। अब तो पूरे भारत में बस कुछ सौ खरबपति हैं जिन्हें फ़ोर्ब्स ने लिस्ट किया है।

ये कुछ हज़ार खरबपति सारी दुनिया का तेल, लोहा, खनिज, पानी और जंगल अपनी मुट्ठी में कर लेने के लिए बावले हैं। वे दिन रात अपने मैनेजरों से यही प्लान बनवाते हैं कि किस देश के संसाधनों को कैसे जल्दी जल्दी अपने कब्जे में किया जाए।

वे हथियार बेचते हैं, हथियार खूब बिकें इसके लिए पड़ोसी मुल्कों में लगातार शक संदेह पैदा करके आग जलाए रखते हैं। वे ड्रग्स बेचते हैं। नन्हें मासूमों की तस्करी करते हैं। वे पूरी दुनिया के मेहनत करने वालों को अपनी उँगलियों के इशारे पर नचाते हैं। वे बताते हैं काम का मतलब है कम्पनी की तरक्की। वे मुनाफाखोरी के ऊंचे ऊंचे टारगेट्स बनाते और बढ़ाते चले जाते हैं। उनकी नौकरियाँ करने वालों के प्यार और परिवार छूटते चले जाते हैं।

इनकी हवस ऐसी दुनिया बनाती है जहां आदमी अपने ही भाई का गला काटने को तैयार हो जाता है। एक तरफ बेहद अमीरी तो दूसरी तरफ भयानक गरीबी के पहाड़ खड़े हो जाते हैं।

रिश्ते ख़त्म होते हैं, दोस्ती ख़त्म होती है, अकेलापन और अवसाद पैदा होता है आत्महत्याएं बढ़ जाती हैं।

इन्हें लोहा चाहिए, इन्हें शीशा चाहिए, खनिज चाहिए, पेट्रोल चाहिए। फिर इन सबको बेचने के लिए बाज़ार चाहिए। तो भले हमारी ज़रुरत और ज्यादा अनाज पैदा करने की हो, क्योंकि हमारे देश में आज भी लोग भूख से दम तोड़ रहे हैं, पर इन हवासियों की खातिर खेतों को बुलडोज़र से रौंद कर बड़े बड़े आठ-दस लेन के डायनासोरी हाइवे बनाने के इन्हें ठेके दिए जाते हैं। भले गाँव, कस्बों और शहरों में चलने के लिए खडंजा भी न हो।

जंगलों को तहस-नहस करके इन्हें खनन करने दिया जाता हैं। पर्यावरण जाए भाड़ में, आदमी जाए भाड़ में। इन्हें मतलब नहीं कि कोई इको चेन नाम की चीज़ होती है, कि अगर जंगल नष्ट होंगे, तो गरमी बढ़ेगी, तो ग्लेशियर पिघलेंगे, तो दुनिया के बड़े हिस्से बाढ़ से डूब जायेंगे, कि जानवरों की नस्लें ख़त्म होना आदमी के जीवन के लिए भी बहुत बड़ा ख़तरा है।

कोई मतलब नहीं इन्हें क्योंकि इन्हें अभी लाखों अरब ख़रब डालर पीटने हैं। जिस पर चढ़ कर ये चाँद और मंगल पर अपनी बस्ती बसा लेंगे और धरती को यूं ही तड़पने के लिए छोड़ देंगे।

शर्मनाक है फ़ोर्ब्स की ये सूची जो यह बताती है कि कुछेक खरबपति क्योंकि पूरी दुनिया के पैसे और श्रम को अपनी तिजोरी में खींच चुके हैं इसीलिए दुनिया का बड़ा हिस्सा इतना बदहाल है।

 

सोशल एक्टिविस्ट और कवि संध्या नवोदिता की फेसबुक वाल से साभार।

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